उमा जी के साथ मेट्रो का एक सफऱ चाहती हूँ... (मेधा राजौरिया, दिल्ली)

 .....मेट्रो ने हम सबकी ज़िन्दगी को कितना आसान बना दिया है ना..! या फिर ये कहा जा सकता है कि हमारे सफ़र को सहज करदिया..!! ये तो खैर! सभी जानते हैं कि मेट्रो से यातायात काफ़ी सरल होगया है...!! अब सरकारी बसों के लिए भरी गर्मी, धूप, बारीश या सर्दी झेल कर इंतज़ार नहीं करना पड़ता...! जिसे ज़्यादा जल्दी होती है.. वो फ़ौरन मेट्रो का टोकन लेते हैं और कुछ मिनटों में अपने गंतव्य पर पहुँच जाते हैं ...!! मैं हिंदी की विद्यार्थी हूँ..!..लेकिन जानते हो... ये "गंतव्य" शब्द मुझे मेट्रो में सफऱ करने के दौरान ही पता चला... इससे जान पहचान तब हुई जब मैं पहली बार कॉलेज गई थी.. कॉलेज के पहले दिन ही मेट्रो स्टेशन पर ही कहीं भटक गई थी... "डेस्टिनेशन" का अर्थ तो समझ आ रहा था मगर ये "गंतव्य" क्या बला थी..मैं समझ ही नहीं पाई... और इसी उलझन को सुलझाने की कश्मकश में भटक गई... जिस स्टेशन पर उतरना था उससे कई ज़्यादा आगे निकल गई थी.. हाँ! फ़ोन था मेरे पास लेकिन कोई एंड्रॉइड स्मार्ट फ़ोन नहीं... नॉकिआ का कीपैड फ़ोन.! जिसमें इंटरनेट तो छोड़ो, नेटवर्क भी मुश्किल से आते थे...!!

मैंने "उमा त्रिलोक" जी की एक क़िताब पढ़ी थी बहुत पहले - "अमृता इमरोज़"..!.. जानते हो उसमें क्या लिखा था... उसमे प्रेम के उस स्वरूप का वर्णन है जो आज की युवा पीढ़ी से कहीं खो कर रह गया है..!! यह एक कोरा असहाय कड़वा सत्य है कि आज ज़्यादातर प्रेम केवल वासना बन कर विवाह के बंधन में बंध जाता है... अलौकिक प्रेम को इतना तुच्छ करदिया है कि श्वेत प्रेम का अस्तित्व अब मात्र केवल माताओं की ममता में और पिता के त्याग में ही नज़र आता है..!! उमा जी ने "अमृता-इमरोज़" लिखकर युवा पीढ़ी के सामने एक बार फिर प्रेम को शब्दों में परिभाषित करने का प्रयास किया है..!!!. अमृता, जो ना केवल एक लेखिका रहीं थी बल्कि एक ऐसी दृढ़ संकलपित स्त्री भी रही जिन्होंने उस दौर में पर पुरुष से प्रेम करने का साहस रखा जिस दौर में पर पुरुष को देखना भी एक स्त्री के लिए महा पाप, जघन्य अपराध माना जाता था..!! क़िताब में कई जगह ऐसी ऐसी बातें, वाक्य, और किस्से हैं कि पढ़ने वाले के मन में एक बार उमा जी से मिलने की इच्छा जाग ही उठती है..! मेरे मन में भी यही इच्छा है! अमृता प्रीतम का उमा जी पर बड़ा स्नेह था...! क़िताब में ही एक जगह उमा जी ने लिखा है..-कि एक दोपहर वह अमृता जी से मिलने जब उनके घर पहुँची थीं तब अमृता जी ने उन्हें एक कागज़ का टुकड़ा दिया था जिसमें उमा जी के लिए यह प्यारा संदेश था - " तुम जो असीम के किनारो से बूँद-बूँद भर लेती हो साँस मौन की, तुमने ज़रूर उस ईश्वर को प्यार की सुगंध की तरह अनुभव किया होगा, इसलिए मैं तुम्हें प्यार करती हूँ, उमा |"...अमृता जी के आखिरी समय में उमा जी उनके बेहद निकट रहीं थी...!! क़िताब पढ़कर आज मैं खुद को उमा और उमा को अमृता महसूस कर रहीं हूँ...!! 

