भारतीय लोकतंत्र और चुनाव

प्रो. संजय द्विवेदी, भोपाल, मो. 09893598888

भूमिका

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया की समझ और उसका कवरेज बहुत आसान नहीं है। चुनावों में न सिर्फ मीडिया की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है वरन स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में यह चुनौतीपूर्ण भी हो जाती है। चुनाव के दौरान मीडिया की विश्वसनीयता भी दांव पर लग जाती है और यह कहना बहुत कठिन है कि वह इसमें कितना खरा उतरता है। भारत जैसे महादेश की विशाल संरचना, विविध भाषाएं, क्षेत्रीय अस्मिताएं, आकांक्षाएं, जाति चेतना, शिक्षा का विविध स्तर जिस तरह सामने आते हैं उसमें कोई संतुलित दृष्टि बना पाना वास्तव में आसान नहीं होता। प्रिंट मीडिया ने तो लंबे अनुभव से इसमें एक परंपरागत कौशल अर्जित कर लिया है, लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया को अभी इस क्षेत्र में लंबा मुकाम तय करना है। इस बीच सोशल मीडिया के विविध मंचों ने एक अलग तरह की चुनौती समाज और राजनीतिक दलों के सामने प्रस्तुत की है। अपने विचारों को परंपरागत माध्यमों के साथ अब सोशल मीडिया पर भी प्रक्षेपित करना और उसके इंतजाम करना भी एक पूरी विधा है जिसकी संभावनाओं के नित नए गवाक्ष खुल रहे हैं।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की तमाम खूबियों के बावजूद तमाम बुराइयां भी हैं जो चुनाव के समय ज्यादा प्रकट रूप में सामने आती हैं। मीडिया को लोकतंत्र का चैथा खंभा कहा जाता है जाहिर तौर पर मीडिया की जिम्मेदारी भी इस लोकतंत्र के महापर्व में विशेष हो जाती है। किंतु जैसी बातें सुनने में आती हैं मीडिया भी हमारे संसदीय लोकतंत्र बुराइयों से बच नहीं पा रहा है। चुनावी कवरेज में भी पैकेज का खेल शुरू हो गया है जिससे जनतंत्र मजबूत तो नहीं हो रहा है उल्टे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान उठने लगे हैं। यह बात रेखांकित करने योग्य है कि है कि देश के कई महत्वपूर्ण पत्र समूहों ने चुनावी कवरेज की पवित्रता के लिए संकल्प जताया है। सो सब कुछ बुरा ही है ऐसा सोचना ठीक नहीं किंतु विचार का  बिंदु यह है कि हम अपनी चुनावी कवरेज या रिर्पोटिंग की प्रामणिकता और विश्वसनीयता कैसे बचाएं। कई बार मीडिया अपनी तरफ से एजेंडा सेट कर लेता है और जमीनी हकीकत उससे उलट होती है, तब दंभी राजनीति मीडिया को लांछित करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। जाहिर तौर पर चुनावी कवरेज को हमें इस स्तर पर ले जाना होगा ताकि कोई राजनीतिक दल मीडिया के आंकलनों का मजाक न बना सके। यहां यह करते हुए हमें अपनी सीमाओं का भी ध्यान रखना होगा कि हम जाने अनजाने किसी के हाथ का खिलौना तो नहीं बन रहे हैं। पत्रकार की राजनीतिक विचारधारा हो सकती है और बहुत संभव है कि वह अपनी राजनितिक विचारधारा को राज करते देखने का भी आकांक्षी हो। किंतु उसकी ‘पोलिटिकल लाइन‘ कहीं ‘पार्टी लाइन‘ में तो नहीं बदल रही है, इसे उसे सचेत होकर देखना होगा। अपनी निगहबानी और निगरानी उसे खुद करनी होगी। तभी वह अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार रह पाएगा। यहां सवाल यह भी उठता है कि पत्रकार की व्यक्तिगत ईमानदारी से क्या काम चल जाएगा। मीडिया संस्थानों के प्रबंधकों को भी इसमें योगदान देना होगा। एक तरफ पत्रकार का मिशन तो दूसरी ओर मीडिया प्रबंधकों और संस्थान का एजेंडा जिसे व्यवसाय की आड़ में पत्रकारिता को कलंकित करने की छूट होती है इससे बचना होगा।

चुनाव रिर्पोटिंग दरअसल बच्चों का खेल नहीं है यह एक सावधानीपूर्ण काम है जिसे अनुभव, अध्ययन, प्रदेश की सामाजिक, आर्थिक, जातीय स्थितियों और सामाजिक ताने-बाने को समझे बिना नहीं किया जा सकता। जनता की आंख और कान होने का दावा करने वाले मीडिया की जिम्मेवारी है कि वह सही तथ्यों को जनता के सामने रखे और प्रतिनिधि का रिर्पोट कार्ड बिना हील-हुज्जत के लोगों को बताए। सिर्फ जातीय समीकरणों के आधार होने वाली रिर्पोटिंग से आगे बढ़कर मुद्दों को आगे लाने की कोशिश भी मीडिया की एक बड़ी जिम्मेदारी है। आज खबर पहले दिखाने की होड़ जिस दौर में पहुँच गयी है वहाँ पत्रकार की चिंताएं बहुत बढ़ गयी हैं। रिर्पोटिंग का स्वभाव भी सुविधाओं की गोद में बैठने का होता जा रहा है जबकि जमीन पर उतरे बिना सच्चाई सामने नहीं आती है। प्रायः पत्रकार बहुत अंदर के गांवों और वनवासी क्षेत्रों में नहीं जाते। जिससे वहाँ चलने वाली हलचलों का पता नहीं चल पाता। इससे तमाम क्षेत्रों की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती। जिन सर्वेक्षणों के चलते मीडिया का विश्वसनीयता सर्वाधिक प्रभावित हो रही है उसे करने वाली कंपनियों की भी विश्वसनीयता दांव पर रहती है। पर प्रायः ये सर्वेक्षण सच के  करीब नहीं आ पाते।

