चंदर, मैं नवाँ चखाँ...?

 

  प्रकाश मनु, फरीदाबाद (हरियाणा), मो. 09810602327, ईमेल : prakashmanu333@gmail.com


आत्मकथा-अंश

बचपन को याद करूँ तो वे तिथि-त्यौहार जरूर याद आते हैं, जिनमें माँ को नित नए रूपों में देखने का अवसर मिलता था। इनमें एक ‘नवान्न’ का पर्व था, जिसमें नए अन्न की रोटी या शायद पराँठा बनता था। उसमें घी डालकर चूरी बना ली जाती। अब माँ आसपास सब बेटों को बिठा लेती थी। हाथ में चूरी का एक ग्रास लिए, एक-एक कर हम सब भाइयों से पूछती थी, “चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...श्याम, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...जगन, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...सतपाल, मैं नवाँ अन्न चखाँ?”

हम लोग ‘हाँ’ कहते, पर कभी-कभी माँ को तंग करने के लिए ‘न’ भी बोल देते थे। तो फिर माँ को फिर से यही सब सिलसिला शुरू करना पड़ता और यों माँ उस चूरी का एक-एक ग्रास खातीं और माँ के खाने के बाद फिर हमें भी वही सब मिलता। मगर इस पर्व की खासियत यह थी कि माँ भी हमारे साथ एकदम बच्ची बन जाती थीं और हम कितना भी तंग करें, उनके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आती थी। हम हँसते थे और माँ भी हमारे साथ बिल्कुल बच्ची बनकर हँसती रहती थीं। जैसे यह भी खो-खो जैसा कोई खेल हो।

इस उत्सव के पीछे की भावना क्या रही होगी? लगता है, यह कृषि व्यवस्था का पर्व है। घर में नया अन्न आया है। उसे अच्छी तरह धोकर, सुखाकर खाने के लिए तैयार कर लिया गया है। उसकी रोटियाँ बनकर सामने पड़ी हैं। पर नया अन्न है, तो पता नहीं कि वह कैसा हो? उसमें तनिक विषैलापन या कोई और नुकसानदायक वस्तु भी हो सकती है, जिसका हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता हो। इसलिए वह नया अन्न घर में आए और उसकी रोटियाँ पकें तो पहले बच्चे न खाएँ। घर के बड़ों को पहले उसे चखकर देखना चाहिए कि यह निरापद है कि नहीं। और अगर उसके खाने पर कोई नुकसान नहीं होता तो फिर घर के बाकी लोग भी खाएँ। 

माँ बड़ी थीं, घर और रसोई की रानी थीं, इसलिए नवान्न की शुरुआत वे खुद से करती थीं। और खाने से पहले वे हम सबको सतर्क भी करती थीं, “चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...श्याम, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...जगन, मैं नवाँ अन्न चखाँ?...सतपाल, मैं नवाँ अन्न चखाँ?” ताकि अगर उन्हें कोई नुकसान भी होता है तो घर के सदस्य इससे वाकिफ रहें और समय पर उपचार करके उन्हें बचाया जा सके।

पर यह तो आज सोचता हूँ। उस समय तो नवान्न हम सब भाइयों के लिए एक मजेदार खेल ही था, और माँ हमारे साथ यह खेल खेलती हुई सचमुच बड़ी मोहक लगती थीं।

इसी तरह नवरात्रों के समय माँ का उत्साह देखते ही बनता था। माँ ‘खेतरी’ (घर के आले में जौ बोना, प्रतीकात्मक खेती) बड़े शौक से बीजती थीं। उसके लिए श्याम भैया खासकर खेतों से मिट्टी लाते थे। माँ ने खेतरी बोने के लिए एक अलग आला बनवा रखा था। जौ बोए जाते थे और जिस बरस माँ की यह छोटी सी खेती खूब जोरों से लहलहाती, माँ की खुशी और उमंग का क्या ठिकाना! सुबह कथा होती, आरती होती। उसमें माँ देवी माँ की बहुत सी आरतियाँ और भजन गातीं। पर मुझे उनमें एक ही पसंद था जिसमें माँ के साथ-साथ दोहराना मुझे अच्छा लगता, “नीं मैया, तेरा काँगड़ा घर चंगा...!”

