सआदत हसन मन्टो और कश्मीर

उर्दू से अनुदित


मूल लेखक: डाॅ. ब्रिज प्रेमी

इतिहास के विभिन्न युगों में राजनैतिक उथल-पुथल के कारण कश्मीरी समाज का एक वर्ग वहां पलायन कर हिंदोस्तान के विभिन्न प्रदेशों में आबाद हुआ और अपनी विशिष्टताओं के फलस्वरूप उच्चपद प्राप्त करने में समर्थ रहा। इन विस्थापित परिवारों में कतिपय ऐसे भी हुए जिन्होंने जीवन में श्लाघनीय कार्य कर दिखाए। जिनमें से कुछ ऐसे प्रतिष्ठित नाम हैं जिन्होंने उर्दू साहित्य के खजाने को मालामाल किया। उनमें अल्लामा इकबाल, चकबस्त, सरशार, दयाशंकर नसीम, मोमिन, आजुर्दा, त्रिभुवन नाथ, हिजर, अल्लामा कैफी, आगा हशर, रामानंद सागर, कुदरतुल्ला शहाब तथा कुछ अन्य नाम चर्चित हैं। इन सब में सआदत हसन मन्टो का नाम विशेषतया उल्लेखनीय है। उन्होंने उर्दू कथा साहित्य को शिल्प तथा विषय के आधार पर नवीन दिशा प्रदान की।

मन्टो मूलतः कश्मीर वासी थे। उनके पूर्वज भी अल्लामा इकबाल के पूर्वजों की भांति कश्मीरी पंडित थे। वह ब्राह्मणों की सारस्वत शाखा से संबंधित थे तथा कश्मीर से पलायन कर पंजाब में आ बसे थे। इस बात की पुष्टि मन्टो स्वयं तथा उनके मित्रगण भी करते हैं। मन्टो अपनी आत्मकथा में लिखते हैंः

“मैं कश्मीरी हूँ। बहुत अरसा हुआ हमारे आबा-वा-अजदाद कश्मीर से हिजरत करके पंजाब आए और मुसलमान हो

गए।” 

कृष्ण चन्द्र और मन्टो के बड़े घनिष्ठ संबंध थे। अपनी ‘सआदत हसन मन्टो‘ नामक पुस्तिका में मन्टो को कश्मीरी बताते हुए कहते हैं कि दीर्घकाल व्यतीत हो जाने के उपरांत भी मन्टो के स्वभाव में कुछ भी परिवर्तन नहीं आया, लिखते हैंः

“मिज़ाज, जिस्म और रूह के ऐतबार से मन्टो आज भी कश्मीरी पंडित है।‘‘

मन्टो को अपने मूलतः कश्मीरी होने पर बड़ा गर्व था। वह कश्मीर तथा कश्मीरियों से अत्यधिक स्नेह करते थे। उनकी अनेक रचनाओं से इस बात की पुष्टि होती है। वह कश्मीर की दिल खोल कर प्रशंसा करते यहाँ तक कि खुद को हातो कहलाने में भी संकोच न करते थे। वह खुद लिखते हैंः

“मैं कश्मीरी हूँ- एक हातो।” 

अपनी ‘लाऊड स्पीकर‘ नामक कृति में मानते हैंः

“मैं भी कश्मीरी हूँ। मुझे कश्मीरियों से बहुत मुहब्बत है 

लेकिन मैं ऐसे कश्मीरियों से नफरत करता हूँ जो अपनी

बीवियों से बुरा सुलूक करें।” 

उनके एक मित्र मुहम्मद असदुल्लाह अपनी पुस्तक ‘मन्टो- मेरा दोस्त‘ में उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि वह कश्मीर से बेहद प्रेम करते थे और इस की बार-बार चर्चा भी करते थे। वह लिखते हैंः

‘‘अगर कभी कोई अमृतसरी या कश्मीरी आदमी उनकी तरफ आ निकलता तो उससे बड़े बे-तकल्लुफ हो जाते-बार-बार उसको बतलाते थे कि मैं भी कश्मीरी हूँ। वैसे अमृतसरी हूँ। आलम यह होता था कि बार-बार नाक साफ कर रहे हैं सिगरेट पर सिगरेट जला रहें हैं। उठ-उठ कर अंदर जाकर एक पैग चढ़ा रहे हैं और अमृतसर और कश्मीर की बातें कर रहे हैं।” 

