संघर्ष ने दी सफलता की परवाज ( प्रेरणात्मक आत्मकथ्य)

डॉ सीमा शाहजी, 325 मगा मार्ग, थांदला जिला झाबुआ, मप्र 457777, मोबाइल 7987678511


मेरे जीवंत स्मृतियों में आज भी शामिल है एक  सहज सरल उमगता बचपन,परिवार के रिश्तों की झिलमिल कड़ियां, शरारतें, पढ़ाई, गुरुजनों का सम्मान, संवेदना से भरा संसार, इन्हीं सब ने मेरे विश्वास श्रद्धा को विनत भाव का एक पुष्ट संस्कार दिया। खुशनुमा बचपन में लौटती हूं तो वहां ढेरों खुशियों के साथ साथ बीत रहा जीवन भी है जीवन के एक-एक पड़ाव  पर सफलता, हर सफलता से खुशी और एक नया लक्ष्य। लक्ष्य से सफलता और सफलता से लक्ष्य मानो यह यात्रा किसी उड़ती चिड़िया की यात्रा थी। इसी बीच उच्च स्तरीय अध्ययन और यौवन उम्र के संधि स्थल पर शादी। शादी याने कि एक आवश्यक स्वप्न का आवश्यक  साकार रूप पर,पर मेरे लिए ऐसा नहीं था। शीघ्र ही शादी का वह साकार स्वप्न मेरी आंखों को तेज रोशनी से भेद गया। आंखों के साथ-साथ दिमाग के स्वप्निल रजत पटल पर  धुंधलका  छा गया। एक स्थायी रात की तरह.......उस उड़ती चिड़िया की यात्रा रेगिस्तान में भटक गई थी। जल विहीन, छांव विहीन, कारवाँ विहीन। शादी एक दुखद अध्याय की तरह टूट चुकी थी। जुड़कर टूटने की वेदना मेरा  निजी नासूर तो बनी ही , लेकिन मुझसे से इतर मेरी ही दुनिया ने इस टूटने की जिम्मेदारी थोपने की चेष्टा में मुझे ही आलोचनाओं प्रत्यालोचनाओ के घेरे में ले लिया। यह आलोचनाएं तीखे बाण बनकर मेरे व्यक्तित्व के पोर पोर को लहूलुहान करने पर आमादा थी। परिवार की साख समाज का अचरज मेरे निजी  घातक घावों से ऊपर आ चुके थे। एकाकी रहना ही मेरे लिए सबसे सुरक्षित अवस्था थी। पता नहीं कब और कैसे इस एकाकी जीवन में मुझे अपने आलिंगन में समेट लिया यह आलिंगन मुझे राहत दे रहा था या मेरे विस्तार को समेट कर मुझे किसी नए एहसास से साक्षात्कार करवा रहा था। पता चल गया था कि अपने मार्ग को समतल बनाना है तो केवल मुझे ही, कोई दूसरा मेरा मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता। जहां निर्जन है वहां छायादार वृक्ष उगाहने होंगे ...सूनापन दूर करना है तो कुछ गुनगुनाना भी होगा.....  वन में भटकते भंवरे की तरह, लक्ष्य को पाने के लिए पंछियों की उड़ान से सबक लेना होगा ........हां मुझे लौटना होगा...... अगर स्वयं को बचाना है तो लौटना होगा उन सफलताओं के प्रतीकों की ओर जो बचपन नवयौवन  मेरी झोली में छोड़कर सदा सदा के लिए गुम हो चुके थे। मेरे आत्मविश्वास और स्नेहिल रिश्तों ने टूटे तंतुओं को फिर से बुनना शुरू किया।  तह किये तहखाने के रास्ते से मैं पहुंची उन प्रमाण पत्रों पुरस्कारों तक जिन्हें ब्यर्थ  मानकर मैंने घर में ही दफना दिया था। साहित्यिक गतिविधियों के प्रेस रिव्यूज मेरे सामने थे, क्या यह वही सीमा  है, जिसने कभी सर्वश्रेष्ठ छात्रा का खिताब पाया था या महाविद्यालय के स्नेह सम्मेलन में माँ कविता पढ़ने पर सभी प्रोफेसर्स  ने जिसकी पीठ थपथपाई थी। बदले हुए इस जीवन ने मुझे एक नई दृष्टि दी, जीवन मूल्यों के प्रति नई दृष्टि। संभावनाओं का अनंत आकाश झिलमिला रहा था। इन सफलताओं के प्रतीकों की प्रेरणा और सहयोग से मैं बन गई सहायक प्राध्यापक। प्रदेश के श्रेष्ट अखबारों में 