इस आरती में आगे एक पंक्ति आती थी जो मुझे बड़ी पसंद थी, “नंगी-नंगी पैरीं राजा अकबर वी आया, सोने दा छतर चढ़ंदा...!” (नंगे पैरों राजा अकबर भी यहाँ आया और उसने सोने का छत्र चढ़ाया। अरी माँ, तेरा काँगड़ा वाला घर बड़ा अच्छा है!) इस आरती की हर पंक्ति के तुकांत को मैं इतना रस लेकर और इतने मजे में, बल्कि कहना चाहिए, थोड़े शरारती अंदाज में दोहराता कि गाते-गाते माँ की हँसी छूट जाती और संग-संग मैं भी जोरों से हँस पड़ता। यानी भक्ति में भी थोड़ा खिलंदड़ापन आ जाता और उसकी गंभीरता थोड़ी कम हो जाती। पर मेरी उदार विचारों की माँ को इसमें कोई आपत्ति न थी।

इसी तरह होई या अहोई भी माँ का प्रिय त्योहार था। मेरा खयाल है, उत्तर प्रदेश में इसे अहोई माता का त्योहार कहते हैं और पंजाब में होई का। और यह संतानों की कल्याण कामना का त्योहार है! बहरहाल उस दिन भी गुड़ का शीरा और डोइयाँ बनतीं। हम बच्चे कुंडा खड़काते हुए जोर-जोर से चिल्लाते, “होई...होई...होई, लै आपणा दुद्ध-पुत्तर, दे मेरी डोई...!” फिर माँ के पुकारने पर हम दौड़कर जाते और वहाँ गुड़ के शीरे में डूबी डोइयाँ खाने के बाद, लौटकर फिर चिल्लाना शुरू कर देते, “होई...होई...होई, लै आपणा दुद्ध-पुत्तर, दे मेरी डोई...!”

दुद्ध-पुत्तर क्या है, यह भला कौन जानता था? हाँ, गुड़ में डूबी आटे की डोइयाँ घर भर में-और साथ ही हमारे दिलों में भी आनंद और उल्लास भर देतीं। खेल में लीन हम बच्चे तब शायद इन चीजों को ज्यादा नहीं महसूस कर पाते थे। पर बच्चों के इस खेल के साथ ही घर भर में कैसा आनंद लहलहा उठता है, इसे वे स्त्रियाँ खूब अच्छी तरह समझती थीं और उनके खुशी से दमकते चेहरों पर महसूस किया जा सकता था। 

और करवा चैथ का तो नजारा ही कुछ और था। सुबह-सुबह बड़े अँधेरे ही खासी चहल-पहल से हम बच्चों की नींद खुलती। उठकर देखते तो साथ वाले कमरे में बढ़िया-बढ़िया पकवानों से सजी थालियाँ लिए भाभियाँ। खूब हँसती, बातें करती और साथ-साथ थोड़ा-बहुत खाती हुई। उनके बीच माँ, मानो किसी राजमहिषी के-से गौरव से भरी हुई नजर आतीं। 

मैं अचानक वहाँ पहुँचकर मजाक करते हुए कहता, “अच्छा, तो चोरी-चोरी खाया जा रहा है!” इस पर भाभियों सहित माँ खूब जोरों से हँसतीं। और कहतीं, “अच्छा चल, तूँ वी खा लै...!”

शाम को करवाचैथ व्रत की कथा होती तो आस-पड़ोस की स्त्रियाँ सज-धजकर हमारे घर आतीं और माँ की कथा शुरू होती। उस कथा की कोई और बात तो मुझे याद नहीं। बस, एक लाइन जरूर याद है, जो मुझे तब अपनी विचित्र ध्वन्यात्मकता के कारण बहुत आकर्षित करती थी कि “जेहड़ी राणी हाई, ओह गोली हो गई ते जेहड़ी गोली हाई, ओह राणी हो गई...!” (यानी जो रानी थी, वह दासी बन गई और जो दासी थी, वह रानी बन बैठी!) इन शब्दों में पता नहीं ध्वन्यात्मकता का कैसा जादू है कि आज भी इन्हें दोहराते ही मानो माँ और घेरे में बैठी स्त्रियों का पूरा ‘कथा-संसार’ भीतर-बाहर से मेरे आगे खुल पड़ता है।

कुछ और भी छोटे-मोटे व्रत-त्योहार थे। इनमें एक ठेठ देशी किस्म का त्योहार बासी खाने का भी था जिसे ‘बेवड़े’ या ऐसा ही कुछ कहा जाता था। मेरा खयाल है, उसी को कहीं-कहीं ‘बासड़े’ भी कहते है और यह होली के कुछ ही रोज बाद आता है। और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसी को कहीं-कहीं शीतला माता के व्रत या त्योहार के रूप में मनाया जाता है। जिस दिन त्योहार होता, उससे एक रात पहले आलू के ढेर सारे पराँठे बनाकर रख लिए जाते और अगले दिन हम वही खाते। उस दिन चूल्हा सुलगाने और गरम खाने की मनाही थी। क्यों भला? यानी इसके पीछे असली बात या विश्वास क्या था? इसे मैं आज तक नहीं जान पाया। हालाँकि एक मित्र ने पिछले दिनों बड़े आत्मविश्वास के साथ समझाया, कि “भाई, बेवड़े पर्व में एक प्रतीकार्थ है कि आज तुम बासी खाना खा लो, पर यह बासी खाना खाने का आखिरी दिन है। इसके बाद बासी खाना बंद। आगे से ऋतु-परिवर्तन के कारण ताजा बनाकर ही खाना चाहिए।” 

