मुखाग्नि


रेनू यादव, नोएडा, मो. 9810703368


धुरियाये, मटियाये, कचड़ियाये, शीतियाये हजारों पैरों के बीच राधिका मुँह के बल पट्ट गिरी पड़ी है, उसके मुँह से साँय-साँय और खरखराती नाक से निकलती हवा शीतियाये धूर पर पड़ते ही धूर फुर-फुर करके वहीं बैठ जा रही हैं जैसे कि आज वो किसी भी हाल में राधिका के साथ ही रहना चाहती हों और उसके अंतर्मन की व्यथा को खुद में सोख लेना चाहते हों। सूखे आँसू, लार चूते मुँह पर अंचरा गोलियाये उसकी सास उतान खटिया पर गिरी हैं। चारों ननदें अस्त व्यस्त बेसुध होकर जमीन से सट गयी हैं। राधिका की बड़ी बेटी रिंकू जो पाँच साल की है वह थोड़ा-थोड़ा कुछ समझ रही है कि कुछ हुआ है इसीलिए इतने लोग आज घर आये हुए हैं, लेकिन यह नहीं समझ पा रही कि किसी को आज पलेट में बिस्कुट और लोटा में पानी क्यों नहीं दिया जा रहा ? लोग इतना चिल्ला-चिल्ला कर रो क्यों रहे हैं ? लोग पापा का नाम क्यों ले रहे हैं ? दो साल की छोटी बेटी पिंकू कभी माँ की सूखी आँखें पोछ रही है तो कभी उसे उठाने के लिए खींच रही है, कभी उड़ती धूर को देखकर खिलखिला पड़ रही है तो कभी लोगों का चीखना चिल्लाना देखकर खुद भी चिखने चिल्लाने लग रही है। भूख से तड़प रही है पर किसी को उसकी सुध नहीं। उन्हें देखकर गाँव की औरतें छाती पीट-पीट कर चिल्ला रही हैं तो आदमी भी भोकार छोड़कर रो रहे हैं। 

 इन सबके बीच साधना राधिका को देखकर और भी हताश हो गयी और इस बात से भी डरी बैठी है कि कहीं राधिका और बिहर न जाये या पिछले दिन जो हुआ उससे और बिफर न जाये... आखिर उसे दिलासा भी दे तो कैसे... किस बात की। इस समय उसे सब दिलासा देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन झूठी। साधना तो इस बात से भी डरी है कि थोड़ी देर पहले जब दोनों की नजरें आपस में टकरायीं थीं तब राधिका की प्रश्नवाचक सूनी नजरों से साधना सकपका-सी गयी, कोई तो ऐसी तीर थी जो सीधे उसके दिल को चीर गयी और खून भी नहीं निकला। यह बात सिर्फ साधना ही समझ पायी और अथाह वेदना से भर गयी। हालांकि इस घटना में इसकी कोई गलती नहीं है और न ही इसका हाथ... बावजूद इसके, न जाने क्यों वह अपराध बोध से भरी हुई है और ठकमुड़ी मारे बैठी है। वह हाथ बढ़ाकर राधिका को छूना चाहती है लेकिन उसके हाथ वहाँ तक पहुँच नहीं पा रहे। उसे डर है कि कहीं राधिका पूछ न बैठे कि तुहार पति कैसे... और हमार पति... ?

 राधिका और साधना के पति मनोज और अशोक दोनों गौरी बाजार के थे- लंगोटिया यार। मनोज का घर रामपुर चैराहे पर ही था जिसमें चैराहे की ओर किरानी की दुकान खुली थी और दुकान के पीछे रहने के लिए दो कमरे और एक दालान का घर था। अशोक का घर चैराहे से थोड़ा अंदर था, जो मनोज के घर से सटी गली सीधे अशोक के घर के पीछे खलिहान से मिलती हुई खेत के चकरोट तक जाती थी। जिससे होकर चैराहे के लोग रोज सुबह का नित्य कर्म करने अशोक का घर पार करके ही जाया करते थे। ये गली सिर्फ गली नहीं थी बल्कि मनोज और अशोक के दिलों की गली थी। दोनों साथ साथ पढ़ाई करके साथ-साथ सी.आर.पी.एफ. में भर्ती हुए, बटालियन भी एक और पोस्टिंग भी साथ-साथ। दोस्ती ऐसी कि मनोज की शादी ठीक होते ही अशोक के पेट में खलबली मच गयी। खलबलाहट बौखलाहट में तब बदल गयी जब मनोज अपनी गोल्डेन नाइट की कहानी सुनाने लगा, “राधिका, सचमुच राधारानी से कम सुन्दर नहीं है, बिल्कुल रामानंद सागर के ‘श्रीकृष्णा’ वाली राधारानी। मेरे तो सारे सपने पूरे हो गये। मैंने जैसा चाहा था वैसा ही पाया” 

“वो कैसे” ?

“बिल्कुल कली कचनार... जैसे ही घुँघट उठाकर मैंने उसकी टोढ़ी ऊपर उठायी, अंधेरे में वो सूरजमुखी के फूल की तरह सिकुड़ गयी। हल्के हवा के झोके से फूल की टहनियाँ थराथरा उठीं, दूर जलती दिए की टिमटिमाती लौ में वह पूरी तरह से पसीज गयी। सच बताऊँ तो वह टिमटिमाती लौ चारों तरफ बिजली बनकर दौड़ गयी”। 

यह सुनकर अशोक के शरीर में झुरझुरी उठ गयी, उसका मन किया कि कहे ‘यार, क्यों जला रहे हो’ ? लेकिन चटकारे लेता मन ‘सुनाओ और सुनाओ... रूको मत...’ की जिद्द कर बैठा।

“उस बिजली से आँख, कान, पेट सब झुलसने लगें, मैंने देखा कि वह भी मेरे जितना ही झुलस रही थी। मेरा मन कर रहा था कि कब उसको कलेजे में समा लूँ। लेकिन पहली ही रात में जल्दबाजी करना अच्छा नहीं लगा, वह भी तब जब वह पूरी तरह से आग में झुलसने के बावजूद भी अपनी गरम गरम साँसों को छुपाने की कोशिश कर रही हो। मैंने उसकी घबराहट समझकर उससे कहा कि लगता है तुम थक गयी हो, आराम कर लो। इतना कहते ही वह किसी घायल शेरनी की तरह मुझपर झपट पड़ी और तब तक घाव करती रही जब कि मैं लहू लुहान होकर पस्त न हो जाऊँ”।

अशोक की सन्न सन्न करती शरीर सकपका गयी, ““क्या उसने तुम्हे मारा” ?

