रावण की जीत : साहिब सिंह गिल

पंजाबी कहानी

अनु. फूलचंद मानव, पंजाबी से अनुवाद प्रो. फूलचंद मानव, 239, दशमेश एनक्लेव, ढकौली, जीरकपुर 140603, मो. 093160-01549


राजा राजपूती न जाने कहां से आया और उसकी जाति, गोत क्या था? हल्ले-गुल्ले के दिन थे। आते ही सिंह सज गया। तभी से पूरा शहर सूली पर टंग गया। वह पेशे से वकील था। वकालत चलने में समय लगता है। वह रातों-रात वकालत चमकाना चाहता था। उसने एक योजना बनायी। सुबह होते ही शोर पड़ गया कि गुरुद्वारे में बीती रात किसी ने बाबाजी की ‘बीड़‘ आग को अर्पित कर दी। शोर मचाने में वह सबसे आगे था। मुनादी करवाके उसने सारा शहर इकट्ठा कर लिया। ‘खून का बदला खून‘ की कसमें खायी गईं। शहर बंद रहा। कई जगह आग लगी। जलती पर तेल डालने के लिए असाल्ट राइफलों वाले पहुंच गये। सन्देह की परत में शहर के मेयर की हत्या कर दी गई। उसकी अस्थियों के साथ प्रदर्शन हुए।

राजपूती राजा को आतंकवादियों की जमानतों के केस आने लगे। घौंस में जमानतें दी जाती थीं। किसी जज की हिम्मत नहीं थी कि जमानत न दे। कुछ ईश्वर के बंदे ऐसे भी होते हैं, जो कर्तव्य को धर्म मानते हैं। कौशल जज उन्हीं में से एक था। मेयर के कत्ल की तारीख थी। अदालत खचाखच भरी थी। डिफेंस का वकील राजा राजपूती था। उसने पूरी आस के साथ जमानत की अर्जी पेश की। कौशल ने पूरा केस समझ कर आर्डर दिया,-‘कातिल दिन-दिहाड़े सब के सामने कत्ल करता है। वह भी शहर के मुखिया का कत्ल । मुजरिम जमानत पर रिहा हो कर किसी और को भी मार सकता है।‘

जज के इनकार करने की देर थी, भीड़ को चीरता एक आदमी आया। हाथ में असाल्ट थी। न्यायमूर्ति की हत्या करके निकल गया। सरकारी बाडीगार्ड डंडा उठाए खड़ा देखता रहा।

वकीलों ने हड़ताल की, जलूस निकाला। राजा राजपूती को बहुत गुस्सा आया। हफ्ता भी नहीं बीतने दिया। उनके दो वकील नेताओं को गोली का निशाना बना दिया। हर तरफ दहशत फैल गई। लोग जान-माल की चिंता में थे। शहर खाली हो गया। जो नहीं जा सकते थे, महीना भरने लगे। सब पैसा राजा राजपूत के पास जमा हो रहा था। लूट-खसूट करने वाले गिरोह भी उसके हुकुम का पालन करते। आज्ञा का पालन न करने वाले को गोली का निशाना बना दिया जाता। न दलील थी, न कोई अपील।

राजपूती राजा से सरकार डरती थी। उसके आगे-पीछे निजी अंगरक्षक होते थे। वे असाल्ट, राइफलों के साथ कब किधर निकल जाते, पता ही न चलता। सिपाही तक डरकर छिप जाते। वे जानते थे, असल सरकार कौन-सी थी। 

राजपूती राजा को सल्तनत का घेरा छोटा लगने लगा। पहला काम उसने यह किया कि मशहूर दूध की फैक्टरी को घेरे में ले लिया। महीना भरने का आदेश जारी कर दिया। जितने बाबे बेकार घूम रहे थे, सबको काम पर लगवा दिया। उन्हें आतंकवादी गतिविधियों के लिए पर्दा मिल गया। मारधाड़ तेज हो गई। उन पर संदेह नहीं हो सकता था।