यह भी सोचने की बात है कि कई बड़ी मीडिया कंपनियाँ अब राजनीतिक दलों से मिलकर सर्वे के परिणामों में उलटफेर करती हैं। यह सोचना भी बहुत डरावना है कि ऐसे में उस साख का क्या होगा जिसे लेकर मीडिया जनता के बीच आदर पाता है। प्रिंट माध्यम में कई समाचार पत्र बाजार के तमाम दबावों के बावजूद बेहतर काम कर रहे हैं किंतु इलेक्ट्रानिक माध्यमों के सामने चुनौती बड़ी है। उन्हें न सिर्फ नज़रिए में बदलाव लाना होगा वरन अपने माध्यम के दैनिक कर्म से अलग चुनावी कवरेज को गंभीर बनाना होगा। बाजार के हाथ का खिलौना हर कोई बनना चाहता है किंतु साख को कायम एक अलग ही बात है। न्यूज चैनलों को सही तस्वीर दिखाने के लिए आगे आना होगा। कैसे कोई वीआईपी इलाका बन जाता है तो कैसे कोई क्षेत्र बहुत पिछड़ा रह जाता है। विकास के साधनों की बंदरबांट और जनप्रतिनिधि की अपने क्षेत्र के बारे में सोच के प्रकटीकरण का चुनाव बेहद उपयुक्त माध्यम हैं। टीवी पर होने वाली बहसें भी कभी-कभार छिछली चर्चा में तब्दील हो जाती हैं क्योंकि कई बार खुद एंकर की पकड़ विषय या क्षेत्र पर नहीं होती। अब जबकि चुनाव आयोग लगातार अपनी सक्रियता से चुनावों में कम से कम दिखने वाले कदाचारों को रोकने में तो सक्षम है मीडिया को भी सिर्फ कार्रवाईयों के विवरण के बजाए अपनी सक्रियता दिखानी चाहिए ताकि आर्दश आचार संहिता का पालन राजनीतिक दलों के लिए अनिवार्य हो जाए। चुनावी कवरेज में कई बार बाहर से गए अनुभवी पत्रकार ज्यादा सच्चाईयाँ सामने ला सकते हैं। छोटे स्थान की अपनी सीमाएँ होती हैं वहाँ नेता, प्रशासन, आपराधिक तत्वों का एक गठबंधन बन जाता है। सो स्थानीय पत्रकार भी कई बार भय के कारण भी सामने नहीं आ पाते ऐसे समय में वरिष्ठ पत्रकारों को कमान संभालनी चाहिए। इसी तरह मीडिया के तमाम संगठनों ने शत-प्रतिशत मतदान के लिए प्रयास शुरू किए हैं। अपने जागरूकता फैलाने वाले विज्ञापनों से उन्होंने लोगों में मतदान का प्रतिशत बढ़ाने का प्रयास किए ऐसे रचनात्मक प्रयासों से मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी निभा रहा है। अब जबकि हर साल देश में कहीं न कहीं चुनाव चलते ही रहते हैं, हमें अपने लोकतंत्र को सार्थक बनाने के लिए मीडिया के योगदान को एक वैज्ञानिक कर्म में बदल देना चाहिए। जिससे हम चुनावी कवरेज की ऐसी विधि विकसित कर सकें जिसमें आमजन की जागरूकता से राजनीति पर समाज का नैतिक नियंत्रण कायम हो सके। इससे मीडिया जनविश्वास तो हासिल करेगा ही लोकतंत्र को भी मजबूत बनाने में अपनी भूमिका निभा सकेगा।

मीडिया और चुनावों के विविध संदर्भो तथा भारत जैसे महादेश के चुनाव को नई नजर से देखने की कोशिश इस पुस्तक में लेखकों ने की है। देश के अनेक लेखकों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और चुनाव के काम से जुड़े रहे विशेषज्ञों ने इस पुस्तक में अपना वैचारिक योगदान किया है। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और सार्थकता के लिए स्वच्छ और बेहतर चुनाव प्रक्रिया पहला कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए यह किताब इस दिशा में चल रहे चिंतन और विमर्श को कुछ नए विचार-बिंदु उपलब्ध कराएगी। पुस्तक की भूमिका कृपापूर्वक मेरे मार्गदर्शक, सुधी चिंतक और लेखक डा. सुशील त्रिवेदी ने लिखी है, उनका आभार। इसके साथ ही मेरे गुरुवर डा. श्रीकांत सिंह, पूज्य पिताश्री डा. परमात्मानाथ द्विवेदी, मां श्रीमती निर्मला द्विवेदी के श्रीचरणों में नमन जिनकी प्रेरणा और आशीष से मैं अपने कामों को बेहतर तरीके से अंजाम दे पा रहा हूँ। इसके साथ ही जिंदगी में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहयोग करने वाले और शुभेच्छा रखने वाले मित्रों का भी आभार। पुस्तक पर आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।