टूटते मोह

“जतिन तुमको सैकड़ों बार बोल चुका हूँ ... साठ पार मेरी भी उम्र हो चुकी है। मेरे ऑफिस पहुंचने से पहले ऑफिस जाने का रूटीन बनाओ।.....अपनी वकालत शुरू करो....वकालत जमाने में भी काफी समय लगता है.....अभी तो मैं हूँ....काम सिखाने व समझाने वाला......आता-जाता वक्त किसने देखा है?” 

कामता प्रसाद के बढ़ती उम्र के साथ गुस्से के बुलबुले ज्यादा फटने लगे थे। एकलौते जवान बेटे जतिन की मनमानियाँ कामता प्रसाद जी की नींदें खराब करने लगी थीं। बेटा छब्बीस बरस का होने वाला था....पर अभी तक खुद की कमाई शुरू नहीं की थी। सालों-साल मन्नत मांग कर जो जानकी देवी और कामता प्रसाद की आँखों का तारा बना....अब वही जतिन आँखों की कोर में छिपी नमी बन गया था।

ऐसा भी नहीं था कि जरूरत से ज्यादा लाड़,प्यार और दुलार मिलने से वो बिगड़ गया हो। माँ-बाप दोनों ही बहुत संस्कारवान और संतुलित थे। बस समय साथ नहीं था। 

हर चैथे-पांचवें दिन की यही रामायण थी। युवा बेटे को ऑफिस जाने के लिए प्रेरित करना कामता प्रसाद और जानकी के लिए बहुत टेड़ी खीर थी। ऐसा भी नहीं था कि उसको वकालत की पढ़ाई उसकी मर्जी के बगैर करवाई गई हो। पर जिसका मन कहीं और रमा हो.....उसका कोई क्या करे।

‘बाऊजी कल से समय पर ऑफिस पहुंच जाऊंगा। आप चिंता ना करें।’....ऐसा हर बार बहुत शांति से बोलकर जतिन अपने बाबूजी को शांत कर देता। पर कभी नियमित रूप से ऑफिस नहीं पहुंचता। पिछले दो साल से वो ऐसा ही कर रहा था। 

जतिन के ऑफिस पहुंचने का समय दो बजे के बाद होता। वो भी हफ्ते में दो या तीन दिन। कामता प्रसाद के गुस्से और प्यार से समझाने पर भी जतिन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। 

कामता प्रसाद अक्सर थक-हार कर पत्नी जानकी को बोलते.. 

‘‘जानकी! जतिन को समझा-समझा कर थक गया हूँ। यह लड़का क्यों नहीं समझता रात-दिन जो सुविधाएं मिल रही हैं उनको अर्जित करने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है। लड़का जब तक कमाए-धमाये नहीं मैं तो उसके शादी-बयाह का भी नहीं सोच सकता। न जाने कब तक हम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होंगे।”

‘‘आप शांत हो जाइए। हम दोनों अपना बहुत खून जला चुके हैं। आपकी और मेरी बहुत गुस्सा करने की उम्र अब नहीं रही। चैदह-पंद्रह बरस की उम्र से ही वो हमसे ज्यादा अपने गुरु की सुनता रहा है। मुझे तो लगता है इसने जन्म  हमारे यहाँ लिया है पर इसका घर कोई और है।” जानकी बोलते-बोलते रूआँसा-सी हो गई। फिर खुद से ही बुदबुदाने लगी..  

