सार्थक और महत्वपूर्ण उद्धरणों से सिक्त है अम्बिका सिंह वर्मा की नयी शताब्दी की हिंदी आलोचना

समीक्षा


राजा सिंह, -एम-1285, सेक्टर-आई, एल. डी. ए., कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ


पुस्तक आलोचना को जानने, समझने और आत्मसात करने के लिए बेहद जरुरी किताब है जो अपने आकार प्रकार में भी सटीक संदर्भों, समीचीन उद्धरणों एवं अकाट्य तथ्यों-तर्कों के साथ अपनी सुबोध भाषा शैली में है।

बिना किसी शोर-शराबे के,बिना आत्म-श्लाघा या आत्मप्रशंसा के वर्मा जी चुपचाप साहित्य साधना में लगे रहते है। यही मुख्य कारक है कि पिछले चालिस वर्षो से साहित्य-लीन, उनकी यह पहली प्रकाशित पुस्तक है। यह विचित्र किन्तु सत्य है कि उन्होंने अपने समय के महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में अपने लेखों आलोचनाओं द्वारा स्थान बनाने के बावजूद वे अचर्चित रहे.जबकि उनके लेखन को भावविन्यास, विचारविन्यास, काव्यविन्यास की आन्तरिक-अन्विति को तमाम स्तरों पर देखा जा सकता है लेकिन उनका लेखन और आलोचना समान्य पाठक को आतंकित नहीं करता है।

जबसमाज में विसंगतिया, कुरीतियाँ, विषमतायें अपने पैर फैलाने लगती है और एक बेसहारा निरुपाय आम आदमी उन विषमताओं का शिकार बनता है उन विषमताओं के विरुद्ध लेखकीय प्रतिकार में उनका लेख/आलोचना/समीक्षा चयन काम करती है.-“सियासत में दंगे करना धर्म है.”...जंगलों की बेबसी के लाख चर्चे हो मगर,/जब शहर की बात आई हमको चुप रहना पड़ा.(मृदुल तिवारी)..रस्सियों के सांप लिए अँधेरा है/पूंजीवादी पृष्ठ का कथानक लुटेरा है/देश की तलैया है विदेश का मछेरा है/योजना न जाने शिलान्यास का मरम. (अशोक निर्मल)...उन्हें फिक्र होगी भला आपकी क्या, /जिन्हें रात दिन फिक्र करने का गम है/बड़े काम की ये चीज आई/सियासत में दंगे करना धर्म है. (चारुदत्त)..जुबां बेचीं कला बेचीं, यहाँ तक कल्पना बेचीं/नियत फनकार की अब कंबरी जानी नहीं जाती. (अंसार कबरी)।

उनकी काव्यात्मक, वैचारिक और मानसिक प्रतिबद्धतायें अधिक महत्वपूर्ण होती है, जो इस संग्रह में स्पष्ट परिलक्षित होता है कि उनका लिखा थोड़ा अवश्य है परन्तु निहायत सारगर्भित, समाजिक, राजनैतिक और मानवीयता से परिपूर्ण है... “वैचारिक दर्पण में भारतीय संस्कृति”... “ढेर सारे नक्काल चिरकुटों की भीड़ जमा है.”... “गीत की प्रासंगिकता पर.” और उस समय की कुछ महत्वपूर्ण हस्तिओं पर.. “तृप्ति मुखर्जी.”.... “डॉ. सोमाघोष”... और शम्भू मित्र एवं तृप्ति मित्र के पुत्री सांवली (मै रंगमंच से क्यों जुडी हूँ?)