उनके लंगोटिये-मित्र अबू सय्यद कुरैशी ने भी अपनी किताब ‘मन्टो में मन्टो के कश्मीर से प्रेम की चर्चा करते हुए वर्णित किया हैः

“उसे अपने कश्मीरी होने पर बड़ा नाज था।‘‘ मन्टो कई पीढ़ियों से अमृतसर में रह रहे थे। इस लिए वहां के प्रत्येक गली-कूचे से भली-भांति परिचित थे। अमृतसर का नाम सुनते ही उनके चेहरे पर अजीब सी आत्मीयता झलकने लगती थी इसके साथ ही उन्हें कश्मीर से असीम स्नेह था। मन्टो को स्नेह की यह पूंजी विरासत में मिली थी। उनके पिता मौलवी गुलाम हसन मन्टो भी कश्मीरियों से बेहद प्यार करते थे। वह कश्मीरी ढंग से पगड़ी बांधते थे तथा उनकी प्रकृति से भी कश्मीरी पन झलकता था। वह कश्मीरियों से यूँ मिलते मानो वे उनके परिवार के सदस्य हों। अपने पिता के इसी आत्मिक लगाव का उल्लेख मन्टो अपने एक लेख ‘शायरे कश्मीर महजूर‘ में कुछ यूँ करते हैंः

“मेरे वालिद साहब को कश्मीरियों से इश्क था। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह कभी-कभी इस इश्क के जेरे असर  किसी हाथ यानि मजदूर को पकड़ कर अपने साथ ले आया करते थे और उसे बैठक में बिठाकर बड़े फख्र से कहा करते थे - मैं काशिर हूँ।”

मन्टो को कुछ लोग मिन्टो के नाम से भी याद करते हैं लेकिन ऐसा कहना उचित प्रतीत नहीं होता। मन्टो शब्द का चिह्न उनके पारम्परिक नाम ‘मनुट‘ से संबंधित है जिसे कश्मीर में 1½ सेर के बाट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है तथा परिवर्तित होते-होते मन्टो हो गया है। मन्टो इस संदर्भ में स्वयं कहते हैंः

“कश्मीर की वादियों में बहुत सी जातियां होती हैं जिन को ‘आल‘ कहते हैं। जैसे - नेहरू, सप्रू वगैरह - वगैरह। मन्ट कश्मीरी जुबान में तोलने वाले बट्टे को कहते हैं। हमारे  आबा-वाजदाद इतने अमीर थे कि अपना सोना-चांदी बट्टों में तोल-तोल कर रखते थे।‘‘

इधर यह कोई चर्चा का विषय नहीं है कि मन्टो ने अपनी जाति संबंधी जो उल्लेख किया है, वह ठीक है या गल्त, यह बात सर्वदा सत्य है कि मन्टो जाति के लोग अभी भी कश्मीर में मिलते हैं तथा वे प्रायः तिजारत का व्यवसाय करते हैं। उनकी जाति ‘मनुट‘ अर्थात् 1) सेर के बाट के साथ किसी न किसी प्रकार जुड़ी हुई है। मन्टो और मनवटी यथार्थतः या किश्तवाड़ी पंडितों की जातियां हैं।‘ फोक के विचारानुसार जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया वे मन्टो कहलाए और जो अपने मूल धर्मानुयायी रहे वह ‘मनवटी‘ के नाम से जाने जाने लगे। वास्तविकता यह है कि आज भी वादी के कई हिस्सों में दोनों जाति के लोग रहते हैं।

