प्रस्तुति


विजय बहादुर सिंह, -भोपाल, मो. 9425031392 


अपर्णा पात्रीकार की ग़ज़लें न तो बहुत प्रचलित उर्दू ग़ज़ल के दायरे में आती हैं, न हिन्दी ग़ज़ल के। उन्हें कोई नाम देना होतो सिर्फ एक ही शब्द मौजूँ हो सकता है और वह है हिन्दुस्तानी ग़ज़ल। वो ग़ज़ल जो वली दखिनी से चलती हुई मुल्ला वजही आदि से होकर अपने ज़माने तक चलती चली आई है। वो जो आशिक माशूक की गुफ्तगू भी है और जब-तब समय की कँटीली झाड़ियों में फँसे हिरन की छटपटाहट और सिसकियाँ भी यहाँ गमे जानां और गमे दौरां आपस में कितने एकमेक हो गए हैं कि तय करना मुश्किल।

जहाँ तक ग़ज़ल के ‘फार्म’ की पूर्णता अपूर्णता का सवाल है अपर्णा ने इसे बेशक उस्तादों के निकट रहकर सीखा है। इसलिए वह दुरुस्त है।

यह तो हर कवि/शायर जानता है कि सृजन का प्राण तो उस अनुभूति में निवास करता है जो सर्जक की आधार पहचान बनता है। पर कैसी अनुभूति ? वह जो शायर के निजी सच को ज़माने के सच में बदल डाले।

कहने की जरूरत नहीं कि अपर्णा का सच इससे अलग नहीं है-


ख़ौफ़ सेे पत्थरों के रूकूंगा नहीं

आइना सच दिखाने पे मजबूर है।।

×              ×                 ×

साथ रहते हैं हम फिर भी हैं अजनवी

बीच में एक अनजान दीवार है।।


अपर्णा के ये शेर ही उनकी पहचान के परिचय पत्र हैं।                   

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