कश्मीरी लोक गीतों का सामाजिक परिदृश्य



यह कहना सरल नहीं कि लोक गीतों की उत्पत्ति कब हुई। इन का इतिहास शताब्दियों पुराना है। सैंकडों वर्ष पूर्व जब मानव ने एक समाज में रहने का ढंग सीखा, सम्भवतः लोकगीतों ने इसी युग में जन्म लिया होगा। प्राचीन-कालीन मनुष्य ने जब स्वप्नों को अपनी आँखों में थिरकते हुए देखा होगा या अपने को चिन्ताओं और दुःखों से निढाल पाया होगा अथवा अपने परिश्रम के बोझ, प्रसन्नता की अधिकता, बीते जीवन की तलखियों, न पनपे भावों की अभिव्यक्ति या भविष्य की आशाओं का अनुभव किया होगा तो यूँ गाँ करते हुए, गुनगुनाते हुए लोक गीतों की किसी विधा ने रूप धारण किया होगा।

लोक-गीतों का क्रमबद्ध इतिहास नहीं। विश्व भर के लोकगीतों का एक दूसरे के साथ मुकाबला करके अध्ययन किया जाए तो हर जगह वही पीडा और दर्द की धीमी आँच, वही इच्छाओं के स्वप्न तथा आँखों के पपोटों को तर करने वाले वही अश्रु नज़र आते हैं जो हमारे लोक-काव्य में मिलते हैं। इस से स्पष्ट होता है कि मानविक भावानाएँ और अनुभव एक जैसे हैं और दुनिया का कोई क़ानून, कोई विधान इनके टुकडे नहीं कर सकता। लोकगीत अलिखित इनसानी दस्तावेज हैं जो सीनों की पट्टियों पर लिखे गए हैं। यह दस्तावेज एक सन्तति से दूसरी तक प्राप्त होते आए है। यह कथाएँ हैं उन लाखों करोडों मनुष्यों की, जो अब इस संसार में नहीं हैं। किन्तु उनके अनुभव और भावनाएं हमारी क़ीमती सम्पत्ति हैं। इन में ऐसी ही महानता, ऐसी ही मधुरता, ऐसा ही सीधापन और ऐसी आवाज होती है जो धीरे धीरे मन के गुप्त स्थानों में उतरती जाती हैं। यह गीत समय और स्थल की कैद से असम्बद्ध मानविक भावनाओं के जामिन है। चीन के प्रसिद्ध लेखक लोहसन ने एक बार ठीक कहा था:-

“लोक-गीत इन हीरों की तरह हैं। / जो शतब्दियों से धरती के सीने / में दफन हैं और उस दिन की / प्रतीक्षा में हैं कि जब कोई जानकर / उनको हीरों की तरह भूमि से ढूंढ / निकालने के बाद परख लेगा।।‘‘

सभी अन्य भाषओं की तरह कश्मीर के लोक-गीतों की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है। इन में कविता के बंधे टिके नियम न भी हों किन्तु इनका अपना साहित्यिक और भाषाई महत्व है। यह शायरी ऐतिहासिक तथा सामाजिक महत्व रखती है।

