‘‘पाप या पुण्य’’

   विभा रंजन, -नई दिल्ली, मो. 9911809003


अमन की पदोन्नति हो गई थी वह चेन्नई में ऑफिसर बन कर आया था। दिन भर ज्वानिंग में ब्यस्त रहा। स्थिर होकर फोन करना चाहा तब  मोबाइल नहीं लगा बार बार प्रयास किया पर मोबाइल ने तो आज न लगने की कसम ही खा ली थी। उसने फिर न. मिलाया, जरूर विन्नी का मोबाइल खराब होगा। तभी टी.वी में खबर आई राँची में भंयकर आँधी तूफान और बारिश के कारण जनजीवन अस्त-ब्यस्त चालीस घंटे से बिजली गायब‘‘।घर पर बात न होने से मन बेचैन होने लगा। जब चेन्नई आ रहा था तब माँ की तबीयत खराब चल रही थी।आधी रात को  पत्नी विन्नी का फोन आया ‘‘माँ को हार्ट अटेक आया है तुम जल्दी आ जाओ!‘‘

अमन के हाथ से मोबाइल गिर गया। उसने तत्काल टिकट बुक कर अपने सिनीयर को खबर किया। अमन की आँखों में माँ की छवि आ रही थी। जीवन के सभी मुश्किल क्षणों में वह माँ के विचारों और तर्कों के सहारे रहा। स्कूल के भारी बस्ते का बोझ, काॅलेज की मस्तियां, बेपरवाहियां, या नौकरी के अंधरे उजालों के दिन, सबमें उसकी माँ ने उसे थामा है। वह बिलकुल नहीं जताना चाहता वह नंबर वन बेटा है पर माँ उसके लिए हमेशा नंबर वन है! वह अपनी माँ के बहुत निकट था। कठिन से कठिन परिस्थितियों में वह अमन की ढ़ाल बनकर खडी रहती। माँ उसके जीवन में आदर्श की प्रतीक थी। अमन ने जब से होश संभाला अपने पापा को बीमार  देखा। उसे याद नहीं  कब उसने पापा को ऑफिस जाते देखा। वह बहुत  छोटा था तभी पापा गुजर गये। उसे याद है पापा की मृत्यु के समय माँ को दादी ने अपने गोद में बहुत देर छुपाये रखा था। कोई कृष्णा बुआ थीं जो लगातार माँ को गंदा बोल रही थी। दादी ने बुआ को दाह संस्कार के बाद चले जाने को कह दिया था। पापा का चेहरा अमन को हमेशा बुझा सा लगता था।माँ बताती है, दादी बहुत प्यारी थी। वो हमेशा माँ की ढ़ाल बनकर खड़ी रहती थी। जब दादी की मृत्यु हुई थी तब माँ टूट गई थी। न जाने अब माँ की तबीयत कैसी है? प्लेन अब पंहुचने  वाला था लैंडिंग की सुचना दी जा रही थी। एयरपोर्ट से सीधा अस्पताल पहुंचा। अमन को देखकर विन्नी के सब्र का बाँध टूट गया, वह अमन से लिपट कर सिसक उठी। अमन ने पुछा,

‘‘डाक्टर ने क्या कहा.?‘‘

‘‘मैसिव हार्ट अटैक है..!‘‘

डॉक्टर ने जब हालत क्रीटीकल बताया तब अमन के पैर काँपने लगे। उसे अपने पापा की उतनी स्मृति नहीं थी। माँ उसके जीवन की मेरुदंड थी, अब क्या होगा? माँ को कुछ होगा तो नहीं? अस्पताल में एक आदमी रह सकता था इसलिए उसने विन्नी को घर भेज दिया। आँखों में नींद नहीं थी, यह रात उसके लिये बहुत भारी लग रही थी। उसने आइ.सी.यू.के हॉल से माँ को देखा माँ का अवश शरीर और ऑक्सीजन स्लेन्डर मुँह पर मास्क देख लगा जैसे माँ कितने वर्षो से बीमार हैं। वह  माँ के शीघ्र ठीक होने की प्रार्थना करने लगा। तीसरे दिन माँ की हालत और बिगड़ गई उनकी सांसे उखड़ने लगी थी। अमन सामने खड़ा था, पलक झपकते माँ की सांसें बंद हो गई। डॉक्टर ने ना का इशारा किया तब अमन तडप उठा

