उस महल की सरगोशियाँ

लघुउपन्यासिका

   नीलम कुलश्रेष्ठ, अहमदाबाद (गुजरात), मो. 09925534694


उस छोटी क्यूट सी सफ़ेद फ़िएट कार का दरवाज़़ा खोलते हुये मीना देवी की बगल में बैठते हुये उसे रोमांच हो आया था। ये किसी राजपूती रजवाड़े की भूतपूर्व राजकुमारी एक लोकल चैनल की पी आर ओ थी। दिल्ली दूरदर्शन कम था जो शहर में ये दूसरा चैनल खुल गया था ? उसने बहुत उत्सुकता से पूछा था, “आप टी वी चैनल में एज़ अ पी आर ओ क्या काम करतीं हैं ?“

‘‘मुर्गे फँसाने का।’’ कहकर वह खिलखिला पड़ी थी।

वह हैरान थी, ‘‘मुर्गे फँसाने का ? ये क्या बात हुई ?“

“मेरा मतलब है कि  मैं लोगों से विशेषकर बिजनेसमैन और कलाकारों से संपर्क करतीं हूँ। उनके सामने चैनल के प्रभाव का ऐसा ख़ाक़ा खींचतीं हूँ कि बिज़नेसमैन हमें अपने विज्ञापन बनाने के लिए पैसा दे देतें हैं। कलाकारों को अपना प्रचार चाहिये। जेनुइन कलाकार तो नहीं लेकिन कुछ उभरते कलाकार चैनल पर अपने इंटर्व्यू के लिए पैसा दे देतें हैं। उन्हें इंटर्व्यू लेने वाला व्यक्ति विश्वास  दिला देता है कि  आप एक महान प्रतिभा हैं। एक दिन पूरी दुनियां में आपकी कला की धूम मच जाएगी। कुछ स्कूल्स अपने प्रचार के लिये अपने बच्चों के कार्यक्रम रखवाते हैं। उनसे  पैसा मिलता है। एक प्राइवेट होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट चैनल पर अपने व्यंजनों के बनाने के कार्यक्रम करता है। फिर उस कार्यक्रम की सी डी भी खरीद लेता है अपने छात्रों के लिये।“ 

“आप लोग राजपूत हैं तो आप लोग कैसे यहां आ बसे?“

“चार सौ, पाँच सौ वर्ष पहले राजस्थान के कुछ राज्य व रजवाड़े अकबर के विस्तारवाद से घबराकर राजस्थान से आकर गुजरात में बस गये थे। बस तब से हम गुजरात के होकर रह गये हैं।“

“वाह ! क्या चेंज है। आप लोगों का खाना पीना भी बदल गया होगा?“

“हाँ, बदला तो है लेकिन राजस्थानी व गुजराती संस्कृति का मिला जुला रूप है। यू नो मैडम! मैं भी जर्नलिस्ट बनना चाहती थी। आपने बाटली वाला कोचिंग क्लास का नाम सुना है ?“

“नहीं।“ 

“यहाँ के सर साठ हज़ार रुपये में मुझे इज़रायल के अख़बार में ट्रेनिंग के लिए भेजने वाले थे।“ 

उसका माथा फोड़ लेने को मन करता है। हथियारों से लड़ने वाले। हथियार बेचने वाले इज़रायल का मानो कला या शिक्षा में ऊँचा नाम है। वहाँ ऐसा कौन सा तीस मार खां अख़बार है जो यहाँ नहीं होगा उसने ऊपर से कहा था, “यहाँ भी तो यूनिवर्सिटी में जर्नलिज़्म डिपार्टमेंट है.“ 

“वो ये बात है मैडम! फ़ॉरेन तो फ़ॉरेन ही होता है न।“

अब फ़ॉरेन की पट्टी दिमाग पर बाँधे इस लड़की से क्या कहे वो ?               

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...कैसे होते होंगे किताबी कहानियों वाले राजा रानी? उनके राज्य, रजवाड़े ? बड़े बड़े महलों में बड़े बड़े लैम्पों की रोशनी में जगमगाते, उनकी सुनहरी पगड़ी में लगे सच्चे मोतियों के फुंदने हवा में झूमते हीरे पन्ने। दरबार हॉल के झरोखे में बैठीं रानियों के सोने चांदी के तार से कड़े लहंगे, चूनर, उनके गले में जगमगाते नौलखा हार ? एक बड़ा पंखा झलती दासी ? हॉल के बीच में नाचती सुंदर नर्तकी। महल में एक कमरा तो ऐसा होगा ही जो खजाने से भरा हो। वाह! क्या रौबदार होंगे वे, शहर के जिस रास्ते से गुज़रें लोगों के सिर झुक जाते होंगे सम्मान से। उस सारे राजसी ठाठ की कल्पना करना भी मुश्किल है। 

बड़ौदा की पैलेस रोड से गुज़रो तो राजमहल की दीवार सड़क के सामांतर चलती जाती है दूर तक...  दीवार के अंदर के परिसर में ढेरों पेड़ है और जैसे शहर में जगह जगह बढ़ के वृक्ष हैं, वैसे ही अंदर बहुत से बढ़ के वृक्ष हैं...तभी तो इसका  क्लासीकल नाम है वड़ोदरा यानि बढ़ के वृक्षों का नगर। बढ़ के वृक्षों की जटायें नीचे झूलती खूबसूसरत लगतीं हैं या ये पेड़ सन्देश देता है कि हमेशा सृजन करते चलो लेकिन हमेशा ‘‘डाऊन टू अर्थ रहो।’’ ...लम्बी दीवार के समानान्तर सड़क पर जाते हुए बीच में आता है आलीशान पैलेस का आलीशान दरवाज़़ा राजसी शान-ओ-शौकत लिये। जब भी वह इस शहर में पैलेस रोड से गुज़रती है तो लगता है... वे राजा रानी की कहानियों वाली किताब के पृष्ठ आस-पास कहीं बेताबी से फड़फड़ा रहे हैं।              

जब वह यहाँ नई आई थी तो इस सड़क से निकलते ही कितना रोमांच महसूस होता था हाय राम... जिन राजा महाराजाओं के बारे में किताबों में पढ़ा है... वे किताबों से निकलकर इस आलीशान राजमहल के गेट के पीछे दिखाई देते आलीशान लक्ष्मी विलास पैलेस में रहते हैं ? ...कैसे होते होंगे वे सब ? यों तो वह कौन से कमतर शहर की थी ? उसके शहर में भी तो ऐतहासिक इमारतें बिखरी हुईं थीं लेकिन वे तो पर्यटन स्थल बन गईं थीं। सचमुच के चलते फिरते राजा कैसे होते होंगे ? सयाजीबाग, सयाजी अस्पताल यहाँ तक कि महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यमलय ...कैसे होंगे महराजा सयाजीराव जिनकी सूझ बूझ के कारण...ये छोटा सा शहर कलाकारों का मक्का बन गया है ...संस्कार नगरी बन गया है। वे अपनी पहली पत्नी से इतना प्यार करते थे कि इस महल का नाम उन्होंने उनके ही नाम पर लक्ष्मी विलास पैलेस ही रख दिया था।

बड़ौदा में एक खूब चहल पहल वाला बाज़ार है जिसका नाम है-‘टॉवर’। मांडवी से टॉवर की तरफ़ जाओ तो बांयी तरफ़ एक बड़े ऊँचे टॉवर पर घड़ी लगी है। बहुत रोचक किस्सा है इस घड़ी का। इस शहर के महाराजा सयाजीराव तृतीय अक्सर शहर में एक आमजन की तरह घूमा करते थे। उन्होंने देखा कि एक गरीब आदमी पास जा रहे दूसरे व्यक्ति से समय पूछ रहा है। महाराजा को ये बात चुभ गई।  राजमहल जाते ही उन्होंने ये योजना बनाई कि बाज़ार में एक ऊँचा टॉवर बनवाया जाये जिस टॉवर पर एक घड़ी लगी होनी चाहिये। जिससे किसी को किसी से समय पूछकर अपनी गरीबी पर शर्मिन्दा न होना पड़े। ...हाय राम! ऐसे थे वो महराजा। अक्सर वह टॉवर से गुज़रती तो उस घड़ी की तरफ़  नज़र उठ ही जाती थी या उसे इस शहर के ऐसे संवेदनशील महराजा याद आ ही जाते थे जिसमें वह आ बसी थी।

टॉवर व दांडिया बाज़ार के बीच के रास्ते पर ही है- गुजरात पुस्तकालय मंडल एवं सहायक सहकारी मंडल। उसे  इस सड़क से गुज़रते हुये कैसा रोमाँच हो आता है। इस मंडल की इमारत से निकलता होगा पुस्तकों से भरी बैलगाड़ियों  का काफ़िला... जिनके बैलों की घंटियां रुन झुन  झूमती ज्ञान का सन्देश देने चल पड़ती होंगी... सुदूर तीन हज़ार गाँवों की डेढ़ हज़ार लाइब्रेरीज़ में। आजकल जो वैन में, बस में मोबाइल लाइब्रेरीज़ की अवधारणा है उसी का आदिम रूप! महाराजा का अपनी जनता को शिक्षित कराने का अद्भुत प्रयास। उसने इतिहास की खोजबीन की तो पता लगा जब महाराजा ने  स्कूल के प्रधानाचार्य मोतीलाल अमीन को इन्हें सम्भालने को बोला तो उन्होंने सन 1924 में पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल की स्थापना कर दी। उन्होंने भी कहाँ  सोचा था कि विश्व का ये सबसे बड़ा लाइब्रेरीज़ का नेटवर्क सहकारी मंडल बनेगा। इसकी इमारत व इसमें शामिल गाँवों व शहरों की सँख्या बढ़ती ही जायेगी। ये गुजराती साहित्य की गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन जायेगा।

ऐसा भी कभी सुना है कि जो उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में महाराष्ट्र के मनमाड के पास के गाँव कवलाना में हुआ था ? इस गाँव में अचानक गायकवाड़ राज्य के पुलिस वाले आ गये घर घर जाकर पूछताछ करने लगे थे कि काशीराव गायकवाड़ का घर कौन सा है ?काशीराव के द्वार खोलते ही एक सिपाही ने पूछा था,“ आपके  कितने बेटे हैं?“

काशीराव ने डरते हुये उत्तर दिया था, “त-त -त तीन बेटे हैं। “ 

“आप उन तीनों को लेकर बड़ौदा चलिये, वहाँ की राज़माता ने आपको बुलवाया है।“ 

“राज़माता को मुझसे क्या काम है ?“

“ये तो हमें नहीं पता।“

डर के कारण वे आगे कुछ कह नहीं पाए थे। कुछ आवश्यक सामान लेकर तीनों बेटों को लेकर उन सैनिकों के साथ चल दिए थे। रास्ते में उनका डर कम हुआ था क्योंकि  सब सिपाही उनकी खातिरदारी करते, सभ्यता से बात करते ले जा रहे थे। काशीराव जी के तीनों बेटों को बड़ौदा के अंग्रेज अफसरों व राज्य के दीवान के सामने पेश किया गया था। काशीराव बड़े असमंजस में कुछ घबराये से खड़े थे। किसी मसखरे सिपाही ने इन लड़कों से पूछा कि उन्हें यहाँ क्यों लाया गया है। बड़े दोनों भाई तो जवाब नहीं दे पाये लेकिन सबसे छोटे गोपालराव ने अपने दोनों हाथ कमर पर रखकर अकड़ कर जवाब दिया था, “मुझे यहाँ राजा बनाने लाया गया है।“ 

सबके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई थी लेकिन महारानी जमनाबाई को कुछ और परखना था क्योंकि महाराजा की मृत्यु के बाद संतानहीन महारानी को किसी से पता लगा था कि कवलाना गाँव में गायकवाड़ राज्य के अलग-अलग  बिखर गये खानदान का कोई वंशज रहता है। उन्होंने तीनों को राजसी खाने की मेज़ पर आमंत्रित किया व मेज़ पर व्यंजनों की भरमार कर दी। दोनों बड़े भाई तो इतना वैभव देखकर  खाना खाना ही भूल गये, गाबदू की तरह घबराये बौखलाये इधर-उधर देखते रहे थे। गोपालराव रानी व दीवान जी के खाना खाने के तरीके को गौर से देखता रहा। उसके बाद उसने उसी शालीनता से खाना खाना शुरू किया था। दूसरे दिन तो गोपालराव की दुनियां ही बदल गई थी। तब  जमनाबाई ने गोपालराव को बेटे के रूप में दत्तक लेते ही, उन्हें उत्तराधिकारी घोषित करते ही इस सुनहरे रुपहले बड़ौदा शहर की नींव पड़ गई थी। 

उनके द्वारा लाई राजसी पोशाक को पहनाकर गोपालराव को दरबार लाया गया था। ब्रिटिश सरकार के अँग्रेज प्रतिनिधि ने स. 1875 में गोपालराव को दरबार में गद्दी पर बिठाकर उन्हें बड़ौदा शासन का महाराजा सयाजीराव तृतीय घोषित किया था। ऐसे कैसे कोई रंक से राजा बन जाता है ? वह इस तिलिस्म को समझ नहीं पाती तो सोचना छोड़ देती है।

उसे कभी ध्यान आता कैसे होंगे मद्रास विश्वविद्यालय के प्रोफेसर टी माधवराव तंजोरकर ? जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में ब्रिटिश सरकार के कहने पर बड़ौदा में मल्हार राव के शासनकाल की गुप चुप रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट से पता लगा था कि वे कोष अपने परिवार व रिश्तेदारों पर लुटा  रहे हैं। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पदच्युत करके माधवराव को स्टेट का सचिव नियुक्त किया।  इन्हीं के सुझाव पर ही  इस स्टेट के उत्तराधिकारी की तलाश आरम्भ हुई थी।    