कश्मीर की लोक-शायरी यहाँ की समाजी ज़िन्दगी का आईना है। इस में हम अपने सदियों पुराने चेहरे को देख सकते हैं। हमारे बीते हुए लम्हे, हमारी संस्कृति, हमारी सामाजिक बंदिशें हमारी कठिनाइयाँ इस आइने में स्पष्ट रूप से झलकती हैं। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हमारा देश एक ज़माने तक सामंती व्यवस्था में कैद रहा और इस व्यवस्था ने हमारे भाग्य की रेखाओं को मिटा के रख दिया था। हमारे हिस्से में मेहनत, बेगार, दारिद्रय और विवशता आई थी। सामाजिक नाबराबरी ने अनगिनत सामाजिक बुराइयों को जन्म दिया। हमारे पारिवारिक जीवन में दहेज, सास बहू के कलह, घर-दामाद के दुःख और ऐसी ही दूसरी समस्याएँ प्रविष्ट हुईं। पिछडे़पन की यह हालत थी कि आए दिन अकाल, बाढ़, आग लगने की वारिदातें, जाड़े का जोर तथा अन्य मुसीबतें हमारा मुहँ चिड़ाती थीं। इन्हें हमारी लोक-शायरी ने समय पर हमारा साथ दिया है तथा इन विषयों को अपने में समो लिया हे। समाजी जिन्दगी में मानवीय मूल्यों, भाईचारे, स्नेह, मानव प्रेम और ऐसी ही भावनाओं की जो महत्ता है उसका चित्रण भी हमारे यहाँ कई भाषाओं की लोक-शायरी की तरह बहुत सुन्दर अंदाज में मिलता है। हमारे लोक-गीत केवल शब्दों का सुन्दर चयन ही नहीं अपितु इन में अनुभवों और भावनाओं का रस मिलता है। इन में कल्पना की पच्चीकारी का अनुभव ही नहीं होता अपितु इस बस्ती की खुशबू भी मिलती है। इस प्रकार जीवन के सारे खरे खोटे पहलू सामने आते है और यह बात स्पष्ट होती है उन लोगों की जीवन-गाथा से जो हम से पूर्व यहाँ रहते आए थे तथा जिन्होंने हमको जन्म दिया। हमारी लोक-शायरी की यही विशेषता इसे महान और उत्तम बनाती है।

रमजान-पाक की शामें हों अथवा विवाह शादी के हँगामे, खेतों में परिश्रम का पसीना बहाने का दृश्य हो या वितस्ता की छाती पर भारी भरकम किश्तियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का सफर, लोक-गीतों का कोई न कोई बोल फिजाओं में रस घोलने लगता है। यह क्रम वर्षों से चला आ रहा है। परिश्रम से फूटता पसीना, हृदय के कोई बोल फिजाओं में रस घोलने लगता है। यह क्रम वर्षों से चला आ रहा है। परिश्रम से फूटता पसीना, हृदय के घावों का नासूर और पीडा के आँसू, इन गीतें के मरहम से सूख जाते हैं। हमारे लोकगीतों की अत्यन्त लोकप्रिय विधा लडीशाह के नाम से जानी जाती है। ‘लडीशाह‘ एक प्रकार का ठंससंक है। इस विधा में हमारे इतिहास के कई तथ्य छिपे हैं। यह ठीक है कि इस विधा में अन्य विधाओं जैसी कलाबद्धता नजर नहीं आती किन्तु जिस निडरता से इस विधा में हमारी सामाजिक जिन्दगी का चित्रण मिलता है किसी अन्य विधा में सम्भव नहीं। समय बीतने के साथ साथ इस विधा की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। लडीशाह में किसी सर्वसाधारण रूचि के वाके, किसी युक्त इनसानी अनुभव, किसी दुर्घटना अथवा हमारी सामाजिक जिंदगी में जाहिर हुए किसी विशेष अनुभव को व्यक्त किया जाता है। इसका अंदाज हास्य-युक्त होता है इस में न केवल लोगों के मन बहलाव का सामान होता है अपितु व्यंग्य के विष में बुझे तीर भी होते हैं। लडीशाह सामाजिक जीवन में हुई अरूचिकर घटनाओं की धज्जियाँ उडाता है, तथा जन जीवन की समस्याओं का प्रतिनिधित्व उचित ढंग से करता है।

जाडे के दुःखों का जिक्र हो अथवा बाढ की तबाही, अनाज छीनने वाले सामंती सरकारी कारिंदों के अन्याय या आग की दुर्घटना से परेशान लोगों की मुश्किलें, घर-दामाद की विवशता हो या स्त्रियों के त्रिया चरितय लडीशाह की व्यंग्य विधा इन सारी सामाजिक समस्याओं का इहाता करती हैं तथा पूर्ण सच्चाई और स्पष्टवादिता से इन की अभिव्यक्ति करती हंै। कुछ उदाहरण देखिएः

