सपनों की उड़ान







डॉ. जवाहर धीर, 
फगवाड़ामो.  9872625435

मुमताज नाम था उसका। मगर उस की सहेलियां उसे प्यार से मोनी कहती थीं। सलमा, सकीना, साजिदा, मेहरू जब स्कूल से पढ़ कर लौटतीं तो बातों-बातों में अपने-अपने भविष्य के सपने बुनने लगतीं।

बालपन की अवस्था जीवन की सबसे अबोध अवस्था होती है। इस अवस्था में बच्चे प्रायः सपनों की दुनिया में खोकर एक ऐसे संसार की रचना करने लगते हैं, जिसे प्रायः सारे जीवन में देख तक नहीं पाते और फिर सपनों की दुनिया में बुने गये सपने मानस पटल पर ऐसे उतर जाते हैं कि मृगतृष्णा की तरह इंसान उनके पीछे भागता चला जाता है।

मोनी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वह अपनी सबसे प्यारी सहेली सकीना से कहा भी करती कि मेरी इच्छा है कि मेरा शौहर दूर सात समुद्र पार किसी ऐसे देश में रहता हो, जहां हवाई जहाज से जाना पड़े। हवाई जहाज का नाम लेते ही मोनी के होंठों पर मुस्कान तैरने लगती और वह अपने हाथ उठा कर हवाई जहाज के उड़ने जैसी अदा में कह उठती...मैं भी हवाई जहाज में बैठ कर एक दिन अपने शौहर के साथ दूर आसमान में उड़ जाऊंगी...और खिलखिला कर हंस देती। सकीना उसका हाथ थाम कर कहने लगी...मोनी...अगर ऐसा न हुआ तो...?‘

तो क्या...?‘ कहती हुई वह आत्मविश्वास से भर उठी...

सकीना...ऐसा होगा और जरूर होगा...बड़ी होकर मैं अपनी अम्मी से साफ कह दूंगी कि... मेरा सपनों का शहजादा आसमान के रास्ते से आएगा और मैं उसकी हमराह बन कर हवाई जहाज़ में उड़ कर दूर किसी देश में चली जाऊंगी...मोनी एक ही बार सब कुछ कह गई।

मोनी की सहेलियां स्कूल आते-जाते उसकी बातें मजे से सुनती। सलमा ने एक दिन कहा भी...ऐसे सपने मत बुना करो...हमारी औकात इतनी नहीं है कि हमारे घर वाले ऐसा शौहर ढूंढ पायें...ऐसे सपने बुनना बंद करो...और...फिर सपने तो सपने हैं...इनके टूटने की पीड़ा ज़्यादा होती है...मोनी को सलमा की बात अच्छी नहीं लगी और वह रूठ गई थी उससे।

जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही मोनी चहक उठी। बला की खूबसूरत निकली वह। उसकी खूबसूरती का आलम यह था कि देखने वाली नज़र उस पर टिकती ही नहीं थी...गोरा-चिट्टा रंग...मोटी-मोटी गहरी काली आंखें...काले घने बाल...और...गठीला बदन...और...क्या-क्या नहीं था उसमें...? कोई देखता तो मन ही मन मचल उठता। बस यूं कहो...खुदा ने जी भर कर नूर बख्शा था मोनी को।

स्कूल की पढ़ाई के बाद सकीना तो कॉलेज चली गई मगर कुछ घरेलू कारणों से मोनी आगे की पढ़ाई से महरूम हो गई और इस प्रकार दोनों सहेलियां बदले हालात में अलग हो गई।

एक दिन !

