‘‘शिकस्त की आवाज़’’ ‘ग़ालिब’ सादिक के क़लम से

समीक्षा



डाॅ. फरहत नादिर रिज़वी, जामिया नगर, नई दिल्ली, मो. 9667892300

प्रोफेसर सादिक, नई दिल्ली, मो. 8384036071


प्रोफेसर सादिक और ग़ालिब का जे़हनी रिश्ता कितना पुराना है, यह तो बताया नहीं जा साकता, लेकिन इनके अदबी रिश्ते का आगाज़ एक खूबसूरत किताबचे की आशाअत से हुआ था। इस किताबचे की अशाअत ग़ालिब की दो सौ साला  बरसी के मौक़े पर की गई थी।  इस किताब का नाम था “अज़ीम शायर मिर्जा ग़ालिब” यह किताबचा प्रोफेसर सादिक की कलात्मकता के विभिन्न पहलुओं को उजागर तो करता ही है, साथ ही साथ ग़ालिब से उनकी बे  पनाह श्रद्धा का भी प्रतीक है। ग़ालिब के हवाले से उनका दूसरा अहम कारनामा “मसनवी चिराग़ ए दैर माअ पाँच उर्दू तराजिम” जिसे लेखक ने बड़ी मेहनत से तरतीब देकर 2015 मैं छपवाया। और फिर इसी मसनवी का हिन्दी तर्जुमा भी उन्होंने खुद किया जिसे 2018 में छपवाया गया था।  ग़ालिब के हवाले से अब उनका चैथा कारनामा एक ड्रामे की शक्ल में सामने आया है। यह ड्रामा मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवन से लिए गए एक विशेष घटनाक्रम पर आधारित है। अपने ड्रामे ‘’इस शक़्ल से गुज़री ग़ालिब’’ में लेखक ने अंग्रेज़ सरकार से अपनी पेंशन के लिए ग़ालिब के संघर्ष का एक ऐसा अद्वितीय समाँ बाँधा है जिसमें दर्शक खुद को  पूर्ण रूप से उसी समयकाल में सांस लेता  हुआ, तथा ग़ालिब के साथ साथ उस संघर्ष का एक हिस्सा बनता हुआ महसूस करता है। ग़ालिब की आर्थिक समस्याएं, पारिवारिक उलझनें, ख़्वाजा हाजी की षड़यन्त्र और नवाब अहमद बख़्श  की चालबाज़ियाँ  दर्शकों को अंत तक बांधे रखती हैं। 

यह नाटक बड़े ही मार्मिक ढंग से ग़ालिब के उस अजीवन संघर्ष की दास्तान सुनाता है, जिसने ग़ालिब को कभी चैन से जीने का मौक़ा न दिया, और ग़ालिब अंततः अपने अधिकारों को न प्राप्त कर सकने का दुख लिए इस संसार से रुख़सत हो गए।

इस ड्रामे में प्रोफेसर  सादिक ने मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवन की कई घटनाओं को चित्रित किया  है, जिनमे बूढ़ी माँ और एक दीवाने भाई को ईश्वर के भरोसे छोड़ कर कलकत्ता का लम्बा सफर, बीमारी की हालत में घर और परिवार से दूरी, मित्रों एवं नवाबों की आर्थिक सहायता पर आश्रित रहना, सरकारी दफ्तर में अफसरों के समक्ष बार बार अपना पक्ष स्पष्ट करना, कलकत्ते के साहित्यिक समुदाय में बहिष्कार एवं तिरस्कार झेलते हुए आहत स्वाभिमान को संभालना और अपनी सहन शक्ति की अंतिम सीमाओं तक पहुँच जाना प्रमुख हैं, जिनका बयान  लेखक ने अपने ख़ास अंदाज़ से किया है। प्रो. सादिक अपने इस ड्रामे में ग़ालिब के इन मुश्किल पलों के साथी के रूप में ग़ालिब की ही अंतरात्मा को हाड़ मांस का रूप देकर  “हमजाद” के रूप में बड़े नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करते हैं, वह हमजाद के रूप में एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व की रचना करते हैं। उनकी यह सृजनशीलता मंच की क्रियात्मकता और  चहल पहल को बनाए रखती है, साथ ही साथ  तनहाई के उन पलों में जब मंच पर ग़ालिब के सिवा कोई और  नहीं होता, संवाद  के अवसर भी प्रदान करती है, इतना ही नहीं, बल्कि उनके द्वारा रचित यह हमजाद ग़ालिब का कटु निन्दक भी साबित होता है, अर्थात वह ग़ालिब के ग़लत निर्णयों पर उन्हें टोकता है और कड़ी पूछताछ कर लाजवाब कर देता है,फिर उन्हें  दुनिया दारी का रास्ता अपनाते हुए, अपने अनावश्यक और हानिकारक अहम और जिद से बचने के लिए प्रेरित करता है, यहाँ तक कि  कई बार अपनी फितरत के विरुद्ध उन्हें मसलेहत  और ज़रूरत के तहत ख़ुशामद और किसी हद तक चापलूसी  के लिए भी किसी न किसी प्रकार तैयार  कर ही लेता है।

