गलियों के शहज़ादे


अंजुम ज़मा, नई दिल्ली Email: anjum68@gmail.com


नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, माे. 9811119489

उस मोहल्ले की पहचान अब सिर्फ एक रह गई थी कूड़ों के ढेर से बना पहाड़ जो बस अड्डे की हाता खिंची सात फुट की दीवार से भी ऊँचा उठ चुका था। पता समझाने, बताने में अब उस घूरे का बड़ा महत्व हो गया था। इससे नये आने वाले को घर ढूंढ़ने में भी कोई खास परेशानी नहीं उठानी पड़ती थी। इस घूरे से प्यार करने वाले केवल दो जीव थे। गली के कुत्ते और शहर की गलियों में फिरने वाले लावारिस बच्चे जिनकी रोजी-रोटी का सिलसिला इस कूड़े के ढेर से जुड़ा हुआ था। कुत्तों की भूख को मिटाने के साथ उनकी जबान के चटखारे का भी यह स्रोत था। इसलिए पालनहारे के बनाए इन दो तरह के जीव में बड़ी मित्रता थी। लड़के कूड़ा खंगालते, काम की चीज को प्लास्टिक बोरी में डालते और खाने का झूठन दुम हिलाते कुत्तों के सामने फेंक देते थे। दाग लगा फल, बासी पूरी, केक का टुकड़ा या फिर कोई स्वादिष्ट व्यंजन प्लास्टिक में बँधा ठीक-ठाक हालत में होता तो उसको पहले सूंघते, खराब न होने की शंका दूर हो जाती तो वे खुद खा लेते। इस बँटवारे पर कुत्ते नाराज होकर कभी भौंकते नहीं थे बल्कि प्यार से उनका हाथ-पैर चाट अपनी स्वीकृति जताते थे कि कोई बात नहीं, भूख तो तुम्हें भी लगी होगी, पेट भरकर खा लो।

कूड़े वाले मोहल्ले में जब से नई दुकान खुली थी तब से कूड़े के ढेर में गोंद की शीशियाँ, जीरोक्स इंक की बोतलें, कार्बन, फीते, बालपेन की खाली रिफलें टूटे कटर, घिसे रबर कागज और कई तरह की अलमगलम दूसरी चीजें भी पड़ी नज़र आने लगी थीं। इससे घूरे के बच्चों की आमदनी बढ़ गई थी। वे जब उस दुकान के सामने से थैला पीठ पर लटकाए गुज़रते तो वहाँ बैठे लोगों को बड़ा ज़ोरदार सलाम दाग़ते थे। गन्दे साँवले चेहरे पर सफेद दाँतों की हँसी ऐसी अटपटी लगती कि वे सब भी हँसे बगैर न रह पाते। अक्सर छेड़छाड़ वाली भाषा का प्यार भरा आदान-प्रदान भी हो जाता था जिसका कोई अर्थ नहीं था मगर दिनचर्या का अटूट अंग बन गया था।

इन लड़कों का जिनकी उम्र आठ से पन्द्रह वर्ष तक थी कोई ठौर ठिकाना नहीं था। कहीं भी रात को जगह मिलती पसर जाते थे। ज्यादातर उनका जमाव गली के मोड़ पर हलवाई की दुकान के सामने वाले चबूतरे पर होता जहाँ जंजीर से बँधी लोहे की मेजें और लकडी की बेंचें पड़ी होतीं। कुत्ते भी आस-पास मंडराते रहते। हलवाई भी खुश था कि बिना चैकीदार रखे उसकी दुकानों की चैकसी हो जाती है। कभी-कभार बासी इमरती, जलेबी या समोसा खुश होकर उनमें बाँट देता था। सड़क के इन शहजादों को अपने चित्थड़े भी धोने का मौका मिल जाता था। वही पिछवाड़े घरों के सामने नगरपालिका का नल लगा हुआ था। बाँस की मदद से यह चबूतरे के बीच में लगे पेड़ की शाखों पर भीगे कपड़े टाँग देते थे। शाम को उतार लेते थे। इनकी सल्तनत यही थी जहाँ बेताज की बादशाहत इनको मिली हुई थी। अक्सर उन्हें बैठा देख कोई ग्राहक चाय पीते हुए पूछ लेता

