मैं हूँ ताड़, तू वट वृक्ष

श्रीप्रकाश सिंह (उपनामः मनोज कुमार सिंह), मो. न. 9436193458


समय: साम के चार बजे:

शीला (सौरभ की माँ) चेहरे पर पुलक लिये अति उमंग के साथ किचेन में लगी है: भाँति- भाँति के व्यंजन बना रही है, जो व्यंजन बन चुके हैं उसे चखकर यह निश्चित कर रही है कि कहीं दाल- सब्जी- पनीर में नमक ज्यादा तो नहीं- सब ठीक तो है न। लगभग सभी व्यंजन बनकर तैयार हैं, अब दाल-मखनी बनाने की तैयारी कर रही है।

दरवाज़े की कालबेल बजी- शीला ने दरवाजा खोला- उसका पति रमेश था। 

शीला मुस्कुराते पर विस्मय होकर बोलती है- अरे वाह! आज तो बहुत जल्दी आँफिस से आ गये क्या बात है?

रमेश- अपनी घड़ी पर नजर दौड़ाते हुये मुस्कुराकर बोलता है- अरे ! अभी पाँच ही बज रहा है ! समय भी बहुत कमबख्त है और दिन तो सरपट दौड़ता है, आज जालिम रेंग रहा है। 

शीला मुस्कुराते हुये- ओ, मै समझ गई। समय को क्यों दोष दे रहे हैं जी- समय तो अपने नियत से ही चल रहा है। बेटे के आने के इंतजार में लगता है आज आप ठहर गये है। हाँ, क्यों नही, अमेरिका से वर्षों बाद आप का लाडला ब्म्व् बेटा जो आ रहा है। 

रमेश मुस्कुराते हुये- और आप का क्या हाल है ? आज तो बहुत खिली- खिली नजर आ रही हैं !”

शीला चहकते हुये- “मैं भी अपनी मन की फ्लाइट में बैठी अपने बेटे- के साथ- साथ उड़ रही हूं जी।“

दोनों ठहाका मारकर हंसने लगते हैं। 

“अरे ! चूल्हे पर कड़ाही रखकर आई हूं, कहीं जल न जाये!” कहते हुये शीला किचेन में आती है और अपने काम में लग जाती है और इसी गुन- धुन में रमेश को एक ग्लास पानी देना भी भूल जाती है।

रमेश- “शीला जी, एक ग्लास पानी तो पिलाइए ! लगता है- आज घर जल्दी आने के कारण पानी पर भी इमरजेंसी लगा दी हैं ? 

शीलाः आज खुद ही लेकर पी लिजिए जी: किचेन में इतना काम है कि साँस लेने तक का फुर्सत नही है।

रमेश- ठीक है, जैसी आप की आज्ञा ! रमेश किचेन में जाते हैं, और देखकर हैरान रह जाते हैं‌।

पूरा किचेन भाँति-भाँति के व्यंजनों से भरा पड़ा है। सब्जियाँ, सालाद, दाल, दही,पुड़ी- कचैड़ी, पनीर, पुलाव, पापड़ आदि। दाल- मखनी बनाने की तैयारी चल रही है।

रमेश अपना सिर ठोकते हुये- अरे भाग्यवान, यह आप क्या कर रही हैं ! बेटे के आने की खुशी में आप पागल तो नही हो गई हैं। ये सब वह खा पायेगा। सब बर्बाद होगा। व्यर्थ आप इतना मेहनत कर रही हैं।

शीला- चुप रहिये जी, मैं जो कर रही हूँ, करने दीजिये। वर्षों बाद तो वह आ रहा है। पता नही विदेशों में वह क्या खाता- पीता होगा। यह देशी घर का खाना उसे कहाँ मिलेगा ? देखना वह सब खायेगा- आप चिंता न करें।“

अरे महरानी जी, आप का लाड़ला यहाँ बसने नही आ रहा हैं, बड़ी मुश्किल से आज एक रात आप के साथ ठहरेगा। विदेशी बड़ी- बड़ी कंपनियों के जितने भी ब्म्व् है, उन सबकी मीटिंग कल से दिल्ली में हो रही है- वह कल से उसी में व्यस्त रहेगा।

