‘‘भारत का राग अमेरिका के रंग’’

 उपन्यास का एक अंश


डाॅ. हरि जोशी

कम समय में ही इस पुण्यभूमि का काफी अध्ययन मनन कर एक दिन तीनों बैठे बैठे झक याने मक्खीमार रहे थे। अचानक चाय पीने का मन हुआ। चाय पीने से पहले पानी जब मंगाया गया तो पानी का गिलास थामे थामे शीतल ने इशारा किया। यद्यपि अमेरिका बोतलों और गिलासों से डूबा पड़ा है, लेकिन हिन्दुस्तान भी तो एक गिलास ही है। आधा भरा हुआ।

व्यंग्य बोला- मैं तो सोचता हूं दोनों ही आधे भरे हुएं, आधे अधूरे हैं। हिन्दुस्तान पानी से और अमेरिका बीयर से। अमेरिका का गिलास बीयर से इसलिए भरा हुआ है, क्योंकि यह एक विज्ञापन पर टिका हुआ देश है, सेव वाटर, ड्रिंक बीयर। याने बीयर पीयो पानी बचाओ। बीयर की बहुतायत है, इसलिए सचमुच में लोग बीयर पीकर पानी बचाते रहते हैं। वैसे यहां के पानी में भी नशा है।

हास्य ने अपना राग अलापा मंदिर मस्जिद बैर कराते मेल कराती मधुशाला। इसीलिए सभी देशों, सभी जाति धर्मों के लोग यहां आकर अपने अपने धर्मों को पीछे छोड़ केपीटेलिज्म-कन्ज़्यूमरिजम को ही अपना धर्म समझने लगते हैं। किसकी इच्छा मधुशाला में जाने की नहीं होगी। भले ही कम समय के लिए दे, नशा भी प्रभुता देता है जिसे पाकर किसे मद नहीं आता?

दोनों देशों के पानी का अलग अलग प्रभाव है। हिन्दुस्तान में पानी की ही नहीं पानीदार लोगों की भी बहुत कमी है? केवल विशिष्ट जन ही पानीदार रह सकते हैं। जो रिश्वत, सिफारिश चमचागिरी और भाई भतीजावाद के सुखसे संपन्न हैं वही लोग पानीदार रह सकते हैं। इसीलिए यहां के एक विज्ञापन पर ध्यान दिया जाता है, पानी का मोल पहचानिये। सामान्यजन सारा पानी बाहुबलियों, देश के कर्णधारों पर चढ़ा देते हैं। 

साधारण पानी ही नहीं, सोने का पानी भी। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मोरा। इसीलिए गरीबों के चेहरों का पानी उड़ा रहता है। भारतीयों के सारे काम ऊपर वाले के भरोसे होते हैं। तभी चैन की नींद सो पाते हैं। राम भरोसो राख के तुलसी निर्भय सोय, होनी अनहोनी नहीं, होनी होय सो होय।

भारत में बरसात की बाढ़ वाला सारा पानी समुद्र में चला जाता है और गर्मी का घाम, मनुष्य का दिल और धरती का जल, दोनों को जला जाता है। सदा सर्वदा ग्रीष्म में पानी की कमी रहती है। प्रतिवर्ष बाढ़ से तो हाहाकार होता ही है, गर्मी में लू द्वारा नरसंहार भी होता है। नहाने का जो आनंद अमेरिका में है वह हिन्दुस्तान में कहां? बाथटब में गर्म पानी में कितनी भी देर रहें। चैबीसों घंटे गर्म पानी उपलब्ध रहता है। इसीलिए वे कुछ भी करने को स्वतंत्र रहते हैं, बाद में नहा लो। यह बात शीतल ने दोनों मित्रों को बतायी

व्यंग्य ने प्रतिक्रिया दी भारतीय लोगों ने जीवन के अर्थ को समझने में ही जीवन खपा दिया और पाया क्या? निर्धनता। जिसमें जी-जीकर जीवन का अर्थ समझ रहे हैं।अमेरिका दुनिया के लिए चुंबक इसीलिए बना हुआ है क्योंकि उसने एक सूत्र दे दिया है कि जीवन में अर्थ का ही अर्थ है बाकी सब अनर्थ है। कई बार लोग पढ़े होते हैं, गुने नहीं होते।।

