क्या यही नियति है?

. मीनाक्षी सिंह ‘परी’


किसे पता था कि मेरे आनेवाले क्षणों का लेखनहारा खुद नसीब होगा, मैं नहीं।

अरबों-खरबों की इस भीड़ में कभी आपने सोचा है कि इस भीड़ की भी कहानी होती है। भीड़ में खोए से, गुम, हर एक इन्सान की अपनी कहानी होती है। मुझे भी नहीं पता था। परंतु आज जब मैं खुद एक खास इन्सान से हटकर इस भीड़ में गुम हो गया हूँ, खो गया हूँ तब मुझे भी एहसास हो रहा है इस बात का... 

किसे पता था कि ऐसा हो जाएगा।

स्कूल में मुझे पचासों काम थे। शिक्षक दिवस पाँच दिन बाद ही था... तैयारियों का सारा बोझ मेरे ही सिर था। सबसे लंबा कद और सबसे दोस्ताना रवैये के चलते मैं ही कुछ बेताज मुखिया-सा था अपनी कक्षा का। शिक्षक दिवस में शिक्षकों के लिए तोहफे, मिठाइयाँ, फल, खाने के पैकेट से लेकर सजावट, बच्चों की परफॉर्मेंस और आनेवाले टेस्ट का हेडेक... हर चीज मेरे माथे में प्रेत की तरह चक्कर काट रही थी - फिर भी मैं हँसमुख तरीके से हर काम कर रहा था और सबसे बड़ी बात थी कि बड़ी सहजता, कुशलता एवं सरलता से मैं सारा दायित्व प्रत्येक दूसरे छात्र को सौंप रहा था... फिर भी कर्ता-धर्ता मैं ही था क्योंकि आज के ज़माने में शारीरिक श्रम करनेवालों की नहीं... दिमागी जमा पूंजी खर्च करनेवालों की कीमत ज़्यादा होती है। यह मैं अच्छी तरह समझ गया था - मैनेजमेंट... यही कहते हैं न... जो मैं कर रहा था... और मैं बखूबी अपने दायित्वों को मैनेज कर रहा था। दुनिया में हर काम का बोझ खुद अपने सिर पर लेकर ढ़ोते रहने से कहीं ज़्यादा होशियारी का काम है हर काम को, उस काम को कर सकने वाले किसी बेस्ट स्पेशलिस्ट को सौंप दिया जाए और इस प्रकार किए जाने वाले मैनेजमेंट पर दुनिया दौड़ रही है। आजकल तो मैं भी यही कर रहा था पर फिर भी सैंकड़ों झमेलों और लचर-पचर के बीच मेरे मन से उसका चित्र नहीं भूला था-- जो मेरी बेंच के ठीक बगलवाली बेंच पर सबसे पहली सीट पर बैठती थी और किसी भी शिक्षक की क्लास हो... वह बड़े मनोयोग से सुनती, बोर्ड पर देखती और न जाने किन आँखों से देखती, किन आँखों से सुनती... क्योंकि बड़े ध्यान से देखने-सुनने के बावजूद भी कई बार किसी शिक्षक के पुकारने या कुछ पूछने पर वह जवाब नहीं देती, बल्कि दो तीन बार पुकारने पर ही वह अचानक अकबका कर मानो नींद से जागती और एकदम से घबड़ाकर खड़ी हो जाती। तभी मुझे कभी-कभी भ्रम हो जाता कि वह इतने मनोयोग से शिक्षक की बात सुन रही थी या सो रही थी या किसी और दुनिया में खोई हई थी। पर उससे भी ज्यादा हैरान कर देने वाली बात यह थी कि हर दिन हर ड्रेस की मैचिंग ईयररिंग्स पहनने वाली यह गोरी और खरगोश जैसी गुदगुदी-सी महसूस होने वाली लड़की से जब भी किसी विषय पर कुछ पूछा जाता तो यद्यपि वह नींद से कई बार पुकारे जाने पर ही अपनी दुनिया से वापस निकल पाती परंतु किसी भी प्रश्न पर वह हिचकिचाती नहीं थी... बल्कि इतने स्पष्ट तरीके से और बिना किसी खिचखिच के जवाब देती मानो वह अभी-अभी इसी दुनिया में थी- यहीं थी और हमारे बीच थी... जब कि उसके बाद भी मुझे यही लगता रहता कि वह यहाँ बिल्कुल नहीं थी... वह कहीं ओर थी... और जब मैं उसे अपनी उसी दुनिया में खोया-सोया-सा देखता तो कई बार टेलीपैथी या अन्य कई मानसिक विधियों से मैंने कोशिश भी की कि काश! मैं भी उसके साथ, ठीक उसी समय पर उसकी उस दुनिया में प्रवेश कर पाता... मैं भी जान पाता कि वह क्या करती है, कहाँ जाती है? और सबकुछ... पर नेट पर शायद अधकचरी जानकारी ही उपलब्ध होती है क्योंकि उसमें दी गई इन सारी जानकारियों पर मेरा प्रयोग सदा विफल ही रहा और मैं कभी भी उसकी दुनिया में प्रवेश नहीं कर पाया। परंतु फिर भी मैंने कोशिश नहीं छोड़ी... हाँ, अब मैंने अपने अलग ही तरीकों को ईजाद किया था। मैंने अब उससे करीबी बढ़ाने की कोशिश की थी ताकि उसके चेतन-अवचेतन को पढ़कर मैं भी उसी तरह के भाव अपने चेतन-अवचेतन में फिट कर एक और कोशिश कर सकूँ... उसकी उस दुनिया में जा सकूँ...

और इसीलिए उस दिन जब उसकी बेस्ट फ्रेंड क्लास में ‘एबसेंट‘ थी तो बेंच के एक कोने पर अकेले टिफिन करती हुई उस खरगोश के सामने जाकर जान-बूझकर मैं जा बैठा था। हाँ, मन में मैंने उसका नाम खरगोश ही रखा था क्योंकि मुझे बार-बार लगता कि वह छूने में खरगोश - जैसी ही मुलायम व गुदगुदी होगी और मेरी बड़ी इच्छा होती कि एक बार मैं उसे गुदगुदा कर देखूं... उसके गुदगुदे गालों में अपनी ऊँगली 

धंसाकर देखू...

