मचान

 समीक्षा


कुलदीप शर्मा, ऊना, (हि.प्र.) मो. 9882011141

डाॅ. धर्मपाल साहिल, होशियारपुर, मो. 9876156964

तेजी से बदरंग होते जा रहे संसार में लोककथाएँ एक अलग ताजा चटख रंग की तरह आती है. इनका रंग वहां दिख जाता है जहाँ यह अपना अस्तित्व किताबों से बचाकर रखे होते हैं. गाँव की किसी पगडण्डी पर या अलाव पर या बड़े बूढ़ों की चैपाल पर या स्त्रियों के जमावड़े में या फिर निपट देहात के तीज त्योहारों पर यह किस्से मुखर रहते हैं। भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद के इस घोर दौर में लोककथाओं का अद्यतन रूप भी खासी हद तक तकनीक की भेंट चढ़ चुका है, जिसके चलते इन किस्सों के आन्तरिक स्ट्रक्चर से वह रूमानी भदेसपन या तो कुंठित हो जाता है या फिर सिरे से गायब रहता है। साहित्य में जब जब लोककथाओं को किस्सों कहानियों या काव्य का विषय बनाया गया तो हर कवि कथाकार ने इसे अपने ढंग से रचना के ढांचे में फिट किया। बहुत से लोग इस प्रक्रिया में कई बार लोककथा को एक भोंडी पैरोडी मात्र बनकर छोड़ देते हैं. पर जब डॉ. धर्मपाल साहिल जैसे सिद्धहस्त रचनाकार किसी लोककथा से अपने पात्र उठाते हैं तो यकीनन उसमे उस मौलिक लोककथा की खुशबू बरकरार रहती है जो आज भी चंबा जनपद के गाँव देहात के लोगों के होंठों पर गूंजता है। 

डॉ. धर्मपाल साहिल ने अपने आठवें उपन्यास ‘मचान’ में चंबा क्षेत्र की प्रेम कथा कुंजू चंचलो को एक छायाग्रह की तरह कथानक की पृष्ठभूमि में रखा है। बल्कि कहना चाहिए कि अपने दो मुख्य पात्रों के नाम उस लोककथा से उठाए हैं। प्रकारांतर से यह चंबा बल्कि पूरे हिमाचल के जनजीवन में रची बसी उस प्रेमकथा का पुनरस्मरण है।

‘मचान’ में इसे लेखक ने उन स्थितियों और सच्चाइयों के समकक्ष इस तरह रखा है कि कोई समानता या सामंजस्य दोनों में न होते हुए भी  उस लोक प्रेमकथा की अनुगूँज पुरे कथानक में महसूस की जा सकती है. ‘मचान’  तो आधुनिक जीवन की संश्लिष्टताओं और भावनात्मक पेचीदगियों के साथ अपने पात्रों में अपने अपने समय के प्रश्नों के हल ढूंढता है। इस उपन्यास में डॉ. धर्मपाल साहिल लोककथा जैसी सरलता और उत्कंठा अपनी बेमिसाल किस्सागोई के बल पर अंत तक निभा ले गये है। इस उपन्यास में भी कुंजू और चंचलो के बीच वह नैसर्गिक प्रेम ही है जो इसे मूल कथा से जोड़े रखता है। 