अधनंगे रह लेते हैं, भूखे रह लेते हैं फिर भी कहते हैं सुखी हैं। पश्चिमी देशों में तो भूखे काम न होई गोपाला किन्तु भारत में विचित्र सोच है। नहाने के बाद भजन करने की प्रथा है, फिर भोजन की। स्पष्ट है भूखे रहकर भी भजन करते हैं। आश्चर्य की बात यह है दरिद्र हैं फिर भी संतोषी हैं। उनका असंतोष जब तक बाहर की दुनिया को नहीं देखते, नहीं बढ़ता। असंतोष बढ़ाना है तो उन्हें अमरीका दिखा दो हास्य ने कहा- 

आप लोगों ने भी देखा था उस दिन एल. ए. के एक पार्क में एक होमलैस, लंबा चैड़े डील डौल का काला आदमी अकेला पड़ा हुआ था। पहले चुपचाप पड़ा था। जब तक शांति से पड़ा था किसी का ध्यान उधर नहीं गया। सारे स्वास्थ्यचेता अपनी अपनी कसरत कर रहे थे, दौड़ लगा रहे, योगासन कर रहे थे। इसी बीच स्वगत ही पहले तो वह बड़बड़ाने लगा। फिर जोर जोर से चीखने लगा। बहुत देर तक चीखता रहा पूरे पार्क को गुंजाता रहा, पार्क में कम से कम सौ लोग तो होंगे ही लेकिन सबने उसे अनसुना किया।अमेरिका के लिए यह कोई नई बात नहीं। ऐसा कई बार होता रहता है कोई किसी अनजान से इसलिए बात नहीं करता पता नहीं सामने वाले की मानसिक स्थिति कैसी हो ? कोई हथियार उसके पास न हो ? पढ़ा लिखा दिखायी देता है तो मुस्कुराकर हैलो हाय अवश्य करते हैं। शीतल ने कहा-

दायें बायें हास्य और व्यंग्य को लिए हुए शीतल लॉस एंजेलिस की सड़कों पर घूम रहा था कि व्यंग्य की निगाह पार्क में पड़े हुए एक दूसरे बर्राते हुए आदमी पर पड़ी हास्य ने भी उस आदमी को देखकर व्यंग्य से पूछा कहो भाई कैसी रही ?

प्रतिक्रिया में व्यंग्य बोल पड़ा यह कोई नई बात नहीं है। भारतीय आदमी भी कलारी के पेय का आनंद लेते हुए कहीं पास की जमीन पर पड़े रहकर, घंटे चार घंटे के लिए प्रधानमंत्री पद पर कब्जा जमाये रहता है। देख लें अमेरिका का महत्वाकांक्षी नागरिक भी पार्क में पड़ा पड़ा हुआ राष्ट्रपति बना हुआ है कि नहीं? यह अलग बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री प्रायः दबे कुचले हुए मौनी बाबा बने रहते है जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति जोर जोर से बर्राते हुए देखे जा सकते हैं। पीने के बाद ऐसे सारे प्रधानमंत्री, सभी राष्ट्रपति अपना धर्म तथा अपना धन भूलकर धार्मिक समभाव तथा आर्थिक समस्तर पर पहुंच जाते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति भी चप्पे चप्पे पर बड़बड़ाते हुए दुनिया को चुनौती देते हुए दिखायी दे जाएंगे। गनीमत यह होती है कि वहां न नालियां खुली रहती न कुत्तों को खुले आम घूमने दिया जाता अन्यथा उन्हे भी चप्पे चप्पे पर कई राष्ट्रपति जलाभिषेक करने को तो मिल ही जाते? आगे की कार्यवाही के लिए भले ही भविष्य का कोई दिन तय कर लेते?