यह उन निर्बलों की कसक की प्रतिध्वनित करती जो सारे अन्यायों को सहन करने के लिए अभिशप्त होते हुए भी इसके प्रतिकार में कुछ नहीं कर पाते। ये विसंगतियां जीवन के किसी क्षेत्र में हो सकती हैं पर मूलतः ये शासक एवं दबंग वर्ग द्वारा समान्यतया किये जाने वाला शोषण उजागर करती है.समग्रतः जीवन के मर्म को उकेरती उनकी कविताओं में सहज सरल, व संप्रेषणीय भाषा का प्रयोग किया गया है। इस संग्रह में दी गयी उनकी कविता “ध्युत-क्रीड़ा” की कुछ पक्तियां उद्धृत करना चाहूँगा..एक बार फिरध्ध्युत-कीड़ा आरंभ हो गयी है/और झूठी शकुनी-गोटों के हर दांव के साथ/दुर्योधन का जयनाद गूँजने लगा है/द्रोपदी का सहज हुलास डूबने लगा है.. और कविता “क्यों नहीं बदलती ललनाएं”..तथा “आपको पता है?”...”होगा अब सांप यज्ञ” और स्त्री मन को खोलती एक और कविता “धरोहर” दृष्टव है..मैं अनुच्छुक, स्वयं औदस्त से घिरी हुई/अपने अकेलेपन में ही त्राण खोजती हूँ/यही मेरी पारंपरिक नियति है/आत्मिक शांति है-व्यापक अर्थ में/अब वही मेरी धरोहर भी/हो चुकी है। कविताओं को पढ़ते हुए हम कवि के अंतर्मन से गुजरते है और उसके साधारण कथन से उसके विचारों से उसके मन की थाह मिलती है. “कुर्सियाँ” और “अपसगुन का सगुन”।

उनकी कविता पढ़कर मुझे लगा कि वे अपनी बात कहने के लिए तमाम विधाओं का इतेमाल कर रहे है। साक्षात्कार,लेख, सामीक्षा, आलोचना और रंगमंच। इनमंे रिश्तों की जटिल परतें, सम्वेदनशीलता, रंगकर्म और अभिनय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती है। उनमे गहरी राजनीतिक समझ है। न हडबडाहट, न जल्दबाजी, न कोई दिखावा, चुपचाप अपना काम करने में भरोसा। प्रचार प्रसार की वैसी भूख नहीं जैसी की आम तौर पर पायी जाती है। बुद्धिजीवी होने के बावजूद अपना प्रभामंडल बनाने के कोशिश कभी नहीं की।

आलोचना संग्रह समाज,राजनीति धर्म भावात्मक संबंधों आदि के विषय में कुछ सवाल उठता है और हमें सोचने को मजबूर करता है।