“साला (हँसते हुए) हा...हा... हा... निरे बेवकूफ हो तुम, कुछ नहीं समझते। बहुत प्यारी है वह, प्यार करना जानती है। इस बात का प्रमाण तब मिला जब उसने आँसू भरे आँखों से मुझे सुबह होते ही कहा कि मुझे आज तक किसी ने इस तरह से नहीं छुआ था। मैं आपको पा कर धन्य हो गयी। माँ के गुजर जाने के बाद मैं प्यार के लिए बहुत तरसी हूँ। मुझे हमेशा ऐसे ही प्यार करते रहना”।

अशोक की देह सनसना उठी, बिजली कौंध गयी, वह भी बादल बनकर बरसने को तैयार हो गया लेकिन हवाओं ने साथ छोड़ दिया क्योंकि उसके लिए उस समय कोई कली कचनार न थी। उसने भी घर में शादी का ऐलान कर दिया। यह सौभाग्य ही था कि मनोज के ब्याह में सहबाला बने अशोक से ब्याह के लिए साधना के घरवाले हाथ-पाँव मारने लगें थे और उसी समय वरदेखुआ बन कर फिर से आ धमके। और एक महिने के अंदर... आव देख न ताव... राधिका की नेवचा-नेवान सखी साधना दुल्हन बनकर फड़फड़ायी, बिजली कड़की, बादल बरस गयें। 

उसके बाद दोनों अपने नाम से नहीं बल्कि फौजियाने लहजे में राधिका और साधना के नाम से जाने जाने लगें। आखिर अपनी-अपनी पारिवारिक कमी को इन हँसी-मजाक के माध्यम से महसूसने और भरपायी कर लेने का यही तो एक साधन होता है।

राधिका और साधना सुन्दरता और गुण-ढंग में एक ही खपड़ा के नहवावल हैं। कौनों एक-दूसरे से कम नाहीं। सब यही कहतें कि दोनों ने बीछ-बीछ (चुन-चुन) कर बियाह किया है। बस पढाई-लिखाई में उन्नीस-बीस हैं पर उन्नीस वाली ज्यादा पंडिताइन है। राधिका आठवीं पास और साधना दसवीं। चिट्ठी पतरी लिखने में दोनों खूब माहिर हैं। दोनों की होड लग जाती है कि किसको कितनी शायरी याद है और कितना लिख पायी हैं। शर्त यह थी कि शायरी में कभी दुहराव नहीं होने चाहिए और दोनों एक ही शायरी अपने-अपने पति को नहीं लिखेंगी। कभी लाल रंग से बड़े अक्षरों में दिल लिखना तो कभी हाथ काट कर दिल बनाकर तीर से चीर देना, कभी रूमाल पर प्स्न् लिखना तो कभी भर-भर कर फूल-पत्ती के साथ शायरी को सजाना। 

“सोना दिया सुनार को पायल बना दिया। 

दिल दिया दिलदार को घायल बना दिया”।।

“लिखा है खत खून से स्याही मत समझना।

करती हूँ प्यार आपसे बेवफाई मत समझना”।। 

खाना पकाकर रात सात-आठ बजे जब राधिका गली से निकलती तो अपने घर से साधना ताक लगाये रहती कि कब वह आयेगी और कब हम अपनी शेर-ओ-शायरी उसे सुनायेंगे। रात की आधी-अधूरी बातें भिनसारे जब चार बजे भी पूरी नहीं हो पातीं तब फिर से रात होने तक पेट में खलबली मचाये रहती।   

नइहर से तो दोनों पक्की सहेली थी हीं, यहाँ भी दुखड़ा लगभग एक ही जैसा रहा। भला क्यों न मिल जाये आत्मा की थाह। 

“चार महिने बीत गये, मन बहुत घबराने लगा है... पता नाहीं कब आयेंगे” राधिका उदास हो कर कहने लगी। 

“का करोगी, भगवान एक ही कलम से हम दोनों की किस्मत लिखे हैं। जब ज्यादा दिन हो जाता है तब सोच-सोच के दिल-हऊल हो जाता है। ऐसा लगता है कौनों हमार कलेजा निकाल के पानी में डालके चूल्हे पर खदका रहा है” साधना की बेचैनी बोल उठी। 

“सही कह रही हो... हमके त बाबूजी पर बहुत गुस्सा है कि काहें किए फौजी से बियाह... इससे अच्छा तो एक बेरोजगार से बियाह कर दिए होते... कम से कम साथ में तो रहतें”

“एइसन मत कहो... ऊ लोग दिन रात कड़ी मेहतन से हम सबको सुरक्षा देते हैं तभी तो हम लोग यहाँ आराम से बतिया पा रहे हैं... हमी लोग ऐसा कहेंगें तो उनका तो दिल टूट जायेगा”। 

“हम सब समझते हैं लेकिन जब देह में आग बरने लगती है तब सब भूल जाता है। आँखों के आगे अन्हार हो जाता है, कान में सिर्फ एक ही धुन चलता है, देह ऐंठने लगती है, मन भारी भारी हो जाता है। रात में रो-रोकर नींद खराब और दिन में काम करने में मन नाहीं लगता, नतीजा सबकी डाँट-फटकार। भरी जवानी में ही हम अपना मन मारके रहते हैं। ये बात तो किसी से कह भी नाहीं सकतें। सबको तो सेवा-पानी से मतलब है, एक अच्छी संस्कारी बहू से, लेकिन केहू के हमरे इच्छा से कौनों मतलब नाहीं है”। 

“इ तो सही कह रही हो... मन मसोस कर जीना ही हमारी किस्मत है...”

“तुहार किस्मत तो फिर भी हमसे अच्छी है। कम से कम एकाध बार अपने दुलहा के साथ सहर तो देख आयी...। हमरे किस्मत में तो उ हो सुख नाहीं है। और तो और जब उ घर आते हैं तो उनकी अम्मा दुआरी पर खटिया डार के सो जाती हैं और उनको भी अपने पास बुला के सुता लेतीं हैं। ऐसा लगता है कि वे फिर से अपने पेट में डार लेंगी। उ बाहर हम अंदर... तड़प तड़प के जान निकल जाती है। जैसे उनसे हमें कौनों मोह माया है ही नाहीं”।

“कैंटिन से जवन भी सामान लाते हैं उ सब सबसे पहले अम्मा जी के हाथ में जाता है, उ अपने बेटिन के खातीर रख लेती हैं बाकी बचा-खुचा दुकान में रख दिया जाता है। हर महिने पइसा उनहीं लोगों के हाथ में जाता है। केहू हमार जरूरत नाहीं समझता। हम उन लोगन से भीख माँग माँग काम चलाते हैं”।

“तो का आने के बाद भी तुहके पैसे नाहीं देते” ?

