संपादकीय

 

देवेन्द्र कुमार बहल, बी-3/3223, बसंतकुँज, नई दिल्ली 110070, मो. 9910497972

वर्ष 2012 में ‘अभिनव इमरोज़’ मेरे गुरुदेव डाॅ. त्रिलोक तुलसी को समर्पित प्रथम अंक का विमोचन कमला नेहरू काॅलेज, फ़गवाड़ा में डाॅ. हरमिन्दर सिंह बेदी द्वारा एवं श्रीमती स्वतन्त्र तुलसी और प्रिंसिपल किरण बालिया की उपस्थति में हुआ था। अभिनव इमरोज़ अपने दसवें वर्ष में पदार्पण कर रहा है। इस दौरान ‘दोआब’: ‘सतलुज’ और ‘व्यास’ में काफी पानी बह चुका है और ‘अभिनव इमरोज़’ और साहित्य नंदिनी, हिन्दी साहित्य सागर में प्रकाश स्तंभ बन कर अपनी हाज़िरी का परचम लहरा रहे है। इसकी निरंतरता का श्रेय परम पूज्य डाॅ. त्रिलोक तुलसी के आशीर्वाद एवं प्रबुद्ध लेखक और सुधि पाठकों को ही जाता है। मेरे प्रेरणा स्रोत स्व. डाॅ. तुलसी को शत शत नमन। और आप सब को नव वर्ष 2021 की शुभकामनाएँ।

वर्ष 2020 के आरम्भ से ही भयकंप, पाबंदियाँ, आत्मसंदेह और विकल्पहीनता की परिस्थितियों से गुज़रते हुए नुकसान जो हुआ सो हुआ, मानसिकता को कचोटती संवादहीनता ने अत्याधिक संत्रस्त कर दिया लेकिन आपके आशीर्वाद, शुभकामानाओं एवं सहृदयता ने मेरे उन्माद को जीवित रखा और मैंने अपनी सोच के प्रांगण में ग़ालिब को गुनगुनाते सुना:

‘‘ग़र किया नासेह1 ने हम को कै़द अच्छा यूँ ही सही

यह जुनूने-इश्क के अन्दाज़ छुट जाएँगे क्या’ -कुलदीप सलील

इसी लहरे-अमल में अप्रेल 2020 से दिसंबर 2020 तक के सारे अंक abhinavimroz.page वेबसाईट पर उपलब्ध करा दिए गए हैं। यह हमारा स्थाई इन्तज़ाम है।

बहुत से पाठकों/लेखकों ने ‘अभिनव इमरोज़’ एवं ‘साहित्य-नंदिनी’ को नए आवरण में देखकर सराहना की है। नए-नए पाठक और रचनाकार भी जुड़े हैं। विदेश से जुड़ने वालों की उपस्थिति से दोनों पत्रिकाओं का अंतर्राष्ट्रीयकरण हो जाना आपके प्रेम और प्रोत्साहन से ही संभव हो पाया है। 

यह पंक्तियाँ लिखते हुए गुज़रे हुए साल की त्रासदियों को भूला कर नए संकल्पों को अंजाम देने की सोच ही रहा था कि डाॅ. तुलसी का एक 22 साल पुराना लेख याद हो आया जो इस लिए भी साझा करना चाहता हूँ परस्थतियाँ आज भी वैसे ही है। डाॅ. तुलसी लेख का आरम्भ कुछ इस प्रकार करते हैं-

अच्छा गुज़र गया

‘‘हफीज जालन्धरी का एक शेर है:

गुज़रे हुए ज़माने का अब तज़करा ही क्या

अच्छा गुज़र गया बहुत अच्छा गुज़र गया।

जब यह शे‘र पढ़ते हैं तो दूसरे मिस्रे के साथ ही स्वतः एक लम्बी सांस निकल जाती है, जो शे‘र के शाब्दिक अर्थों को झुठला देती है। कुछ न कहते हुए भी शायर जैसे बहुत कुछ कह जाता है।

किसी का वैयक्तिक जमाना चाहे जैसा भी गुजरा हो, सामूहिक दृष्टि से बात करें तो नहीं कह सकते कि यह अच्छा गुजरा है, या गुजर रहा है। बीते कुछ दशकों में विश्व में इतना विनाश हुआ है और आज भी हो रहा है कि जीवितों को देख कर ही आश्चर्य होता है कि ये बचे हैं तो कैसे:

मरने वाले तो खेर बेबस हैं

जीने वाले कमाल करते हैं। (अदम )

संसार को देखिए। मानवजाति आत्महत्या का पूरा प्रयास करती दिखाई दे रही है। सब ओर चीत्कार है, हाहाकार है। और यह सब कुछ उस काल में हो रहा है जब मनुष्य के पांव चांद पर पड़ चुके हैं और जब उसका रथ मंगल पर चल रहा है। कैसी विडम्बना है कि मानव की महानतम सफलताओं का यह युग उसके भयंकरतम विनाश का भी युग है।

अतः शायर के इस परामर्श को मानने को जी नहीं चाहता कि ‘गुजरे हुए जमाने का अब तजकरा (चर्चा) ही क्या‘ । बल्कि आज तो यह और भी आवश्यक प्रतीत होता है कि गुजरे जमाने की चर्चा गहराई से की जाए ताकि पता चल सके कि उसमें क्या हुआ है, और क्यों हुआ है, कि सामूहिक आत्महत्या को तत्पर यह उन्मादग्रस्त मानव क्या बच भी सकेगा, और यदि हां तो कैसे ?

सब ओर समाधानों की भी वर्षा हो रही है जो पथ जानने वालों को भी बहुधा भटका देती है:

हम कुछ इस ढब से तेरे घर का पता देते हैं

ख़िज्र भी आए तो गुमराह बना देते हैं। (आदम)

ख़िज्र को विश्व-मार्गदर्शक कहा जाता है। आज तो यदि वह भी धरती पर आ जाए तो विचारधाराओं की भरमार से घबरा कर दिग्भ्रमित हो जाएगा।’’

समाधान तो बहुत हैं लेकिन हमें पहले अपने आप को तैयार करना होगा। छपते-छपते भाई रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ द्वारा प्रेषित मीनू खरे की कविता प्राप्त हुई जो कामयाबी की शर्तों का बखान करती है-

स्वयँ का सारथी होना पड़ेगाहमें भी आदमी होना पड़ेगा।

मिटाने को अँधेरा ठाना गर तोतुम्हीं को रौशनी होना पड़ेगा।

चढ़ोगे शीश पे शिव के यक़ीननमगर भागीरथी होना पड़ेगा।

हुईं बेघर हैं मछली और कछुएजमीं को अब नदी होना पड़ेगा।

हैं हर सू मौत के सन्नाटे बिखरेइन्हें अब ज़िन्दगी होना पड़ेगा।

जुटी है भीड़ शब्दों की क़लम पेइन्हें अब शायर होना पड़ेगा।


 -मीनू खरेप्रभारीआकाशवाणी केंद्रबरेली, Email : meenukhare@gmail.com

आप से निवेदन है कि अभिनव इमरोज़ एवं साहित्य नंदिनी के साहित्यिक यज्ञ में आहुति स्वरूप अपना अमूल्य योगदान दें।