‘‘कहाँ के हो?‘‘ 

‘‘यहीं के‘‘ 

‘‘तुम्हारे माँ-बाप कहाँ रहते हैं?‘‘ 

‘‘मालूम नहीं‘‘ 

‘‘उम्र क्या है?‘‘ 

“अब हमको क्या पता?‘‘

इनकी याददाश्त में कोई चेहरा या घर की चहारदीवारी नहीं थी। यह तो इन्हीं गलियों के पैदावार थे। शायद घूरे पर, नापदान में, किसी घर के पिछवाड़े गन्दगी में पड़े रोते पाये गये होंगे। माँ ने समाज के डर से अपनी कोख का रिश्ता काट बदहवास होकर इन्हें छोड़ दिया होगा या फिर उसकी इच्छा के खिलाफ यह काम घर वालों ने कई तरह के दबाव में आकर कर दिया होगा सो यह हालात के राजा बेटे हैं। मस्तमौला, अपनी मर्जी के मालिक अपने बल पर जीने वाले सूरमा जिन्हें भीख में हाथ फैलाना गंवारा नहीं है मगर कूड़े के ढेर से काम की चीजें छाँटना इनका मश्गला है आखिर पेट पूजा के लिए किसी को तो भगवान मानना पड़ेगा। 

इन साव सूखे, हड्डिले, काले साँवले लड़कों के बीच एक लड़का और शामिल हो गया जो आसपास के गाँव ‘मोराई टोला‘ से भागकर आया था। उसके चचा ने खेत के लालच में उसकी विधवा माँ की गर्दन गड़ासे से काट दी थी। बहुत दिनों तक उस लड़के का दम फूलता था और वह फटी-फटी आँखों से सबका मुँह ताकता रहता था। स्टेशन के पास वह राजू को खड़ा मिला। जहाँ वह कूड़ा बिनने गया था। किसी बात का वह जवाब तो नहीं दे पाया था मगर राजू के पीछे चल जरूर पड़ा था। यहाँ आकर वह एक-दो दिन भूखा प्यासा दुबका पड़ा रहा। कुछ देने पर भी उसने खाने से इनकार कर दिया। उसकी शक्ल देखकर लगता था जैसे उसने ऐसा भयानक कुछ देखा है जिससे भूख-प्यास लगना बन्द हो गई है। कई दिन बाद उसने सिर्फ इतना कहा था-

‘‘अब गाँव हम लौटकर न जइबे‘‘ ‘‘क्या कोई है तेरा वहाँ‘‘

‘‘नाही...‘‘ इतना कहकर उसकी फूली साँसें आँसुओं में बरस पड़ी। रोने के कुछ देर बाद उसने अटक-अटककर सब किस्सा बताया।

‘‘अच्छा हुआ हमारा कोई नहीं वरना यही सब होता।‘‘ एक लड़के ने सोचा।

‘‘चलो भूल जाओ। कल से हमारे साथ काम पर चलना।‘‘ राजू ने कहा और कुछ खाने को दिया।

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?‘‘ ‘‘नन्हें।‘‘ 

‘‘वहाँ क्या करते थे?‘‘ 

‘‘दूसरी कक्षा में पढ़ता था।‘‘ 

‘‘पढ़ते थे तुम?‘‘ कई लड़के फूहड़पन से हँस पड़े।  

‘‘हाँ‘‘ उनकी हँसी देख नन्हें भी हँस दिया।

दूसरे दिन वह उस टोली के साथ गया तो मगर कूड़ा खंगालने में उनकी मदद नहीं कर पाया। बदबू से उसकी नाक फटने लगी। गीली सड़ी चीजों को देखकर उसने अपनी उबकाई रोकी। बाकी बच्चे बड़ी तनमयता से कूड़ा छाँटने में व्यस्त रहे। उसके मन में कुछ टूट जुड़ रहा था। दिल चाह रहा था कि वह गाँव वापस चला जाये मगर उसको माँ के अन्तिम शब्द याद आ रहे थे जो जंगल में भागते हुए उसने मरने से पहले कहे थे।

