बैसाखी: परंपरा और खालसा पंथ

   डॉ. शुभदर्शन, अमृतसर (पंजाब), मो. 9417290544



ऋतुओं पर आधारित त्योहारों के इस देश में बैसाखी एक मात्र ऐसा पर्व है जो सम्याचारक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। मध्यकाल में मुगलों के शासन दौरान शोषित व दबे- कुचले लोगों को संगठित करने और उन्हें स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा देने के लिए खालसा पंथ की स्थापना की गई थी। भारत में विक्रमी संवत इसी दिन शुरु हुआ। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के कारण इसे ‘मेष संक्राति’ और दिन रात एक समान होने की वजह से यह संत्सर के नाम से भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि भागीरथ इसी दिन स्वर्ग से 

धरती पर गंगा को लाने में सफल हुए थे और उससे अपने पित्तरों की आत्मिक शांति व मोक्ष प्रदान करा पाए। हरिद्वार और अन्य धर्म स्थानों के सरोवरों और पवित्र नदियों में स्नान के महत्व की परंपरा तभी से जारी है। फसल का कटान इसी दिन शुरु होता है। इसलिए आर्थिक संपन्नता की उम्मीद में झूमते किसान छमाही के परिश्रम को साकार होते देख मेलों व त्योहारों में शरीक होते हैं।

पंजाब में इस ‘कृषि त्योहार’ का सबल आर्थिक पक्ष भी है। गुरु नानक देव जी का जन्म इतिहासकार इसी महीने में हुआ मानते हैं। जबकि परंपरानुसार यह कार्तिक की पूर्णिमा में मनाया जाता है। हरिद्वार में पितरों को पानी देने का भ्रम गुरु जी ने इसी दिन तोड़ा। गुरु अमरदास जी द्वारा गोइंदवाल में शुरु बावली का कार्य इसी दिन संपन्न हुआ। मध्यकाल में पूरा समाज जाति, धर्म व वर्गो में बंटा हुआ था। धार्मिक पाखंड और कर्मकांड सामाजिक प्रगति व भाईचारे में सबसे बड़े बाधक थे। मुगल साम्राज्य धार्मिक कट्टरता की नींव पक्की कर रहा था। ऐसे में गुरु नानक देव जी द्वारा चलाए मिशन को साकार रूप देते हुए दशम गुरु गोविंद सिंह जी ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की। खालसा पंथ की स्थापना जहां औरंगजेब द्वारा तलवार के बल पर हिंदुओं का मुस्लमान बनाने के लिए चुनौती थी, वहीं जातियों और वर्गो में विभाजित दबे कुचले लोगों को स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा। खालसा पंथ की स्थापना ने पंजाब और भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के इतिहास में मानववादी दृष्टिकोण को एक क्रांतिकारी अभियान की शुरुआत दी। धर्म, संप्रदाय और इलाके की सीमाएं तोड़ कर यह दृष्टिकोण पूरी मानवता में नई जान फंूक गया। ‘सरबत का भला’ की विचारधारा ने ‘मानस की जात सबै एकिह पहिचानबो’ के आदर्श को सभी तरह की संकीर्ण भावनाओं से मुक्त कर दिया।

इस ऐतिहासिक घटना ने पूरे समाज में क्रांति ला दी। पहली बार मानव को मानव के रूप में देखा गया। समाज के दबे- कुचले शूद्र कहे जाने वाले, जिनकी परछाई भी उच्च वर्ग को सहन नहीं थी, को समानता का अहसास हुआ।  ‘रंगरेटे  गुरु के बेटे’ से सम्मानित लोगों को अपने से ऊंची जाति समझने वालों के साथ मिल-बैठने व उनकी संगत का अधिकार मिला। गुरु जी द्वारा चलाई ‘संगत और पंगत’ की विधि ने उन्हें लंगर में एक साथ बैठने की आश्चर्यजनक समानता का अहसास दिलाया। लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार भी था। लोकतंत्र का मुख्य आधार है समानता और यह समानता खालसा पंथ की स्थापना से मिली। इतना ही नहीं गुरु और चेले में भी समानता का उदाहरण प्रस्तुत करके गुरु जी ने ऐतिहासिक दृष्टि से प्रचलित गुरु के प्रभुत्व की मान्यता को ठुकराया। अभी तक गुरु को महान समझकर उसे पूजा के आसन पर बैठाने की परंपरा को नकार कर अपने ‘मानस की जात’ के आदर्श को सार्थक अर्थ दिए।

1699 को श्री आनंदपुर साहिब में बैसाखी के दिन  ‘पंज प्यारे’ बनाए गए, वे भारत के विभिन्न स्थानों से थे। वे अलग- अलग जातियों से थे। तथाकथित अछूत भी इसमें शामिल थे। इन ‘पंज प्यारो’ की जातियों और इलाकों से भी स्पष्ट है कि गुरु जी ने सिर्फ सिद्धांत ही नहीं दिए, बल्कि उन्हें व्यवहारिक रूप भी दिया। लाहौर से दयाराम क्षत्रिय,हस्तिनापुर (मेरठ) उत्तर प्रदेश से धर्म सिंह जाट, बीदर से चंद नाई, जगन्नाथपुरी से हिम्मतराय माशकी और द्वारिका से मोहम्मद चंद धोबी को  ‘पंज प्यारों’ के रूप में चुना गया। इस तरह सभी जातियों को एक मंच पर लाने के अलावा गुरु जी ने उत्तर, पश्चिम, पूरब और दक्षिण को भी एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। इसके साथ ही खालसे की मर्यादा भी गुरु जी ने निर्धारित कर दी, ताकि वह अपने आदर्श से न भटक सके। इसमें पंज ककार खालसे के लिए जरूरी बताए गए। ये हैं कछहरा, कड़ा, कंघा, केश और किरपाण। ये सब इसलिए जरूरी थे कि खालसा को सदा अपना आदर्श याद रहे। इन सबमें कछहरा उतम आचरण और संयम का प्रतीक है। इसे पहनने से मन में अपवित्र व दुर्भावना न आने और संयम से रहने का उद्देश्य है।

कड़ा की घर्षण दिल और दिमाग में फौलादी असर पैदा करती है। गुरु जी ने सभी को सोने -चांदी के स्थान पर लोहे का कड़ा पहनने का आदेश दिया। केश का महत्व प्राचीन ग्रंथों में भी उपलब्ध है। किसी सजा के रूप में केश (सिर के बाल) कटाने का आदेश इत्यादि अपमान का सूचक है। इनकी सफाई के लिए कंघा जरूरी बताया गया है और किरपाण को अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने और आत्मरक्षा के लिए जरुरी बताया गया है। इस तरह बैसाखी, जो खालसा स्थापना का अब पर्याय बन चुका है, हमें गुरु जी द्वारा स्थापित समानता, न्याय, आपसी सद्भाव और इंसानियत के आदर्शो पर चलने की याद ताजा दिलाता है। विज्ञान और पैसे की दौड़ के इस युग में मेलों का प्रचलन अब लगभग खत्म हो गया है परंतु धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह त्योहार आज भी प्रासंगिक है।