मन्टो परिवार के एक बर्जुग ख्वाजा रहमतुल्लाह थे जो तिजारत किया करते थे। वह प्रथम ऐसे बजुर्ग थे जो पंजाब की राजधानी लाहौर में आकर बसे। उनके पोते ख्वाजा जमालुद्दीन सिक्ख राजसत्ता में अमृतसर चले आए और पश्मीना उद्योग करने लगे। उन्होंने अपना उद्योग मात्र लाहौर तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उसका प्रसार बम्बई तक किया। उनके सबसे छोटे बेटे मौलवी गुलाम हसन थे जो बाद में सब जज के पद पर सुशोभित हुए। मौलवी गुलाम हसन के बारह बच्चों में एक सआदत हसन मन्टो हुए। पंजाब के लाहौर तथा अमृतसर शहरों में बसने के बाद भी मन्टो खानदान के रहन सहन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ, यहां तक कि इन के नाम भी कश्मीरी ही रहे। जैसे हमजा जू, रसूल जू, अहमद जू, ताजमाली, जोन माली आदि। ये नाम आज भी कश्मीर प्रदेश में मिलते हैं।

मन्टो का विवाह एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। इसमें उनकी अपनी मर्जी से अधिक उनकी अम्मी का अधिक हाथ था। उनकी पत्नी अफ्रीका के प्रसिद्ध राष्ट्रीय कार्यकर्ता ख्वाजा शमसुद्दीन की भतीजी थी। उनके ताया अफ्रीकी पार्लियामेंट के सदस्य थे और जब मन्टो से रिश्ते की बात चली तो वह मन्टो को देखने के लिए बम्बई आए थे। मन्टो की पत्नी बेगम सफिया के मायके वाले वर्षों पहले अफ्रीका में जा बसे थे। वहीं मन्टो के दो बड़े भाई बैरिस्टरी कर रहे थे। अतः उन्हें रिश्ता पसन्द आ गया। एक अन्य कारण यह भी रहा कि वे खुद मूलतः कश्मीरी थे और अपनी बेटी का रिश्ता कश्मीरी परिवार में करने के इच्छुक थे। बेगम सफिया के अब्बाजान अफ्रीकन पुलिस में इंसपैक्टर थे लेकिन वहीं किसी दंगे में किसी हबशी ने उन्हें कत्ल कर दिया था। अब उनके चाचा ही उनका लालन-पालन कर रहे थे। मन्टो ने अपने जीवन का सम्पूर्ण यथार्थ उनके समक्ष उजागर कर दिया। मन्टो को यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उन्होंने फिर भी रिश्ते के लिए सहमति दे दी। मन्टो ने विवाह पूर्व अपनी पत्नी को नहीं देखा था। उनकी अम्मी के अनुसार लड़की बड़ी होशियार तथा सलीका मंद है इससे बढ़कर यह कि वह कश्मीरी है। यह जानकर मन्टो बड़े प्रसन्न हुए। उन्हें जितना ज्ञात हुआ उसकी चर्चा अपने मित्र अहमद नदीम कासमी को एक पत्र में बड़े दिलचस्प ढंग से करते हुए लिखते हैंः

“मेरी शादी मुकम्मल तौर पर नहीं हुई है। मैं सिर्फ निकाहिया गया हूं। मेरी बीवी लाहौर के एक कश्मीरी खानदान से ताल्लुक रखती है। उसका बाप मर चुका है, मेरा बाप भी जिन्दा नहीं, वह चश्मा लगाती है, मैं भी चश्मा लगाता हूं। वह 11 मई को पैदा हुई मैं भी 11 मई को पैदा हुआ था। उसकी मां चश्मा लगाती है मेरी वालिदा भी चश्मा लगाती है। उसके नाम का पहला हरफ “ऽ” है मेरे नाम का पहला हरफ भी “ऽ” है .....” 

मन्टो को जीवन भर इस बात की कमी खटकती रही कि वह प्रत्यक्षतया कश्मीर भ्रमण न कर सके। वह बटोत तक ही जा पाए जब उन्हें तपेदिक का रोगी घोषित कर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया। वहां वह तीन माह तक रहे लेकिन स्वास्थ्य सुधर न पाया। यहीं पर उनका प्रथम प्रेम साकार हुआ जिसने उनके दिलो-दिमाग पर अमिट प्रभाव छोड़ा जिसकी छाप उनकी अधिकतर कहानियों में दृष्टिगोचर होती हैः- ‘एक खत‘, ‘बीगो‘, ‘मिसरी की डली‘, ‘लालटेन आदि इस के अंतर्गत ली जा सकती हैं। मन्टो को बड़ा मलाल था कि वह कश्मीरी भाषा बोल तथा समझ नहीं सकते। कश्मीरी भाषा के प्रतिष्ठित शायर ‘महजूर‘ की शायरी के जो अनुवाद उन्होंने पढ़े थे इससे वह ‘महजूर‘ के प्रमुख प्रशंसक बन गए विशेषतया जब उन्हें इस सत्य का भान हुआ कि महजूर ने अनेक विषमताओं के बावजूद भी उनके अम्मी-अब्बा की तरह अपना प्रदेश नहीं त्यागा तो उनके हृदय में महजूर के प्रति सम्मान और भी बढ़ गया। महजूर की प्रशंसा में वह लिखते हैं:

