जंग तृतीया: पारंपरिक कश्मीरी महिला दिवस

अग्निशेखर,  -जम्मू (जे. के.), मो. 9697003775

चैत महीने की शुक्ल तृतीया पारंपरिक कश्मीरी संस्कृति में एक तरह से स्त्री दिवस है, इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्त्व है। इसे कश्मीरी में ‘जंग त्रैय’ कहते हैं, अर्थात् ‘जंग तीज’। मान्यता है कि नवरेह अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शिव ने ब्रह्माण्ड रचा और द्वितीया को सोच में पड़ गये कि कहीं गलत तो न किया और तृतीया को उमा नव निर्मित सृष्टि की बधाई देने के लिए मायके जाकर वहाँ से शगुन लिए ससुराल लौट आई। तब से कश्मीर की स्त्रियाँ देवी उमा के इस दिन मायके जाने की परंपरा का अनुपालन करती आ रही हैं, क्योंकि उमा ही कश्मीरा देवी हैं, वही वितस्ता हैं। कश्मीर आगमन पर तो श्रीकृष्ण ने भी कश्मीरा को पार्वती कहा है। इसलिए आज के दिन जंग त्रैय यानी शगुन तृतीया पर जब बेटी, बहन या बुआ मायके आती हंै, तो उन्हें उमा या पार्वती का रूप मानकर अतिरिक्त सम्मान मिलता है।

कश्मीरी भाषा में जंग टांग को कहते हैं। यहाँ इसका अर्थ शगुन है। जंग कश्मीरी मुहावरों और लोकोक्तियों में अपना रोचक स्थान रखती है। सामने से रास्ता काटने के लिए ‘जंगि युन कहते हैं। इसमें शुभ और अशुभ संकेतक होते हैं। जैसे कोई कन्या जब रास्ता काटती है, तो इसे शुभ माना जाता है। अन्य शुभ संकेतों में घोड़ा, सफाईकर्मी, बालक, संन्यासी, दूध या जल का कलश लिए कोई भी। इसी तरह अशुभ संकेतों में बिल्ली, ब्राह्मण (पुरोहित), गाय और विवाहिता स्त्री मानी जाती है। 

इसलिए उपरोक्त जंग त्रैय (शगुन तृतीया) के दिन किसी भी आयु की विवाहिता स्त्री दिन में मायके चली आती हैं। दो दिन पूर्व आए नवरेह यानी नव संवत्सर की शुभकामनाएं देती हैं। इस दिन उसका मायके आना उसके लिए वर्ष भर खुशहाल रहने के लिए एक शगुन की तरह मान्य है। कुछ भी हो उसे इस दिन मायके आना ही आना है। मायके में उसका हार्दिक अभिनंदन होता है। उनके लिए विशेष पकवान बनाए जाते हैं। उसे यथायोग्य भेंट मिलती है। मायके में माँ या भाभी उसे ‘अटहरू (संस्कृत में आदित्य होरा) यानी कानों के ऊपर वाले छेद से लाल रंग के लंबे सूती धागे से छातियों तक लटकते सुनहरी या रूपहले गुच्छे का मांगलिक आभूषण पहनाती हैं। इसे एक मांगलिक लक्षण की तरह लिया जाता है। इसे शादी-ब्याह के अवसर पर भी सब स्त्रियों को पहनाया जाता है। आज भी स्त्री जब कहीं न्यौता देने जाती है, तो उसे अटहरू तो पहनाया ही जाता है। 

इस शगुन के अलावा घर आई स्त्री को, जो बेटी, बुआ, बहन या मुँहबोली पुत्री या भगिनी भी हो सकती है, विदा करते हुए नमक का एक पैकेट और यथाशक्ति अटॅगथ (आगत) 