भारत में नालियां खुली रहती हैं जिनमें गिरकर यहां के प्रधानमंत्री निर्द्वन्द्व होकर बर्राते रहते हैं। ऐसे ही खुले हुए मुंह का लाभ लेकर भारतीय श्वान जलाभिषेक करने का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहते। जिसके परिणामस्वरूप वे प्रधानमंत्री आचमन करने का आनंद प्राप्त करते हैं। अमेरिका में कोई नाली खुली ही नहीं मिलती अतः यहां वैसा आनंद प्राप्त नहीं किया जा सकता। हास्य ने मुंह खोला-

वहां किसी लायसेंस की जरूरत नहीं होती अतः पाकिस्तान में, ईराक में ड्रोन हमले तथा अपनी ही जमीन पर,प्रेम के त्रिकोण हमले प्रायः देखे जाते हैं कभी दोस्ती कभी दुश्मनी, कभी संग साथ, कभी तलाक। फिर भी वहां के लोगों का पानीदार बने रहना स्वाभाविक है, लॉस एंजेलिस तो बीचों के बीच बसा हुआ शहर है। आसपास समुद्र ही समुद्र,पानीदार नहीं होंगे तो लोग और क्या होंगे? शीतल ने जानकारी दी-

कुछ दिन पहले वाशिंगटन डी.सी. में एक मनमौजी ने आत्मिक शांति के लिए पंद्रह लोगों को गोली से भून दिया। परसों लास एंजेलिस में एक अन्य संतप्त ने खुद के भोगे हुए नर्क से निकालकर दस बीस को स्वर्ग भेजने की सफल कोशिश की थी। कल शिकागो में एक शूरवीर ने दस को निपटा दिया। उड़ा देने वाले यहां के ऐसे कार्यक्रम यत्र तत्र होते ही रहते हैं यह सामान्य बात है। मेरे विचार से अखबारों में एक दैनिक स्तंभ होना चाहिए जिसमें स्थान और लोगों की संख्या घटनानुसार भर दी जाया करे हास्य बोला- 

व्यंग्य ने दुनिया के इस चैधरी के बारे में अपना मत रखा-अमेरिका एक ढोल है जो समूचे विश्व में जोर जोर से बज रहा है जिसकी आवाज दूर दूर तक पहुंच रही है। किन्तु ढोल जितना विशाल होता है, वह उतनी ही बड़ी पोल लिए रहता है। प्रत्येक ढोल में पोल तो होती ही है ढीलपोल भी होती है। कोई सिरफिरा स्नोडेन या विकिलीक्स जब बता देता है कि ढोल में कहां कहां कितनी बड़ी पोलें हैं तो ढोली संटियां लेकर उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाता है। फिर वह ढोल को पीटना छोड़ उस देशद्रोही पर हाथ जमाना शुरू कर देता है कि सार्वजनिक तौर पर उसने पोल क्यों बतायी ?

ऐसे हाथियों के लिए ही कहावत कही गई है कि हाथी के खाने के दांत और होते हैं और दिखाने के और। जानता तो वह स्वयं भी है कि उसके ढोल में कहां-कहां और कितनी जगह पोल है पर वह उसे ठोस बताते नहीं अघाता? अपने को ठोस घोषित कर दूसरों को ढूंसा मारने में आसानी होती है। शीतल ने बैंड बजाने वाले की मानसिकता बतायी।

यही तो इसकी विशेषता है कि अपने देश में बैंड नहीं बजने देता दूर दराज के किसी देश में बैंड बजाकर अपने घर उड़कर सुरक्षित आ जाता है। व्यंग्य ने वचन उचारे-

हास्य ने मत दिया सचमुच में वहां ढोल नगाड़ों की कोई कमी नहीं। जंगल भरपूर हैं, ढोल नगाड़े बनाने में कोई कठिनाई नहीं। तरह तरह की चमड़ी, बीफ खाने के कारण गायों बैलों की चमड़ी, प्रतिदिन चट किये जाने वाले असंख्य अन्य पशुओंकी तथा स्वयं की मोटी चमड़ी तथा मोटी मोटी लकड़ी भी खूब उपलब्ध है। इसीलिए यह बात देखी जाती है कि जिसने इस देश का थोड़ा भी बाजा बजाया कि यह, उसके घर में घुसकर उसका पूरा बाजा बजाकर आता है। बढिया बैंड मास्टर है। विभिन्न ड्रेसों में कई कई बैंड हमेशा तैयार ही नहीं रखता,बिगुल बजाकर छोटे देशों को मुर्गा बनाकर उनकी ड्रेसिंग कराता और चट कर जाता है।