समकालीन महिला कथाकारों की रचनाओ पर एक दृष्टि डालते हुए वह कहते है कि-वर्तमान कथा परिदृश्य में महिला कथाकारों ने सक्रिय भागीदारी निभाते हुए अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। उनके महत्वपूर्ण रचनात्मक प्रयत्न के केंद्र में समसामयिक जीवन संदर्भों के परिपेक्ष्य में विभिन्न रूप और आकार लेती स्त्री चेतना है। उनकी स्त्री अब रूमानी आदर्श नहीं रह गयी है.वह हमारे समय की जीवंत वास्तविकता है,एक ठोस सच्चाई है। वह अपने वजूद को महसूस करती है.एक सजग इकाई के रूप में वह तमाम यथार्थ स्थितिओं से प्रतिकूल हो तो वर्तमान सामाजिक परिवेश के अन्तर्विरोधों व असंगतिओं को अपनी व्यक्तिमता,स्त्री अस्मिता और मानवीय स्थिति के परिपेक्ष्य में जानना समझाना चाहती है,उनका विश्लेषण-विवेचन करने का प्रयास करती है...इस कोण से महिला कथाकारों ने समकालीन परिवेश में स्त्री-समाज की त्रासदी और विडम्बना,उसकी शोषित स्थिति, उसकी समाजिक और आर्थिक पराधीनता,सदियों से चले आ रहे स्त्री सम्बन्धी स्मंती मूल्यों,रूढ़िगत मान्यताओं और धारणाओं से जुड़े प्रशनों को खुले, तीखे व साहसपूर्ण ढंग से अपनी कहानिओं के माध्यम से हमारे सामने रखा है..पश्चिम की आर्थिक प्रगति और उसके नए पुराने जीवन मूल्यों की चकाचैध के बरबक्स अपने अन्धविश्वासी,अर्धशिक्षित,पिछड़ेपन और हीनताबोध से ग्रसित भारतीय समाज की नियति और अंतर्विरोधों से रूबरू होने की कोशिश महिला रचनाकारों में परिलक्षित की जा सकती है.(समकालीन महिला कथाकारों में स्त्री चेतना का सन्दर्भ) चूंकि वह सक्रिय रंकर्मी भी रहे है इसलिए उनके रंगमंच के विषय में लेखों और आलोचनाओं में गम्भीर चिंतन, मनन,और अध्धयन के फलस्वरूप उपजी आलोचना बौद्धिक और प्रतीकवादी है उनमे गंभीर जीवन दर्शन है, जो उद्धहरणों से पूर्णतया युक्त है। रंग कर्म लेखकीय आलोचना में उन्होंने कोई अपनी स्थापना प्रस्तुत नहीं की है.-इस थिएटर के माध्यम से कुछ महत्यपूर्ण, कुछ विशिष्ट कुछ और सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि रंगमंच पर कोई भी, कही से भी प्रवेश कर सकता है। थिएटर के अलावा और कोई माध्यम ऐसा नहीं है,जो ट्रेंड-अनट्रेंड सबको इस तरह से हँसकर गले लगाता है... “-जब जब मनुष्य की आत्मा अनंत के आलोक की एक गहरी झलक ग्रहण कर लेती है। वह चित्रकला, कविता या गीत में प्रस्फुटित हो जाती है.मनुष्य तब तक इस आलोक किरण को ग्रहण नहीं कर पाता जब तक उसकी दृष्टि अस्तित्व के गहन सत्य को स्वय में समोहित नहीं कर लेती.” (महाकवि रविन्द्र नाथ टैगोर)..-इसमें शायद ही दो मत हो कि कारंत का सम्पूर्ण जीवन निरंतर रंगकर्म और अनवरत रंग-चिंतन दोनों को अपने केंद्र में बनाये रखने अद्भुत साधना का प्रमाण है। वह अपने समकालीन रंग-समाज को अपने विस्तृत अंग अनुभव और रंग-चिंतन के माध्यम से व्यापक विचार विमर्श का सहभागी बनाये जाने का ठोस प्रयत्न करते है... “-संगीत मेरे अस्तित्व का अभिन्न अंग है.वह मेरी रचनात्मकता का सबसे सबल पक्ष है। फिर मै अपाने काम में अपनी शक्ति का प्रयोग क्यों न करूं...मै संगीत को भाषा मानता हूँ। मेरे लिए वह संवाद और सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है.मै नाट्य संगीत को भाषा का हिस्सा मानता हूँ.”(बी.व्.कारंत)..-रंग संगीत को नाट्य-प्रस्तुति में सर्वाधिक महत्व देने या उसको मूल आधार देने का तर्क औचित्य और आवश्यकता कई रूपों में कारंत को उद्द्लित करती रही है..-“इसलिए अभिनय इस तरह से करना उचित है,जिससे अंतर का आवेग का काव्य अनायास अभिव्यक्ति पा सके। केवल यथार्थवादी भंगिमा से हम प्रयासपुर्वक भी यह न कर सकेंगे। कोशिश यह करनी चाहिए कि उसके साथ-साथ अंतर की बातें भी अत्यंत सहज भाव से उन्मुक्त हो, अर्थात इन दोनो स्तरों पर संचरण अत्यंत ही सहज हो, वाह्य-जीवनऔर अन्तरंग जीवन दोनों ही एक दुसरे में अंतर्लीन होकर एकांगी रूप वर्तमान रहें। (शम्भु मित्र)”...

मुझे कविता लिखने में अपने आप से जितना संघर्ष करना पड़ता है उतना ही आलोचना लिखने में भी। आलोचना लिखना मेरे लिए उतना ही जिंदा काम है जितना कविता लिखना। (प्रसिद्ध कवि आलोचक मलयज)। अपने जीवन में इस आदर्श को पूरी तरह चरितार्थ करने के कारण ही, शायद इसलिए वह कम मात्रा में में रच सके हैं।

जैसा की भाई राजकुमार सिंह इस संग्रह के संपादक ने कहा है, “गुरुवर कवि, रंगकर्मी और आलोचक की रचनात्मक आलोचनाओं में माक्र्ससवादी या सौष्ठववादी या शैलीवादी,तात्विकवादी या मिथकीय आलोचना-समालोचनाओं का कोई विशेष या पूर्वाग्राही आग्रह संचयन में दिखाई देगा। इसका सीधा और साफ मतलब है, गुरुदेव को किसी बंदिशों या दायरों में रहना पसंद नहीं। जाहिर सी बात है कि उनकी आलोचना कृति पर आधारित रही है, किसी कृतिकार विशेष पर नहीं.” इस बात से पूर्णतया सहमत हुआ जा सकता है कि उन्होंने सदैव कृति पर ध्यान दिया है नाकि कृतिकार पर जैसा कि इस संग्रह में परिलक्षित होता है। यहाँ एक बात और भाई राजकुमार सिंह की उद्धृत करना चाहूँगा कि, “मेरे बड़े भईया व गुरुदेव अम्बिका भाई साहेब में साहित्यिक नैतिकता कूट कूट भरी है.” इसी कारण उन्होंने कभी अपने निकट के लोगों के विषय में कुछ ना लिखा न कहा सिवाय उस प्रकरण का जिसका जिक्र भाई राजकुमार सिंह ने किया है. उनकी कहानी “शवासन” उनका संक्षिप्त समीक्षा के कुछ अंश उद्धरित है.. “आत्महत्या के विरुद्ध “शवासन” एक बहुत बड़ी कहानी लगती है..” कहानी की भाषा प्राणवान है, सन्दर्भों व कथा स्थितियों को व्यक्त करने में मेरी समझ से सक्षम है। इस हद तक कि कथाकार कहानी को शीघ्र समाप्त करने की धुन में अपनी रचनात्मकता, अपने संयम व कलात्मक समर्थ में ढील देता है।”