‘पहले औलाद की चाहना में मंदिर-मंदिर फिरो....पालो-पोसो....फिर वो रात-दिन किसी और की बातों को सुने और उनकी चाकरी ऐसे करे.....जैसे खुद के घर में तो मूर्खों का वास है। हर बार समझाने की कोशिश करती हूँ पर जवान लड़के की दलीलों के आगे ममता भी हार जाती है।’

कामता प्रसाद और जानकी जब भी अतीत के पन्ने उलटते उनको याद आता कैसे जतिन चैदह-पंद्रह साल की उम्र से ही स्कूल के बाद खाना खाकर सीधा अपने गुरुजी के घर पहुँच जाता था। फिर रात को ही घर में घुसता था। जब भी वो दोनों पूछते.....बोलता कि गुरुजी के साथ था। बहुत पूछने पर जतिन ने कभी भी संतुष्टि भरा जवाब नहीं दिया। 

शुरू में तो दोनों सिर्फ कयास लगाते रहे कि जतिन का गुरु स्कूल में भी पढ़ाता है तो पढ़ने में मदद करता होगा। पर जब गुरु के यहाँ ज्यादा समय के लिए  रुकने लगा तो दोनों ने सोचा कि कहीं किसी नशे का आदी तो नहीं हो गया। तब कामता प्रसाद जी ने जतिन के पीछे जासूस भी लगाए ताकि पता चल सके कि यह कहाँ जाता है.. किन लोगों के साथ उठता-बैठता है।

कामता प्रसाद के दिमाग में होमोसेक्सुअलिटी से लेकर साधु-बाबाओं से जुड़े सारे केस घूम जाते थे.....जिनको उन्होंने अदालत में देखा था। अपने बेटे के व्यवहार में कभी ज्यादा विकृति दिखाई नहीं दी तो उन्होंने कड़ा निर्णय नहीं लिया।....सच तो यह था कि वो किशोर अवस्था में बढ़ते हुए अपने बच्चे के तेवर से भी आशंकित थे कि वो कोई बड़ा निर्णय न ले ले।  

बढ़ती उम्र के साथ कामता प्रसाद और जानकी के दिमाग में एक ही ख्याल आता कि.. भविष्य में दोनों में से कोई अकेला रह गया तो बेटे से थोड़ी बहुत भी अपेक्षा करें या न करें। बेटे के बारे में जब भी सोचते दोनों का दिमाग भाएं-भाएं करने लगता है। 

जो बेटा वकालत करने के बाद भी अपना भविष्य न सोचे उसका कोई क्या करे। जतिन तो अपनी ही जिंदगी की लुटिया डुबाने के लिए तैयार बैठा था। 

अक्सर कामता प्रसाद जानकी से बोलते थे....

“जानकी! रोज-रोज हम अपने रात-दिन हलकान करते हैं। एक वो है जिसको अपने माँ-बाउजी की इच्छाओं से ज्यादा गुरुजी की इच्छाओं के बारे में पता होगा। सारा दिन उसका मन और शरीर से उन्हीं के साथ रहता है।”

“हम दोनों को अपने मन को शांत रखना चाहिए..हालांकि मेरा भी मन बहुत खराब रहता है। पर जो हमारा होकर भी हमारा न हो उसका बहुत मत सोचिए।” 

‘‘कैसे शांत हो जाऊँ जानकी.. कुछ दिन पहले जब ऑफिस पहुंचा तो ऑफिस का काम समझाने पर मुझसे बोला.... 

“मेरा मन पूजा-पाठ और साधना में ज्यादा रमता है बाबूजी.. रोज-रोज आपके एक ही बात  बोलने से मुझे अच्छा नहीं लगता.. छोटा बच्चा नहीं हूँ.. ज्यादा मन अशांत हुआ तो ऑफिस तो क्या घर भी नहीं आऊँगा।..” 

मैं उसकी बात सुनकर बहुत भड़क गया था जानकी। मैंने उससे पूछा......

‘कहां जाएगा बता? कौन अपना घर छोड़कर जाता है?’ जानती हो क्या बोला.....