जरूरत पड़ने पर बिगुल बजा देता है। बगुला भगत भी बन जाता है। नाश्ते में बेगल खाता है। बगली दांव मारने में सिद्धहस्त है। बंगाल का जादू तो नहीं जानता पर नरसंहार करने में उसकी बगल में या उसके पासंग में क्रूर से क्रूर बैठ नहीं सकते? जापान, वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान आदि आज भी उसका निरंतर जाप करते रहते हैं। व्यंग्य बोला-

दुनिया भर में स्वस्थ प्रजातंत्र स्थापित करने के उद्देश्य से दूसरे देश में जाकर ठोकता पीटता है, इस तरह अपना नगाड़ा बजाकर चैधराहट की चाक चैबंद धाक जमाये रखता है। हास्य ने कहा-

पर उसके देश में ही जगह जगह जो नरसंहार हो जाते हैं उनको तो रोक नहीं पाता। मानसिक रूप से विक्षिप्त या कोई भी गुस्सैल, संतप्त व्यक्ति, मशीनगन की सहायता लेकर स्वयं के भोगे हुए अमरीकी नर्क से निकालकर, दस बीस को स्वर्ग भेज देता है। व्यंग्य ने बताया-

वहां बच्चों को खिलौनों के रूप में मशीन गन, स्टेनगन देने की आम प्रथा है। ताई क्वांडो, जूडो कराटे और डिशुंग डिशुंग के खेलों का प्रशिक्षण बहुत लोकप्रिय है। बच्चा बच्चा वी.डी.ओ.गेम्स, टी. वी. सीरियल्स में भी हिंसा सेक्स और मार धाड़ देखकर प्रेरणा लेता रहता है अतः बचपन से ही वह ठांय ठांय करना सीख लेता है। संवैधानिक तौर पर प्रत्येक नागरिक को अपनी स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए हथियार रखने की भी पात्रता है। बस फिर क्या है, खिलौनों से अभ्यास करते करते तथा खेल खेल में झूट मूट मारते हुए वे सचमुच में मारने लगते हैं। शीतल ने बतलाया किन्तु वहां तो प्रत्येक शहर में दिनरात पुलिस के वाहनों के सायरन बजते ही रहते हैं? हर घंटे दो घंटे में वह डरावनी आवाज आसपास गूंजती ही रहती है। हेलीकॉप्टर से भी अनवरत पुलिस पहरा चलता रहता है। सामान्य नागरिक भी सतर्क रहता है कि कॉप की आंखें कहीं उसपर न हों ? फिर भी जघन्य हत्याकांड हो ही जाते हैं क्या यह आश्चर्य नहीं ? व्यंग्य का अगला प्रश्न था-

वहां भी अनेक सुनसान बस्तियों में अकेले न जाने की सलाह दी जाती है। यदि राहगीर कहीं अकेला फंस ही जाए और कोई काला उसके सामने पिस्तौल या चाकू अड़ाकर सब वस्तुएं दे देने को कहे तो बिना विरोध के सब कुछ दे देना ही श्रेयस्कर माना जाता है अन्यथा वह सामान उड़ाने के पहले पदयात्री को उड़ा देता है। हां लड़कियों को उनसे घनिष्ठता या सहमति के बिना नहीं उड़ाया जाता। पिस्तौल या चाकू का सहारा लेकर भारत में नारियों को भगाने या उड़ाने की शौर्यपूर्ण गतिविधियां संपन्न की जा सकती हैं। इक्कीसवीं शताब्दी में भारत में नारियों को नई तरह से पूजा जाता है। भारत में भी आधुनिक देवता बसते हैं जो यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताःको नए तरीके से मानते हैं। शीतल ने बताया-