“जब आते हैं तब सबसे चोरी छुपे एकाध हजार हाथ में थमा जाते हैं, उसी से हम नईहर सासूर के सब रिस्तेदारी निभाते हैं”

भीगी आँखें पोछते हुए साधना बोली, “तुम्हारे पास तो पइसा भी होता है, हमारे हाथ में सबकर सेवा-पानी के अलावा कुछ नाहीं होता । घर का खर्च चलाते चलाते पइसा ही नाहीं बचता कि ऊ हमें कुछ दे सकें। हम भी आपन परेशानी उनसे नाहीं कहते कि ऊ दिन रात ड्यूटी में खटते हैं ऊपर से हम कुछ कहेंगे तो ऊ अउर परेशान हो जायेंगे। दो बार जरूर हम उनके साथ सहर गए लेकिन हम का बताएँ घर वाले पइसा के लिए एतना नोचने लगें कि ऊ हार मानकर हमें वापस छोड़ गए। एक आदमी कमवइया पूरा घर खवइया। खेती-बारी सब से खाओ ऊपर से उनकी तनखाह भी...। (थोड़ा धैर्य धरते हुए) लेकिन सच बताये सखी... ऊ दिन हमरे खातीर सरग से कम नाहीं था”।  

“तो तुम चली काहें आयी... नाहीं भेजने देती घर में पइसा” 

“पहली बार त उनकी दिल्ली में तैनाती थी, तो उनको आर.के.पूरम. में सरकारी क्वार्टर मिला था। एक ही कमरा था, उसके सामने ही किचन और किचन से बाहर निकलने का दरवाजा था और थोड़ी दूर पर बाथरूम और लैट्रिन। सब घर एक दूसरे से सटे-सटे थे। हमें तो यहाँ खुला खुला लगता है लेकिन वहाँ बड़ी घुटन होती थी। दिन भर ऊ बाहर रहते थे हम घर में। जी तड़फड़ा उठता था। खाना बना बनाकर रोती थी खाने को मन नाहीं करता था। जब ऊ आते थे तभी खाना घोटाता था। हमारी हालत देखकर ऊ घर पहुँचा गयें”।

“त का सबके घर में एक ही कमरा होता है” ? आश्चर्य से राधिका पूछ बैठी

“सिपाही लोगों को एक ही कमरे का घर मिलता है और अफसरों को दो-दो तीन-तीन कमरे का बड़ा मकान”।

“तुम देखी थी”?

“हाँ एक बार बुआ जी की भतीजी कविता बुलायी थीं, उनके पति बड़े अफसर हैं। उनके घर में सिपाही खूब काम कर रहे थे, कौनो खाना बना रहा था, कौनो उनके बच्चे को स्कूल छोड़ने गया था, और तो और कविता के पति का ट्रांसफर कहीं और हो गया था तो सिपाही ही सब सामान गाड़ी में लाद रहे थे। हमको तो बड़ी हैरानी हुई। घर आकर हमने इनसे पूछा कि आप भी अफसरों के घर में नौकर की तरह काम करते हैं ? तब इन्होंने बताया कि नाहीं इसीलिए तो खतरे वाली जगहों पर इनकी तैनाती हो जाती है”।

“इ सब भी होता है का ? हम भी इनसे पूछेंगे” 

“होता सब है, पर कहता कोई नाहीं है। सरकार के आँखों में धूर झोंककर अफसरगिरी झाड़ दी जाती हैं। बेचारे सिपाही शिकायत करेंगे तो फँस जायेंगे इसीलिए जबान पर ताला मारकर सारा काम कर जाते हैं। कुछ इच्छा से तो कुछ मजबूरी में”।

“इच्छा से कौन केहू के घर में नौकर बनना चाहेगा ! मजबूरी ही होती होगी...” 

“पेट और परिवार के खातीर बड़े बड़े लोग घुटनियाँ जाते हैं सखी। अफसरों की चमचागिरी करने से जल्दी से छुट्टी मिल जाती है, घर मिल जाता है, खतरे वाली जगहों पर तैनाती होने से बच जाती है”।

“त तुम लौट काहें आयी”

“खाये पिए बिना बीमार पड़ गयी, हमें तनिकों अच्छा ही नाहीं लगता था वहाँ। केहू किसी से बात ही नाहीं करता था। अकेले रहते रहते लगता था कि हम पागल हो जायेंगे। एकाध औरत थीं आस-पास की तो उ सब अपने काम से काम रखती थीं। एक तो खर्चा चलाना मुश्किल दूसरे हमार हालत... इ सब देखकर उ पहुँचा दिए घर। यहाँ भी उनके बिना अच्छा तो लगता नाहीं, इसलिए फिर से जाने के लिए कमर कसी। लेकिन दूसरी बार पेट से रह गयी। पइसा न कौड़ी। घर ला कर पटक दिए। कहने लगें कि एक सिपाही क ऐतना सैलरी नाहीं होती कि सहर में लेकर पालेंगे पोसेंगे। बच्चा छोटा है तो काम चल जायेगा लेकिन बड़े होने पर मुश्किल हो जायेगी। अच्छे स्कूल बहुत मँहगे हैं, पढ़ा लिखा नाहीं पायेंगे”।

“इ बात तो रिंकू के पापा भी करते हैं। न साथ न पइसा न प्यार... आखिर कवने बात के खातीर बियाह ? और तुम कहती हो कि हम बुरा भला न कहें” आवाज उँची हो आयी राधिका की।

“तो का करें... माँ बाप को तो कमासुत लइका चाहिए सो मिल गया... सरकारी नौकरी के नाम पर बियाह तो कर दिया जाता है लेकिन कौन समझता है कि पन्द्रह दिन या महिने भर की छुट्टी काटने के बाद जो हमारा हाल होता है, उ कवनो छोड़ी हुई औरत या राँड का भी नाहीं होता ? जब पति नहीं होता है तब मन को समझाया जा सकता है लेकिन होते हुए भी जब दूर हो और ढाँढ़स बढ़ा बढ़ा कर टूट जाये तब जो हाल होता है उ कवनों मरन से कम नाहीं होता। सबके खातीर भरा पूरा परिवार है, कवनो कमी नाहीं लगती लेकिन हमारे अंदर की कमी हमको तोड़कर रख देती है ? सबसे बुरा तब लगता है जब ऊ छुट्टी आने के लिए दिन बता देते हैं और छुट्टी कैंसिल हो जाती है... तब तो लगता है कि हम अपनी जान ही दे दें। अगर आ भी जाये तो मिलने में बड़ी झिझक होती है, अपनी बेताबी बता भी नहीं सकते और जब बताने का समय होता है, झिझक टूटने लगती है तब तक उनके जाने का समय हो जाता है। मन को समझा समझा कर थक गये हैं”।  

“सच कह रही हो, हम तो हम... हमारे बच्चे भी नाहीं पहचानते कि ये हमरे पापा है”।

हँसते हुए “ हा..हा.. हा... ये तो सही कह रही हो कि एक बार तो उ घर आयें, और रात में बिस्तर पर सो गयें। अचानक रिंकू की आँख खुल गयी, डर कर लगी चिल्लाने। सबको पता चल गया कि उ आज बिस्तरे पर हैं”।

