कुर्सी रोग (व्यंग्य)

डाॅ. सरोजिनी प्रीतम, नई दिल्ली, मो. 9810398662


बांकेलाल की जब से नौकरी छूटी थी उसे जैसे कुर्सी के प्रति एक अजीब सा प्यार उभड़ आया था.... जिसे प्यार करो वह दुलत्ती मार कर फेंक दे तो भी सच्चा प्रेमी अपनी धूल झाड़कर उसी मोह में पुनः खिंचा चला जाता है। घर में पत्नी ही थी जो उनके इस मानसिक आघात को समझ सकती थी। अतः घर की एक पुरानी प्लास्टिक की कुर्सी उनकी चारपाई के पास रखकर हंस हंस कर समझाती, तुम तो अभी भी बॉस ही हो, बैठो कुर्सी पर और मैं सारे हुक्म बजा लाऊंगी- लो पहले पानी, फिर चाय.... फिर हम दोनों गपशप करेंगे। तब तक लंच टाइम हो जायेगा....

बांके ने कुर्सी को फटी फटी नजरों से देखा और समझौता कर लिया। पर कुर्सी का भूत जिन्न बन गया जब भी पत्नी बच्चे यहां-वहां होते वे कमरा बन्द करके कुर्सी पर बैठ जाते- अरे कोई है का तूफान उठा देते और फिर अपने आपको समझा बुझाकर पुरानी किताबों, अखबारों में खो जाते। मन बीमार सा हो चुका था। जीवन व्यर्थ दिखाई देने लगा। कल के बच्चे भी दफ्तर जाने लायक हो चुके थे। खाने खिलाने के दिनों को भूलकर अफसरी करने लगे। अपनी ही आंखों के आगे बेटे भी फर्राटेदार गाड़ियों में अपनी पत्नियों को लादे हुए उनसे भी नौकरी करवा रहे थे। बांके को लगता उन्होंने बच्चों में अपनी मुस्कानों के दान पर थान बांट डाले अपने लिए कुछ न छोड़ा। पत्नी ‘नैना’ उनकी हर अनकही बात को भांप जाती थी अतः उसके सामने ज्यादा न सोचते। पेन्शन के नाम पर आने वाली राशि तो बकायदा तनख्वाह ही थी पर उसके लिए किसी कुर्सी पर बैठकर हुक्म न चलाना पड़ता .... बस यही दर्द यही गम 

धीरे धीरे उनके मस्तिष्क पर यों हावी हो गया कि पागलपन तक जा पहुंचा।

उन्हें हल्का हल्का बुखार रहने लगा। बार-बार वह दिन याद आता जब कसाई की तरह उन्हें हलाल करके उन्ही के कबाब बना बनाकर चटनी के साथ खा गये थे। विदाई ऐसी थी कि जैसे वह संसार से कूच कर रहे हों अन्तिम दर्शन के लिए लोग खड़े थे - उन पर काफी फूल चढ़ाये गये थे।

वे चाहते थे प्रथा यह बन जाये कि बॉस जिस कुर्सी पर बैठा रहा उसे वे घर ले जा सके- चलन यही हो, प्रथा यही होनी चाहिए पर इस समय उनकी कोई सुनने वाला न रहा था- बिस्तर पर लेटे लेटे उठ बैठते नैना उनकी दिव्य दृष्टि सी थी वह घर के काम काज से फुरसत पाकर आ बैठती उनकी सभी अनर्गल बातें दफ्तर के किस्से.... कांड सुनती समझ न पाती तो भी बड़ी समझदारी से सिर हिला देती। सलाह भी देती और फिर चाय पानी लाने के बहाने यहां वहां हो जाती... पर अब पति की हालत चिन्ता जनक होने लगी। बुखार ऐसा कि उठ उठकर बैठ जाते और कुर्सी से लिपटते फिर उस पर उलटे होकर बैठ जाते उसे बांहों में जकड़ लेते और सिर टिका कर अपना दुखड़ा रोते। एक ही मुद्रा में घंटों बैठे बड़बड़ाते, दफ्तर के कर्मचारियों के नाम याद करके जोर से चिल्लाते- ‘तुम्हारी तनख्वाह काट लूंगा.....’ फिर बिफराये नेत्रों से यहां वहां देख चुप हो जाते। मैं हमेशा ऊंचे पद पर रहा हूं बॉस.... खबरदार - अरे चपरासी कहां है - अरे- कौन मिलने वालों की भीड़ सब सिफारिश के लिए खड़े हैं। एक एक को देख लूंगा- साले। किसी को नौकरी चाहिए, किसी को छोकरी, छोकरी को नौकरी।