जिस किसी के ऊपर हेलीकॉप्टर दो एक बार उड़ जाए कि उसके चेहरे की हवाइयां उड़ने लगती हैं। जब प्रत्येक नागरिक को शस्त्र रखने की पात्रता है तो पुलिस के कॉप को किसी ने हथियार न रखने का शाप तो नहीं दे रखा है?वह पहले अपराधी पर लाइट फेंकता है फिर पिस्तौल का निशाना। हेलीकॉप्टर ऊपर उड़ता है और आदमी नीचे। उड़ना उड़ाना अमेरिका के लिए सामान्य घटना हैं। हास्य ने बताया

भारत में महिलाओं को उड़ाना, बलात्कार करना और फिर हत्या कर देना आजकल सर्वाधिक लोकप्रिय गतिविधियों में माना जा रहा है। व्यावसायिक शिक्षा काफी बढ़ गई है। सभ्यता का विकास यहां नए तरीके से हुआ है। शीतल बोला 

अपने यहां की व्यवस्था अच्छी है। जूते खाने से बचने के लिए अपराधी के पास, पुलिस पर चलाने को, चांदी का जूता हमेशा तैयार रहता है। यहां चांदी का जूता नहीं चल सकता। शायद अमेरिका की पुलिस सरकारी नहीं होती? व्यंग्य ने शीतल से पूछा

वहां की पुलिस सरकारी नहीं इसीलिए असरकारी होती है। कभी घूस नहीं खाती इसीलिए अपराधी को जूते या गोली खाना ही पड़ता है? प्रत्येक क्षेत्र की, बड़े शहर की अपनी अलग सरकार होती है, पुलिस उस स्थानीय सरकार का अंग होती है। भले जनों की मित्र, किन्तु अपराधियों, खंूखारो के लिए क्रूरतम होती है। दुर्घटनास्थल पर ही ढेर कर देती है। पुलिस न हो तो यह धरा अपराधों से पट जाए? स्थानीय जेलों को भरने का श्रेय ये मनीषी बाहरवालों को नहीं देते, सारे के सारे अपराधकर्मी स्थानीय ही होते ? भगवान से तो न मां बाप डरते हैं न बच्चे। बच्चे शायद पहला शब्द जो उच्चारण करना सीखता है, वह मां न होकर 911 ही होता है। मां बाप को तक 911 की धौंस बताकर छोटे छोटे बच्चे डरा लेते हैं। गलती से भी यह नंबर दब गया कि गगन गुंजाती हुई पुलिस आ धमकती है। चारों ओर बस पुलिस का भय रहता है। वहां ईश्वर सर्वव्यापक नहीं होता पुलिस होती है। भारतीयों द्वारा इस नंबर के दब जाने का भय अधिक बना रहता है, क्योंकि जब भारत में कोई भी दूरभाष पर बात करता है तो अंतर्राष्ट्रीय कोड 91 ही लगता है। शीतल ने बतलाया

सुना है एक फेक्टर नैनी जेल का भी है। इलाहाबाद के पास वाली नैनी जेल सरीखा ही, अमेरिका की नैनी जेल का। बच्चे के लिए माता पिता के पास तो समय रहता नहीं, वे नैनी के हवाले करके, कई घंटे बच्चों से दूर रहते हैं। अब पंद्रह डॉलर प्रतिघंटे में नैनी भारतीय श्लोक या पूजा पाठ तो सिखायेगी नहीं ? फिर उसे एक को नहीं, कई बच्चों को भी संभालना पड़ता है। मां बाप हों या नैनी लक्ष्य एक ही रहता है,बच्चे बिगड़ जाएं तो कोई बात नहीं डॉलर बनते जाना चाहिए। परस्पर मार पीट और लड़ाई झगड़े होते रहने से बच्चे भी मजबूत हो जाते हैं। जब युवावस्था में पूरी तरह शक्तिसंपन्न होते हैं तभी तो संस्कारित होकर ठांय ठांय करते, दस बीस को एक साथ उड़ाते हैं। हास्य ने समझाया

एक अनुभवी और धुरंधर अपराधी ने यहां के समाज को बता दिया है कि भगवान है ही नहीं क्योंकि यदि भगवान होता तो वह स्वयं आकर उसके कार्यकलापों के कारण उसकी अच्छी धुनाई करता। तबसे लोग भगवान को नहीं पुलिस को ही मानते हैं। उसी की इज्जत करो जो जूते मार सकता है। मां बाप बच्चों को, पुलिस का भय दिखाते हैं,तो बच्चे भी मां बाप को पुलिस से शिकायत कर देने की धमकी दे दिया करते हैं। इस तरह परिवार, झगड़ों से मुक्त रह लेते हैं। शीतल ने समझाया 