शीला गर्व से बोली-  ब्म्व् होगा दूसरों के लिये- हमारे लिये तो बस मेरा बेटा है।“

 “ठीक है ब्म्व् की मम्मी जी, जो समझ में आये कीजिये। विमला कहाँ हैं- आज काम पर नही आई क्या ?”, रमेश ने पूछा।

शीला- “आई थी, घर का दूसरा काम करके चली गई। मैंने ही भेज दिया था। सोची, आज मैं अपने बेटे के लिये खुद ही अपने हाथों से खाना बनाऊंगी। और हाँ, सौरभ की फ्लाइट कब लैंड करने वाली है। जायेंगे न रिसीव करने ?” शीला सगर्व पूछती है।

राजेश मुस्कुराते हुये- “सात बजे शाम उसकी फ्लाइट लैंड करेगी। और उसने कहा है कि मुझे एअरपोर्ट आने की जरूरत नही है, वह खुद ही आ जाएगा। रमेश ने अपनी घड़ी पर पुनः नजरें दौड़ाई- अरे, अभी तो काफी समय हैं...“

शाम आठ बजे।

रमेश और शीला सौरभ की स्वागत की पूरी तैयारी कर चुके हैं, आरती की थाल और पुष्पगुच्छ सब तैयार है। दोनों बेसब्री से सौरभ के आने का इंतज़ार कर रहे है। रमेश बार- बार अपनी घड़ी पर नजरें दौड़ा रहे हैं।

घर के सामने एक आलीशान गाड़ी आकर रूकती है। शीला आरती की थाल और रमेश पुष्पगुछ हाथ  में लिये दरवाजे पर खड़े हैं। कार का दरवाजा खुला, सौरभ अपने पद और गरिमा के भार से लदे कार से बाहर निकलता है। आगे बढकर शौरभ के पिता ने सौरभ को पुष्पगुछ थमाते हुये उसका स्वागत करते हैं। न सलाम न प्रणाम, सौरभ उदासीन भाव से “थैंक्स डैडी” कहकर आगे बढ़ जाता है। सौरभ का यह व्यवहार रमेश को असहज लगता है-वह मायूस हो जाते हैं। 

सौरभ घर के दरवाजे पर शीला को खड़ी देख बोलता है- हैलो माँम, हाउ आर यू ?

 शीला अति पुलकित मन से सौरभ को टीका लगाती है और उसकी आरती उतारने के लिये आरती की थाल उसके सामने घुमाती है, सौरभ अपनी माँ का हाथ पकड़ लेता है और कहता है‌- ये सब क्या माँम, मेरे पास इतना समय नही है इन सब रस्म अदायिगी के लिये। इतना कहते सौरभ घर के अंदर प्रवेश कर जाता है।

सौरभ के इस व्यवहार से शीला के मन को धक्का लगता है- उसकी आँखों की चमक फीकी पड़ जाती है। खिला चेहरा कुम्हला जाता है, उसके हाथों में नाचती आरती की थाली थम जाती है- सौरभ के इस रूखे व्यवहार से वह सन्न रह जाती है।

रात्रि के नौ बज गये हैं। डाइनिंग टेबल भाँति- भाँति के स्वादिष्ट व्यंजनों से सज गया है। रमेश और सौरभ खाने के लिये बैठ चुके हैं। शीला फुदुक- फुदुक दोनों को खाना परोस रही है और फूले न समा रही है, तभी अचानक सौरभ बरस पड़ता है-

“ॅींज पे जीपे डवउ! ये सब क्या है, हमे जानवरों की तरह परोसे जा रही हो। आप सब की मानसिकता वही रह गई 19वीं शताब्दी की। मुझे ये सब खाना विल्कुल ही पसंद नहीं है। डैड, आप खाइये, मैं अपना टिफिन लाया हूं, मैं उसे ही खा लूंगा। मुझे पहले से ही पता था- आप सब का फूड कल्चर।“

