सलाखों से झाँकते चेहरे (उपन्यासिका )

    डाॅ. प्रणभ भारती, -अहमदाबाद, मो. 9940516484


1. 

जैसे ही इशिता ने उस कमरे में प्रवेश किया उसकी साँसें ऊपर की ऊपर ही रह गईं। एक अजीब सी मनोदशा में वह जैसे साँस लेना भूल गई, लड़खड़ा गई जैसे चक्कर से आने लगे। 

‘‘व्हाट हैपेंड मैडम ?‘‘ कामले कमरे में प्रवेश कर चुके थे। पीछे-पीछे एक नवयुवक भी जिसके हाथों में गाड़ी में से निकाले गए बैग्स व दूसरा सामान था। 

इशिता के मुख पर किसी ने टेप चिपका दिया था जैसे। वह बोलना चाहती थी लेकिन शब्द थे कि उसके मुख में गोल-गोल भरकर न जाने तलवे में कहाँ चिपक रहे थे। 

‘‘मैडम ! आर यू ऑल राइट ?... ओ. के...? ‘‘ कामले उसके पास तक आ गए थे। 

‘‘हाँ...मि. कामले ! मैं ठीक हूँ...‘‘ कहकर उसने अपनी दृष्टि उस स्थान से हटा ली जहाँ चिपक गई थी।  

‘‘नो,यू  आर नॉट...‘‘ कामले उसके चेहरे पर उड़ती हवाईयाँ देख रहे थे। उनके पीछे ही नया फोटोग्राफर सुबीर भी था जिसने हाल ही में संस्थान जॉयन किया था। अभी तक वह बहुत अधिक नहीं खुल पाया था लेकिन मि. कामले जब तक किसीके मुख में ऊँगली डलवाकर उसकी आवाज न निकलवा दें,तो वो कामले  ही कहाँ ? पूरे रास्ते वह सुबीर से मजाक करते रहे थे और बेसुरे सुर में अंताक्षरी कर-करके उन्होंने सबको पका दिया था।    

‘‘रैम ! प्लीज, पानी लाओ, भागकर...‘‘ 

‘‘जी...‘‘ वह लड़का अपने हाथ का सामान नीचे रखकर कमरे से दिखाई देने वाली किचन में पानी लेने तेजी से गया। 

इशिता देख रही थी लेकिन क्या...? रैम किचन में रखे फिज से काँच के एक साफ-सुथरे ग्लास में पानी निकालकर ट्रे लेने प्लेटफॉर्म की ओर मुड़ा। 

‘‘यार... अभी ट्रे की जरुरत नहीं है... जल्दी आओ...‘‘ कामले कुछ जोर से बोले। 

हड़बड़ाहट में रैम से काँच के ग्लास का पानी छलका लेकिन वह जैसे-तैसे उसे सँभालकर इशिता के पास तक ले आया जहाँ वह सोफे पर बैठ चुकी थी। 

‘‘मैडम ! पानी लीजिए...‘‘ कामले ने रैम नामक युवक से ग्लास लेकर उसे पकड़ाते हुए कहा। 

‘‘थैंक्स...‘‘ बस, इतना ही इशिता के मुख से निकला। 

पानी का  ग्लास लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए उसने महसूस किया कि उसके हाथ काँप रहे थे। हाथ क्या उसका पूरा शरीर ही कँपकँपा रहा था।   

उसे खुद पर अफसोस  हुआ... उसके पति और मित्र  उसे ‘झाँसी की रानी‘ कहकर चिढ़ाते थे, वह अपने इस ‘निक नेम‘  को बदनाम करने पर आमादा थी! इशिता ने कसकर ग्लास पकड़ा और अपने मुख तक ले गई लेकिन उसे उल्टी जैसा महसूस हो रहा था। फिर भी खुद को स्वस्थ्य दिखाने  के लिए उसने दो घूँट पानी पीया और ग्लास सोफे के सामने रखी छोटी सी गोल मेज पर रख दिया। 

‘‘लगता है सर, इशिता मैडम थक  गई हैं। पहली बार इतने ऊबड़-खाबड़ रास्ते से आई होंगी,हैं न मैडम ?‘‘ अब तक ड्राइवर बंसी भी अपने हाथों में गाड़ी से निकाला गया कुछ सामान लेकर कमरे में प्रवेश कर चुका था। 

‘‘जी, मैडम, आप ठीक तरह से बैठ जाइए,थोड़ा रिलेक्स होकर...‘‘ सुबीर ने उसके पीछे साइड में रखा कुशन  लगाने की कोशिश की। 

‘‘सब ठीक है...‘‘ उसने बामुश्किल अपने मुख से ये शब्द हवा में छोड़े जिनमें से उसकी लंबी अशक्त सी श्वाँस सबने महसूस की। 

‘‘अरे! हमारी मैडम झाँसी की रानी हैं,तुम तो जानते हो बंसी...‘‘कामले के सामने कई बार इशिता के पति सत्येन उसे ‘झाँसी की रानी‘ का तमगा पहना चुके थे। उसने एक बार उनके चेहरों पर दृष्टि डाली और कामले,सुबीर व बंसी के चेहरे पर एक सरल मुस्कान पसर गई। 

 ‘‘हाँ भाई रैम, वही रूम तैयार किया न मैडम के लिए जो मैंने बोला था....‘‘ कामले अब उस युवा से लड़के से मुखातिब थे जो शायद कुछ आज्ञा लेने की प्रतीक्षा में डाइनिंग-टेबल के पास खड़ा था। 

‘‘जी सर... बंसी भाई, आइए, मैडम का सामान इस कमरे में रख देते हैं...‘‘ उस युवा लड़के ने खुद भी उसका बैग उठाया जिसे वह जल्दी में नीचे छोड़कर पानी लेने चला गया था। 

बंसी और रैम इशिता का सामान उठाकर उस सिटिंग-रूम के भीतर से ही एक दरवाजे में चले गए थे। 

‘‘मुझे लगता है मैडम, आप फ्रैश हो जाइए तब तक रैम कॉफी बना लेगा...‘‘

‘‘अभी उठती हूँ मि. कामले, आप हो जाएँ पहले फ्रैश...‘‘अब उसके मुँह से आवाज निकली थी लेकिन सच में वह इशिता नहीं थी...पता नहीं,आवाज कहाँ से आ रही थी बिलकुल मद्धम सी। वह तो जब बोलती है तब खूब खुलकर बोलती है। अच्छा-खासा दम होता है उसकी आवाज में।  

‘‘ओ.के बॉस...‘‘ कामले ने नाटकीय अंदाज में उसके सामने अपने कंधे उचकाए। 

‘‘अब्ब्बी आता है मैं...‘‘ एक चुटकी बजाकर कामले सिटिंग-रूम के सामने बनी लॉबी में जाने के लिए मुड़े  जो उसे सोफे पर बैठे हुए भी दिखाई दे रही थी। उसकी दाहिनी तरफ एक कमरे का दरवाजा व बाईं ओर एक मोड़ दिखाई दे रहा था। 

‘‘सर...सर...‘‘ बंसी तेजी से कामले से कुछ कहने आया था। उसके पीछे सुबीर भी था। 

‘‘सर...हम होटल चलते हैं... कल सुबह कितने बजे निकलना होगा ?‘‘

हाँ, बंसी, मुझे लगता है दस बजे तक ठीक है। मैडम! तैयार हो जाएँगी न दस बजे तक....?‘‘ कामले जाते-जाते रुक गए थे।

‘‘हाँ...हाँ बिलकुल, मैं तो जल्दी उठ जाती हूँ,जल्दी भी निकल सकते हैं....‘‘ इशिता ने अब तक अपने आपको संयमित कर लिया था। 

‘‘नहीं मैडम, हम सब कहाँ जल्दी जागने वालों में से हैं... आप भी बहुत थकी लग रही हैं...‘‘ 

‘‘ठीक है बंसी, दस बजे ठीक रहेगा....‘‘कामले ने घूमकर बंसी को स्वीकृति का अँगूठा दिखाया। 

‘‘गुड-नाइट सर...गुड-नाइट मैडम...बाय...रैम ‘‘बंसी कमरे से बाहर निकल गया... उसके साथ सुबीर भी बाय करके निकल गया,उसका ठहरने का इंतजाम भी पूरी शूटिंग-टीम के साथ होटल में था।      

2.     

रैम किचन में घुसा, शायद उसने कॉफी के लिए गैस पर दूध रख दिया था, फिर बाहर निकलकर उसने कहा-

‘‘मैडम! बस, पाँच मिनिट... मैं गर्मागर्म दाल-बड़े भी खिलाएगा आपको...‘‘ वह तेजी से कमरे से बाहर निकल गया। 

अब इशिता की दृष्टि उस कमरे के चारों ओर घूमने लगी। कमरा बहुत बड़ा नहीं था लेकिन उसमें सभी चीजें सुव्यवस्थित रूप में रखी थीं। चार कुर्सियों की डाइनिंग-टेबल थी, फाइव सीटर सोफा था। डाइनिंग-टेबल की साइड में ऊपर से नीचे तक एक अलमारी बनी हुई थी जिसका ऊपरी भाग लकड़ी से बंद था और नीचे के कई खानों के दरवाजों में काँच लगे हुए थे जिसमें से ठीक ठाक सी क्रॉकरी झाँक रही थी। इशिता ने अपनी आँखें  किचन के दरवाजे की दीवार के ऊपर जाने से पहले ही रोक ली थीं। 

एक ओर से कामले गले में तौलिया लटकाए आ रहे थे तो दूसरी ओर से रैम हाथ में थैली पकड़े आता  दिखाई दिया। 

वह फ्रैश होने के लिए अपने कमरे में चली गई। उसे बताया गया  था कि उसके कमरे में ही अटैच्ड बाथरूम है।     

रास्ते भर कचरा खाते हुए यहाँ तक पहुँचे  थे सो कामले  ने इशिता से पूछकर रैम से खिचड़ी बनाने के लिए कह दिया और कॉफी पीने के बाद अपने लिए कुछ दाल-बड़े लेकर अपने कमरे में चले गए थे,अपने ड्रिंक के साथ लेने के लिए। 

कितना भी मना करो कामले अपने साथ चलने वालों को ‘गार्बेज-बैग‘ बनाकर ही छोड़ते थे। किसी छोटे से भी गाँव में से निकलो, उन्हें पता रहता वहाँ की क्या चीज मशहूर है। यहाँ तक कि  किस लारी पर बढ़िया मसाले वाली चाय मिलती है और किस पर करारे गरमा गरम पकौड़े, सब कुछ उनके दिमागी रजिस्टर में दर्ज रहता। रास्ते में हाई-वे पर कई अच्छे रेस्टोरेंट्स  और होटल्स भी पड़ते थे,उनमें लंच करना तो जरूरी था ही। 