और अंत में शीर्षक लेख “नयी शताब्दी की हिंदी आलोचना” जो निहायत उम्दा और महत्वपूर्ण लेख ही नहीं बल्कि सार्थक और कालजयी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। वे लिखते है, “नयी शताब्दी में यानी उसके शुरुआती चार वर्षों में आलोचना उसी रूप में प्रवेश कर चुकी है जिसे पिछली शताब्दी के आखरी दशकों में उसने ग्रहण किया था.-यह उसकी प्रकृति यानि धैर्य,आत्मानुशासन, ठोसपन और आश्वस्तिपरकता इत्यादि गुणों के कारण सम्भव होता है.”... “बीसवी शताब्दी में विभिन्न साहित्यिक विधाओं में हुई आधुनिक रचनाशीलता को और काफी पहले साहित्य यानि पूर्व प्राचीन व मध्ययुगीन काव्य साहित्य को भले ही थोड़े विलम्ब से सही हिंदी आलोचना ने अपने विभिन्न रूपों, आयामों और स्तरों पर गहराई से जानने-समझाने, विस्तुत और व्यापक सन्दर्भों में विवेचित विश्लेषित करने एवं हिंदी सहित्य के बड़े पाठक वर्ग तक उसकी विशिष्टताओं, गुणों को ही नहीं बल्कि उसके कमजोर और हलके कोणों को भी चुनने का प्रयास किया है।” 

यहाँ मै कहना चाहूँगा कि वर्तमान शती में भी यह कहना मुश्किल है कि आलोचना पूर्णतया निष्पक्ष और अचयनित की श्रेणी में है। क्या आलोचना प्रसिद्ध, प्रसंशित, प्रचारित,प्रतिष्ठित के इर्द-गिर्द नहीं घूमती है? इस बात की स्वीकरोक्ति उन्होंने इस तरह से की है, “हाँ यह भी हमें स्वीकार करना होगा कि कई बार और कई स्तरों पर गहरी संवेदनशील दृष्ट व आत्मानुशासन की कमी के चलते ये प्रयास अधूरे और अपर्याप्त रह जाते है, तो कुछेक स्तरों पर ईमानदारी के अभाव, पक्षधरता और पूर्वाग्रहों के चलते तटस्थ और समुचित मूल्यांकन से दूर चले जाते है, परिणामस्वरुप हिंदी आलोचना की यह प्रवति जेनुइन रचनाकारों और प्रवुद्ध व जागरूक हिंदी पाठकों के कोपभाजन के प्रति आलोचना का शिकार भी रही है।” वह आग्रह करते हुए कहते है कि, आलोचक के लिए इसलिए भी यह जरुरी है ताकि भविष्य में कोई जेनुइन रचनाकार निराला के शब्दों में हेरफेर कर यह शिकायत न कर सके कि, “मै अलक्षित रह गया हूँ।”

“अपने सर्वोत्तम क्षणों में रचना आलोचना होती है,जबकि आलोचना को अपने सर्वोत्तम क्षणों में रचना होना चाहिए।” इस रचना के आदर्श के अनुपालन में वर्मा जी का रचना कर्म रहा है, और इसके प्रतीक रूप में इस आलोचना पुस्तक को देखा जाना चाहिए।                                 

आलोच्य पुस्तकः -नयी शताब्दी में हिंदी आलोचना, लेखकः अम्बिका सिंह वर्मा, चयन एवं सम्पादनः राजकुमार सिंह, प्रकाशकः विकास प्रकाशन, कानपुर, मो. 9415200724

  

  


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