“मुझे नदामत है कि मेरे आबा-वा जदाद ने हिजरत की, जोरो सितम सहना बड़ी बात है लेकिन हिजरत बहुत बड़ी सजा है। महजूर ने जुल्मो सितम सहे। उसने सबसे बड़ी अजीयत जो जे़हनी खसूसियत है बरदाश्त की, मगर वो डटा रहा। हिजरत का ख्याल तक भी उसके दिमाग में न आया ....। महजूर के कलाम का तर्जमा पढ़ने के बाद मैं वसूक से साथ कह सकता हूँ कि उसका हिजर ही उसका विसाल है।‘‘

मन्टो भारत-पाक की आपसी तनातनी से क्षुब्ध थे। उन्हें इस बात का गहरा सदमा था कि भारत-पाक के प्रधान दोनों कश्मीरी होते हुए भी परस्पर विरोधी क्यों हैं? उनका मानना था कि यदि महजूर जीवित होते तो शायद स्थिति कुछ भिन्न होती। (जबकि 1947 के पाक-हिन्द विभाजन के समय महजूर जीवित थे।) अपने शायराना एवं भावनात्मक दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए अपने लेख ‘शायरे कश्मीर ... महजूर कश्मीरी‘ में लिखते हैंः

“अगर वो जिन्दा होता तो मैं समझता हूँ डाक्टर गराहम की जरूरत पेश न आती। वो अपने कलंदराना अंदाज में जवाहर लाल नेहरू और ख्वाजा नाजमुद्दीन को (यह भी कश्मीरी हैं) समझा देता कि देखो इंसान का खून पानी से अरजां नहीं है। कश्मीरी ख्वाह वो मुसलमान हो या हिन्दू, हर हालत में कश्मीरी है। तुम जवाहर लाल नेहरू हो - यह नाजमुद्दीन है दोनों कश्मीरी हो ....तुम गोगजी और भत्त (शलगम और चावल) के ऐसे दस्तरख्वान से कभी निकल नहीं सकते हो। फिर तुम क्यों लड़ते हो? शलगम और भात की कसम खाओ क्या तुम एक-दूसरे के गिरेबान में हाथ डाल सकते हो?‘‘

मन्टो की अधिकतर रचनाओं में कश्मीर तथा कश्मीरियों का उल्लेख मिलता है। इनकी कुछ कहानियों में कश्मीर तथा कश्मीरी परिवेश के कुछ पहलुओं को उजागर किया गया है। हिन्दोस्तान तथा पाकिस्तान की आपसी तनाव पर आधारित कुछ कहानियां ‘आखिरी सैल्यूट‘, ‘टीटवाल का कुत्ता‘ आदि उल्लेखनीय हैं। इन में मन्टो की इन्सानी दोस्ती में धड़कती रूह साफ दिखाई देती है, जिनमें धर्म, जाति एवं सम्प्रदाय संबंधी कोई भेदभाव नहीं मिलता। इनकी अधिकतर कहानियों का कथानक कश्मीर से संबंधित हैं तथा पात्र कश्मीरी। इनके कथानकों में वर्णित दृश्यों से कश्मीर की मिट्टी की सुगंध आती है जिससे मालूम होता है कि मन्टो कश्मीर को अपने मानसपटल से विस्मृत नहीं कर पाए थे। मन्टो की कहानियां, आलेख तथा अन्य साहित्यिक कृतियों में कश्मीर को बड़े मनोहर एवं मनोरंजन ढंग से प्रस्तुत किया गया है जिनकी विस्तृत चर्चा करना एक अलग विषय होगा। लेकिन यहां यह उल्लेख करना अनुपयुक्त नहीं होगा कि हिन्दपाक विभाजन के समय मन्टो हिन्दोस्तान में थे। इसके बाद दोनों देशों की आपसी तनातनी आरंभ हो गई और मन्टो पाकिस्तान प्रस्थान कर गए। वहां उन्होंने ‘ठंडा गोश्त‘, ‘खोल दो‘, ‘टोबा टेक सिंह‘ और कुछ अन्य कहानियां लिखीं। ‘टीटवाल का कुत्ता‘ और ‘आखिरी सैल्यूट‘ में उसकी आत्मीयता लुप्त सी प्रतीत होती है। उसमें वह हिन्दोस्तानी मन्टो है न पाकिस्तानी मन्टो - वह मात्र मन्टो है जिस की वफादारी मात्र मानवता से है। उसकी सोच, उसके एहसास में धर्म, जाति, समाज एवं देश आदि के प्रति किसी प्रकार का भी राग-द्वेष, भेदभाव नहीं दिखता बल्कि वह अमन-शांति, मित्रता, स्नेह तथा भाई चारा रूपी पुल बांधने के इच्छुक थे।