अरे कोई है, आने दो एक एक कर के भेजना। और पहले सबके कागज, फाइलें चेक करना।

सब कामचोर हैं, सब को छुट्टी चाहिए। बेईमान, कामचोर, घूंसखोर.... अरे अब तो जमाना आयेगा कि फिर से जातिप्रथा शुरू हो जायेगी- घूसखोर जाति, बेईमान जाति, कामचोर जाति।

नैना अन्दर आई तो बांके एकदम चुप हो गये.... नीचे देखने लगे। वह उनकी कुर्सी पर चाय का कप और दो बिस्कुट रखकर बिना कुछ कहे चली गई। अब तो वे तैश में आ गये। पत्नी को हांक लगाई- पर पत्नी जा चुकी थी। अपना सिर पकड़ लिया- ‘मेरी कोई सुनता क्यों नहीं....’ फिर खड़े होकर कुर्सी का मुआयना किया - क्या इसके चारों पायों में कोई माइक लगे हुए हैं कि इस पर बैठते ही आवाज अपने आप सुनाई देने लगे, आवाज सुनने को लोग चैकन्ने रहे ..... सारे दफ्तर मंे बॉस के मूड़ की चर्चा हो ..... उसकी मुस्कान का अर्थ, उसकी भृकुटि टेढ़ी होते ही दफ्तर में भूचाल आ जाए - लेट आने वालों की छुट्टी काटने में जो मज़ा है जो सुख है वह तो .... इसी कुर्सी की देन है। हाय ! कुर्सी क्या गई नीचे की जमीन भी खिसक गई .... हाय ! हाय ! करते हुए सिर पर हाथ मारा। फिर चाय पी ली .... फिर बिस्तर पर औधें मुुंह लेटे तो नींद आ गई - बहुत देर हुक्म चलाते रहे थे ... थक गये .... खर्राटे लेने लगे।

पत्नी अपनी खाट पर बैठे हुए लेटे हुए सब देखती - पर अनदेखा करती रही। आधी आधी रात को उठकर कुर्सी पर बन्दर की नाई उछलकर बैठना, सामान्य लगने लगा। कुर्सी पर ही सिर टिकाकर वे सोने भी लगे थे। और डाक्टर से पूछा तो वे बोले - ‘कुर्सी पर सिर टिका कर सोना कोई रोग नहीं, मात्र आदत है। बांकेलाल जी तीस साल सरकारी विभाग में उच्चपद पर रहे जो सुख चैन तनख्वाह के साथ के आदी रहे हों। उनके लिए यह कुर्सी दुख असहनीय हो जाता है। अतः आप उन्हें इन हरकतों को करते समय स्वयं संयम बरतें।’ नैना देवी ने अब उनके लिए उन्हीं की पेन्शन के रूपयों से एक गोल घूमने वाली कुर्सी मेज मंगा कर दफ्तर के जैसे ही पेन, पुरानी डायरी और कागज ला रखे हैं।  बांकेलाल लेकिन पुरानी कुर्सी से ऐसे चिपके हैं कि छूट नहीं पा रहे। उनकी दशा को देख देखकर विज्ञापन कर्ताओं की भीड़ जमा हो गई। बांकेलाल सबको एकटक ताकते रहे ..... चिपकाऊ चीजों के ब्राडं का विज्ञापन देने वाले ने उनकी कुर्सी पर उलटे ..... बैठी हुई मुद्रा को कैमरे में जकड़ लिया .....

हमारी कम्पनी की कुर्सियां ही ऐसी - पद छूटे कुर्सी न छूटे .... एक और ज्ञापन ... चिपको अभियान चिपको कांड कही कुर्सी का ज्ञापन, कहीं चिपकने के लिए ब्राड़ का विज्ञापन .... बांकेलाल में नये प्राण फूंक गये। वे तनकर खड़े हुए और बोले - ‘एक ऐसी कुर्सी बनाओ, लगे न झटके। प्राण जाई पर कुर्सी न छूटे।’

अगली सुबह सबने देखा एक निष्प्राण शरीर कुर्सी को जकड़े हुए था ..... उसके पास एक कागज पर लिख था - मुझे शवदाह गृह में कुर्सी पर ही बिठा दिया जाए तथा एक ही झटके में समाप्त किया जाए ताकि यह कुर्सी बार-बार झटका न दे सके।