नाटक/रंगमंच में स्‍त्री रंगकर्मियों की भूमिका

लेख

नरेन्‍द्र मोहन, नई दिल्ली, मो.  9818749321

कमल कुमार, नई दिल्ली, मो. 9810093217

हिंदी में ऐसे लेखक उंगलियों पर गिने जाने लायक हैं जिन्होंने एक साथ कई विधाओं में लिखा हो। कमल कुमार बहुविधा अध्यासी कथाकार और कवि हैं। आलोचक और आत्मकथाकार हैं और देखिए नाटक/रंगमंच पर उनकी यह पुस्तक ‘लोकमंच और समकालीन हिंदी रंगमंच का स्‍त्री विमर्श‘ उनकी आलोचनात्‍मक दृष्टि के एक अलग रूप को प्रस्‍तुत करती है। जाहिर है इतनी सारी विधाओं में लिखने वाला जब रंगमंच पर लिखेगा तो कुछ तो अलग होगा ही। स्त्री नाटककारों, निर्देशकों और अभिनेताओं की धारणाओं-विचारों के बीच जब वे हमें लोकमंच और समकालीन हिंदी रंगमंच के स्त्री विमर्श’ के विभिन्‍न पहलुओं के रू-ब-रू कराती हैं तो पाठक बड़ी उत्सुकता से उस ओर मुड़ता है। हाँ, अगर मैंने वसुधा सहस्रबुद्धे की पुस्तक ”हिंदी रंगमंच में महिलाओं का योगदान“ न पढ़ी होती तो मैं इस पुस्तक को इस विषय की पहली पुस्तक मान सकता था, लेकिन पहली या दूसरी से क्या होता है, बड़ी बात यह है कि कोई पुस्तक अन्य पुस्तकों से कितनी अलग है। रूसरों के शब्द याद आते हैंः ‘अगर मैं औरों से बेहतर नहीं तो कम से कम मैं उनसे अलग (विशिष्ट) तो हूँ।“

हिंदी नाटक/रंगमंच में स्त्री रंगकर्मियों की क्या भूमिका या योगदान है, इसे लेकर छुट-पुट चर्चा होती रहती है मगर उससे कोई खास तस्‍वीर नहीं बनती। यह पुस्तक रंगमंच के स्त्री विमर्श पर केंद्रित है। यहाँ स्त्री रंगकर्मियों, कलाकारों और निर्देशकों के साथ बातचीत को आधार बना कर रंगमंच का स्त्री डिस्कोर्स गढ़ने की कोशिश की गयी है जो रंगमंच पर चर्चा की एक नयी खिड़की खोल सकती है।

यह प्रश्न हो सकता है कि लेखिका ने सीधे-सीधे रंगमंच में स्त्री विमर्श को लेकर आलोचनात्मक पुस्तक क्यों नहीं लिखी? क्यों उसे रंगकर्मियों के साक्षात्कारों का सहारा लेना पड़ा? इसका कारण एक तो शायद यह है कि रंगमंच में स्त्री रंगकर्मियों ने जो काम किया है, उसकी प्रामाणिक जानकारी का हिंदी में अभाव है। जो जानकारी है, वह व्यवस्थित नहीं है। नाट्य जैसी कला में जहाँ कई कलाओं जैसे नृत्य, चित्र, संगीत, ध्वनि, स्थापत्य आदि का प्रवेश रहता है, उसे आखि़र कैसे समझा जाए? ऐसे में साक्षात्कार ही एक मात्र प्रामाणिक रास्ता रह जाता है जिसे अपनाने के सिवा कमल कुमार के पास और कोई विकल्प नहीं था। और यह तो है ही कि छोटे-बड़े निर्देशक-अभिनेता अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में प्रायः चुप्पे होते हैं - सीलबंद किताब की तरह। कोई निर्देशक स्त्री हो या पुरुष अभिनेताओं की मंडली से कैसे काम लेता है और कैसे प्रस्तुति खड़ी करता है, प्रस्तुति के धीरे धीरे स्वरूप ग्रहण करते जाने की अपनी प्रक्रिया के बारे में बकलम-खुद उसने कभी कुछ लिखा हो, मुझे याद नहीं। कोई उनसे बुलवा ले तो बुलवा ले और देखिए न कमल कुमार ने उनसे बुलवा ही लिया, एक की छोड़िए 35 विशिष्ट रंगकर्मियों से। हाँ, सामग्री के उपयोग के लिए, उसकी रंगमंचीय समझ और विवेक जरूरी है। रंगमंच के संदर्भ में स्त्री की स्थिति और पहचान को लेकर निर्देशक ने जो बातें कही हों, वे उपयोगी हो सकती हैं पर जरूरी नहीं कि वे रंगमंच संबंधी जानकारी को बढ़ाती ही हों। कमल कुमार के सामने यह खतरा रहा है हालाँकि उसने निर्देशकों-अभिनेताओं के चयन में व्यापकता और सावधानी बरती है।