मुझे सामने बैठते देख वह एकाएक सकपका गई थी... क्योंकि पूरी कक्षा में एक वही लड़की थी जो किसी भी लड़के की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखती थी और उसकी इसी गंभीरता तथा रहन-सहन से किसी लड़के की आजतक हिम्मत नहीं हुई थी कि उससे जाकर बात करे, उसके विषय में बात करे या फिर उसके सामने जाए, उससे बातें करे। पर मैंने हिम्मत जुटाई थी... वैसे मैं बताना चाहँुगा कि भले ही कक्षा के लड़के उससे डरते होंगे... क्योंकि किसी भी वस्तु पर जब तक आवरण पड़ा हो... उसका अंजानापन हमें भयभीत ही करता है... परंतु वहीं बड़ी-से-बड़ी और दुर्लभ चीज़ भी जो जान ली गई हो... वह भयंकर नहीं लगती कम से कम... और उस लड़की पर मैंने मानसिक रूप से जितनी रिसर्च की थी... मुझे पूरा यक़ीन था कि मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ... शायद उससे भी ज़्यादा और जब जान गया तो मुझे इसका भी पक्का यक़ीन हो गया था कि मुझे उससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। भले ही वह अपने गंभीर आवरण से खुद को बचाने की कोशिश करती रही है, पर वास्तव में वह भीतर से हद से ज़्यादा तरल है। और मुझे एक बार फिर से मन किया कि मैं उसके हृदय की उस तरलता को छू लूँ। न जाने यह विश्वास क्यों था मुझे पर जो भी था - पक्का था। यह तब और भी पक्का हो गया जब सबकी आशा के विपरीत मुझे सामने बैठा देख उसने न कोई चिल्ला-चिल्ली की, न ही किसी प्रकार का शोर मचाया, बल्कि अपनी टिफिन में रखे कुछ रोटियों के टुकड़ों और आलू की चंद फाँकों को छुपाने की कोशिश करते हुए वह धीरे से मुस्करा दी और जल्दी-जल्दी से मुँह खोलकर चबाते हुए अपने मुँह के कौर को मुँह में बंद कर धीरे-धीरे मुँह चलाने लगी... मुझे देखकर बड़ी हैरानी हुई कि उसके व्यवहार में कहीं भी असहजता का आभास नहीं था बल्कि वह खुद को और भी बेहतर दिखाने की कोशिश कर रही थी। यह हैरत करने वाला था। काफी देर उसकी हर हरकत पर गौर से देखते रहने के बाद मैंने अचानक कहा... आज तुम्हारी दोस्त नहीं आई? उसने भी बड़ी सहजता से बंद मुँह में धीरे-धीरे कौर चबाते हुए सिर हिला दिया... नहीं। मुझे लगा वह अपने इस स्थिर एकटक चेहरे के भीतर कहीं किसी गुफा में कैद थी और वहाँ वह ज्यादा सहज थी... अकेली थी और खड़ी होकर लगातार हँस रही थी। हँसना चाहती थी। मैंने भी उसके साथ मुस्कुराना शुरू कर दिया और मैंने देखा कि उसे कोई एतराज नहीं था।

उस पर रिसर्च की धुन इतनी पक्की थी कि मेरे रिसर्च के कार्यक्रम में अब तक उसकी हरकतों पर गौर करने की ही प्रोग्रामिंग फीड थी और इसलिए मैं उसके एक-एक व्यवहार को निहारता रह गया और वह अपनी गुफा के बीच में खड़ी अकेली मुस्कराती रह गई थी कि अचानक घंटी बज गई। मैं अपनी सीट पर आ गया।

आज सुबह-सुबह माँ ने फिर पूछा था कि तू पूरी चलेगा कि नहीं? तीन-तीन भाईयों के होने के बाद भी न जाने क्यों माँ मुझे ही अपने साथ पूरी ले जाना चाहती है... जब कि मेरा बिल्कुल भी मन नहीं था। अभी जिस रस में डूबकर मैं ऊब-चूब हो रहा था... क्या इससे भी ज्यादा रसपूर्ण हो सकता है पूरी के समुद्र में नहाना? मैंने बस अपने मन से पूछा था ये प्रश्न... पर फिर भी माँ को ‘ना‘ नहीं कर पा रहा था? मेरे जवाब न देने को माँ ‘ना‘ ही समझ रही थी पर फिर भी बार-बार पूछती थी मानो मेरे बिना उन्हें पूरी में भी चैन नहीं आएगा। बड़े दोनों भईया की शादी हो चुकी थी। दोनों का अपना-अपना परिवार था। एक मैं ही छोटा सा बच्चा बचा था, जिसे अब भी माँ की गोद, माँ की चिंता और माँ के ख़्याल की जरूरत थी और माँ अपने इस अधिकार गर्व से कदाचित वंचित नहीं होना चाहती थीं... कहीं इन चार दिनों में मैं उनके बिना रहना-जीना सीख गया तो ...? फिर उनका क्या काम बच जाएगा जीवन में? उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अब मैं ही तो था, जिस पर उनकी सारी चेष्टाएँ अटकी हई थीं। बड़े भाईयों के भी बच्चे थे पर नए ज़माने की भाभियां पुराने जमाने की दादी का हद से ज्यादा प्रभाव बच्चों पर नहीं पड़ने देना चाहती थीं इसलिए वे बच्चों पर माँ का उतना ही अधिकार या हस्तक्षेप होने देतीं जब तक कि खुद उनके स्वार्थ में लाभ पहुँचता था - मसलन, कभी भाईयों के साथ उन्हें शॉपिंग या मॉल या मूवी जाना होता तो वे बच्चों को दादा-दादी के भरोसे छोड़कर चली जातीं... उन खास पलों में माँ को आजादी मिल जाती थी अपने पोते-पोतियों पर जी भरकर प्यार लुटाने की, फिर भी अपना शत-प्रतिशत अधिकार वे अपने सबसे छोटे बेटे... यानी कि मुझपर ही समझती थीं... और कहीं न कहीं मैं उनके मर्म को समझता था। इसलिए पाँच दिन से लगातार पूछे जाने पर भी न मैं ‘हाँ‘ कर पा रहा था और न ‘ना‘... पर मैं भी जानता था... अंत में मैं माँ के साथ खिंचा चला ही जाऊँगा या शायद माँ मुझे खींचकर ले ही जाएंगी। आखिर मैं छोड़ भी कैसे सकता हूँ माँ को, क्या मैं उनके अपने ऊपर अधिकार भाव को नहीं समझता? क्या भाई और भाभियों के समस्त व्यवहार को समझते हुए भी मैं उनके अधिकार गर्व का हनन कर सकता हूँ? भला क्या मैं उनका दिल तोड़ सकता हूँ?

तो फलतः मैंने अंत तक हामी तो नहीं की पर हाँ, स्कूल जाने के पहले मैंने अपना यात्रा वाला छोटा बैग निकालकर झोल-झाल साफ कर देने को जरूर कह दिया था... साथ ही सुबह ब्रश करने के बाद मैंने ब्रश व जीभि तथा अपने गंजी, जाँघिया, तौलिया आदि को अपने बिस्तर पर तहाकर रख दिया था... कहीं आओ-जाओ तो ये छोटी-चीजें ही सबसे आसानी से भुला दी जाती हैं और इन छोटी चीजों को ही भुलाने का बड़ा-बड़ा बदला चुकाना पड़ता है ...मैंने इसे कई बार भोगा था और इसलिए कहीं भी जाने के पहले अब मेरा सबसे बड़ा काम अपनी सबसे छोटी-छोटी चीजों को तहाना होता था। माँ यह अच्छे से जानती थीं और इसलिए वह भी अब बड़ी खुशी से तैयार हो रही थीं... साड़ियाँ तहा रही थीं... मैंने जहाँ चैकी पर सिरहाने अपने ब्रश और गंजी वगैरह रखे थे... देखा हर दस या पंद्रह मिनट पर वहाँ छोटी-छोटी कुछ एकाध चीजें जुड़ती जाती थीं मसलन मेरा मोबाइल का चार्जर, बेल्ट, मेरा धूप का काला चश्मा, कैमरा, और देखकर भी न टोकने से माँ का उत्साह और बढ़ता जाता था। मैंने भी हमककर दिल ही दिल में ‘हाँ‘ की और स्कूल चल दिया। आज शाम को ही निकलना था और फिर सीधे चार तारीख की रात को वापसी थी... मतलब सीधे शिक्षक दिवस के दिन ही स्कूल आना था अब... तो तब तक की सारी जिम्मेदारियों का हिसाब-किताब बराबर करके जाना था। वैसे तो मैंने सबकुछ कर ही दिया था... जिसे जो काम सौंपना था...

सौंपा जा चुका था... पर मैंनेजमेंट का जो सबसे बड़ा रूल था... हिदायत देकर सामने वालों को सदैव सजग रखना... 