‘‘बाबूजी! गुरु जी का घर मेरा ही है। वह बहुत स्नेह रखते हैं.. उनके बगैर मेरी जिंदगी निरर्थक है। आप मुझसे बार-बार मत कहा करिए। मैं कर लूँगा कुछ न कुछ। मेरे गुरु जी कहते हैं तू मेरी ही संतान है मेरा संबल है। वह मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे। अगर मैंने उनको छोड़ दिया कि मेरा जीवन खत्म हो जाएगा।”

‘‘उनको छोड़ने से तेरा जीवन खत्म हो जाएगा और तेरे न होने से हमारा जीवन......बेटा जतिन सोच तो जरा.....क्या-क्या अनाप-शनाप बोल रहा है..तेरा अपना खर्चा भी तो इसी ऑफिस से निकल रहा है।....अदालत में बहुत सारे केस मैंने देखे हैं....कुछ न कुछ तो तेरे गुरुजी ने भी सोच रखा होगा जो अभी सामने नहीं है....कभी मुझे अपने गुरु जी से मिलवा। मैं भी उनसे बात करके देखता हूं।...” 

जतिन की बातें सुनकर कामता प्रसाद जी उस दिन बहुत आग-बबूला हो गए थे क्यों कि संतान की ऐसी लापरवाही वाली बातें किस बाप के कलेजे को ठंडा करेंगी। जतिन को लेकर कामता प्रसाद या उनकी पत्नी ने स्वप्न देखे थे....वो कहीं न कहीं टूट रहे थे।

दो दिन बाद सच में ही जतिन अपने गुरुजी को लेकर ऑफिस भी पहुँच गया। कामता प्रसाद सोचते थे कि साधनारत आध्यात्मिक साधु चेले-चपाटों को लेकर घूमते नहीं। पर यह तो उसके ऑफिस पहुँच गए थे। तब उनकी समझ आया कहीं न कहीं ढोंग जुड़ा है। 

कामता प्रसाद ने जानकी को सभी बातें विस्तार से बताई। उनको जतिन के गुरु का उठना-बैठना बोलना बहुत साधारण लगा। तब जानकी उनसे बोली.....

“क्या बोल रहे थे इसके गुरुजी वो बताइए...” जानकी को लगा शायद उसके पति को गुरुजी की कोई जानकारी मिल गई है।  

“घोर अक्कड़ और अहंकारी व्यक्ति लगा मुझे। जिसने इसकी मासूमियत और विवेक पर कब्जा कर रखा है।......जब तक ऑफिस में बैठा अपनी ही अपनी बातों को बोलता रहा। मैं बीच में कुछ बोलना चाहता तो बोलने नहीं दे रहा था।....शायद सोच रहा था जैसे बेटे की बुद्धि फेर दी है मेरी भी फेर देगा।.. 

“कितनी देर बैठे इसके गुरुजी?”....

“आधा-पौना घंटा बैठा होगा।.. जब उसको लगा उसकी दाल नहीं गलेगी तो चला  गया। हालांकि जतिन को बर्गालाने के पीछे उसका मकसद क्या है....मैं कुछ-कुछ समझ गया हूँ.......जवान औलाद माँ-बाप को किस-किस तरह से डरा सकती है....आज महसूस कर रहा हूँ। मेरे मरे पीछे भी यह गुरु घर नहीं आना चाहिए.....तुम ध्यान रखना।”.... अपनी बात बोलकर कामता प्रसाद फिर से कल की गुजरी बातों में खो गए।

“शुभ-शुभ बोलिए आप......मैं खाना लगाती हूं हम दोनों खाना खाते हैं। बाकी आप ईश्वर के ऊपर छोड़ दीजिए। वह जो भी निर्णय लेगा हमें स्वीकार करना होगा।”  जानकी ने कामता प्रसाद जी को बीच में ही टोक दिया। 

बहुत ईमानदारी से काम करने वाले कामता प्रसाद जी का हृदय आज पीड़ा से भर गया था। जो रुपया-पैसा उन्होंने अपनी मेहनत से कमाया, खूब लोगों की सेवा में लगाया। पर अब उनको अपनी झोली में छेद ही छेद होते नजर आ रहे थे। 

घर का काम हो या ऑफिस का पढ़ी-लिखी पत्नी जानकी का पूरा-पूरा सहयोग था। अपनी ही संतान से हारे हुए आदमी की पीड़ा कोई भुगत-भोगी ही महसूस कर सकता था।

एक रोज सवेरे-सवेरे जतिन को नाश्ते की टेबल पर पाकर जानकी को थोड़ा अचरज हुआ। न जाने कितने सालों से जतिन ने उन दोनों के साथ नाश्ता तो क्या, खाना भी नहीं खाया था। सो जानकी ने जतिन को आखिरी बार समझाने की सोची....