सकीना को खबर मिली कि मोनी को किसी अरब मुल्क का शेख निकाह करके ले गया है। सकीना को इस खबर से खुशी तो मिली कि उसकी प्यारी-प्यारी सहेली के बालपन में बुने सपने पूरे हो गये हैं और वह आसमान में उड़ कर दूर देश में चली गई है। मोनी के सपनों को पर लगने की खुशी तो थी सकीना को मगर मन के एक कोने में पीड़ा भी थी कि उसकी बहन जैसी सहेली ने उसे खुशियों की इस घड़ी में शामिल तक नहीं किया। मगर मोनी की इन खुशियों के आगे सकीना अपनी पीड़ा को भूल गई। सकीना कभी-कभी सोचती कि मोनी उसे खत जरूर लिखेगी और उसके उत्तर में वह शिकायत करेगी कि उसे भुला क्यों दिया उसने। मगर वर्षों बीत गये...मोनी का कोई खत नहीं आया...कोई संदेश भी नहीं।

समय के पहिए युगों से चली आ रही अपनी रफ्तार से घूमते रहे और उसी प्रकार रफ्तार से सरकती रही सकीना की जिन्दगी। सकीना की कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई तो घर वाले उसके लिए भी अच्छा शौहर ढूंढने लगे। जीवन की इस दहलीज़ पर जब हरेक लड़की शादी की उम्र में दाखिल होती है तो सभी को लड़की के भविष्य की चिंता सताने लगती है। सकीना की रिश्ते में ही लगती मौसी ने एक ऐसे लड़के के साथ सकीना के रिश्ते की बात चलाई...जो हाल ही में इंजनियरिंग पास करके लौटा था। लड़का खूबसूरत भी था और पढ़ा-लिखा भी...उधर सकीना भी तो कुछ कम नहीं थी। सकीना की मंगनी लियाकत नाम के इस लड़के के साथ हो गई तो सकीना झूम उठी। आज सकीना के सपने भी पूरे होते दिखाई देने लगे। बालपन में बुना उसका सपना भी तो यही था कि उसका शौहर बड़ा अफसर हो।

उधर लियाकत नौकरी की तलाश में था। एक इंगलिश कम्पनी ने उसे साऊदी अरब में काम करने की ऑफर दी। लियाकत ने अपने भविष्य को संवरता देख सकीना से कहा...साऊदी अरब में नौकरी ज्वायन करने के बाद शीघ्र लौटूंगा...और...ब्याह के तुझे साथ ले जाऊंगा...लगभग एक साल के बाद जब लियाकत लौटा तो उसका निकाह सकीना से हो गया।

लियाकत और सकीना खुशी से फूले नहीं समा रहे थे । वे जब भी दोनों मिल बैठते तो सपनों के संसार में खो जाते। एक ऐसे संसार में जिसमें खुशियां ही खुशियां थीं...गमों का नामो-निशां तक नहीं। वे भविष्य के सपने बुनते तो कभी बीते हुए कल को याद करने लगते। एक दिन सकीना बैठे-बैठे अपने बालपन में खो गई और सोचने लगी मोनी, सलमा, साजिदा और मेहरू की प्यारी-प्यारी बातें । सोचते-सोचते उसका ध्यान मोनी पर अटक गया। वह सपनों के संसार में खोई थी तो अचानक उसे लगा कि उसकी प्यारी-प्यारी मोनी उसके सामने बैठी है जो अपने शौहर की प्यारी-प्यारी बातें उसे चटखारे लेकर सुना रही है। सोचते-सोचते उसने अंगड़ाई लेनी चाही तो अचानक किसी ने पीछे से उसे बाहों में ले लिया। सकीना चैंकी। पीछे पल्ट कर देखा...सामने लियाकत था और सकीना उसकी आगोश में सिमट कर रह गई।

लियाकत अपनी हमराह सकीना को साथ लेकर साऊदी अरब लौट गया। वहां कम्पनी की ओर से उसे रहने के लिए शानदार घर और दूसरी सहूलियतें मिल गई । कम्पनी की ओर से उन्हें शानदार दावत दी गई। आये दिन लियाकत के मित्र, जो हिन्दुस्तान के रहने वाले थे। उन्हें दावत पर बुलाते तो सकीना सोचने लगती कि खुदा ने उसे अच्छे रुतबे वाला शौहर ही नहीं दिया, बल्कि उस की ख्वाहिशों से कहीं ज़्यादा इज़्जत भी दी है।