मचान की कथाभूमि मूल कथा से बिलकुल अलग है पर उसमें देहाती जीवन की ऐसी सुबास है जिसने उपन्यास के पात्रों को आधुनिकता के बावजूद ठेठ ग्रामीण की चेतना की गर्भनाल से जोड़े रखा है। अलबत्ता ‘मचान’ अपने कथानक में, शिल्प में, पृष्ठभूमि में, और जीवन स्थतियों में एक अलहदा तनाव वृत्त की रचना करता है। यहाँ डॉ. धर्मपाल साहिल पहले पृष्ठ से ही इस युग की कथा कहते-कहते अचानक स्वयम्वर जैसी एक असम्भव सी स्थिति का वर्णन करते हैं, तो लगता है यह जरुर कोई जबरन गढ़ी गयी घटना होगी। लगता है कि आगे चलकर कल्पना और यथार्थ के बीच की यह खाई और चैड़ी हो जाएगी और इसे पाटना आसान नहीं होगा। पर पाठक के तौर मैं कह सकता हूँ कि हम जल्दी ही गलत साबित हो जाते है और कहानी अपने विकास क्रम में अधिक से अधिक कठोर यथार्थ के धरातल पर बढ़ने लगती है। कहना न होगा कि डॉ. धर्मपाल साहिल अपने इस उपन्यास में बिलाशक एक मास्टर किस्सागो के रूप में सामने आए हैं। हर पल यह  जिज्ञासा बनी रहती है कि आगे क्या हुआ। पाठक के मन में इस तरह की जिज्ञासा पैदा करना और फिर उसे अंत तक बनाए रखना इधर आ रहे उपन्यासों में बहुत कम देखने को मिलता है। स्वयम्वर दरअसल चंचलो के पहलवान पिता महावीर की अपनी युवा हो रही पुत्री को लेकर स्वाभाविक चिंताओं का नतीजा है। स्वयम्वर की बात सुनकर इस बार हरिपुर गाँव में सालाना आयोजित होने वाली छिंज में युवाओं में एक तरह की होड़ लग जाती है। चंचलो युवा है और अनिन्द्य सुन्दरी है. सभी युवा और अविवाहित पहलवान चंचलो को पाने के लिए छिंज में अपना अपना भाग्य आज़माते है। इसी गाँव के दो युवा पहलवान दिलावर और जगदीश जो कई मर्तबा पहले भी इस अखाड़े में बड़े बड़े कुश्ती मुकाबले जीत चुके है, और अखाड़े के पुराने प्रतिद्वंदी हैं, इस बार जीतोड़ मेहनत करके अखाड़े में उतरते है। एक तरह से उनके लिए यह छिंज उनके बल पौरुष और मल्लयुद्ध-कौशल की परीक्षा है। उनकी परस्पर प्रतिद्वन्दिता पहले से है पर इस बार वे स्वयम्वर में हैं, केवल और केवल चंचलो को पाने के लिए। दोनों कई नामी पहलवानों को हराकर इस दंगल के फाइनल में भिड़ते है और दिलावर विजेता होकर चंचलो जैसी रूपसी को जीवन साथी के रूप में पा जाता है। जैसे जैसे कहानी आगे बढती है, स्वयम्वर जैसी प्रथा का अटपटापन जेहन से निकल जाता है। उलटे यह बिलकुल स्वाभाविक लगता है कि चंचलो छिंज की ‘माल्ली’ जीतने वाले किसी अविवाहित युवा पहलवान के गले में वरमाला डाले। अटपटापन सिर्फ इसलिए कि यह सब उस क्षेत्र में होता है जहाँ वर वधु  की जन्मकुंडली मिलाकर रिश्ते तय किये जाते हैं। शरीर सौष्ठव से ज्यादा लडके की आर्थिक स्थिति देखी जाती है। वर पक्ष का खानदान, उंच नीच और उनके चारित्रिक पहलू देखे जाते हैं। वहां चंचलो के पिता महावीर जो खुद एक नामी पहलवान रह चुके है यह घोषणा करते है कि उनकी रूपसी पुत्री इस छिंज यानि दंगल का फाइनल जीतने वाले पहलवान के गले में वरमाला डाल कर उससे शादी रचाएगी। दिलावर जहाँ गाँव का सीधा सादा और मेहनती युवा है वहीं जगदीश चालाक, लम्पट  और महत्वाकांक्षी है। पुलिस की नौकरी करते करते उसे शराब जैसी लत भी लग गयी है और वह गाँव के आवारा नशेडी दिशाहीन युवकों का अगुआ भी बन बैठा है। दोनों कभी छिंज के उस फाइनल के बाद दंगल में तो नहीं भिड़े पर इनके बीच द्वंद्व का एक महीन सा वितान तनता चला जाता है। यह द्वन्द्व चंचलो को लेकर तो है ही इसका एक कारण यह भी है जगदीश स्वयं को दिलावर के मुकाबले अधिक योग्य और सम्पन्न मानता है। जगदीश की नौकरी पुलिस में होने के कारण उसका गाँव के सीधे सादे लोगों पर जो रुआब है उससे वह गाँव का एक प्रभावशाली व्यक्ति बन बैठा है। उसके स्वभाव में हेकड़ी है और कहीं भी कैसे भी अपनी बात मनवा लेने का दम्भ है। चंचलो पर उसकी कुदृष्टि उसी दिन से है जिस दिन वह छिंज का फाइनल हार गया था। दिलावर की उस अंतिम पटकनी से जगदीश खुद ही नहीं हारा चंचलो को भी उसने खो दिया था। उस हार का कांता उसे निरंतर टीस देता रहता है और वह इसके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता।