‘‘जतिन तुम अपने बाऊजी की इच्छा का मान कब रखोगे बेटा..” 

“जल्द ही रोज ऑफिस जाना शुरू करूंगा माँ।...मैंने कब मना किया है।”

‘‘जतिन तुमसे कुछ पूछूँ तो सही जवाब दोगे।” जतिन के सहमति में सिर हिलाने पर जानकी ने पूछा..... 

“तुम लोग गुरु जी के साथ किस तरह साधना करते हो....और किन विषयों पर चिंतन-मनन व चर्चाएं करते हो।”

“असंख्य विषय हैं माँ....हम सब बहुत सारे लोग हैं माँ। सभी बहुत पढ़े-लिखे हैं। सब गुरुजी को बहुत मान-सम्मान देते हैं। तभी तो वो सब....” अचानक आगे बोलते-बोलते जतिन ने अपनी जुबान को सख्ती से रोक लिया और बात बदलते हुए बोला....

“हमारे गुरुजी ब्रह्मज्ञानी हैं। जो बोल देते हैं वही होता है। आप दोनों को मेरी कोई बात समझ नहीं आएगी। इसलिए मैं आप लोगों को कुछ भी नहीं बताता। मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं। सब काम सीख लूँगा पर मैं गुरुजी को नहीं छोड़ूँगा।”

“इतनी-कितनी चर्चाएं होती हैं....जो हर रोज आठ से दस घंटे एक साथ होने पर भी समय पूरा नहीं पड़ता। खुद के जीवन के लिए चिंतन-मनन भी करो बेटा ....खुद को दूसरों से हँकवाना भी गलत है।...कितने लोग आते हैं वहाँ?” 

आज जानकी भी जतिन के बात करने के तरीके से चिड़चिड़ा गई क्यों कि जतिन बहुत अनमने ढंग से जवाब दे रहा था। 

अपनी बात बोलकर बगैर माँ की पूरी बात सुने जतिन अपना नाश्ता करके उठ गया। तब जानकी को एहसास हुआ शायद वो उन दोनों की टोह लेने आया था क्यों कि कल उसके गुरुजी ऑफिस पहुंचे थे।

आज नाश्ते की टेबल पर कामता प्रसाद जी माँ-बेटे की बातों को बहुत ध्यान से सुन रहे थे। कल इतना सब होने के बाद वो कुछ भी बोलना नहीं चाहते थे। 

घर में रुपये-पैसे की कमी न होने से जतिन का कोई काम रुक नहीं रहा था। जब भी उसको रुपया चाहिए होता....या तो अपने उस अकाउंट से निकाल लेता जिसको कामता प्रसाद ने ही खुलवाया था या फिर जानकी से मांग लेता। मना करने पर कई-कई दिनों तक माँ से बात नहीं करता। जतिन का इस तरह चोटिल करना जानकी को बहुत आहत करता था। पर जतिन को इस तरह का व्यवहार करके कोई पश्चाताप नहीं होता था।  

कामता प्रसाद जी को तो पूरा विश्वास था कि जतिन रुपयों को गुरुजी और उनकी टोली पर उड़ा देता होगा। इतनी बड़ी औलाद को हर बात पर टोकना भी तो गले में घंटी बांधने जैसा था। अब जितना कम से कम होता दोनों पति-पत्नी उतना ही बोलते।