“हा...हा...हा... (हँसते हुए) बहुत अजब गजब कहानी है। एक बार तो ठंड में ऊ बिस्तर में आ घुसे। देह में आग लग गयी। जैसे जैसे साँसें तेज होतीं वैसे ही कोमल कुनमुनाते लगती... हम डर के मारे साँस रोक लेतें। एक ही कमरा... कहीं और जा भी नाहीं सकतें। बेचारे को गुस्सा आ गया, पैर पटक कर बाहर जाकर सो गयें कि बच्चे भी अपने दुश्मन हैं”।

दोनों मिलकर हँसने लगीं। 

दोनों खट्टी-मीठी यादों को कह-सुनकर हँस भी लेतीं रो भी लेतीं। घर में भी आधी छोड़ी हुई औरत से अधिक इज्जत नहीं होती, जो भी इज्जत मिलती पैसे आने पर थोड़ी बढ़ जाती, पैसे देर से आने पर थोड़ी और कम हो जाती। पति के ड्यूटी पर जाने के बाद लोगों की खुंखार नजरों से बच पाना आसान नहीं होता। बगुला, गिद्ध, चील, सियार, लोमड़ी हर तरह की नजरें होती हैं। राधिका की सुन्दरता ही उसकी दुश्मन हुआ करती। रिंकू के जन्म के बाद देवर सुरेश ने यहाँ तक कह दिया कि “मनोज भईया तो यहाँ रहते नहीं, फिर बच्चा किसका है” ? राधिका जल उठी और चार बातें सुना भी दी “हमारे ही पति की कमाई खाकर हमें ही गरियाते हो... जिस दिन पईसा देना छोड़ देंगे उस दिन भीख माँगने लगोगे तुम लोग... नौकरी के बाद घर उह बनवाये हैं कहकर घर छिनवा लुँगी। देखते हैं कवने बल पर नाचते हो तुम लोग। आने दो उनको जबान खींचवा न लूँ तो राधिका नाम नाहीं”।  

उस दिन राधिका की सास ने अपने बेटे सुरेश का पक्ष लिया, “तुहार मरद होने से पहिले हमार बेटा है। हमार बात मानेगा। आने के बाद मउगा घरे में घुसा रहता है वोही का नतीजा है कि येकर मन बढ़ गया है। आने दो इस बार कह कर इसकी सारी गरमी झड़वाती हूँ, कह देती हूँ नइहरे छोड़ आये। हमरे सोना जइसे लइका को गरिया रही है”।

“जो अपने भौजाई का इज्जत करना नाहीं जानता, ऊ सोना नाहीं हो सकता। सोना नाहीं कोईला है कोईला”। उस दिन खेत में राधिका साधना के कंधे पर सर रखके खूब अहक अहक कर रोयी थी।

देवर होने के नाते चिढ़ा भी देता है कि ‘भौजाई अकेले रहती हो, भईया की याद सताती ही होगी... भईया ने देखभाल की जिम्मेदारी हमें ही सौपीं हैं... बता देना जब जरूरत हो...’। 

राधिका हँसी हँसी में जवाब दे ही देती, “लहूरा देवरूआ... काहें इतनी बेचैनी है ? आप उनके लतवा के झरनवो भी नाहीं हो...” 

राधिका ये तो जान चुकी थी कि सुरेश उसे छुप छुप कर घूरता है, लेकिन ये नहीं जानती थी कि वह घात लगाये बैठा है। एक बार खूब ओस पड़ रही थी, दो डेग के बाद कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। रिंकू के जन्म के तीन साल बाद वह दूबारा पेट से थी और पेट इतना खराब रहता कि वह घर से खेत और खेत से घर की आवाजाही में ही पूरा समय लगा देती। हालांकि बैद्य बाबा दवाई की पुड़िया भी दिये थे पर कवनो फायदा नाहीं हो रहा था। राधिका सर पर गोबर भरी खाची उठाई और लड़खड़ाते पैर से आगे बढ़ गयी उसी समय सुरेश धीरे धीरे दबे कदमों से उसके पीछे बढ़ता जा रहा था। राधिका ने आहट सुनकर मुड़ कर एक-दो बार पीछे देखने की कोशिश की पर कुछ दिखायी नहीं दिया, उसे लगा कि इस समय पेड़-पत्तों से वैसे ही पानी टपकता रहता है, हो सकता है कि कुछ खड़खड़ा रहा हो और अगर कोई है भी तो इसे क्या करना। राधिका गोबर फेंककर जैसे ही उँखीयाड़ी की ओर बढ़ी कि अचानक से सुरेश उसे उँखीयाड़ी में धक्का देकर उसका मुँह पकड़कर उसके ऊपर चढ़ गया। वह गिरयी मछरी की तरह छटपटाने लगी, उसने सुरेश के कंधे को ऊपर की ओर धक्का देने का पूरा प्रयास किया लेकिन शारीरिक कमजोरी उसे मात दे देती फिर भी वह हिम्मत नहीं हारी। उसका पेट बहकर साया में पसर गया। उसने थोडा सा अपने शरीर को ढ़ीला किया जिससे सुरेश को लगा कि वह थक चुकी है वह अपना पैंट जैसे ही खोलने लगा मौके का फायदा उठा राधिका ने लेटे लेटे ऊँख खींच कर तोड़ लिया और उसी ऊँख से खूब बजाया, “फौजी की मेहरारू हूँ... एतना कमजोर समझते हो... काठ हो गयी हूँ काठ... लगा हाथ सारे... ऊँख की तरह तुहार हाथ तोड़कर तुहरे हाथ में नहीं रख दिया तो हमार नाम बदल देना। अपने भाई को धोखा देता है.. उन्हीं के टुकड़ों पर पलकर उनही के पतरी में छेद करता है... तू आने दे उनको, फिर देख तेरा हगनी मूतनी कैसे रोकवाती हूँ..”। पीछे से खदरा खदरा कर उसे खूब लतियाती रही। लथपथ साया से बहुत दूर तक तो नहीं जा पायी, लेकिन घर लौटकर सबको हक्का बक्का कर दिया। घर की बातें घर में ही रहे सब लोग मान मनुहार करने लगें। थोड़े दिन तक खूब खातीरदारी की गयी कि मनोज को कहीं कुछ बता न दे। कमजोरी दूर करने के लिए बलाक पर ले जाकर बोतल चढ़वाया गया, बैठे बैठे दरी पर ही चाय पानी पहुँचाया जाने लगा। सुरेश ममहर चला गया। राधिका ने बेटी पिंकू को जन्म दिया।  

राधिका जानती थी कि अगर वह कुछ कहेगी तो लोग इसे ही गलत समझेंगे। फोन पर मनोज से कुछ भी कहना ठीक नहीं था इसीलिए वह उसके आने का इंतजार करती रही। लेकिन उसे नहीं पता था कि सुरेश ने उससे पहले मनोज के कान भर दिये हैं। मनोज के आने पर वह खूब लिपट लिपट कर रोयी। मनोज को समझ नहीं आ रहा था कि क्या सच है ?