‘‘तू भाग जा। तुझे भी तेरा चाचा मार डालेगा।‘‘ 

वह माँ की बात सुन बीच राह में पल भर ठिठका था मगर जब माँ की गर्दन उसी के सीने पर झूल गई तो वह खून देख रोता-चीखता सरपट उलटे पैर भागा था। चाचा कुछ दूर तक पुकारता उसके पीछे दौड़ा था फिर वह नज़र नहीं आया। आगे तक दौड़ने के बाद पटरी पर खड़ी गाड़ी के डिब्बे में घुस सीट के नीचे छुप गया था। गाड़ी चली तो उसका काँपना कम हुआ। कुछ देर बाद वह वहीं पड़े-पड़े सो गया। जब टेªन अपने अन्तिम पड़ाव पर ठहरी तो शोर के बीच किसी के जूते तले हाथ दबने से उसकी आँख खुली। दर्द को पीता हुआ वह बाहर निकला और घबराया सा भीड़ के पीछे चल पड़ा। भीड़ रिक्शा, मोटर, बस में सवार हो चली गई वह कुचली हथेली सहलाता सा खम्भे से लगकर खड़ा हो गया, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। दिल बुरी तरह अब भी धड़क रहा था। तभी राजू पीठ पर थैला लादे उसके पास आन खड़ा हुआ था।

रात को जब चैपाल सन्नाटी सड़क के किनारे चबूतरे पर जमी तो अन्य लड़कों ने उसको अपने हिस्से में से कुछ खाने को दिया। उसने लेने से इनकार कर दिया। उसका गला रुंध रहा था। आँखें कहीं और अटकी कुछ ढूँढ रही थीं। उसकी इस हालत को देखकर राजू को हँसी आ गई। पास बैठा कुन्नू बोला। 

‘ऐसे कैसे चलेगा रे?‘‘ न तू काम करता है न खाता है। अरे तेरे मरने पर कोई नहीं रोने वाला, ले खा तो‘‘ यह कहकर उसने उसके मुँह में सब्जी रोटी का कौर ठूँसा।

‘‘तुझे अभी पता नहीं है कि अकेले जीने का क्या सुख होता है....। याद कर रहा उन्हें; जो कहीं हैं नहीं....अबे बन्दर की औलाद खुश रहना सीख।‘‘ ‘‘कितने साल का है?‘‘ आठ का? क्या काम करेगा? कौन काम देगा?‘‘ कड़वाहट से भर मुन्नू बोला।

“जहाँ जाओगे कन्टाप खाओगे...मतलब गर्मागर्म झापड़। यह बड़ी उम्र के लोग बच्चों पर रहम खाना नहीं जानते। बस काम लेना जानते हैं। रात-दिन जुते रहो....यह नाखून देख....जमीन की रगड़ाई करते गायब हो गये अब तो उगते भी नहीं।‘‘

‘‘चुपचाप खा और ऐश कर, यह जगह लाखों में एक है बस बरसात में जरा मुश्किल पड़ती है। पुलिस का डंडा भी खाना पड़ता है मगर वह तीन महीने कट ही जाते हैं।‘‘ राजू ने हाथ धोते हुए कहा।

