महान् व्यक्तित्व: न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन

खोए हुए कश्मीर-इतिहास और कश्मीर-विलय के प्रकरण में मुख्य न्यायाधीश मेहरचंद महाजन की भूमिका अत्यंत  महत्वपूर्ण कड़ी है। मेहरचंद महाजन जी का जन्म 23 दिसंबर 1889 में कांगड़ा के नगरोंटा शहर में प्रसिद्ध वकील ला. वृजलाल महाजन के घर में हुआ जो पौराणिक विचारों के थे और जिन्होंने ज्योतिषियों के कहने पर इस नवजात शिशु को सात वर्षों तक अपने घर से बाहर रखा। लेकिन इस प्रतिभावान बालक ने आगे चल कर राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान किया और कीर्ति स्थापित की। आपने 1910 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1912 में लॉ कॉलेज लाहौर से एल.एल.बी. की परीक्षा पास करके सफल वकील बन गए। सर्वप्रथम वकालत का कार्य तो आपने गुरुदासपुर और धर्मशाला से प्रारंभ किया लेकिन 1919 में आप लाहौर आ गए और इतने लोकप्रिय हुए कि जल्दी ही आप हाईकोर्ट की बार एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गए। 1943 में आप हाईकोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त हुए।

1947 में महाराजा हरिसिंह जी ने जब जस्टिस मेहरचंद जी को जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित किया तो सर्वप्रथम आप सरदार पटेल और पं. जवाहरलाल नेहरू से मिले। सरदार पटेल ने बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया और इन्हें जज के पद से अस्थायी छुट्टी दिलवा दी। 1947 में श्रीनगर पहुंचकर आपने जम्मू-कश्मीर की वास्तविक स्थिति का आकलन लिया। महाराजा हरिसिंह को भारत में विलय के लिए तैयार किया। दिल्ली आकर पं. जवाहरलाल नेहरू को विवश किया कि वह कश्मीर विलय को स्वीकार करें और जम्मू-कश्मीर की रक्षार्थ भारतीय सेनाएं वहां भेजें। 26.10.1947 को भारतीय सेनाएं कश्मीर में पहुंचनी शुरू हो गईं। श्री मेहरचंद महाजन ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दिया और पं. जवाहरलाल नेहरू की इच्छानुसार शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बन गए।

न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन फेडरल कोर्ट के जस्टिस पद से उभर कर 04.01.1954 को स्वतंत्र भारत की सर्वोच्च न्यायालय के प्रथम चीफ जस्टिस बनाए गए और उन्होंने बड़े समर्पित और न्यायसंगत तरीके से इस पद की गरिमा को बनाए रखा। नवंबर 1947 में जब मीरपुर पतन हुआ तब आपकी ससुराल से अनेक सगे-संबंधी बरबादी और मृत्यु के शिकार हुए, क्योंकि मीरपुर में ही आपकी ससुराल थी। आप आर्यसमाज के प्रखर वक्ता और नेता थे। आप डी.ए.वी. मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष पद पर आसीन रहे। आप अनेकानेक आयोगों के अध्यक्ष रहे। शिक्षानीति-उत्थान, समाज-निर्माण, दलितोद्धार में आपका योगदान अति सराहनीय रहा। 11 दिसंबर 1967 को आप स्वर्ग सिधार गए। वे प्रेरणादायी व्यक्तित्व के धनी महान् राष्ट्रपुरुष थे।

साभार: ‘खोया हुआ कश्मीर’ विजय गुप्त


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