क्या तुझे मालूम है, बच्चों से उनके माता पिता में दूरी कब से शुरू हो जाती है ? व्यंग्य ने पूछा

जन्म होते ही बच्चे को मां से अलग ही रखा जाता है। बच्चे को अलग बिस्तर या झूले पर। माता पिता से दूरी बढ़ाने के लिए इतनी व्यवस्था काफी है। किशोरावस्था तक आते आते ब्वायफ्रेंड, गर्ल फ्रेंड से नजदीकी बढ़ना शुरू हो जाती है। अठारह वर्ष की उम्र के बाद बच्चे माता पिता का घर छोड़कर अलग रहने लगते हैं। माता पिता राहत की सांस लेते हैं। अच्छा हआ टले। अब वे अपनी सांस्कृतिक या पारिवारिक दुर्गंध कहीं और फैलायें इधर और हमें भी फैलाने दें। शीतल ने बताया

सुना है अठारह वर्ष की उम्र के बाद प्रत्येक बच्चा यदि स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करता है तो पचास साठ हजार डॉलर का कर्ज लेता है, फिर नौकरी करके बरसों चुकाता रहता है। अठारह वर्ष की उम्र तक ही पिता खाने पीने रहने की आर्थिक सहायता करता है, बाद में उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती। इसीलिए यहां के विश्वविद्यालय तथा अन्य उच्च शिक्षा के संस्थान भारतीय और चीनी प्रोफेसरों के भरोसे चलते हैं। व्यंग्य ने कहा

शायद तुम्हें मालूम नहीं, अंग्रेजी की सही स्पेलिंग वाली सारी अमरीकी प्रतियोगिताओं में दस दस हजार डॉलर के अधिकांशपुरस्कार भारतीय बच्चे ही ले जाते हैं। वहां के बच्चे फिसड्डी रह जाते हैं। विज्ञान और गणित की अच्छी पढ़ाई के कारण ही सबसे अधिक भारतीय बच्चे अमरीका के लिए स्वीकार्य होते हैं। जब भारतीय शिक्षा संस्थानों में अनुशासन के साथ, बच्चों को भावी जीवन में संस्कारित सुरक्षित और पूर्णतः स्वावलंबी बना लेने की शिक्षा दी जाती है, तब वहां के बच्चे मानसिक दबाव से मुक्त रहकर मस्ती में मगन रहकर तरह तरह के खेल खेलते हैं, थोड़ा बहुत ही पढ़ पाते हैं। शीतल ने बताया तो जब यहां की स्कूल शिक्षा का यह हाल है तो यहां किशोरावस्था तक पढ़ाया क्या जाता है? व्यंग्य ने पूछा-

किशोरावस्था में अमरीकी बच्चों को विद्यालयों में सुरक्षित यौन संसर्ग करते रहने तथा उस काजल की कोठरी से सुरक्षित बाहर निकल जाने का पाठ तो पढ़ाया जाता है कि नहीं? यहां के जीवन का वही धार्मिक पाठ होता है। हास्य ने उत्तर दिया

शीतल ने समझाया दुनिया को जो कहना है कहती रहे उसकी चाल ढाल में कोई बदलाव नहीं होगा। विश्व में सर्वाधिक प्रदूषण और गरमाहट फैलाने का श्रेय उसीको जाता है फिर भी दूसरे देशों को चेतावनी देने में संकोच नहीं करता कि उन्हें इन मनुष्य विरोधी गतिविधियों से दूर रहना चाहिए। चोरी करने के बाद सीना जोरी करने का साहस कुछ भारतीय सत्तासीनों में तो देखा जा सकता है ये भी भट्टजी हैं जो स्वयं बैंगन खाते हैं पर दूसरों को परहेज बताते हैं।