“फौज में नौकरी पन्द्रह साल की होत है, आप रिटायरी लेकर घर आ जाओ... घर पर नून-रोटी खा कर जी लेंगे” रोते रोते राधिका ने कहा।

“कहाँ पगली... सी.आर.पी.एफ. में बीस साल के बाद रिटायरी मिलती है। और नमक रोटी का इन्तजाम कहाँ से होगा... ? पेंशन तो मिलेगी नहीं।

“काहें नाहीं मिलेगा ? हमारे चाचा को तो मिलता है”

“2004 के बाद भर्ती हुए फौजियों की पेंशन बंद करवा दी गयी है... जिन सरकारी लोगों का ये फैसला है वे खुद जिन्दगी भर पेंशन पर जी रहे हैं। लेकिन वे लोग खुद इस बात को नहीं समझतें”।

“लेकिन समाचार में दिखा रहा था कि पेंशन फिर बहाल होगी... प्रधानमंत्री वन रैंक वन पेंशन की बात कह रहे थे... हमें तो कुछ समझ में नाहीं आया, बस इतना समझ में आया कि पेंशन मिलेगी”

(हँसते हुए) “वह आर्मी के लिए है, हम लोगों के लिए नहीं। और तुम कह रही हो कि हम नौकरी छोड़ दें...। नौकरी करते हुए भी बड़ी मुश्किल से गुजारा हो पा रहा है। बहुत दुःख होता है कि हम अपने बच्चों का एड़मिशन किसी अच्छे बड़े स्कूल में नहीं करवा सकते। अच्छी सुविधाएँ भी नहीं दे सकतें। तुम्हें अपने साथ नहीं रख सकतें। फिर जब नौकरी छोड़ दूँगा तब क्या होगा ? 

“मेहनत मजूरी करके कैसे भी जी-खा लेंगे। लेकिन अब अकेले नाहीं रहा जाता। आप नाहीं जानतें कि हमरे साथ...”

“जानता हूँ मुझे सुरेश ने सब बता दिया है”

“बता दिया... ! क्या बता दिया” !!

“ये ही कि पास के गाँव का कोई आदमी तुम्हारे साथ छेड़खानी किया था”

“पास के गाँव का” !!

“कौन था वो”

“काहें... उसने नहीं बताया कि कौन था वो” ! गुस्से से तमतमा उठी राधिका

“हाँ वो कह रहा था कि काफी ओस थी इसलिए पहचान में नहीं आया और वह ओस का फायदा उठाकर भाग गया...। (राधिका के चेहरे को अपने हाथों में थामते हुए) तुम भी थोड़ा बचकर निकला करो, अकेले मत जाया करो। अगर मेरे सुन्दर बीवी को कोई उड़ा ले गया तो...” चुटकी लेते हुए मनोज ने कहा।

“मुझे सीख दे रहे हो... अपने भाई को नहीं ! उसने नहीं बताया कि वो कैसे ताड़ता है, क्या किया है उसने” ? राधिका की आवाज ऊँची हो गयी

“धीरे बोलो, कोई सुन लेगा। तुम सुरेश को लपेटे में क्यों ले रही हो ? उसने तो तुम्हारी हिफाजत की है...”

“उसने हिफाजत की है !! झूठ बोल रहा है वो... कोई और नाहीं, उसी ने...” 

बात काटते हुए मनोज बोल पड़ा “चुप रहो... वो ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता। तुम्हें गुस्सा आ रहा है जानता हूँ...लेकिन मेरे भाई के खिलाफ एक शब्द मत बोलो”

“अपने भाई पर भरोसा है... और हम पर” ?

“खुद से भी ज्यादा” 

“नाहीं है भरोसा हम पर... इसीलिए हमार बात नाहीं सुन रहें... हम सच कह रहे हैं तुम्हारा भाई ही मुझे” 

मनोज फिर से बात काटते हुए राधिका को बाँहों में भर लिया “एक शब्द नहीं... अब नहीं... चुप हो जाओ... मेरे सीने से लग जाओ... चुप रहो”

“हमें बताना है...सब कुछ बताना है”

“परेशान मत हो... बच्चे उठ जायेंगे... शांत हो जाओ... शांत...”

शांत शांत कहते हुए राधिका की बात उसने कभी नहीं सुनी। इस बार दिसम्बर में मनोज जब छुट्टी आया तब उसने राधिका से वादा किया कि अभी तो श्रीनगर में तैनाती है, जब वहाँ से कहीं अच्छी जगह तैनाती होगी तब राधिका और बच्चों को एक बार वह जरूर सहर ले चलेगा। तब तक वह घर वालों की मन से सेवा करके उन्हें इतना खुश कर दे कि लोग इनके शहर जाने से इन्कार ही न कर सकें। राधिका के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। वह दिन रात इसी उधेड़बुन में रहती कि शहर कैसा दिखता होगा। टी.वी. में तो खूब देखा है लेकिन हकीकत कैसा होगा। क्या पहनेगी क्या ओढ़ेगी... घर कैसा होगा... और सबसे बड़ी बात जब घर में दोनों अपने बच्चों के साथ होंगे, सिर्फ अपना परिवार तब कैसा लगेगा...। अपनी एक दुनियाँ कैसी लगती है इसकी तो कल्पना भी स्वर्ग से अधिक खूबसूरत है। 

जनवरी महिने में वह ड्यूटी पर गया और चार दिन बाद वह बिना बताये फिर से घर आ गया। सब लोग अचम्भा में पड़ गयें। अम्मा तो फूले नाहीं समायी। रिंकू के लिए पापा फिर से कपड़े और गुड़िया लायेंगे और पिंकू के लिए पापा पहचाने जाने वाले एक व्यक्ति हो गए, जो उसे कंधे पर घुमायेंगे। 

राधिका नाच उठी। उसने तो सोचा भी न था कि बिन माँगे मुराद पूरी होगी। अभी तो वह रो रोकर अपना हाल बुरा कर रखी थी कि मनोज आकर उसके आँसूओं को मुस्कराहट में बदल दिया, “अब क्यों रो रही हो पगली हम आ गयें”  

“हम तो सोचे भी ना थे”

“सोचने की जरूरत क्या है, मैं हूँ ना... वहाँ का रास्ता बंद था जवानों से कहा गया कि जो लोग वापस छुट्टी लेकर जाना चाहते हैं वे चले जायें। फिर क्या था...मैंने तुरन्त एक महिने की छुट्टी ले ली और अब तुम्हारे साथ हूँ”

“तब तो छुट्टी इधर ही खतम हो जायेगी। (थोड़ी उदासी के साथ) बाद में तो छुट्टी ज्यादा दिन के बाद मिलेगी ना” ?

