साक्षात्कार: भाव भूमि बनी बनारस में

किसी व्यक्ति को बाहर कितने भी सम्मान मिल जाएं, लेकिन घर का सम्मान उसके लिए विशेष महत्व रखता है। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा घोषित उसका सर्वोच्च भारत भारती सम्मानप्रख्यात कथाकार डॉ. सूर्यबाला को इसी विशिष्टता की अनुभूति करा रहा है। 1943 में बनारस में जन्मीं एवं वहीं पढ़ी-लिखी सूर्यबाला में लेखन के बीज भी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की धरती पर ही पड़ गए थे फिर पति की व्यावसायिक बाध्यताएं उन्हें अलीगढ़ होते हुए मुंबई ले आई। मायानगरी मुंबई को ही उन्होंने अपनी कर्मभूमि बना लिया। कर्मभूमि भले मुंबई बन गई हो, लेकिन बनारस आज भी उनकी रचनाओं में रचताबसता है। पारिवारिक मूल्यों का अहसास उनके हर कहानी संग्रह-उपन्यास में किया जा सकता है। प्रस्तुत हैं उनसे लंबी बातचीत के अंश...

आपका कर्मक्षेत्र अब मुंबई है। कैसा लग रहा है गृह प्रदेश का सम्मान मिलने पर? बनारस मेरी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों रही है। पहले मैं बनारस में बसती थी, अब बनारस मुझमें बसता है। मेरी कोई कहानी ऐसी नहीं होगी, जिसमें बनारस न हो। इसलिए भारत भारतीमेरे लिए मायके से आई चिट्ठी की तरह है। मैं 1975 में मुंबई आ गई थी, लेकिन आज भी मैं बनारस के अपने चेतगंज वाले घर का पता नहीं भूलती, जहाँ मेरे पहले पारिश्रमिक का मनीआर्डर आया था 10 रुपए का। डाकिया नीचे से ही आवाज लगाता था कि बिटिया सूर्यबाला, तुम्हारा मनीआर्डर आया है। तब उस 10 रुपए में से एक रुपए मैं पोस्टमैन को बख्शीश स्वरूप दे देती थी और बाकी नौ रुपए मां की पूजा की चैकी पर रख देती थी। इसलिए बहुत अच्छा लग रहा है यह सम्मान मिलने पर।

उत्तर प्रदेश से मुंबई तक का सफर कैसे तय किया?

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पी.एचडी. में दाखिले के साथ ही मेरा विवाह हो गया था। विवाह के बाद करीब आठ साल का लंबा अंतराल मैंने घर-गृहस्थी को समय देने एवं पत्रपत्रिकाएं पढने में बिताया। इसी दौरान अलीगढ़ में रहते हए द्विजेंद्र नाथ मिश्र निर्गणजी की एक प्रेम कहानी सारिका में पढ़ी। संयोग देखिए कि उस कहानी की किशोरी नायिका का नाम भी सूर्यबाला था। उस कहानी पर एक लंबी व्यंग्य प्रतिक्रिया लिखकर पत्रिका को पोस्ट कर दी। वह प्रतिक्रिया पढ़कर संपादक कमलेश्वर जी का पत्र आया। उन्होंने लिखा था कि आपकी रचना (प्रतिक्रिया नहीं!) देखी। इसमें निहित व्यंग्य को देखकर मुझे लगता है कि यदि आप नियमित लिखें तो हिंदी को कुछ महत्वपूर्ण रचनाएं मिल सकती हैं। वह दिन और आज का दिन। लिखना अनवरत जारी है। कमलेश्वर जी ने ही सारिका के महिला कथाकार अंक में मेरी पहली कहानी ‘‘जीजीप्रकाशित की। इसके बाद तो धर्मयग. - साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी सहित देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं में यह सिलसिला चल मिकला।

साहित्यिक उर्वरता की दृष्टि से बनारस, अलीगढ़ एवं मुंबई में क्या फर्क देखती हैं?

