इश्क करना गुनाह नहीं


डॉ. रेनू यादव                                                                                                     

रिसर्च/फेकल्टी असोसिएट, भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर, 

ग्रेटर नोएडा - 201 312 (उ.प्र.)                                                                                                                          

ई-मेल- renuyadav0584@gmail.com 


चर्चा के बहाने 

कहानी - ख़ते मुतवाजी
कहानीकार - डॉ. लक्ष्मी शर्मा
लिंक - https://www.kahaniya.com/s/khate-mutvazi-8446/khate-mutvazi-8446


“इश्क़ करना गुनाह नहीं है मेरी चाँद, ये वो खुदाई नेमत है जिसे देना-पाना हमारे बस में भी नहीं है”

यह ददिया का वाक्य है, जो अपने अनुभव से राबिया को समझा रही होती है। डॉ. राबिया सिद्दीकी कोमा में पड़े पेशेन्ट को देखते हुए अपने अंदर की राबिया को हावी नहीं होने देती, बावजूद उसके अंदर की राबिया कोमा में पड़े पेशेन्ट की आँखों में डूब कर छटपटाने लगती है। इस पवित्र प्रेम में राबिया को कोई अपराध बोध या शर्मिन्दगी नहीं है और न ही उसे लगता है कि वह अपने प्रेम करने वाले पति एवं प्रिय बेटे अर्थात् परिवार से कोई बेवफाई कर रही है। वह प्रेम की ज्वाला में जल रही होती है, जिसपर उसका स्वयं कोई नियंत्रण नहीं है।  

दूसरी तरफ कोमा में पड़े पेशेन्ट का रेस्पॉन्स सिर्फ डॉ. राबिया के लिए ही होता है अन्यथा उसकी अधखुली आँखें पथरा जाती हैं। ऐसे में जब अचेतन अवस्था में ही सही, इस बात से अन्जान कि वह सुन रहा है अथवा नहीं, वह समझ पायेगा अथवा नहीं...ददिया राबिया के प्रेम का एहसास उसे दिलाती है तब उस समय उसकी आँखें बंद हो जाती हैं और स्वास्थ्य में सुधार आने लगता है। यह एक आश्चर्यजनक परिवर्तन है जो मेडिकल साइन्स से परे है।  

ददिया के बीमार होने पर डॉ. राबिया कुछ दिनों के लिए अस्पताल नहीं जा पाती और उसी बीच वह नागरिक ठीक होकर डॉ. राबिया के नाम एक लिफाफ रिसेप्शन में देकर पूर्तगाल चला जाता है। जब डॉ. राबिया वह लिफाफा खोलती है तब ख़त सिर्फ एक कोरा कागज होता है।  

जिस तरह से राबिया को बिना सोचे समझे एक मरते हुए इंसान से प्रेम हो गया उसी तरह से ये प्रेम भी कोरा क़ागज-सा प्रतीत होता है जिसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता। प्रेम एक एहसास है, जो जाति, धर्म, देश से परे है। प्रेम के लिए रिश्तों में बंधना जरूरी नहीं होता, उसे महसूस करना जरूरी होता है अथवा वह प्रेम स्वयं को महसूस करवा जाता है। जब प्रेम होता है तब मनुष्य अपने आप से छद्म करना भूल जाता है और उस समय वह वही होता है जो सदियों से नैसर्गिक रूप से वह भीतर से होता रहा है। रिश्तों के आवरण में बंध कर अपने में प्रेम की नैसर्गिक अस्तित्व को ढ़ूँढ़ने और पाने की छटपटाहट पर आधारित है यह कहानी- ख़ते मुतवाजी। 

ऐसा नहीं है कि राबिया अपने शादीशुदा जीवन में खुश नहीं थी, फिर भी उसके साथ यह अनहोनी हुई। अनहोनी से तात्पर्य अर्धमृत्त व्यक्ति से प्रेम होना तथा विवाहेत्तर प्रेम होना। जिनकी रूहें सदा से एक दूसरे को जानती हों उन्हें किसी रिश्ते में बँधने की जरूरत नहीं। एक नज़र में यह प्रेम करूणा से उत्पन्न छटपटाहट प्रतीत होती है किंतु बाद में स्पष्ट होता है कि राबिया का पेशेन्ट की आँखों में डूब कर प्रेम में पड़ जाना ठिठुरते ठंड में कहीं दूर टिमटिमाते लौ को देखकर तपन महसूस करने जैसा है। सच में, निःस्वार्थ प्रेम कुछ ऐसा ही होता है। पिछले माह फरवरी में वैलेन्टाइन-डे मनाने के लिए एक-एक दिन किसी न किसी प्रतीकात्मक दिन के लिए निर्धारित था, जिसमें लाखों करोड़ों प्रेमी उन दिनों में रोज डे, हग डे, चॉकलेट डे आदि मनाते हुए प्रेम से सराबोर हुए होंगे। लेकिन राबिया के जैसे प्रेम करने वालों की छटपटाहट और कोरा कागज पढ़ कर प्रेम की तृप्ति और निःस्वार्थ रूप से प्रेमी की मनोकामना पूर्ण होने की कामना करने वालों का प्रेम किसी भी विशेष दिन से परे होता है। जिसका अंकन न कोई विशेष दिन कर सकता है और न ही शब्द...


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