धनराशि भी सस्नेह भेंट स्वरूप दी जाती है, जिसे स्त्री बिना किसी संकोच के साधिकार स्वीकार करती है। और यदि आप किसी कारणवश अथवा भौगोलिक दूरी के चलते या आर्थिक मान्यताओं के कारण अपनी बहन, बेटी, बुआ या मुँहबोली पुत्री अथवा बहन को फोन पर जंग त्रयै की शुभकामनाएं देना भूल गए, तो समझिए कि आपसे बहुत बड़ी भूल हो गई। इससे यह भावनात्मक पहलू जुड़ जाता है कि अब हम मायके वालों के लिए अवांछित हो गए। यह तो जंग तृतीया का एक निजी पक्ष हुआ। इस दिन कश्मीर में, गाँव-गाँव में, कस्बों में, शहरों में, देवालयों और तीर्थों के परिसरों में, हरे-भरे उद्यानों में स्त्रियों का मेला-सा लगता था। एक उत्सवी रौनक में वातावरण दमक उठता। श्रीनगर में सधू बरबरशाह के रामचंद्र मंदिर उद्यान में, कर्णनगर के शिवाला मंदिर, हारी पर्वत, दुर्गानाग में स्त्रियों का मेला लगता है।

स्त्रियाँ अपने घर के सदस्यों के साथ इन मेलों में भाग लेतीं। साथ लाए स्टोव पर कहवा और पकोड़े बनातीं। मेला परिसर में ही नदरू के पकौड़े और उबलते तेल की कड़ाही में मैदे की चूपड़ी लूचियाँ (रोटी विशेष भी मिलतीं। दूर दूर तक हरी दूब पर दरी या कालीन बिछा कर अलग अलग परिवार की हर्षोल्लास में उन्मत्त टोलियाँ एक अपूर्व दृश्य का निर्माण किए दिखतीं। ऐसे उद्यानों में कहीं गीत, संगीत, नृत्य के आयोजन होते। कहीं कहीं रंगकर्मियों की प्रस्तुतियां होती हैं। कहीं कोई लडीशाह गा रहा होता। किसी कोने में कहीं कोई मजमा लगाए होता। कोई खिलौने बेच रहा होता। 

यों तो चैत का महीना कश्मीर की संस्कृति में शुरू से ही उत्सवों और पर्वो का महीना रहा है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नवेरह यानी नव संवत्सर महोत्सव, तीज को स्त्रियों का शगुन दिवस, पंचमी को श्रीपूजा, षष्ठी को बच्चों के आरोग्य के लिए पूजा, नवमी को भद्रकाली की पूजा अनुष्ठान, एकादशी को वास्तुदेव और अग्निदेव की पूजा, द्वादशी को वासुदेव की पूजा, मदन त्रयोदशी को कामदेव की पूजा और फाल्गुनी पूर्णिमा है। मदन त्रयोदशी महोत्सव के बारे में ध्यातव्य हो कि यह पत्नियों के लिए ऐसा महिमा मंडित करने वाला दिन है, जब किसी वस्त्रपट पर चित्रित मदन अर्थात् कामदेव की पूजा-अर्चना के बाद पुरुष सजधज कर स्त्रियों को सम्मानित करते हैं। इस मदन त्रयोदशी की पूर्व संध्या पर द्वादशी को एक पति अपनी पत्नी को कामदेव के सामने रखे कलश के अभिमंत्रित जल से तेरस को सूर्योदय से पहले स्नान कराता है। (नी. पु. श्लोक, 679-682)

इससे पहले कृष्ण पक्ष के पखवाड़े में भी उत्सवों की धूम रहती रही है। जैसे फाल्गुनी पूर्णिमा से चैत की कृष्ण पंचमी तक, पाँच दिन तक, पारंपरिक फाल्गुनी पूर्णिमा पर्व मनाया जाता था। इसमें ‘नीलमतपुराण‘ के अनुसार प्रो. वेदकुमारी गई के शब्दों में, ‘सूर्य और चंद्र की पूजा, संगीत सुनना, नाटक देखना, स्वयं को अलंकृत करना तथा पर्पटी युक्त भोजन करना। (श्लोक 545-48)

इसी कड़ी में चैत कृष्ण चतुर्थी से अष्टमी तक तीन दिन कश्मीरा देवी (भूमि) रजस्वला होती हैं। विधान है कि सिर्फ स्त्रियाँ ही इस दौरान कश्मीरा देवी की पूजा, उबटन कर सकती हैं। अष्टमी को स्त्रियाँ ही कश्मीरा देवी को राज्ञीस्रापन अर्थात् औषधियुक्त जल से स्नान कराती हैं। उसके बाद हर घर की स्त्री अग्निदेव, ब्राह्मण की पूजा करने के बाद पड़ोसियों को, मित्रों को भोजन भेजती हैं। संगीत सुनती-सुनाती है, ऐसा ‘नीलमतपुराण‘ सूचित करता है। 