“यह परमेश्वर की मंशा थी / कि सैलाब सिंध जोर आवर हुआ / जुम्मे को आकाश पर काली घटा छाई / सारे कश्मीर में भय की थरथराहट छा गई / लोग भयमीत हो गए और कई मर भी गए / सैलाब सिंध जोर आवर हुआ / हीजन का मैदान जल में डूब गया / पनचक्की वाले को अपने साथ बहा ले गया / अब केवल दो मन आटा बच गया / सैलाब सिंध जोर आवर हुआ / चक्की वाले अभिमानी हो गए थे / वे लोगों का गला काटते थे / तथा उनका रक्त पीते थे / सैलाब सिंध जोर आवार हुआ।” का सैलाब-(बाढ़) 

हमारा जीवन हमारे गाँव हैं तथा गाँवों का जीवन उपज की सफलता पर निर्भर करता है। धान की फसल के लिए पानी का होना अत्यन्त आवश्यक है। पानी के स्रोत सूख गए तो ग्रामीण जीवन के स्रोत सूख जाते हैं। कभी कभी जब पहाड़ों पर बर्फ कम पड़ती है या वर्षा नहीं होती तो नदियाँ और नाले सूख जाते हैं। इस से चारों ओर हाहाकार मच जाता है और कभी कभी खून खराबा भी होता है। यह समस्या वर्षों पुरानी है। हमारी लोक-शायरी ने इसे अपना विषय बनाया है। देखिएः

“पानी की कमी ने क्या सितम ढाये / ‘अरह‘ ग्राम के लोगों ने हंगामा खड़ा किया / वे गवर्नर के पास फर्याद ले कर गए / खुले हृदय से अपना हाल व्यक्त किया / पानी की कमी ने क्या सितम ढाए। / पाने के लिए जल की एक बूंद नहीं / मैदान में दरारें पड़ गई हैं। / धान के खेत आँसू बहा रहे हैं।‘‘

अक्तूबर 1947 में जब पाकिस्तानी आक्रमणकारियों ने हमारी रियासत पर आक्रमण किया आने जाने के सभी रास्ते कट गए। कश्मीर घाटी अन्न और दूसरी वस्तुओं की कमी के साथ जिस वस्तु की कमी अनुभव की गई वह था-नमक। नमक की कमी के कारण विचित्र घटनाएँ घटी। ‘लडीशाह‘ में इसका जिक्र देखिएः

“लवन की कमी के कारण कैसे सुन्दर चहरे बे-नमक हो गए / नमक महंगा होकर गायब हो गया / बिना नमक के किसी व्यंजन में मजा नहीं / नमक की कमी से..... / लोगों ने नमक की चोरी आरम्भ कर दी / ‘जुनी‘ ने अपने आँचल में नमक के डले छिपा लिए / रहती ने कस्मे खाई / नमक की कमी से...... / ऐ लोगो! तोबा करो / हमारे पाप हमारी कठिनाइयों के जिम्मेदार हैं / बिना नमक के कितने व्यंजन (खाने) में मजा हैं।” (नमक का क़हत)

या

-“जरा रूको और मेरी बात सुनो / मैं तुम्हें नमक के क़हत की बात सुनाऊं / पति बीवी पर विश्वास नहीं करता / उसने घर के सामान पर ताला चढ़ा लिया / कर वह स्वयं बीवी को चीजे ला देता है / उसे डर है कि पत्नी ज़्यादा खर्च न करे / जरा रूको और बात सुनो / मैं तुम्हें नमक के क़हत की बात सुनाऊँ।” (नमक का अकाल) 

अंग्रेजों के काले क़ानून के विरूद्ध इस प्रकार निन्दा की गई हैः

-“अंग्रेजों का क़ानून भी क्या क़ानून था। / रहीम भट्ट ने जूही स्नानघर का द्वार खोला / न फारिस्टर की आवाज़ गूंजी / अरे मूर्ख! स्नान न कर! / यदि तू ने अपने को साफ किया / तो तुझे देश-निकाला मिलेगा।‘‘