“तब की तब देखी जायेगी। अभी तो हम साथ रह लें... अब तो मुस्करा दो”

मुस्कराते हुए राधिका ने पूछा “तब तो हमारे सखी के पति भी आये होंगे” ?

“नहीं, वो कह रहा था कि अभी अभी तो आया हूँ बाद में छुट्टी जाऊँगा। वह वहीं रूक गया”।

“तो इस बार लंगोटिया यार अलग अलग हो गयें” 

राधिका ने चुटकी ली।

“लंगोटिया यार नहीं चड्ढी-दोस्त कहो... हा... हा... हा...” दोनों हँसने लगें।

राधिका खुश हो गयी। पति और परिवार को खुश करने में रात दिन एक कर दिया। खूब बनाया खिलाया। ननदों ने अम्मा को समझा दिया कि तुमने भाभी के साथ झगड़ा किया तो भईया नाराज हो जायेंगे, घर में पैसा भी नाहीं देंगे। इसलिए अम्मा ने इस बार खुला मौका दे दिया। दोनों देवरिया बाजार गए पाण्डेय जी की दुकान से घर भर के लिए कपड़े खरीदें। दोनों साथ-साथ कई शादी में सज-सँवर कर गयें, गवनहरू दिन फिर से लौट आये राधिका के।    

मनोज ने छुट्टी काटकर जम्मू ट्रांजिट कैंप पहुँचकर सकुशल पहुँचने की सूचना दी। उसने बताया कि वह दूसरे दिन फौजियों के साथ जम्मू के चानी रामा से श्रीनगर के बख्शी स्टेडियम जायेगा और वहाँ सभी बटालियन्स की गाड़ियाँ आयेंगी और सबको उन्हें उनके ड्यूटी के स्थान पर ले जायेंगी। राधिका को ज्यादा कुछ समझ में नहीं आया उसे बस इतना समझ में आया कि हो सकता है कल नेटवर्क न मिले इसलिए बात नहीं हो सकेगी। वैसे तो गाँव में वैलेंनटाइन-डे मनाने का प्रचलन तो नहीं, लेकिन टी.वी. देख-देखकर सबके दिल में वैलेन्टाइन-डे का भूत सवार हो ही जाता है। गुलाब का फूल देना-लेना कभी नसीब तो नहीं हो सका लेकिन फोन पर बातें हो जाना ही जिन्दगी को लालिमा से भर देता है।  

राधिका ने चैदह फरवरी को फोन मिलाया पर बात न हो सकी। सुबह से मन बेचैन था, वह भागी भागी साधना के पास गयी कि उसके पति से मनोज की कहीं कोई बात हुई हो ? लेकिन साधना ने बताया कि “उनसे कल बात हुई थी लेकिन मनोज भईया सलामत होंगे। कोई पहली बार तो नहीं जा रहे हैं कि इतनी चिंता कर रही हो...”।  

राधिका बदहवास दिन भर काम करती रही। खुद को समझाती रही लेकिन मन नहीं माना। उसने सोचा कि टी.वी. पर कोई धारावाहिक देख ले लेकिन टी.वी. की ओर देखने का मन नहीं किया। उसने सोचा शायद वैलैन्टाइन-डे का दिन उसे दुखी कर रहा है, दुनियाँ में एक-एक दिन बना दिया जाता है और सब लोग उसी के फेर में पड़कर खुश हो लेते हैं और दुखी भी हो जाते हैं। इसके लिए तो हर साल दुख ही देता है यह दिन। सिर्फ यही दिन नहीं बल्कि नया साल, वसंत पंचमी, तीज, करवा-चैथ, होली, दीपावली ये सभी उसके जीवन में नाग बनकर समय समय पर डँसते रहते हैं। जब मनोज घर आते हैं तब वही दिन उसके जीवन में रंग बन जाता है, नाहीं तो सारी दुनियाँ सूनी सूनी लगती है। वह हर साल मारी मारी फिरती है पर पूरी दुनियाँ में उसे वही नहीं मिलता जिसे वह चाहती है।  

शाम तक चारों तरफ आग की तरह ये ख़बर फैल गयी कि पुलवामा में सैनिकों के बस को उड़ा दिया गया, बहुत सारे सैनिक मारे गये। तीस हैं या सैंतीस... समाचार में संख्या बढ़ती जा रही है। आज ही के दिन मनोज भी रास्ते में थे पर उन्होंने तो पुलवामा का नाम ही नहीं लिया और राधिका ने पूछा भी नहीं कि रास्ते में कौन-कौन से शहर से होकर गुजरना पड़ता है, कभी तो नहीं पूछती ! काश !  इसने रास्ते में पड़ने वाले सभी जगहों का नाम पूछकर लिख लिया होता। वह फिर से भागी भागी साधना के पास गयी कि पुलवामा रास्ते में ही पड़ता है क्या ? साधना खाना बनाने में इतनी व्यस्त कि उस तक समाचार की खबर ही पहुँची नहीं थी। जब उसे राधिका से पता चला तो उसके होश उड़ गये कि कहीं अशोक भी तो... !!  

उसने आटा में पानी डालकर माड़ना ही शुरू किया था कि ख़बर सुनते ही सब छोड़-छाड़ कर वह हाथ धोकर फोन पर झपट पड़ी। कई बार फोन मिलाई पर अशोक का फोन नहीं मिला। करीब घंटे भर फोन मिलाने के बाद भी बात नहीं हो पायी। दोनों की नजरें आपस में टकरातीं और अंदेशा के सच हो जाने के भय से आँखें चुरा लेतीं। दोनों चाहकर भी अपने आँसूओं को आँखों में रोक नहीं पातीं लेकिन एक दूसरे से आँसू छिपाने का भरपूर प्रयास करतीं। 

“भाई साहब से कब बात हुई थी” ? साधना ने राधिका से दिल पर पत्थर रखकर पूछा

“हाँ...कल हुई थी”

“किस नम्बर से ? फोन में होगा न वो नम्बर”

राधिका के ध्यान में ये बात आयी ही नहीं थी कि यहाँ से जाने के बाद जम्मू में यहाँ का नम्बर बंद हो जाता है, “हाँ हाँ, वहाँ से ऊ किसी और के फोन नम्बर से बात किये थे और कहा था कि वहाँ का नम्बर लेने के बाद फिर से बात करेंगे”

जिस नम्बर से फोन आया था उस नम्बर पर साधना ने बार-बार फोन मिलाया पर फोन स्वीच ऑफ आ रहा था। रात दस बज जाने पर साधना ने राधिका को समझाया कि वह घर लौट जाये, बच्चो को खिलाये-पिलाये। रात-बिरात कभी भी किसी भी नम्बर पर बात होगी तो वह घर आकर उसे बता देगी। 

घर लौटते समय राधिका के पैरों में जैसे जांता बंध गया हो। वह बड़ी मुश्किल से घर पहुँची। जेठ जी और सुरेश समाचार देखने में लगे थे कि क्या पता कुछ खबर मिल जाये या फिर मनोज समाचार में कहीं घूमते हुए दिख जाये। कमरे में बच्चे बिना खाये-पिये सो चुके थे, राधिका घडे की तरह बच्चों के बगल में ढ़िमिला गयी। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था यहाँ तक कि कोई देवी-देवता भी नहीं। 

रात दो बजे साधना की अशोक से बात हुई। 

“कहाँ हैं आप... ठीक तो हैं... फोन क्यों नहीं मिल रहा था... कहीं आप भी पुलवामा में तो नहीं ? भाई साहब ठीक हैं कि नहीं... वे आज श्रीनगर के रास्ते जाने वाले थे पुलवामा उनके रास्ते में ही पड़ता है क्या”? एक साँस में कई प्रश्न पूछ गयी साधना।

 “हाँ मैं ठीक हूँ...” 