सौरभ की बात सुनकर रमेश और शीला दोनों एक दम से खामोश हो जाते हैं, उन्हें गहरा दुख पहुंचता है। शीला की आँखें डबडबा जाती है।

रमेश विनम्रतापूर्वक- “बेटा, तुम्हे पता नही कि कितने प्रेम से तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए ये सब बनाया है ! तुम्हारे लिये क्या बनाऊं, क्या खिलाऊं इसी चक्कर में दिन भर लगी रही दृ कुछ तो खा लो बेटा- तुम्हारी मम्मी का मन रह जायेगा।“

“डैड ! आप भी कुछ कम नही है- ठम चतंबजपबंस क्ंक ! जतल जव नदकमतेजंदक उम ! मुझे ये सब बिल्कुल ही पसंद नही है पापा! मेरा टिफिन है न ? मै खा लूंगा। आप खाइये।“

इतना कहते सौरभ ने अपना टिफिन खोला ‌- और टेबल पर फैला दिया। साथ ही विदेशी वाईन की चमचमाती बोतल भी।

बोतल से पैग बनाकर रमेश की तरफ ग्लास बढ़ाते हुये सौरभ मुस्कुराकर बोलता है- कवदश्ज उपदक कंक ! इम वचमद ंदक मदरवल पज ! बड़े आदमियों के डाइनिंग टेबल का यह शोभा है डैड! जंाम पज ंदक सववा ेउंतज सपाम उमण्ण्ण्

 सौरभ की यह हरकत देख, रमेश खून का घूंट पीकर खामोश रह जाते हैं, लेकिन शीला को यह बर्दाश्त के बाहर था। उसकी आँखें तन गई और रोष में बोलती है-

“बेटा, आज मेरा दर्प, घमंड सब कुछ चकनाचूर हो गया है। तुम बड़े आदमी तो बन गये हो सौरभ, लेकिन तुम्हारे अंदर बड़प्पन बिल्कुल ही नही है। जानते हो बेटा, संस्कारहीन व्यक्ति चाहे कितना भी बड़ा हो जाय, उसका वज़न बहुत हल्का रहता है- गरीमाहीन, ठीक तुम्हारी तरह। जानते हो, बेटा वटवृक्ष जितना ही बड़ा होता है, उसकी जड़े उतनी ही गहरी होती है, और इसीलिए वह छायादार बनता है, लेकिन तुम तो  रेगिस्तान में उगने वाले ताड़ के वृक्ष निकले बेटा ! जो देखने में तो बड़ा होता है लेकिन उसके पास देने के लिए कुछ नही होता है- ना पथिक को फल और ना छाया....“

इतना कहकर शीला तमतमाती हुई अपने कमरे में आ जाती है और अपने पल्लू से अपना मुह ढ़ककर सिसकने लगती है।

रमेश व्यथित मन से कहते है- “हाँ सौरभ, तुम्हारी माँ ठीक ही तो कहती है। मुझे भी यही लगता है कि तुम बड़े आदमी तो बन गये, पर तुम न एक अच्छा इंसान ही बन सके और ना ही एक अच्छा पुत्र। तुम्हारी आधुनिकता की परिभाषा बहुत खोखली है बेटा !

इतना कहकर रमेश भी शीला  के कमरे में जाते हैं- शीला गुम-सुम बैठी है, उसकी आँखों में आँसू हंै।

सौरभ खड़े- खड़े मन में सोचता है कि वह आवश्यकता से अधिक कठोर हो गया है, उसे इतना कठोर नही होना चाहिए था।

