गुलाबी हाथी

दीपक शर्मा, लखनऊ, मो. 9839170890

उनसे पहले उनका सामान आया था... दो कुलियों के साथ...एक बड़ा सूटकेस, वी. आई. पी। एक मीडियम स्काए बैग जिसके हत्थे पर लगे लेबल हाल ही की किसी हवाई यात्रा की सूचना दे रहे थे। एक लंबी प्लास्टिक टोकरी, जिसकी जाली के बीच की खाली जगहों से सेब, नाशपाती और थरमस के साथ लिफाफे में लिपटी एक बोतल देखी जा सकती थी।


फिर वह लड़की आई थी...अपना एक हाथ अपने कंधे से झूल रहे अपने सुनहरे बटुए पर टिकाए और दूसरे हाथ में एक हल्का रूमाल सँभाले।


‘‘पंद्रह और सत्रह नंबर कहाँ पड़ेंगे?‘‘ लड़की ने पूछा।

‘‘यहीं दरवाजे से एकदम पहले,‘‘ किसी एक कुली ने कहा।

‘‘असल में पहले यह कोच भी ए.सी. वन का हिस्सा था, दूसरा कुली बोला, ‘‘फिर जब ए.सी. टू में भीड़ बढ़ने लगी तो इसे काट कर ए.सी. टू में बदल दिया गया।

‘‘क्या बात है?‘‘ वे अब आए थे।

आला कमान। रौब और झुँझलाहट से संपूर्णतया संग्रथित।

‘‘बेबी अपनी सीट‘‘ की बाबत पूछ रही थी, लड़की की बजाए किसी एक कुली ने उत्तर दिया।

‘‘बेबी?‘‘ वे झुँझलाए। लड़की और उनकी उम्र में बीस साल का अंतर तो जरूर ही रहा होगा।

‘‘मेम साहब, सर, कुली ने फौरन ‘‘बेबी‘‘ शब्द अपने पास लौटा लिया, यही पूछ रही थीं।‘‘

‘‘अभी भी पूछ रही थी? खट से वे गुर्राए, ‘‘कल भी यही पूछ रही थी। पिछले दस दिनों से यही पूछ रही हैं...‘‘

‘‘सामान हमने टिका दिया है, सर‘‘, एक कुली बोला, ‘‘जाएँ?‘‘ इधर धामपुर में यह हावड़ा मेल बस कुल जमा पाँच मिनट ही रुकती है।‘‘


‘‘बेशक,‘‘ पचास का एक नोट उन्होंने कुलियों की तरफ बढ़ा दिया।

‘‘नहीं साहब,‘‘ दोनों कुली एक साथ चीख पड़े, ‘‘पचास का एक नोट नहीं चलेगा। दो नोट चाहिए होंगे।‘‘

‘‘चलो,‘‘ पचास का एक नोट उन्होंने अपने बटुए से निकाल लिया, ‘‘अब तो खुश हो न?‘‘

‘‘हाँ, हजूर,‘‘ दोनों कुली मुस्कुरा पड़े।

‘‘यह पंद्रह और सत्रह नंबर मैंने एडजस्ट कर दिए हैं, सर!‘‘ गाड़ी के गतिमान होते ही मैं उनके पास पहुँच लिया। ‘‘हमारी बड़ी बिटिया की शादी अगले सप्ताह पड़ रही है, सर उसके मनोरथ भी कुछ दे दिया जाए...‘‘

‘‘धामपुर से सहारनपुर तक ही तो जा रहे हैं,‘‘ वे ठठाए, ‘‘अदनवाटिका नहीं। फिर तुमसे कोई रसीद नहीं माँग रहे। टिकट नहीं माँग रहे। पंद्रह और सत्रह नंबर की ये सीटें यों भी तो खाली ही जातीं...खाली जा ही रहीं थीं...नहीं क्या?‘‘

‘‘जी सर,‘‘ मैं तनिक झेंप गया, ‘‘फिर भी हमारा थोड़ा ध्यान रख लिया जाए। दो हजार तो दे दिया जाए।‘‘