‘‘माँ..माँ.. आँखें खोलों माँ.. एक बार मेरी तरफ देखो माँ..!‘‘

अमन माँ के शव को घर ले आया, वह स्वयं पर काबू नहीं रख पा रहा। विन्नी भी हतप्रभ थी माँ नहीं रही?  सब विश्वास नहीं कर पा रहे थे, यह सब कैसे हो गया। अमन के दिमाग में हलचल मची थी, वह लड़खड़ा कर गिरने वाला था विन्नी ने उसे थाम लिया। विन्नी ने जब उसे थामा तब वह फफक पड़ा। दोनों एक दुसरे को पकड कर रो रहे थे।  रोने की आवाज से अमन का चार साल का बेटा रोने लगा। विन्नी ने उसे चुप कराया। कमरे में एक नीरवता छाई थी, सभी स्तब्ध लग रहे थे। यही पर आकर मानव हार जाता है आर्यसमाज रीति से सब काम करना है। यह माँ की इच्छा थी, तीन दिन बाद ही हवन होना था, परिवार से किसी के आने की सम्भावना भी कम थी। अमन की बूआ थी पर अमन उनसे संर्पक रखना नहीं चाहता था माँ के मैके से किसी भी सदस्य को अमन ने आजतक नहीं देखा था। अमन अपने ननिहाल के बारे में जानता था, पर उन सबको याद नहीं करना चाहता है। हवन की समाप्ति पर सब घर चले गए। अमन अपनी माँ के कमरे में अपनी माँ के यादों के साथ उदास बैठा था। उसे माँ की सब बातें याद आ रही थी, जब अमन छुट्टियों में घर आया तब उसने माँ से अपने नाना-नानी से माँ के रिश्ते पर कुछ पुछा था। तब माँ ने तो उसे अपनी पुरी रामकहानी ही सुना दी थी। माँ ने बताया था, कि उनकी मां जब वह दस वर्ष की थी, तभी स्वर्ग सिधार गई थी, परन्तु बाबुजी ने मेरे और निखिल छोटे भाई के कारण, दुसरा विवाह नहीं किया था। उनके पिता बनारस में कालेज के प्रिन्सिपल थे। माँ और पापा साथ में उसी कालेज में बी.ए. कर रहे थे ।अमन के दादाजी उसी कालेज में लाईब्रेरियन थे। जो चाहते थे अमन के पापा पढ़-लिख कर अपने घर का नाम रौशन करें। अमन के दादा के आकस्मिक निधन के बाद, अमन के पिता को लाईब्रेरियन की नौकरी करनी पडी, साथ पढ़ाई भी जारी रखने की सुविधा नाना जी ने करवा दी थी। जब नानाजी को माँ और पापा के संबंधों का पता चला तो, वह बहुत क्रोधित हो गये। उन्होंने पापा को नौकरी से निकाल दिया  साथ में कालेज छोड़ कर जाने को कह दिया। माँ की भी पढ़ाई छुडवा कर घर बिठा दिया, माँ पर पुरी पाबंदी लगा दी गई थी। माँ ने अपने छोटे भाई से सहयोग मांगा था, पर पिता के सामने उसकी हिम्मत नहीं पडी। माँ ने चुपके से ड्राइवर को कहकर पापा को काशी विश्वनाथ मंदिर बुलवाया और शादी करने को कहा था। माँ ने बताया था पापा समझाते रहे माँ घर लौट जाये दोनों का मेल सुखद कभी नहीं होगा माँ ने कह दिया घर से पांव निकाल चुकी है, पत्नी ना बन सकी तो गंगा में समा जाएंगी। पापा जानते थे कि शारदा जिद्दी है बात नहीं मानेगी इसलिए उन दोनों ने मंदिर में विवाह कर लिया। बाद में माँ पापा को लेकर जब अपने पिता के घर गई, तो किसी ने भी दरवाजा ही नहीं खोला। माँ ने बहुत कोशिश की थी, पर नानाजी ने भी मुंह मोड लिया। तब माँ ने हंस कर कहा था