डिनर के लिए कामले समय पर डाइनिंग-टेबल पर थे। वे ड्रिंक्स लेते जरूर थे लेकिन इशिता ने कभी उनको बेकार बहकते हुए नहीं देखा था। वो तो बिना लिए हुए ही बहके रहते थे। उनके साथ कोई दाँत फाड़कर हँसता न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता था। 

इशिता से खिचड़ी नहीं खाई गई, असहज थी वह, बहुत असहज। अपने कमरे में आकर वह लेट गई किन्तु वह दीवार उसका पीछा ही नहीं छोड़ रही थी। 

कामले उसकी तबियत देखकर परेशान हो रहे थे,अगली  सुबह शूटिंग पर जाना था। इस समय वह आदिवासी झाबुआ प्रदेश में थी। एक सरकारी प्रोजेक्ट से जुड़े ये सब लोग इस प्रदेश में एक सीरियल की शूटिंग करने आए थे।

अहमदाबाद से दो गाड़ियाँ निकली थीं जिनमें एक में कामले, इशिता, सुबीर और ड्राइवर बंसी था जबकि दूसरी गाड़ी में शूटिंग का पूरा सामान और शूटिंग-क्रू के सारे लोग थे। सुबह नौ बजे चलने के बाद यहाँ शाम के लगभग छह बजे पहुँचे  थे सब लोग,थकान होनी स्वाभाविक थी। लेकिन इशिता की शारीरिक थकान से अधिक मानसिक थकान थी। 

 ‘‘मैडम ! रैम आपके कमरे के बाहर यहीं सिटिंग रूम में सोएगा,आपको कुछ चाहिए तो बोल दीजिएगा। ‘‘अपने कमरे में  जाने से पहले कामले रैम को समझा गए थे।  

रैम इशिता के कमरे के बाहर जमीन पर चटाई  बिछा रहा था। 

इशिता की आँखों में नींद नहीं थी,उसका दिल भी रह-रहकर धड़क रहा था। 

3.

कुछ देर में ही नीरव सन्नाटा छा गया। यह छोटा सा बँगला सड़क पर ही था। इशिता के कमरे की एक खिड़की सड़क पर खुलती थी लेकिन कमरे के बाहर छोटा लेकिन सुंदर सा बगीचा था जो रैम की मेहनत दिखा रहा था। यह उसने यहाँ प्रवेश करते ही देख लिया था लेकिन उस समय बेहद थकान थी और वह सीधे कमरे में आना चाहती थी लेकिन कमरे में 

सीधे आ कहाँ पाई थी? 

बाहर के कमरे में ही उस दीवार ने उसे रोककर असहज कर दिया था। 

मि. कामले भी कमाल के आदमी हैं! इतने अच्छे और संवेदनशील हैं लेकिन किस समय क्या कह बैठें, कुछ पता ही नहीं चलता। सुबह जब उसे लेने घर गए थे तब उसके पति से हँसकर ऐसी बात कर आए थे कि बस...! 

इशिता के पति सत्येन वर्मा को मालूम था कि उनकी पत्नी  एक आदिवासी प्रदेश पर काम कर रही है। कामले तो न जाने कितनी बार इस प्रदेश में आकर गए थे। वह पहली बार यहाँ आई थी। 

सुबह-सवेरे जब मि.कामले उसे पिक करने उसके घर गए थे तब चाय पीते हुए बड़े मजे से गाना गाकर आए थे;

‘‘देखिए सर, हम इशिता जी को ऐसी जगह लेकर जा रहे हैं जहाँ अभी भी तीर-कमान का प्रयोग किया जाता है...‘‘

फिर कामले ने हाल ही में हुई घटना का जिक्र कर दिया। कोई दो-एक वर्ष पहले झाबुआ में एक नया अस्पताल बना था। जिसमें नए डॉक्टरों व नर्सों की भर्ती की गईं थीं। आदिवासी युवा इन नर्सों के आगे-पीछे घूमते नजर आने लगे थे। कुछ नर्सें अहमदाबाद, भोपाल, इंदौर से भी आईं थीं। इन्हीं में से किसी सुंदर नर्स पर एक आदिवासी का दिल आ गया, वह अस्पताल के चक्कर काटता रहता। भला नर्स उसे क्या भाव देती ? वह बौखला गया था। 

नर्सों के लिए अस्पताल के ऊपर क्वार्टर बनाकर उन्हें दे दिए गए थे। नर्स पर फिदा होने वाला वह आदिवासी लड़का उसकी बालकनी के सामने के बाजार में सड़क पर चक्कर काटता  रहता।  एक दिन जब नर्स अपने क्वार्टर की बालकनी में खड़ी अपने धुले हुए बाल सुखा रही थी, एक तीर सनसनाता हुआ उसकी गर्दन को काटता निकल गया। और नर्स बेचारी वहीं पर ही...   

‘‘अब आप ले जा रहे हैं तो जिम्मेदारी भी आपकी ही है। भई ! इकलौती पत्नी हैं, सँभालकर ले आइएगा।‘‘ सत्येन ने हँसकर कामले से कहा। 

‘‘अरे! कहाँ की बात लेकर बैठ गए हैं मि. कामले आप भी,जब तक वापिस नहीं आऊँगी इनको बिना बात ही चिंता लगी रहेगी... वैसे मुझे कोई मारने वाला नहीं है...‘‘

‘‘जी, आप तो झाँसी की रानी हैं...‘‘ सत्येन उसे कभी भी चिढ़ा देते थे। ड्राइवर बंसी भी तो वहीं लॉन में बैठा सबके साथ चाय पी रहा था और सुबीर भी जो केवल मंद-मंद मुस्कुरा भर रहा था। 

 ‘‘फोन की सुविधा भी तो नहीं है जो हम ही यहाँ से बात कर लें, श्री तो जरूर उदास हो जाएगी।‘‘

इशिता की बिटिया छोटी सी थी, मात्र चार साल की। वैसे वह अपनी दादी के पास आराम से रह लेती थी लेकिन बच्ची ही तो थी। जब इशिता ने श्री से कहा था कि मम्मा कुछ दिनों के लिए बाहर चली जाए ? आप परेशान तो नहीं होंगी ? 

‘‘वो तो मैं अब बड़ी हो गई हूँ न मम्मा... पर मैं आपके साथ क्यों नहीं जा सकती ?‘‘

‘‘फिर आपके स्कूल का क्या होगा ? ‘‘ 

‘‘हाँ, यह बात तो है... लेकिन आप जल्दी आ जाना...‘‘ श्री माँ के गले का हार बन गई थी। 

‘‘बिलकुल बेटा। मैं जल्दी आ जाऊँगी....‘‘ 

गाड़ी में बैठते हुए कामले ने सत्येन से कहा था;

‘‘आप बिलकुल चिंता न करें मि. वर्मा, मैं आपको मैडम से रोज बात करवाऊँगा और बेबी से भी... क्यों बेबी ? ‘‘ 

 ‘‘ठीक है, पक्का प्रॉमिज... कामले अंकल ...?‘‘ उसने अपनी नन्ही उँगलियों से अपनी गर्दन के नीचे का भाग स्पर्श किया था। 

‘‘पक्का प्रॉमिज...‘‘ कामले ने भी श्री के जैसे ही एक्शन करके उसे आश्वस्त किया और सब हँस पड़े थे । 

यह वो जमाना था जब मोबाईल फोन्स के बारे में कोई नहीं जानता था। केवल एक डिब्बा हुआ करता था, वह भी बहुत कम घरों में। इशिता के घर में यह लैंड-लाइन थी लेकिन झाबुआ में यह व्यवस्था कैसे होगी, वह नहीं जानती थी। 

यहाँ पहुँचकर शहर में घुसते ही कामले जी ने एक रेस्टोरेंट से इशिता को सत्येन व श्री से बात करवा दी थी और खुद भी अपने घर बात कर ली थी। 

उस रात इशिता को  बिलकुल भी नींद नहीं आई। सिटिंग रूम की दीवार पर टँगे तीर-कमान उसका पीछा करते रहे। एक अनजान, अनदेखा खूबसूरत युवा स्त्री की गर्दन से रक्त लगातार टपक रहा था और एक युवा अनजान आदिवासी का चेहरा सलाखों के पीछे से झाँकता रहा जिसे नर्स को मारने के जुर्म में जेल हो चुकी थी।  

एक झटका नींद आती और उसे महसूस होता कि शायद वह स्वयं ही वह नर्स है जिसका आदिवासी प्रेमी ने खून कर दिया था,उसकी गर्दन रक्त से लथपथ होती रही। कहीं दूर से कुत्तों के सस्वर भौंकने की,रोने की आवाज ने भी उसके दिल की धड़कन  बेतरतीबी में बढ़ा दी थीं। उनींदी अवस्था में उसके मन में रात भर अपनी बिटिया श्री का भोला चेहरा घूमता रहा। 

4.

