कश्मीर विस्थापन के संदर्भ में

 मूलोच्छेदन-1

जैसे पेड़

जो जड़ से उखड़ जाते हैं

जैसे शरीर से...

निकलने पर आत्मा...

जैसे सूख जाती जल की धारा स्रोतहीन...

जैसे अन्धेरे में डूब जाती है पृथ्वी प्रकाशहीन...

ऐसे ही खदेड़ा उन्होंने

तुम्हें अपने बसेरों से...

तुम चीखते छटपटाते भटकते रहे

रात दिन...

अब विश्वास तुम्हें

चुभता है कटार की तरह...

घाव सा टीसता है भीतर

जाने कौन सा लम्हा था...

खून से बुझाई थी

उसी में घुल गया था जहर

घृणा का...

लेकर बाहुपाश में अपने

कर गया रिक्त

मानवता को...

भटकते तो जानवर भी नहीं...

उनके भी होते हैं ठिकाने

और इस तरह कर दिया जड़विहीन...

उठा दी दीवार बीच तुम्हारे इस तरह...


मूलोच्छेदन-2

खदेड़े गये इस तरह

जिन्दगी की त्रास ले तरसते

भटकते रहे...

चलती रही जुल्म की चाकी

रात दिन...

रिसने लगा मवाद

धर्मान्द का 

सभी नैसर्गिक रंगों से विहीन

बने हम 

देश का महज रेखाचित्र भर...

सुलग रही है हममें

अगरबत्तियाँ सी...

महका दिया बचपन को

जला भी दिया...

वे बैठे हैं...

हाथ पर हाथ धरे...

उन्हें मालुम हो

कि हम राहों में हैं खड़े...

शक के किले में है

कातिल का इंतजार...

दर्द बेहिसाब...

मरहम कब, कैसे करें

ऐतबार...


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