ये वही शहर है जहाँ गोपालराव की तकदीर उन्हें खींच लाई थी। उन्हें एक अँग्रेज शिक्षक एफ ए एच इलियट को नियुक्त करके उनकी पढ़ाई आरम्भ की थी जो उन्हें हमेशा ये अहसास दिलाते रहते थे कि उनका जन्म इस स्टेट में राज्य करने के लिये ही हुआ था। जब पहली बार उन्होंने गोपालराव की मानसिकता परखने के लिए उसे सम्बोधित किया था, “महाराजा गोपालराव!“

गोपालराव ने सीधे उनकी आँखों में देखते हुये आत्मविश्वास से कहा था, “कहिये महानुभाव ?“  

सर इलियट के होठों पर मुस्कान आ गई थी  कि उन्हें इसे अधिक ट्रेनिंग देने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी। उन्होंने उन्हें बस समझाया था, “क्योंकि आप ही बड़ौदा के भावी महाराज हैं, आपका जन्म ही इसी स्टेट में राज करने के लिए हुआ है। यहाँ की प्रजा के दुःख को, उनकी परेशानियों को आपको ही दूर करना होगा। ये शहर, ये राज्य आपके बड़े होने का इंतज़ार कर रहा है।“

“ये बात हमें यहां आकर महारानी व आप सबकी हमारे प्रति भावनाएं देखकर पता लग गई हैं। विश्वास करें हम  आपके विश्वास को टूटने नहीं देंगे। हम यहाँ कुछ ऐसा काम करेंगे कि पूरे भारत में हमारी स्टेट एक अलग पहचान बनायेगी। अभी हम समझ नहीं पाते ये सब कैसे होगा? लेकिन आपकी शिक्षा हमें इस लायक बनाएगी।“   

गोपालराव बहुत गंभीरता से पढ़ाई में जुट गये थे।  बहुत जल्दी ही उनकी गुजराती, मराठी व उर्दू भाषा की पढ़ाई आरम्भ हो गई थी। कभी टी माधवराव, कभी स्टेट का कोई मंत्री उन्हें अलग अलग विभाग या संस्थान दिखाने ले जाता।

कुछ वर्ष बाद सन 1881 मे नज़र बाग में बम्बई के गवर्नर सर जेम्स फ़ॉरगॉसन ने भारत के वायसराय का 

प्रतिनिधित्व करते हुये उन्हें अठारह वर्ष की उम्र में बड़ौदा स्टेट का राजा घोषित करा दिया था। इनको कुछ समय के अंतराल से ब्रिटिश रेजीडेंसी में हाज़िरी देनी होती। ये टी माधवराव के सामने रोष  से कहते, “मैं यहाँ का राजा हूँ या अंग्रेजों का गुलाम ? क्यों मुझे हाज़िरी देने जाना होता है ?“

माधवराव दूरदर्शी थे, “इस सरकार ने चालाकी से ऐसा अनुबंध कर लिया है कि बड़ौदा स्टेट में कुछ ऐसी परेशानियां हैं कि ब्रिटिश सरकार का अंकुश रहेगा ही। आप धीरज रखिये। दो वर्ष बाद ये आपके सपनों का नगर होगा।“  

माधवराज ने कभी सोचा ही नहीं था कि ये महाराजा प्राथमिक स्त्री शिक्षा को अनिवार्य व मुफ्त कर देंगे। उन्होंने प्रश्न भी किया था,“ महाराजा! स्त्री तो घर की शोभा होती है। उसे सिलाई, कड़ाई व पाककला में निपुण होना चाहिये तो फिर वह शिक्षित होकर क्या करेगी ?“

“आपने कभी देखने का कष्ट नहीं किया है कि स्त्री ही हमारे सामाजिक मेल मिलाप को संचालित करती है। आपको नहीं लगता कि यदि वह शिक्षित होगी तो परिवार की और समाज की भी बुद्धिमत्ता से देख रेख करेगी। हमने विदेशों की यात्राएं कीं हैं तो हमें महसूस हुआ कि एक पढ़ी लिखी और एक अनपढ़ स्त्री में क्या फर्क होता है?“ 

“वाह महाराज ! आपके इस दूरगामी कदम से इस शहर की संस्कृति अवश्य प्रभावित होगी।“

उन महाराज ने अपने सपनों का नगर कुछ इस तरह बसाया कि आज तक उनकी रोपीं अच्छाइयां इस शहर में झलकतीं हैं। कभी ये राज्य 7000 गरीब हिन्दुओं को, 3000 मुसलमानों को प्रतिदिन भोजन करवाता था। वही परंपरा इन्होंने आरम्भ करवाई। शहर के बगीचे के केंद्र में बने बेंड स्टैंड पर शहनाई वादन के साथ सुबह होती थी जिससे सारा अलसाया शहर जागे तो उसे मधुर संगीत से सारे दिन काम करने की ऊर्जा मिले। उन्होंने एक ख़ूबसूरत पैलेसनुमा इमारत ‘कलाभवन’ बनवाई जिसमें संगीत की, नाटक व सांस्कृतिक महफ़िलें सजतीं रहें। जिसे अब इंजीनियरिंग कॉलेज में बदल दिया गया है। उनकी बनवाई आजवा लेक आज भी शहर को पानी दे रही है।

महाराजा सयाजीराव जी ने किसानों का बहुत ध्यान रक्खा था। किसानों को उनकी आय के हिसाब से कर देना होता था। कुछ मंत्री नन्हे राजा पर हावी होने की कोशिश करते लेकिन उन्हें पता नहीं था कि एक अंग्रेज शिक्षक ने इन्हें बुद्धि के चरम प्रयोग व घड़ी की सुइयों के अनुशासन से बांध दिया है। कुछ वर्षों में उनकी सारी चलाकियाँ रक्खी की रक्खी रह गईं जब देखते दूर-दूर के राजा अपने राजकुमारों को इनसे प्रशासन सीखने भेजने लगे थे। 

उसने सोचा न था कि वह हिंदी कलम हाथ में थामे इस शहर को पहचानने निकलेगी और कुछ बरस बाद ही एक दिन राजमहल में जा पहुंचेगी, जिसे कभी हसरत से पैलेस रोड पर आते जाते अपनी आँखों को दूरबीन बनाती देखती रही है... उसने कब सोचा था कभी किताबों की फ़ोटो वाले राजा रानी को साक्षात देख पाएगी। एक दिन शहर के बीच के विशालकाय  महल के विशाल नक्काशीदार दीवारों व मेहराबों वाले दरबार हॉल में सुसंस्कृत श्रोताओं के साथ कालीन पर बैठकर, बड़े झिलमिलाते पीच व सफ़ेद रंग के शेंडलेयर्स के नीचे वह सामने मंच पर अपने साजिन्दों के साथ बैठी गिरिजा देवी की  गाई ठुमरी के आरोह अवरोह में डूब उतर रही होगी। भारतनाट्यम नृत्य की एक नृत्यांगना प्रवीणा दी की मेहमान बनकर वह उस कार्यक्रम में गई थी। मध्यांतर में अधिकतर लोग चाय की स्टॉल की तरफ़ चले गए थे। वह आतुरता से अपने पति के साथ दोनों नन्हे बेटों की उंगली थामे प्रवीणा दी को भीड़ में ढूंढ़ रही थी। प्रवीणा दी ने ही पीछे से उसके 

कंधे पर थपकी दी थी, “किसे खोज रही हो ?“

“आपको ही खोज रही थी।“

“महारानी से मिलना है ?“

“जरूर।“ वह महल के विशाल दालान में लोगों से घिरी महारानी की तरफ़ ले गईं थीं व परिचय करवाया था। 

वह उन्हें ठगी सी देखती रह गई थी कि सोने के तार से बनी रानी कैसी होती हैं। वह शिफॉन की साड़ी में सिर ढके बोलती-सी आँखों की बेहद ख़ूबसूरत महिला थीं। उनकी शादी को कुछ बरस ही गुज़रे थे इसलिए मखमली गोरे रंग के नाजुक शरीर पर वह साड़ी सच में ऐसी लग रही थी कि  सोने के ख़ूबसूरत लचीले तार को हौले से उसमें लपेट दिया हो। उसकी नमस्ते के उत्तर में उन्होंने बड़ी नज़ाकत से बजती हुई घंटियों के स्वर में कहा था ,“नमस्ते। कहिये गिरिजा देवी की गाई ठुमरी का आनन्द लिया ?“ 

“ऐसा लग रहा था जैसे कोई संगीत लहरी आत्मा में उतर रही हो। “

प्रवीणा जी बोल उठीं थीं, “शास्त्रीय संगीत के ये गुरु हमारी आत्मा को अपनी संगीत शक्ति से छू लेते हैं।“ 

बड़ी उत्सुकता थी कि राजा साहब कैसे होंगे क्योंकि श्रोताओं में पीछे बैठे हुए सिर्फ़ उनके घुंघराले काले बाल,उनकी पीठ व गहरे हरे रंग का सिल्क का कुर्ता ही देख पाई थी। प्रवीणा दी फिर उन सबको ग्रीन रूम में उनसे मिलवाने ले गई थीं, “चलिए, आपको महाराजा से मिलवाऊँ।“ 

गिरिजा देवी एक कुर्सी पर बैठी पानी पी रही थीं व वह एक दीवान के मसनद पर अधलेटे बैठे थे। दी ने जैसे ही मिलवाया, उन्होंने राजसी अदा से कुछ इस तरह सिर हिलाया था जैसे हम उनके दरबार में कोर्निश  करने गए हों। वह कुछ मायूस सी ग्रीन रूम से निकल आई थी। उस समय सोच नहीं पाई थी कि कभी उसे बार बार किसी न किसी इस शहर के आस पास के राजा या रानी से मुलाकात करनी पड़ेगी। उसने कहाँ सोचा था कि किसी की तीखी नाक पर बैठे दर्प का, क्रोध का, हाथ की आकाश की तरफ़  उठी पन्ना जड़ी मोटी अंगूठी पहने हष्ट पुष्ट उंगली का राजसी क्रोध के वारों का बरसों तक शिकार समझे जाने के कारण तड़पते हुये बार-बार प्रतिउत्तर देना होगा, किसी औरत को हासिल करने की ज़िद का “हम ....हार नहीं मानते।“

जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो लोग उठकर जाने लगे। तब तक क्रीम कलर के सिल्क कुर्ते व सफ़ेद चूड़ीदार में माथे पर बाल बिखराये उसके नन्हे राजकुमार कालीन पर लेटे सो चुके थे। उस ने उन्हें जगाया तो बड़े ने जागकर आँखें मलीं, इधर उधर देखा और फिर कालीन पर लेटकर पेट पर हाथ रक्खे सो गया। छोटा भी उठकर कुनमुनाया और ममा के पेट  को मसनद समझ कर उस पर सिर टिका और हाथ रखकर फिर सो गया। हॉल से निकलती भीड़ मुस्कराकर इस तमाशे को देख रही थी। वह बुरी तरह झेंपी जा रही थी।

इस शहर का ही प्रभाव था कि बरसों बाद उसे यहां बस गईं रानियों के जीवन का सर्वे करने की सूझी थी। एक तो शहर का प्रभाव उस पर उसके बचपन में दूर के मामा बताया करते थे, “तुम्हारी नानी के पिता जी थे तो जेलर लेकिन फ्ऱीडम से पहले कोटा के प्रिंस को पढ़ाने जाते थे। सारा राज्य परिवार उनकी इज्ज़त करता था। जब वो मरे थे तो राजा स्वयं उन्हें शमशान तक पहुंचाने आये थे।“

उसकी नन्हीं आँखें फैल जातीं थीं किसी आम जन की बेटी जैसी, “हाय राम! कोटा के राजा स्वयं आये थे?“

“हाँ, सच्ची कह रहा हूँ।’’ उसे क्या पता था कि बड़े होकर शान ओ शौक़त से रहती रानियों के विषय में उसके भ्रम टूटेंगे।    

दूसरे शायद पादरा कॉलेज की प्रिंसीपल सरोज़ सिन्हा जी ने उससे शिकायत की थी, “बड़ौदा इतना एक्टिव सिटी है कि इंटरनेशनल लेवल पर यहाँ काम हो रहा है फिर भी हिन्दी मैगज़ीन में इसका कहीं कोई ज़िक्र नहीं दिखाई देता।“

उसे यहां आये दो तीन वर्ष ही हुये थे, उसने बहुत ठसक से अपनी गर्दन में अकड़ भरकर कहा था, “अब मैं यहाँ आ गईं  हूँ। मैं लिखूँगी इस शहर के बारे में।“ तब उसे भी नहीं पता था कि उसे कोई बहुत कोशिश नहीं करनी पड़ेगी ये शहर ही कुछ न कुछ अपने पहलू दिखा-दिखाकर उससे लिखवाता जायेगा। 

सर्वे का आरम्भ उसने सोने की तार वाली महारानी के इंटर्व्यू से किया था। मुख्य पैलेस के सामने सड़क पार बने छोटे महल में राजपरिवार के ऑफ़िस में उनके इंटर्व्यू  लेने के लिये एक प्रार्थना पत्र देना ज़रूरी थी। उनके पी ए के नियत किये समय पर वह उनके ऑफ़िस में गई थी। बहुत दिलचस्प था ये जानना कि इस राजपरिवार को आज भी क्यों इतना सम्मान  दिया जाता है। उन्होंने बेबाक होकर बताया था, “आई एम नॉट अ रॉयल पर्सन। लेकिन मैं ग्वालियर की एक एरिस्टोक्रेट फैमिली की बेटीं हूँ। लखनऊ में मेरी एजुकेशन हुई है।“

“मैंने सुना है कि अपने राजपरिवार के साथ आप भी समाज सेवा में रूचि लेतीं हैं ?“

“मैं बहुत से समाज सेवी कार्यों से जुड़ीं हुईं हूँ। मैं अखिल भारतीय महिला परिषद की अध्यक्षा हूँ जिसकी नींव मेरी परदादी सास यानि चिमणा बाई ने डाली थी।“

“मुझे ये शहर बहुत क्रिएटिव लगता है। क्या आपको भी ?