यह व्याख्या सही है या गलत, नहीं कह सकता। मगर इतनी बात तय है कि पुरानी बहुत सी चीजों का प्रतीकात्मक मतलब तो है ही। उनसे नए और पुराने वक्तों की तुलना करने का आनंद भी हमारे हाथ आ जाता है। 

बात त्योहारों की चल रही थी। उसी सिलसिले में याद आया, शुरू में शिवरात्रि भी हमारे परिवार में खूब जोर-शोर से मनाई जाती थी। शाम के समय आँगन में उपलों की आग सुलगाई जाती। उसके चारों ओर पानी छिड़कते हुए हम लोग परिक्रमा करते। माँ उस आँच पर मोटे-मोटे ‘रोट’ सेकतीं। नमकीन भी, मीठे भी। और वे कई दिनों तक मीठी और नमकीन लस्सी के साथ खाए जाते। मुझे याद है, मीठी लस्सी के साथ नमकीन रोट और नमकीन लस्सी के साथ मीठे रोट खाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

यहीं यह दर्ज करना भी शायद अप्रासंगिक नहीं कि माँ शिवभक्त थीं और उन्होंने ही मेरा नाम शिवचंद्र प्रकाश रखा था। हालाँकि इतना लंबा नाम चला नहीं और स्कूल में दाखिले के समय हैड मास्टर साहब ने खुद-ब-खुद छोटा करके उसे चंद्रप्रकाश बना दिया। पर यह बात मन में पुलक भरती है कि इस नाम में माँ की छुअन है और मेरे नाम में जुड़ा चंद्र असल में शिव के मस्तक में जड़ा चंद्रमा है। 

त्योहार के दिन माँ की बनाई चीजों और खाने में पता नहीं कैसे, अनोखा रस आ जाता। यों माँ कोई असाधारण पाक-कलाशास्त्री न थीं, पर उनकी बनाई चीजों में बड़ा रस होता था। माँ के बनाए खाने की बात करें तो माँ आलू और मूली के पराँठे खूब अच्छे बनाती थीं। मक्के और बाजरे की खूब घी से तर रोटी तो शायद वैसी कोई बना ही सकता। उसे हम लोग रोटी नहीं, ‘ढोढा’ कहा करते थे। यानी मक्के का ढोढा, बाजरे का ढोढा...वगैरह-वगैरह। सर्दी के दिनों में ऐसी चीजें हमारे लिए किसी अनमोल नेमत से कम न थीं और इनके आगे पाँच तारा होटल तो छोड़िए, स्वर्ग के पकवान भी हम छोड़ सकते थे। और सर्दियों में माँ के हाथ की बनाई गुड़ और आटे की पिन्नियों के लिए तो आज भी तरसता हूँ। दुनिया की अच्छी से अच्छी मिठाई से वे मुझे ज्यादा स्वाद भरी लगती थीं। 

’माँ ने याद नहीं पड़ता कि कभी पीटा हो। बल्कि पीटना तो दूर, याद नहीं पड़ता कि माँ ने कभी हलके से भी डाँटा हो। माँ को न जाने कैसा यह अजब-सा विश्वास था अपनी संतानों को लेकर कि मेरे बेटे या बेटियाँ गलत नहीं हो सकते! या वे कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते।...

एक छोटी सी घटना याद आ रही है-और वह होली के मौके की है। हुआ यह कि होली को मुश्किल से एक-दो दिन बाकी थे। हम सब बच्चे अपनी-अपनी पिचकारियाँ लिए मोरचों पर डटे थे। हमारे घर के सामने खुला मैदान है, जिसके चारों सिरों से चार गलियाँ निकलती हैं। यानी कोई कहीं से भी इनमें से निकलकर आ सकता था या जा सकता था। और हमारी चैकन्नी निगाहें इन चारों छोरों पर थीं। इतने में एक सज्जन ड्राईक्लीन किए हुए बढ़िया कोट-पैंट, टाई पहने हुए निकले। रोब-रुतबे और घमंड की साकार मूर्ति! अब उन पर कौन रंग डाले? सभी बच्चे डर रहे थे तो मैंने बीड़ा उठाया। मैं उस छोटे से बालदल का नायक जो ठहरा! मैं चुपके-चुपके उनके पीछे गया और फिर एकाएक अपनी पिचकारी से उन्हें छींटमछींट कर दिया। 

