स्पंदित प्रतिबिम्ब

संघर्ष का चिराग़

जीवन के अंधेरे पलों में

रोशनी के लिए

संघर्ष 

जब बढ़ जाता है

तब

सन्नाटों को बुनते हुए

ख़ुद चिराग़ बन

जल उठता हूँ मैं !

हाँ

यही परिभाषा

बन गई है ज़िन्दगी की !

गंगा की धारा में

मेरी ख़ुशियों, उमंगों

और लक्ष्यों का

प्रतिबिम्ब उभरता है

अक्सर

चाँदनी के बीच 

और फिर जीवन

गीत बन जाता है

लहरों के संग चलकर

घुप अंधेरे के

साए में भी !

अमरनाथ ‘अमर’ दिल्ली