“इस शहर में ही हमारे परदादा श्वसुर महाराजा सयाजीराव ने कुछ ऐसे काम किये हैं कि इस शहर की क्रिएटिविटी इतनी ज्यादा है कि जो कोई भी यहाँ बसता है इसकी क्रिएटिविटी से जुड़ जाता है, डल नहीं रह पाता। मेरे ऊपर भी मेरे राजपरिवार व शहर का प्रभाव पड़ा।“ 

“आप भी तो कुछ एन जी ओज से जुड़ीं हुईं हैं ?“

“जी, एक पर्यावरण के लिये काम करने वाली संस्था की उपाध्यक्ष हूँ। हम लोग अभी पुस्तकें पढ़कर, विशेषज्ञों से राय लेकर योजना बना रहे हैं कि बढ़ती हुई जनसँख्या में पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिये हमें सन् 2000 के बाद शहर में क्या क्या करना है। हमारे राज्य का संग्रहालय, जिसे सरकार को दे दिया है, देश का पहला संग्रहालय है जिसके लिये विशेष रूप से इमारत बनाई गई थी। नहीं तो किसी पुरानी  इमारत में संग्रहालय बना दिए जाते हैं। मैं उसकी ट्रस्टी हूँ।  वह भी मेरी ज़िम्मेदारी है।“

“आप लोगों का जीवन अच्छा है, घर का कुछ काम नहीं करना पड़ता।“

“ये आपसे किसने  कह दिया ?“

सोने के तार जैसी रानी ने मेज़ पर रक्खे गिलास से पानी पीया व बोलीं ‘‘इतना बड़ा राजमहल है, गार्डन हैं, दूसरे राजमहल में हमारे ऑफ़िसेज हैं उनकी साज सज्जा व सफाई का कितना ध्यान रखना पड़ता है। ये बात और है कि हमारे सेवक ये काम करते हैं लेकिन उनको मॉनीटर करने के लिए हाऊस कीपिंग स्टॉफ है लेकिन सब पर नज़र तो रखनी पड़ती है। देशी विदेशी मेहमान आते ही रहते हैं। कभी कभी अपने लिये समय निकलना मुश्किल हो जाता है।“

उन्होंने एक अपने जैसी ख़ूबसूरत पेंटिंग अपने ऑफ़िस  में दिखाई थी जिसे उनके पति ने बनाई थी । 

वह मुस्करा उठी थी, “ये बात तो मैंने सुनी थी कि महाराजा साहब के कलाकार व्यक्तित्व के होने के कारण पार्लियामेंट के सांसद होने पर भी राजनीति छोड़ दी थी। ये मुझे पता है कि वे बहुत अच्छे शास्त्रीय संगीत के गायक हैं लेकिन वे एक पेंटर भी हैं ये बात पता नहीं थी।“

“वो सिर्फ़ पेंटर ही नहीं हैं पेंटिंग्स के कला प्रसार में भी लगे रहते हैं। हम लोग पंद्रह दिन के लिये जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स, बॉम्बे में हमारे म्यूज़ियम की पेंटिंग कलेक्शन जैसे राजा रवि वर्मा, रशियन पेंटर रोरिक व दूसरी पेंटिंग्स की एग्ज़ीबीशन लगा रहे हैं।“

“हम लोग से मतलब ? आप को भी पेन्टिंग में रूचि है ?“

“बहुत तो नहीं लेकिन परिवार में जो काम हो रहा है उसमें मेरा भी क्या हर गृहणी का रोल रहता है। मैं ये देखती रहतीं हूँ कि इन पेंटिंग्स की ठीक से पैकिंग हुई है या नहीं। ठीक से म्यूज़ियम हॉल से उन्हें ट्रक में लोड करवाना है।  उनके नंबर का हिसाब रखना है। ये काम किसी मैनेजर से करवाया जाता है लेकिन ख़ुद वॉच करना भी बहुत ज़रूरी है। आफ़्टर ऑल दे आर क़्वाइट प्रेशियस (ये बहुत मँहगी हैं।)’’ 

उनकी व्यस्ततायें सुनकर उसका दिमाग चकरा गया था... जैसा ऊँचा परिवार उतने ही पहाड़ जैसे काम, वह अपने को ये पूछने से रोक नहीं पाई थी,“ आपकी उच्च शिक्षा इतने काम सँभालने में काम आती होगी?“

“शिक्षा से अधिक कर्मचारियों को सम्भालने में कॉमन सैंस काम आता है।“  

“मुझे पत्रिका के लिये आपका फ़ोटो भी चाहिये।“

“आप ऐसा करिये कि मेरे पी ए को अपना पता नोट करवा दीजिये। वो मेरी फ़ोटो भिजवा देंगे।“ 

दो दिन बाद ही उसके पीछे के कम्पाउंड के गेट पर ठक ठक  हुई। उसने बाहर निकलकर देखा। चपरासी से लगते एक आदमी ने अपना हाथ उठाकर अभिवादन किया व बोला, “मैं पैलेस से आया हूँ।“

“जी, कहिये।“

“महारानी के पी ए साहब ने आपको ये पत्र देने को बोला है।  “

“पानी जुइए?“

“नथी।“

उसने व्यग्रता से वह लिफाफा  खोला था। उसमें उनका सिर पर पल्लु लिए भव्य  फ़ोटो था। एक पत्र  उनके हस्ताक्षर सहित था। उसमें लिखी हल्की सी डाँट की भाषा थी। इस औपचारिक पत्र के अंत में लिखा हुआ था-‘‘हम इस शहर की महारानी हैं’’, न कि ‘रानी’। आगे से हमारे नाम के आगे ‘महारानी’ लिखकर हमें सम्बोधित करें। ‘इस बात को पढ़कर उसके होंठ मुस्करा उठे थे- अच्छा हुआ जो राजा महाराजाओं के ज़माने चले गये, प्रजातंत्र आ गया नहीं तो पता नहीं वो उसे इस ग़लती के लिये क्या पता कोई कड़ा राजदंड सुना देतीं।

बाद में उनके विषय में उसकी ग़लतफ़हमी समाप्त हो गई थी क्योंकि जब जब लेखिका मंच के कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित किया, वे बहुत स्नेह से आईं व उसकी पुस्तक भी विमोचित की थी। धर्म  के स्त्री शोषण वाली पुस्तक के लिये विमोचन के अवसर पर उनके उदगार सुनकर वह गदगद हो गई थी, “बड़ौदा हर क्षेत्र में एक क्रन्तिकारी शहर रहा है। वीर सावरकर जैसे वीर यहाँ रहे हैं। वैसे ही इन्होंने भगवान के प्रकोप या धर्म के मठाधीशों से बिना डरे वीर सावरकर जैसी वीरता दिखाते हुये ये पुस्तक सम्पादित की है।“

...हाँ, इस राज्य की राज़माता अर्थात उनकी सास ने बहुत चतुराई से विशाल लक्ष्मी विलास पैलेस के कुछ मुख्य  कक्ष दिखवा दिए थे। हुआ ये था कि वह उनका इंटर्व्यू लेने राजमहल पहुँच गई थी। उसी राजमहल जिसके दरबार हॉल में ठुमरी सुनी थी। महल की उनकी सेविका उसे एक हॉल के सोफ़े पर बिठाकर पानी लेने चली गई थी। वह पानी पीते हुये कमरे की राजसी शान के मज़े ले रही थी। यही हैं वो राजसी कक्ष, ये महराबें, ये विशाल दीवारें, ये मखमली विशाल सोफ़े, ये झरोखे जहां सयाजीराव तृतीय की पत्नी लक्ष्मीबाई की पायल की रुन झुन गूंजती होगी। यूँ तो न जाने इस राजवंश की कितनी पीढ़ियां  इस महल से गुज़री होंगीं लेकिन उसे हर समय ये ही महाराजा क्यों याद आते हैं ? क्यों न याद आयें क्योंकि बड़ौदा आने वाले हर इंसान पर जगह जगह इनके नाम को देखकर इनका अनोखा व्यक्तित्व उसके दिमाग पर छा जाता है। उनकी पत्नी का नाम राजवंश की परंपरा के कारण बदल कर लक्ष्मीबाई  से बदलकर चिमणाबाई रख दिया होगा। इस महल में इन्हीं कक्षों में माँ व दासियों को खिजाते दौड़ते होंगे नन्ही राजकुमारी व नन्हे राजकुमार के कदम। अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने व पत्नी  के व्यक्तित्व को सम्मान देने के लिये उन्होंने नए महल का नाम लक्ष्मी विलास पैलेस रक्खा था।

कितना  ख़ौफ़नाक होगा सं 1885 जब रानी चिमणाबाई शादी के छः वर्ष बाद ही चल बसी होंगी। तब तक ये लक्ष्मी विलास महल पूरा बन भी नहीं पाया था। 

उसने पानी का गिलास सामने की विशाल कांच के टॉप वाली नक्काशीदार मेज़ पर रक्खा था व बाहर दिखाई देते गलियारे पर नज़र डाली... ये गलियारा गवाह होगा दुःख से पागल हुये इधर से उधर घूमते महाराजा का। जिन्होंने राजकाज में रूचि लेना कम कर दिया था। अक्सर अपने कक्ष में बंद रहते होंगे। वो कक्ष कौन सा होगा ? उनका स्नायु तंत्र इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था इसलिए उन्हें इन्सोमनिया हो गया था। इस अवसाद का उपचार था उनकी दूसरी शादी- राज़माता, मंत्रियों व चिकित्सकों ने सलाह मशविरा करके यही उपाय खोजा। महाराजा को इसके लिए बमुश्किल तैयार किया गया था । 

जब देवास राज्य की गजराबाई उनकी पत्नी बनकर एक बड़े जश्न के बाद इस महल में आईं तो तीन चार दिन तक तो उन्होंने उनकी तरफ़ नज़र भी नहीं उठाई। इस स्थिति के लिए  गजराबाई मानसिक रूप से तैयार होकर आईं थीं। अपने रेशम से सरसराते वस्त्रों में वही महाराजा के निकट होतीं चलीं गईं। वे कब तक किसी भीने सेंट, गुलाबों व मोंगरे के गजरे व गोरी बाहों के मनुहार से बच सकते थे ? इन्हें नया नाम दिया गया चिमणाबाई द्वितीय। महाराजा इन्हें लेकर जहाज से विदेश यात्राओं पर निकल जाते थे। एक बार वे किसी विदेश यात्रा से लौटे थे। दूसरे दिन ही उन्होंने राज़माता व मंत्रियों को मंत्रणा कक्ष में बुलावाया था। 

सभी उनकी मंत्रणा कक्ष में प्रतीक्षा कर रहे थे, जैसे ही महाराजा आये सब खड़े हो गए सिर्फ़ राज़माता के। महाराजा ने  अभिवादन का उत्तर देने के बाद अपनी सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठते हुये कहा, “मैंने बहुत से देश देखें हैं। मैं समझ नहीं पाता कि सिर्फ़ हमारा देश उस पर भी राजपरिवार ही अपने घर की स्त्रियों से घूंघट करवाते हैं। वे भी तो इंसान हैं क्या उन्हें बाहर की दुनियाँ ठीक से देखने का हक नहीं है?“

प्रधान मंत्री ने मुलायम आवाज़ में कहा, “पर्दा प्रथा तो हमारे देश की शान है, हमारी सुंदर परम्परा है।“

“इसमें सुंदर क्या है किसी को पर्दे में रखकर उसे कैद करके रखना ?“

राज़माता उनके इस प्रश्न से हैरान थीं, “आपके मन में ये विचार क्यों जन्मा ? ये परम्परा तो सदियों से चली आ रही है।“

“राजे माँ! हम विदेशों में जाते हैं। कितना अच्छा लगता है कि वहां की मैम बिना घूघंट के रहतीं हैं। हम निर्णय कर चुके हैं कि हमारी पत्नी चिमणाबाई अब किसी से भी घूँघट नहीं करेंगी।“

“क्या ?“ सारे दरबारियों का मुंह खुला का खुला रह गया। 

प्रधान मंत्री ने राज़माता की तरफ़ देखा जिनके माथे पर भी बल पड़े हुए थे, “राजे माँ! ये क्या कह रहे हैं ? ऐसा कहीं भारत के किसी भी राजपरिवार के बारे में सुना है कि रानियां घूँघट ही नहीं करें ? अपनी मर्यादा से बाहर चलीं जाँयें?“

तुरन्त ही राज़माता के चेहरे के भाव बदल गये। उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई, “मुझे बहुत अच्छा लग रहा है भारत के किसी पुरुष ने पहली बार हम औरतों के विषय में सोचा तो कि हमें अपने घूंघट के पीछे कितनी घुटन महसूस होती है। कभी कभी गर्मियों में कोई स्त्री बेहोश तक हो जाती है।“