सावधान करते रहना कि कहीं भूल-चूक न होने पाए... मैंने देना आज के लिए जरूरी समझा... वर्ना अगले चार दिन मेरे न रहने से गुड़ का गोबर भी हो सकता था। फिर अपनी खरगोश को भी इसी बहाने से थोड़े और करीब से देखना था... दिमाग में इतनी सारी बातें चक्कर काट रही थीं कि विचारों की तेजी ने मेरे कदमों में मानो चक्के लगा दिए हों और मैं चलते हुए भी लग रहा था... दौड़ रहा हूँ। हालांकि शायद मेरा दिल मेरी, धड़कन और मेरा दिमाग ही तेजी से भागा जा रहा था... शरीर अपने औसत वेग में ही था क्योंकि कुछ देर के लिए बीच में जब एकाएक दस-बीस भैंसों का झुंड रास्ते पर गोबर करता हुआ सामने से गुज़रा तो मैंने रुक कर देखा, मेरी आँखें भीतरी प्रदेश से निकल कर बाहर देखने लगी कि मैं दौड़ नहीं रहा था... अपने स्कूल के बाकी छात्रों की ही भांति मैं भी चल रहा था... सामान्य वेग से और भैंसों के झुंड के आगे बढ़ते वक्त मैं थोड़ी देर के लिए रुक भी गया था। जब देर-सी लगने लगी तो मैंने अपनी आँखों को फिर से भीतर के प्रदेश में छुपा दिया... वह भीतर सँभालने लगा... कार्य सूची पर ध्यान देने लगा और मैं चुपचाप सामान्य रीति से रास्ते के किनारे-किनारे होकर वेग से निकल गया।

कक्षा में घुसा तो देखा सर आ गए थे और हाजिरी हो रही थी। मेरा कलेजा धक्-सा हो गया... लगा कितनी देर बाद प्रकाश में आँखें निकली हों... वह उस बेंच पर नहीं थी। आज उसकी मित्र उसकी सीट पर थी पर वह नहीं थी। मैंने पीछे-आगे के एक दो बेंच पर भी नजर को दौड़ा दिया पर नहीं थी वह... वैसे उसे देखने के लिए मुझे इतनी मेहनत करने की जरूरत नहीं थी यह मैं अच्छी तरह समझता था... क्योंकि नजरों को कभी उसे पहचानने के लिए घूमना नहीं पड़ता था... बल्कि वह ही मेरी नजरों की पहचान में थी। भीड़ में भी मेरी नजरें न जाने कैसे उस पर ही टिकती थीं... और इसलिए मैं क्लास में घुसते-घुसते ही जान गया था कि वह आज नहीं आई थी। खैर, मैंने सोचा कोई बात होगी - आज वैसे भी काम बहुत है। फुर्सत नहीं थी। पूरा दिन क्लास लेते-लेते और खाली समय मीटिंगों में ही बीत गया। छुट्टी के बाद मैं लगभग दौड़ता हुआ-सा घर पहुँचा। माँ-पापा तैयार थे - बस, मेरा ही इंतजार हो रहा था... मैंने घर में घुसकर अपना बैग ठीक किया... वास्तव में मैंने बस उसे नजर भर देख लिया... ठीक तो माँ ने कर ही दिया था फिर जल्दी से शर्ट-पैंट उतार फेंकी और एक हल्का-सा टीशर्ट और बरमूड़ा पहनकर बैग लेकर निकल गया।

बस से जाना था, बुकिंग थी। माँ और पापा एक सीट पर थे... मैं दूसरी सीट पर। बगल की खिड़की से आती ठंडी हवा, साफ आसमान, सफेद चाँद, रंग-बिरंगे तारे, खुला आसमान और चाँदनी रात... मैं पूरी रात मानो इन ठंडी हवाओं में, तारों में और चाँद में उसे ढूँढ़ता रहा... बार-बार रहकर मन में कौंध जाता कि काश! बगल की सीट पर वह होती... वह कोमल एहसास। प्यार एक कोमल एहसास ही तो है... इन चाँद-सितारों से भी कोमल, इन बरसते बादलों से भी कोमल, इन आसमानी टुकड़ों से भी कोमल, इन हवाओं की सरसराहट से भी गुदगुदी और चाँदनी रात की शीतलता से भी ज्यादा सुखद। सब चीज तो था-- पर फिर भी उसकी कमी महसूस हो रही थी मुझे और तभी मुझे लगा कि इस एहसास में कितनी शक्ति है, जिसका झोंका रह-रहकर मुझे लगता मानो मेरे सीने से मेरा दिल खींचकर निकाल ले जाएगा-- रह-रहकर दिल कौंध जाता और इच्छा होती कि मैं उड़कर उसके पास पहुँच जाऊँ... न जाने क्यों उन क्षणों में मैं भूल गया था कि दुनिया, यह कल्पना या इस रात की सुखद यात्रा नहीं है... यह दिन का तपता हुआ धूप है - यथार्थ। यह चाँद-सितारों की खुशनसीब मेहफिल नहीं है बल्कि यह हजारों लाखों करोड़ों यथार्थ की कठोरताओं का साम्राज्य है - रह-रहकर मुझे बस यही लगता कि वह इस दुनिया में कहीं है... और आज अचानक मैं उसकी दुनिया में प्रवेश कर चुका था। मुझे विश्वास था कि यही वह उसकी दुनिया है जिसमें वह बार-बार खो जाती है, पर इसमें वह कहाँ है? उसे न पाकर मन व्याकुल हो जा रहा था... बार-बार उमगता हुआ हृदय मुँह तक उछल आता और आवेग यूँ उबलने लगते मानो छलांग लगाकर हवाओं में उड़ने लगा.. चाँद में से उसे तोड़ लाऊँ... सितारों में से उसे ढूँढ़ लाऊँ - इस यात्रा को अनवरत बना लूँ... अनंत बना लूँ... उसी में चलता रहूँ... पर तब जब वह भी सामने हो... इसी में हो... वर्ना हर रात में घुल-मिलकर खोकर उसके मन में समा जाऊँ... उसकी उस दुनिया का हिस्सा बन जाऊँ-- उसकी उन खोई हुई आँखों में चुरा लिया जाऊँ... छुप जाऊँ उसी रात में... कहीं गुम हो जाऊँ उसके पास... उसी के साथ।

और न जाने कब गुम हो गया था मैं उसके साथ इन टुकड़ों में... कि अचानक धूप आँखों पर पड़ी... माँ की आवाज कानों में... और मेरी नींद टूटी...