इसके बाद किसी भी दिन खेत जोतने और बीज बोने के अवसर को उत्सवधर्मिता के साथ मनाते हैं। नृत्य और संगीत का आयोजन किया जाता है। इसी तरह एकादशी और द्वादशी को छन्दोदेव की पूजा स्त्रियाँ मछली आदि जीवों का मांस, नाना प्रकार के खाद्य पदार्थों, मादाओं, धूप तथा सुगंधित केसर से करती हैं। 

द्वादशी के दिन छन्दोदेव की पूजा करके उन्हें द्वार से बाहर ले जाकर पुनः गवाक्ष से भीतर लाकर कहीं भी रखा जाता है। - (569-73)। इसी तरह पिशाच चतुर्थी को पिशाचराज निकुम्भ की शंकर अर्चना के दिन स्त्रियाँ मांस, मछली आदि के भोज्य पदार्थ बनाकर चैराहों पर या नदी तटों पर रखती हैं और घरों में रात-भर संकीर्तन का आयोजन होता है। अब तो बस ये अतीत की स्मृति हैं सामूहिक जलावतनी में।

देखा जाए तो प्राचीन कश्मीर की समूची संस्कृति स्त्री प्रधान है। ऐसा कोई पर्व-त्यौहार, उत्सव नहीं, जिसकी धूरी स्त्री न हो। आप कह सकते हैं कि यह एक सार्वभौम तथ्य है भारतीय संस्कृति का। मैं इतना भर कह रहा हूँ कि कश्मीर की प्राचीन संस्कृति और समाज में जो स्थान, सम्मान और स्वातंत्र्र्य उसे जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्राप्त रहा है, शायद ही उसकी मिसाल कहीं और मिलेगी।

वे सखियों के साथ जल-क्रीडाएं करती हैं। पुरुषों के साथ खेलती हैं। सार्वजनिक रूप से बिना किसी संकोच के साधिकार भाव से नृत्य और संगीत सभाओं में रात रात भर भाग लेती हैं। उसे कोई घूँघट निकालकर बाहर आनेजाने को नहीं कहता। उसकी कई अवसरों पर पूजा होती है। 

धार्मिक क्षेत्र में तो उसे पुरुष के समान अधिकार प्राप्त हैं। कई अवसरों पर तो इष्ट की पूजा करने का सिर्फ उसे ही एकमात्र अधिकार है। जैसे रजस्वला कश्मीरा देवी की प्रतिमा का स्नान और छन्दोदेव की पूजा।

लोक-वार्ता में अनेक ऐसे प्रमाण जुटाए जा सकते हैं, जिससे यह बात निर्बाध कही जा सकती है कि कश्मीरी समाज मातृसत्ता प्रधान रहा है। आज भी शादी-ब्याह के अवसर पर यदि आपको घर-परिवार में कोई वरिष्ठ अनुभवी महिला है, तो विचार-विमर्श या सुझाव आदि के लिए अचानक उसका महत्त्व और रुतबा बढ़ता है। दादी से पूछा? काकिनी से पूछा? कोई भी कदम उठाने से पूर्व उसकी राय जानी जाती है। वह विदुषी है। शास्त्रार्थ करती है। वह किसी कारणवश यदि गणिका भी है, तो भी राजा के राज्याभिषेक में आमंत्रित रहती है। इस तरह हम ‘नीलमतपुराण‘ से लेकर कल्हण की ‘राजतरंगिणी‘, दामोदरगुप्त कृत ‘कुट्टनीमत‘ तथा बिल्हण की ‘विक्रांकदेवचरितम्‘ तक में कश्मीरी स्त्री के अस्मितागत उदात्त पक्ष का साक्षात्कार करते हैं। 

इसी बृहद सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में हमें जंग त्रैय अर्थात् स्त्रीपरक शगुन तृतीया की अविच्छिन्न परंपरा को देखना चाहिए। यह परंपरा कश्मीर से जड़ों सहित उजाड़ दिए जाने के बावजूद देश के सुदूर शहरों में छितरा जाने के बाद भी बनी रही।