नन्हें ने एक रोटी किसी तरह खाके पानी पिया और हाथ मोड़कर उसकी तकिया बना चुपचाप लेट गया। उसको माँ याद आ रही थी। उसके हाथ की बनाई रोटी और साग का स्वाद याद आ रहा था। न चाहने के बावजूद उसकी आँखों में आँसू गिरने लगे। बिना कमाए वह भूखा नहीं रह सकता है और दूसरे कब तक उसको अपना हिस्सा खिलायेंगे? काम तो उसको करना पड़ेगा। मन मारकर उसको कूड़ा खंगालना पड़ेगा। रोते-रोते वह सो गया सपने में देखा माँ उसको साबुन से मल-मलकर नहला रही है, फिर तेल लगाकर कंघी कर उसके कन्धे पर बस्ता टाँग माथे को चूम धीरे से कहती है ‘‘मन लगाकर पढ़ियो नन्हे।‘‘ 

उसकी आँख खुल जाती है। पेड़ पर चिड़ियाँ जाग गई हैं जो पौ फटने की सूचना चहचहा कर दे रही है। वह कुछ देर लेटा रहा फिर नलके पर जाकर उसने मुँह धोया और कमीज उतारकर पानी से भिगोकर निचोड़ा फिर कुछ सोचकर वह नेकर समेत नहाने लगा। उधर आड़ में जाकर उसने नेकर उतारी फिर निचोड़कर दोबारा पहन ली। उसका मन हल्का हुआ। हवा से दोनों चीजें सूख जायेंगी। यह सोचकर वह बेंच पर जाकर बैठ गया। कुछ देर बाद एक-एक करके सब जाग गये। हलवाई ने दुकान खोली और बासी चीज उनको बाट दी। उसमें वह भी शरीक़ था। खाकर सबने नल से पानी पिया और नहाए धोए फिर थैला पीठ पर लादकर गाते, गुनगुनाते, गाली देते चल पड़े, वह भी उनके साथ हो लिया।

आज उसके थैले में कुछ चीजें थीं। शाम तक उसको बेचकर उसने इतने पैसे कमा लिए थे जिससे वह दो रोटी और भाजी दूसरों की तरह खरीद सका। उसकी जेब में आज एक चीज और थी। एक खूबसूरत मुन्नी सी शीशी, उसमें कुछ था। महक अच्छी थी। सँूघने के बाद उसने उसे चखा। उसमें एक स्वाद था। उँगलियों में चिपकन थी, जिसको बार-बार जोड़ने बन्द करने से वह समझ गया कि यह कोई चिपचिपी चीज है मगर गोंद को वह पहली बार देख रहा था। इसलिए समझ नहीं पाया। लेई और चावल से उसने पतंग और फटी किताब चिपकाई जरूर थी मगर वही चीज इतनी सुन्दर शीशी में होगी वह सोच नहीं पाया। रात को उसने अंगुलियाँ डालकर कई बार उस चिपचिपे पदार्थ को चाटा। उसकी आँखें झपकने लगी और थोड़ी देर बाद वह गहरी नींद में डूब गया।

जिन्दगी बिना किसी हंगामे के ख़ामोशी से गुज़र रही थी। नन्हें को अब कूड़ा बीनने में मज़ा आने लगा था। जिराक्स इंक और गोंद की खाली शीशियों को चाटने की उसको लत लग गई थी। उसकी इस अजीब हरकत को देखकर राजू ने उसको मना किया था मगर नन्हें माना नहीं था। उसको इससे सुकून मिलता था। एक नशा सा आता था जो उसको सुला देता था। उसके ज़हन से ज़हरीली यादों के दृश्यों को पोंछ देता था। उसकी आमदनी अब भी दूसरे लड़कों से कम थी। फिर भी काम चल रहा था। कई माह गुज़र गये। गोंद और जिराक्स इंक का मिश्रण उसकी मुलायम आँतों पर असर कर रहा था। इससे वह बेपरवाह था। उसका बदन शिथिल पड़ता जा रहा था। यह अन्य लड़के महसूस करने लगे थे। कभी-कभी जब वह उनके साथ निकलने की स्थिति में नहीं होता तो वे चले जाते। सारे दिन के बाद जब थके हारे लौटते तो उसको या तो फुटपाथ पर या गली के नाले वाली पुलिया पर औंधा पड़ा देखते। उनमें भी नन्हें के इस हाल को देख उदासीनता सी आ गई थी। उनकी खुद की उम्र भी कितनी थी जो वह माँ-बाप बन नन्हें को सुधारते-संभालते। जो था वह अपना खुद का माँ-बाप था। यही एक सच वह जानते थे।