रात कितनी कोमल होती है, दिन कितना कठोर, रात कितनी सुखद होती है... कितना यथार्थ। मानो दिन तपती हुई 

धूप और रात ठंडी सुहानी चाँदनी। कुछ अच्छा नहीं लगा। दिल किया रजाई में मुंह छुपाकर वापस उस रात में समा जाऊँ... इस दिन के उजाले से आँखें चुराकर फिर से अपनी सीपी में जाकर छुप जाने की इच्छा हुई। तीर्थों पर का कोलाहल, पंडों का 

धार्मिक व्यापार और नोचा-चोथी मुझे शुरू से ही परेशान करते हैं... फिर हृदय की इस अवस्था में जब मन एक खूबसूरत सुहानी रात में जीकर आया है, हृदय चाँद की चाँदनी से नहाकर निकला है और आंखें चांद की चांदनी में डूबकर सिक्त होकर खुली हों। कितना मन किया था कि काश! वह अद्भुत एहसास उन सबको शब्दों में किसी तरह बींध पाता... पर ये विचार भी अजीब हैं... ये एहसास भी बड़े घोंघा किस्म के होते हैं। यूँ मन में अरबों-खरबों चक्कर काटते रहेंगे पर ज्यों ही सोचो कि इन्हें शब्दों में बांध लें... न जाने क्यों ऐसे सजग हो जाएंगे मानो उन्हें मारने की योजना बनाई जा रही है। अरबों-खरबों मिनटों में चक्कर काटने वाले विचार एकाएक गायब-विलुप्त... मानो कभी थे ही नहीं... फिर जबरदस्ती सोचो और दिमाग पर जोर भी डालो तो छन-छनकर इतने कम निकलेंगे कि लिखना भी व्यर्थ लगने लगता है। क्या व्यर्थ नहीं है कि जिस असीम एहसास को हम महसूस करें उसे चंद अक्षम-निरर्थक शब्दों में बींध दें... हत्या कर दें उसकी... क्या एहसास को शब्दों में पिरोया जा सकता है... क्या दर्द एवं पीड़ा को किसी को दिया जा सकता है? क्या वह प्रेम का एहसास... वह दर्द वह बेचैनी... वह छटपटाहट को बयान किया जा सकता है? मैं बार-बार चाहकर महसूस भी नहीं कर सकता... दुबारा शायद स्वयं देख या छू भी नहीं सकता फिर लिखकर ही क्या हासिल कर लूँगा... ऊँहूँ हूँ... असंभव।

पापा ने जो होटल बुक किया उसमें सीढियों के अगल-बगल दो कमरे हमारे थे। एक में मम्मी-पापा और दूसरा मेरे लिए था। मम्मी-पापा आते-आते ही समुद्र में नहाने चले गए। जाने क्यों माँ के बहुत जिद करने पर भी मेरा मन नहीं किया जाने का। दो दिनों तक, मैं बस थोड़ी देर के लिए बाहर निकलता और 

अधिकतर समय कमरे में ही रहता। दोस्तों के बिना, ‘उसके बिना यहाँ क्या मजा आता? मेरा मन तो अटका था क्लास में उस बेंच की पहली सीट पर... और शिक्षक दिवस के सारे इंतज़ाम पर... और सच पूछो तो उस रात बस में मैंने जो महसूस किया था पूरी रातदिन- में चाहे बेचैनी कुलहट के भी जो एक शांति और नीरवता का एहसास हुआ था... मैं उसी में समाए रखना चाहता था... बाहर के शोर में मैं उस शांति को, उस को गुम नहीं कर देना चाहता था... क्या मेरा एहसास मेरे लिए सबसे कीमती चीज नहीं थी जो उस कोलाहल में घुला-मिलाकर बर्बाद कर देता... नहीं... मैं पूरे-पूरे दिन होटल के कमरे में बंद मोबाइल पर फिल्में देखता, ‘उसे‘ याद करता और व्हाट्सएप के माध्यम से दास्तों से लगातार कांटैक्ट में रहता... मैं पल-पल की खबर लेता कि इंतज़ामात कहाँ तक हुए ठीक हुए या नहीं... न जाने क्यों वहाँ रहकर जो काम और जो ज़िम्मेदारी बड़ी हल्की-सी लगती... यहाँ आकर लगता मानो वे ज़िम्मेदारियाँ बड़ी हो गई हैं... वहाँ रहकर उनकी गंभीरता का एहसास ना के बराबर था परंतु यहाँ आकर वही ‘‘ना‘ बड़ी ‘‘नाना” में बदल गया था... हर तरह के काम बड़े-बड़े आकार में आँखों के सामने आकर नाचते से लगते... लगता... मेरे बिना वहाँ कोई काम हो ही नहीं पाएगा... सब गड्ड-मड्ड हो जाएगा। मैं देखता - सब हो रहा है... फूलों का, मिठाईयों का आर्डर दिया जा चुका था... डांस परफॉरमेंस की रिहर्सल भी देखी मैंने वीडियो पर फिर भी दिल धक-धक सा करता रहता। माँ के साथ मैं यहाँ तक आ गया था इसलिए अब माँ निश्चिंत थी। अब यहाँ से मैं उनके साथ हूँ या नहीं... इससे उन्हें कोई ज्यादा अंतर नहीं पड़ता था... एक शहर में एक जगह उनका मेरे साथ होना ही उनकी संतुष्टि के लिए काफी था। अब वे आराम से बाहर पापा के साथ जाती, घूमने जाते दोनों... समुद्र स्नान करती... पूजा करतीं... वहाँ उनके कुछ रिश्तेदारों को भी आना था - वे सब दिन भर घूमते। मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की कि दो दिन तक वे कहाँ-कहाँ घूमे... कहाँ गए - क्या किया? बल्कि अब मैं बोर हो चुका था और रह-रहकर खुद पर गुस्सा भी आता... माँ पर खीझ भी आती... -झलाहट भी आती कि बेकार यहाँ क्यों चला आया? इतना सारा काम, इतनी कुछ तैयारियाँ थी वहाँ और मैं यहाँ सब छोड़-छाड़कर बिस्तर तोड़ रहा हूँ। इतने दिनों से उसका चेहरा तक नहीं देखा... और न जाने क्यों उस रात के बाद से आंखों में एक छटपटाहट-सी तैर रही थी कि कब स्कूल जाऊँ, उससे मिलूँ... उससे बातें करूँ... मानो दो ही दिन में मैंने वर्षों जी लिया था... और उन वर्षों की दूरी ने हमारे बीच की दूरियों को पूरी तरह से मिटा दिया हो। पता नहीं क्यों मुझे महसूस हो रहा था कि मैंने उसके समस्त रहस्यों का पता लगा लिया है... और अब जाकर मैं उससे सब कुछ बताऊँगा... उससे कहूँगा कि मैं सब कुछ जानता हूँ... अब हम अलग नहीं हैं... एक ही दुनिया के खोजी हैं... एक ही एहसास के वासी हैं और सबसे हैरत अंगेज बात यह थी कि यथार्थ में जो दूरी और जो अजनबियत हमारे बीच में थी और जो वास्तविकता में भी यथार्थ थी... इन दो दिनों में मुझे वह बिल्कुल गायब होती-सी नज़र आती थी। न जाने क्यों मुझे महसूस हो रहा था कि अब मैं क्लास जाऊँगा तो हम दोनो टूटकर एक दूसरे से मिलेंगे... वह दौड़कर मेरे पास आ जाएगी... हमलोग एक दूसरे का हाथ पकड़कर एक दूसरे से खूब बातें करेंगे... खूब हँसेंगे... एक दूसरे को खूब देखेंगे। जिसे मन ने सिर्फ नज़रों के दायरे में ही देखा था उसे हर दायरों से बाहर महसूस कर मन और भी छटपटा उठता था। इन दूरियों को मिटा देने के लिए। दिल करता अभी इसी वक्त उड़कर वापस चला जाऊँ। बड़ा क्रोध आता कि माँ को साफ मना क्यों न कर दिया? इतने लोग तो थे ही... माँ तो मेरे बिना भी आराम से घूम ही लेती... झूठ-मूठ में आकर फँस गया... अब क्या करूँ ? बीच में जाने के लिए कर नहीं पा रहा था। कहने का मन करते ही हलक सूखने लगता। साथ आए थे... अकेले जाने की बात कैसे कह सकता था भला? अकेला पड़ा रहने की छूट है... यही क्या कम है... कि तभी तीसरे दिन पिता क्रोध में आगबबूला हो गए... ये लड़का दिनभर कमरे में बैठा-बैठा क्या करता रहता है, मोबाइल लेकर अजब रोग पाल लिया है इन लड़कों ने... दिन-रात न जाने क्या पेरते रहते हैं... पिता जब भी मोबाइल को लेकर क्रोध करते तो मेरी समझ में अच्छे से आता कि पिता क्यों गुस्सा होते हैं... आखिर वे भी एक लड़के रह चुके हैं और अब मेरे पास मोबाइल है... इंटरनेट है... पूरा दिन का खाली समय... खाली दिन खाली रात... मैं बहुत कुछ करता रहा होऊँगा पर चूंकि मैं ऐसा कुछ भी दुरुपयोग नहीं कर रहा होता फिर भी न जाने क्यों सफाई नहीं दे पाता... न ही अपनी सफाई में कुछ कह पाता... बस वाच्यार्थ के व्यंग्य की 

