‘गली दूसरी है’

 समीक्षा

ज्योत्स्ना ‘कपिल’, (सहसंपादक ‘अविराम साहित्यिकी‘), दिल्ली, मो. 9412291372

विनय पँवार जी का सद्यः प्रकाशित दूसरा उपन्यास ‘गली दूसरी हैं‘ मेरे हाथों में है। विनय जी का पहला उपन्यास ‘अदृश्य हमसफर‘ पर्याप्त धूम मचा चुका है, पाठकों के दिलों में जगह बना चुका है। इस उपन्यास ने उन्हें खूब ख्याति दिलाई।

उसी कड़ी में यह दूसरा उपन्यास भी अपनी उपस्थिति दर्ज करेगा, ऐसा मुझे विश्वास है। ‘गली दूसरी है‘ नाम ही काफी है किसी का भी ध्यान आकृष्ट करने के लिए। पहले उपन्यास में जहाँ आदर्श प्रेम का स्वरूप चित्रित किया गया था, वहीं इस दूसरे उपन्यास में चंचल प्रकृति की नायिका, भौतिक आकर्षण की चकाचैंध से भ्रमित है। शिवांगी उन भटकी हुई युवतियों में से एक है जो बाहरी चमक को ही प्रमुखता देती हैं। जिनके लिए भीतर की स्वर्णिम चमक को देखने की न तो दृष्टि है और न ही समझ। वह सुकेश जैसे नकली व्यक्तित्व से इस कदर प्रभावित है कि उसके लिए अपनी सुखी गृहस्थी को भी दाँव पर लगा देती है।

उधर दूसरी तरफ है सरल सहज, उज्ज्वल चरित्र वाला उसका पति अमित, जो नीलकंठ की भांति अपनी पत्नी के भटकाव का हलाहल अपने कंठ में ही धारण करता है। अंत में वह अपने सद्व्यवहार से न सिर्फ उसकी आँखें खोलता है बल्कि उसे सही राह चुनने को भी विवश कर देता है। 

एक ओर नारी की भावुकता, उसकी सम्वेदनशीलता का लाभ उठाता सुकेश है, तो दूसरी ओर अपने सिद्धांतों पर कायम रहने वाली, दृढ़ चरित्र की स्वामिनी, सुकेश की पत्नी सीमा। इसमें आस्था जैसी सच्ची मित्र भी है, जो अपनी भटकी हुई सखी की सही समय पर आँखें भी खोलती है। 

इस उपन्यास की भाषा एवम शैली सहज, सरल है। लेखिका ने चरित्र अपने आसपास के समाज से ही उठाए हैं, जिनके सम्वाद सन्तुलित और स्वाभाविक हैं। पात्रों के चरित्र का चित्रण सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से किया गया है। ख्यात साहित्यकार डॉक्टर हरीश नवल जी भी कहते हैं कि- उन्होंने जिस संकेतात्मकता से चरित्रों का कैट स्कैन किया है, यह उनकी निजी शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। 

श्वेत श्याम रंग के रेखाचित्र द्वारा सजा हुआ आवरण देखने में सुंदर है। इस सुंदर आवरण चित्र को बनाने के लिये अनु प्रिया जी बधाई की पात्र हैं।

अंत मे मैं विनय जी को अनन्त शुभकामनाएं देती हूँ और आशा करती हूँ कि, आगे भी उनकी कलम से बेहतरीन सृजन होता रहे।