फैक्टरी से आगे आयुर्वेदिक कालेज था। वहां पढ़ाई तो क्या होनी थी। बंदे मारने के लायसेंस जरूर जारी हो जाते । राजपूती राजा को महसूस हुआ, यह काम मैं कर सकता हूं। वहां कौन-सा भावी डाक्टरों को पढ़ाना था। पैसा ही पैसा बनता था।

दाखिले के दिन मौके पर पहुंच गया। जितना धन इकट्ठा हुआ, कब्जे में कर लिया। मालिकों को भगा दिया। कालेज पर कब्जा करके बैठ गया। गेट पर ‘बाबे‘ का पहरा लगा दिया। हुकुम हो गया, उसकी आज्ञा के बिना कोई अंदर नहीं जा सकता। कालेज का अध्यक्ष भी वह, और मालिक भी वह।

जिन्होंने करोड़ों रुपए खर्च करके बाप दादा की याद में काॅलेज बनाया था। साथ बड़ा अस्पताल बनाया था। उन का मकसद था कि गरीबों का मुफ्त इलाज हो। सपने अधूरे रह गये। उजाड़ने के लिए राजा राजपूती एक साधन बन गया। उनका वासता कभी ऐसे पशु के साथ पड़ा ही नहीं था। पशु के साथ पशु होकर सुलझा जाता है। कलम की लड़ाई लड़ने वाले महाजन लोग एक तरफ होकर बैठ गये। कोई पेश न चलती देख, बेचारों ने कोर्ट का द्वार खटखटाया। दस-पंद्रह साल कोर्ट ने कोई न्याय नहीं किया। राजपूती की मौज हो गई। पुराना स्टाफ भगा दिया। जो न भागे, उनका वेतन बंद कर दिया। लंबी सर्विस वाले लोग सड़कों पर आ गये। उनकी जगह निठल्ले बैठे। वैद, हकीम, पांचसात सौ पर रख लिए गए। कालेज दुकान बन गया। 

इमारत को वह कहीं नहीं लेकर जा सकता था। जो सामान था, उठवाकर कबाड़ में बिकवा दिया। हर तरफ सफाई करता वह चलता गया। जब देखा, पैसा बहने लगा है, संभालने मुश्किल हो रहे हैं, तो उसने भुट्टो नामक एक विधायक खरीद लिया। सोचा प्रधानमंत्री, सांसद खरीद कर पांच साल राज्य कर सकता है। मुख्यमंत्री विधायकों को चाट डाल कर सरकार को पतंग की तरह लूट सकता है तो क्यों एक को खरीद कर राजा राजपूती अपना काम नहीं निकाल सकता। उसे सरकारी अंगरक्षक फोकट में रह गये। एमएलए अपनी जगह कमा गया। वह सोचता, मुझे परचून में नहीं बिकना पड़ा। थोक में काम बन गया। कुछ मूर्ख लोग मुफ्त में ही अपनी बदनामी करवा लेते हैं। विधायक की मोहर लगाने के पैसे लेने लग जाते हैं। अपने कोटे का माल ब्लैक में बेचने लग जाते हैं। एक बात में मैं भी मार खा गया। ससुर महोदय मंत्री हैं। जो काम उससे लेकर दूंगा, उसके पैसे निश्चित करने भूल गया।

राजा राजपूती ने घर छोड़ दिया। कालेज को हैड-क्वार्टर बना लिया। वह दूरदर्शी था। यदि कालेज में नहीं रहूंगा तो अधिकारी भी नहीं रह पायेगा। घर छोड़ने पर उसकी पत्नी मिंदरी अकेली रह जायेगी। कब्जा नहीं छोड़ना चाहिए। वह भले अकेली रह जाये। कौन-सा ब्याह करके लायी हुई है। अच्छा है, गले से उतरेगी। मिंदरी मुश्किल से पंद्रह-सोलह साल की थी, जब बंदूक की नोक पर उठा लाया था। 