ध्वन्यात्मकता की कसक को अपने हृदय में महसूस करता... उससे टकराता- उससे लड़ता, मन ही मन उसके हजार जवाब देता पर सूखे कंठ से उस प्रतिरोध का एक बूंद भी बाहर नहीं निकाल पाता। उस दिन मां भी नहीं मानी और कमरे में घुसकर जबर्दस्ती मझे अपने साथ घसीटकर ले जाने लगीं। आज इन लोगों की ज़िद देखकर मुझे भी अपनी तपस्या भंग करनी पड़ी... दो दिन से वैसे मैं इसी इंतज़ार में था और ज्वालामुखी के फट पड़ने का इंतज़ार ही कर रहा था और हैरत में भी था कि आखिर अभी तक ज्वार उठा क्यों नहीं... ज्वाला फूटी क्यों नहीं। और अब जब फूट ही गया था तो मेरा तो हिलना निश्चित था। मैंने माँ को दो मिनट बाद आने को कहा और बाथरूम में जाकर नहाने के लिए गंजी और एक बरमूडा पहन लिया। फिर बाहर निकलकर उनके साथ हो लिया। सुबह का समय था। दो दिन बाद जब कमरे से बाहर निकलकर समुद्र के किनारे पर आया तो महसूस हआ कि मैं दो दिनों से बड़े धोखे में था। यह मेरी गलतफहमी थी कि यहाँ का कोलाहल मेरी उस कोमल अनुभूतियों को कुचल कर रख देगा... बल्कि समुद्र का असीमित विस्तार...आसमान से बातें करती और बादलों को चूमती लहरें मेरी उन कोमल और एक रात में सिमटी सहमी अनुभूतियों को एक नया अर्थ विस्तार दे रही थीं। लहरों में लिपटी ठंडी हवा का झोंका उस एहसास को एक नई अर्थवत्ता प्रदान कर रहा था। मेरा मन आनंद से झूम उठा। मुझे लगा मैं व्यर्थ ही इतना भयभीत हो रहा था कि यहाँ आकर मैं भीड़ में गुम हो जाऊँगा... बल्कि मैंने खुद को अपनी अनुभूतियों में ही इतना पूर्ण और इतना भरा हुआ पाया कि भीड़ में भी मैं खुद को गुम-सा महसूस नहीं कर रहा था बल्कि मुझे पता चल गया कि भीड़ में गुम हो जाना या ऐसा ही कुछ महसूस करना खुद में खाली होने जैसा है। यदि मन खुद भरा रहे तो वह कभी खुद को गुम होने नहीं दे सकता... और मैं उस भीड़ में भी खुद को निहायत अकेला, एकदम विशिष्ट महसूस कर रहा था... अपने एहसासों से तर, अपनी अनुभूतियों में मस्त... अपने सपनों में बुत... अपने ही ख्यालों से पस्त। 

माँ-पापा और मैं समुद्र से नहाकर बाहर किनारे पर आ चुके थे। न जाने कहाँ से पापा के कई मित्र और उनकी पत्नियाँ आ गई... पापा उनके साथ बातें करने लगे... माँ मेरी गीली गंजी को एक प्लास्टिक बैग में रख रही थी... पापा के गीले कपड़े भी वे उसी में रख रही थीं... मैंने कहा... माँ मैं एक बार और नहा लूँ... मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था... मन बड़ा खुला-खुला सा लग रहा था मानो बरसों से बंद सीलन और बदबू यहाँ खुली बयार में आकर बह गई हो। मन बार-बार लहरों में झूमने और नाचने का हो रहा था। आती हुई पछाड़ों से पछाड़ खाकर बार-बार गिर जाने का अपना ही मजा था... मन ही नहीं भर रहा था... माँ ने देखा... बच्चा दो दिन से जाने किस घुटन में कैद था... आज निकला है उस बंद गृह से... उसे जबरदस्ती बाहर निकाल लाने और उस जबरदस्ती में भी उस बच्चे को खुश देख उसके भी गर्व का ठिकाना न था... कहीं नकचढ़ा बच्चा फिर से न चिढ़ जाए... वे बोलीं... जा नहा ले... और अपना बैग लेकर वे पापा के पास जाने लगीं।

मैं दौड़कर पीछे लहरों की तरफ आया मानो वह मेरा प्यारा घोड़ा हो और मैं उसे थपथपाने दौड़ा हूँ... मैंने एक टायर ले लिया। लहर जा चुकी थी... रेत पर दौड़ता हुआ मैं दूर तक चलता गया कि लहर आती दिखी... मैं वहीं रेत पर बैठ गया... रेत आई और मुझे भी अपने वेग के साथ किनारे पर ले आई... मुझे बड़ा आनंद आया मैं बार-बार दौड़कर खाली रेत पर जाकर बैठ जाता... लहर आती और मुझे किनारे पर छोड़कर चली जाती... मैंने देखा कि कुछ लड़के खड़े-खड़े लहर की मार सीने पर ले रहे हैं... मैं शरीर से उतना ताकतवर नहीं था... डील-डौल भी काफी मजबूत न था... पर फिर भी भीतर से तो भरा हुआ था ही और इस वक्त खुद को किसी से भी कम शक्तिशाली नहीं समझ रहा था। मैंने भी खड़े होकर लहर को सीना दिखाने की सोची और इस बार टायर फेंककर सीधा दौड़ गया लहरों का सामना करने। मन इतना उच्छसित था कि दौडता-दौडता कितनी दूर गया पता ही नहीं चला... कि तभी लहर आती दिखी... मैंने एक बार विछोह से उमगते हृदय से पीछे मुड़कर देखा... मन सहम गया... मैं बहुत दूर आ गया था... पर फिर भी हिम्मत थी... डरा नहीं, खड़ा हो गया। आँखें बंद करके... कुछ सेकेंड बाद पांवों पर पानी के स्पर्श से आँखें खोली तो दहशत से भर गया, मुझे महसूस हुआ मानो लहरों में मिला-जुला कोई विशाल दैत्य अपने हजारों हाथों से मुझे लीलने आ रहा है-- मैं एक क्षण को भयभीत हुआ... मैंने पांव पीछे किए... बदन को सिकोड़ा और ज्यों ही दो-चार कदम पीछे की तरफ भागा कि लहरों के वृत्त ने मुझे अपनी विशाल गोद में भर लिया - ये विशाल लहरें ज्वार के चरम पर थीं... जिसकी ऊँचाई ने मेरे कद को भी अपने भीतर ढाँप दिया, उसने मुझे लील लिया... एक ऐसा तूफानी भँवर था... जिसमें मेरे पांव पड़ चुके थे... मैं फँसता ही गया... घुलता ही गया... वह क्षण ऐसा था जब कि ऊब चूब होती मेरी सांसों में, नसों में, फेफड़ों में, आँख... नाक -कान-मेरे पूरे बदन में बस खारा पानी ही पानी था... मेरे दिमाग में एक क्षण के लिए बस यही कौंध पाया कि हे देव... यह क्षण लौटा दे...वापस ले ले यह क्षण... मैं रो पड़ा - ‘बचाओ‘ तक न चिल्ला पाया... बस हिलोरों के साथ एक अदृश्य इच्छा-सी उभरी कि काश! इस क्षण मैं अपनी माँ की गोद में होता... काश! इस क्षण मैं अपनी मां के आँचल से बँधा होता... यह क्षण मुझसे ले ले... वापस ले ले प्रभू... वापस लौटा दे मेरा यह क्षण - एक पल और दे दे मुझे कि मैं दौड़कर अपनी माँ की गोद में छुप जाऊँ। मेरे शरीर ने बहुत समझाने की कोशिश की होगी लहरों को कि वह देख... किनारे पर मेरी माँ हैं... मेरे पिता हैं... वे मेरी राह देख रहे हैं... मेरी माँ, मुझे मेरी माँ के पास जाने दे... पर उन विशाल, कोलाहली, चीखती, चिल्लाती भँवरों ने न सुना... उन दैत्य लहरों ने मुझे लील लिया... मैं बहता गया... बहता गया यहाँ तक कि मेरी सोंसें उखड़ गई... शरीर में इतना पानी भर गया कि मेरी नसें तक फट गई... वह शरीर जिसे कभी मैंने बड़े कायदे से गढ़ा था, जिसे सुंदर दिखाने के लिए मैं नए-नए तरीकों से बाल काढ़ा करता था... जिस चमड़े को चिकना दिखाने के लिए मैं तरह-तरह की क्रीम, पाउडर मला करता था... वह चमड़ा किनारे से बीस किलोमीटर दूर पानी में हिलोरें ले रहा है... मेरे शरीर पर कई निशान पड़ गए हैं... चोटों के, खरोचों के।