वैसे इशिता का वहाँ आना इतना जरूरी भी नहीं था, वह सीरियल की लेखिका थी। इससे पहले कई वर्षों से झाबुआ क्षेत्र पर शोध-कार्य चल रहे थे, उसके पास सूचनाओं का पूरा जखीरा था। उसने कामले से कहा भी था कि वह घर बैठे हुए ही लिख सकती है लेकिन कामले का मानना था कि सीरियल का लेखक होने के नाते उसे एक बार प्रदेश की सारी बातों, उनके सारे रहन-सहन, रीति-रिवाज, भाषा, कार्य-कलाप को जान लेना चाहिए जिससे सीरियल के लेखन में जान आ सके। 

अनुभव से लेखन सतही न रहकर समृद्ध होता है, यह तो सत्य ही था। 

रात भर की उनींदी इशिता कमरे की खिड़की से झुटपुटे के कमरे में प्रवेश करते ही एकदम चैंककर अपने बिस्तर पर उठकर बैठ गई। तुरंत उसका हाथ अपनी गर्दन पर गया जहाँ उसे गीला सा महसूस हुआ। अपने हाथ पर लाल रंग की जगह पसीने का भीनापन देखकर उसे तसल्ली हुई। 

कमरे का दरवाज़ा खोलते ही उसकी दृष्टि सामने किचन में खड़े रैम पर गई जो अपनी चटाई लपेटकर वहीं साइड में रख रहा था और क्षण भर में  रैम के चेहरे से फिसलती हुई फिर से किचन के दरवाजे की दीवार पर ऊपर जा चिपकी और हाथ एक बार फिर अपनी गर्दन पर ! ‘‘गुड़ मॉर्निग मैडम....‘‘ रैम चटाई रखकर किचन के बाहर आ गया था। 

‘‘गुड़ मॉर्निंग रैम....‘‘ 

‘‘रात में नींद आया आपको...?‘‘ उसके स्वर में एक कोमलता थी। 

‘‘नहीं रैम। नींद तो नहीं आ सकी...‘‘

‘‘क्या बात है मैम, समथिंग रॉन्ग ?‘‘

इशिता कुछ नहीं बोली। अभी लगभग छह बजे थे। छुटपुटा धीरे-धीरे बढ़ रहा था। वह जानती थी कि मि. कामले नौ बजे से पहले नहीं उठेंगे। 

‘‘मैडम,कॉफी या चा...?‘‘ उसके स्वर में बहुत मिठास थी।  

‘‘बाहर बैठ सकते हैं क्या ? बाहर बैठकर चाय पीएँ तो...?‘‘ इशिता ने रैम से पूछा। 

‘‘जी बिलकुल... मैं बाहर खुर्सी  रख देता.... फिर चा  बनाता...‘‘ कल से ही रैम की बोली में इशिता ने इस प्रकार के शब्द नोट किए थे। आखिर शब्द ही तो उसके असली मित्र थे। वह जहाँ कहीं किसी की बोली में अलग प्रकार के शब्द सुनती,उसका ध्यान तुरत उन पर जाता। प्रत्येक मनुष्य के संवादों में उसकी बोली का प्रभाव बहुत स्वाभाविक रूप से दिखाई दे जाता है। 

उसने कोने में खड़ी फोल्डेड कुर्सी निकाली और बाहर बगीचे में चला गया। 

‘‘मैडम ! आप बैठिए। मैं चा .... बनाकर लाता....‘‘ 

‘‘मैं फ्रैश हो जाती हूँ...।‘ वह कमरे में मुड़ते हुए यकायक रुक गई। 

‘‘रैम....सुनो, अपने लिए भी चाय बनाकर लाना। दोनों बाहर बैठकर पीएंगे....‘‘ 

 रैम कुछ झिझका फिर चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट ओढ़कर बोला-

‘‘जी....‘‘ 

कुछ देर बाद  इशिता रैम के साथ बाहर बगीचे में बैठी छोटे से सुंदर बगीचे में चाय पी रही थी। रैम एक स्टूल उठा लाया था,उस पर मस्ती से बैठा उसे अपनी बागबानी दिखा रहा था। 

बगीचे में सुंदर फूलों के साथ कई तरह की सब्जियाँ भी लगी हुईं थीं। 

रैम ने बाकायदा बेलें चढ़ाने के लिए डंडों के सहारे रस्सी से जाली बना रखी थी। कच्चे-पक्के  टमाटर ! झूलती हुई लौकी, तोरी, इठलाती हुई मिर्ची के पौधे जैसे वातावरण में सजीवता भर रहे थे।    

‘‘बहुत सुंदर रैम ! ये तुम्हारी मेहनत है सारी....?‘‘

‘‘जी....‘‘रैम का चेहरा अपनी प्रशंसा सुनकर खिल उठा। 

बगीचे के बाहर छोटा सा बाँसों का सुंदर गेट भी बना हुआ था। रैम ने बताया कि वह भी उसने बनाया है। अच्छा कलाकार था रैम ! अब खुल भी गया था उससे... पता नहीं कहाँ-कहाँ की बातें सुनाने लगा। 

गेट के बाहर थोड़ी दूर पर ही कुछ खुदाई का काम चल रहा था। सुबह-सुबह मर्दों,औरतों के साथ उनके बच्चे भी लटके हुए आ गए थे। पेड़ों के नीचे औरत-मर्द मिलकर अपने गोदी के बच्चे के लिए पुराने कपड़े का झूला बाँध रहे थेद्य छोटे बच्चे मिट्टी के ढेर पर चढ़कर गोला बनाकर पेशाब करते हुए खिलखिला रहे थे। जिन्हें देखकर इशिता के चेहरे पर मुस्कान की रेखा खिल आई।

‘‘मालूम है मैडम, ये बच्चे बहुत बदमाश हैं...बंसी भाई इनसे बहुत चिढ़ते हैं और ये लोग उनको भौत ही चिढ़ाते हैं....‘‘ 

‘‘अच्छा ! क्या करते हैं ? ‘‘ 

‘‘वो जब भी यहाँ आते हैं न, उनकी गाड़ी के टायरों पर पेशाब करके भाग जाते हैं....‘‘ रैम खिलखिलाने लगा। इशिता भी अब काफी नॉर्मल हो गई थी। उसके चेहरे पर भी मुस्कान थिरक उठी। 

‘‘मैडम ! एक कप चा.... और ले आऊँ....?‘‘इशिता ने देखा,अभी पौने आठ बजे थे, उसने हाँ में सिर हिलाया।

‘‘अपने लिए भी ले आना...‘‘ 

थोड़ी देर में रैम चाय और बिस्किट ले आया था। 

‘‘सर ने बताया था,आप खाली चा नईं पीता... मैं बूल ही गया.... सॉरी मैडम.....‘‘इशिता मुस्कुरा दी। रैम अंदर से एक छोटी तिपाई भी ले आया  था, उस पर उसने चाय और बिस्किट का डिब्बा भी रख दिया। पहले  की तरह ही वह इशिता के सामने स्टूल पर मुस्कुराते हुए बैठा था।  

वैसे बड़ा सलीके वाला लड़का था रैम, उसकी भाषा कभी बहुत सुथरी हुई लगती तो कभी उसमें स्थानीय शब्दों की भरमार हो जाती। इतनी सी देर में इशिता की उससे ऐसी दोस्ती हो गई जैसे न जाने कितने वर्षों से जान-पहचान हो। 


5.

‘‘तुम्हारा नाम रैम किसने रखा ? क्या मतलब है इसका ?‘‘

रैम थोड़ा हिचकिचाया फिर बोला;

‘‘मैडम ! आपको यहाँ की गरीबी के बारे में तो पता होगा,हम लोको बी भोत गरीब थे। अमारी मम्मी बताते हैं के उनके परिवार के सारे बच्चा लोको अपने को छुपाने का वास्ते अपने मुख पर चूला का राख मलके भीक माँगने को जाता। दादा जी के पास हमेरे परिवार को खिलाने  का वास्ते कुछ बी नहीं था। उन दिनों में... आपने देखा.... रास्ते में जो बड़ा सा चर्च है ने....तब्बी वो बनरा था.... हमेरे  दादा जी को फादर ईसाई धरम लेने को बोला। दादा जी के पास कोई काम नईं था.... उनोने ईसाई धरम ले लिया और हमरे सबके नाम फादर ने ही रखे। पहले मेरा नाम रामा था..... अब्बी मैं रैम और मेरा भाई सैम....‘‘

इशिता की आँखें भर आईं, पेट आदमी से क्या-क्या करवाता है ! लेकिन उसके सामने जो युवा बैठा था वह एकदम मस्त था, बिंदास !

‘‘ख्रिस्ती बन जाने का बाद अमेरा परिवार को कोई प्रॉब्लेम नईं हुआ.... अबी हमेरा अपना म्युजिक-बैंड है, खुद का दो माल का घर है। पापा बैंक में पीयून है, मम्मा छोटे स्कूल में टीचर 

है.... हम दोनों बाई बैंड बजाता है। ‘‘ 

इतनी देर में रैम ने अपने पूरे परिवार की कहानी बयान कर दी थी। इशिता को लिखने के लिए एक सॉलिड प्वॉइंट मिल गया था। उसने रैम के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा। 

‘‘मैडम ! सच्ची-सच्ची एक बात बोलेंगा...? रैम ने कुछ झिझकते हुए इशिता से पूछा। 

उसके चेहरे पर ‘हाँ‘ देखकर वह बोला-

‘‘बुरा मत लगाने का मैडम... आप रात को वो टाँगेला तीर-कमान देखकर गबरा गया था न ?‘‘

इशिता को फिर से याद आ गया वह सब जो उसके ‘बैक ऑफ द माइंड ‘था। रैम के साथ वह और बहुत सी बातों में खोने लगी थी। उसके चेहरे पर फिर से पीलापन पसरने लगा। 

‘‘मैडम, घबराने का नईं, ये तो आपको हरेक गर में मिलेगा,ये हमेरा मतलब आदिवासी का रिवाज है। इससे हम किसीको मारता नईं है....‘‘ रैम ने कितनी सहजता से उसे बता दिया था कि डरने की कोई बात नहीं थी। वह उसे क्या बताती कि वह नर्स की उस कहानी से खुद को जोड़ने लगी थी जिसे मि. कामले उसके पति के सामने शेखी बघारकर आए थे। 

बातों में पता ही नहीं चला नौ कब बज गए। मि. कामले रैम को आवाज देते हुए बरामदे में आ रहे थे। 

‘‘यस...सर....गुड मॉर्निंग.... आपके वास्ते खुर्सी लाता, मैं चा....‘‘ 

‘‘नहीं रैम, अब बैठने का टाइम नहीं है। तुम चाय बनाकर अंदर मेरे कमरे में रख दो,मुझे जल्दी तैयार होना है....‘‘फिर वे इशिता की तरफ मुड़े, ‘‘गुड मॉर्निंग मैडम, हाऊ वाज नाइट...?‘‘ फिर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए हुए कहा-

‘‘मैडम, अपने को लेट नहीं होने का.... तैयार हो जाइए....‘‘

कामले की इस जल्दबाजी पर इशिता के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। 

‘‘आप तैयार होइए मि.कामले, मैं तो दस मिनट में आपको तैयार मिलूँगी... ‘‘कहकर इशिता अपने कमरे में चली गई।      

और ठीक दस मिनट बाद इशिता तैयार होकर सिटिंग रूम में आकर बैठ गई । 

‘‘ओ मैडम ! गुड मॉर्निंग...सो हैप्पी टू  सी यू...‘‘ एक स्त्री ने अंदर आते हुए उसे विश किया। उसके हाथ में टिफिन था जिसे  टेबल पर रखकर उसने इशिता के पैर छुए।

‘‘हमेरा मॉम है... मिसेज एलिसा जॉर्ज...‘‘ रैम ने महिला से परिचय कराने की कोशिश की । 