‘‘तुम्हारी दादी ने जरुर हम दोनों की आरती उतारी थी..!‘‘

जब नानाजी को पापा की मृत्यु की खबर मिली तब वह खबर सुनकर बरदाश्त न कर सके। तब नानाजी को मैसिव हार्ट अटैक आया था। डाक्टर ने कहा था भाग्यशाली हैं जो बच गये । नानाजी जब ठीक हो गये तब उन्होंने अपने ड्राइवर के हाथों प्रोपटी के कागज माँ को भिजवाया था। बनारस में एक घर और कुछ एफ्डीज के पेपर थे। पर माँ ने कुछ भी लेने से इन्कार कर दिया था। उस समय माँ कठोर होने का प्रयास कर रही थी। रानी जैसा जीवन बिता रही माँ ने पापा के लिए सब त्याग दिया। उनका धीरज उस दिन टूट गया, जिस दिन बनारस के समाचार पत्र में नानाजी के मृत्यु की खबर पढ़ी ‘‘विद्वान हरिओमराय जी का निधन‘‘ उस दिन माँ बहुत विह्ववल हो गई थी। दादी ने माँ को कहा माँ बाप से खून का रिश्ता होता है! कभी नहीं टूट सकता! तुम जाकर दर्शन कर लो! पर माँ ने कहा,

‘‘कैसे जाऊं, हिम्मत नहीं होती है, उनका यह रुप कैसे देख पाऊंगी.. मेरा दुख उनकी उम्र कम कर गया?‘‘

लहू तो लहू को खींचता है रोती बिलखती  पिता के अन्तिम क्रिया में चली गई। अमन को सब अब तक याद है उसने पुछा था

‘‘मैं क्यों नहीं गया था माँ?‘‘

‘‘तुम नहीं गये थे  क्योंकि तुम्हारे सर में चोट से दो टांके लगे थे। मैं तो तुमसे छुपकर गई थी!‘‘

माँ को हमेशा यह लगता रहा उन्होंने अपने जनक का हृदय दुखाया शायद इस कारण उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। और नानाजी भी अपने कठोर वर्ताव के कारण सदैव जीवन भर दुखी रहे। माँ को लगता उनका ही दूर्भाग्य  उनके पिता के मृत्यु का कारण बन गया। माँ अपने पिता को हमेशा याद करती थी, उनकी बातें किया करती थी। संस्कृत के बहुत बडे विद्वानों में उनका नाम आता था। अमन इस बात को समझता था, नानाजी को माँ के दुख दर्द से बहुत तकलीफ होती थी। उन्होंने माँ को पापा के मृत्यु के बाद अपनाने की कोशिश भी की थी पर सफल नहीं हुए। माँ को हमेंशा से इस बात का दुख रहा पापा के कारण उन्होंने अपने पिता को छोड़ा। जिस आदमी के लिये छोड़ा वह चार पांच साल से ज्यादा साथ न दे सका। प्रकृति के क्रूर नियति ने माँ के साथ बडा अन्याय किया था। माँ अपने पिता के बहुत लाड़ली थी। उनसे अलग होकर वह सुखी नहीं रह पाई। यह दुख भी उनके अंदर बहुत था। माँ की संस्कृत बहुत अच्छी थी लड़कियां कितनी इच्छुक रहती थीं। प्रतीक के होने के बाद माँ ने पढ़ाना बिल्कुल छोड़ दिया था। अमन सोचने लगा माँ ने जीवन में कितने कष्ट सहे! दादी के जाने और मेरी नियुक्ति के बाद, माँ बिल्कुल अकेली हो गई थी जब हम बनारस का दादाजी वाला घर बेंच रहें थे, तब माँ बहुत ही रोई थी माँ ने कहा था, ‘‘इस घर से मेरी बहुत सी अच्छी यादें जुडी हुई हैं! उसी के सहारे तो जी रही थी मैं !‘‘ जब मैने उन्हें समझाया कि अब आप अकेली कैसे रहेगीं! मैं आपको अकेला छोड़ कर नौकरी नहीं कर सकता! तब तैयार हुई थी!अमन को एक-एक कर सारी बातें याद आने लगी। यह तो प्रकृति का नियम है, हमारा अतीत चाहे अच्छा हो या कड़वा, हम भूल नहीं पाते हैं । वैसे भूलना भी नहीं चाहिये, अगर अतीत नहीं होगा तो, वर्तमान भविष्य की नींव किस पर रखेगा। अमन अभी सोच में डूबा बैठा ही था कि विन्नी आकर खड़ी हो गई। सोच को दो घड़ी विराम मिला। विन्नी के हाथ में एक लिफाफा था, वह अमन को देने की कोशिश कर रही थी।