भुट्टो भी अपना दफ्तर कालेज में ले गया। वह भी घर की कैद से निकलना चाहता था। सिक्कम का एक गोरखा चैकीदार था। उसके कई बेटियां थीं। सब एक दूसरी से सुंदर और कमसिन। बड़ी, के मूल नाम का किसी को पता नहीं था। सब उसे ‘पटोला‘ कहते थे। वह पटोले-सी, पतली पतंग, गुड़िया-सी लगती थी। वह किसी संपन्न घर में बच्चों को संभालने पर लगी हुई थी। कहीं वह राजपूती राज की नजर चढ़ गई। उसने तुरंत गोरखे को बुलाया और हुकम दिया, ‘गोरखा! यह उठा महीने का वेतन। कल से पटोला रोटी-पानी का काम संभालेगी। क्वार्टर बीच में ही था। वह घर गया। बेटी की मां से बात की। उसने इंकार कर दिया। हम मरदों के तबेले में जवान लड़की नहीं भेजेंगे। गोरखा मिली रकम, रात शराब पर उड़ेल चुका था। घर में कलह रहने लगा। राजपूती राजा को जब से अप्सरा दिखाई दी थी, उसे पाने की जल्दी में था। दो-चार दिन प्रतीक्षा की, पटोला न आयी। गोरखे को हुकम सुना दिया, ‘तेरी नौकरी कल से खत्म। क्वार्टर खाली कर दे।‘ 

गोरखा पंद्रह साल से वहां चैकीदारी करता आ रहा था। हुकम सुन कर कांप उठा। वह घर गया। पटोला को काम से बुलाया। पति-पत्नी दोनों बेटी की मिन्नत करने लगे। परिवार की रोटी-रोजी का सवाल था। बेटी न चाहते हुए भी आगे चल दी। दोनों ने जाकर पांव पकड़ लिए।

छोटी बड़ी सब बहनें लोगों के घर बर्तन-भांडे धोने को लगायी हुई थीं। ताकि बाप की शराब पूरी हो सके। राजा राजपूती गोपियों में कान्हा हो गया। वह जिंद को भूल चुका था। एम.एल.ए. भुट्टो भी तो उससे कम नहीं था। उसने दो बेकार नर्से अपने कालेज में पांच-सात सौ में लगा रखी थीं। उन्हें सरकारी नौकरी का भरोसा दिया हुआ था। चंडीगढ़ जाते रहते थे। कभी एक को, तो कभी दोनो को ही साथ ले जाता। उनके साथ रहने पर बड़े से बड़ा काम निकाल लेते थे। वे जानते थे, घी तो आग के सामने पिघलेगा ही।

उनके चंडीगढ़ जाने पर मां-बाप को क्या एतराज था। बल्कि खुशी हुई। वे समझते, पक्की नौकरी के लिए दौड़-धूप हो रही है। भुट्टो का एहसान मानते। दूर बैठे हुए क्या पता था कि चंडीगढ़ एय्याशनवाबों का शहर बन चुका है। हिरणी के बच्चों का चीते के ठिकाने पर क्या काम?

पांच-चार महीने मुश्किल से बीते होंगे, एक नर्स गर्भवती हो गई। भुट्टो परेशान हुआ। वही लेकर आया था। दोष उसी पर आ रहा था। राजपूती राजा को भी अपने भविष्य पर काला पोचा लगता दिखाई दिया। न जाने गरीब गाय पर क्या गुजरी। उसका शव भाखड़ा नहर से मिला। बेटी की हत्या के आरोप में पिता पकड़ लिया गया। पुलिस का दोष था, उसने बेटी को नहर में धकेला है। थानेदार पिता के प्रति हमदर्दी प्रकट करने लगा। ‘बापू! तुम भी भोले हो। बेटी को मारना ही था तो यह काम पहले करता। जन्मते ही गला दबा देता या जन्म से पहले, गर्भ में कत्ल करवा देता।‘ चार-पांच सौ का खर्च था। न पुलिस का भय, न समाज की बदनामी। सारी दुनिया समझदार हो गई। तुम्हें क्यों समझ नहीं आयी। अब हमारे लिए पंगा खड़ा कर दिया। बापू दस-पंद्रह दिन अंदर ही रहा। दुख झेलता। जब उसका दिमाग काम करने लगा, वह मूल दोषियों के नाम लेने भूल गया। पुलिस ने फौरन आत्महत्या का केस बनाकर फाइल बंद कर दी। बाबुल बेटी के लिए नौकरी खोजता, मृतक के कपड़े साथ लेकर घर लौट आया।