एक बात और ‘स्त्री रंगमंच’ का उल्‍लेख भूमिका में और पुस्तक में कई बार आया है, जिस पर मतभेद हो सकता है। रंगमंच की भाषा को भाषायी फ्रेम से बाहर लाकर जो प्रयोग हो रहे हैं, वे क्या देखने-समझने योग्य नहीं हैं? उषा गांगुली के इस वाक्य पर गौर कीजिए, ”थियेटर से भाषा की सीमाएँ टूट रही हैं।“ वैसे भी थियेटर या रंगमंच, से संप्रेषणा की दृष्टि से, भाषायी निर्भरता का मोहताज नहीं है। ऐसे में रंगमंच को पुरुष और स्त्री रंगमंच में बांटना, किसी भी लिहाज से उचित नहीं है?

इसमें संदेह नहीं कि इस पुस्तक में कमल कुमार ने कई रंग-पीढ़ियों के रंगकर्मियों के साक्षात्कार संजोये हैं और  उनके आधार पर अपनी कुछ धारणाएँ भी बनाई हैं, तो भी यह स्त्री रंगकर्मियों के साक्षात्कारों की किताब नहीं है। अगर ऐसा होता तो पुस्तक का जो नाम है वह न होता, नाम होता स्त्री रंगकर्मियों के साथ साक्षात्कार। सही है कि पुस्तक में साक्षात्कारों ने बड़ी स्पेस घेरी हुई है, तो भी महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद यह पुस्तक का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हिस्सा नहीं माना जा सकता है किसी भी पैमाने से नहीं, केंद्रीय थीम के हिसाब से भी नहीं। देखने की बात यह है कि लेखिका ने साक्षात्कारों का आलोचनात्मक उपयोग क्या और कैसा किया है। इस दृष्टि से पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ आपके सामने प्रस्‍तुत करना चाहता हूँ। स्त्री निर्देशक की कार्य-प्रणाली के संदर्भ में एक जगह वे लिखती हैंः

‘साधारणतया निर्देशक दूसरों को ‘साधिकार’ हुक्म जैसा देता है कि उन्हें क्या करना है। परंपरागत रूप से निर्देशक की भूमिका उसके प्रभुत्व की भूमिका होती है। लेकिन स्त्री निर्देशक के साथ जिन्होंने कार्य किया है, उनका कहना है कि उनकी रचनात्मक प्रक्रिया में सभी की भागीदारी रहती है। एक दूसरे के साथ विचार-विमर्श करके निर्णय लिए जाते है। कलाकार को किसी तरह की घुटन या उपेक्षा का अनुभव नहीं होता। उनकी कार्यविधि में पात्रों और स्थितियों का अन्वेषण रहता है।  ‘दी गयी’ स्थितियों में या ‘फ्रेम’ में कार्य नहीं किया जाता। त्रुपुरारि शर्मा ने अपनी बातचीत में बताया था कि कई बार तो वह पात्रों की स्थिति या घटना समझा देती है कि उसको अपने अभिनय में किस तरह के संवादों और भाषा में अभिनीत करना है। इस निर्णय को अभिनेता स्वयं करते हैं। औरतें अपने इर्द-गिर्द आत्मीयता और दोस्ती का घेरा बनाती है। जिससे जटिल-स्थितियों पर सरलता से कार्य हो जाता है। मतभेद भी तो ज्यादा देर तक नहीं रहते। हर कलाकार को प्रतिष्ठा दी जाती है। साथ ही उन्हें अपनी तरह सोचने और करने की स्वतंत्रता भी होती है....आदि आदि।