‘‘क्या है यह..?‘‘

‘‘मुझे नहीं पता.. खोलकर देखो..? ‘‘

यह तो चिठ्ठी लग रही है.. अरे! यह माँ की चिट्ठी है.. माँ ने मुझे चिठ्ठी क्यों लिखी..?‘‘

‘‘मुझे मालूम नहीं..अभी लगभग एक महीना पहले उन्होने मुझे दिया था.. कहा मेरे जाने के बाद ?‘‘

विन्नी ने बात अधूरी छोड दी अमन ने खोला लिखावट माँ की थी, माँ की चिठ्ठी मन विस्मय से भर गया

‘‘ठीक है..प्रतिक सो जायेगा.. तब आराम से पढेगें..!‘‘

जब सब तरफ सन्नाटा हो गया उसने लिफाफा खोला । विन्नी उसके पीछे आकर बैठ गई। अमन ने पढ़ना शुरु किया,

‘‘मेरे बेटे अमन,

बहुत प्यार..

तुम्हें जब यह पत्र मिलेगा.. मैं इस नश्वर शरीर को छोड़ कर अपने अनंत यात्रा के लिए निकल चुकी होऊंगी.. दावा तो नहीं करती.. मन में विश्वास जरुर रखती हूं.. तुम्हारे पापा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे आगे ले जाने जरुर आएगें..मैं जानती हूं अभी तुम बहुत दुखी होगे..पर बेटा.. दुख मत करना.. मृत्यु तो शाश्वत सत्य है जो आया है उसे जाना ही होगा.. कभी यह सोच कर भी दुखी मत होना कि ‘हम‘ तुम्हारे साथ नहीं है..बेटा.. माँ बाप कहीं नहीं जाते..हृदय से सदा अपने बच्चे के पास रहते हैं.. जानती हूंँ.. तुमको आश्चर्य तो जरूर हो रहा होगा कि माँ चिट्ठी क्यों लिख रही हैं.. कारण है.. और कारण यह है, कि कुछ बाते ऐसी होती हैं, जिसे हम सामने से नहीं कह पाते हैं..अगर सामने में कोई अपना हो.. तब तो सच बोलना और भी कठिन हो जाता है.. लेकिन, मुझे सच बोलना था.. इसलिये मैने तुमको यह पत्र लिखने के लिए सोचा है..तुमको पापा की याद तो आती होगी..उनकी तस्वीर धुंधली दिखाई पड़ती होगी..तुम तो हमारे जीवन की नई आशा थे.. तुम्हारे आने के बाद हम तुम्हारी आँखों से देखने लगे..तुम्हारी हंसी से हंसने लगे..हमारा जीवन सुखमय हो गया था..लेकिन, जीवन ने हम दोनों को धोखा दे दिया..तुम्हारे पापा को अकस्मात मुँह में ब्लड कैन्सर ने अपने चपेट में ले लिया था.. कितना भयावह और दर्द देने वाला यह रोग होता है मुझे नहीं पता था.. पुरे मुंह में जख्म भर जाता है.. जो मरीज को सिर्फ दर्द देता है.. अवस्था निरतंर बिगड़ती ही जाती है..इतनी तेजी से यह बीमारी बढ़ती है सभी लोग घबड़ा जाते है..अतंतः मरीज बिस्तर पकड़ लेता है.... मृत्यु उसके निकट आती जाती है..