जब नर्स के कत्ल की खबर राजपूती को सुनाई, उसे अपनी चिंता घेरने लगी। तथाकथित पत्नी मिंदरी को फिक्र सताने लगा। यदि मुझे गर्भ ठहर जाता, मेरा अंत भी यही होता। ये मर्द जो औरत को लिंगपूर्ति के माध्यम से अधिक कुछ नहीं समझते, वे इसे अमृत में बताशे घोलने वाली अर्धांगिनी क्यों समझेंगे। इनके लिए तो मैं घिसी हुई पांव की जूती हूं। जब चाहें मुझे कचरे में फेंक दें।‘

उसने जान बचाने के लिए पिता को फोन किया। बाप सहारा तो क्या देता, उल्टा गुस्सा उगलने लगा। ‘जाते समय तूने कौन-सा मेरी पगड़ी की इज्जत बचायी थी। जैसे चुन्नी उठाकर गई थी, वैसे ही सब संबंधी जवाब दे गये। हरेक को जान प्यारी थी। राजपूती राजा से पंगा लेने को कोई तैयार नहीं था।

जन्मेजय उस इलाके में सत्यवादी हरिशचंद्र कहलाता था। गाय, गरीब की बांह पकड़ने वाला। गरीब मां-बाप की बेटियों का कन्यादान करने वाला, वह सतयुगी इंसान था। मिंदरी ने साइकिल उठाया और मुंह अंधेरे जन्मेजय के घर पहुंच गई। उसने पूरी कहानी सुनाई। जन्मेजय ने सिर पर प्यार भरा हाथ टिकाकर दिलासा दिया और उसे पत्नी के हवाले कर दिया। वही बात हुई, मानों राजपूती राजा का युद्ध के लिए छोड़ा घोड़ा जन्मेजय ने पकड़ लिया हो। इस पर राजपूती को बहुत क्रोध आया। मौके पर भुट्टो एम.एल.ए. का भी कुछ बाकी नहीं रहा।

पटोला गर्भ धारण कर चुकी थी। उसकी राम कहानी भी जन्मेजय तक पहुंच चुकी थी। उसके बाप ने अपना मान तान रखकर, उसे एक वृद्ध के गले मढ़ दिया। वृद्ध गोरखा का हमप्याला, हमनिवाला था। जो कमाता, शराब में उड़ा देता। साल बाद बच्चों की जोड़ी बना दी। पति की कमाई से घर कैसे चलता। आखिर मां, बच्चों को आधा नंगा, भूखा, कहां तक रख सकती थी?, उसने अलग धंधा चला लिया।

नर्स के कत्ल से बचने के लिए भुट्टो और राजपूती पंजाब छोड़कर चंडीगढ़ में रहने लगे। जन्मेजय का हौंसला बुलंद हो गया। कहा है, शत्रु को कभी कमजोर न समझो। सांप की जब तक सिरी नहीं कुचली जाती, वह कभी भी खतरा बन सकता है।

एक दिन सवेरे जन्मेजय अखबार पढ़ रहा था। उसे पैरों की दगड़-दगड़ सुनाई दी। सिर उठा कर देखा, सामने स्कूल के बच्चे भागते, उसकी ओर आ रहे थे। देखकर हतभ्रम हो गया। हैं ! सब ठीक तो है! ये क्यों सांस फुलाए इधर आ रहे हैं। बंटी कहीं दिख नहीं रहा।‘