व्यंग्य का मत था। वह अच्छी तरह जानता है कि ओजोन परत में जो छेद हुआ है उसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार वह तथा उसके समान तथाकथित अत्याधुनिक देश हैं फिर भी ढोल नगाड़ों से प्रचार करता है कि धरती की उसे कितनी चिन्ता है? धरती को बचाने के आंदोलन की पहल वह कर रहा है। आप लोगों ने देखा होगा 26 डिग्री सेन्टीग्रेड पर लोग यहां काले चश्मे लगाना शुरु कर देते हैं गर्मी से परेशान होने लगते हैं। सन स्क्रीन, बॉडी लोशन और न जाने क्या क्या शरीर पर चुपड़ने लगते हैं जबकि हिन्दुस्तान में यही तापमान सुखद अनुभूति देता है। हास्य ने तर्क दिया

यह देश ऊपर से बहुत शीतल किन्तु भीतर से बड़ा गर्म है। दुनिया में चैधराहट की डॉलर की, हथियारों की, जल जंगल जमीन के असीमित साधनों की,अनगिनत देशों के नवयुवकों को नौकरी देने की गर्मी कम होती है? बड़े पेटवाला सेठ वाशिंगटन के अर्थ टोकनालॉजी फोरम के द्वारा, धरती को बचाने की सबसे बड़ी झंडाबरदारी वही कर रहा है। विश्व के बड़े बड़े देशों को प्रतिवर्ष आमंत्रित करने का सफल दिखावा भी वह कर लेता है। अपने समर्थक छोटे बड़े चैधरियों से ठकुर सुहाती कहलाता रहता है। उसने अपने गुट के सभी देशों की मदद से समूचे विश्व को आगाह कर रखा है कि ओजोन परत में छेद हो गया है जो सबके लिए घातक है। उन्हें पेट्रोल (गैसेलीन) का कम से कम उपयोग करना चाहिए। वे (सीएफसी) क्लोरो फ्लोरो कॉर्बन का न्यूनतम उत्सर्जन करें।

दुनिया में सर्वाधिक वाहनों वाला तथा पेट्रोल की फिजूलखर्ची करने वाला देश यही है। समझदार धनाड्य और बाहुबलि परिवार का मुखिया अपनी संतान को कभी रोकता टोकता है? पास पड़ौस के बच्चों को अनुशासन हीनता और फिजूलखर्ची करने पर अवश्य लताड़ लगा देता है। व्यंग्य ने उत्तर दिया 

अपने परिवार में अपनी लोकप्रियता को और कैसे बढ़ाकर रखी जा सकती है ? हास्य फुसफुसाया 

एक कहावत है कि जबरा पीटे तो पीटे, रोने भी न दे? शीतल ने कहा

हास्य ने प्रश्न किया? जबरा क्या एक जबड़ा नहीं होता?

सच है दोनों प्रकारांतर से एक ही हैं ? शीतल ने पूर्वमत की पुष्टि की यहां के भारतीय अपनी परंपराओं, धार्मिक रीति रिवाजों, मान्यताओं को संभाल कर कैसे रख पायेंगे, वे अमरीकी सांचे में ढल नहीं जाएंगे? व्यंग्य ने पूछा– हां कुछ लोग अवश्य प्रीतम से पीटर ,करतार से कारटर, हरि से हेरी कहलाने में गौरवान्वित होते हैं। अपने देश में भी कई कौए हंसों के बीच बैठकर अपने को हंस समझने लगते,और मोती चुगने का दिखावा करने लगते हैं। हास्य ने उत्तर दिया।

शीतल ने दोनों मित्रों को बताया इस बार अमेरिका में भी गरीबों की संख्या उसे पहले से बढ़ी हुई दिखायी दी। कई सालों से वह आ रहा है। पहले पार्क के किसी झाड़ के नीचे या बस स्टॉप के शेड के नीचे इतने अधिक बेघर नहीं दिखायी देते थे,जितने वह आज देखता है। ऑस्टिनमें, बोस्टन में,या न्यूयार्क में पहले भी चैराहों चैराहों होमलैस भिखारी होते थे पर अब अधिक हो गए हैं।

एक एक डॉलर ही मांगते हुए उसने देखे। एक डॉलर से कम नहीं। हिन्दुस्तान में भी हवा द्वारा सूचना पहुंच चुकी है। वहां भी स्तर बढ़ गया अब वहां भी कोई पचास पैसे नहीं लेता। अभी और भी स्तर के बढ़ने की संभावना है? शायद भविष्य में वहां भी पांच रूपये से कम स्वीकार न किये जाएं?