दावतों के इसी दौर में कम्पनी के सबसे बड़े पार्टनर मोहम्मद असलम शेख ने लियाकत और सकीना को अपने बंगले पर दावत में बुलाया। वे दोनों शेख के घर गये तो उसके महलनुमा घर की हर चीज़ जो सुन्दर और सलीके से बनी थी, देखकर बहुत प्रभावित हुए। उस घर की गुलाबी रंग से पुती दीवारें वहां पर रहने वाले लोगों के सभ्य होने की कहानी कहती प्रतीत हुई। सकीना हैरानी से सब कुछ देख रही थी तो उसकी नजर ड्राइंग रूम के बाई ओर बने शीशे के उस बड़े दरवाजे पर पड़ी, जहां से बाहर बने पार्क और विदेशी कारों को देखा जा सकता था।

आओ भई बैठते हैं...लियाकत के कानों में आवाज पड़ी तो उसने पीछे मुड़ कर देखा...सामने शेख था जो उनके स्वागत के लिए आया था। मखमली सोफे पर बैठते हुए शेख बोला... और सुनाओ...लियाकत भाई...! कुछ अपनी...कुछ अपने वतन की और कुछ अपनी नई बीवी की...लियाकत शेख के साथ बातों में खो गया और सकीना उठ कर पास ही में बनी लॉबी में टहलने लगी। लॉबी में दीवार पर लगी एक पेंटिग में वह खो गई। तभी उसके कानों में आवाज पड़ी... मेम साब.. .शर्बत ले लीजिए...सकीना ने पीछे खड़ी लड़की के हाथों में पकड़ी सुनहरी गिलासों वाली ट्रे को देखा और शर्बत का गिलास उठा कर पीने लगी।  खाली गिलास वापिस लेकर वह लड़की लौटने लगी तो सकीना का हाथ उसे रोकने के लिए आगे बढ़ा मगर तब तक वह लड़की लौट गई थी। शायद सकीना को उससे कुछ पूछने की इच्छा थी।

कुछ समय के बाद शेख लियाकत और सकीना को लॉबी में से ही निकलती सीढ़ियों के रास्ते से उपरी मंजिल में ले गया। वहां करीने से सजी टेबुल पर खाना पहले से ही लगा था । दावत कबूल करते हुए सकीना और लियाकत खाना खाने लगे। वही पहले वाली लड़की उन्हें खाना खिला रही थी तो सकीना फिर सकते में आ गई। उसे लगा कि वह इस लड़की को पहले भी कहीं देख चुकी है। सकीना का ध्यान उस समय खाना खाने में कम और उस लड़की में ज़्यादा था।  खाना उसके अन्दर नहीं जा रहा था। जैसे-तैसे खाना निगल कर वह हाथ धोने को उठी तो लियाकत शेख के साथ सीढ़ियों से नीचे उतर गया। हाथ धोकर ज्योंहि वह पीछे मुड़ी, सामने वही लड़की तौलिया पकड़े खड़ी थी। तौलिया उसने पकड़ा तो सही, मगर पकड़ में नहीं आया। उसने उसे दोनों हाथों से कन्धों से पकड़ लिया और बोली... कौन हो तुम...?‘

मैं हसीना हूँ...

नहीं...तुम झूठ बोल रही हो...तुम हसीना नहीं...मुमताज हो...मेरी अपनी मोनी...कह कर सकीना उस लड़की के फड़फड़ा रहे होंठों को देखने लगी जो शायद कुछ कहना चाह रहे थे मगर कह नहीं पा रहे थे। सकीना ने फिर कहा...तुम मोनी हो न...!