एक बार मेरे पाँवों में मोच आ गई थी खेलते वक्त तब मैं चार दिन तक घर से बाहर नहीं निकला था... रात-दिन माँ से हल्दी-चूना पीस-पीसकर लगवाता, तेल की मालिश करवाता, चलने-फिरने से इतना डरता था, यह सोचकर कि मैं लंगड़ा हो जाऊँगा... पांव टूट जाएगा तो मैं जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो जाऊँगा और आज मेरे उसी कीमती शरीर को सैंकड़ों मछलियाँ कुतर रही थीं... समुद्री कीड़े-मकोड़े उस पर चिमटे पड़े हुए थे और मैं कुछ भी नहीं कर सकता था। मेरा शरीर उस भँवर में नाच रहा था... अभी भी नाच रहा था मैं... क्या मैं अब कभी भी स्कूल नहीं जा सकता... क्या मैं अब कभी भी ‘उससे‘ नहीं मिल सकता - क्या यही सच्चाई है जिसे हम जीवन भर अपने आपसे लपेटे खड़े रहते हैं संसार-समर में... क्या यह सब कुछ अचानक एक झटके में यूँ ही छूट जाता है। फिर क्यों किया मैंने इतना जतन-किस लिए की इतनी मेहनत? क्यों करता था अपनी चिंता-- क्यों सजाता-सँवारता था अपने शरीर को यूँ सड़ने देने के लिए... यूँ जीवों से कतराते देने के लिए क्या इस शरीर की यही सच्चाई है... पर उस एहसास का क्या होगा? मैंने जो जाना था... उस रहस्य का क्या होगा ? मेरा शरीर मर गया... पर मैंने सुना है विचार, अनुभूति, एहसास कभी नहीं मरते-- पर मेरे साथ मेरे सीने में दफन मेरे ये एहसास भी तो दफन हो रहे हैं... इन्हें अब ‘उस‘ तक पहुँचाने का क्या कोई रास्ता है? नहीं ...मैं ऐसे नहीं मर सकता... मैं इतनी जल्दी नहीं मर सकता...? नहीं मरना मुझे...।

पापा के पास मेरे एक दोस्त का फोन आया... अंकल, अमन का फोन नहीं लग रहा है... आज आपलोग आ रहे हैं न? कहाँ हैं वह दो दिन से? घूमने में इतना बिजी है कि हमसे बात भी नहीं करता?

वह स्तब्ध रह गया सुनकर... पिता बोले... अब अमन तुमलोगों को कभी नहीं मिलेगा। वह हमेशा के लिए गुम हो गया है और फूट-फूट कर रोने लगे। 

दो दिन से लगातार अमन के शरीर को खोजने का प्रयास जारी था... गोताखोर और मछुआरों पर लाखों रुपये खरचे जा चुके थे पर अमन था कि मिलता ही नहीं। माँ को उम्मीद थी कि मैं डूबा नहीं हूँ... कहीं गुम हो गया हूँ... रास्ता भटक गया हूँ... और अभी एक क्षण में आकर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा... क्या अभी भी मैं उनके पास वापस लौट सकता हूँ... न जाने क्यों मन में एक हिलोर-सी उठ रही है कि उनकी गोद में जाने का, उनके गले लगने का एक मौका मिल जाता... दुनियावी मोह बहुत तगड़ा होता है... सब कुछ छूटने लगता है फिर भी एक आस बंधी रहती है। पहले माता-पिता-दोस्तों-मित्रों से मोह, फिर पत्नी से मोह... फिर अपने खून और मांस से पैदा हुए बच्चे से मोह... क्या जीवन का एक-एक कदम, एक-एक आयु हमारे इस मोह के 

बंधन को और मज़बूत नहीं करता? जो काम बचपने में, युवावस्था में हमारे लिए फूल तोड़ने जैसा आसान होता है... वही वयस्क होने पर, बच्चों और परिवार में बंध जाने पर लोहे के जहाज-सा भारी क्यों लगने लगता है?

शायद इसीलिए तो साधक-तपस्वी पहले ही सांसारिक जाल तोड़कर उस मोह-माया के फंदे से दूर चले जाते थे और शायद उसी से वे मोक्ष पाते थे... पर मेरे दिल में यही जंजीर बंधी हुई है... बार-बार हृदय उमगता-सा है कि यह मात्र एक सपना ही हो... यह सब पीछे चला जाए और मैं वापस अपने उसी जीवन चक्र में... जीवन के पार का यह चक्र बड़ा ही सुनसान, वीराना, तन्हा है... बहुत डर लग रहा है मुझे यहाँ-यहाँ माँ नहीं है, जो मुझे जरा-सी चिंता में देख अपने सीने से लगा लेती हैं... जो मुझे सोता देखकर नींद में ही मेरे पूरे शरीर पर हाथों में पांवों में गरम तेल की मालिश करती हैं... जो मेरे लिए सुबह शाम, दिन-रात मेरे मन का खाना बनाती है जो मेरा मुँह जोहती रहती हैं कि मैं कुछ कहूँ और वे मेरा काम करके मुझे खुश कर दें। आज लग रहा है... बड़ी तकलीफ हो रही है कि क्यों एक बार भी दिन-रात माँ के इतना कुछ करने के बाद भी मैंने माँ को अपने गले से क्यों नहीं लगा लिया? क्यों मैं माँ से दूर भागता रहा? माँ मेरे पैर दबाती, मेरी नींद टूट जाती और मैं उन पर चिल्लाने लगता... माँ मुझे भूखा जानकर मुझे ठीक समय पर खिलाने के लिए बार-बार चिल्लाती और मैं उन्हें उनकी जल्दबाजी पर चिल्लाकर डाँट देता... पर आज वह माँ नहीं हैं यहाँ। इस दुनिया में मैं बिल्कुल अकेला हूँ... मुझे बहुत बुरा लग रहा है कि मेरी माँ फिर भी अपने उसी बुरे बेटे के लिए चीख-चीखकर रो रही हैं... मुझे बार-बार बुला रही हैं और देखो यह निष्ठुर बेटा... पहले भी इसने इस माँ की गोद का, उनके लाड़ का तिरस्कार किया था - आज भी यह उनकी आँखों में आँसू ही दे रहा है... मेरी माँ की सूखी आँखें उस निर्जन समुद्र तट पर सूने तट पर न जाने कहाँ टिकी हुई हैं... कहाँ खो गया मेरा बेटा ? समुद्र निगल गया या जमीन लील गई कि अचानक गोताखोरों का सिर दिखाई देता है। उनकी गोद में उनके बेटे का नोचा-चोथा, छीला-छाला शव पड़ा हुआ है... जो जगह-जगह से फट गया है... माँ पछाड़ खाकर गिर पड़ी... उन्होंने यह कल्पना नहीं की थी। उन्होंने लाखों रुपए खर्च करवाए थे इस उम्मीद में नहीं कि ये निर्दयी उसके बेटे का शव लाकर उसके सामने पटक देंगे... बल्कि इसलिए कि ये सब एक एक ही बात कहेंगे कि माँ तेरा बेटा जिंदा है... वह कहीं गुम गया है... वह मरा नहीं है... वह इस समुद्र में नहीं डूबा है... सब्र कर आ जाएगा तेरा लाल - मुए यही खबर देने के लिए आए थे ...।