उस दिन के बाद जतिन ने तीन से पाँच बजे के लिए ऑफिस जाना शुरू कर दिया। हफ्ता ही गुज़रा होगा कि एक दिन अचानक ऑफिस में काम करते-करते कामता प्रसाद जी को जतिन की उपस्थिति में दिल का दौरा पड़ा। 

जतिन ने जब तक स्टाफ की मदद से उनको गाड़ी में बैठाकर डॉक्टर के पास ले जाने की तैयारी की... उनके प्राण-पखेरू उड़ गए। अपने बेटे को काम सिखाने की उनकी चाहत ने भी उनके साथ ही विदाई ले ली।

कामता प्रसाद जी के यूं अचानक चले जाने से जानकी एक बार तो बौखला गई। पर जतिन की मदद से उन्होंने घर और बाहर से आने वालों की सभी व्यवस्थाओं को संभाल लिया। जानकी बहुत पढ़ी-लिखी व हिम्मती महिला थी। 

कामता प्रसाद जी के स्नेह,प्रेम व सेवा-भाव की वजह से आने वालों का तांतां लगा हुआ था। काफी लोग कामता प्रसाद जी को अंतिम विदाई देने विश्रामस्थल तक गए। कामता प्रसाद जी का अंतिम-संस्कार अगले दिन सवेर-सवेरे ही कर दिया गया।

अन्त्येष्टि वाले दिन शाम को जानकी ने देखा कि जतिन किसी महानुभाव को बड़े आदर सत्कार के साथ अंदर ला रहा था। जिनके पीछे-पीछे कई लोग चले आ रहे थे। 

इस पल में जतिन के मुँह पर पिता विछोह की पीड़ा लेशमात्र भी नहीं थी। उसके चेहरे पर जो चिंता नजर आ रही थी वो यह कि....उस व्यक्ति  को कहाँ बैठाया जाए की गर्मी न लगे...उनको पानी मिला या नहीं। जतिन के लिए उस समय आने-जाने वाले दूसरे सभी लोग गैर-जरूरी हो गए थे। तब जानकी को समझ आया.....यही जतिन के गुरुजी हैं। जानकी उनसे कभी नहीं मिली थी। 

गुरुजी को देखकर जानकी को कामता प्रसाद जी की बात का ध्यान आया। उन्होंने अपने बेटे को भी बोल दिया था....इस आदमी का घर में प्रवेश नहीं होगा। जानकी को अपने बेटे की मति पर बहुत अफसोस हुआ।  

रिश्तेदारों के सामने जानकी कुछ भी नकारात्मक करना नहीं चाहती थी सो वो चुपचाप ही यंत्रवत सब देखती रही। 

तीसरे दिन उठावणा होते ही जतिन ने गुरुजी के यहाँ जाना शुरू कर दिया। यह जानकी के लिए बहुत हिला देने वाला था। अपने बाऊजी की मृत्यु के बाद होने वाले संस्कारों को प्राथमिकता न देकर गुरुजी को प्राथमिकता देना जानकी की समझ से परे था। उसने जतिन को एकांत में बहुत धीमे स्वर में टोका भी...

‘‘जतिन तुमने तो उठावणा होते ही अपने गुरुजी के यहाँ जाना शुरु कर दिया। तुम्हारी गुरुजी ने नहीं समझाया...कि पहले पुत्र-धर्म निभाओ।‘‘

जानकी की बात पर जतिन ने अपना स्पष्टीकरण दिया कि उठावणे के बाद लोग अपने-अपने काम पर निकल ही जाते हैं। इसलिए मैंने भी जाना शुरू कर दिया। मैं एक दिन के लिए भी वहां नहीं जाता तो मुझे बहुत खालीपन लगता है।”...