ग़ालिब के तुर्की सलजुकी खून की गर्मी अब भी बरकरार थी, मगर प्रतिकूल परिस्थितियाँ उनके वजूद को पल पल निचोड़ रही थीं, उनकी आत्मा उन्हें झुकने नहीं देती थी चाहे वह टूट ही कियूं न जाएं, दूसरी ओर जीवन के मूलभूत  तकाज़े एवं आवश्यकताएं उन्हें  धराशाई किए देती थीं, लेखक ने बड़ी कामयाबी के साथ ग़ालिब के इस अन्तर द्वंद को हमजाद जैसे एक काल्पनिक चरित्र की रचना करते हुए पेश  कर दिया है। उनका अहम एवं खुद परस्ती उनकी तुर्की सलजुकी फितरत की ओर संकेत करती है, मगर हमजाद की नुक्ताचीनियाँ दर्शकों के समक्ष ग़ालिब हेतु उनका  एक निष्पक्ष दृष्टिकोण भी पेश करने मैं सहायक होती हैं, और इस प्रकार  ग़ालिब के व्यक्तित्व  का एक बेहतर और व्यावहारिक ख़ाक़ा उभरता हुआ दिखाई देता है। हमजाद और ग़ालिब के बीच की नोक झोंक, तनहाई के पलों का  साथ, दुख और परेशानी की मित्रता, हमजाद के कटाक्ष और ग़ालिब की झुंझलाहट, ये तमाम  पहलू दर्शकों के मन को ग़ालिब पर गुज़रने वाले दुख और तकलीफ से अनायास ही बड़ी सहजता के साथ जोड़ देते हैं। 

इस ड्रामे के द्वारा लेखक ने इस तथ्य को स्थापित कर दिया है कि, ग़ालिब के जीवन की समस्या उनका कोई प्रेम प्रसंग या केवल उनकी मदिरा पान की आदत नहीं थी, बल्कि असल समस्या उनकी दिन ब दिन गिरती हुई आर्थिक परिस्थति थी, क्यूँकि उनके ऊपर घर के अंदर बाहर मिला कर कुल 20 जनों के भरण पोषण की जिम्मेदारी थी, पारिवारिक मान मर्यादाओं का निर्वाह करना था, एक दीवाने भाई की दवा इलाज, तथा उसके परिवार को भी कुछ न कुछ आर्थिक सहायता प्रदान करनी थी, नस्ल दर नस्ल परिवार की सेवा में लगे रहे खानदानी सेवकों को भी मायूस नहीं करना था, यही कारण थे जिनकी वजह से उन्हें अपने आत्मसम्मान की तिलांजलि देकर दोस्तों के आगे हाथ फैलाना पड़ा। एक ऐसी व्यवस्था जिसने उनके जाएज़  अधिकारों का हनन किया, उसी की हिमायत में “दसतंबों” तक लिखनी पड़ी।