किसी लेखक से मिलकर क्या किया जाता है.. मैं यह तो नहीं जानती... और ना ही मेरे पास कोई सवालों की सूची है, जिनके जवाब ढूँढने मुझे उमा जी से मिलना है... मगर हाँ एक बात निश्चित है कि मैं उनसे मिलना ज़रूर चाहती हूँ..! मिलकर क्या होगा पता नहीं... बातें क्या होंगी.. पता नहीं... मुझसे मिलना उन्हें अच्छा लगेगा या नहीं.. यह भी नहीं जानती... दरसल मैं सच में कुछ भी नहीं जानती... लेकिन उनसे मिलने क़ी प्रबल इच्छा है..!! उनका घर यही दिल्ली में ही कहीं हैं... गूगल से कभी उनका घर का पता भी निकाला था... फेसबुक पर उन्हें फॉलो तक करती हूँ... कुछ महीने पहले तक तो वो रोज़ कोई ना कोई कविता पोस्ट भी करतीं थी..! शुरू शुरू में उनके बारे में काफ़ी कुछ जानने क़ी इच्छा में बहुत कम जान पाई थी.. इतना ही नहीं उन्हें मैसेज भी किया था... अपनी लिखी कहानी भी उन्हें भेजी थी...उन्होंने पढ़ने के लिए कई किताबें भी सुझाईं थी...!! मगर इस सब के बाद भी मैं उनसे मिलने क़ी बात नहीं कह पाई.. मैं नहीं कह पाई कि मेरा कितना मन हैं उनसे मिलने का... बावजूद इसके कि मेरे मन में कोई सवाल नहीं उनसे पूछने को... बावजूद इसके कि मुझे कुछ भी पता नहीं है... बस मिलना है... तो मिलना है... लेकिन यही बात उनके अलावा सब से कह देती हूँ..!!

अगर दिल्ली में सफऱ करना मुश्किल होता तो कितना आसान होता ना, यह कह देना कि "घर दूर है और जाने का कोई सही साधन नहीं है इसलिए मिलने जा नहीं सकते "...!! आज सारी सुविधाएं हैं पर फिर भी उनसे मिलने से अब तक वंचित रही हूँ..!!.. मैंने तुम्हें ख़त लिखें हैं जैसे... क्या उन्हें भी लिखूँ कुछ...??.. जो बातें मैसेज से नहीं कह पा रही... ख़त लिखकर बता दूँ कि मैं कितने हद तक उनसे मिलना चाहती हूँ..??.. लेखकों से मिलना या ज़रा देर के लिए उनका सानिध्य पा लेना... मैं समझती हूँ इससे प्यारा कुछ नहीं किसी पाठक केलिए...!! लोग मिलकर.. लिखने की कला पर प्रश्न करते हैं, लिखने केलिए कुछ राय माँगते हैं... जीवन के बारे में पूछते हैं..उनकी दिनचर्या को लेकर हज़ारों सवाल करते हैं... मगर मैं बस उमा जी के साथ मेट्रो का एक सफऱ चाहती हूँ... चाहती हूँ कि मेरे घर से उनके घर तक जाने वाली मेट्रो में मैं उनके साथ एक सफऱ तय करूँ... अपने घर उन्हें शाम की चाय पर बुलाऊं... बावजूद इसके कि मेरे पास कुछ नहीं होगा कहने को... बावजूद इसके कि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाऊँगी...!!


साँझ

मेधा राजौरिया, रोहिणी, दिल्ली, मो. 9899485233

Uma Trilok, Chandigarh, Mob. 98111 56310