“भगवान की कृपा से आप ठीक हैं... हमारी तो जान ही निकल गयी थी। हमने तो सत्यनारायण बाबा की कथा ही मान दिया। कल ही जाकर कथा कहलवायेंगे। हम बता नहीं सकते कि इतने ही देर में हमारे ऊपर क्या गुजरी है”।

“हाँ समझ रहा हूँ तुम चिंता न करो इसीलिए नेटवर्क में आते ही मैंने इतनी रात को फोन कर लिया”।  

 “समाचार देखने की हिम्मत नहीं हो रही। लोग कह रहे हैं सैंतीस फौजी...”

“न्यूज वाले हमेशा कम संख्या बताते हैं, एक बस का तो अता-पता नहीं। चिथड़े उड़ गये हैं... बहुत तकलीफ हो रही है” उदास मन से अशोक रूक रूक कर कह पाया।

“सखी आयी थी... भाई साहब के बारे में पूछ रही थी... वो आज ही श्रीनगर जाने वाले थे। पुलवामा रास्ते में पड़ता है क्या ?”

“हाँ... पुलवामा रास्तें में ही पड़ता है, वह भी उन्हीं गाड़ियों में से किसी एक में था... उससे बात करने की कोशिश कर रहा हूँ पर बात नहीं हो पा रही, पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ कि ठीक है कि नहीं...पर अभी कुछ पता नहीं चल पा रहा कि वो ठीक है कि नहीं”

“हे देवी-देवता... जैसे आपको सलामत रखे हैं वैसे उनको भी सलामत रखना... हे बैष्णो देवी... हम दरसन को आयेंगे”

“घबराओ नहीं... वह ठीक होगा” अशोक का गला भर आया

“हम सखी से जाकर का कहें” ? सकुचाते हुए साधना ने पूछा

“पता करके बतायेंगे... फोन रखता हूँ। उसकी बहुत चिंता हो रही है”।

साधना अशोक की सलामती से राहत की साँस ली, वह खुश हो गयी। उसने भगवान का धन्यवाद किया कि उसका पति सलामत है। वह स्वार्थी नहीं थी, लेकिन कुछ समय के लिए सब भूलकर वह स्वार्थी बन गयी। पर जैसे ही उसे 

राधिका का खयाल आया उसकी खुशियों पर दुख के बादल छा गयें, वह भरभरा कर रो पड़ी, अपने स्वार्थीपन पर उसे अफसोस होने लगा। वह बारीस के हल्के फुहारों के बीच कँपकँपाती ठंड में बेतहासा राधिका के घर की ओर भागी, लेकिन राधिका के घर के कोने पर पहुँचते ही उसके कदम रूक गयें, वह आगे न बढ़ सकी। वह सोच में पड़ गयी कि वह राधिका से क्या कहेगी। कैसे बतायेगी कि भाई साहब का कुछ पता नहीं चल पा रहा। ये कहना जितना भारी होगा उतना ही राधिका के लिए सुनना भी। अचानक कुत्तों के भौंकने की आवाज आयी तो तंद्रा टूटी, उसे पता चला कि अँधियारा छंट रहा है, वह घंटों उसी कोने पर खड़ी है और वह ठंड से काँप रही है। वह उल्टे पैर अपने घर लौट आयी कि क्या पता सुबह तक कुछ पता चल जाये।  

दूसरे दिन पुलवामा हादसे की खबर गाँव में आग की तरह फैल गयी और मनोज के लिए सब लोग हाय-हाय करते हुए समाचार के चैनल बदलने में लगे थे। लेकिन कहीं कुछ पता नहीं चल पा रहा था। समाचार चैनलों में जिन जिन शहीदों का फोटो दिखाया जा रहा उसमें मनोज का नाम न था। 44 जवान शहीद हुए। पालम एयरपोर्ट पर शहीदों के ताबूत लाइन से बिछे हुए देखकर गाँव वालों का दिल दहल गया। ‘ऐ वतन, ऐ वतन, तुझको मेरी कसम’ और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी’ सुनकर जिसे नहीं रोना चाहिए वे भी रो उठे। राधिका बौखलाये बौखलाये अपने घर से साधना के घर और उसके घर से अपने घर की ओर दौड़ती।  वह बार बार मनोज से और उसके बुआ के भतीजी कविता के पति से गुहार लगाने के लिए कहती कि कविता के पति तो बड़े अफसर हैं पता लगाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं। साधना के पास इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह राधिका से बता दे कि हादसे में शहीद हुए जिन जवानों की लिस्ट जारी हुई है उसमें मनोज का भी नाम है। राधिका को समाचार देखने की हिम्मत नहीं थी इसलिए कभी वह दालान के चैखट पर खड़ी होकर जेठ जी से पूछती तो कभी सुरेश को फटकार लगाती कि वह समाचार ठीक से देख नहीं रहा इसलिए उसके भईया उसमें दिखायी नहीं दे रहें...। कभी बेजान होकर धरती पर पट्ट लेट जाती तो कभी पेट में मरोड़ उठता तो खेत की ओर भागती। कपड़े-लत्ते की सुध तो थी नहीं। कभी बहुत ठंड़ी लगती तो कभी रह रहकर माथे पर पसीने की बूंदें छिटक जातीं। शादी के बाद पहली बार वह मनोज के साथ इस छुट्टी में खुश थी। वह खुशी उसे खाये जा रही थी कि काश! इतनी खुश नहीं हुई होती तो क्या पता दुःख भी न आता।  