 यह नाटक पूर्ण रूप से ग़ालिब के वास्तविक जीवन के एक प्रमुख घटना क्रम पर आधारित है, किन्तु इसमें जीवनी की सी  नीरसता नहीं पाई जाती। लेखक ने बड़ी ही कुशलता से ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ किए बगैर पटकथा में नाटकीय तत्वों का भी समावेश किया है और इसे एक जीवनी की नीरसता से बचा लिया है। आम तौर पर इस प्रकार के ड्रामों के लेखन में यह समस्या सामने आती है कि एक ओर जहां मात्र ऐतिहासिक तथ्यों पर निर्भरता, नाटक में उत्सुकता और सनसनी की कमी पैदा कर सकती है और नाटक को उबाऊ बना सकती है, तो वहीं दूसरी ओर काल्पनिक रंगों के ताने बाने ऐतिहासिक संदर्भों को वास्तविकता से दूर करदेते हैं। ग़ालिब के संदर्भ में ग़ालिब सीरयल और फिल्म, दोनों में  ही यह समस्या बहुत साफ तौर पर नज़र आती है और ग़ालिब के किरदार को पूरी तरह से छतविछत्त कर देती है। ग़ालिब फिल्म के ग़ालिब का डोमनी से प्रेम प्रसंग सिनेमा की ज़रूरत तो पूरी करता नज़र आता हैं किन्तु ग़ालिब के किरदार को वास्तविक ग़ालिब से कोसों दूर कर देता है और ग़ालिब के जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण  किरदारों को पटकथा से गायब कर देता है। इस कारणवश यह सीरयल  और फिल्म उस साहित्यिक समुदाय की निराशा  का कारण बन जाती  है जो ग़ालिब को पहचानता था।

पुस्तक के “दीबाचे” में प्रोफेसर  सादिक लिखते हैंः- “मिर्ज़ा ग़ालिब एक तफरीही फिल्म थी लिहाज़ा ज़ेब ए-दास्तान के लिए जो कुछ शामिल किया गया उसमें डोमनी के किरदार को हीरोइन का  दर्जा मिला, इस तरह राई को पर्बत की हैसयत हासिल हो गई- हक़ीक़त  खुराफ़ात में खो गई- निस्फ सदी के बाद ऐसा ही कुछ ग़ालिब पर बनाए गए एक टीवी सीरयल मंे मजीद फ़नकाराना इज़ाफ़ों के साथ दुहरा दिया गया। इस तौर ग़ालिब की ज़िंदगी के अहम तरीन वाक़्यात और किरदार धुंधलकों की नज़र हो गए।”

 ग़ालिब के संदर्भ में अबरार रहमान कदवाई ने “तस्वीरे ख्याल”, और डाॅ. रफया सुल्ताना ने “दुदे चरागे महफिल”  के नाम से जो ड्रामे लिखे, यह देखा जा सकता है कि उन में ऐतिहासिकता का दबाव नाटकीय तत्व को उभरने नहीं देता और क्रियात्मकता की कमी स्टेज के सूनेपन का कारण बन जाती है। ज़्ाुबैर रिजवी “दुदे  चरागे महफिल” के बारे मे कहते हैंः- 

‘‘मगर नाटक, टकराव, कशमकश एवं स्टेज की जरूरतों से खाली है।“ (ग़ालिब और फुनूने लतीफा, पेज-55)  

 इस संदर्भ में यदि देखा जाए तो प्रोफेसर सादिक हमजाद की सहायता से ड्रामे की क्रियात्मकता, रोचकता, रहस्यमयता, और ऐतिहासिकता के बीच एक अत्यंत सुंदर संतुलन स्थापित करने में कामयाब नजर आते हैं। हमजाद न केवल ड्रामे की  नाटकीयता और ऐतिहासिकता के बीच संतुलन स्थापित करता है बल्कि दर्शकों के लिए ग़ालिब के चरित्र के भीतर झाँकने का एक अवसर भी प्रदान करता है। हमजाद ग़ालिब को अपने ही अस्तित्व की अदालत मे कड़े, तीखे, बेबाक और दोटूक सवालों की जवाबदेही पर मजबूर करता है, और ग़ालिब को वास्तविकता का आभास करा कर अपने वजूद के दायरे से बाहर निकलने पर मजबूर कर देता है। यही ग़ालिब के जीवन की असल जंग थी जो उनकी शायरी में भी प्रतिबिम्बित हैः