लड़ीशाह के मिज़ाज के खिलाफ एक और विधा है जो रोफ कहलाती है। रोफ खालिस तौर पर स्त्रियाँ गाती हैं। रमजान मास की पवित्र शामों को हमारे आँगन रौफ के सुरीले सुरों से गूंज उठते हैं। अविविाहित युवतियाँ, नई नवेली दुलहनें और छोटी आयु की स्त्रियां अपने गले के सोज (लय) से एक जादू जगाती हैं। रोफ की शैली ही अपने रस से हृदयों में एक विचित्र स्वर पैदा करती है। यह ब्याह शादियों पर भी बड़े चाव से गाया जाता है। सुन्दर युवितियां दो टोलियों में बट जाती हैं। एक स्थल पर अपने पैरों को आगे पीछे धरती हुई, गीत की लय के साथ ताल मिलाती हुई, रोफ के पद्य दोहराती हुई अपने हृदय का सारा दर्द और राज़ मिलाती हैं। चूडियों की खनक और नये कपड़ों की सरसराहट के साथ जब लय ऊँची उठती है तो एक से एक दृष्य उपस्थित होता है। रोफ के बोलों में एक विचित्र अपनापन होता है। रोफ कदमों और आवाजों का नृत्य है। रोफ, के गीतों में कँवारेपन के अरमान (आशाओं) और नई नवेली सुहागनों की सिसकियाँ मिलती हैं। मायके में बीते जीवन के क्षण, ससुराल में परायेपन का अनुभव, दहेज की मांगों के काँटों, सास ससुर और ननद के ताने, ममता की टीसें, कलेजा मुहं को लाने वाले चरके, सामाजिक बंदिशों और बुराइयों का कंटीला व्यवहार, साजन के विरह में हृदय के तारों को छेड़ने वाली व्यथा, क्या कुछ नहीं होता। इन का पूर्ण अध्ययन हमारे सामाजिक जीवन को आइना दिखाता है। लीजिए कुछ उदाहरण देखिएः-

”सखी री जा / साजन को धीरे से आवाज दे / वह मुझ से रूठ कर चल गया है / उसे क्या रंज व दुःख है? / सखी री जा मैं / अपने आँगन में चश्मे के किनारे / उस की राह तकती रहूंगी। / ऐसा न हो कि शत्रु मुझ विवश का मजाक उडाएँ। / देख ‘शीरीन‘ के लिए ‘फरहाद‘ पर क्या बीत रही है। / देख ‘लैला‘ के लिए ‘मजनूं कैसे बेहाल है।  / ‘हीमाल‘ के लिए ‘नागराज‘ कैसे परेशान है? / सखी री जा।“

साजन की जुदाई में शर्म और लज्जा के सारे बन्धन तोड़ कर सहमी सहमी आवाज देखिएः

“विरह की अग्नि में जल चकी हूँ / चले आओः / मैं आराम में पड़ी ‘जुलैखा‘ / स्वप्न से जाग्रत हुई हूँ / ऐ यमन के व्यापारी / मैं बगिया में तेरे लिए / सिंहासन बिछा दूँ / अपनों ने मुझे रौंद दिया है / ऐ मेरे पिया।”

विरह की आग में झुलसी हुई कश्मीरी युवती जब अपने प्रियतम को याद करने लगती है तो द्वार और दीवारे सुन्न हो जाती हैं। उसका प्यार इसी अग्नि की तरह पवित्र है। प्रियतम के दर्शन की तलाश जनूँ की सीमा तक पहुँचकर इस प्रकार आवाज के साँचे में ढलती हैः

“चारों और तेरी झलकी देखी / अब कहाँ ढूं ढूं ? / रात दिन तेरी तलाश में / पाँव छलनी हो गए / यहाँ आई तो तुम्हारा प्रतिबिम्ब देखा / प्रभु का धन्यवाद कि ठिकाना बता दिया / किन्तु-किन्तु कहाँ चले गए / जब तू मेरे मार्ग से गुज़रेगा / तो मैं सदियों की रोगी /स्वस्थ हो जाऊँगी  / मेरे रोम रोम में जीवन की लहर दौड़ जाए / तब होंटों पर रंग चढा कर / आँखों में काजल भर के / सोलह श्रृंगार करके / तुम्हारा दामन थाम लूंगी।‘‘