मेरी भावभूमि तो बनारस में बन चुकी थी। बचपन का जो समय होता है, वह स्मृति कोष, स्मृति मंजूषा, संस्कार, समाज, संस्कृति वह सब मेरे अंदर प्रविष्ट और प्रतिष्ठित हो चुकी थी। ये संस्कार कभी अपने से अलग नहीं हो सकते, लेकिन बनारस से मुंबई आने के बीच आठ वर्ष अलीगढ़ में रहने के दौरान ही मेरी कई कहानियां चर्चित हो चुकी थीं। इनमें प्रमुख रहीं, ‘एक इंद्रधनुष जुबैदा के नाम‘, ‘गौरा गुणवंती‘, ‘निर्वासित‘, ‘अविभाज्य‘, ‘हां, लाल पलाश के फूलनला सकूगाऔर रिस

आपकी कहानियों में वह पक्ष नहीं दिखता, जिसे आज कुछ महिलालेखक स्त्री विमर्श का नाम देती हैं?

जी हां (हंसते हुए), उससे मैं काफी हटकर लिखती हूं। कारण यह है कि प्रारंभ से ही मेरी प्रकृति कुछ ऐसी रही है कि जो सब लिख रहे हैं, उससे अलग लिखा जाए। दूसरी बात यह कि मेरे लिए स्त्री विमर्श का अर्थ है-स्त्री के मन से, उसके सपनों से, उसकी संवेदना, उसकी भावना, उसके अंतः प्रकोष्ठों की खिड़कियां, झरोखे इत्यादि, जबकि स्त्री विमर्श के नाम पर जो कहानियां लिखी जा रही थीं, उनमें आपको ये सब नदारद मिलेंगे। उनमें स्त्री विद्रोह, स्त्री आक्रामकता, स्त्री का असंतोष मिलेगा, लेकिन ये बाहरी पक्ष है। ये स्त्री का अंतरंग नहीं है जिसे आप बाहरी पक्ष कह रही हैं, वह कितना महत्वपूर्ण है आपकी नजर में? देखिए, यह गलत नहीं है। झूठ भी नहीं है, लेकिन इस फार्मूले के फेर में स्त्री के चारों ओर चैहद्दियां खींच दी गई। नई पौध के एक पूरे वर्ग को जैसे विमर्श का एक बाजार मिल गया हो। वह उस पर टूट पड़ा। इतना विमर्शी साहित्य आने लगा कि पाठक को उससे ऊब महसूस होने लगी। पाठक को अपनी कहानी चाहिए। विमर्श भी आप दें तो उसकी गहराई में तो जाएं। यहां तो एक समय ऐसा आ गया कि पुरुष मठाधीशों की साजिश ने प्रतिबद्धता के नाम पर इतनी कलमों को बहकाया कि सिर्फ खुलेपन को बढ़ावा मिलता गया। छद्म आधुनिकता को बढ़ावा मिलता गया। स्त्री के अंदर से उसकी बड़ी मूल्यवान चीजें हटाकर तमाम नकली चीजें उसमें समाविष्ट कर दी गई।

लेखन में विचारधारा के समावेश को कितना सही मानती हैं आप?

विचारधाराएं मनुष्य और समाज के हित में बनी हैं। बड़े-बड़े विचारकों ने गढा है इन्हें। ये एकदूसरे की पूरक होती हैं, लेकिन उनको प्रदूषित करने का काम उनके अनुयायी करते हैं। वो एक बड़ी विराट चीज को एक छोटे पात्र में भर देते हैं। मेरा मानना है कि विचारधारात्मक मतभेदों को एक किनारे रखकर लिखा जाना चाहिए। तब आपको साहित्य के मंदिर में पैर धोकर आने जैसा अहसास होगा।

आपका उपन्यास कौन देश को वासीवेणु की डायरीकाफी चर्चित हुआ है। क्या है इसकी पृष्ठभूमि?

मेरे पाठकों का कहना है कि यह एक उपन्यास ही मेरी पिछली कई रचनाओं पर भारी है। यह विदेश जाने वाले युवाओं के जीवन पर आधारित उपन्यास है। अमेरिका में अपने बटकघर पर छह-छह महीने रहना हुआ है मेरा। मैं जिस उछाह से झूमती हुई वहां गई थी। वहां के समाज, संस्कृति, स्त्री, विखंडित परिवार, अकेला विक्षिप्त व्यक्ति, एकाकी बच्चे देखकर वह उछाह ठंडा पड़ गया। उसने उस महाविकसित देश की विद्रूपता हमारे सामने ला दी। तब मुझे महसूस हुआ कि अभी तो हमारे पास बहुत अमूल्य संस्कृति और थाती बाकी है। बस इसी ने मुझसे यह उपन्यास लिखवा दिया। 

-ओम प्रकाश तिवारी