पता लगा तो वे कोट-पेंटधारी महाशय गुस्से में फनफनाते हुए मेरे पीछे दौड़े। मैं तब छोटा सा था। दुबला-पतला और एकदम चुस्त। लिहाजा एकाएक उछलकर घर के अंदर! अब मैं सुरक्षित घेरे में था। वे सज्जन भी तेजी से घर में आना चाहते थे कि हमारे चबूतरे पर धड़ाम से गिरे।...चबूतरे पर काफी गीला रंग बिखरा हुआ था। लिहाजा जितना हमने लगाया, उससे ज्यादा रंग खुद-ब-खुद लग गया। 

अब तो उनका गुस्सा और भी बुलंद। अदर आकर उन्होंने शिकायत की। माँ ने कहा, “मैं डाँटूँगी इन्हें, पर ये तो छोटे बच्चे हैं। बेटा, तू बता, तूने कौन-सी समझदारी की कि होली से एक दिन पहले यह सूट पहनकर चला आया?... तू तो इनसे भी गया-बीता है!” 

सुनकर उनका पारा उतरा, शर्मिंदा हुए। बाद में माँ ने हमें समझाया कि ऐसा नहीं करते। पर दूसरों के आगे अपने बच्चों को किसी शेरनी की तरह वे बचाती थीं! और धीमे से सीख भी देती जातीं कि देखो, मुझे तुम्हारी वजह से कहीं नीचा न देखना पड़े!

अलबत्ता माँ का यह विश्वास जाने-अनजाने हमें बहुत ताकत, बहुत बल देता था और आज भी देता है। लगता था कि माँ का चाहे हम पर यह भोला विश्वास ही है, पर हमें इस विश्वास को झूठा नहीं होने देना, खुद को भटकने नहीं देना।

एक दिलचस्प बात यह है कि माँ पिता से बड़ी थीं, शायद कुछ महीने। मुझे शुरू-शुरू में जब यह पता चला तो बड़ी हैरानी हुई थी। आज भी इसे याद करता हूँ, तो चकित होता हूँ। पिता सौ बरस पूरे करके गए, 19 जून 2009 को। इस लिहाज से उनका विवाह कोई पचासी बरस पहले-यानी सन् 1925 में हुआ होगा। उस समय ऐसे विवाह का होना जिसमें वधू की उम्र दूल्हे से अधिक हो, चाहे वह कुछ महीने ही अधिक क्यों न हो, सचमुच बड़ी चीज थी।

माँ बड़ी थीं तो अपने बड़प्पन का एकाध बार इस्तेमाल कर भी लेती थीं। यों तो पिता बहुत बोलते, बहुत गुस्सा करते थे और माँ अकसर चुप रहती थीं या बहुत कम जवाब दिया करती थीं। पर माँ पिता से दबती या डरती हरगिज न थीं। और कभी-कभी तो जब उनका धैर्य जवाब दे जाता था, उलटा सुना दिया करती थीं, “बस-बस...! हुण बस कर।” और पिता की बोलती एकदम बंद!

ऐसा मुझे याद पड़ता है कि अकसर तभी हुआ करता था जब या तो पिता घर के काम में अनुचित दखलंदाजी करते थे या फिर उस समय जब पिता हम भाई-बहनों पर नाराज होकर हमारे बारे में कोई छोटी बात कहते थे। घर माँ का साम्राज्य था जहाँ की वे ‘राजरानी’ थीं। उसमें पिता की दखलंदाजी वे बिल्कुल सहन नहीं करती थीं। इसी तरह माँ सब सह सकती थीं, पर अपनी संतानों की हेठी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती थीं। आखिर हम उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना थे और सचमुच एक बड़ी तपस्या के साथ उन्होंने हमें पाला था।

एक बार तो अपने बड़े बेटे की मदद लेकर माँ ने पिता को गलत राह जाने से रोका था। हमारे घर के वे बहुत दुखभरे दिन थे। इसलिए कि पिता ने शिकोहाबाद आकर खासा कमाया था, पर इस कमाई के साथ ही उनमें वे व्यसन भी आने लगे थे जो अति समृद्धि से जनमते हैं। वे सट्टा खेलने लगे थे और सट्टे में उस समय के हिसाब से भी हजारों रुपए गँवा चुके थे। घर की हालत डावाँडोल थी। साथ ही परिवार की इज्जत भी दाँव पर थी। पर पिता को इस सबका होश न था।

माँ को लगा कि अब हालत यह है कि कुछ न किया गया, तो घर दिवालिया हो जाएगा। उन्होंने बड़े बेटे बलराज को बुलवाया। सारी बात बताई। वे रुकनपुरे में एक अलग घर में रहते थे, पर माँ-पिता के श्रवणकुमार पूत थे। माँ के बुलाने पर दौड़े-दौड़े घर आए। और मुझे याद है, उस समय का उनका क्रोध से तमतमाया चेहरा। लाल, एकदम लाल। पिता की बाँह पकड़कर वे उसी कमरे में बने मंदिर के आगे ले गए। बोले, “मेरी कसम खाओ कि आगे से कभी सट्टा न खेलोगे। खेलोगे तो मेरा मरा मुँह देखोगे!”