न गुले नगमा  हूँ न पर्दा ए साज

मैं हूँ अपने शिकस्त की आवाज

प्रोफेसर  सादिक का हमजाद इसी शिकस्त की आवाज का शारीरिक रूपांतरण है। ग़ालिब के किरदार के परस्पर आंतरिक विरोध और शायरी की अभिपुष्टि व खण्डन को लेखक इसी  हमजाद की शक्ल में स्टेज पर प्रस्तुत करता  है। ‘‘तमाशा और तमाशाई’’ में मोहम्मद हसन ने इस तकनीक को बरतते हुए “मिर्जा असदुल्लाह खान” के नाम से एक चरित्र गढ़ा था, प्रोफेसर सादिक  के यहाँ इसी तकनीक की न केवल पुनरावृत्ति हुई है बल्कि उन्होंने  चरित्र रचना की इस तकनीक को एक विशेष आयाम से बरत कर अपने शिखर तक पहुँचा दिया है। ड्रामे के पहले, दूसरे, चैथे सातवें तथा बारहवें ऐक्ट में हमजाद की उपस्थिति ड्रामे में ग़ालिब के बाद इस चरित्र को ड्रामे का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण किरदार बनादेती है।   

प्रोफेसर सादिक ने ग़ालिब के भाई यूसुफ़ मिर्ज़ा के दिवानेपन का भी बहुत प्रभावशाली रूप से उपयोग किया है। स्टेज पर किसी ऐसे दृश्य की आवश्यकता थी जिसमें सनसनी, हंगामा, तीव्रता का भाव तथा एक आकस्मिक दुर्भाग्य पूर्ण परिस्थिति का आभास हो, “खौफ” तथा “रहस्यमयता” दो प्रमुख तत्व हैं, किसी दृश्य में जिन की उपस्थिति दर्शकों का ध्यान सम्पूर्ण रूप से मंच की ओर आकर्षित कर लेने की ज़मानत बन जाती है, ग़ालिब के जीवन से ऐसी किसी घटना को तलाश करना मुश्किल था अतः ड्रीम सिकुएंस की तकनीक अपनाते हुए एक ऐसा सीन तराशा गया जिसमें कोलाहल, दुख और हलचल का बेहतरीन समावेश किया जा सके, इस प्रकार एक तीर से कई शिकार किए गए, परदेस में ग़ालिब के मानसिक तनाव की शिद्दत का आभास कराया गया, ग़ालिब के जीवन में यूसुफ़ मिर्ज़ा की अहमियत को उजागर किया गया, भाई के होते हुए ग़ालिब को जिस प्रकार तन्हा अपनी लड़ाई लड़नी पड़ रही थी और कदम कदम पर अपनी बेबसी का एहसास उन्हें बेचैन कर देता था ,इसका भी एहसास दिला दिया गया, और दर्शकों की तमाम तर संवेदनाएं ड्रामे के मुख्य पात्र, अर्थात ग़ालिब के साथ जोड़ देने में भी लेखक कामयाब हो गया। यूसुफ़ मिर्ज़ा का किरदार ग़ालिब के जीवन के अहमतरीन लोगों में से एक था जिसे मिर्ज़ा ग़ालिब सीरयल और फिल्म दोनों मे ही पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया था। यद्यपि पहले सीन में पेश की जाने वाली यह आकस्मिक दुर्घटना पूर्ण रूप से लेखक की कल्पना मात्र है, परंतु बिना एतिहासिक तत्वों के साथ छेड़छाड़ किए , नाटक में बवदसिपबजए ेनेचमदेम और उत्सुकता के तत्वों की कमी को पूरा करने में सक्षम है, और लेखक की असीम कल्पना शक्ति को दर्शाती है। ग़ालिब का यह सपना सम्पूर्ण नाटक की पृष्टभूमि भी तैयार करता है और आर्थिक तंगी, भाई के दीवानेपन के कारण किसी भी समय किसी भयानक घटना से दोचार हो जाने के अंदेशे, घर पर किसी ज़िम्मेदार पुरुष  का आभाव, स्वयं ग़ालिब की घर से लम्बी अनुपस्थिति, जैसी मूलभूत समस्याएं जिन पर आगे बात होनी है , उनका एक आभास इस दृश्य के माध्यम से करा दिया जाता है। 