उन्होंने पहले अपनी रिवाल्वर अपनी पेटी से अलग की, फिर अपना बटुआ दोबारा बाहर, निकाल लिया।

‘‘ठीक है?‘‘ पाँच-पाँच सौ के चार नोट उन्होंने मेरी हथेली पर गिन दिए।

‘‘थैंक यू, सर,‘‘ मैंने कहा, ‘‘अटैंडेंट उधर ए.सी. वन की तरफ सोने निकल गया है। उसे खोज कर आपके बिस्तर आपको पहुँचाए देता हूँ।‘‘

‘‘बिस्तर के लिए अब किसी को जगाइए नहीं,‘‘ वे उदार हो लिए, ‘‘हमने अच्छा गर्म कपड़ा पहन रखा है। तिस पर इधर ऐयर कंडीशनिंग है, ठंड महसूस नहीं हो रही...‘‘ बाहर शुरू जनवरी की बर्फीली रात अपनी पराकाष्ठा पर थी।

‘‘जैसी आपकी आज्ञा सर,‘‘दुष्करण की समूची रकम अब मेरी हो गई थी।


‘‘पानी‘‘ अपने ब्रीफकेस के कुछ नंबर घुमा कर उन्होंने उसमें से एक बोतल निकाल ली। लड़की ने प्लास्टिक की टोकरी में धरी एक थरमस में से ढक्कन के नीचे छिपे गिलास में थरमस का पानी उड़ेल दिया। पानी गर्म था। भाप छोड़ता हुआ गर्म।

‘‘आप ब्रांडी लेंगे?‘‘ बोतल के कुछ अंश उन्होंने थरमस के ढक्कन में मिला दिए। मेरी निर्धारित सीट उनके ठीक सामने पड़ रही थी।

‘‘आप लीजिए, सर,‘‘ मेरी लार टपक आई।

‘‘मैं भी ले रहा हूँ‘‘ थरमस के ढक्कन में उन्होंने ब्रांडी की मात्रा बढ़ा दी।

‘‘लीजिए,‘‘ ढक्कन उन्होंने मेरी ओर ला बढ़ाया।

एक बड़े घूँट के साथ मैंने वह ढक्कन खत्म कर दिया।

‘‘और लीजिए,‘‘ थरमस और बोतल उन्होंने मेरी सुपुर्द कर दी, ‘‘नेपोलियन ब्रांडी है। आपको शीत से दूर रखेगी।‘‘

‘‘नहीं सर,‘‘ झूठा विरोध प्रकट कर लेने के बाद मैं तत्काल मदिरासक्ति में डूब लिया।


अपने खंड की सभी बत्तियाँ बुझा कर वे लेट लिए, सत्रह नंबर पर। लड़की पंद्रह नंबर पर लेट गई।

अपनी मध्यधारा की अधबटाई के बीच मुझे दरवाजा खुलने की आवाज आई तो मैं उठ खड़ा हुआ।

तत्काल।

‘‘आप चालू रहिए‘‘ दरवाजे पर वही थे। आला कमान।

‘‘जी सर,‘‘ मैंने उनकी आज्ञा स्वीकारी।

‘‘मेरी डायरी उधर बाथरूम के अंदर गिर गई है।‘‘ उन्होंने लड़की को आन जगाया, ‘‘उसे ले आओ...लड़की की पीठ जैसे ही दरवाजे पर दिखाई दी, वे फुरती से उठे और लड़की के सुनहरे बटुए पर झपट पड़े, बिना आधा पल गँवाए उन्होंने अपना ब्रीफकेस खोला और बटुए के सभी वर्णित विषय उसमें उलट कर उसे बंद कर दिया।

खाली, सुनहरे बटुए के साथ वे दरवाजे से बाहर लपक लिए।

लौटे तो खाली हाथ लौटे। तभी मैं उठ खड़ा हुआ। दरवाजे के पार कोई न था। बाहर निकल कर मैंने दोनों बाथरूम देखे।

दोनों खाली थे। धुंध अँधेरे और तेज ठंड के बीच गाड़ी द्रुतगति से आगे बढ़ रही थी, आगे बढ़ती रही।