व्यंग्य ने कहा मुझे तो दोनों लोकतंत्र, जोकतंत्र ही दिखायी देते हैं। यह कहना बड़ा मुश्किल है कि कहां अधिक जोकें हैं, हिन्दुस्तान में या कि अमेरिका में। दोनों में अपने अपने जोकतंत्र तो हैं? दोनों प्रजातंत्रों में उसे कारों और बेकारों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती हुई ही दिखायी दी। दोनों देशों के अखबारों में अपने अपने देश के कुछ 

साधु संतों के कार्यालयों के बॉसों के, प्रेम प्रसंग पढ़ लीजिये। भारतवर्ष में गरीब आदमी झोले में अपनी सारी संपत्ति लेकर चल देता है तो अमेरिका में घसीटने वाली गाड़ी में या व्हील चेयर पर। भारतीय गरीब दुबला है अमेरिकी दरिद्र थोड़ा मोटा। कोई किसी से कम नहीं। गर्दभराज और अरबी को मिलाकर उच्चारण करें तो गरीब और गरीबी का आभास होता है। भारत याने अश्व में गर्दभराज और अमरीका याने अरबी घोड़ा इतना ही साम्य है।एक बहुत धीरे-धीरे चलने वाला और दूसरा हवा से बात करने वाला। वह माक्र्सवादी भले ही न हो किन्तु अध्यापक होने के कारण यदि उसे विश्व के चिंतकों के चिंतन पर, माक्र्स देना होगा तो इस विचारक को ऑनर्स या विशेष योग्यता देकर उत्तीर्ण अवश्य घोषित कर देगा।

माक्र्स का चिन्तन कहता है कि किसी एक स्थान की गरीबी, सभी जगहों की अमीरी के लिए खतरा बनी होती है किन्तु हिन्दुस्तान और अमेरिका में बड़ी विचित्र परंपराएं विकसित हुई हैं। एक ओर विपन्न लोगों की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी ओर संपन्न लोगों की भी । दोनों ओर प्रगति की यही शैली देखी जा सकती है। कार्ल माक्र्स का सिद्धांत अपनी जगह ठीक है लेकिन व्यवहार में फिट नहीं बैठता। भारत, और अमेरिका में तो देख लिया गया। शीतल बोला-

डॉ. हरि जोशी, छत्रसाल नगर, भोपाल, मो.09826426232


अभिनव इमरोज एवं साहित्य नंदिनी परिवार की ओर से हार्दिक अभिनंदन


प्रियंका देवपुरा को पीएच. डी. उपाधि प्रदान

मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर के गृहविज्ञान विभाग के अंतर्गत श्रीनाथ द्वारा निवासी प्रियंका देवपुरा को पीएच. डी. उपाधि प्रदान की गई। प्रियंका को यह उपाधि उनके शोध राजस्थान के चयनित क्षेत्रों मे दृष्टिहीन बालको का व्यक्तित्व विकास एवं स्वयं की चुनोतीयों व उनके अभिभावकों की चुनोतीयों का एक अध्ययन विषय पर किए शोध के लिए पीएच. डी. उपाधि प्रदान की गइ। यह शोध कार्य बी.एन. विश्वविद्यालय, उदयपुर के गृहविज्ञान विभाग की सह आचार्य डॉ. शिल्पा राठोड के निर्देशन मे पूर्ण किया गया। ज्ञातव्य है कि प्रियंका देवपुरा देश के ख्यातनाम साहित्यकार श्रीनाथ द्वारा निवासी स्व. श्री भगवती प्रसाद जी देवपुरा की सुपोत्री एवं श्री श्याम प्रकाश देवपुरा, प्रधानमंत्री साहित्य मण्डल की सुपुत्री ह। इन्हे पूर्व मे स्नात्कोतर परीक्षा मे भी स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ था।

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