ओह, उस समय की पिता की बेचारगी। उन्होंने सिर झुकाकर लगभग आर्त होकर कसम खाई। माँ जीतीं। बड़े भाई जीते और सचमुच पिता का सट्टा खेलना हमेशा-हमेशा के लिए खत्म!

आज भी मुझे यह सोचकर ताज्जुब होता है कि माँ के पास वह कौन-सी अंतर्दृष्टि थी कि खुद अनपढ़ होते हुए भी वे अपनी संतानों के बारे में सब कुछ जानती थीं। श्याम भैया की बीमारी के दौरान माँ का रात-रात भर जागना और परेशान होना मुझे अच्छी तरह याद है। श्याम भैया अपनी बीमारी की वजह से कुछ ज्यादा ही गुस्से में आ जाते थे और उसे सँभाल नहीं पाते थे। इसलिए माँ श्याम भैया के पास आने से तो बचती थीं, पर दूर रहते हुए भी एक-एक चीज का हिसाब रखती थीं। श्याम अब तक नहाया या नहीं? श्याम ने खाना खा लिया या नहीं? एक-एक छोटी से छोटी बात की चिंता। श्याम ने खाना नहीं खाया तो वे कैसे खा लें! रोटी का कौर उनके गले से उतरता न था।

माँ ने ममता की किस बारीक डोरी से पूरे घर को लपेटकर एकजुट किया हुआ था, यह आज मुझे बेहद चकित करता है। असल में माँ के लिए उनकी संतानों में कोई छोटा-बड़ा नहीं था। उनके बेटों में अगर कोई दुनियावी रूप से कमजोर और शक्तिशाली है तो वे उनमें भेदभाव न करती थीं। बल्कि जो कमजोर है, उसके प्रति उनकी ममता कहीं अधिक निसार होती थी। जबकि पिता के साथ उलटा था। वे चाहते थे कि उनके बेटे सफल और अग्रणी हों। पैसा, इज्जत, नाम और दुनियादारी में सबसे आगे।

यही माँ और पिता के हम भाइयों को लेकर देखे गए सपनों का फर्क है। पिता का सपना था कि उनके बेटे बड़े बनें, इतने बड़े कि सारी दुनिया उन्हें माने। और माँ का सपना था कि उनके बेटे भले और उदार बनें। इतने भले और उदार कि लोग मन ही मन उनकी सराहना करें कि बेटे हों तो ऐसे! 

मुझे याद है, जब कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में मैं शोध कर रहा था, माँ मेरे बारे में सोच-सोचकर चिंतित रहा करती थीं। तब फोन वगैरह की तो ज्यादा सुविधा नहीं थी। इसलिए अगर उन्हें रात को मेरे बारे में कोई बुरा सपना भी आ गया तो अगले दिन ही छोटे भाई सत से या कृष्ण भाईसाहब से चिट्ठी लिखवाती थीं। और एक बार तो उन्होंने कृष्ण भाईसाहब और भाभी जी को बड़ी जिद करके कुरुक्षेत्र भेजा था कि “जाओ, चंदर से मिलकर आओ। मुझे बहुत चिंता हो रही है। उसके बारे में बड़ा बुरा सपना आया है!”

और सच ही कृष्ण भाईसाहब और कृष्णा भाभी मीलों दूर शिकोहाबाद से चलकर मुझसे मिलने कुरुक्षेत्र बस इसलिए आए थे, ताकि माँ की चिंता दूर हो सके।

इससे पता चलता है कि माँ का होना क्या होता है और माँ की ममता क्या होती है!

माँ स्वाभिमानिनी थीं और पिता की तरह बोलती भले ही न थीं, पर पिता से डरती हरगिज न थीं, बल्कि एकाध दफा तो मैंने उलटा भी देखा है। बात तब की है, जब हमारा मकान बन रहा था और हम कुछ दिनों के लिए कलकत्ते वालों के मकान में किराए पर रहे थे। सर्दियों की एक सुबह। कंबल ओढ़े बीड़ी पी रहे पिता। और तभी जब वे बीड़ी पीकर राख झाड़ रहे थे, थोड़ी-सी गरम राख कंबल पर गिरी। पिता ने झटपट राख हटाई तो देखा, कंबल थोड़ा-सा जल गया है। 

नया कंबल था। माँ तब कुछ दिनों के लिए बाहर गई थीं- देहरादून या कहीं और। पिता ने जैसे हम बच्चों से डरकर कहा, “तुम्हारी माँ आएँगी तो गुस्सा करेंगी कि नया कंबल जला दिया!” और वे खुद सूई-धागा लेकर कंबल रफू करने में जुट गए। उस दिन मुझे पता चला कि जैसे माँ ‘तेरे पिता जी...तेरे पिता जी’ कहकर हमें डराती हैं, ऐसे ही पिता को भी माँ का डर हो सकता है। क्योंकि आखिर तो घर की चीजों की वही सम्राज्ञी थीं।