पर तडपा कर आती है.. यह सारी अवस्थायें मैने तुम्हारे पापा के साथ देखी है.. अंत के पहले सबसे कष्टों वाले दिन होते हैं..तुम्हारे पापा के साथ भी यही सब होने लगा था..पापा का सुंदर चेहरा बलवान शरीर मात्र हड्डियों का ढ़ांचा दिखने लगा था.. उनकी दयनीय अवस्था पर मै रो-रो भरती थी..वह कितनी पीड़ा झेल रहे थे. उनकी अवस्था देख सुई देने वाला आदमी सुधीर भी कभी-कभी घबड़ा जाता था..उसने बताया यह रोग मरीज को इतना तडपाता.. और कष्ट देता है कि परिवार वाले भी मरीज के मृत्यु की कामना करने लगते हैं.. यह अंत की शुरूआत है..मैं सन्न हो गई, अगर अंत की शुरूआत यह है,.. तो अंत कैसा होगा..मैं तो रोज मर रही थी..मन करता था कि खुब रोऊं पर सोचती थी..किस-किस बात के लिए रोऊं..अपने दुख पर.. पापा की लाचारी पर..या एक बेबस माँ तुम्हारी दादी पर.. दादी के सामने, मुझे अपना दुख बहुत छोटा लगने लगता था..तुम्हारी दादी भगवान के सामने प्रार्थना करतीं और कहतीं, ‘‘ हे भगवान..मेरे बेटे को मुक्ति दे दो..!‘‘

मैं पुछती,

‘‘अगर आपके पुत्र नहीं रहेगें तब.. मैं जी कर क्या करुंगी..?‘‘

तब वह बहुत दुख से कहती-

‘‘अगर ईश्वर की यही मर्जी है.. मै अपने आँखों के सामने अपने बेटे की जलती चिता देखूं.. तब क्या करुं..मैं भाषकर को इस तरह तडपता भी नहीं देख सकती.. कम से कम उसे इस पीड़ा से मुक्ति तो मिल जाये..!‘‘

हम सब बेबस होते जा रहे थे। समय तो डाक्टर ने दो महिना बताया, पर हालत लगती थी इतना समय नहीं होगा। हम अपने मन को झूठी दिलासा देते जाते थे उनके गिरते हुए स्वास्थ्य को देख रहे थे। अंत आने के पहले खाना-पीना बंद होने लगा आवाज बंद होने लगी थी। कभी दादी कभी मैं उनके कमरे में रहा करते थे। उनकी तकलीफ दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी। एक दिन तुम्हारे पापा ने मुझे पास बुलाकर एक किताब से एक हिरण की कहानी पढने को कहा हमने एक कहानी पढ़ी थी।

‘‘राजा के पास एक बहुत सुंदर हिरण था, वह बहुत अच्छा कुलांचें मारता था। राजा ने उसके पैर में घुंघरू बंधवा दिये ताकि जब वह नाचे तो घुंघरू बजे, जिसको देख राजा बहुत खुश होता था। बाद में हिरण का पैर खराब हो गया अब वह नाच नहीं पाता था । हिरण राजा को अपना पैर दिखा कर रोता था, राजा उसके क्रंदन से द्रवित हो उठा राजा ने उसके कष्ट मुक्ति का उपाय  सोचा और फिर उसने अपने बंदूक की गोली द्वारा उसकी पीड़ा का अंत कर दिया‘‘।