चुनाव का जोर शहर में जगह-जगह था। हर तरह के वायदे जनता से किये जा रहे थे। इन लड़कों को भी खूब मजा आ रहा था। रात गये तक शहर की चहल-पहल देखते हुए घूमते रहते थे। कहीं कुछ बँट रहा होता तो खाने से भी नहीं चूकते थे। चुनाव खत्म हुआ तो नए आये नगरपालिका के उम्मीदवार की जीत में चहल-पहल रही फिर उनको वायदा याद दिलाया गया। विपरीत दल वालों ने विरोधी नारे लगा जुलूस निकाला। पोस्टर चिपकाए। थू थू....हाय हुआ जिसका नतीजा सामने आया। नगरपालिका की गाड़ी जगह-जगह के कूड़ा के ढेरों को समेटने लगी। जमादारों को कड़ी हिदायतें दी गईं। नाली नापदानों का बाकायदा मुआयना होने लगा। मच्छर मारने की दवा शाम को मोहल्लों में छोड़ती गाड़ियाँ घूमने लगीं। शहर को सुन्दर बनाने का अभियान छिड़ गया। यह नई तरह की सनसनी थी। जिसकी चर्चा सब कर रहे थे।

एक दिन ऐसा आया जब शहर के घूरे एक-एक करके गायब हो गये। उनकी जगह सुन्दर लोहे टीन के गहरे-गहरे कूड़ेदान रख दिये गये। जहाँ तक कुत्ते पहुँच नहीं पाते थे। कुछ भूख और आदत से मजबूर जाँबाज कुत्तों ने उसमें छलांग लगाकर पेट भरना शुरू कर दिया मगर निकलते वक्त बेबस हो उठे। उनका विलाप सुन जमादारों ने उन्हें कूड़ेदान से निकालने में मदद जरूर की मगर उल्टी झाडू के डंडे से उनकी जी भरकर पिटाई करने के बाद, उनका मन यूँ ही ख़राब हो रहा था इन दिनों मेहनत कर करके जबकि बरसों से वह काम करना भूल चुके थे। लंगड़े कुत्तों की बहुतायत देख किसी जागरूक नागरिक ने फोन कर दिया और कुत्ता गाड़ी चल पड़ी जगह-जगह से कुत्ता पकड़ने के लिए।

शहर एक कैफियत से गुजर रहा था। कुत्ता पकड़ अभियान के बाद हर जगह सन्नाटा छा गया। गाड़ी चालकों ने भी राहत की साँस लिया और रात को जख्मी कुत्तों के विलाप को सुनकर नींद उचट जाने वालों ने मीठी नींद का मजा लिया। शहर में ताजा साफ हवा बहने लगी। सूरज की किरणें बिना किसी रुकावट के धरती पर पहुँचने लगी थीं। पीली धूप का घेरा बचे-खुचे कीड़ों-मकोड़ों को खत्म करने में अपनी गर्माहट को हर कोने में पहुँचाने लगी थी। विरोधी पार्टी वाले अपना सा मुँह ले किसी नए मुद्दे की खोजकर नया आन्दोलन चलाने के फिराक में थे। 

इस साफ-सुथरे माहौल में उदास पाँच बच्चे खाली पेट बैठे सोच रहे थे कि काम माँगने कहाँ जायें? पूँजी पास नहीं तो रेडी लगायें? उनके नन्हें-मुन्ने दिमाग फिक्र के बोझ से दुखने लगे थे। खासकर उस जुलूस को देखकर जिसमें बाल श्रमिकों पर रोक लगाने की माँग की जा रही थी।

इन सातों शहज़ादों को उस रात नींद नहीं आई।                        


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