इन पंक्तियों को इसलिए उद्धृत किया गया है कि इनमें साक्षात्कारों से निर्मित रंगमंच संबंधी कमल कुमार की दृष्टि का पता चलता है। स्त्री निर्देशकों के साक्षात्कारों के आधार पर लेखिका ने उनकी नाट्य-प्रक्रिया के बारे में कुछ बातों की ओर संकेत किया है जैसे उनकी कार्य प्रणाली में अपनी तरह सोचने की स्वतंत्रता होती है। एक दूसरे के साथ विचार-विमर्श करके निर्णय लिए जाते हैं। ध्‍यान देने की बात है कि स्त्री निर्देशकों की जिन बातों को यहाँ शब्दबद्ध किया है ठीक यही बातें स्त्री निर्देशकों में भी इतर निर्देशकों पर पायी जाती हैं। वे दिन हवा हुए जब निर्देशक ‘साधिकार’ हुक्म देता था और अभिनेता उन्हें मंत्रमुग्ध भाव से स्वीकार करते थे। स्त्री पुरुष निर्देशकों देवेन्‍द्र अंकुर, सतीश दवे, अरविंद गौड, गिरीश रस्तोगी द्वारा अपने नाटकों का निर्देशन करते हुए देखने की प्रक्रिया में, रिहर्सलों में भागीदारी के आधार पर कह सकता हूँ कि निर्देशन के मामले में मैंने स्त्री निर्देशक और पुरुष निर्देशक को बुनियादी तौर पर एक सा पाया है हालाँकि कई अलग अलग बिंब दोनों को हॉट करते हैं। पितृसत्‍तात्‍मक समाज में जकड़नों की स्थितियों को झेलते हुए और ‘घर‘ के दबावों में रहते हुए स्‍त्री रंगकर्मियों को रंगमंच के लिए एक तरह की स्‍वतंत्रता हासिल करनी ही पड़ती है। दृष्टि में खुलापन ला कर ही स्‍त्री और पुरुष निर्देशक रोल के लिए अभिनेताओं को खुला, स्वतंत्र छोड़ते ही हैं और नाटक पाठकों दर्शकों में रसने-बसने लगता है। पुरुष निर्देशक हों या स्त्री निर्देशक दोनों पात्रों और स्थितियों का अन्वेषण बिना किसी फ्रेम से बंधे करते है। यह जरूरी है कि साक्षात्कार में कही गयी बातों को, उन्हें सूत्रबद्ध करते हुए रंगमंचीय विवेक से समझा जाए। यह एक लोकतांत्रिक और मनोवैज्ञानिक पद्धति है जिसके द्वारा समझदार और संवेदनशील निर्देशक, स्त्री हो या पुरुष, अभिनेताओं को किरदारों के करीब ले जाकर, उनका हिस्सा बना देता है। और यह तो है ही कि प्रतिभाशाली अभिनेता निर्देशक की उंगलियों में से जगह बनाते हुए फ्रेम से बाहर आ जाते हैं। स्त्री और पुरुष निर्देशकों में अलगाव की थ्योरी का कोई पुष्ट आधार नहीं है।