वह भी मम्मी- पापा के रूम में आता है ,और शीला के आँसू को पोंछते हुये अपने पिता रमेश की ओर देखते हुये बहुत ही प्यार से कहता है- मम्मी, डैड! जब से मैंने होश संभाली है, आप दोनों से मैं एक ही बात सुना करता था कि “बेटा, पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनों, बड़ा आॅफिसर बनों, स्मार्ट और, माँडर्न बनो !” आप लोगों ने हमसे यह कभी नही कहा कि तुम पढ़-लिखकर एक अच्छा इंसान बनों, सांस्कारवान बनो। आप लोगों ने मुझे जो सिखाया, बनाया वही तो सीखा और बना हूँ। इसमे मेरा क्या दोष है। जब मुझे आप सबकी सबसे अधिक ज़रूरत थी तब तो हमे बड़ा आदमी बनाने के चक्कर में आप दोनों ने हमें अपने से बहुत दूर एक बहुत बड़े इंगलिश स्कूल के हाँस्टल में डाल दिया था-जहाँ हाय, हैलो, बाय की संस्कृति सीखता रहा, विदेशी संस्कार में पलता- बढता रहा। जब कभी छुट्टियों में घर आता तो भी आप सब का सानिध्य न के ही बराबर मिलता। कमला दाई की देख- रेख में मुझे छोड़कर आप दोनों तो अपने- अपने आॅफिस चले जाते थे। देर शाम को हारे- थके घर आते थे- मेरे साथ रहते कब थे, जिससे कि आप सब से मैं कुछ सीखता- समझता। जो कुछ सीखा- समझा वह कमला दाई से ही। आप लोगों ने हमें जिस संस्कार और संस्कृति में पाला- पोसा, बड़ा किया, आज वही तो मेरे साथ है। आप ने मुझे बड़ा आदमी बनाना चाहा था, वह बन गया हूं, पर बड़प्पन कहाँ से लाऊं माँ ? बड‌प्पन के लिये बड़ा आदमी होना जरूरी नही होता माॅम- डैड ! जबतक संस्कार बड़ा न हो, व्यक्ति बड़ा नही हो सकता, भले ही उसका पद कितना भी बड़ा हो जाय। जो आप सब से मुझे कभी नही मिला।

माॅम, आप ने ठीक ही कहा है कि मै रेगिस्तान में उगने वाले ताड़ के समान हूं, वट बृक्ष नहं। यही बात तो मैं आप सबको समझाना चाहता हूं कि माँ- बाप की ममता से बंचित बच्चों का जीवन रेगिस्तान में उगे पौधों के समान हो जाता है- चाहे वह 

पौधा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाय। वह वट बृक्ष कभी भी नही बन सकता। दिखावे के चकाचैंध में अपने बच्चों को रेगिस्तान के ताड़ बनाने की सिलसिला कब थमेगी... काश ! आज के माता- पिता अपने मासूम बच्चों के मन के सूनापन का एहसास कर पाते! सौरभ की आँखें डबडबा जाती है।

वह आगे कहता है-

खैर मुझे आप सब से कोई शिकायत नही है। मन में एक दुख था जो इस तरह फूट पड़ा था। माॅम-डैड, मुझे माफ कर दीजिएगा, चलिये खाना खाते हैं। माँ के हाथों इतना स्वादिष्ट खाना कहाँ मिलेगा, इसके लिए तो मैं तरस गया था। अमेरिका में  तो यह बहुत ही दुर्लभ है। अगर मिल भी जाय तो उसमे माँ के हाथों का स्पर्श नही, स्वाद नहीं। मै तो आज मन भर खाऊँगा और अपने दोस्तों को भी खिलाऊंगा। माँ, खाने से जो बच जाये, उसे पैक कर देना, अपने साथ ले जाऊंगा- और कल मीटिंग में आये हमारे जितने भी विदेशी मित्र हैं उन सबको खिलाते हुये गर्व से कहूंगा- देखो, यह मेरा देशी खाना है- मेरी माँ ने बनाई है। 

इतना कहते सौरभ अपनी माँ के गले लग जाता है- रमेश और शीला की आँखें छलछला जाती है, वे दोनों सौरभ के ललाट को चूमते हुये कहते हैं- “ बेटा, हम दोनों को माफ कर देना, हमे अपनी गलतियों का एहसास हो चुका है सौरभ ! आज तूने एक भटके माँ- बाप को बहुत बड़ी सीख दिये हो बेटा, तुम न सिर्फ पद से बड़े हो बल्कि अपने व्यक्तित्व से भी बड़े हो। तुम्हारा यह बड़प्पन बट बृक्ष के समान है, ताड़ तो हम थे बेटा,  हमे तुम पर बहुत गर्व है।“

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