तीसरे दिन शाम जेठ जी समाचार देखना बंद कर दिए। सब कहते टी.वी. चलाओ तो वे चुप चाप मुँह लटकाये बैठे रहते। सुरेश ने जिद्द करके समाचार लगा दिया कि आज देख लेते हैं, नहीं तो कल तो दिल्ली या जम्मू रवाना होना ही है। समाचार देखते देखते जेठ पुक्का फाड़कर रोने लगें। जिन्दगी में जिसने कभी न रोया, पहाड़ जैसे मुसीबत अपने सीने पर लाद कर हँसता रहा, वह आज अपना आपा खो दिया और धम्म से खटिया पर गिर पड़ा। पहली बार घर के बड़े बेटे का रोना सबको हक्का बक्का कर गया। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्या हो गया ? अभी तक तो कोई समाचार नहीं मिला है फिर सबको हिम्मत बँधाने वाला ही क्यों हिम्मत हार गया ? घर में से सारी दुलहनें भाग भाग कर दरवाजे पर खड़ी हो गयीं कि बाहर वाले कमरे में जेठ जी रो रहे हैं। राधिका आते आते चैखट से फिसल गयी मुँह के बल गिर पड़ी। भसूर (जेठ) के सामने भयहू (छोटे भाई की पत्नी) नहीं जातीं लेकिन आज उनके चरणों गिरी पड़ी थी। जिठानी राधिका को उठाने की कोशिश करती हैं लेकिन वह सम्भल नहीं पा रही। कभी जेठ जी ने उसकी आवाज न सुनी थी लेकिन आज पहली बार वह अटक अटककर पूछ रही  है, “उ ठीक तो हैं ना” ?

जेठ जी की हूँक और बढ़ गयी, उनसे अब छुपाया नहीं जा रहा, “आज दोपहर में ही फोन आया था”

“फोन आया था तो बताये क्यों नहीं... केकर फोन आया था” ?  अम्मा चिल्ला पड़ी

रोने के आगे कुछ आवाज नहीं निकल रही। समझ सब रहे थे स्वीकारना कोई नहीं चाहता। सुबकने की आवाज हर जगह से आने लगी लेकिन बोलना कोई नहीं चाहता।

“भईया ठीक है ना... बताईये भईया” सुरेश रोते-रोते पूछने लगा

“बॉडी लेकर लोग आ रहे हैं”

पूरा घर चीख उठा, चीख उठा गाँव, धरती और आसमान।

सुबह पट्ट पड़े राधिका के सामने अनेकों वर्दियों के जूते दिख रहे हैं। कोई देश भक्ति की बात कर रहा है तो कोई चुप है, कोई रो रहा है कोई जाबाज सिपाहियों के गुणगान गा रहा है, लेकिन चेहरा सबका धूमिल है, व्यथा एक है। ‘अंतिम दर्शन कर लो...’ कहते हुए राधिका को उसके भाई उठाते हैं ? उसी समय गाँव की एक बुढ़ी औरत राधिका का फक्क पियराया मुँह देखकर चिल्ला पड़ी, “बछिया को आखिरी बार मुँह भी देखना नसीब नाहीं हुआ”

साधना पिंकू को कलेजे से चिपटाये हुए राधिका का मुँह निहारे जा रही है लेकिन उसमें उसे सम्भालने की हिम्मत नहीं, यह जानते हुए कि राधिका उससे इस समय कुछ नहीं पूछ पायेगी फिर भी वह डरी हुई है कि अगर उसने पूछ लिया कि मैं भाग-भाग कर तुम्हारे पास गयी फिर तुमने मुझे क्यों नहीं बताया ? तो वह क्या जवाब देगी...। काठ बनी राधिका को काठ के ताबूत के पास बैठा दिया गया। आज न सर पर घूँघट की चिंता है न ही ससूर भसूर की। आज उसे न तो देश भक्ति का स्वांग सूझ रहा है न ही माँ-बाप पर कोई गुस्सा। न भविष्य की चिंता है और न ही बच्चों की। मनोज का चेहरा आँखों में लिए ख़ुद एक ताबूत बन चुकी है जिसमें सिर्फ अफनाहट है, जिसमें उसकी इच्छाएँ, अनिच्छाएँ, सपने सब तड़फड़ा रही हैं। वह नहीं चाहती कि कोई उसे देखे और न ही ये किसी को। सबकी नजरों से छिपकर एकटक निहार रही है तिरंगे में लिपटे ताबूत को। 

अचानक उसके कान में कुछ आवाजें गुँज उठीं, “मनोज की सिर्फ लड़कियाँ ही हैं, मुखाग्नि कौन देगा” ?

“उनके पिता के पास इतनी हिम्मत है नहीं कि वे श्मशान घाट तक पहुँच सकें”। 

“छोटा भाई भी तो बेटे के समान होता है। वहीं मुखाग्नि दे देंगे”

“छोटा भाई भी तो बेटे के समान होता है”। यह वाक्य राधिका के कानों में पहुँचते ही वह काँप गयी। बेटा कहने के साथ ही दो साल पहले ऊँखियाड़ी में घटी घटना उसके आँखों के सामने नाच गया। बेटा शब्द अपवित्र लगने लगा, वह अपने पति के शरीर को अपवित्र नहीं होने देना चाहती। ऐसे लोगों के छूने से स्वर्ग भी नरक बन जायेगा। ‘भारत माता की जय’ का नारा गूंज उठा, पार्थीव शरीर कंधों पर उठते देख वह तुफान की तरह उठी और समेट लेना चाहती थी समस्त पृथ्वी को अपने आगोश में। कितना मुश्किल होता है एक बार किसी तुफान उठने के बाद उसकी गति को रोक पाना...। रोक लिया उसने ताबूत और चूमती रही देर तक। आखिरी बार लिपट कर दहाड़ उठी राधिका, ‘कहवाँ ले जा रहे हो... हमके एक बार मुँहवा दिखा दीजिए...’ ताबूत के साथ खड़े फौजियों की आखें फिर से भरभरा आयीं, कैसे कोई समझाए कि यह तो नाम का ताबूत है, जवानों के तो चिथड़े उड़ गये थे... पहचान तो सम्भव ही नहीं था, बस में बैठे जवानों के नामों की लिस्ट से अंदाजा लगाया गया कि इसमें यह भी एक जवान था।  

जवानों ने फिर से हिम्मत बाँधा और गाँव वालों के साथ मिलकर फिर से कंधों पर ताबूत उठा लिया... “भारत माँ की जय’। राधिका लड़खड़ाते कंधों से ताबूत पर टेक लगा चल पड़ी। पीछे से कोई औरत चिल्लाई , “अरे कवनों रोको उसे, मेहरारू कंधा नाहीं देतीं, मेहरारू समशान नाहीं जातीं”। 

राधिका का पैर लड़खडाया, पिंकू को कलेजे से चिपकाये 

साधना झट से उसे छोड़ ताबूत पर अपना कंधा लगा देती है और राधिका को सम्भाल लेती है। राधिका की आँखें सखी का सम्बल पाकर कह उठीं, “अब तक तो साथ नाहीं मिला, कम से कम आखिरी समय में साथ चलने दो। हमहूँ श्मशान जायेंगे...। रिंकू इनके कलेजे का टूकड़ा है, मुखाग्नि वही देगी...”    

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