हमारे सामाजिक जीवन में सास, बहू, नंद,बहू सुसराल के रिश्तों की बडी महत्ता है। आज यद्यपि जमाना काफी आगे निकल चुका है किन्तु इन सम्बन्धों में बन्धनों के साथ-साथ कडुवाहट अब भी मिलती है। हमारी बहू एक आदर्श बहू है जिसके हिस्से में सदियों से दुःख चले आए है। ससुराल की सख्तियाँ, बहू की सहन शीलता और लड़की वालों का सब्र एक मिसाल की हैसियत रखता है। हमारी लड़कियों का असली घर सनातन से ही उनका ससुराल है। यहीं उसका जीना, यहीं उसका मरना भी है। हमारी लड़की लल्लेश्वरी है जिसने नीला पत्थर सर्वदा अपने सीने से लगाया। एक दुःखी बहू अपने अश्रुओं से रोफ (गीत) को इस प्रकार सींचती है।

“मैं पनघट की ओर चली /वहाँ मुझे बाबा मिला / वह मुझे घर ले गया / सीढियों पर फूलों का बिस्तर बिछा दिया / मुझे अपने कमरे में ले गया / रंगदार कमरे में सेज पर बिठाया / मेरी दाईं ओर तोता रखा / सामान बाईं ओर जलती शमा / सामने कुराने मजीद / मैं ने धीरे धीरे अपने मन का राज कहना आरम्भ किया /बाबा ने कहा /बेटा! यह सब सहना होगा / पनघट से जल का मटका ले जा / सास ससुर के पाँव धो ले / जा अपने घर चली जा। बेटी रानी / मायके में रहना अच्छा नहीं लगता / ससुराल के कष्ट झेलना सीख।”

यह है हमारी असली संस्कृति। अपने पर काबू तथा त्याग की शिक्षा जो हम अपनी बेटियों को देते हैं। यह सारी चीज़े हमारी लोकशायरी में वर्षों से मौजूद हैं। हमारे सामाजिक जीवन में शादी ब्याह का अपना महत्व है। शादी ब्याह के अवसरों पर हमारे घरों में अनगिनत रस्में पूर्ण की जाती हैं। यह रस्में हिन्दू घरों में भी होती है और मुसलमान घरों में भी। ‘वनवुन‘ लोक-शायरी की वह विधा है जो ऐसे अवसरों पर प्रयुक्त होती है। दुल्हन के बाल गूंथना, स्नान करना, पोशाक बदलना, मेहन्दी लगाना, विवाह का लिबास पहनना, सुसराल जाना, बरात का स्वागत, निकाह पढना या लगन-मंडप पर कन्या दान, दुल्हन को रुख्सत करना, यज्ञोपवीत के गीत गरज कौन सी ऐसी रस्म है जिसका ज़िक्र इन गीतों में न हों। सच तो यह है यदि यह गीत न हों तो शादी ब्याह केवल एक शुष्क और सपाट लेन देन बन जाए। यह गीत ऐसे अवसरों में रंग भरते हैं। ‘वनवुन‘ गीत पूर्ण होते हैं। हर गीत अपने अवसर के लिए विशेष है और अवसर का एक स्पष्ट वक्तव्य। इन गीतों में स्त्रियाँ अपने कुल और कुल के सदस्यों की बड़ाई के गीत गाती हैं। सभी सम्बन्धियों के लिए शुभ प्रार्थना करती हैं। साथ ही साथ समाज द्वारा ढ़ाये अन्याय और युग की कुकृत्यों पर व्यंग्य करती हैं। इन गीतों का सब से जीवित भाग वह है जिसमें बाबुल के गीत छेड़े जाते हैं। लड़की को सुसराल के लिए विदाई के गीतों में ऐसी कसक होती है कि आदमी मन मसोस कर रह जाता है। इन गीतों की उययोगिता इस से भी ज़्यादा है क्योंकि इन में हमारा सारा आर्थिक ढाँचा, हिन्दू और मुस्लमानों की रीत तथा रिवाज खुल कर सामने आ जाते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हिन्दू और मुसलमानों के हाँ यह गीत भिन्न प्रकार के हैं किन्तु जहाँ तक विषय का सम्बन्ध है वह एक जैसा है। इसमें वही चिरन्तन सत्य छिपा दृष्टिगोचर हिता है। वही मानवीय कसक और पीड़ा। समय की तेजरफतारी ने इन गीतों में कहीं कहीं परिवर्तन किया है। इस प्रकार आज के गीतों में नई बातों की वृद्धि हुई है। यह वही बातें है जो हम आज के जीवन में देखते हैं। इस प्रकार कुछ पुरानी चीजे़ं मिट चुकी हैं। इस विधा के कुछ उदहारण देखिएः