पापा की बात सुनकर मैं हैरान रह गई! अपने पिता का हृदय मैने दुखाया था तब क्या भगवान ने ये सजा मेरे लिए सोच रखी थी? एक बार ड्योढ़ी लांघने की इतनी भयंकर सजा नियति मुझे देगी?सुधीर ने बताया उसने भी अपने जीजा के अंत समय में दवा बंद कर दिया था दवा से कौन सा चमत्कार होने वाला था पर दीदी को तिल तिल मरते देखना उसके लिये कष्टकर लगा। तुम्हारी दादी इसके लिये पहले से तैयार थी कहने लगी-

‘‘यदि मेरे भाग्य में मेरे बेटे का शव देखना लिखा है तब.. इसे मैं टाल नहीं सकती पर.. भाष्कर को एक चैन का गमन दे सकती हूँ..!‘‘ मैने दुसरे दिन तुम्हारे पापा को कोई दवा नहीं दिया। पापा की तकलीफ में कमी तो नहीं आई हाँ उनके चेहरे पर एक शांति जरुर दिखी शायद उन्हें लग गया था आगे की राह शीघ्र मिलने वाली है। उस रात तुम मेरे पास सोने की जिद करने लगे मैं पापा के कमरे के बाहर तुमको गोद में लेकर लोरी सुना रही थी मेरी गोद में तुम भी सो गए मेरी भी आँखें झपकने लगी मैं जब तुमको उठाती तुम और चिपक जाते फिर हम वही बाहर सो गए। रात के तीसरे प्रहर ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे धीरे से स्पर्श किया है। मैं चैंक कर उठी और कमरे की तरफ भागी। कमरे में भंयकर नीरवता छाई थी, तुम्हारे पापा जा चुके थे। वातावरण में विचित्र सी खामोशी छाई थी, लगा किसी महान आत्मा ने मुक्ति पा ली हो। उनके चेहरे पर एक विचित्र शांति और होठों पर अधखिली मुस्कान थी। मैं उनके हाथों को अपने हाथों में लेकर चुपचाप बैठी रही,अब कहाँ हम मिलेगें जी में आ रहा था चीत्कार करुं जोर से दहाड मार कर रो लूंँ, पर सच कहती हूँ आवाज ही नहीं निकली। अपराध भाव से ग्रसित जो थी। तभी तुम्हारी दादी आ गई और बोली-

‘‘भाष्कर चला गया..वह मेरे पास आया था.. उसके चेहरे पर मुस्कान थी.. उसने मेरे पैर छुए..!‘‘

रात भर हमदोनों वहीं पास बैठे रहे.. हमदोनों की पीडा एक थी..,हम इतना रो चुके थे अब हमारे आँसूं सूख चुके थे..किसी ने कहा तुमने अपने पिता अपने जनक का हृदय दुखाया है.. भंयकर पाप किया है.. किसी ने कहा तुमने प्रेम किया है.. तब निभाना धर्म था.. तुमने पुण्य का काम किया है.. मैं पाप और पुण्य की परिभाषा नहीं जानती.. इसलिये इसका र्निर्णय मैं तुमपर छोडती हूँ.. अगर मैने पाप किया है.. और मैं तुम्हारी दृष्टि में पापिनी हूँ.. तब मेरी अस्थि को किसी गंदी नाली में बहा देना.. और अगर मैं तुम्हारी दृष्टि में सही हूँ.. तब मेरी अस्थि को बनारस के घाट पर प्रवाहित कर देना.. जिसकी मिट्टी ने मुझे इतना आत्मबल दिया... शुभ आर्शीवाद..

तुम्हारी माँ

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‘‘हवन के बाद मैं बनारस जाऊंगा...‘‘

अमन और विन्नी के आँसुओं ने गंदे नाली शब्द को 

धो दिया था.....! 

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