मैंने देखा... रेत पर मेरा शरीर... पीठ के बल फैला हुआ... बदन पर सिर्फ एक बरमूडा... मुझे याद आया... बड़ी जिद करके पिता से मैंने ग्यारह सौ रुपए लिए थे यह ब्रांडेड पैंट खरीदने के लिए... आज यह मेरे शरीर पर पड़ा चीथड़े-सा लग रहा था... यह भी तो नहीं आया मेरे साथ? क्यों खरीदता था मैं महँगे कपड़े-- क्यों सँवारता था यह तन? जिस शरीर पर ये लाखों जतन करता था... मां मालिश कर करके चमकाती रहती थी आज वही शरीर मुर्दा बन गया है... चारों तरफ से गिद्ध-कौए उसे नोच खाने के लिए झपट पड़ रहे हैं और मुझे बचाने माँ तक नहीं आती। मैं भी तो नहीं भाग पाता खुद को बचाने के लिए। सबको खबर दी गई। मेरा शरीर मेरे शहर ले जाया गया। मेरा वही कीमती शरीर जो मेरे लिए सर्वस्व था आज छेनी-हथौड़ी से काट-पीटकर नोचा-खसोटा गया... पानी में फूला हुआ शरीर मुझे ही गंदा लग रहा है देखने में... आज चार दिन होने को आए - तब से मेरे इस शरीर पर क्या-क्या न बीती। काट-फाड़कर मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए... फिर मोटे-मोटे धागों से उसे सीकर प्लास्टिक के बीच मुझे पैक कर दिया गया है। आज पहली बार मुझे प्लास्टिक बैग के उपयोग करने पर आपत्ति हुई थी। मुझे याद आया... बचपन में मैं काफी बड़ी उम्र तक छोटा और लाडला होने की वजह से माँ का दूध पीता रहा था। दूध पीते वक्त माँ अक्सर मेरा मुँह अपने आँचल से ढाँक देती ताकि कोई देख न ले... मगर मैं बार-बार आँचल को उड़ा देता ओर दूध पीते हुए माँ को कनखियों से देख शरारत से हँसता। मेरी यह आदत अभी तक थी... मैं मुँह पर चादर रखकर नहीं सो पाता था... मेरा दम घुटने लगता था... और आज सिर से पाँव तक मुझे काले प्लास्टिक में लपेटकर रस्सियों से बांध दिया गया था... मैं कैसे सह ले रहा हूँ यह सब ...?

चार दिनों तक पानी में फूलने के बाद आज काट-छाँट और सिलाई होने के बाद मेरा शरीर अब सड़ रहा है। उसमें से ऐसी गंदी बास आ रही है कि खुद मेरी दिमाग की नसें फटती जा रही हैं... मेरी माँ, मेरे पिता भी अब मेरी हालत देखकर रो रहे हैं... माँ बार-बार पछाड़ खाकर गिर रही हैं पर मेरा शरीर जड़ है... उसमें अब जान नहीं है... उसका कष्ट भी अब माँ को पास नहीं जाने दे रहा है। शरीर की अपनी सीमाएँ माँ को पास जाने से रोक रहीं हैं। माँ को अब मुझसे दूर कर दिया गया है - मेरे सड़ते हुए शरीर से निकलता बदबू और सड़न से फैलता हुआ जहर वातावरण को विषाक्त कर रहा है। माँ बीमार पड़ सकती है... डॉक्टरों ने पिता के कान में फुसफुसाकर कहा है कि उसका दाह संस्कार यहीं से करवा दीजिए... अब इसे और रखना ठीक नहीं है। यह सुनते ही दीवार के उस छोर पर खड़ी सजग कानों वाली मेरी माँ अचानक चीखने लगी... नहीं मेरा बेटा, मेरा बेटा... एक बार घर जाने दो इसे... एक बार घर देख लेने दो-- और रोते-रोते माँ फिर से बेहोश हो गई हैं... इतने दिनों से बिना कुछ खाए-पिए लगातार चिंता-फिक्र, दारुण रुदन ने माँ को बेहद कमजोर बना दिया है। वह बार-बार बेहोश हो जाती हैं। उनके दाँत लग जा रहे हैं। क्या अब सचमुच में माँ से हमेशा के लिए अलग हो जाऊँगा... क्या उसी घर में जो मेरा घर था, जहाँ मैं पला-बढ़ा वहीं मैं जाने लायक नहीं रह गया। क्या वाकई पिता मुझे बिना घर ले जाए ही यहीं से हमेशा-हमेशा के लिए विदा कर देंगे...

बंद गाडी में भीषण बदबू थी। मझे पता था, यह अस्पताल में नथनों की नस-नस में जहर की तरह घुलती दवाईयों की महक है। यह महक मुझसे जरा भी बर्दाश्त नहीं होती। एक बार पिता जी की अपेण्डिक्स का ऑपरेशन हुआ था और पिता इतने दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। सभी जाते थे सुबह शाम दोनों वक्त, पर मैं कभी भी अस्पताल नहीं जा पाया। अस्पताल की वह रोगी गंध... वह दवाईयों की घुटन और घुटन में छटपटाती लाखों-करोड़ों रोगियों के बीच, रोगों के कीटाणुओं के बीच फँसी तड़पती मेरी आत्मा... मेरा दम घुटने लगता... मुझे लगता... अपनी मुँह में आ रहे लार में भी यहाँ के रोगी जीवाणु घुल से गए हैं... मैं उस लार को भी हर पल थूकता रहता... गटक नहीं पाता... सांस तक को मानो थूकता रहता... और आज अपने ही शरीर में हजारों-करोड़ों सड़ते हुए कीटाणुओं के बीच लिथड़ा हुआ मैं... मेरा शरीर पड़ा हुआ था- मुझ पर बार-बार बोतल की बोतल केमिकल छिड़की जाती मेरी बास कम करने के लिए... पर खुद मैं अपनी बास से कहाँ भागूं...जीवन भर मैं रोगियों से भागता रहा... आज प्लास्टिक में बंधी लिपटी मेरी लाश ऐसे कई लाशों के बीच पड़ी रही... मेरा कटा-फटा सिला हुआ शरीर घंटों पोस्टमार्टम के लिए और पोस्टमार्टम के बाद बाहर बरामदे में पड़ा सड़ता रहा और मैं ऊफ तक न कर सका...खुद को सड़ने-गलने से रोक भी न सका।