दिलावर चंचलो के साथ अपनी गृहस्थी में मशरूफ रहता है। उसकी जिन्दगी चंचलो, खेत और मवेशियों तक सीमित हो जाती है। उसकी सीमित इच्छाएँ और थोड़े से सपने है और वह चंचलो को आपने जीवन में पाकर खुश है संतुष्ट है। दिलावर अपनी खेती बाड़ी को जंगली जानवरों से बचाने के लिए खेत के बीचोंबीच एक मचान बनाता है। 

मचान का प्रचलित अर्थ है एक शिकारी का स्ट्रेटेजिक बैठने का स्थान जहाँ से वह आपने शिकार की टोह लेता है और उस पर निशाना साधता है। इस उपन्यास में मचान का प्रयोग बहुअर्थी है। दिलावर के लिए मचान महज जंगली जानवरों से फसल की रक्षा करने के लिए व स्वयं सुरक्षित रहने का एक साधन है जिसे हिमाचल के इस भूभाग में ‘तन्न’ कहा जाता है। जगदीश के लिए यह मचान सम्भवतः एक शिकारी का मचान है। अचानक इसी तन्न या मचान पर एक रात को दिलावर की रहस्मयी स्थितियों में मौत हो जाती है। नतीजतन चंचलो अपने दो बच्चों संग इस दुनिया में नितांत अकेली पड़ जाती है। तभी उसे यह भी एहसास होता है कि वह अर्धशिक्षित या लगभग अशिक्षित है। अशिक्षा का यह दंश उसे भीतर तक सालता है। मास्टर कुँज कुमार जो छिंज में मंच संचालन का काम सम्भालता था, हरिपुर गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक है। चंचलो के बच्चे इसी स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे है और चंचलो अपने बच्चों की पढ़ाई और फीस को लेकर चिंतित रहती है। और फिर एक दिन वह खुद अपने दोनों बच्चों के साथ स्कूल जाती है और मास्टर कुँज कुमार से उसके व्यक्तित्व से, उसकी उदारता से, और उसकी भद्रता से बहुत प्रभावित होती है।

दिलावर की मौत के बाद कहानी में जो ट्विस्ट है वह यह कि युवा चंचलो हर कदम पर जगदीश की नजरों में खटकने लगती है और वह उसे किसी भी तरह पा लेने के लिए लालायित है। अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए वह हर तरह के हथकंडे अपनाता है। उसके खेतों की बिजाई निराई का लालच देता है पर चंचलो उसके लालची स्वभाव से परिचित है। वह उसे दो टूक जवाब देकर हड़का देती है। दिलावर की मौत के बाद चंचलो के पिता महावीर, और घर में पाली गयी एकमात्र गाए की मौत चंचलो को और ज्यादा तोड़ देती है। मास्टर कुँज कुमार के साथ चंचलो की नजदीकियां जगदीश को बुरी तरह आहत करती है और वह गाँव के आवारा नशे के लालची युवकों के साथ मिलकर कुंज कुमार के खिलाफ एक साजिश रचता है। यह साजिश ऐसी है कि मास्टर कुँज कुमार के जीवन में एक बवंडर ला देती है। कुँज कुमार अचानक एक समझदार और लोकप्रिय अध्यापक से एक शातिर अपराधी और भगोड़ा बन कर दुनिया के सामने आता है। कुंज कुमार पर अचानक एक आरोप लगता है कि उसने स्कूल में पढ़ने वाली  एक छोटी दलित बच्ची के साथ बलात्कार करने का प्रयास किया और वह स्कूल में इसी कारण बेहोश हो गयी। यह एक सोचे समझे षड्यंत्र का हिस्सा था जिसकी इबारत जगदीश ने लिखी थी। इस शिकायत पत्र पर तथाकथित पीड़ित बच्ची के अनपढ़ पिता का अंगूठा भी लगा है और इस शिकायत की संस्तुति स्थानीय एम एल ए भी करता है, पूरा प्रिंट मीडिया और टी वी चैनल इसमें अपनी खलनायकी भूमिका निभाते है और टी आर पी बढ़ाने के चक्कर में यह मुद्दा इस तरह उछाला जाता है कि हर कहीं लोग इसके खिलाफ प्रदर्शन करते हैं। वे सब लोग जो मास्टर कुंज कुमार के चरित्र के विषय में जानते हैं सकते में आ जाते हैं। केवल एक रौशनी है जो खुलेआम कुँज कुमार के पक्ष में है और उसकी छाया में चलने वाली चंचलो भी यह जानती है कि मास्टर कुँज कुमार निर्दोष है। वह जानती है कि जगदीश ने ही उसे फंसाया है। पर वह कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं है। यह सारा प्रकरण उस ‘डेडली-‘नेक्सस’ का हिस्सा है जो पुलिस, अपराधी, राजनेता और मीडिया के बीच बहुत फल-फूल रहा है और आम आदमी के पास जिसका कोई तोड़ नहीं है। 