और एक दिन तो अद्भुत था कि पिता रो रहे थे और माँ उन्हें सांत्वना दे रही थीं, धीरज बँधा रही थीं कि हो जाएगा, सब ठीक हो जाएगा। ईश्वर यहाँ तक साथ देता आया है तो अब भी क्यों न देगा!...प्रसंग यह था कि पिता सट्टा खेल-खेलकर आर्थिक रूप से दुर्बल हो चुके थे। फिर अब अनाज पर कंट्रोल लग गया था। शायद लालबहादुर शास्त्री या इंदिरा गाँधी का शुरुआती जमाना था। पहले की तरह मुक्त व्यापार संभव नहीं था, बल्कि जीविका कमाना ही मुश्किल था। घर कैसे चले यह चिंता थी, क्योंकि चीजों की बहुत लिखत-पढ़त, एक-एक चीज का हिसाब-किताब रखना और सरकारी इंस्पेक्टरों से निबटना उन्हें कठिन लगता था। 

पिता टूट गए थे, पर माँ को अपने भगवान पर भरोसा शायद कहीं अधिक था। वे पिता से कहीं अधिक बड़ी हो गई थीं और पिता को भरोसा दिला रही थीं कि जिस ईश्वर ने पैदा किया है, वही कोई इंतजाम करेगा। हम अपना काम करते जाएँ, बस! कष्ट किस पर नहीं आए? भीड़ाँ (विपत्तियाँ) किस पर नहीं पड़ीं? ध्रुव पर भी...प्रह्लाद पर भी! पर आखिर तो भगवान ने सबकी मदद की न!

वाह रे स्त्रियों के धीरज, जिसके आगे मर्द कई बार बौने लगते हैं!

ऐसे ही मेरा एम.एस-सी. के बाद हिंदी से एम.ए. करने का निर्णय दुनियादारी के हिसाब से एकदम अटपटा था। मुझे याद है कि पूरा घर न सिर्फ मेरे विरोध में था, बल्कि मुझे कोस रहा था। पर तब भी मेरी अनपढ़ माँ ही थीं जो कुछ न समझती हुई भी मेरे साथ आ खड़ी हुई थीं। और उन्होंने कहा था, “ठीक है पुत्तर! तुझे जो ठीक लगता है, कर। तुझे किसी की चिंता करने की जरूरत नहीं है। फीस के पैसे मैं दूँगी, चाहे जहाँ से इंतजाम करूँ!”

कभी-कभी तो मुझे यहाँ तक लगता है कि कहीं माँ ने अपने अतिरिक्त लाड़ से हमें कमजोर तो नहीं कर दिया। कहीं जरा अपमान होते ही मैं मर्माहत हो उठता हूँ। क्या यह इसलिए तो नहीं कि माँ ने अपने कोमल प्यार और ममता के घेरे में बाँधकर हमें इतना बड़ा सुरक्षा-कवच दे दिया था कि वहाँ कोई दुख, कोई अभाव, कोई परेशानी झाँक ही न पाती थी। इसलिए हमें शायद इसकी आदत ही नहीं रही। लेकिन जिंदगी तो सख्त है, बहुत सख्त। बहुत कस-कसकर मारती है और भिगो-भिगोकर मारती है। और कई बार तो यह मार वहाँ से आती है, जहाँ इसकी बिल्कुल कल्पना ही नहीं होती। अपनों के और-और चेहरे निकलकर आते हैं और हम एकबारगी भौचक्के रह जाते हैं। मगर जिंदगी तो इसी का नाम है। 

यह दीगर बात है कि जब तक माँ थीं, हमने इस तरह की चोटों को कभी महसूस ही नहीं किया। और आज भी किसी दुख या अपमान के क्षणों में कभी-कभी बहुत विकल होता हूँ, तो सबसे पहले माँ याद आती हैं।

याद पड़ता है, माँ मेरे दोस्तों को कितना लाड़ करती थीं! मेरे बाल मित्रों में अनिल हो या शेखर, उन्हें ये मेरे प्रतिरूप लगते थे और वे उन पर अपनी अजस्र ममता और प्यार लुटाया करती थीं। मेरे पीछे भी वे घर आते तो माँ घंटों उनसे बातें किया करती थीं। माँ की पंजाबी मिश्रित निहायत अटपटी हिंदी अनिल-शेखर को कम ही समझ में आती थी। पर माँ के प्यार का आवेग ऐसा था कि भाषा का संकट कोई संकट नहीं रह जाता था। माँ उनसे घंटों अविरल बतियाती रहतीं। और उन्हें खूब खिला-पिताकर भेजतीं, तभी उन्हें चैन पड़ता। 