‘‘अरे! पर आप मेरे पैर क्यों छू रही हैं ? ‘‘वह महिला एलिसा या जो कोई भी नाम था उसका इशिता को बड़े असमंजस में डाल रही थी। 

‘‘आप बड़े लोको...मतलब....इतना पड़ा....लिखा ?‘‘ शायद उसकी समझ में नहीं आ रहा था, वह क्या बोले।

‘‘सर...कहाँ पर हैं ? उनोने सब बताया आपका बारे में...कितना बड़ा बड़ा काम करता है आप?‘‘

‘‘ओहो! गुड मॉर्निंग मैडम मिसेज जॉर्ज,मिले आप हमारी मैडम से....?‘‘ 

‘‘जी,बिलकुल मिला.... आपने कितना बात बोलै इनके बारे में....‘‘ 

‘‘क्या बोले मि.कामले आप इनको ? मेरे पैर छू रही थीं। कितनी बड़ी हैं मेरे से....‘‘ वह इस अजीब सी स्थिति में उलझ सी गई थी। 

‘‘ हा...हा... ‘‘ मि. कामले अपनी चिर परिचित मुद्रा में खिलखिलाए। 

‘‘मैडम ! मैंने इनको बोला था कि अगर मैडम बोलेंगी तभी मैं आपको सीरियल में वही रोल दूँगा जो मैडम बताएंगी...‘‘ इशिता का चेहरा सफेद पड़ गया। पता नहीं ये कामले भी क्या-क्या करते रहते हैं। 

‘‘मि, कामले डायरेक्टर आप हैं,आपको ही ये सब डिसीजन लेने होते हैं। कौनसा  कलाकार किस पात्र में फिट बैठ सकेगा? आप भी....‘‘ 

‘‘अच्छा मैडम! देखेंगे,अभी आप नाश्ता करिए। मिसेज जॉर्ज आपके लिए स्पेशल गर्मागर्म नाश्ता बनाकर लाई हैं...‘‘ रैम और उसकी माँ ने मिलकर टेबल पर सलीके से नाश्ता लगा दिया था। इशिता बहुत असहज थी  लेकिन उसने अपने चेहरे पर एक ओढ़ी हुई मुस्कान ओढ़े रखी।

6.

होटल से क्रू के सब लोग आ चुके थे। तब तक नाश्ता भी खत्म हो चुका था। कामले ने बताया था कि रैम भी हमारे साथ में ‘लोकेशन-हंट‘ पर जा रहा है। मिसेज जॉर्ज ने बेटे को भी नाश्ता करवा दिया था और कुछ नाश्ते के पैकेट्स एक थैले में रखकर उसको पकड़ा दिए थे। पानी के थर्मस तो साथ ही रहते थे।  सबके गाड़ी में बैठने के बाद मिसेज जॉर्ज ने कामले को याद दिलाया  कि  वे हम लोगों का डिनर बनाकर रखेंगी। उनको मैडम को लेकर उनके घर आना है। शायद उन्होंने बेटे से पहले ही यह निमंत्रण मि. कामले  को भिजवा दिया था जिसके बारे में इशिता को कोई जानकारी नहीं थी। मि. कामले का आना-जाना  वहाँ लगा रहता जिससे उनकी खूब बड़ी मित्र-मंडली बन गई थी। जिधर से निकलते...‘साब,थोड़ा चा...पीकर जाइए‘। और सब कामों में देरी होती रहती। 

बंसी वाली गाड़ी में ही कामले के साथ इशिता,सुबीर व रैम भी थे। अहमदाबाद से ही शेड्यूल तय था। आज की लोकेशन-हंटिंग के बाद वहाँ के किसी स्कूल की व्यवस्था व पढ़ाई का तरीका देखने जाना था। जहाँ उनके दोपहर के भोजन की व्यवस्था भी की गई थी। इशिता ने रैम से कुछ बिस्किट्स के पैकेट्स व चॉकलेट्स बच्चों में बाँटने के लिए मँगवा ली थीं। 

झाबुआ का पूरा इलाका रेतीला  सूखा हुआ था केवल कुछ लंबे-लंबे पेड़ दिखाई देते जो उसे बाद में पता चला था कि वे ताड़ी के पेड़ थे जिन पर मटकियाँ टाँग दी जाती थीं। यदि उसे सूर्य की किरणें पड़ने से पहले उतार लिया जाता तब वह स्वास्थ्य-वर्धक था, उसे ‘नीरा‘ कहा जाता और वह शहरों में भी भेजा जाता जिसका सेवन अच्छा माना जाता था लेकिन उसमें  सूर्य की किरणों  के पड़ने पर वह ‘ताड़ी‘ बन जाती जिसको पीने से भयंकर नशा हो जाता था। स्थानीय लोग पेड़ों पर हांडियों को टाँगे रखते और सूर की किरणें पड़ने का सेवन करते। इसके  नशे में वहाँ के लोग बेहद गंभीर अपराध कर बैठते थे।

रैम के दिशा-निर्देश पर बंसी गाड़ी चला रहा था, पीछे-पीछे शूट के लोगों व सामान से लदी -फदी  गाड़ी भी थी। इतने सूखे स्थान पर अपनी आँखों के सामने एक बेहद हरा-भरा स्थान और छोटी सी पहाड़ी से गिरते हुए पतले से झरने को देखकर सबको बेहद आश्चर्य हुआ। छोटा सा लेकिन बेहद खूबसूरत स्थान था वह ! सुबीर ने दूसरी गाड़ी में से कुछ कैमरे निकलवाकर कुछ सुंदर दृश्य कैद कर लिए थे। 

कामले इतनी सुंदर जगह देखकर प्रसन्न थे और उन्होंने सोच लिया था कि अगली बार अपने कुछ दृश्य वहीं पर शूट करेंगे। लगभग एक बजने वाला था और उन्हें अभी उस स्कूल में पहुँचना  था जहाँ उनकी प्रतीक्षा की जा रही थी। वह स्थान वहाँ से लगभग दस किलोमीटर दूर था। रैम के दिशा-निर्देश में काफिला आगे बढ़ा और न जाने किन पथरीले व रेतीले रास्तों से निकलकर स्कूल में पहुंचा जहाँ बड़ी आतुरता से उनकी प्रतीक्षा की जा रही थी। 

स्कूल के बड़े मास्टर जी अपने सहयोगी शिक्षकों  को लेकर धूप में आगे-पीछे कर रहे थे। उन्होंने कुछ बच्चों को भी एकत्रित किया हुआ था जिन्हें पंक्तिबद्ध होने की आज्ञा दी जा रही थी। बच्चे एक-दूसरे को धक्के मारते, अपने कमीजों से बहते हुए नाक व चेहरे पर आए पसीने को पोंछते  हुए बड़े मास्टर जी की आँखों की तरेर से मार खाकर भी एक-दूसरे के आगे आने की कोशिश करते नजर आ रहे थे। 

 ‘‘मेहमानों का स्वागत करेंगे.... लाओ फूलों के गुलदस्ते जो बनाए हैं....‘‘ कुछ बच्चे पंक्ति में से दौड़कर अंदर जाकर स्कूल के प्रांगण से जंगली फूल तोड़कर बनाए गुलदस्ते लेकर आ गए थे जिनसे मेहमानों का स्वागत किया गया। सुबीर के शूटिंग के कुछ लड़के शूट कर रहे थे और बच्चे अपनी-अपनी शकल दिखाने के लिए बार-बार एक दूसरे को धक्के मारकर आगे आने की कोशिश कर रहे थे। 

‘‘मेहमानों के स्वागत में गीत गाएंगे....‘‘ बच्चे फिर 

धक्का-मुक्की करते, अपने कमीज की बाहों में नाक पोंछते बेसुरे सुर में गाने का प्रदर्शन करने लगे-

‘हम होंगे कामयाब.... एक दिन....‘‘ बच्चे लंबे-लंबे हाथ उठाकर जोश में गा  रहे थे। सामने कैमरा देखकर वे पूरे उत्साह में थे और यह भी  जानते थे कि उन्हें गीत  गाने के बाद केला मिलने वाला है। 

इशिता ने रैम से गाड़ी से बिस्किट्स व चॉकलेट्स के पैकेट्स भी मंगवा लिए थे और उसे कहा था कि केले बँट जाने के बाद वह उन बच्चों में ये सब बाँट देगा। 

स्कूल की काँटो वाली बाड़ के बाहर बच्चों की माँए भी खड़ी थीं, किसीकी काँख में बच्चे भी लटक रहे थे और अहाते में बँटने वाली चीजों पर उनकी दृष्टि जमी हुई थी। 

‘‘रैम, सबको बाँट देना,वो जो बाहर औरतें खड़ी हैं उनको भी। बचाना नहीं कुछ भी....‘‘ कहकर वह सबके साथ अंदर आ गई थी जहाँ पर मेहमानों के लिए कुर्सियों का इंतजाम किया गया था। 

अब सबके पेट में चूहे कबड्डी खेल रहे थे और सामने के बरामदे में चूल्हे पर बीरबल की खिचड़ी पक रही थी। 

खाने के लिए मेहमानों को एक अलग कमरे में ले जाया गया जहाँ पर नीचे टाट पर चादरें बिछाकर खाने का इंतजाम किया गया था। 

‘‘मास्टर ! जल्दी लाओ, मेहमान भूखे हैं....‘‘ परोसने वाले मास्टरों के हाथ से घबराहट में खिचड़ी प्लेटों में न गिरकर जमीन पर गिर रही थी और इशिता को लग रहा था कि वह उनकी सहायता कर सकती लेकिन उस समय वह महत्वपूर्ण अतिथि के रूप में थी, सो चुपचाप देखती रही। 

आखिर खिचड़ी आ ही गई,साथ में मिट्टी की कटोरियों में दही जो गर्मी के कारण फटने को मजबूर थी। अचार की फाँकें और कटी हुई प्याज सामने प्लेट में रखी थी। 

भूख से बेहाल मेहमानों ने जैसे ही खिचड़ी मुख में डाली,कच्ची दाल के दाने दाँतों में चिपकने लगे। बेहद कच्ची खिचड़ी और पेट में चूहों की कलाबाजी.... दो चार कौर खाकर सब उठ खड़े हुए। 

7.