और अब यह असहनीय दुर्गंध... जिस दुर्गंध से भरी गाड़ी में मेरी अपनी माँ मेरे अपने पिता तक नहीं बैठ सकते... उसमें मैं लेटा बंद घुटती सांस-- बंधा शरीर। गाड़ी रुकी... मेरी अनोखी मौत, अजीब लाश और दुर्गंध मारती नई ताजा खबर को लाइव देखने के लिए सैंकड़ों लोग इकट्ठा हैं... इतने कि भीड़ को रोकने के लिए... मेरे अपने दोस्तों ने मेरी लाश के चारों ओर हाथों को जोड़कर सिक्कड़-सा बना लिया है ताकि हजूम से रास्ता जाम न हो जाए। मेरी अर्थी सजाने में दिक्कत न हो। हाय ! कैसा दर्द हो रहा है दिल में... मेरा शरीर अब इतना त्याज्य है कि बीमारी फैलने के डर से उसे घर में तक नहीं ले जाया गया... घर के बहुत पहले ही एक मैदान में अर्थी सजाई गई और उसे गाड़ी पर विदा कर दिया गया... मेरे अपने रोते रहे... मेरे पीछे मेरे दोस्तों, मित्रों, साथियों, भाईयों और पड़ोसियों का हुजूम रोता रहा... माँ एकबार फिर पछाड़ खाकर गिर पड़ी और मैं निष्ठुर एक बार फिर माँ को झिड़ककर चला गया। मैंने एक बार देखा... मेरी नजर को पहचान थी... पर उस पहचान का निशान कहीं नहीं था... वह नहीं आई थी... मैं अपनी अंतिम अनुभूतियों को भी अपने शरीर में समेटकर नहीं ले जा पाया... क्या यही जीवन की नियति है? क्या यही जीवन है?

मौत मुझे डरा रही है - जिसे मैंने आज तक देखा भी नहीं था, जो जीते-जागते होकर भी कभी मेरी भयरूपी कल्पना में प्रवेश नहीं कर पायी थी - आज वही एकाएक मेरे समूचे अस्तित्व को लील गया था। मौत के रूप में मेरा प्लास्टिक में पैक, रस्सियों में बंधा अपना ही पार्थिव शरीर भयभीत कर रहा हैं - दीवार पर, हर कोने में मुझे अपना ही निष्चेष्ट, पार्थिव निर्जीव शरीर खड़ा-खड़ा सा दिखाई दे रहा है... जो शरीर मर गया है... वह भला मुझे कैसे डरा सकता है - क्यों डरा रहा है?

तो क्या मुझे उसका भय नहीं... मृत्यु का भय डरा रहा है? तो क्या मुझे मृत्यु की वीभत्सता, मृत्यु की विभीषिका भयभीत कर रही है... क्या मृत्यु वाकई इतनी भयंकर है... पर सच्चाई भी तो यही है... मानो यहाँ सब के सब... हमारी सबकी नियति एक लाश ही बनना तो लिखा है... फिर भी हम जीवन का जश्न मनाते हैं... मौत को भी भूलकर पछाड़ने की कोशिश करते हैं... ठीक उन बच्चों की तरह जो आँखमिचैनी के खेल में दीवार की तरफ मुँह करके अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है कि उसे कोई नहीं देख सकता क्योंकि वह स्वयं किसी को नहीं देख रहा... तो क्या हमने भी मौत से बचने के लिए मौत को अनदेखा कर दिया है... हमने मौत को न देख सकने के लिए अपनी आंखें बंद कर ली हैं? यह सोचकर कि अब मौत हमें नहीं देख सकती... पर मौत तो अपने स्वाभाविक वेग से हर दिन हर पल हमारी तरफ बढ़ रही है... हमें लील जाने के लिए... हम चाहें जितना भी भाग लें... जब वक्त आएगा वह हमें पकड़ कर लील जाएगी। अपने उस वृहद वृत्त में छुपा लेगी। हमारा विशाल जीवन ढल जाएगा उस जीवन की विशालतम गहन छाया में... वह जो काली लहर है... उससे भी विशाल... उससे भी गहन, उससे भी निर्जन है ये मृत्यू... जो इतनी बड़ी है इतनी करीब है कि हमें दिखती ही नहीं। मुझे पता है कि मैं इस भय को भी जीतकर, उससे पीछा छुड़ाकर आगे निकल जाऊँगा पर क्या मौत से भाग पाऊँगा? क्या मौत से विमुख हो पाऊँगा? जाऊँगा तो मौत की ही तरफ... क्योंकि जिंदगी में कई बकाये हो सकते हैं, पर मौत अपना कोई भी हिसाब बकाया नहीं रखती, जिंदगी बकाया वसूलने के लिए नियति‘ बनाती है, मौत अपना बकाया वसूलने के लिए जिंदगी भर हमें ही बनाता रहता है। 


    परिचय


डॉ. मीनाक्षी जयकाश सिंह, 

17 अप्रैल 1984 में जन्म

पता-डी-286 ट्रेंचिंग ग्राउंड रोड, 

गार्डेनरिच, कोलकाता- 700024

Email - minihope123@gmail.com


कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. और पी-एच.डी., भारतीय स्टेट बैंक में कार्यरत 

‘‘मौन गूंज’’ नामक कहानी संग्रह प्रकाशित, ‘‘भारत विभाजन की त्रासदी और पिंजर’’ (आलोचना पुस्तक प्रकाशित), ‘‘आठवां फेरा’’ कहानी संग्रह प्रकाशित, ‘‘प्रेमचंद के उपन्यासों में आर्थिक दोहन’’ विषय पर आलेख प्रकाशित, ‘‘गिरते जीवन मूल्य और प्रेमचंद साहित्य की प्रासंगिकता’’ विषय पर आलेख प्रकाशित, ‘‘नव औपनिवेशिक दौर और दत्तात्रेय के दुःख’’ नामक आलेख प्रकाशित, ‘‘पूंजी, ग्लैमर और बाजार’’ नामक आलेख प्रकाशित, ‘‘मंदिर भगवान का घर या दुराचारियों का अड्डा’’, ‘‘भारतीय संस्कति पर वैश्वीकरण का प्रभाव संदर्भ -सोमा बंद्योपाध्याय रचित सदी का शोक गीत’’, ‘‘साहित्य की सामाजिक भूमिका’’, ‘‘मन्नू भंडारी की कहानियों में सामाजिक सरोकारों का जोड़-घटाव’’, ‘‘प्रेमचंद साहित्य में स्वराज के मायने’’, ‘‘जातिवादी व्यवस्था के ऊपर तमाचा मारती पीली छतरी वाली लड़की’’, सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों के ह्यास की कहानी उदय प्रकाश रचित ‘‘तिरिछ’’, ‘‘मूल्यों के धरातल पर प्रेमचंद का साहित्य’’ (आलेख शीघ्र प्रकाश्य), डॉ. अजीत कुमार दास के साथ संयुक्त संपादन में पुस्तक ‘‘यथार्थ के आईने में आधुनिक कहानियों की तस्वीर’’ शीघ्र प्रकाश्य ‘‘प्रेमचंद: कथा सृष्टि और मूल्य दृष्टि’’ पुस्तक प्रकाशित।