इसी तरह मैं जब कुरुक्षेत्र में पढ़ता था तो माँ एक-एक दिन गिनते हुए, किस कदर बेकली से मेरा इंतजार करती थीं और छुट्टियों में घर आते ही कैसे बेकली से छाती से चिपका लेती थीं! आज भी आँखें बंद करूँ तो माँ का वह चेहरा डब-डब-डब करता आँखों के आगे आ जाता है।

माँ का नाम उस समय के हिसाब से मुझे बड़ा सुंदर लगता है, भागसुधी। हिंदी में शायद इसे भाग्यसुधि कहा जाए। भाग्यसुधि तो सुंदर है ही, उसका तद्भव भागसुधी भी मेरे खयाल से कम सुंदर नहीं है। जैसे नाना जी ने अपनी बड़ी और लाडली बेटी के लिए बहुत सोचकर यह नाम ढूँढ़ निकाला हो। और नाम ही नहीं, नाना जी के व्यक्तित्व की छाप माँ में कई रूपों में नजर आती थी। उनमें बड़प्पन, एक तरह की उदारता या देने का भाव कहीं अधिक था, पिता से भी अधिक। और यह चीज उनमें मैं समझता हूँ, नाना जी से आई थी। 

नाना जी जमींदार थे, व्यक्तित्व और देह से भी काफी भव्य। लंबा, ऊँचा कद। लहीम-शहीम काया। घोड़ी पर चढ़कर दूर से आ रहे होते तो हल्ला मच जाता कि वो देखो, वो हकीम साहब आ रहे हैं! दूर-दूर के गाँवों तक उनकी धाक थी। लेकिन वे किसी से एक पैसा तक न लेते थे। यहाँ तक कि जिसके यहाँ इलाज करने जाते, उसके यहाँ पानी तक न पीते थे। आसपास के लोग इसीलिए उन्हें किसी देवता की तरह पूजते थे। मेरे बड़े भाई कश्मीरी भाईसाहब जिन्होंने नाना जी को नजदीक से देखा था, अकसर उनकी चर्चा करते हुए कुछ ज्यादा ही भावुक हो जाते हैं। विगलित स्वर में कहते हैं, “वे कोई सामान्य व्यक्ति तो हो नहीं सकते। वे तो कोई देवता थे, देवता! जैसा उनका भव्य व्यक्तित्व था, जैसे उनके विचार और काम थे, उससे वे तमाम लोगों से ऊपर उठे हुए नजर आते थे!”

बेशक, इस कथन में अतिरंजना कम नहीं, पर इससे नाना जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व का कुछ अंदाज तो लगाया ही जा सकता है। उनके जीवन के बहुत सारे आश्चर्यजनक प्रसंग कश्मीरी भाईसाहब सुनाते हैं। इनमें उनकी मृत्यु का प्रसंग तो सच ही बड़ा अद्भुत है। नाना जी को अपनी मृत्यु का आभास हो गया था और उन्होंने गाँव में और दूर-पास की रिश्तेदारियों में सबको कहला दिया था कि “फलाँ दिन मुझे यह चोला छोड़ना है। आप सब लोग आ जाएँ!” और ठीक उसी दिन उनका 

निधन हुआ। उनके निधन पर आसपास के गाँवों के सभी लोग इस तरह शोकाकुल थे और रो रहे थे, जैसे उनका अपना कोई बड़ा पुरखा चला गया हो!

नाना जी की शख्सियत सचमुच बड़ी विलक्षण थी, इसलिए दूर-दूर तक उनका बड़ा नाम था। लोग दिल से उनकी इज्जत करते थे। नाना जी के पारिवारिक जीवन के बारे में मैंने कम बताया है। दो-तीन बातें जो कश्मीरी भाईसाहब से बात करते हुए पता चलीं, यहाँ लिख दूँ। नाना जी की चार संतानें थीं। तीन बेटियाँ, एक बेटा। माँ उनकी सबसे बड़ी बेटी थीं। उनके अलावा दो बेटियाँ और थीं। एक देहरादून वाली कौशल्या मौसी, तथा एक बेटी और थी, जो वहीं पाकिस्तान में गुजर गई। उसने प्रेमविवाह किया था और यह बात नाना जी को पसंद नहीं आई थी। 

वे लंबे समय तक कचहरी आते-जाते रहे, जहाँ इस केस की लंबी सुनवाई हुई। और अंत में नाना जी हारे। अदालत ने इस प्रेमविवाह को उचित और वैध ठहराया था। बाद में मेरी वे मौसी शायद बीमारी से चल बसीं और जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तो मेरे मौसा जी ने उसी जलती आग में कूदकर प्राण दे दिए। यह ऐसा प्रसंग है, जिसकी कल्पना करते ही झुरझुरी होती है। 