उस गाँव से निकलकर कामले ने गाड़ी का रुख एक छप्पर वाले होटल जैसी जगह पर करवाया। तब तक शाम के चार बजने वाले थे। सबके पेटों में बैंड बज-बजकर शांत होने लगे थे।

‘‘सर! पाँच बजे हमको कलेक्टर साहब को भी मिलना है...‘‘ सुबीर ने कहा।

‘‘हाँ, याद है, नहीं तो कल कैसे अलीराजपुर जा सकेंगे?‘‘ अहमदाबाद से लाए गए आज्ञा-पत्र पर कलेक्टर साहब के हस्ताक्षर करवाकर उनका आज्ञा-पत्र भी लेना था। अलीराजपुर की जेल के कैदियों से मिलने जाना था और वहाँ यह भी नोट करवाना था कि कितने लोगों को ले जाया जा रहा है।अलीराजपुर झाबुआ के अंतर्गत था,सरकारी काम के लिए कलेक्टर के आज्ञा-पत्र की आवश्यकता थी।  

‘‘जल्दी जल्दी पेट में कुछ डाल तो लें...‘‘ कामले ने एक खारी बिस्किट मुह में भरते हुए कहा। सबका ही भूख के कारण बुरा था। 

होटल के मालिक ने इतनी देर में अपना चूल्हा तेज करके फटाफट कच्चे-पक्के गर्म पकौड़े भी लाकर मेज पर रख दिए थे। 

जल्दी ही पेट ने अपनी तृप्ति की सूचना दे दी और काफिला झाबुआ के कलेक्टर के ऑफिस के आगे ठीक पाँच बजने में कुछ मिनिट पर जा रुका। बाहर अपना परिचय-पत्र दिखाकर मि. कामले इशिता के साथ कलेक्टर साहब के ऑफिस में पहुँच गए। 

कलेक्टर साहब उनकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे, उन दोनों के अंदर पहुँचते ही उन्होंने कहा-

‘‘आइए मि. कामले, मैं आपकी ही वेट कर रहा था, आज काम जल्दी खत्म हो गया था...‘‘ 

कामले वहाँ जाते रहते थे इसलिए उनका कलेक्टर साहब से पूर्व परिचय था। इशिता का परिचय करवाया गया,कलेक्टर सूरी एक सुलझे हुए सरल इंसान लगे इशिता को। 

‘‘बस. दो ही लोगों को अलीराजपुर जाना है ?‘‘ कलेक्टर साहब ने मि,कामले से पूछा था। 

‘‘नहीं साहब, हमारे साथ फोटोग्राफर सुबीर, शूटिंग-क्रू के चार मेंबर्स और वो...जॉर्ज परिवार का लड़का रैम भी जाएगा जिसको आप जानते हैं...‘‘

‘‘उन सबको बुलवा लीजिए न, सबसे मुलाकात हो जाएगी...‘‘ 

सबके परिचय के बाद कलेक्टर साहब ने चाय बनवाई और दूसरी तरफ सबके नाम से अपने क्लर्क से एक आज्ञा-पत्र टाइप करवाकर उसपर अपने हस्ताक्षर कर दिए। इस पत्र के बिना जेल में मुलाकात लेनी संभव नहीं थी। 

अब तक बहुत थकान हो चुकी थी। इशिता का मन इस समय रैम के घर डिनर के लिए जाने का बिलकुल  भी नहीं था। वह सो जाना चाहती थी, कल रात भी उसकी नींद पूरी नहीं हुई थी लेकिन रैम की माँ उनके पहुँचने से पहले  ही वहाँ बैठी थीं। वह जानती थी कि वहाँ कामले का अभी थकान उतारने का कार्यक्रम चलेगा, उसको बिना बात ही थकान हो जाएगी। 

‘‘प्लीज, मुझे माफ करिए। मुझे बिलकुल भूख नहीं है,आराम करना चाहती हूँ...‘‘

‘‘मैडम!  आपके लिए इन लोगों ने इतनी तैयारियाँ की हैं...आप चलिए तो सही, आप खाना खाकर रैम के साथ जल्दी आ जाइएगा...‘‘ 

‘हे भगवान! न जाने क्या तैयारियाँ की हैं‘ मन में वह भुनभुना रही थी लेकिन जबरदस्ती मुस्कुराना पड़ रहा था।  

कामले ने बंसी से कहा कि वह इशिता व कामले को रैम के  घर छोड़ दे जबकि सामने सड़क पार करते ही रैम का घर था। 

काफी अच्छा-खासा घर था रैम का। नीचे मरियम की आदमकद मूर्ति लगी हुई थी, दो कमरे भी दिखाई दे रहे थे लेकिन वो बंद थे। साइड में एक जीना था, रैम की माँ भी आ चुकी थी और इशिता से आगे जाकर जीने में फटाफट चढ़ गई थी। जब तक इशिता और कामले ऊपर पहुँचे तब तक वह अपने पति व दूसरे बेटे सैम के साथ एक बुके सहित सीढ़ियों के ऊपरी छोर पर खड़ी थी। 

‘‘आइए, मैडम... वैलकम...‘‘ उन्होंने सीढ़ियाँ खत्म होते ही उसे पहले बुके पकड़ाते हुए कमरे में आने का इजहार किया। पति-पत्नी ने उसे कुछ ऐसे ट्रीट किया मानो वह कोई वी.आई.पी थी। 

‘बस...एक रैड कार्पेट की कमी है ‘उसने मन में सोचा। 

ऊपर तीन कमरे थे, खासे बड़े ! सामने बरामदा था... खूब लंबा-चैड़ा जिसमें बैंड के सारे साजो-सामान दिखाई दे रहे थे। रैम इशिता को अपने ‘म्युजिक-बैंड‘ के बारे में बता चुका था। इशिता का मन अधिक बात करने का नहीं था,वह चुपचाप बैठी घर देखती रही। कामले रैम के पिता के साथ दूसरे कमरे में यह कहते हुए चले गए थे-

‘‘एक्सक्यूज अस मैम... मैं जरा...‘‘ उन्होंने अंदर जाने का इशारा करते हुए इशिता से कहा-

‘‘आपके साथ रैम चला जाएगा, मैं थोड़ी देर में आऊँगा...मैडम, यू वोंट माइंड...‘‘

‘‘जी बिलकुल नहीं, कैरी ऑन मि. कामले, ....‘‘ 

जिस कमरे में उसे बैठाया गया था, वह एक तरह से डाइनिंग-कम ड्राइंग रूम ही था। उसके लिए फटाफट सुंदर क्रॉकरी में खाना लगा दिया गया। प्लेटें व्यंजनों की कई वैराइटीज से भरी थीं। 

‘‘मैं अकेली ?‘‘ इशिता ने  पूछा। 

‘‘नहीं मैडम,मैं आपके साथ बैठती हूँ न। सैम तुम  सर्व करो.... तुम भी डिनर ले लो रैम, तुमको मैडम के साथ जाने का  है...‘‘

अचानक सामने से सैम निकलकर आ गया था और उसने बड़ी तहजीब से खाना सर्व करना शुरू किया। दोनों भाई बड़े अनुशासित और माँ के कहेनुसार चलने वाले थे।  

अगले दिन सुबह जल्दी ही निकलने की बात हुई थी लेकिन मि. कामले  से मिलने सुबह कुछ लोग आने वाले थे और मि. कामले बला के चिपकू... वह खाते हुए यही सब सोच रही थी। 

‘‘मैडम! खाना अच्छा नहीं है क्या?‘‘ अचानक मिसेज जॉर्ज ने पूछा। 

‘‘अरे! नहीं बहुत अच्छा है,आपको पता है न मैं कितनी थकी हुई हूँ... बस. इसीलिए ज्यादा नहीं खा पा रही... फिर सुबह निकलना भी है,रैम हमारे साथ जा रहा है न ?‘‘ इशिता को कुछ तो बोलना था। 

‘‘हाँ जी, मुझको सर ने बोला....‘‘

खाना खाकर वह उठ खड़ी हुई। धन्यवाद देकर वह रैम के साथ अपने रुकने की जगह पर आ गई। 

8.

इशिता अपने कमरे में आकर गहरी नींद सो गई, उसे बिलकुल पता नहीं चला कि  रात में किस समय मि. कामले आए थे। रोज की तरह चिड़ियों की चहचहाहट के साथ ही उसकी आँखें लगभग पाँच बजे के करीब खुलीं। 

उसने कमरे का दरवाजा खोलकर देखा, रैम करवट बदल रहा था। दरवाजा खुलने की आवाज से उसकी आँखें खुलीं, वो हड़बड़ाकर उठने लगा। 

‘‘अरे ! सो जाओ रैम, मेरी नींद पूरी हो गई तो आँखें खुल गईं।‘‘

‘‘गुड मॉर्निंग मैडम। मैं भी जाग गया है...‘‘ वह उठकर अपनी चटाई लपेटने लगा।

उसकी दृष्टि फिर से किचन के दरवाजे पर टँगे तीर-कमान पर गई। पल भर को हृदय धड़का लेकिन वैसी कुछ घबराहट नहीं हुई जैसी पहली बार देखकर हुई थी।    

बाहर झुटपुटा शुरू होने लगा था। वह बाहर जाकर रैम के छोटे से बागीचे में टहलने लगी। उसने कुछ नहीं कहा पर वह जानती थी रैम अभी आ जाएगा। कुछ देर बाद ही रैम कुर्सी लेकर आ गया। 

‘‘मैम, आप फ्रैश हो गए ?‘‘ उसने पूछा। 

वह जानती थी रैम चाय के साथ बिस्किट लाने के लिए पूछ रहा था। 

‘‘हूँ....‘‘ उसने धीरे से मुस्कुराकर कहा। एक ही दिन में रैम उसकी दिनचर्या से परिचित हो गया था। 

कुछ देर में वह एक ट्रे में चाय व बिस्किट का डिब्बा लेकर आ गया। पहले दिन की तरह वह खुद स्टूल पर बैठ गया। 

रैम खूब बातें करता था, उसने बातों ही बातों में इशिता को जैसे पूरे झाबुआ की सैर करवा दी। कहाँ पर क्या है ? क्या नए विकास हो रहे हैं ? खिर्स्ती धर्म अपनाने के बाद उनकी जाति के लोग उनसे अलग रहने लगे लेकिन साथ में उन्हें ईर्ष्या भी होने लगी क्योंकि अब यह परिवार खाते-पीते परिवारों में से था। 

‘‘मैडम ! ये तो इस दुनिया की खासियत है जब गरीब होते तो इंसल्ट करने का और जब पैसा आ जाए तब कुछ कुछ बातें करने का...‘‘ कड़वे अनुभव छुटपन में ही बहुत कुछ सिखा  देते हैं। 

रैम ने उसे और बहुत सी बातों के साथ यह भी बताया कि यहाँ आदिवासियों में भगोरिया का मेला होता है जिसमें लड़के-लड़की मिलते हैं और भाग जाते हैं। फिर काफी दिन बाद वो मिलते हैं और लड़की के परिवार वाले लड़के के परिवार से काफी बड़ी रकम लेकर ही उन दोनों की शादी करते हैं। 

 ‘‘और पता है मैडम... यहाँ एक लड़के की कई बीबी भी होती... ,कब्बी कब्बी तो वो लड़के से डबल उमर की भी होती...। 

‘‘अरे ! पर ऐसा क्यों ? ‘‘ इशिता ने आश्चर्य से पूछा। 

‘‘यहाँ औरतें ही शब्बी काम करती हैं न ? घर का काम,जंगल का काम... सब्ब...‘‘ 

‘‘तो, मर्द क्या करते हैं ?‘‘

‘‘वो... बस... ऐश करते हैं और...‘‘ कहकर वह संकोच में चुप हो गया। 

आज भी लगभग नौ बजे कामले उठे।

‘‘गुड मॉर्निंग मैडम.... सॉरी... रात को बहुत देर हो गया था...‘‘ 

‘‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा, मैं तो खूब चैन की नींद सोई...‘‘

‘‘मैं तैयार हो जाता है मैडम... जरा जल्दी से एक कप चाय मिलेगा रैम बाबा... ‘‘कामले मराठी मूल के थे उनका बोलने का तरीका भी अलग ही था, कुछ बंबइया मिश्रित। 

रैम के पीछे कामले भी जल्दी से अंदर चले गए। इशिता जानती थी अगर कामले लोगों में बैठ गए तब तो हो गया आज का दिन पूरा...! 