रंगमंच में भागीदारी निभाती औरत इन साक्षात्कारों के केंद्र में हैं। स्त्री कलाकारों के संघर्ष के लगभग सभी शेड्स इनमें रेखांकित हुए हैं। एक अन्य बात जो फोकस में रही है, वह यह कि ‘असली शक्ति तो स्क्रिप्ट ही है’ या ‘अच्छी कहानी नाटक की रीढ़ हैं।‘ स्त्री रंगकर्मियों की यह बात पढ़ कर अपनी एक बात बरबस ध्यान में कौंधती है कि पहला रंगकर्मी नाटककार ही है। एक जगह विजय मेहता अपने साक्षात्कार में कहती हैं। ‘नाटक के प्रदर्शन के बाद सब ख़त्म। हम बाहर आ जाते हैं’ और इसी पर मेरी पहली आपत्ति है। ‘नाटक के प्रदर्शन के बाद सब ख़त्म’ जबकि यही वह क्षण है जब बात शुरू होनी चाहिए। क्यों नहीं हमारे निर्देशक, अभिनेता प्रदर्शन के बाद प्रस्तुति संबंधी अपने अनुभवों को तरतीब देते, डायरी लिखते। प्रश्न सीधा और दो-टूक है कि हमारे निर्देशक ब्रेख्त जैसे निर्देशक की तरह अपने साक्षात्कारों में प्रस्तुतियों को खड़ा करने वाली विचार शृंखला तक क्यों नहीं ले जाते जिनकी उम्मीद दर्शक और पाठक उनसे करते हैं। अगर ऐसा हुआ होता तो कमल कुमार भी उन सूत्रों को लेकर उनके भीतर से नाट्य समीक्षा के बिंदुओं को खोजने का आलोचनात्मक साहस दिखा पाती।

कमल कुमार ने महिला निर्देशकों की तीन श्रेणियां (मुझे लगता है पीढ़ियों) का जिक्र किया है - पहली है विजय मेहता, सईं परांजय, शीला वत्स  जाय माइकल की पीढ़ी, दूसरी है उषा गांगुली, त्रिपुरारी शर्मा अमाल अलाना की पीढ़ी।

तीसरी है नीलम मानसिंह, अनुराधा कपूर, अनामिका हक्सर की पीढ़ी। तीनों पीढ़ियों के निर्देशकों ने अलग और नए ढंग से काम किया है। तीनों के निर्देशन संबंधी काम में गजब का संतुलन और वैचारिक-संवेदनात्मक गुंथव है। यहाँ घटना भीतरी वारदात में बदलती गयी है। यह बात अनामिका हक्सर त्रिपुरारी शर्मा के निर्देशन के बारे में साफ तौर पर कही जा सकती है।  चैथी पीढ़ी भी है 21वीं सदी की पीढ़ी जिनके बारे में किताब चुप है। हो सकता है चैथी पीढ़ी के निर्देशकों और अभिनेताओं को कमल कुमार इसी शृंखला की दूसरी किताब के रूप में लें। 

कमल कुमार ने रंगमंच और स्त्री विमर्श के एक बेहद महत्त्वपूर्ण काम को उठाया है। यह काम आगे बढ़ना चाहिए  मुख्य बात जिसे कमलकुमार ने लोकेट करना चाहा है वह यह कि स्त्रियों की आवाज स्वरूप में कहा है? उस इस आवाज को पहचाना है। इस आवाज को और उसके स्केल को एक बड़ी रैंज ले जाने में वह सफल रही है। रंगमंच और स्त्री विमर्श को लेकर इस तरह की एक-तान और संश्लिष्ट अभिव्यक्ति कम किताबों में मिलेगी।                   

संदर्भ: लोकमंच और समकालीन हिंदी रंगमंच का विमर्श, डॉ.  कमल कुमार, राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय, बहावल  पुर, हाउस, भगवान दास रोड, नई दिल्‍ली 110001, प्रथम संस्‍करण 2018, मूल्‍य: 200। 00