रेल यात्राओं की कुछ मधुर यादें

   अशोक श्रीवास्तव, -वसंतकुँज, नई दिल्ली, मो. 8587856637


इटारसी का वह फरिश्ता.....

वर्ष 1959 की गर्मी की छुटिट्यों के दौरान मैं पोर्ट ब्लेयर से जहाज द्वारा मद्रास - अब चेन्नई और फिर मद्रास से 

वाराणसी तक अपनी माता जी व छोटे भाई बहनों के साथ रेल से सफर कर रहा था। उस समय मेरी उम्र मात्र 9 वर्ष की थी। अचानक नागपुर के बाद मेरे छोटे भाई की तबियत काफी खराब हो गई। उसे बार-बार उल्टियां हो रही थीं। हमें इटारसी जक्शन से अपनी रेलगाड़ी बदलनी थी। दूसरी गाड़ी के आने में एक घंटे का समय था। हम सब परेशान थे। तभी लाल पोषाक में एक भारवाहक बन्धु फरिश्ते के रूप में हमारे सामने आये। अपनी दिहाड़ी छोड़ कर वे छोटे भाई की सेवा में जुट गये। यही नहीं दौड़ते हुये बाजार जाकर अपने पैसों से दवा भी ले आये और ईश्वर से प्रार्थना भी करने लगे। कुछ ही देर में भाई की उल्टियां बन्द हो गई और इटारसी से रेलगाड़ी बदल कर हम सकुशल वाराणसी तक की यात्रा कर सके। माता जी ने इटारसी के इस फरिश्ते की सेवा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुये कुछ धन राशि देनी चाही। परन्तु उन्होंने कुछ भी रकम लेने से इन्कार करते हुये बस मुस्कराते हुये इतना कह कर हमसे बिदा ली,‘‘बहन! यह तो मेरा फर्ज था।‘‘ 

इटारसी स्टेशन के उस लाल पोषाक वाले फरिश्ते का नाम तो मुझे याद नहीं है पर उनका चेहरा उनकी मानव सेवा व समर्पण और साथ में इटारसी स्टेशन को मैं कभी नहीे भूल सकँूगा।


कालका मेल का वह कूपे............

दिसम्बर 1978 में अपनी शादी के तुरन्त बाद अपनी धर्मपत्नी के साथ मैं इलाहाबाद से हावड़ा के लिये सफर कर रहा था। रात में इलाहाबाद जंक्शन से कूपे में अपनी सीट पर बैठा ही था कि कानों में एक मधुर आवाज गंूज उठी,‘‘ श्रीवास्तव साहब! शादी मुबारक हो.....‘‘ यह मधुर आवाज सुन कर मैं आवाक् रह गया। चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो देखा कि शादी की यह बधाई चन्द सेकेन्ड पहले मेरे लिये एक अपरिचित शख्स की ओर से थी। और ये शख्स कोई और नहीं यूनीफार्म में रेलवे के टी.टी. थे। लम्बा चैड़ा गोरा शरीर और बुलन्द आवाज़। उनका नाम तो याद नहीं कर पा रहा हूँ परन्तु अपनी डयूटी के बीच एक अनजान रेलयात्री को मधुर आवाज़ में शादी की बधाई देकर कुछ क्षणों के भीतर अपना बना लेने वाले रेलवे के उक्त स्टाफ के द्वारा कहे गये शादी की बधाई के वे अविस्मरणीय शब्द जीवन में बार-बार याद आते हैं और याद आते रहेंगे।


रेलवे सेे रिश्तेदारी.........

बात फरवरी 2008 की है। मेरी धर्मपत्नी, अंजू जी हावड़ा-दिल्ली राजधानी से कोलकता से इलाहाबाद तक का सफर कर रहीं थी। उनकी सहयात्री कोलकता की एक धर्मपरायण व परोपकारी भद्र महिला श्रीमती पुरी थीं। मेरी धर्मपत्नी श्रीमती पुरी से काफी प्रभावित हुई। बातचीत के दौरान श्रीमती पुरी ने मेरे बेटे दीपक की शादी के लिये उनके पारिवारिक मित्र व रेलवे स्टाफ, चड्डा परिवार की बेटी पारूल से विवाह प्रस्ताव रक्खा। रेलवे के उस 2ए.सी. कोच में  श्रीमती पुरी का वह विवाह प्रस्ताव सन् 2008 के नवम्बर माह में इलाहाबाद में संपन्न हुआ। रेलवे स्टाफ श्री चन्द्रजीत चड्डा व श्रीमती किरण चड्डा की सुपुत्री पारूल को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार कर हमें अपार प्रसन्नता हुई। हमें रेलवे के अपने रिटायर्ड  समधी व समधिन पर गर्व है। वास्तव में उनके माध्यम से भारतीय रेलवे से एक अनोखी व बेेजोड़ रिश्तेदारी जो हुई है।