उसने सोचा उसे तैयार तो हो ही जाना चाहिए और वह अपने कमरे की ओर बढ़ गई। बाहर आने पर इशिता ने देखा, रैम ने नाश्ते के लिए तवे पर ब्रेड सेक दी थी, साथ ही  टेबल पर बटर भी रख  दिया था। गरमा-गरम कॉफी उसके सामने थी। 

कामले भी जल्दी तैयार हो गए और एक टोस्ट पर बटर लगाकर धीरे-धीरे खाने लगे। किसी सोच में दिखाई दे रहे थे कामले।  

‘‘सब ठीक है न ?‘‘ इशिता ने कामले से पूछा। 

‘‘ ओ ! यस... सब ठीक है। अगर यहाँ के लोग मिलने को आ गए न तो निकलने में देर हो जाएगी और वो रास्ता बड़ा खराब है... लेकिन मैंने बोल दिया है न मैडम तो...‘‘ उनके शब्द मुख में ही रह गए। दो-तीन लोग बाहर आकर कामले सर को आवाज लगाने लगे थे।कामले अपना नाश्ता छोड़कर उनके स्वागत के लिए बाहर बरामदे में निकल गए। 

दरसल कामले ने कलाकारों का एक बड़ा झुण्ड तैयार कर रखा था, यहाँ के लोग कम पैसे में सीरियल में काम करने के लिए तैयार हो जाते और उन्हें अहमदाबाद स्टूडियो में बुलाने का पैसा भी नहीं देना पड़ता। शूटिंग भी वहीँ हो जाती, कभी जंगलों में,कभी किसी के भी घर पर ! सरकारी शिक्षण के इन प्रोजेक्ट्स में कुछ अधिक ‘रिच सैट्स‘ की जरुरत नहीं थी।   

ठीक दस बजे बंसी,सुबीर और क्रू के सभी सदस्य पहुँच गए। अब वहाँ भीड़ सी हो गई थी। इशिता को कुछ बेचैनी सी होने लगी। वह अपना कमरा बंद करके बैठ गई और अपने काम के कुछ प्वाइंट्स नॉट करने लगी। 

सिटिंग रूम से लगातार आवाजें आ रही थीं। मि. कामले ने सभी लोगों से उसका परिचय करवाकर उसे वहीं बैठने का आग्रह किया था लेकिन उसे सहज नहीं लग रहा था अतः वह कमरे में आकर काम करने लगी थी। 

न जाने कब वह पलँग पर लेटी और फिर से उसकी आँखें बंद हो गईं, दरवाजे पर कोई था। 

इशिता ने दरवाजा खोला-

‘‘क्या मैडम ! आप भूखे ही सो गए थे...?‘‘कामले थे।  

इशिता ने महसूस किया पेट उससे शिकायत तो कर रहा था, घड़ी में समय देखा-

‘‘दो बज गए...?‘‘ वह बड़बड़ाई। रात को तो इतनी गहरी नींद आई थी,वह फिर इतना सो ली ! 

  वह बाहर निकली, सिटिंग रूम में शांति थी। क्रू के लोग भी बैठे-बैठे बोर हो गए थे। वे सब  होटल जाकर खाना खाकर आ गए थे और यहाँ के लिए खाना पैक करवा लाए थे। 

कामले, इशिता और रैम जल्दी ही खाने बैठ गए। निकलने में जितनी देर होगी,उतना ही अँधेरे में गड़बड़ी होने की संभावना थी। 

लगभग तीन बजे वहाँ से निकलना हुआ,लेकिन रास्ते में न जाने कितने लोग कामले को राम, श्याम करते मिले जिनके पास गाड़ी रुकवाकर उनके हाल-चाल न पूछते तो कामले का खाना हजम होने वाला नहीं था। 

यानि जहाँ से गाड़ियाँ ‘कनवाय‘ में जाती थीं, जहाँ आगे-आगे पुलिस की एस्कॉट चलती और पीछे-पीछे गाड़ियों का काफिला,वहीँ से सबको जाना होता था। ऊबड़-खाबड़ रास्तों में कहाँ से आदिवासी अटैक हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता था। वहाँ अभी तक कई गाड़ियाँ जमा हो गईं थीं। 

उस स्थान से अलीराजपुर पहुँचने में लगभग डेढ़ घंटे लगने थे और यहाँ पहुँचते हुए उन्हें आठ  बज गए  थे। 

अंधेरा छा गया था और घने जंगल में दूर -दूर तक रौशनी के नाम पर जैसे दो पटबीजने से शायद जीरो वॉट के बल्ब इधर से उधर डोल रहे थे। गाड़ियाँ पीं पीं कर रही हीं  और एस्कॉट की गाड़ी कहीं दिखाई नहीं दे रही थी। 

अचानक एक लंबा-चैड़ा सरदार ट्रक-ड्राइवर अपने ट्रक से कूदा,अपनी लुंगी की फेंट में से उसने एक बॉटल निकाली,मुँह पर लगाकर गटागट खाली करके उसे जंगल की तरफ नीम अँधेरे में उछाल दिया। उसके ट्रक की हैड-लाइट्स खुली थीं जिससे वहाँ का थोड़ा -बहुत  दिखाई दे रहा था। 

‘‘क्यों कहाँ है वो त्वाडा एस्कॉट... बुला अपने अफसर 

को...‘‘ उसने अपने दोनों बलशाली हाथों से दुबले-पतले सिपाहियों को झकझोर दिया। ट्रक की हैड लाइट्स सिपाहियों पर पड़ने से वे जानदार लगे वरन वे ऐसे लग रहे थे मानो दो काले रँग के पेड़ खड़े हों और उनमें आँखों की जगह दो पटबीजने पटर पटर कर रहे हों। 

सिपाही घबरा से गए,उन्हें लगा अभी सरदार जी के हट्टे-कट्टे दो-दो हाथ पड़ेंगे और वे लुढ़क पड़ेंगे। उनका भाग्य अच्छा था कि इतनी देर में एस्कॉर्ट की गाड़ी पीं-पीं करती गुप्प अंधकार से बाहर आई और सरदार जी अपने ट्रक में सवार होकर ट्रक स्टार्ट करने लगे। अब बहुत सी गाड़ियों की पीं-पीं...घर्र-घर्र सुनाई देने लगी थी और एस्कॉट  के आगे पीं-पीं करके जाने के बाद गाड़ियों का काफिला भी चल पड़ा था। 

कुछ गाड़ियाँ तेजी से भाग रही थीं,शूट की गाड़ी थोड़ी पीछे रह गई थी,उसके लिए पाँच मिनिट प्रतीक्षा करना जरूरी था। इतनी देर में एस्कॉट की गाड़ी तो न जाने कहाँ भाग गई थी और पीछे की गाड़ियाँ भगवान भरोसे चल रही थीं। 

शूट के क्रू की गाड़ी के पास आते ही  दोनों गाड़ियाँ साथ चलने लगीं लेकिन जैसे ही कुछ दूरी पर चलीं,एक बड़ा सा पत्थर गाड़ी की विंड-स्क्रीन पर आकर इतनी जोर से टकराया कि गाड़ी का काँच चटख गया। 

‘‘भगाओ बंसी भाई,नहीं तो अभी अटैक हो जाएगा...‘‘सबको कामले पर गुस्सा आ रहा  था  लेकिन यह बहस करने का नहीं,जान बचाने का समय था।      

9.

अलीराजपुर पहुँचते हुए रात के दस बज गए। एस्कॉट की जीप अलीराजपुर की सीमा पर ही एक छोटे से होटल पर खड़ी मिल गई थी। उसमें से उतरे हुए सिपाही और ड्राइवर आराम से ठहाके लगते हुए चाय पी रहे थे। 

‘‘कमाल है, इन लोगों को ये भी ध्यान नहीं कि जिन लोगों के लिए इनकी ड्यूटी लगी है, वे सही सलामत पहुँचे भी या नहीं?‘‘ इशिता ने फुसफुसाकर रैम से कहा।

‘‘ मैडम ! सब ऐसेइच चलता है....‘‘ वह भी इशिता के कान में फुसफुसाया। इशिता को गुस्सा आ रहा था। कमाल है कामले उनके पास जाकर दाँत फाड़ने लगे थे, अपनी विंड-स्क्रीन का काँच दिखाकर बता तो सकते ही थे कि उनके आगे चलने का फायदा क्या हैं ? अगर कुछ और ज्यादा हो जाता तो ? 