आकाशवाणी में लेखन वाचन का काम चल  पड़ा निरंतर लेखन ने मुझे प्रदेश स्तर के लेखकों के समूह में शामिल कर लिया। अब जीवन में आलोचना की जगह सराहनाओं का नया परिपक्व दौर आ चुका गया था इसी दौरान शिलांग की साहित्यिक  यात्रा भी हो गई। मित्र मिलते गए उनके साथ जीवन भी विस्तार पाता चला गया। साहित्य जगत के पुरस्कारों सम्मानों ने , जहां मेरे आघातों  को भुला दिया, वही मुझे संवेदनाओं का नया आकाश भी दिया। संवेदनाओं वेदनाओं को समझने अभिव्यक्त करने का नया व्याकरण मुझे मिला। हिंदी के अध्यापन के दौरान विद्यार्थियों को रचनात्मक साहित्यिक गतिविधियों से जोड़ना  ,पर्यावरण को समृद्ध बनाने के लिए वृक्षारोपण करना या कभी किसी छात्र छात्रा की परीक्षा फीस भरकर उन्हें पढ़ाई नहीं छोड़ने की सलाह देना , मेरे आत्म संतोष का पर्याय बने। नौकरी के कारण होने वाली यात्राओं में ही एक दिन अपने सामने की सीट पर आंसुओं से डूबे चेहरे वाली उस लड़की ने मेरी चेतना को चुनौती दे दी थी।    

क्यों बेटी? क्या हुआ ?

उसके आंसुओं का सैलाब अब मेरे कंधों  पर बह रहा था। रुंधे गले से रुक रुक कर अपनी जो कहानी सुनाई , उससे बेगाने किंतु अपनत्व के किसी रास्ते से बहकर आई ,आंसू की अनजानी बूंदों ने ,मुझे अपने ही जीवन के भूल चुके उन रास्तों पर लाकर फिर से खड़ा कर दिया , मैंने उसे समझाने के प्रयास में अपना परिचय दिया-

मैं सीमा शाहजी।

क्या डॉ शाहजी !

मैंने कहा हां,....  उस लड़की के छोटे से जवाब ने  मुझे अपने ही जीवन की सार्थकता का बोध करा दिया ‘‘दीदी आप तो सफल जीवन का प्रतीक हो इस अंचल में आप जैसी सफल लेखिकाएं  कितनी है।। उसने मुझे अपने संघर्ष एवं संघर्ष से उपजी सफलताओं का साक्षात्कार करा दिया। 

क्योंकि मैं ही जानती हूं जीवन का एक रूप अगर सफलताओं में लक्ष्य पाने की प्रेरणा देता है, तो जीवन का ही एक और रूप  संघर्ष से सफलता प्राप्त करने में पारंगत बना देता है। बचपन में सफलता से फूलने वाली यह लड़की, जीवन के एक दौर से गुजर कर संघर्ष से  सफलता पाने की कहानी जो बनी है। जीवन में संघर्ष और विरोधाभास की परिस्थितियां आती है  लेकिन आत्मा का चेतस बना रहे... आत्मविश्वास की लो प्रदीप्त रहे ....क्षमता से अधिक सह जाए ....अच्छे समय की प्रतीक्षा करें ....  गोया संघर्ष के पल पल को हम अपना बना ले, तब देखिए वह आपका गर्व , आपकी हिम्मत बन जाता है। आपके औचक एव मरूस्थलीय  संसार में रंग बिरंगे फूल सृजित कर देता है। आपके आसपास एक हरित सौंदर्य , संघर्ष की एक अलग परिभाषा दे देता है, इस नए परिवेश में जो मंजा हुआ व्यक्तित्व सामने आता है उस पर हम भरोसा भी नहीं कर पाते,  कि क्या हम वही हैं जो अपनी भी परिभाषा को भूल चुके थे ......लेकिन चट्टानों से टकरा टकरा कर पत्थरों का चमकीली सीपियां बन जाने का माद्दा अगर हो तो मंजिलें दूर नहीं होती और रास्ते भी आसान हो जाते हैं .....।