नाना जी का एक ही बेटा था, जो उन्हीं की तरह बड़ा लहीम-शहीम और सुंदर था। योग्य और बुद्धिमान भी। नाना जी की सारी आशाएँ उस पर टिकी हुई थीं, कि उनके बाद वह जमींदारी और घर-परिवार की सारी जिम्मेदारी सँभालेगा और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएगा। पर उसकी चढ़ी जवानी में एकाएक मौत हुई। कहते हैं कि उसे किसी ने विष दे दिया था। यह ऐसा आघात था, जिसे नाना जी सह न सके। वे एकदम टूट गए। और धीरे-धीरे यही चीज मेरे उन सबल और सबकी चिंता करने वाले नाना जी को मृत्यु की ओर ले गई। हालाँकि उनके जाने के बाद भी उनकी कीर्ति अक्षुण्ण रही और लोग उन्हें बराबर आदर से याद करते रहे।

इसी तरह देश-विभाजन के दौर का एक प्रसंग माँ से कई बार सुना था और हर बार सुनकर मेरी आँखें भीगती थीं और इनसानियत पर विश्वास कहीं ज्यादा पुख्ता हो जाता था। हुआ यह कि शुरू-शुरू में तो लोगों ने देश-विभाजन की जुगत को महज अफवाह माना और कोई अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं था। अपनी धरती कभी पराई हो जाएगी, यह कल्पना भी मुश्किल थी। पर जैसे-जैसे समय बीता, यह साफ होता गया कि जिसे लोग अफवाह मान रहे हैं, वह तो ऐसी क्रूर और कठोर सच्चाई है, जिसका सामना करना ही होगा। उस समय पूरा गाँव माँ को मनाने के लिए गया कि वे यह पिंड छोड़कर न जाएँ। उनकी सुरक्षा का पूरा जिम्मा गाँव वालों का है। 

गाँव में अधिकतर परिवार मुसलिमों के थे, पर हिंदू और मुसलिम का कोई भेदभाव वहाँ न था। सब बार-बार नाना जी को याद कर रहे थे और कह रहे थे, “तुम हकीम साहब की बेटी हो तो समझो, पूरे गाँव की बेटी हो। तुम्हारी हिफाजत हम करेंगे और बाल बाँका न होने देंगे। तुम कहीं न जाओ।”

कुछ दिन इसी तरह अनिश्चय में बीते। फिर आने वाले समय का कुछ अनुमान करके माँ ने दुखी हृदय से ही सही, अपने पुरखों की धरती और अपना गाँव छोड़ने का निर्णय किया। तब सबको उनका यह निर्णय स्वीकार करना ही पड़ा। पर जिस समय माँ गाँव से विदा हुईं, उस समय का दृश्य बड़ा ही कारुणिक था। पूरा गाँव रोते हुए उन्हें विदा करने आया था। चलते समय लोग रास्ते के लिए खाने-पीने के सामान के साथ, नेग दे रहे थे कि हमारी बेटी विदा हो रही है। और सब बार-बार आग्रह कर रहे थे कि “देखना भागसुधी, ये सब बावेला थोड़े दिनों में ही थम जाएगा। उसके बाद तुम्हारा मन करे तो जब चाहो, फिर से आ जाना। तुम्हें अपना घर-मकान और सारी चीजें ऐसी की ऐसी मिल जाएँगी, जैसी तुम छोड़कर जा रही हो।” 

उस बुरे दौर में भी माँ की विदाई ऐसी हो रही थी, जैसे वे वहाँ की राजकुमारी हों। अपनी यादगार के रूप में लोग उन्हें कुछ न कुछ भेंट कर रहे थे। अपनी जन्मभूमि से विदा होते हुए माँ लगातार रो रही थीं और साथ-साथ पूरा गाँव रो रहा था। 

बेशक यह नाना जी के बड़े और उदार व्यक्तित्व का ही असर था, जिसके कारण उनकी बेटी सबकी बेटी बन गई। वे हर किसी के सुख-दुख में भागीदार होते थे और सारा गाँव उन्हें अपना खैरख्वाह मानता था। तो फिर ऐसे नाना जी की बेटी सबकी बेटी भला क्यों न होंगी? 

तो ऐसे पिता की बेटी थीं माँ और यों भी वे जिस परिवार से आई थीं, उसका पारिवारिक गौरव और प्रतिष्ठा पिता के परिवार से कहीं अधिक थी। शायद इसीलिए माँ में दूसरों को देने और देकर तृप्त होने का राजसी भाव अधिक था। यानी जो भी घर में कुछ माँगने आया, वह वापस न लौटा। घर में मदद के लिए कुछ माँगने आए गरीब, अभावग्रस्त लोगों और साधु-संन्यासियों के मामले में तो ऐसा था कि जब तक माँ उन्हें खिला-पिलाकर और खूब संतुष्ट करके न भेजती थीं, उन्हें चैन नहीं पड़ता था।