रैम शायद उसके दिल की बात समझ गया था, वह इशिता के कान में फुसफुसाया-

‘‘मैम! ये आदिवासी इलाका है। ये सपाई लोको बी तो आदिवासीच न, तो इनसे दुश्मनी नहीं, करने का...‘‘

कामले ने होटल वाले से खाने के लिए कहा और उसने आलू की ऐसी रसेदार सब्जी जिसमें नमक, मिर्च भरा पड़ा था,आलू ढूँढने के लिए उसमें तैरने की जरूरत थी और घुटे हुए चावल लाकर उसने सबके सामने प्लेटों में सजा दिए। 

मरते, क्या न करते ! जैसे तैसे कुछ कौर पेट में डालकर सब उठ खड़े हुए-

‘‘बंसी, बैस्ट होटल की तरफ चलो...‘‘ कामले ने बंसी को आदेश दिया।   

शायद वह कोई बाजार था जो बिना बत्ती के अँधेरे में नहाया हुआ था। लगभग पंद्रह मिनट बाद गाड़ी एक छोटे से दरवाजे के सामने आकर रुक गई। नीरव सन्नाटे में केवल एक छोटी सी पान की दुकान खुली हुई थी जिस पर एक पीला सा बल्ब तार के सहारे झूल रहा था। अब रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे। नीरव सन्नाटे में ‘आजा सनम मधुर चाँदनी  में हम  तुम मिले तो वीराने में भी आ जाएगी बहार...‘बजकर न जाने किस सनम को पुकार रहा था ? 

बैस्ट होटल के छोटे से दरवाजे को खटखटाते ही अंदर से उनींदी सी आवाज आई-

‘‘कूंण सै...‘‘ 

‘‘कामले सर अमदाबाद से...‘‘ बंसी के कहने पर दरवाजा धीरे से खुला। 

‘‘आओ...आओ सर...कैसे हो...?‘‘

‘‘बस बढ़िया...रामदेव...सब बढ़िया ?‘‘ कामले सबको लेकर  छोटे से दरवाजे में से अंदर आ गए। बंद कमरे का भभका उसके सिर पर चढ़ गया। 

वह एक लॉबी सी थी जिसमें एक छोटा सा सोफा था जिस पर शायद वह बंदा सोया होगा। उसने नीचे कोने में  घुटने पेट में घुसाए सोए हुए एक लड़के की कमर को पैर से हिलाया। बेचारा तेरह/चैदह साल का एक दुबला पतला बच्चा आँखें मलता उठ खड़ा हुआ। 

‘‘चल, खड़ा हो। कमरे खोलने का,साब लोको का सामान कमरों में जमाने का... मैं आता... तू चाबी लेके चल...‘‘  

उस लॉबी में ही एक काउंटर सा बना था जिस पर काले रंग के टेलीफोन साहब विराजमान थे। इशिता ने उसे देखकर कामले की ओर देखा-

‘‘अरे ! रामदेव भाई ! मैडम को अहमदाबाद बात करवाओ न....!‘‘

‘‘ठीक है साब...आप लोग ऊपर चलो,मैं मैडम को बात करवाकर आता अब्बी....‘‘

इशिता की सत्येन से बात हो गई,बहुत अच्छा हुआ, वो परेशान से थे। पता चला श्री उसे बहुत याद कर रही थी। अभी-अभी उसकी आँख लगी थीं। लेकिन वह पिता की आवाज सुनकर उसकी आँखें खुल गईं....

‘‘मम्मा ! कब आने वाली हो...‘‘ बच्ची की आवाज में नींद भरी हुई थी। 

‘‘लव यू मम्मा....जल्दी आ जाना....‘‘ कहकर श्री फिर से सो गई, सत्येन ने बताया। इशिता को चैन पड़ गया था पति व बच्ची की बात सुनकर। 

उस लॉबी में ही साइड से एक छोटा सा जीना लगा हुआ था। रामदेव ने उसे ऊपर चढ़ने का इशारा किया। ऊपर तो और भी बुरा हाल था। वही बेनूर सी ऐसी रौशनी जिसमें  दस आँखों वाले को भी न दिखाई दे। चार कमरे खोल दिए गए थे। इशिता को जो कमरा दिया गया, उसमें से भयंकर दुर्गंध आ रही थी,उसके पास वाला रैम का था। 

रैम ने खिड़कियाँ खोलकर पँखा चला दिया था लेकिन वह गंध इशिता के फेफड़ों में भरी जा रही थी। इशिता ने रैम को पैसे देकर कहा कि वह जल्दी से पान की दुकान से अगरबत्ती के पैकेट्स और माचिस ले आए। उसने रैम से दीवारों के छेदों में धूपबत्तियाँ लगवाकर जलवा दीं लेकिन दुर्गंध का बुरा हाल था। सब थके हुए थे, अपने कमरों में ड्रिंक लेकर जैसे-तैसे पड़ गए। बेचारे रैम की ड्यूटी इशिता के साथ थी।   

वहाँ सोने का कोई सवाल ही नहीं था। कुर्सी मँगवाकर इशिता रात भर मँुह पर कपड़ा बाँधे बैठी टूलती रही। उसने रैम से कहा भी कि वह सो जाए लेकिन उसे कंपनी देने के चक्कर में वह बेचारा भी उसके पास एक कुर्सी पर बैठा झटके खाता रहा।

जैसे ही झुटपुटा खिड़की के रास्ते कमरे में झाँका इशिता ने कुर्सी छोड़ी और ब्रश करने की कोशिश की लेकिन मुह में झाग भरे रहे गए,कमरे की लॉबी में जो वॉश-बेसिन था उसमें झांकते ही उसे वॉमिट होने लगी। बाहर निकलने की जगह झाग मुह के अंदर जाने लगा। कभी गुलाबी रंग का वॉश बेसिन रहा होगा जो अब बीड़ियों के टुकड़ों,माचिस की तिल्लियों,पान की पीक से भरा पड़ा था। वह भागकर कमरे में आई और बिना देखे-भाले कमरे की खिड़की से बाहर कुल्ला कर दिया। पानी की बॉटल तो उसके हाथ में ही थी। दो-तीन बार कुल्ला करके उसे थोड़ा चैन पड़ा। 

‘‘ओय... कूंण सा...??‘‘ नीचे से किसीकी भद्दी गाली की आवाज आई। 

अरे बाबा ! कोई नीचे सड़क पर सोया हुआ था। उसने रैम से वहाँ से भागने को कहा और वे दोनों धड़धड़ करते नीचे उतर आए। एक ही नजर में इशिता ने उस गैलरी के गाढ़े गुलाबी रंग को देख लिया था जिस पर न जाने कैसे-कैसे अनगिनत गंदे दाग लगे थे। उसके लिए वहाँ खड़ा रहना अब मुश्किल था। 

नीचे का दरवाजा खुल चुका था,छोटा लड़का झाड़ू लगा रहा था और रामदेव दरवाजे के बाहर खड़ा बार-बार सड़क पर दातुन करके थू...थू कर रहा था। इशिता को देखते ही बोला- 

‘‘मैडम ! इदर अकेले जाने का नाइ....अब्बी भौत से लोग ताड़ी के नशे में होएंगे...‘‘

‘‘रामदेव भाई। मैं जाता है मैडम के साथ... इदरीच --थोड़ा दूर... बस, उनको खुल्ली हवा माँगता...‘‘

रामदेव मँुह देखता ही रह गया और इशिता रैम का हाथ पकड़कर वहाँ से भाग आई। 

रास्ते में सच में ही दो-तीन लोग झूमते हुए मिले लेकिन रैम ने उसे अपने पीछे कर लिया। 

‘‘अब ...?‘‘ इशिता खुली हवा में साँस ले पा रही थी। 

‘‘मैडम ! इसी रोड पे आगेइच जेल है--वहीँ चलते न,आपको चा बी मिल जाएगी...‘‘

रैम वहाँ के चप्पे-चप्पे से परिचित था। 

‘‘अपन को जेल में तो जाने का न आज... तो वहींच चले न....‘‘ अब तक सूर्य की लालिमा दिखाई देने लगी थी। 

इशिता इतनी हताश थी कि बिना सोचे-समझे रैम के साथ चल दी। सच में ही थोड़ी दूर पर ही बड़ा सा गेट दिखाई दिया- उस पर अर्धचन्द्राकार में बड़ा सा बोर्ड था जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था;

 (जेल...अलीराजपुर) और एक लंबा-चैड़ा आदमी अपनी लुंगी घुटनों तक चढ़ाकर गेट के बाहर एक औरत को पैरों से जोर-जोर से मार रहा था। उसकी रोने की आवाज से वातावरण में एक अजीब सा सहमापन पसरा हुआ  था। 

10.

एक भद्र महिला को अपने सामने देखकर लुंगी वाले महानुभाव कुछ खिसिया से गए,उन्होंने अपनी लुंगी नीचे कर ली फिर अपने पास खड़े हुए दो युवा लड़कों को देखकर उनमें से एक से कहा-

‘‘रौनक ! इसको अंदर लेकर कोठरी में बैठाओ,मैं बाद में इससे बात करूँगा-‘‘ 

‘‘जी, कहिए-‘‘ वे लुंगी वाले महाशय इशिता की ओर मुखातिब हुए। 

‘‘मैं डॉ. इशिता वर्मा,अहमदाबाद से... मि. कामले के साथ....‘‘ 

‘‘अरे ! आपको तो आज जेल की मुलाकात लेनी है,लेकिन आप इस तरह से ?.... माफ करिए, मैं यहाँ का जेलर अनूप सिन्हा....‘‘ वह बंदा कुछ अधिक ही शर्मिंदा लग रहा था। 

‘‘आप अंदर आइए। मेरे पास झाबुआ से कलेक्टर साहब के पास से सब लिस्ट आ चुकी है लेकिन आप अकेले ? इस समय? ऐसे ?....‘‘ उसने उन दोनों को अंदर आने का आग्रह किया और स्वयं आगे चला। 

जेल के अंदर प्रवेश करते ही इशिता ने जेल के उस खूब बड़े से प्रांगण को देखा जो पेड़-पौधों, बेलों, फूलों से भरा पड़ा था। जेलर साहब फूलों की पंक्ति में बनी एक पगडंडी पर चल रहे थे जो एक बरामदे पर जाकर बंद होती थी। बरामदे में खूबसूरत लॉन-चेयर्स थीं और सामने ही एक दरवाजा। 

‘‘आप बैठें प्लीज, मैं आता हूँ...‘‘ वे जल्दी से दरवाजा खोलकर कमरे में चले गए। उनकी आवाज आ रही थी। 

‘‘अरे ! बाहर आओ मुक्ता... देखो कौन आया है...?‘‘

इशिता ने रैम की ओर देखा और उसे यह महसूस हुआ कि उसने यहाँ आकर गलती नहीं की है। 

पाँच मिनट के अंदर जेलर साहब लुंगी पर कुरता पहनकर पत्नी सहित उसके सामने थे। 

‘‘मेरी पत्नी....मुक्ता...‘‘ 

सुंदर सी स्त्री थी मुक्ता, मुस्कुराते चेहरे से उसने इशिता को अभिवादन किया। 

‘‘आपको इस तरह मिलना मेरे लिए बड़ी अजीब स्थिति हो गई  लेकिन हम लोगों के लिए यह बहुत नॉर्मल है...हमें हर दिन ऐसी स्थिति से रूबरू होना पड़ता है... हम लोग अगर इनसे ऐसे मार-पीट न करें तो ये यहाँ मारकाट करवा दें...‘‘