‘‘क्या है?‘‘ वे भी दरवाजे के बाहर निकल आए।

‘‘वे कहाँ गईं? मैंने पूछा।

‘‘कौन?‘‘

‘‘आपकी लेडी सवारी?‘‘

‘‘लेडी सवारी?‘‘ वे हँसे,

‘‘या गुलाबी हाथी?‘‘ मैं चैंका, ‘‘माने?‘‘

‘‘नेपोलियन की तहत आप बहक रहे हैं...मतिभ्रम में, दृष्टि भ्रम में, श्रुतिभ्रम में निर्मूल-भ्रम में...‘‘

‘‘नहीं सर,‘‘ मैंने प्रतिवाद करना चाहा।

‘‘डयूटी के समय मदिरा सेवन की सजा जानते हैं टी .टी . साहब?‘‘ उन्होंने मुझे ललकारा।

‘‘जी सर,‘‘ मेरी बोलती बंद हो गई।

दरवाजा पार कर मैं अपनी निर्धारित सीट पर लौट आया। जल्दी ही मेरी घबराहट नींद में बदल ली।

नींद मेरी टूटी तो मैंने गाड़ी को खड़ी पाया। सामने नजर दौड़ाई तो पंद्रह और सत्रह मुझे खाली मिली। सामान और थरमस भी गायब थे।

इस कथायोग की लुप्त कड़ी मुझे मेरी वापसी यात्रा के दौरान प्राप्त हुई।


धामपुर अभी पच्चीस मील की दूरी पर था जब एक स्त्री-स्वर ने मुझे पीछे से पुकारा, ‘‘आपकी बड़ी बिटिया की शादी कब है?‘‘

‘‘कौन बड़ी बिटिया?‘‘ उस एक पल के लिए मैं भूल गया कि सीटों के ‘‘एडजस्टमेंट‘‘ करते समय मैं अकसर एक ‘‘बड़ी बिटिया‘‘ का पिता भी बन जाया करता था। जबकि संतान के नाम पर मेरे पास मात्र दो बेटे ही थे।

‘‘देखिए‘‘ स्त्री-स्वर ने कहा, ‘‘अभी दो दिन पहले की बात है। घड़ी में ऐसे ही बारह बज कर तेरह मिनट हो रहे थे जब इसी हावड़ा मेल में एक हादसा हुआ था...‘‘

‘‘कैसा हादसा?‘‘ मैं काँपने लगा।

धामपुर से एक दंपत्ति हावड़ा मेल में सवार हुए थे, पंद्रह और सत्रह नंबर वाले...

‘‘वे दोनों बर्थ उस दिन खाली गए थे,‘‘ मैं मुकर गया, मेरे पास रिकार्ड है, पूरा रिकार्ड है।

‘‘आप याद करिए। पुरुष के पास एक रिवाल्वर था और लेडी सवारी के हाथ का बटुआ सुनहरा था सोने की तरह चमकीला...‘‘

‘‘कतई नहीं,‘‘ मैं फिर मुकर लिया।

‘‘मैं नहीं मानती,‘‘ स्त्री-स्वर ने एक पहचानी लड़की की आकृति धारण कर ली, ‘‘एक लड़की की लाश इस रेलपथ पर मिलने की सूचना आज की अखबार में भी छपी है। कहें तो अखबार दिखाऊँ?‘‘

लड़की ने अपने हाथ एक बटुए की ओर बढ़ाए।

‘‘उस लड़की का बटुआ?‘‘ छिटक कर मैं उस आकृति से दूर जा खड़ा हुआ।

‘‘यह बटुआ आपके पास कैसे आया?‘‘ मैंने पूछा।

‘‘यह मेरा है,‘‘ आकृति की दिशा से हँसी फूट ली।

‘‘कौन हो आप?‘‘ मेरी जीभ सूख चली।

‘‘गुलाबी हाथी।‘‘

सुनहरे बटुए वाली वह लड़की आज भी मुझे उस कोच में जब-तब दिखाई दे जाती है, किंतु जब भी मैं यह पता लगाने का प्रयास करता हूँ कि उसके दूसरे हाथ में उसका रूमाल उसके साथ है या नही, वह अदृश्य हो लेती है।


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