दूसरे ऐक्ट मे राए छजमल ग़ालिब के मित्र एवं शुभ चिंतक की हैसियत से सामने आते हैं, उनके बीच होनेवाली बातों से ही ग़ालिब की पेंशन से संबंधित सारी तफसील दर्शकों के संज्ञान में आती है। यहीं ग़ालिब के ताया एवं श्वसुर के बारे में भी बात होती है, पेंशन में की गई हेराफेरी के संदर्भ में ख़्वाजा हाजी और जनरल लीक के नाम लिए जाते हैं, तथा नवाब अहमद बख़्श एक बद-दयानत व्यक्ति के रूप में सामने आता है, ख्वाजा हाजी की ख़ुदगरज़ फितरत से भी दर्शकों को अवगत करा  दिया जाता है। इस से अधिक जानकारी की ड्रामा मैं कोई आवश्यकता थी, न ही लेखक इस से आगे कुछ बताता है।  

तीसरे ऐक्ट मैं सुबहान अली और नयाज़ हुसैन की बात भी चलते चलते कर ली जाती है, यह दोनों ही मिर्ज़ा ग़ालिब के घनिष्ट मित्रों में हैं। 

उमराव बेगम जो कि  ग़ालिब की पत्नी हैं उन से ड्रामे के एक्ट नंबर चार में दर्शक रुबरु होते हैं, लेखक ने इस किरदार को उसके सम्पूर्ण सम्मान एवं हाव भाव के साथ इस प्रकार पेश किया है कि इस प्रस्तुति द्वारा स्वयं ग़ालिब का व्यक्तित्व परिपूर्ण होता नज़र आता है, ग़ालिब के वैवाहिक जीवन के संबंध में एक प्रकार की शून्यता का आभास दर्शकों को होता रहा है, पति पत्नी के मध्य एक लम्बे समय की रिफ़ाक़त से पनपने वाली आत्मियता, परस्पर निर्भरता, प्रेम एवं एक दूजे पर अपने अधिकारों का एहसास स्वभाविक है, प्रोफेसर सादिक ने इस शून्यता को एक  भाव-भीने संवाद की प्रस्तुति द्वारा समाप्त करने की एक जानी बुझी कोशिश की है, इस संवाद में उमराव बेगम  एक पति वर्ता स्त्री के रूप मैं उभरती हैं जिसे पति से दूरी एक आँख नहीं भाती, उसे चिंताएं  घेरे रखती हैं, वह ग़ालिब के बार बार “फिरोज़ पुर झरका” जाने को शक की निगाह से देखती हैं, हालांकि वह पति के प्रेम प्रसंगों में पति को कम, तथा  बाज़ारी स्त्रियों के प्रलोभन को  अधिक दोषी ठहराती हुई दिखाई देती हैं, यहीं वह अपनी शंका जताते हुए “उस गाने वाली’’ का ज़िक्र भी करती हैं, पूरे ड्रामे मैं केवल यहीं एक जगह है जहां लेखक ने डोमनी का ज़िक्र बिल्कुल सरसरी अंदाज़ से करते हुए बात को कम से काम शब्दों में समेट कर वहीं समाप्त भी कर दिया है, बिल्कुल उसी प्रकार जैसे कि मकातीब ए ग़ालिब मैं यह बात चंद शब्दों में चर्चा में आई थी। यह अंदाज़ ए बयान  लेखक की तटस्थता का परिचय भी देता है , वह ड्रामे को रंगीन बनाने हेतु कोई अनावश्यक तफ़सील पेश करना दुरुस्त नहीं समझता।  

ड्रामे के पांचवें दृश्य में साइमन फ्रेज़र एक आम गोरे अफसर के रूप में सामने आया है, यह आरंभ में ग़ालिब से काफी प्रभावित भी है, इसी ऐक्ट में ग़ालिब का सेवक मदारी खान ग़ालिब की माँ की चिट्ठी भी लेकर आता है। एक्ट नमबेर छैः मैं अफज़ल बेग एवं अब्दुल करीम के किरदार काफी प्रभावशली ढंग से सामने आते हैं। अफज़ल बेग ख़्वाजा हाजी को अपना सगा बहनोई बता कर साइमन  फ्रेज़र की नज़रों में ग़ालिब को गिरा देने की तरकीबें बयान करता है। उसे डर है कि यदि साइमन फ्रेज़र को ग़ालिब की बात समझ में आगई तो उनकी पेंशन सम्पूर्ण रूप से दुबारा जारी कर दी जाए गी, यदि ऐसा हो गया तो ख़्वाजा हाजी की विधवा तथा बच्चे भूखे मर जाएंगे। अपने मक़सद की पूर्ति के लिए वह साईमन फ्रेज़र के दफ़्तर के एक मामूली सेवक अब्दुलकरीम की सहायता प्राप्त करता है। अब्दुलकरीम अफज़ल बेग की चालों में आसानी से फंस जाता है। दोनों ही शराबी हैं और सियाह को सफेद करने वाले सामाजिक वर्ग के सूचक हैं। सच्चाई, ग़लत और सही जैसी बातों का कोई महत्व इनके लिए नहीं। अफज़ल बेग बला का चतुर है, तथा हर प्रकार से ग़ालिब की कोशिशों को नाकाम करने की जुगत लड़ाता है, लेखक का इस किरदार के विषय में यह दावा है कि:

”मिर्जा अफज़लबेग की शक़्ल में एक विलयन है जो गै़र हक़ीक़ी नहीं“ (जब इस शक्ल से गुज़री ग़ालिब पेज 12)

अफज़ल बेग एक नया नाम हो सकता है, किन्तु यह चेहरा तो हमारा जाना पहचाना ही है, समाज में हर ज़माने में ऐसे लोग देखे जा सकते हैं, जिनका धंधा ही सही को ग़लत और ग़लत की सही करना होता है, वह इसी का खाते हैं, लेखक ने इस चरित्र के माध्यम से न्यायिक व्यवस्था की त्रुटियों तथा न्यायपालिका के आंतरिक ढांचे की जर जर अवस्था की ओर संकेत किया है। यह एक सर्व व्यापी समस्या है। हर ज़माने मैं सरकारी कार्यालयों मैं इसी प्रकार के व्यक्तियों का अमल दखल रहा है, तथा न्यायिक व्यवस्था इनके हाथों का खिलौना बनी रही है, आला अफसरों का काम न्याय दिलाना है, पर व्यवहारिक रूप से वह अन्याय करते ही दिखते हैं। वह अपने दिमाग़ से सोचने ओर समस्या का निदान करने के बजाए ऐसे ही धोखे बाज़ बीचोलियों की आँखों से देखते तथा इन ही के कानों से सुन कर ग़लत सलत फेसले करते रहे हैं, इस प्रकार न्याय आम आदमी की पहुँच से सदैव दूर ही रहा है। 

ग़ालिब के मुक़द्दमे का फ़ैसला लिखने वाला सरकारी अफसर सुइनटन अपने सह कर्मचारी हेनेरी से ड्रामे के ग्यारहवें सीन में कहता है कि ग़ालिब का दावा बिल्कुल सही था परंतु सुबूतों के आभाव में सही फैसला न होसका, सरकारी दफ्तर में वह फाइल तो मिली जिसमें ग़ालिब की पेनशन दस हजार तै की गई थी, किन्तु दूसरी फाइल जिस में दस से घटा कर केवल पाँच हजार पेनशन देने का हुकुम दिया गया था, और उसी पाँच हजार में से दो हजार सालाना का अधिकारी ख़्वाजा हाजी को बनाया गया था उस फाइल का कुछ पता नहीं चल सका। यही नहीं बल्कि देहली के रेजिडेन्ट फ्रांस हाकीनस ने इस पहलू को बिल्कुल ही अनदेखा कर दिया कि ख़्वाजा हाजी पेनशन का अधिकारी नहीं, कवि अपने सच्चे दावे को साबित भी न कर सका, सुइनटन दुखी मन से यह भी कहता है की उसे जितना इस मुक़द्दमे की रिपोर्ट  लिखते समय दुख हुआ, इस से पूर्व कभी नहीं हुआ था। 

ग़ालिब का यह दुख केवल उनका ही दुख नहीं बल्कि न्याय के लिए अपने पेट की रोटी काट काट कर नसल दर नसल न्यायालयों के चक्कर काटने वाले हर उस व्यक्ति का दर्द है जो एक अच्छे कल की उम्मीद पर अपने जीवन का हर एक पल कुरबान  कर देता है परंतु अंत में केवल मायूसी ही हाथ लगती है। 