“लेकिन भारत के दूसरे राजवंश कितनी निंदा करेंगे।“

“करते रहें अगर किसी अच्छी पहल के लिये निंदा करें भी तो क्या हुआ ? आप देख लेना धीरे धीरे क्रांति आ जाएगी सभी राज्यों की रानियां इस पर्दे से मुक्त हो जाएंगी।“

तो ये है घूंघट से स्त्री मुक्ति का बिगुल बजाने वाला बड़ौदा का राजमहल ? उसका सौभाग्य है की वह इस कक्ष में  बैठी है। वर्तमान की राज़माता को भी दुल्हिन बनाने का किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं है बिलकुल सिंड्रेला की कहानी जैसा- वह सोचती है। 

महाराजा सयाजीराव जी को और भी दुःख सहने लिखे थे। उनके पुत्र व पुत्रवधु की मृत्यु हो गई थी इसलिए उन्होंने प्रपौत्र प्रताप सिंह गायकवाड़ की शादी के लिए हज़ारों लड़कियां देख डालीं थीं। एक बार कोल्हापुर के एक गाँव हसूर के जागीरदार मानसिंहराव घोरपड़े अपनी तेरह वर्ष की बेटी को खूब सुंदर चुनिया चोली पहनाकर लक्ष्मी विलास पैलेस लाये थे। वह नन्हीं तो ये वैभव देखकर हैरान थी। हज़ार लड़कियों के व्यक्तित्व व बुद्धिमता को परखने के बाद  शांता देवी उनकी दुल्हिन चुनीं गईं थीं। शादी के बाद ही उनकी शिक्षा आरम्भ हो गई थी। ...वह महल में कुछ सूंघने की कोशिश करती है ...इसी फिजा में फैलती होगी नवाब रामपुर द्वारा महाराज को भेंट किये गए अपने बेहतरीन खानसामा के बनाये पकवानों की सुगंध।  

महाराजा ने कुछ वर्ष बाद उन्हें प्रेरित किया कि वे राज्य की स्त्रियों से मिलें, उनकी समस्याएं समझें व उनकी प्रगति के लिए कुछ करें। जैसे ही प्रताप सिंह गायकवाड़ व उनकी रानी कुछ और वयस्क हुये उनके लिये अपनी दूसरी पत्नी के नाम बने एक अलग महल महारानी चिमणाबाई पैलेस में रहने की व्यवस्था कर दी गई। अरे... उस महल में तो वह कितनी बार जा चुकी है क्योंकि अब तो उस विशाल पैलेस को रेलवे ऑफ़िसर्स ट्रेनिंग कॉलेज बना दिया गया है।

अभी वह सामने की दीवार पर लगी किसी भव्य पेंटिंग को देखकर सोच ही रही थी कि एक सेविका ने कक्ष के अंदर आकर कहा, “राज़माता आपसे दूसरे कमरे में मिलेंगी।“

वह बाहर रक्खी अपनी चप्पल पहनकर चल दी थी। फिर उससे चप्पल उतरवाई गईं व अंदर लकड़ी के विशाल सोफ़े पर बैठाया गया। दूसरी नौकरानी उसके लिये एक ट्रे में चाय का कप लेकर आ गई। उसने चाय का कप उठाया था और सोचने लगी थी  क्या ये घूँघट का हटना ही था कि महारानी चिमणाबाई ने पति के साथ घूम घूमकर अपनी खुली आँखों से दुनियां देखी। इतना ही नहीं उन्होंने स्त्रियों के दर्द को अभिव्यक्त करने के लिए एक पुस्तक लिखी ‘‘द पोजीशन ऑफ वीमन इन इंडियन सोसायटी’’। उनके भाषण से ही सन 1927 में पूना में भारत के प्रथम स्त्रियों के संगठन अखिल भारतीय महिला परिषद का शुभारम्भ हुआ था। जिसके लिए  सरोजिनी नायडू व कमला देवी चट्टोपाध्याय जैसी स्त्रियों ने धन दिया था। वह इस महल की दीवारों में उन विचारों की आहट सुनने की कोशिश करती रही थी कि जो महारानी चिमणाबाई के दिमाग में इस शहर में लौटकर सरसराये होंगे कि क्यों नहीं हमारे शहर में स्त्री संगठन बन सकता ? और सच ही सन 1928 में उन्होंने  बड़ौदा आकर इस स्त्री संगठन की स्थापना करके स्त्रियों को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया था। 

क्या इसीलिये इनकी पोती राज़माता के नाम के अस्पताल में मनोचिकित्सक है? उसे बहुत रोमांच होता है कि उसने इस राजपरिवार की तीन पीढ़ी के इंटर्व्यू लेकर बहुत नजदीक से इनके बातचीत के शाही तौर तरीके, मिजाज देखें हैं। अस्पताल के उसके कमरे में जैसे ही उसने इंटर्व्यू लेने के लिए पैन खोला वह पोती तुनकमिजाजी से बोल उठी थी, “आई हैव ओनली फ़ि फ़ि फ़िफ्टीन मिनट्स। जल्दी इंटर्व्यू  खत्म कीजिये। आप राज्य परिवारों की महिलाओं पर सर्वे कर रहीं हैं मैंने मीना देवी झाला को फ़ोन कर दिया है, वह दस मिनट में यहां पहुंचतीं होंगी।“

तो इस तरह हुई थी चैनल के लिए मुर्गे फंसाने वाली मीना देवी से मुलाकात। प्रिंसेस की तुनकमिजाजी देखकर वह मन ही मन मुस्करा उठी थी क्योंकि जानती थी जब उसके  प्रश्न फिसलने लगतें हैं, कलम अपने ईज़ाद किये शार्ट हेंड में ताल देती चलती है तो इंटर्व्यू देने वाला इस तरह खो जाता है कि उसे समय का ध्यान नहीं रहता। हुआ भी यही था। थोड़ी देर बाद आकर पच्चीस छब्बीस वर्ष की, लम्बी, भरे बदन वाली किसी रजवाड़े की राजकुमारी मीना देवी झाला, जो यहाँ के एक लोकप्रिय लोकल टी वी चैनल में पी आर ओ (पब्लिक रिलेशन ऑफ़िसर) है इस प्रिंसेस की सहेली, उन दोनों को अभिवादन करती बैठकर उनकी बातें सुनती रही थी। 

यहाँ के राजघराने की वह ख़ूबसूरत प्यारी सी राजकुमारी समाज से जुड़ी मानसिक समस्यायों के विषय में बताते-बताते भूल गई थी कि उसे पंद्रह मिनट बाद कहीं जाना था। वह उसे छिपी आँखों से देखती जा रही थी जिसे एक मध्यम वर्ग के लड़के से प्यार हो गया था और उसी से शादी करने वाली थी ये खजानों के ढेर में, फूलों में पली नाजुक राजकुमारी। 

उसने अपनी कलम बंद की तो मीना देवी झाला व्यग्रता से बोली थी, “प्लीज़ ! हम लोग चलें ? आई एम गैटिंग लेट।“

“ओ श्योर।“

...वह इसी मीना देवी की फ़िएट में बात करती चली जा रही थी। मीना देवी ने अनुरोध किया था,“ ‘‘मुझे  रास्ते में उसी होटल मैनेजमेंट  इंस्टीट्यूट में कुछ काम है। यदि आप माइंड न करें तो हम लोग दस मिनट वहाँ रुकते हुये चलें?“

“ओ के।“

जैसे उन्होंने उस इंस्टीट्यूट के प्रिन्सीपल के ऑफ़िस  के बाहर पहुंचे, चपरासी ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया था। बाहर तक प्रिंसीपल की किसी से फ़ोन पर बात करते हुये आवाज़ आ रही थी, “अच्छा आप ऐसा करिये मीना देवी झाला से मिल लीजिये। यू नो शी बिलोंग टु अ रॉयल फ़ैमिली  उसके ‘रॉयल एटीकेट्स’ देखने लायक हैं। हमारा जो लोकल टीवी चैनल है उसमें पी आर ओ है।“

“आपने सही सुना है कि उसकी डाइरेक्टर व ओनर लीना देवी देसाई हैं लेकिन बिल्डिंग हमारी है।“

“इसलिये मैं कह रहा हूँ कि मीना देवी से कॉन्टेक्ट करिये।“

फ़ोन खत्म होते ही पटेवाला ने उन्हें अंदर जाने के लिये इशारा किया था। वे जैसे ही अंदर गए वे हंस पड़े,“ ,“थिंक ऑफ डेवल... डेवल इज हीयर। वैलकम सोनल अभी तुम्हारी बात चल रही थी।“

“सर ! आपने कैसे मुझे याद किया ?“ उसने उनके सामने बैठते हुए पूछा था व उसका परिचय करवाया था, “इनसे मिलिये, ये हैं जानी मानी जर्नलिस्ट।“ 

“ग्लेड टु मीट यू।“

फिर वे मीना देवी से कहने लगे थे, “तुम  इस वर्ष जर्नलिज़्म डिप्लोमा कर लो। मैं इस वर्ष जर्नलिज़्म क्लास आरंभ कर रहा हूँ।“

‘‘अब मूड नहीं है। मैं मार्केटिंग में घुस गई हूँ।“

“मैंने तुमसे बात की थी न, हमें युनीवर्सिटी के जर्नलिज़्म डिपार्टमेंट में एन्ट्रेन्स टेस्ट देने वाले छात्रों  की लिस्ट चाहिये।“  

“सर ! वहाँ सेकंड ईयर का स्टूडेंट मेरी जान पहचान का है। मैं अभी उसे फ़ोन मिलाती  हूँ। “

वह फ़ोन पर नंबर डायल करने लगी थी, “कौन शिरीष बोल रहे हो?“

सर ने स्पीकर ऑन कर दिया था। उधर से शिरीष की आवाज़ आई थी, “हाँ “.

“मैं मीना देवी बोल रही हूँ। मेरा एक काम करेगा। मुझे तेरे डिपार्टमेंट की इस बार ‘‘एन्ट्रेन्स’’ में एपीयर होने वाले छात्रों की लिस्ट चाहिये।“

“वो किससे मिलेगी ?“

“ये लिस्ट क्लर्क के पास होती है। हैड से मैंने बात की थी वे तैयार नहीं हैं। तू क्लर्क से बात कर।“

“अगर उसने मना कर दिया तो...“

“तो चार पाँच सौ पकड़ा देना। मैं तुझे बाद में दे दूंगी।“

“चल हट ये गन्दा काम मुझसे नहीं होगा।“

“ओय ! अगर नहीं करेगा तो मार्केट में फेल हो जायेगा, एकदम फ़्लॉप  जर्नलिस्ट। “वह बड़े नाटकीय स्वर में बोलने लगी, “जानता है जर्नलिस्ट्स का क्या काम है ? पेपर ऑन द टेबल, मनी अन्डर द टेबल- हा...हा...हा...“

इस बात से खुश होकर प्रिंसीपल ने तिरछी आँखों से मीना को शबासी दी थी। 

“ये सब मुझसे नहीं  होगा।“ उधर से शिरीष बोला।   

“सोच ले मैं बाद में फ़ोन करूँगी।“

उसने सर से कहा था, ‘‘ये बन्दा तो हाथ ही नहीं रखने दे रहा। कुछ और सोचतीं हूँ। दस दिनों में लिस्ट आपकी टेबल पर होगी। तो सर! मैं अब निकलती हूँ।“

“ऑफ़िस जा रही हो ?“

“जी हाँ, प्रिंसेस ने इनको हमारी डाइरेक्टर से मिलवाने के लिए कहा है, एज यू नो शी  इज ऑलसो अ रॉयल लेडी। ये रॉयल लेडीज की लाईफ़ स्टाइल पर सर्वे कर रहीं हैं।“

उन्होंने मुस्कराते हुये कहा, “मैडम जी ! कभी हम इंस्टीट्यूट वालों का इंटर्व्यू  भी ले लीजिये।“

“आई विल ट्राई।“ वह  मन ही मन कुढ़ गई कि  क्या वह ‘‘रॉयल एटीकेट्स’’ वाली सोनल की तरह दुकान खोलकर बैठी है ?