मास्टर कुँज कुमार जगदीश द्वारा रची गयी इस साजिश में फंस कर इस कदर असहाय हो जाता है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वह रातों रात भूमिगत हो जाता है। इज़्जतदार आदमी का इस तरह भगोड़ा हो जाना पाठक को भी आक्रान्त कर देता है। हमारा समाज आज जिस अनैतिकता की चपेट में है वह इस पूरे प्रकरण में अपनी पूरी भयावहता के साथ उभर कर आई है। इसी प्रकरण में रौशनी की भूमिका भी एक ताजादम और रोशनख्याल व्यक्तित्व के रूप में उभर कर सामने आई है। वह आर्थिक और भावनात्मक रूप से आजाद है और निजी जिंदगी के झटकों ने उसे निर्भीक बना दिया है, वह कुँ्ज कुमार की लेखक के तौर पर प्रशंसक है और एक गहरे स्तर पर उनकी मित्रता एक दुसरे का सम्बल है। वह कुँज कुमार पर अचानक आई आपदा से बड़ी सुझबुझ और साहस के साथ जूझती है। रौशनी से चंचलो का मिलना और उसकी फर्म में नौकरी मास्टर कुँज कुमार की वजह से ही सम्भव हुई थी। इसी बीच दिलावर की मौत की फाइल को दोबारा से खुलवाना, उसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट निकलवाना जो पुलिस ने जगदीश के दखल के चलते छुपा ली थी, पुलिस पर दवाब बनकर उनसे सच्चाई उगलवाना और इसमें सीधे सीधे दिलावर की भूमिका का जाहिर होना यह सब काम रौशनी और मास्टर कुँज कुमार इस तरह करते हैं कि धीरे धीरे यह भी साफ हो जाता है कि दिलावर की हत्या हुई थी और उसमे जगदीश ने थाने में बंद दो कैदियों का इस्तेमाल किया था। एक अन्य स्त्री पात्र सुरंजना जो जगदीश की रखैल है रौशनी से मुलाकात के बाद अपने जीवन में बदलाव ले आती है और रौशनी के कहने पर दिलावर हत्याकांड में सच बोलने को तत्पर हो जाती है। इस तरह धीरे धीरे सारी घटनाओं पर से रौशनी और मास्टर कुँज कुमार के प्रयासों से धुंध छंट जाती है।

उपन्यास का यह भाग एक सस्पेंस थ्रिलर की तरह चलता है और पाठक उन सारी घटनाओं से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है। घटनाओं में एक से अधिक बार नाटकीयता आ गयी है पर वह कहानी के प्रवाह में बखूबी खप जाती है। कुछ ओपरा या बनावटी नहीं लगता। अंत में जब रहस्य के बादल एक एक कर छंटने लगते है तो मास्टर कुँज कुमार भी सुर्खरू होकर दोबारा उसी स्कूल में जोइनिंग देता है जहाँ से उसे निलम्बित किया गया था। इस बीच बहुत सारे पात्र जो इस मुहिम में रौशनी का साथ देते हैं वे समाज के गुडी गुडी लोग हैं। उपन्यास की कथावस्तु में उनका योगदान यही है की वे रौशनी के आग्रह पर और स्वेच्छा से भी उसकी मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। कहानी अंततः एक सुखान्त की और बढती है। पर इस सब में लोक कथा के दो पात्र कुंजू और चंचलो बहुत पहले से प्रेम और समर्पण की आधी अधूरी अभिव्यक्ति में एक दूसरे के लिए न्योछावर हो जाने की मनःस्थिति में आ चुके होते हैं। फिर एक आश्रम में वे सारी वर्जनाएं तोडकर शारीरिक स्तर पर अपने इस प्यार पर मुहर लगाते है। कुंजू चंचलो बिना शादी किये एक हो जाते है। 