हो...मैं मोनी ही हूँ...! तुम्हारी बचपन की सहेली...कह कर वह पास की ही दीवार से सट कर खड़ी हो गई और रोने लगी। सकीना ने उसे हिम्मत दी और पूछा...तुम इसी शेख की बीवी हो.. .? क्या यही तुम्हारे साथ निकाह करके लाया था...? फिर यह सब..........?‘ सकीना एक ही बार में कई सवाल कर गई।

हां...सकीना मैं भी इसी गल्तफहमी का शिकार थी कि शेख मुझे अपनी पत्नी बना कर अरब मुल्क में ले जा रहा है...यहां आकर मुझे पता चला कि शेख मुझे निकाह करके नहीं...खरीद कर लाया है तो मेरे सपनों की दुनिया बिखर गई...उस दिन से लेकर आज तक मैं नर्क के कीड़े की तरह जी रही हूँ...पहले तो शेख ने मेरे जिस्म को जी भर के नोचा...मेरी जवानी को मेरी मजबूरी समझ कर वह खेलता रहा...और...फिर जब उसका दिल भर गया तो मुझे अपनी रखैल बना लिया..

आज मैं सिर्फ नुमायश की चीज रह गई हूँ...दावतों में साकी की तरह पैमानों में शराब उंडेलने के लिए मेरा इस्तेमाल किया जाता है...और...लोगों की नज़रों में मैं एक वेश्या की तरह हूँ...कह कर मोनी जोर-जोर से रोने लगी। सकीना आंखें फाड़-फाड़ कर उसे देख रही थी। कुछ भी सुझाई नहीं दिया उसे। तभी उसके कानों मे आवाज पड़ी...भई कहां खो गई हो...? लगता है हमारे शेख साहब की हर चीज तुम्हें पसन्द आ गई है...यह लियाकत की आवाज थी । मगर सकीना उसे क्या बताती कि शेख की इन चीजों में उसकी अपनी मोनी भी तो है...जो उसे जी जान से प्यारी है।

सकीना को कुछ भी सुझाई नहीं दे रहा था कि वह क्या करे ? तभी मोनी ने कहा... मेम साब...मैं हसीना हूँ...सिर्फ हसीना...आप कुछ लेंगी क्या...?‘ कह कर वह अन्दर लौट गई। सकीना कुछ समय तक खड़ी रही और फिर धीरे-धीरे लियाकत के पास लौट गई जो नीचे सोफे में धंसा हुआ था। सकीना के माथे पर तैरती पसीने की छोटी-छोटी बूंदों को देख कर लियाकत मुस्कराया...शायद यहां की आबो-हवा अभी आपको फिट नहीं बैठी। इससे पहले कि सकीना लियाकत से कुछ कहती ऊपरी मंजिल से नीचे किसी चीज के गिरने की आवाज सुनाई दी।

सकीना ने शेख से पूछना चाहा कि क्या हुआ तभी शेख ने खुद कह दिया...घबराने की जरूरत नहीं ऐसे छोटे-छोटे हादसे यहां आये दिन होते ही रहते हैं...कह कर शेख लियाकत से बोला...शुक्रिया...! आपके यहां आने से हमारा घर रौनक हुआ...और दोनों लौट पड़े। बाहर निकल कर देखा, खून से लथपथ फर्श के बीच एक लाश पड़ी थी, जिसे जल्दी-जल्दी हटाया जा रहा था। सकीना की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसे लगा कि वह लाश उससे कह रही है... मैं हसीना हूँ...मेम साब...सिर्फ हसीना...

सकीना लियाकत के संग लौट पड़ी और खोलने लगी बालपन के सपनों की किताब के पन्ने. ......जिनमें से एक पर लिखा था...मैं भी एक दिन आसमान में उड़ कर.....सात समुद्र पार चली जाऊंगी...और उसने अपना सर लियाकत के कन्धे पर रख दिया।

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