उसने राज़माता का राजमहल में इंतज़ार करते हुये चाय का खाली कप मेज़ पर रक्खा था और सोनल देवी के साथ हुई लीना देवी से मुलाकात को याद करने लगी थी। उनसे मिलने से पहले ही उसने सुन रक्खा था कि ये किसी हाई स्कूल, इंग्लिश मीडियम की प्रिंसीपल थीं। ये अचानक स्कूल के अपने से दस वर्ष छोटे एक क्लर्क के साथ गायब हो गईं थीं। पांच बरस बाद ये अपने शहर में फिर प्रगट हुईं तो ये उस क्लर्क की पत्नी थीं व इनके पास काफी पैसा आ चुका था। जब इन्होंने अपना लोकल चैनल आरम्भ किया तो उसके उद्घाटन की तस्वीर के साथ इनके विचार अख़बार में पढ़ने को मिले थे, “मैं ‘‘एड्युएण्ट’’ यानि कि मनोरंजन के साथ शिक्षा दी जाये इस पर विश्वास करतीं हूँ। इसलिए बच्चों व बड़ों के मनोरंजन के साथ शिक्षा देने के लिए इस चैनल को शुरू किया है।“

इन्हीं लीना देवी ने अपने भव्य ऑफ़िस में उनका स्वागत किया था। उनकी रॉयल भव्य पसंद उनके ऑफ़िस के नक्काशीदार सोफों में दीवार पर लगीं विशाल ऑइल पेंटिंग्स व चाइना क्ले के फूलदानों में दिखाई दे रही थी। वे बतातीं रहीं थीं कि किस तरह उनके रजवाड़े में रानियों को अंग्रेजी शिक्षिका नियुक्त करके पढ़ाया जाता था। उन्होंने भूल से ये नहीं बताया जो उसे किसी से पता लगा था कि जैसे ही उनके पिता की कोई रानी पैंतीस  वर्ष की हो जाती थी, वह एक नई शादी कर लेते थे। सारी जानकारी देने के बाद उन्होंने मुलामियत से उससे पूछा था, “आपका नाम बहुत सुना है। आप अगर हमारे चैनल के लिये विज्ञापन इकट्ठा कर सकतीं हों तो आपको मैं सीनियर पी आर ओ की पोस्ट दे सकतीं हूँ।“

उसका मन हुआ वह जोर से चिल्लाये, “मैंने जर्नलिज़्म की दुकान नहीं खोल रक्खी है।“ लेकिन वह टालते हुये बोली, “मेरे पास कोई न कोई प्रोजेक्ट रहता है। मैं समय नहीं निकाल पाऊँगी।“

वह नाक चढ़ाकर, नखरे दिखाते हुये बोलीं थीं, “अरे! फ्ऱीलांसर तो अपने कोई भी प्रोजेक्ट चुन सकते हैं। दे आर नॉट स्लेव ऑफ एनीबडी। आप वो प्रोजेक्ट्स छोड़िये। हमारे लिये काम करिये। आई विल गिव यू हैंडसम सैलेरी।“

“जी, मैंने अपनी रूचि से अपने प्रोजेक्ट्स चुने हैं। मुझे माफ करें।“ वह तेजी से बोलती हुई वहां से चल दी थी।   पंद्रह दिन बाद ही उसने सुन लिया था कि लीना देवी व उनके पति के पच्चीस ऑफ़िसेज पर पुलिस का छापा पड़ गया व वे दोनों जेल में हैं। कितनी शांति मिलती है दुनियाँ को बाज़ार समझने वाले व बाज़ार बनाने वालों के ऐसे हश्र पर या इस तरह के ‘‘रॉयल एटीकेट्स’’ पर।  

उसके विचारों का तांता टूटा क्योंकि  महल के कक्ष में थोड़ा और इंतज़ार करने के बाद राज़माता की सेविका आ गई थी, “आपको राज़माता तीसरे कक्ष में मिलेंगी।“

तीसरे कक्ष में उसके मख़मली सोफ़े पर बैठते ही सिर पर सिल्क की साड़ी का आँचल लिए राज़माता आ गईं थीं। वह अभिवादन करती खड़ी हो गई थी। वे अपनी अपने नाम के अस्पताल की व्यस्त्तता, शहर में समाजसेवा की बातों को बतातीं रहीं थीं। अचानक उन्होंने उससे पूछा था,“ हमारे हॉस्पिटल के एक गायनोकॉलोजिस्ट, मेडिकल एडवाइजर डॉक्टर के. एन. कुलश्रेष्ठ थे, अब तो नहीं रहे। आप क्या उन की कोई रिलेटिव हैं ?“

“जी बहुत दूर का रिश्ता है। मुझे लगता है उन्होंने बड़ौदा स्टेट में इतना नाम  कमाया है कि  हर तीसरा चैथा व्यक्ति मुझसे यही प्रश्न पूछता है।“

अब वह उन्हें क्या बताती कि वे उसकी मम्मी की बुआ के जेठ के लड़के थे। उनके बड़े भाई नेवी में अधिकारी चुने गए तो उन्होंने  भी यू पी से उन्हीं के पास मुम्बई जाकर मेडीकल की पढ़ाई की थी। 

“आपको मैं एक संयोग बताऊँ। मैं व महाराजा शिप से लन्दन जा रहे थे। रास्ते में मेरी तबियत खराब हो गई थी। जब पूछताछ की तो शिप पर ये ही एक डॉक्टर थे जिन्होंने मुझे देखा। जल्दी ही इनकी दी  हुई दवाइयों से मेरी तबीअत ठीक होने लगी। लंदन भी ये मुझे देखने आते रहे। इनकी काबलियत देखकर महराजा साहब ने इन्हें बड़ौदा के हमारे अस्पताल को सँभालने का ऑफर दिया तो उन्होने मान लिया।“

“आपको एक बात पता है कि इनकी पहली पत्नी उत्तर प्रदेश के राजा कासगंज की बेटीं थीं?“

“नो, आई डोन्ट नो। मैं तो इनकी दूसरी पत्नी एनी यानि निर्मला कुलश्रेष्ठ को जानतीं हूँ, जो ज्यू (यहूदी) हैं। 

“जी हाँ, उनके बंगले पर जब कुछ फैमिलीज का गेट टुगेदर होता है तो उनसे मेरा मिलना होता है।“

जब हमारा महिला दरबार लगता था तब वे ट्रेडीशनल लहंगा या साड़ी पहनकर आतीं थीं। शी वाज सच अ प्रिटी लेडी एट दैट टाइम। उस पर जरी के लिबास ...हमारा दरबार उस नीली आँखों वाली स्लिम विदेशी सुंदरता से जगमगा जाता था।’’

उसके लिये कल्पना करना मुश्किल हो रहा है क्योंकि नीली आँखों वाली एनी आंटी की सुंदरता उनके चेहरे से टपकती है लेकिन अब मोटी होकर विदेशी मक्खन का पहाड़ हो गईं हैं। उसने उन्हें ब्यॉय कट काले सफ़ेद  बालों में अक्सर घुटनों तक की टाइट फ्रॉक में ही  देखा है  

“आप उनकी पहली पत्नी को जानतीं हैं ?“

“कोई खास नहीं।“ वह टाल जाती है।        

वह नहीं बताती कि अक्सर आगरा के बाजारों में मटमैली साड़ी में, बिखरे बालों में घूमती हाल बेहाल सिगरेट पीती औरत को दिखाकर उसकी मम्मी  कहतीं थीं, ‘‘देख वो राजा कासगंज की बेटी जिसकी शादी बड़ौदा के डॉक्टर से हुई थी।’’  

पहली बार तो ये जानकर वह हैरान हो गई थी, ‘‘आप मुझे बुद्धू बना रहीं हैं। ये अधपगली सी औरत कोई राजा की बेटी हो सकती है ?’’

‘‘सच ये वही है। तब इसके डॉक्टर पति मुंबई में थे लेकिन ये उन्हें तंग करती थी कि मेरे घर में दो नौकर मेरे आगे पीछे घूमते हैं। मुझे खाने में चार सब्ज़ी चाहिए। मेरे घर में मैं रोज़ नई चादर बिछाकर सोतीं हूँ। ‘‘बिचारे डॉक्टर साहब तो तंग आ गये होंगे।’’

‘‘वो क्या कोई भी तंग हो जाता। उन्होंने इसे छोड़ दिया तभी से पगलाई सी सिगरेट फूंकती घूमती रहती है।’’

कैसी किस्मत थी उन डॉक्टर साहब की ? द्वितीय युद्ध के समय वियना एक कॉन्फ्रेंस में गए थे। तभी डॉक्टर्स के बीच बात हुई कि उनकी कोई पैरा मेडीकल स्टाफ ज्यू है जिसके खानदान को हिटलर के सिपाहियों ने मार डाला है। कोई दूर का रिश्तेदार भी नहीं बचा है। यदि ये वियना रही तो मार  डाली जाएगी। इसे यहां से हटाना ज़रूरी है। जब अन्य देशों का कोई डॉक्टर उसे अपने साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ तो डाॅ. कुलश्रेष्ठ अपने साथ ले जाने को तैयार हो गए। पहले तो उन्होंने इन्हें ‘‘निर्मला’’ नया नाम दिया व वहाँ से लंडन भेज दिया और वे बड़ौदा लौट आये। दो तीन दिन बाद एनी अपने नए नाम निर्मला से बड़ौदा आ गईं। तीन वर्ष तक उन्हें एक अलग मकान में रक्खा था।  कासगंज की पत्नी से पूरी तरह रिश्ता टूटने के बाद उन्होंने इनसे शादी कर ली।   एनी ने भी निर्मला बनकर राज़माता के साथ व बाद में भी अपने को समाज सेवा से जोड़े रक्खा था।  डॉक्टर साहब को वृद्धावस्था में दिखाई देना बिलकुल बंद हो गया था। सभी परिस्थितियों का निर्मला मुकाबला करतीं रहीं थीं।    

राज़माता से बात करते हुये वह कहाँ खो गई थी ? फिर उसने कलम सम्भाली, “आपके राजपरिवार के कारण ही क्या बड़ौदा का शिक्षा, विशेष रूप से स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में बहुत नाम है?“

राज़माता ने तुरंत  मुंह बनाया था ‘‘हाँ, जिस बड़ौदा ने शिक्षा के क्षेत्र में इतना नाम कमाया था, लोगों को विद्वान बनाया उसका शैक्षणिक स्तर देखकर मुझे कष्ट होता है।’’ 

 वह हैरान है, ‘‘क्यों ? आज भी देश विदेश से लोग बड़ौदा में अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं।’’

‘‘पता नहीं वे क्या सोचकर हमारी महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी में अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं ? यू  नो,  इसकी पहली वाइस चांसलर हंसा बेन मेहता जापान से शिक्षा प्रणाली को समझकर आईं थीं।’’

‘‘उस ज़माने में एक लेडी वाइस चांसलर, वैरी स्ट्रेंज ?’’

‘‘वो हमारे राज्य के दीवान की बेटीं थीं। सन् 1923 में सैनफ्रांसिस्को में एक सभा में उन्होंने निडर होकर ब्रिटिश राज्य के अत्याचारों को बताया था। ये डर नहीं लगा कि उन्हें लौटना तो भारत ही है।’’

‘‘अच्छा इसीलिये यहां पर हँसा बेन गल्र्स हॉस्टल, यूनिवर्सिटी में हंसा बेन लाइब्रेरी है। ‘‘जी हाँ’’

उनके सम्मान में वह कह नहीं पाई थी कि आज भी देश विदेश के लोग अपने बच्चों को यहां पढ़ने भेजना पसंद करते हैं। शायद ये हर वर्ग के बुजुर्ग का दर्द है ,“हमारे ज़माने में ऐसा होता था.....“ सोचकर वह मुस्करा उठी थी। 

“आपने तो अपने शासनकाल का सुख खूब भोगा होगा।  बाद के दौर में कुछ परिवर्तन हुये ?“

“मैं व मेरे पति लालबाग के चिमणाबाई पैलेस में रहते थे। महाराजा सयाजीराव लक्ष्मी विलास में रहते थे। जब मैं बड़ौदा की महारानी बनी तो मकर संक्रांति व दशहरा पर राजमहल में महिला दरबार लगता था। शहर भर की महिलायें मुझसे मिलने आतीं थीं। हमारे ऊटी, मंसूरी, पूना, बंबई में घर थे। मैं गर्मियों में बच्चों को लेकर चार महीनों के लिये ऊटी चली जाती थी। वहां भी नौकरों की फौज थी लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे बाहर के शहरों के घर बिक गए नौकर कम करने पड़े थे।“

इनके पति  का पोलो प्रेम शहर भर में प्रसिद्ध है। उनके पास बहुत से ऑस्ट्रेलियन घोड़े थे। बाद में एक  एक करके मरते चले गये।  

“सुना है आपकी बड़ी बहू को तोतों से बहुत प्रेम था।“

“हाँ वह उन्हें बच्चों की तरह प्यार करतीं थीं। शादी में अपनी मायके से तीस कुत्ते व चालीस तोते लेकर आईं थीं।“ 

“आपके दो बेटे संसद  सदस्य रहे हैं। आपकी क्या भूमिका थी ?’’

“हम लोगों ने बड़े बेटे का चुनाव में बहुत साथ दिया लेकिन राजनीति  के सुनहरे जाल का भ्रम टूटते  ही मैंने छोटे बेटे को राजनीति में जाने से मना कर दिया क्योंकि वह बहुत स्ट्रेट फ़ॉरवर्ड है। मुझे गर्व है अपने बड़े  बेटे पर क्योंकि वो व महाराजा जम्बुघोड़ा दोनों देश की पहली पर्यावरण सरंक्षण के लिए स्थापित की गई डॉक्टर जी. एम. ओझा की संस्था ‘इनसोना’ को भरसक सहायता करते हैं।“

“आपके जीवन का कोई बड़ा बदलाव ?“

“हमारा जीवन कितना बदला है इस बात से आपको पता लगेगा कि पहले परिवार के लोग व नौकर मिलाकर चार सौ लोग महल में रहते थे और आज इस विशाल महल में सिर्फ़  परिवार के चार लोग व चार नौकर रहते हैं।“  

कभी सैकड़ों लोगों के शोरगुल के बीच रहने वाली राज़माता रात में टीवी ऑन रखकर सोतीं हैं जिससे उनकी कानों में शोरगुल जाता रहे।  

....इस परिवार के राजाओं की रंगीन मिजाजी की बात कहीं नहीं सुनी फिर भी उसकी बड़ी उम्र की ख़ूबसूरत मित्र भूतपूर्व शासन काल की बात बतातीं हैं, “जिस दिन महाराजा हमारे स्कूल के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर आते थे मेरी ख़ूबसूरती के डर के कारण मेरी माँ मुझे स्कूल नहीं जाने देतीं थीं।“    

महारानी व राजे माँ से ही पता लगा था कि इस नगर में अनेक छोटे मोटे राजा अपना भूतपूर्व रियासत छोड़ कर रहने लगे हैं। उनसे ही दूसरी रानियों के पते मिले थे। वह सर्वे करने के बाद अचरज में पड़ गई थी कि सभी महारानियाँ व रानियां राजघरानों से सम्बन्धित थीं और जो सबसे लावण्यमयी सोने के तार जैसी महारानी थीं, वे राजघराने की नहीं थीं, एक अभिजात्य परिवार की थीं।

इस सर्वे के दौरान ही पता लगा कि छोटा उदेपुर, भादरवा स्टेट, लिम्बड़ी और भी कुछ ऐसे राजपूती राज्य व रजवाड़ों के परिवार यहां आ बसें हैं। सर्वे के दौरान किसी रानी से ही पता लगा था कि उसके अपने घर से डेढ़ किलोमीटर दूर उस बड़े फाटक  पर लगे ‘‘सदाशिवलाल’’ की नेमप्लेट के पीछे एक भूतपूर्व रानी विभावरी देवी रहतीं है। हद हो गई उसके घर से थोड़ी दूर ही एक महारानी रहतीं हैं ? 