जेलर साहब ने बताया कि उस जेल में ऐसे कैदी रखे जाते हैं जिन्होंने कत्ल किया होता है। वहाँ ताड़ी पीना आम बात है  और ताड़ी की बोतल पर इन सीदे-सादे लोगों से कत्ल करवा लिए जाते हैं। झाबुआ से भी कैदी इसी जेल में भेज दिए जाते हैं। वो जिस औरत की पिटाई कर रहे थे,ऐसा उन्हें लगभग हर रोज करना पड़ता है। ये औरतें अपने प्रेमी या पति के लिए छिपाकर ताड़ी की बोतल भरकर लातीं और मिलने के बहाने अंदर जाकर गंदे नालों में डालकर उनके पास पहुंचा देतीं। 

इनके मिलने के लिए दिन में सुबह और शाम एक-एक घंटा निश्चित किया गया है लेकिन ये स्त्रियाँ बहुत पहले से आकर जेल के बाहर चक्कर मारने लगती हैं और पकड़ी जाती हैं। जेलर साहब ने जेल के ही कुछ बंदों को इस काम पर लगा दिया था। रौनक इन सबका प्रमुख था। 

अब जेलर अनूप सिन्हा ने इशिता से पूछा कि  वह इस प्रकार यहाँ कैसे पहुँची और मि. कामले और क्रू के अन्य सदस्य कहाँ पर थे ? इशिता पहुत परेशान सी तो लग ही रही थी उसने फटाफट सारी बातें बता दीं। वह होटल से पर्स तक नहीं उठाकर लाइ थी। 

‘‘ओह ! मैडम, वह जगह आपके ठहरने के लिए नहीं है।मैं इंतजाम करवाता हूँ। ‘‘ 

इशिता के कहने पर मुक्ता उसे वॉशरूम ले गई जहाँ वह चैन से फ्रेश हो सकी। 

रौनक चाय, नाश्ता लेकर हाजिर हो गया था। जेलर साहब ने उससे कहा कि वह दूसरे लोगों से मिलकर बराबर वाला बँगला ठीक कर दे, मैडम रात भर से नहीं सोई हैं,थोड़ी देर आराम कर लेंगी। 

इशिता को वहाँ बैठकर बहुत अच्छा लग रहा था,बिलकुल नहीं लग रहा था कि वह जेल के प्रांगण में बैठी है। मुक्ता का अपनत्व,जेलर साहब का उससे बड़े होते हुए भी दीदी कहना,उसे कहीं छू गया था। 

‘‘दीदी ! अब आप यहाँ से नहीं जाएँगी,रैम को ड्राइवर के साथ भेजता हूँ, आपका सामान भी आ जाएगा और सब लोगों को पता भी चल जाएगा कि आप सुरक्षित हैं।‘‘ 

मुक्ता उसे लेकर पीछे के रास्ते से बराबर वाले बँगले में ले गई जिसमें रौनक ने उसके लिए कमरा तैयार कर दिया था। कमरा साफ-सुथरा,खुला व हवादार था। पीछे से आते हुए इशिता ने अंदर जेल में काम करने वालों के घर भी देखे जहाँ बच्चे खेल रहे थे। बीच में एक बड़ा सा दरवाजा था जो जेल थी,उस दरवाजे के गेट पर दो सिपाही बंदूकें ताने खड़े थे। 

कुछ ही देर में रैम उसका सामान लेकर आ गया। 

‘‘मैम, सर बहुत परेशान  हो रहे थे, होटल वाले रामदेव बाई को बी मालूम नहीं अम लोग कहाँ गया ? मुझको सर ने गुस्सा किया...‘‘

इशिता का सामान रखकर रैम वापिस चला गया। जेलर साहब ने होटल में मि. कामले से बात कर ली थी। मुक्ता उसे आराम करने को कहकर चली गई और न जाने कब इशिता की आँख लग गईं।    

लगभग ग्यारह बजे इशिता की आँखें खुलीं, वह तैयार होकर पीछे के रास्ते से निकली तभी मि. कामले के साथ सब लोग जेल में पहुँच रहे थे। 

‘‘मैडम ! फ्रैश....‘‘ कामले मुस्कुराए। 

‘‘हम तो घबरा गए थे मैडम, आपके साहब को क्या जवाब देंगे....? ‘‘ इशिता मुस्कुराई, कुछ उत्तर नहीं दिया। 

जेल में प्रवेश करते ही पता चला कैदियों ने अंदर से जेल को खूब  सजा रखा था। जेल का भीतरी भाग बहुत बड़ा था जिसको कागज की रंग-बिरंगी झंडियों से बंदनवार बनाकर सजाया गया था। कैदी नए कपड़े पहने थे,किसी ने नए फैशन की बनियान भी पहन रखी थी जिन पर रंगीन धागों से कढ़ाई करके नाम लिखे गए थे। किसी बनियान पर फूल भी बने हुए थे। 

‘‘ये किसका नाम है ?‘‘ इशिता के आगे तीन -चार कैदी थे, वह जिनसे बात कर रही थी। 

लड़का शरमा गया, उसने अपने हाथ से नाक की नथनी का आकार बनाया और वहाँ से भाग गया। यानि वह उसकी प्रेमिका का नाम था। इशिता के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। 

कैदी अपनी नई पोशाकों में सजे आदिवासी संगीत का कार्यक्रम करने के लिए ढोल मंजीरे लेकर आ गए थे। शूटिंग वाले क्रू के सब लोग तैयार थे। कैदी समुदाय झंडियों से सजे बड़े से पेड़ के नीचे आकर पूरे उत्साह में दिखाई दे रहा था। 

मि. कामले के आदेश देते ही उन्होंने अपने साज बजाने शुरू किए,साथ ही उनका नृत्य और गायन शुरू हो गया। वो सब बिना झिझक के नाच-गाने में तन्मय हो चुके थे और सुबीर के आदेशानुसार उनको शूट किया जा रहा था। बहुत कर्णप्रिय था उनका नृत्य व संगीत ! 

अचानक इशिता की दृश्य एक सैल में गई जहाँ से कुछ लोग जंगलों में से झाँककर बड़ी उत्सुकता से बाहर के दृश्य देख रहे थे। उस बड़े से लोहे के जंगलों को भी अलग-अलग भागों में बाँटा गया था। इशिता का ध्यान गीत-संगीत की दुनिया से निकलकर उन जंगलों की ओर चला गया था। जेलर साहब पास ही कुरसी पर बैठे थे-

‘‘उन बेचारों को क्यों बंद रखा है ? उन्हें क्यों नहीं निकाला?‘‘ इशिता ने उनसे पूछा। 

‘‘दीदी ! इनको बाहर निकाला और एक-दो का मर्डर तो पक्का...‘‘ उन्होंने कहा। 

‘‘सबसे बड़ी मुसीबत ये है कि इसके लिए मेरी जिम्मेदारी हो जाती है और मुझे ऊपर जवाब देना पड़ता है....‘‘ जेलर बहुत संजीदा थे। एक तरफ जश्न चल रहा था और दूसरी ओर इशिता का मन उधेड़बुन में निर्लिप्त हो रहा था। 

‘‘दीदी! आज आपने मुझको जिस हालत में देखा,मैं बहुत शर्मिंदा हूँ पर क्या करूँ अपनी ड्यूटी से मजबूर हूँ....‘‘

‘‘ वो देख रही हैं दूसरे नं. के सींखचे में ? इसने अपने बेटे का खून किया है...पेड़ पर चढ़कर वह ताड़ी की मटकी उतार रहा था कि बिना सोचे-समझे उसने तीर चला दिया --अब छह माह से जेल में है। ताड़ी इसकी कमजोरी है और  ताड़ी पीकर यह पागल हो जाता है...‘‘ 

‘‘आप पिछले हफ्ते यहाँ होतीं तो इसी चार रास्ते  पर आपको चार मुंडियां कटी पड़ी मिलतीं।‘‘  

‘‘ये रौनक यहाँ क्यों है ? ‘‘

‘‘साल भर पहले अपने बाप का खून कर दिया था....बस इसलिए कि उस दिन खूब बढ़िया खाना बना था जो इन्हें कम ही नसीब होता है। बाप-बेटे ताड़ी के नशे में खाने बैठे थे। माँ ने पहले इसके पिता को रोटी दे दी,इसे इतना गुस्सा आया कि आव देखा न ताव...पास पड़ा गंडासा उठाया  और बाप का सिर काट डाला...‘‘ 

‘‘यह कैसे बाहर घूम रहे हैं ?‘‘ 

‘‘वैसे यह बहुत अच्छा लड़का है दीदी,इसकी ताड़ी पीने की आदत छुड़ाई, मुक्त) ने इसे सारा घर का काम सिखाया,अब हमारे घर का सारा काम यही करता है...‘‘ 

‘‘ये आदिवासी बहुत प्यारे इंसान हैं लेकिन इन्हें सही ट्रेनिंग देने की जरुरत है जिसके लिए हम कोशिश कर रहे हैं...‘‘

‘‘इन्हें यह सब करके पश्चाताप नहीं होता...?‘‘

‘‘पश्चाताप ? बिलकुल नहीं,यही तो मुश्किल है यदि इन्हें पश्चाताप होने लगे तो आधी से अधिक समस्याएँ हल हो जाएं। रौनक और उस जैसे कई लड़के अब यह महसूस करने लगे हैं कि यह नहीं होना चाहिए लेकिन पश्चाताप ये कभी नहीं समझते,बिलकुल नहीं...‘‘ जेलर कष्ट में थे।   

‘‘ये जो उधर से तीसरे नं की जाली दिखाई दे रही है न, वो... देखिए जो लड़का झाँक रहा है उसने साल भर पहले में झाबुआ तीर चलकर एक नर्स की मुंडी काट दी थी...‘‘ इशिता को अचानक फिर से कामले द्वारा सुनाई हुई कहानी याद आ गई और वह पसीने से नहा उठी। 

नाच -गाना अपनी द्रुत गति पर था और इशिता के दिल की धड़कन सप्तम स्वर में!   

Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

एक बनिया-पंजाबी लड़की की जैन स्कॉलर बनने की यात्रा

अभिनव इमरोज़ सितंबर अंक 2021