इस प्रकार पंद्रह किरदारों एवं  बारह दृश्यों पर आधारित यह नाटक मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवन के एक विशिष्ठ पक्ष का ही चितरण करता है। जहां ग़ालिब का अपनी पैनशन के लिए अग्रसर रहना, और अंत में मायूस होकर खुदा से शिकायत की बात कहना दिखाया गया है। तथा इसी मुख्य समस्या से  संबंधित कुछ विशेष घटना क्रमों पर  ध्यान केंद्रित रखा गया है। यहाँ  कवि ग़ालिब कहीं दिखाई नहीं देता, न बहादुर शाह के दरबार में शेर व शाऐरी की महफिलों का ज़िक्र, है न बल्ली मारों के मोहल्ले में अपने बेतकल्लुफ दोस्तों के साथ “दाद ए सुखन” वसूल करते ओर उरुसे ग़ज़ल को सँवारते हुए कहीं ग़ालिब नज़र आते हैं, यहाँ तक कि देहली की राजनैतिक गतिविधियों, सियासी इंतेशार और “गदर” के हालात, जिनसे ग़ालिब सीधे प्रभावित हुए थे, उन पर भी कोई चर्चा नहीं की गई है। ऐसा महसूस होता है कि  लेखक ने जान बूझ  कर अपने ड्रामे का कनवास बिल्कुल सीमित रखा है। 

 ऐसा करना ड्रामे की ज़रूरतों के अनुरूप भी है। ड्रामा  एक निश्चित समय के अंदर ही समाप्त होना अच्छी बात है, बहुत अधिक लम्बा ड्रामा मंच पर प्रस्तुत करना बहुत आसान नहीं होता, दर्शकों का ध्यान तथा एकाग्रता भंग होने की आशंका बनी रहती है। यूँ भी ग़ालिब जैसे बहु आयामी कवि के व्यक्तित्व एवं जीवन के समस्त पहलुओं को एक से अधिक ड्रामों में भी समेटना कुछ आसान नहीं। शायद इसी अधूरेपन  के एहसास ने मुहम्मद हसन से “कुहरे का चाँद” लिखने के बाद “तमाशा और तमाशाई” लिखवाया, लेकिन फिर भी स्वयं लेखक इन दोनों ड्रामों को  लिख कर कितना संतुष्ट हुआ यह कहा नहीं जा सकता।

ड्रामों में डाइलॉग की बड़ी अहमियत होती है, प्रोफेसर सादिक ने इस ड्रामे के डाइलॉग भी बहुत तवज्जोह से लिखे हैं, विशेष कर ग़ालिब और हमजाद का संवाद बड़ा ही रोचक, बहु आयामी, बेबाक, बरजस्ता और दिलचस्प है। यहाँ हमें मकातीब ए ग़ालिब के लब ओ लहजे की गूंज साफ तौर पर सुनाई देती है।

दूसरा प्रमुख संवाद ग़ालिब का उमराव बेगम के साथ है,जहां सादगी के साथ एक अपनाइयत का अंदाज़ उभर कर आता है। ग़ालिब को एक ऐय्याश कवि तथा उमराव को कटीले एवं तीव्र स्वर रखने वाली महिला के रूप में अब तक  सुनते  देखते एवं पढ़ते रहने वाले ग़ालिब पसंद वर्ग के लिए यह एक ख़ुशगुवार तबदीली है, मुमकिन है ड्रामे का यह वातावरण खुद लेखक की ग़ालिब परस्ती का नतीजा हो। क्या मालूम वास्तविक जीवन में कभी इस कवि ने अपनी अर्धांगनी के दुखों से भरे जीवन में खुशयों के दीप जलाने की कभी कोई कोशिश भी की होगी या नहीं कौन जाने, परंतु प्रोफेसर सादिक का ग़ालिब एक हसास, ज़िम्मेदार, और हमदर्द व्यक्ति है, जिसे अपने परिवार ही नहीं बल्कि अपने सेवकों से भी प्यार है, और वह उन सब के लिए चिंतित नज़र आता। 

इस ड्रामे में ग़ालिब के आखरी जुमले न केवल उनकी सारी ज़िंदगी की कोशिशों और अंततः हाथ लगने वाली नाकामियों पर उनकी हसरत का इजहार हैं बल्कि “नुक्ता दाँ” जेहनों के लिए ग़ालिब के छत विछत व्यक्तित्व की परतें उकेर कर उसके दिल व दिमाग़ में झाँकने का एक मौक़ा भी फराहम करते हैंः