जबसे वह यहां बसी है बांयी तरफ़  के गार्डन से दांये  मुड़ो या बांये सड़क पार सामने दिखाई देते बड़े अहाते के बंद बड़े फाटक पर लगी बड़ी नेमप्लेट पर लिखे नाम पर नज़र पड़ ही जाती  थी ...‘सदाशिवलाल ’। अंदर के अहाते से अपनी गर्दन उचकाए नीम, पीपल के पेड़ों की झूमती कतारबद्ध मोहक लगती डालियों की पंक्तियाँ भी आँखों की दृष्टि को खींच ही लेतीं थी। बड़े अहाते का रईसी रौब हमेशा पड़ ही जाता है। दरअसल वह सोच भी नहीं पाई थी जिस सड़क से वह बरसों से गुज़रती इस भव्य फाटक से प्रभावित होती रही है, इस बड़े  फाटक के अंदर एक छोटा मोटा सफ़ेद महल है। इसमें एक भूतपूर्व रानी रहतीं हैं।

उसे कोई ज़रूरी शॉपिंग करने जाना था,उसने सोचा लौटते में उन रानी का इंटर्व्यू ले लेगी इसलिये उन्हें फ़ोन करके समय नियत कर लिया था। उस बड़े फाटक  पर एक मूंछों वाला चैकीदार खड़ा था जिसने उसके आने का मंतव्य पूछा व रजिस्टर पर खाना पूरी करके साथ वाले चैकीदार को उसे आदर से अंदर ले जाने के लिए कहा व शॉपिंग बैग्स अपने केबिन में रखवा लिए। किसी महल में जाते ही उसकी  चाल भी वैसी अकड़ भरी राजसी हो गई थी। वह भी लम्बे डग भरती उसके पीछे चल दी। जब उसे गंतव्य की तरफ़ आदर देने के लिए कोई एस्कॉर्ट कर रहा होता है तो वह और भी अकड़ जाती है वर्ना घर पर तो गृहणीनुमा पड़ी फालतू जैसी चीज का अहसास होता रहता है।

अंदर जाते ही सफ़ेद रंग का महल दिखाई देने लगा था और मैदान के दूसरी तरफ़ राजघराने का स्टड फॉर्म दिखाई दे रहा था जहां अच्छी नस्ल के घोड़े हिनहिना रहे थे। किसने सोचा था उस फाटक के पार इतना भव्य सफ़ेद महल होगा। महल के मुख्य द्वार तक जाने के लिए चार पांच सीढ़ियाँ बनी हुईं थीं जिनके दोनों तरफ़ थे दो मदमत्त शेरों के पत्थर के सिर। महल का लकड़ी का द्वार भी राजदरबारी था जिसके काले रंग पर पीतल से डिजाइन बनी हुई थी व पीतल के ही बड़े बड़े कुंडे व सांकल थीं। साथ में आये  आदमी ने  हत्थेदार  सोफ़े पर बैठने के लिए इशारा किया और बाहर निकल गया। उसकी आँखें इस हॉल का जायजा लेने लगीं थीं।

सोफ़े के सामने की दीवार पर हृष्ट-पुष्ट डील डॉल वाले, ऊँचे माथे वाली आर्मी की ड्रेस पहने एक मूंछों वाले व्यक्ति की विशाल पेंटिंग लगी थी। उस पेंटिंग पर माला चढ़ी हुई थी व लिखा था ‘‘हिज़ हाइनेस कर्नल सदाशिवलाल’’। 

छत के विशाल शेंडलियर्स व दीवारों पर एक कतार में लगे छोटे शेंडलियर्स की रोशनी की आभा में ये कक्ष लगता था जैसे किसी अतीत के पृष्ठ उसे दिखला रहा था। दोनों तरफ़  की दीवारों पर विशाल अंडाकार आईने लगे हुए थे जिनके  फ्ऱेम अखरोट की लकड़ी के महीन नक्काशी किये हुए थे। उनके सामने चाइना क्ले के फ्लावर वास थे जिनमें माली के लगाए ताज़े फूलों की गमक से कमरा गमक रहा था। कोनों में कुछ कलात्मक मूर्तियाँ, राजघरानों के कुछ और व्यक्तियों की फ़ोटोज़ लगी हुईं थीं। उसे लग रहा था कि उस गुज़र  गए इतिहास की धड़कने यहीं कहीं धड़क रहीं हैं। गुज़र गए सरसराते इतिहास का क्या अनुमान लगाना आसान था ?    

अंदर के द्वार से राजसी चाल से चली आ रही चंदेरी साड़ी से सिर ढके मध्यम कद की एक महिला को आते देख वह समझ गई कि यही रानी विभावरी देवी  हैं। उनके आने से  हॉल किसी महंगे सेंट से गमक गया था। वह उनके सम्मान  में खड़ी हो गई थी। 

उन्होंने सीधी कमर से ही सोफ़े पर बैठते हुए कहा था,“प्लीज़ ! बैठिये।“

उसने बैठते हुए कहा था, ‘‘हम लोग आपके घर के पास ही रहते हैं लेकिन कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि यहां कोई महल है।“

वे धीमी स्मित से मुस्करा दी थीं। यदि ये महल के बाहर मिलतीं तो वह कभी सोच ही नहीं पातीं कि ये आकर्षक लगती आम सी महिला कोई रानी हैं। हाँ, बोलती हुई आँखों का आत्मविश्वास कुछ अलग सा था।  

उसने डायरी पेन सम्भालकर अपने प्रश्नों का पिटारा खोला था, जो सब रानियों से पूछती आ रही थी मसलन आपको आज के ज़माने में अच्छा लगता है या पहले अच्छा लगता था जब आम जनता सिर झुकाती थी। वह स्वयं आश्चर्यचकित हो गई थी सबको आज का समय या बिंदास घूमना पसंद है- एक आम औरत की तरह। शहर के आस पास के छोटे मोटे राजघरानों की रानियां अपने बड़े बंगलों में बेहद खुश थीं क्योंकि महल के पिंजरे से उन्हें आज़ादी मिल गई थी। अधिकतर रानियां समाज सेवा से किसी ना किसी तरह जुड़ीं  हुईं थीं क्योंकि रूपये कमाना उनकी मजबूरी नहीं थी। वही सवाल मैंने इन रानी से किया, “आपको अपना महल का जीवन कैसा लगता है ?“

उन्होंने बेहद नम्र होते हुए जवाब दिया, “मुझे तो छोटे छोटे घर बहुत अच्छे लगते हैं, जहां लोग अपने सुख दुःख बाँटते हैं लेकिन मेरे भाग्य में तो महल में ही रहना लिखा है। मेरे पिता व उनके भाई का महल पास ही था और अब ....“कहते हुए वह धीमे से हंस गईं।’’

“तब तो आप रेशम सी राजकुमारी बन गईं होंगी ?“

“नहीं जी, मैं खूब घूमी फिरी। मैं नैनीताल के बोर्डिंग स्कूल में पढ़ती थी। मैं किसी को बताती नहीं थी कि मैं राजकुमारी हूँ, मुझे बहुत शर्म आती थी।“

“आप अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए क्या कर रही हैं ?“

“मैं बच्चों से बहुत प्यार करतीं हूँ। मैं अनाथालय में अक्सर जाती रहतीं हूँ लेकिन मेरा सपना है कि इस महल के कुछ कमरों में एक स्कूल खोलूंगी। शास्त्रीय संगीत सीख रही हूँ व मंच पर कुछ प्रस्तुति भी की हैं।“ 

‘‘ओ ...ग्रेट।“

इंटर्व्यू  समाप्त करके मैंने पेन बंद किया। वह तपाक से बोलीं, “आपने ये तो बताया नहीं कि आप कुछ कोल्ड लेंगी या चाय ?“

“ओ ...नो, कुछ भी नहीं। मैं पास में ही रहतीं हूँ।“

“ऐसा कैसे हो सकता है ? आप पहली  बार हमारे पैलेस में आईं हैं। कुछ तो लीजिये।“

“प्लीज़ नहीं ! मेरे बेटे स्कूल से घर पहुँचने वाले होंगे और फिर उन्हें कोचिंग क्लास जाना होता है। “उसने उस हड़बड़ाई माँ की तरह कहा था जब उसके बच्चे दसवीं व बारहवीं में होते हैं। उस माँ की हर सांस पर, समय की हर घड़ी पर अलार्म बजता रहता है कि बच्चों की बोर्ड की परीक्षा हैं। स्कूल से आने के बाद उन्हें कोचिंग भेजना  होता है और उसे लगता  वह उन्हें सामने बैठकर खाना खिलाये।

“देखिये हम लोगों का कब मिलना होगा,  प्लीज़  !“

उनके आग्रह पर उसने अपनी पसंद बता दी, “सिर्फ़   चाय।“

नौकर जब ट्रे से पाँच-छः प्लेट्स में नाश्ता व चाय मेज़ पर लगाने लगा तो उन्होंने शुगर पॉट में चम्मच डालते हुए पूछा, “शुगर कितनी ?“

फिर अपना बोन चाईना के कप, जिस पर रंगीन बोन चाइना से ही नक्काशी की गई थी लेकर कहने लगीं, “आपका टाइम ले रही हूँ, यू नो ...सबसे कुछ कहना पॉसिबल नहीं होता।“

ज़ाहिर है वह गुमान से भर गई थीं। उन्होंने संजीदा  होते हुए कहा, “आप सामने लगी   हिज़  हाइनेस की फ़ोटो देख रही हैं। ही वाज ब्लाइन्ड।“

“वॉट ?“ उसके हाथ का प्याला काँप गया था, “कैसे ?“

रानी विभावरी राजा साहब के नेत्रहीन होने की बात बता  रहीं थीं “सन 1967 की पकिस्तान  से जंग में एक बम्ब विस्फोट में उनकी आँखें चली गईं थीं।“

“वैरी सैड, आप तो बहुत दुखी हो गईं हो गईं होंगी ?“

“तब हमारी शादी नहीं हुई थी।“

दोबारा प्याला छलछलाने की बारी थी, “वॉट यू वॉन्ट टु से ? आपने एक ब्लाइंड व्यक्ति से शादी कर ली थी?“

वह रहस्यमय मुस्कान से मुस्कराईं थीं, “यही कहानी तो मैं आपको बताना चाह रही थी। राजा साहब ने इस दुर्घटना के बाद मिलट्री से रिटायरमेंट ले लिया था व वापिस इसी अपने महल में रहने लौट आये थे। तब उनकी पहली पत्नी जिंदा थीं, वही इनकी देखभाल करतीं थीं लेकिन तीन साल बाद वे भी चल बसीं। राजा साहब का मन उचाट हो गया था। यू नो ... कहाँ मिलट्री की पार्टीज ,मस्ती, शेम्पेन के दौर व डांस... कहाँ ये सूना महल। और इस महल के विशाल कक्षों में घूमते नेत्रहीन राजा साहब। राजा साहब अपने कुछ सेवकों के साथ  घूमते हुए हमारे हिमाचल प्रदेश आये थे। कुछ इत्तेफाक ये हुआ कि हिमाचल प्रदेश के राज्यों के राजघरानों के भूतपूर्व राजाओं की एक मीट थी। वहीं  के किसी भूतपूर्व शासक राजा, जो इनके मित्र रहे होंगे ने इन्हें भी आमंत्रित कर लिया था। मैं भी अपनी स्टेट से अपने पति के साथ वहां गई हुई थी।“

उसके प्याले में चाय अब छलकने के लिए बची हुई नहीं थी। वह सकते की हालत में चुप रानी विभावरी देवी की बात सुने जा रही थी, “फिर क्या हुआ ?“

“इसी पार्टी में हमारा  परिचय हुआ था। यू नो ...आर्मी पीपल के एटीकेट्स बहुत अलग होतें हैं। इन्हें चलते फिरते देखो तो थकान उतर जाती है। लेडीज़ से तो ये बहुत तमीज़ से पेश आ रहे थे। ऊपर से इनकी शानदार पर्सनेलिटी व  दुनियाँ भर का ज्ञान। बस आँखें ही तो  नहीं थीं।“ 