विदाई 

-“पशमीने का दोशाला है और रेशम का पहरावा / जा बेटा तेरा सुहाग बना रहे / ऐ परी! तू डोली मे छुपी बैठी है / ऐ सुन्दरी!अब तू चुप क्यों है? / झा तू हजरतबल की ओर आबाद रह और डल में किश्तियों की सैर कर / या / अन्धेरे में मोतियों की माला तेरे हाथ लगी है / तू ने हमारी मैना को बातों में फुसलाया हे / ‘मजनूँ चारों ओर खोज रहा है / मामला किस गवाक्ष से शाह परी दर्शन दे दे / पाल पोस कर इसे तेरे हवाले कर रहे हैं / खुदा का वासता है, इसकी देख भाल करना / हम पहले ही कह चुके / हमारी बेटी मासूम है। / इसका विवाह तुम से कभी न होता / हम तुम्हारी बातों में आकर बहक गए।‘‘ / या / -“अब तक हमारे घर की रखवालन थी / जा माँ की लाडली! अब ससुराल की राह ले / पहले पुनः लौटने का वादा कर / फिर अपने साजन के साथ जा।‘‘ / कश्मीरी पंडितों के वनवुन में इनकी देवमालाई उक्तियों का भरपूर प्रयोग हुआ है। भाव वही हैं जो दूसरे गीतों में नज़र आते हैं। उदहारण देखिएः

“हाथी बोझ सम्भाले पधारे हैं और दूल्हा घोड़े पर सवार / हमारी मैना का दूल्हा सजीले परन्दे में आया है / सुभद्रा का वासुदेव बाबा सुखी रहे / जर्बफत् का पहरावा वह लंदन से लाया है / समुद्र पर चन्दन की लकडी से बाँध लगवाया / दूल्हा रामचन्द्र की राह से आया है। / ऐ सूर्य भगवान! तू पूर्व से निकल / अब पश्चिम की ओर किरने में बिखेर / विश्वामित्र बाबा और मेनका के लिए / दूर कन्धार का राजा आया है।‘‘

दूसरे प्रकार के लोक गीतों में वचन गीत, चरवाहों के गीत, खेलों में नलाई के गीत आदि विशेष प्रकार से उल्लेखनीय हैं। वचन गीतों में प्यार और प्रेम का वहीं ठाठे मारता हुआ समुद्र नजर आता है। यह गीत भी शादी ब्याह के अवसरों पर गाए जाते हैं। चरवाहों के गीत और नलाई के गीत हमारी श्रमिक श्रेणी के गीत हैं। लगातार थकान से जब हमारे चरवाहे और किसान चूर चूर होजाते हैं तो इनके होंटों से गीत फूटते हैं। यह गीत थकन से चूर इनके शरीर में जीवन की गरमी उत्पन्न करते हैं और वे एक नया उत्साह लेकर काम में जुट जाते हैं। हमारे लोक गीतों में न केवल हमारा देवमालाई प्रतिबिम्ब नज़र आता है अपितु इनको पढ़कर हमारी ख़ुराक़, हमारे व्यंजन, हमारा लिबास, हमारी सजावट का सामान, हमारा दुःख और गम, खुशी और आनन्द, हमारी सहृदयता, हमारा भाई चारा हमारे रिश्ते नाते, हमारे पशु-पक्षी, और हमारे जीवन से सम्बन्ध हर वस्तु और हमारी सारी दुनिया हमारे सामने खड़ी हो जाती है। हमारे जीवन के कितने अध्याय खुल जाते हैं जिनका अध्ययन रूचिकर भी है, रोचक भी है और जरूरी भी।

(अनुवाद: अर्जुन देव मजबूर)