“मर जाने के बाद अगर हश्र के दिन मुझे खुदा के सामने पेश किया गया तो अब मैं वहीं फर्याद करूंगा, और  चीख चीख कर कहूँगा, मुझे इंसाफ चाहि..  मुझे इंसाफ चाहिए .. इंसाफ चाहिए”

इन जुमलों से यह साफ ज़ाहिर है कि ग़ालिब को धर्म अधर्म तथा सजा व जज़ा के ईश्वरीय वादे पर भी कहीं न कहीं  विश्वास था। और वह यह कह कर इस बात को टालते रहने के बावजूद कि: 

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है 

कभी कभी असल बात भी बयान कर जाता था यानिः

जनता हूँ सवाब ए ताअत ओ ज़ुहद

पर तबीयत उधर नहीं जाती 

ग़ालिब की फितरत में जो अहम, जिद और खुदपसंदी का पहलू था ग़ालिब को खुद भी उसका एहसास था:

बंदगी में भी वह खुद्दार वह खुद बीं हैं हम 

उलटे फिर आए दरे काबा अगर वा न हुआ 

मगर जिंदगी की पए दर पए शिकस्तों ओर नाकामियों ने इतना चकना चूर कर दिया कि ग़ालिब को कहना पड़ाः 

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे

बे सबब हुआ दुश्मन ज़ालिम आसमाँ अपना                                                

उन्हों ने मसलहत का लबादा भी ओढ़ लिया ,और फिर वो सब कुछ भी लिखा जिसे लिखना वो अपनी शान और आन बान के खिलाफ समझते रहे थे, मगर यह सब कुछ लिखते हुए उनकी उँगलियाँ ही नहीं उनका दिल भी लहू लहान हुआ:

दर्द ए दिल लिखूँ कबतक जाऊँ उनको दिखला दूँ 

उँगलियाँ फगार अपनी खामा खून-चकां अपना  

इसी दुहरी मनःस्थिति को लेखक ने हमजाद की मदद से पेश करके ग़ालिब का नुकताचीन खुद ग़ालिब को ही बना कर उसके एहसास ए जुर्म की ही निशानदेही नहीं की बल्कि ग़ालिब के साथ मजीद सहानुभूतियाँ भी वाबस्ता कर दी हैं और खुद ग़ालिब की हक़ पसंदी, आला जर्फी और विनम्रता को भी प्रदर्शित कर दिया है, ग़ालिब की कविताओं में गाहे ब गाहे यह भाव उभरते डूबते देखे जा सकते हैं जिन्हें प्रोफेसर सादिक ने कलात्मक रूप से अपनी ड्रामे की कहानी गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया है। फरक बस इतना है की ग़ालिब के यहाँ इन तमाम तत्वों को शाइराना ढंग से प्रस्तुत किया गया है जब कि प्रोफेसर सादिक ने इन तत्वों को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत कर दिया है । 

इस प्रकार हम कह सकते हैं की प्रोफेसर सादिक अपनी कलात्मकता के समस्त पहलुओं के साथ ग़ालिब के जीवन तथा उनकी शाइरी के साथ जुड़े हुए नज़र आते हैं, यदि वह कवि तथा चित्र कार हैं तो उन्होंने “अजीम शाइर मिर्जा ग़ालिब” के द्वारा अपने और ग़ालिब के रिश्ते को प्रतिबिम्बित किया है, वह बेहतरीन अनुवादक भी हैं, तो मसनवी “चिराग ए दैर” का हिन्दी अनुवाद पेश करते हुए “ग़ालिबफहमी” के लिए रास्ते आसान किए हैं, और वह रंग मंच से जुड़े हुए एक कलाकार भी हैं, फिर तो उनका ही हक़ था कि वह ग़ालिब के वास्तविक जीवन के रंग भी हमें एक नाटक के रूप में दिखाएँ, जहां कहानी न हो, बल्कि वास्तविकता का ड्रामाई इज़हार हो,सो वह यहाँ भी पूर्ण रूप से क़ामयाब नज़र आते हैं।