‘‘कुछ नहीं अरे राम-सियां ....भूल ही गया तू सोर के नल्ला ....की लड़ाई .... यह लड़ाई?”

उस उठा-पटक एवं खलबली के दौर में बड़े-बड़े हतोत्साहित हो चुके थे। सभी के दृष्टिकोण बदल चुके थे यहां तक कि प्रतिष्ठित साहित्यकार मार-काट, लूटपाट, सतीत्वहरण आदि निकृष्ट कार्यों में लिप्त हो चुके थे। ऐसे में मन्टो की आत्मा चीत्कार कर रही थीः

“समझ में नहीं आता था कि हिन्दोस्तान अपना वतन है या पाकिस्तान और वह लहू-किस का है जो हर रोज इतनी बेदर्दी से बहाया जा रहा है? वे हड्डियां कहां जलाई या दफन की जायेंगी जिन पर से मजहब का गोश्त-पोस्त चीलें और गिद्ध नोच-नोच कर खा गए थे।‘‘

कश्मीर संबंधी मन्टो की कहानियां, डोगरा राजसत्ता के विरुद्ध प्रतिक्रिया, गनी और महजूर की शायरी से अथाह प्रेम, कश्मीर को खुली आंखों न देख पाने की लालसा, खुद को गर्व से ‘काशिर और हातो कहना आदि असंख्य बातें सआदत हसन मन्टो के मन मस्तिष्क कश्मीर: कुछ सांस्कृतिक पहलू में छिपी अतृप्त अभिलाषायें थीं जिनकी तृप्ति के वह इच्छुक थे मगर ऐसा हो न सका। अगर असमय मृत्यु उन्हें लील न लेती तो संभवतः ऐसा हो सकता था। मन्टो के बड़े भाई ख्वाजा सलीम हसन मन्टो 1921 में एक बार कश्मीर पधारे थे तथा कश्मीर में मन्टो समुदाय के लोगों से मिलकर इतने खुश हुए कि कई दिन तक खुशी के कारण सो न पाए। इस की चर्चा वह अपने परिवार वालों तथा परिचितों से प्रायः किया करते थे लेकिन मन्टो उस समय भी कश्मीर नहीं आ पाए।

मन्टो के चाचा जान ख्वाजा हबीबुल्लाह का देहांत 27जून 1934 को श्रीनगर में नब्बे वर्ष की आयु में हुआ था तथा उन्हें दफनाया भी वहीं गया। मन्टो को उनकी कब्र पर हाजिर होना भी नसीब न हो सका। सआदत हसन मन्टो आजीवन इस इच्छापूर्ति के लिए तरसते रहे। वह समय के हाथों बेबस थे और जीवन भर रहेः

”सआदत हसन मन्टो हमारे इतिहास का एक सजीव पात्र है। हम उन्हें क्यों कर विस्मृत कर सकते हैं।“

 -अनु. अज़रा चौधरी

1. विवरण के लिए लेखक की पुस्तक ‘साअदत हसन मन्टो: जीवनी और कारनामे।