“तो इसलिए आपने अपने पति को छोड़ कर इनसे शादी कर ली थी? “उसे हल्का क्रोध आ गया था। 

“अरे! मैं ऐसे कैसे कर सकती थी ? वह तो संयोग.....“

जब तक सेवक बर्तन उठाने आ गया था। वे उससे बोलीं, “मुखवास ले आना।“

वह जब वापिस लौटा तो उसके हाथ में मोर के आकार का एक सुन्दर डिब्बा था। उसने उस मोर के पंख हटाए तो अंदर अलग अलग डिब्बे में सौंफ, इलायची, लौंग, सूखे आंवले  और भी पता नहीं क्या क्या रक्खा हुआ था। उसके एक लोंग  उठा ली और रानी सेवक के जाने का इंतज़ार करती रहीं। 

“पार्टी के बाद मेरे पति ने इनको अपनी स्टेट में हमारे साथ चलने को आमंत्रित किया। उन्हीं दिनों हमारी स्टेट में दिल्ली के एक गुरु महाराज पधारे हुए थे, जो हमारे परिवार के गुरु भी थे। ये राजा साहब उन गुरु से बात करके, उनके वेदों के ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि मेरे पति के प्रोत्साहन पर  हमारी स्टेट में ही उन्होंने इनसे गुरु दीक्षा ले ली थी। हवनकुंड के पास बैठे सदाशिवलाल जी का गोरा शरीर भगवा वस्त्रों में इतना चमक रहा था की मैं एक्सप्लेन नहीं कर सकती। मेरे पति भी इतने उदार थे कि उन्होंने इनसे पूजा  समारोह का एक भी रुपया नहीं लिया। इस तरह से मेरे पति व इनकी दोस्ती हो गई थी।“

“जी, फिर क्या हुआ ?“  

रानी विभावरी आगे बताने लगीं, “जब कभी दिल्ली में हमारे गुरु महाराज के यहाँ भंडारा या कोई बड़ी पूजा होती तो हम लोग इनसे वहां मिलते थे। मेरे पति ने हिदायत दी हुई थी कि मैं इनका विशेष ध्यान रक्खूँ क्योंकि ये आँखों से लाचार तो थे ही। एक बार मुझे अचानक गुरु जी का तार मिला-‘‘तुम दिल्ली अकेले पहुंचो। स्टेशन पर ही तुम्हें कोई विशेष व्यक्ति मिलेगा जिसका तुम्हारे आगामी जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।“

गुरु घंटालों पर उसकी कभी आस्था नहीं रही, इस प्रदेश में उसने देखा है कि अधिकतर परिवारों के कोई ना कोई गुरु महाराज होते ही हैं। कोई डॉक्टर हो, इंजीनियर या व्यवसायी अपने गुरु की तस्वीर वह अपने ऑफ़िस  में रखता ही है। अक्सर उससे भी पूछा जाता रहा है कि आप कौन से सम्प्रदाय को मानती हो ?

वह किंचित क्रोध से घड़ी देखती विभावरी देवी जी से  बोली, “तो आप तार पाकर दिल्ली चल दीं ?“

“ओ... सॉरी, आपको देर हो रही है ? बस थोड़ी देर और सही। हाँ, तो मैं गुरु आज्ञा कैसे टाल सकती थी ? अब सोचिये जैसे ही मैं स्टेशन पहुँची तो देखा प्लेटफ़ॉर्म  पर हिज़ हाइनेस खड़े हैं। मेरे उनके पास जाकर ‘‘हेलो’’ कहने  से पहले उन्होंने शायद मेरे सेंट की खुशबू से मुझे पहचान कर भावुक हो मेरा हाथ पकड़ लिया, “विभावरी! सो यू आर इम्पोर्टेन्ट पर्सन इन माई लाईफ़।“

“मैं सकते की हालत में थी, क्या कहूँ ? बड़ी मुश्किल से मेरी जुबान खुली, मैंने उनसे पूछा वे दिल्ली में क्या कर रहे हैं? और जो उन्होंने बताया मेरे तो होश उड़ गए।“

“क्या बताया ?“ उसकी स्थिति ये हो रही थी कि इनकी कहानी खत्म हो और वह भाग ले... मन डाइनिंग टेबल पर भटक रहा था कि जरूर बच्चे दही या दाल लेना फॉर्म भूल जाएंगे। पक्का दाल तो लेंगे ही नहीं क्योंकि मूंग दाल से चिढ़ते हैं।

“उन्होंने बताया था कि गुरु महाराज ने उन्हें भी तार देकर बुलाया था व कहा था कि कोई स्पेशल पर्सनेलिटी इस ट्रेन से उतरेगी और उनका जीवन बदल देगी। सच मानिये हम लोग हल्के हल्के काँप रहे थे। मैं मन ही मन खुश  थी क्योंकि अनजाने ही उन्हें धार्मिक समारोह में सहारा देते मेरे हाथों को उनका स्पर्श अच्छा लगने लगा था। मैं अपनी स्टेट में होती तब भी उनके सेंट की खुशबू में जैसे सराबोर  रहती थी।“

“फिर आगे क्या हुआ?“

“गुरु महाराज ने एक तरह से हम दोनों को आज्ञा दी कि विधि का विधान कह रहा है कि हम दोनों शादी कर लें। सोचिये मैं कैसे गुरु आज्ञा मानने से इंकार कर सकती थी ? “

“आपके पति तो ये बात सुनकर आप दोनों को बन्दूक से मारने निकल पड़े होंगे ?“ 

“नहीं, वे बहुत सज्जन व्यक्ति थे व गुरु जी को व उनके आदेश को बहुत मानते थे इसलिए उन्होंने भी शादी करने की अनुमति दे दी।“

“और आप अपने पति व बच्चे को छोड़कर यहां आ बसीं ?“

“उनको छोड़ा कहाँ ? मैं दोनों परिवारों को सम्भालती  रही। इनका महल देखती रही। वे लोग भी हिमाचल प्रदेश  से यहां आकर रहते थे। बहुत स्नेह भरे सबंध थे हम सबके। अब तो वे नहीं रहे तो स्टड फॉर्म व इतना बड़ा कारोबार मेरे बच्चे ही सम्भालते हैं।“

“ओ ...आपने तो बहुत रोचक व फिल्मी कहानी सुना डाली। अच्छा तो अब चलती हूँ। “उसने उठते हुए कहा.

वे भी सोफ़े से खड़ी हो गईं, “आप तो पास ही रहतीं हैं,जब भी समय मिले आया करिये।“                    

उस जड़बुद्धि ने कभी रानी विभावरी की इस कहानी पर गहराई से विचार नहीं किया।     

ये सर्वे करते हुये महारानी छोटा उदेपुर से भी उसे एक और दिलचसप कहानी सुनने को मिली थी, “महाराजा उदेपुर पृथ्वीराज चैहान के वंशज थे व मुम्बई में व्यवसाय किया करते थे। मैं अकेले महल में रहकर नौकरों के षडयंत्र झेलती थीं। हमारे महल से कीमती पीतल का फूलदान या सोने या चांदी के डिनर सेट की कटोरियाँ या कोई प्राचीन मूर्ति गायब होती रहती थी। ओहदेदारों को डांटती तो वे 

धमकी देते कि वे हमारे बच्चों को मार डालेंगे। “महारानी जी की आँखें सजल हो आईं थीं, “मैं राजमहल में अकेली होती थी इसलिए उनकी धमकी से बहुत डर जाती। मैं सारी सारी रात सोते हुए बच्चों के सर पर हाथ रखकर बैठी रहती थी।“ 

कभी कोई आवाज़ बदलकर फ़ोन करके उन्हें डरा देता कि  महाराजा का मुम्बई में कत्ल हो गया है, ट्रेन से उनका शव आ रहा है। वह बदहवास कार चलाती स्टेशन पहुंचतीं लेकिन ट्रेन रुकती और वे एक एक डिब्बा झांकती जातीं। न उनमे शव होता, ना कोई राज्य का हरकारा। उन्हें राहत तो पहुँचती लेकिन वह क्रोधित होती महल लौट आतीं। इसीलिये वे स्वतंत्रता के बाद बेहद खुश थीं। उसके सर्वे से तो और भी खुश कि लोगों का भ्रम टूटे कि रानियां मजे़ -एशोआराम में राज्य करती थीं।

ज़िंदगी भागती गई थी। बस जब उन दिनों रानियों पर ये सर्वे प्रकाशित हुआ तो उसने सोचा कि ये रानी विभावरी पास में रहतीं हैं तो क्यों न ये पत्रिका उन्हें दे ही आये। 

उन्होंने बड़ी व्यग्रता से वह पत्रिका खोली लेकिन अपनी बताई कहानी प्रकाशित ना देखकर वो कुछ कड़वाहट से भर गईं, “आपने तो मेरी बैकग्राउंड के बारे में कुछ नहीं लिखा ?“

“जी ये सर्वे किसी के जीवन की बैकग्राउंड पर नहीं था सिर्फ़ एक रिसर्च थी रानियों के बदले जीवन पर। “बस उन्होंने उस आग उग़लती आँखों से घूरते हुए पानी के लिए भी नहीं पूछा था। वह मन ही मन हँसते हुये चल दी थी। उनकी इस कहानी को इस सर्वे में लिखने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। उसके इस मेहनत से किये सर्वे ने अपना व  औरों का भ्रम तोड़ा था। इनमें से किसी भी रानी को सोने के तार वाली पोशाकों, सोना, चांदी व हीरे, मोती में कोई दिलचस्पी नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद शासन की बंदिशें टूटते ही दुनियां में ये अपने हिसाब से अपना जीवन भरपूर  जी सकीं थीं, खुलकर मुस्करा सकीं थीं।                               

हाँ, इस शहर के अपने दो मंज़िले  बंगले में छोटे उदेपुर की महारानी ने बहुत स्नेह से पत्रिका ली थी,“ आपने बताया था कि आपकी इच्छा है कि छोटा उदेपुर आकर आदिवासियों का मेला देखें। हमारी तरफ़ से आमंत्रण है कि जब भी आपको नवरात्रि पर या होली पर समय मिले आप हमारे महल में पधारें। “

“अभी कुछ वर्ष निकलना सम्भव नहीं है, जैसे ही समय मिला, हम लोग अवश्य आएंगे।“

उसे इस राज्य के आदिवासी मेले को देखने का बहुत शौक था। वे आस पास के गाँवों से चलकर होली पर व नवरात्रि  में रात भर राजघराने के देवी माँ के मंदिर के सामने नगाड़े की ताल पर एक बांस लिए या वैसे ही नृत्य करते रहते हैं। और हाँ, यदि रास्ते के गाँव में कोई उनका दुश्मन रहता है तो दुश्मनी निबटाने के लिए उसका कत्ल करके आगे बढ़  जातें हैं। ये बर्बर प्रथा समय के साथ कम तो हुई है। तीन चार वर्ष बाद उसका परिवार महारानी उदेपुर का मेहमान बना था। सप्तमी के दिन एक गैस्ट हाउस में पहुँच गए थे।

छोटा उदेपुर  के गैस्ट हाऊस में जैसे जैसे रात गहराने लगी कुछ अंतराल से बार बार बांसुरी की धुन सुनाई देने लगी मतलब मेले के लिए गांव वालों का आना शुरू हो गया था। सब उत्सुकता से खिड़की के पास कुर्सियाँ डालकर बैठ गए। इस छोटे से कस्बे के अधकच्ची सड़क पर बिजली के खम्बों पर पीले बल्ब टिमटिमा रहे थे। उस मरियल सी रोशनी में दिखाई देने लगता सुदूर गाँव से बांसुरी बजाता आता कोई आदिवासी दल। अलग अलग गाँव के आदिवासी आठ दस लोगों के झुण्ड में एक हाथ लम्बी बांसुरी बजाते राजघराने के देवी के मंदिर की तरफ़ बढ़े जा रहे थे। सांवली स्त्रियां घुटनों तक सस्ती धोती पहने हुईं थीं, जिनके चमकते तेल लगे बालों में लाल या गुलाबी रिबन बंधे हुए थे। सांवले आदमी धोती या पेण्ट के ऊपर रंगीन कमीज  पहने हुए थे। किसी किसी ने पगड़ी भी बाँधी हुई थी। 

उसने सुन रक्खा था कि इस लम्बी बांसुरी में वे देसी दारू भरकर लाते हैं। कभी बांसुरी बजाते हैं ,थोड़ी देर बाद दारु पीते चलते हैं। इसी के नशे में स्त्री पुरुष सारी रात नगाड़े की ताल पर नाचते रहते हैं। ये लम्बी बांसुरी दूर दराज से आये ग्रामीणों के लिए मीलों चलने के लिए लाठी की तरह भी काम देती है। हल्के धुंधलके में आदिवासियों के आने के दृश्य को वह आँखों में भरे ले रही थी, ये दृश्य जीवन में दोबारा  देखना नसीब नहीं होगा।

उन्होंने  मंदिर के सामने ये  नृत्य देखा था लेकिन सिर्फ़  नगाड़े की एक सी ताल, एक ही नृत्य शैली में वे गोलाकार घूमते नृत्य कर रहे थे। छोटे बेटे ने एक लड़के से बांसुरी बजाने के लिए माँगी तो वह उसे जलती आँखों से घूरता भीड़ में गायब हो गया। 