‘अंकल, अपना बंटी ट्रक के नीचे आ गया।‘ जन्मेजय ने आधी बात सुनी। उठकर वह स्कूल की तरफ दौड़ पड़ा। सड़क चढ़ गया। सामने देखा, सड़क की बायीं तरफ खून का छप्पर लगा हुआ था। बीच में बंटी चिपटा पड़ा था। पास ही बस्ता और पिसा हुआ साइकिल था। बच्चों से ट्रक के नंबर आदि की पूरी जानकारी मिल गई। ‘ओह‘ ! वही हुआ जिसका डर था। साले कायर ! मासूम बच्चे पर दुश्मनी निकाल गये। मर्द था तो मेरे साथ दो-दो हाथ करता। शायद इसी कारण छिपे हुए थे।‘

भुट्टो की बदनामी इतनी हो गई कि आगे उसकी जीत जरूरी नहीं थी। बैठे हुए ही उसने राजपूती को कहा, राजा! हम भी पागल हैं। मासूम की हत्या नहीं करनी चाहिए थी। लोग इतने नादान नहीं कि समझेंगे नहीं। जनता की सहानुभूति जन्मेजय के साथ होगी। वह पूरे इलाके का नायक बन गया। उसकी सीट पक्की है। हमें कोई वोट नहीं देगा। उसका काम है। शोहरत कमा बैठा है। हो सकता है आने वाली सरकार में मंत्री बन जाये। लगता है हमारी मूर्खता ने, उसकी झंडी वाली कार पक्की कर दी है। चुनाव हो लेने दो। वह गिन-गिन कर बदले लूंगा।

राजा राजपूती अभिमान में था। बच्चे का कत्ल करके भी वह तनिक अफसोस नहीं कर पाया। भुट्टो से गुस्से में बोला,-‘मूर्ख मैं नहीं, तुम हो। अपनी सरकार में रहते भयभीत हो। नर्स के केस में कोई हमें कुछ कह सका? उल्टा केस पिता पर डलवा दिया। यह मेरी ही करामात थीं।‘ 

‘तुम्हारी करामात की बात पुरानी हो गयी। लोगों ने बेटे की हत्या के वास्ते हमें पकड़वाने का सत्याग्रह शुरू कर लिया?

‘जन्मेजय ने मिंदरी को पनाह देकर मुझे चुनौती दी है। मुझे बदला लेना है। अच्छा भला बस रहा था, बेटा मरवा लिया। उम्रभर बेटे का दुःख नहीं भूलेगा। एक काम और रह गया। अपने ससुर से पूछ, उसे अंगरक्षक किसलिए दिए हैं। वापिस ले लें। इसके जितने लाइसेंस है, रद्द कर दें। राजपूतिया राजा भुट्टो की सरकार को भी पड़ गया।

-शेर, शिकारी और गीदड़, कलोलें कर रहे हैं। हमारे, सिर पर दो-तिहाई सीटें ले गए। कुर्बानी ‘सिहों‘ की, और सरकार तुम बना गये। बारह में से ग्यारह एम.पी. बना लिए। अब हमें भूल गये। मेरी तरफ से मुख्यमंत्री को कहना-‘अपने पराये की पहचान रखे।‘

लोगों के संघर्ष को एक महीना बीत गया। सरकार के सिर पर जूं नहीं रेंग पायी। कातिलों को तो क्या पकड़ना था। उल्टा जन्मेजय को सूली चढ़ाया हुआ था। अंगरक्षक वापस ले लिए। लायसेंस रद्द कर दिये और हथियार जमा करवा लिए।

जन्मेजय गवर्नर के पास जा पहुंचा। अपनी जान के खतरे की फरियाद की। लेकिन वह क्या कर सकता था? गवर्नर तो मात्र पतीले का ढक्कन था।

उसे आराम से बैठने की चैन कहां? वह प्रधानमंत्री को मिला, लेकिन किसी ने उसकी बांह नहीं पकड़ी। पकड़ता भी कौन? ‘लोकराज जो था।‘

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