लगभग पौने तीन सौ पृष्ठों के इस उपन्यास में लेखक ने जिस भौगोलिक अंचल को अपनी कथावस्तु के लिए चुना है वह हिनाचल पंजाब का सीमांत क्षेत्र है। वहाँ के ग्रामीण जीवन का साहिल को व्यक्तिगत अनुभव है। वे कई वर्ष तक वहाँ अध्यापन कार्य करते रहे हैं। जाहिर है कि मास्टर कुँज कुमार का किरदार बहुत हद तक लेखक का अपना भोगा हुआ यथार्थ भी है. निजी अनुभवों से निसृत किसी भी रचना प्रक्रिया में उस क्षेत्र विशेष की जीवन स्थितियों का प्रामाणिक वर्णन मिलना स्वाभाविक है। यही कारण है कि जब डॉ. धर्मपाल साहिल हरिपुर गाँव के मेलों, त्योहारों, उत्सवों या परम्पराओं पर कलम चलाते हैं तो आपके आसपास उस हवा का स्वाद तैरने लगता है. यह लेखक के लिए रचनात्मक तुष्टि का सबब हो सकता है. साहिल सात उपन्यास और कई अन्य पुस्तकें लिखने के बाद मचान में अपना सारा जमा अनुभव उंदेल देते हैं और पाठक के हाथ में एक ऐसी कृति देते हैं जिसमे पाठक सिर्फ पाठक रह जाता है, प्रश्नकर्ता नहीं बन पाता। हमारे गाँवों में निर्विवाद रूप से जातीय वर्गीकरण और जातीय संघर्ष छोटी छोटी घटनओं मे मौजूद रहता है वैसा संघर्ष मचान में भी है पर वह कहानी के दवाब में अंडरकरंट की तरह विद्यमान  है कहानी के मुख्य खांचे में नहीं आता। 

किसी भी कहानी या उसके पात्रों को लेकर लेखक के निजी मन्तव्य रहते है जिनसे एक संवेदनात्मक लगाव बना रहता है, ऐसे में किसी वैचारिक दृष्टिकोण को निभाने की गुंजाईश कम रहती है। डॉ. धर्मपाल साहिल का यह उपन्यास किस्स्गोई की एक बेहतरीन मिसाल है। रौशनी और सुरंजन के माध्यम से स्त्री पुरुष सम्बन्धों की दो नितांत अलग तरह की व्याख्याएँ यहाँ मिलती हैं। एक पति द्वारा उपेक्षित और त्यक्त किन्तु हर अर्थ में अपने समय से मुठभेड़ करती और जीतती हुई, दूसरी प्रेमी के लिए पति को छोड़ देने वाली और बाद में उसकी रखैल बन जाने को अभिशप्त। इतना ही नहीं वह प्रेमी से केवल शारीरिक भूख की तुष्टि का प्रयोजन  तलाशती उसकी अपराधिक गतिविधियों में भी बिना कुछ सोचे शामिल हो जाती है। एक आत्मसम्मान और सुझबुझ से जीवन की चुनौतियों से जूझती और दूसरी बिना रंचमात्र स्वाभिमान के पतन के रास्ते पर लगातार फिसलती हुई। जैसे ही जगदीश की पत्नी और सुरंजनी रौशनी के उजले व्यक्तित्व के सम्पर्क में आती है वे जगदीश के खिलाफ गवाही देने को तैयार हो जाती है। पर अपनी बाजी पलटते देखकर जगदीश आत्महत्या कर लेता है और इसके साथ ही दिलावर की हत्या और दुसरे मामलों का भी पटाक्षेप हो जाता है। उपन्यास में दूसरे पात्र भी है। मसलन रौशनी की फर्म के मालिक मित्तल जी, रिटायर्ड जज जो रौशनी की मदद करते हैं, पर सबसे रहस्मय पात्र हैं बकरीवाले बाबा ! दिलावर की मौत के बाद वे गाँव छोड़ कर चले जाते है और उसके बाद उनका उपन्यास में कोई वर्णन नहीं है। मास्टर कुँज कुमार का चंचलो के लिए प्रेम उद्दात भावनाओं से लबरेज है और कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कुँज कुमार चंचलो के कुंजू नहीं है। तमाम संघर्षों और पीड़ाओं से निकलकर वे एक सुखद अंत की और लौटते हैं। मास्टर कुँज कुमार पता नहीं क्यूँ प्रेम की परिणति विवाह में नहीं चाहते और कई तरह के तर्क देकर वे चंचलो को इस बात के लिए राजी कर लेते है कि उनका सम्बन्ध जैसा है वह शादी के घेरे में आ जाने के बाद सीमित हो जाएगा। कुंजू और चंचलो के लिए-‘दुःख भरे दिन बीते रे भईया अब सुख आयो रे’ वाली स्थिति है। जैसे उनके दिन फिरे वैसे सब के फिरें।