दूसरे दिन गैस्ट हाउस में देर से जागकर अलसाये से रिसेप्शन के पास कुर्सियों पर बैठे वे लोग चाय पी  रहे थे। बरामदे में एक नाटी काली आदिवासी लड़की झाड़ू लगाते हुए अपनी भाषा में एक मधुर गीत गा रही थी। वह रिसेप्शन पर बैठे लडके से पूछ ही बैठी थी कि इस गीत का क्या अर्थ  है ? उस लड़के ने झिझकते हुए बताया था,“ यहां दस बारह साल की उम्र में ही लडके लड़कियों की दोस्तियां हो जातीं हैं। लड़कियों के मित्रों को ‘गोठिया’ कहा जाता है। ये लड़की गा रही है कि मैं सूरज की किरणों  के सामने आइना लेकर खड़ी हो जाउंगी। उसकी चमक तुम्हारे गाँव तक पहुंचेगी और तुम प्रियतम उसकी किरणें  पकड़ कर मेरे पास ,मेरे गाँव आ जाना।“

“वाह क्या सुन्दर कल्पना है ?“

नवरात्रि की अष्ठमी की पूजा के लिए महल में कुछ राजपरिवार के संबंधी आये हुए थे। उसका परिवार भी लंच  के लिए आमंत्रित था। जब उसका परिवार महल में पहुंचा तब तक अष्ठमी का हवन हो चुका था, बड़े दालान में बनाये हवन कुंड में हल्की अग्नि जल रही थी। राजपुरोहित व उनके सहायक अपनी दक्षिणा, मिठाई का डिब्बा व फल समेटने में लगे हुए थे। उसके परिवार ने चैकी पर प्रतिष्ठित देवी के सामने सिर झुकाया था व आरती की थाली में रूपये चढ़ा दिए थे। 

एक सेवक ने उन्हें सीधे ही डाइनिंग  हॉल में चलने का आग्रह किया। डाइनिंग हॉल में पचास लोगों की खाने की मेज़ पर पंद्रह  सोलह मेहमान बैठ चुके थे। महारानी कुर्सी पर बैठी अपने राजसी भारी भरकम गहनों में व बनारसी  सिल्क साड़ी में शानदार लग रही थीं। उन्हें देखते ही उन्होंने कहा,“वेलकम टु ऑल। प्लीज़ हैव अ सीट।“ 

महाराजा छोटा उदेपुर ने भी उनका सिर हिलाकर अभिवादन किया। महाराज भी घर की पूजा के कारण पारम्परिक राजसी पोषाक में थे। सिर पर कलगी वाली पगड़ी थी व कमर में कटार। मेज़ पर डोंगों का अम्बार  लगा हुआ था। वह छोटा उदेपुर के राजमहल के डाइनिंग हॉल का  जायजा लेने लगी। चारों दीवारों पर मृत शेर के, जंगली भैंसे के या चीते के सिर भूसे भरे संरक्षित किये टाँगे हुए थे। उसने सोचा जमाना कितना बदल गया है- पहले दीवारों पर जानवरों के कटे सिर लगाना शान समझी जाती  थी। आज की दुनियाँ इन्हीं के संरक्षण में लगी हुई है। यहाँ तक कि बहुत से विदेशी चमड़े  से बने पर्स, कोट, बैल्ट, जूते पहनना छोड़ते जा रहे हैं, और तो और मीट मटन छोड़कर शाकाहारी बने जा रहे हैं।           

छोटा उदेपुर की महारानी ने उसकी तरफ़ राज़मा का डोंगा बढ़ाया था, “हमने खासतौर पर एक पंजाबी कुक रखा है जो पंजाबी डिशेज अच्छे बना सके।“

एक चम्मच राज़मा चखकर उसका जायका ख़राब हो गया था, इससे अच्छा राज़मा तो वह अपने घर बना लेती है।  लंच के बाद महाराजा ने सबसे कहा था, “हम लोग ऊपर चलते हैं। आपको दरबार हॉल भी दिखा देंगे। उसे हमने म्यूज़ियम बना दिया है।“        

दूसरी मंज़िल पर दरबार हॉल के बरामदे की तरफ़  खुलने वाले सभी विशालकाय दरवाज़़े खुले हुए थे  लेकिन उनके बीच में एक रस्सी लगाई हुई थी। उन लोगों को देखते ही वहां खड़े दरबान ने वह रस्सी खोल दी। महारानी अंदर घूमते हुये बताने लगीं,“ यहाँ जो मेहमान आते हैं उन्हें अंदर नहीं जाने देते। अब आप तो पढ़ी लिखी हैं समझतीं हैं ऐसे बड़े महल की मेन्टेन्स में कितना रुपया खर्च होता है। मेहमान लोग हर चीज को छू  छू कर देखने लगते हैं। बच्चे इन सोफों  पर उछल कूद करते हैं इसलिए सबको अंदर नहीं जाने देते लेकिन आप अंदर जाकर फोटोज़ ले सकतीं हैं।“

दरबार हॉल के विशालकाय सिंहासननुमा सोफ़े या दरबारियों के दोनों तरफ़ लगी नक्काशीदार कुर्सियाँ या भव्य मूर्तियाँ दीवार पर जड़ी फ्ऱैंच पेंटिंग्स, चीन के फूलदानों को  देखकर उसे समझ नहीं आ रहा था कि  किस किस की फ़ोटो ले। उसने फ़ोटो लेना बंद कर दिया तो सब लोगों को वे  खुली छत पर ले गये, “यहाँ से सारा छोटा उदेपुर  दिखाई देता है।“

बाद में सभी मेहमानों को कंगूरेदार झरोखे वाले पीछे  बड़े दालान में बिठा दिया था, जहाँ से बहुत सुन्दर 

प्राकृतिक दृश्य दिखाई दे रहा था, हरे भरे जंगल के बीच बीच बहती नदी की सफ़ेद धारा और सरसराती हवा। महाराजा व महारानी ख़ूबसूरत संखेड़ा के गुजराती झूले पर झूलते से बैठ गए थे। एक सेवक वहीं खीर की प्यालियाँ सर्व करने आ गया था। महाराजा उन्हें बताने लगे, “प्रिवी पर्स बंद होने से पैलेस का मेंटेनेंस करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। हम लोग इसे हेरिटेज होटल में बदलना चाह  रहे हैं। सर्वे करवा रहे हैं। “

किसी मेहमान ने कहा ,“गुड आइडिया।“

उसके बेटे की उत्सुकता कुछ और थी,“ ,“आप अपने पूर्वज महाराजा पृथ्वीराज चैहान के बारे में कुछ बताइये। मैंने कहीं  पढ़ा है कि मुहम्मद गजनवी ने  पृथ्वीराज चैहान जी को अफगानिस्तान के गजनी शहर के बाहर दफनवा दिया था। वहां से जो गुज़रता है उनके टॉम्ब को अपमानित करता जाता है। इट इज वेरी डिस्गस्टिंग।“ 

महाराज जैसे अतीत में  खो गये थे,“ यस, शहाबुद्दीन गौरी को महाराज ने अनेक बार युद्ध में शिकस्त दी थी लेकिन बाद में एक युद्ध के बाद अंधे हो गए थे। गौरी  पृथ्वीराज जी को  कैद करके गजनी ले गया था और उनके गले में मनों  भारी तोप बाँध दी  क्योंकि उन्हें डर था कि वे कहीं भाग ना जाये। उनका मुंह लगा दोस्त चंद्र बारोट वहां पहुँच गया व गौरी को उन्होंने चिढ़ाया कि आप महाराजा की धनुर्विद्या देखकर अपना मनोरंजन क्यों नहीं करते क्योंकि सौ सौ मन के सात तवे एक साथ रक्खे जाएँ  इनका बाण उन्हें बेधता निकल जाएगा। और सच ही गौरी ने एक मैदान में जनता को आमंत्रित कर डाला और सात तवे भी एक साथ लटकवा दिए। वह उन्हें चुनौती देने लगा कि  पृथ्वीराज ...बाण चलाओ ...हम भी तो देखें तुम्हारे मित्र का झूठ । चंद्र बारोट महाराजा के पास ही खड़े  थे। वे गुनगुनाने लगे ,“चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ,ता ऊपर सुलतान है,मत चूके चैहान।“

‘‘फिर क्या हुआ ?’’

‘‘चंद्र बारोट की कविता में इशारों से बताई गौरी के सिंहासन की स्थिति जानकार, जो तीर लोहे के भारी तवों की तरफ़ तना हुआ था अचानक घूमा और सनसनाता गौरी की छाती में जा धंसा। गौरी आश्चर्यचकित आँखें लिए चल बसा लेकिन सारे सैनिकों ने इन्हें घेर लिया। दुश्मन से दुर्गति करवाने से बेहतर इन शूरवीरों ने एक दूसरे को तलवार मारकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। उन दोनों का अफगानिस्तान में कहीं क्रियाकर्म कर दिया गया था।“

इस घटना को सुनकर वातावरण बोझिल हो गया। शायद इससे उबरने के लिए वहां बैठी एक भारी बनारसी साड़ी पहने महिला ने बात बदली व उसकी तरफ़ मुख़ातिब  होकर बोली, “आपका महारानियों रानियों  वाला सर्वे मैंने पढ़ा था।“ 

वह ख़ुश हो गई क्यों कि बरसों में कोई इक्का दुक्का इस अहिंदीप्रदेश में कहता है कि आपका लेख या कहानी पढ़ी  थी तो उसके कानों में घण्टियाँ बजने लगतीं हैं। उसने धीरे से कहा,“ थैंक्स, मेरा सौभाग्य है कि महारानियों व रानियों से मिलने का मौका मिला। ऐसी विभावरी देवी से मिलने का मौका मिला जिन्होंने अपना परिवार छोड़कर एक अंधे राजा की देखभाल की।“

“वॉट ? देखभाल माई फुट।“

“क्यों क्या हुआ, ये ग़लत बात है ?“

उस महिला ने अपने बालों में लगा सफ़ेद गजरा ठीक किया तो उनके हीरे के कंगन खनक उठे, “महारानी जी ! आपने इन्हें सच नहीं बताया ?“

उदेपुर की महारानी रहस्यमय मुस्कान मुस्करा दीं, “मैं  क्या बताती। पर्दे की बात पर्दे में ही रहे तो अच्छा है।“ 

वह महिला मुंह बिचकाते हुए बोली थी, “आप मीडिया पर्सन हैं आपको उन्होंने अंधे कर्नल साहब से मिलने की अपनी ड्रेमेटिक कहानी अवश्य बताई होगी व ज़ोर भी दिया होगा  कि इसे प्रकाशित करें।“

“जी हाँ, बताई तो थी लेकिन ये नहीं कहा था कि इसे प्रकाशित भी करवाएँ जब मैं उन्हें पत्रिका देने गई थी तो वे कुछ बुरा सा मुंह बना रहीं थीं। मुझे समझ नहीं आया था कि किस बात पर नाराज़ हैं।“

“उन्हें ग़लतफ़हमी होगी कि आप उनका इंटर्व्यू लेने आईं हैं तो इस प्रमुख बात को तो लिखेंगी ही। अगर कोई लोकल रिपोर्टर होता तो वह भारी भरकम उपहार भी दे देतीं।“

उसका धीरज जवाब देने लगा था,“  प्लीज़ ! बताइये ना क्या हुआ था ?“

“वो कर्नल साहब कुछ वर्ष बाद ही एक सुबह अपने कमरे में मृत पाए गए थे। कारण बताया गया था कि उन्हें हार्ट अटैक हुआ था लेकिन नज़दीकी रिश्तेदारों का शक यही था...“

महारानी उदेपुर किंचित क्रोध से बोली,“  प्लीज़ ! सोनल देवी जी अब बस भी कीजिये।“    

एक भयानक काला सन्नाटा फैल गया था उसके मन में यहां से वहां तक। क्यों वह विभावरी देवी के महल में बैठी पर्दों  व खिड़की व दरवाज़े से अंदर आने को आतुर उस सरसराते इतिहास की धड़कनें गिन  नहीं पाई थी ? उसी समय ज़रा एकाग्र होकर ध्यान देती तो अपने आप कड़ियाँ जुड़ती चलीं जातीं, इतिहास जैसे अपनी सलवटें खोलता उसके सामने अपने यथार्थ में झिलमिला रहा होता। 

प्राचीन राजा महाराजाओं के राजपुरोहितों के कारनामे जानने वाली वह, चाणक्य, धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, चन्द्रास्वामी, आचार्य रजनीश के देश की वह लेकिन उसकी जड़बुद्धि तब भी कुछ सोच नहीं पाई थी। बेटों के कैरियर मेकिंग सालों की अफ़रा तफ़री में ना उसे सोचने का समय था और ना पूछने की उत्सुकता  कि गुजरात की राजकुमारी विभावरी देवी हिमाचल प्रदेश  की किस स्टेट की रानी बनीं ? अकबर के विस्तारवाद से घबराकर कुछ राजपूत राजा या रजवाड़े के शासक जैसे जाड़ेजा, गोहिल, चैहान, वाघेला, सोलंकी, जेथवा, झाला उत्तर भारत से आकर गुजरात में आ बसे थे तो क्या कोई गुजराती शासक हिमाचल प्रदेश में चार सौ, पाँच  सौ वर्ष पूर्व बस गया था ? पता नहीं। अब वह बेबस उस भोले  चेहरे को वितृष्णा से याद कर रही है जिसने अंधे राजा के महल व जायदाद पर अपने पति के साथ कुटिलता से कब्जा करके बेहद मासूमियत भरी नौटंकी  से उससे कहा था,“ मुझे छोटे छोटे घरों में रहने का शौक  है। जिसमें रहकर लोग आपस में अपने दुःख सुख बांटा करते हैं।“