जतिन ने माँ से सलाह लिए बगैर खुद ही जाने का निर्णय ले लिया था। जानकी को यह बात बहुत आहत कर गई।

“गुरु जी के यहां ऐसे कौन-सा काम करते हो? तुम को नहीं लगता तुम को अपनी मां के पास रुकना चाहिए था।” बोलते-बोलते जानकी को रोना आ गया। वैसे ही पति का यूं अचानक चले जाना उसको बहुत तोड़ गया था।

‘‘ठीक है आप कहती हैं तो थोड़ी देर के लिए ही जाऊंगा.. आप निश्चिंत रहें। उस दिन के बाद जतिन ने सवेरे दो घंटे के लिए जाना शुरू कर दिया। पर उसके गुरु जी और उनके शिष्यों ने शाम के समय कामता प्रसाद जी के घर पर जमघट लगाना शुरू कर दिया। 

जानकी को लगातार तेरह दिन तक गुरुजी और उनके शिष्यों के दर्शन, न चाहते हुए भी करने पड़े। जानकी निशब्द मूकदर्शक बनी दिल-मसोस कर रह गई। कुछ ज्यादा बोलती तो लोग उसके लिए भी अनाप-शनाप बातें बनाते। 

कामता प्रसाद के जाने के बाद चैथा या पाँचवा दिन होगा कि किसी काम की वजह से घूमते-फिरते अनायास ही जानकी का ध्यान गुरुजी के पास उठने-बैठने वाले लोगों की आवाजों पर गया। 

आज गुरुजी कामता प्रसाद जी के छोटे भाई के बेटे विजय को अपने पास बैठाकर कुछ बातें बता रहे थे। 

जतिन तुम्हारा बड़ा भाई है न विजय। हम उसके गुरु आज से नहीं सालों साल से है। आज तुमको हम अपने शिष्यों से परिचय करवाते हैं। यह मोहन हैं बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं। यह हमारे यहां रोज ही आते हैं। जब यह परेशान थे हमने इनका मार्गदर्शन किया। इनको बताया क्या करना है क्या नहीं। आज तुम देखों इनके ऊपर लक्ष्मी की कितनी कृपा है।..... जो भी हम सत्कर्म करते हैं यह दिल खोल कर मदद करते हैं। 

यह इंजीनियर श्रीकांत है। बहुत बड़ी जगह पर ऑफिसर थे। पर हमारे एक बार बोलने से अपनी नौकरी को लात मार कर हमारे पास आ गए। अब हमारे यहाँ की सभी व्यवस्थाएं देखते हैं। यह जो तुम्हारे सामने बैठे हैं, एक बड़ी कंपनी में मैनेजर थे। इनको भी हमारे यहाँ आने से बहुत संबल मिलता है।..  

तुम अपने बड़े भाई जतिन को तो जानते ही हो.. जो वकील बनकर पिता की तरह वकालत करना चाहते थे पर चूँकि यह हमारे पास बचपन से ही आ रहे हैं तो हमारा इन पर विशेष प्रेम है । हमने इन्हें वकालत करने से रोका। हमने इनको समझाया और हमारे साथ जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। तुम्हारे भाई जतिन भी हमारा काम देखते हैं। 

आज तुम देखो हमारे पास जो भी लोग आते हैं कितने संतुष्ट है। संसार में रहकर अध्यात्मिक सेवा कर रहे हैं। तुम भी हमारे यहां आओ और हमारी इस साधना से जुड़ें। तुमको बहुत अच्छा लगेगा।

अब जानकी को समझ में आया कि जतिन क्यों वकालत नहीं करना चाहता था। जतिन के गुरु जी की मक्कारियों का आभास अब जानकी को हो चुका था। मृत्यु के अवसर पर भी आए हुए लोगों के बीच भी वो व्यक्ति अपनी मार्केटिंग कर रहा था।

जानकी के कान में जैसे ही यह बातें पहुंची कि गुरुजी ने जतिन को वकालत करने से रोका है। तो उसकी सांस वहीं के वहीं थम कर रह गई। उसको बहुत अफसोस हुआ क्योंकि कामता प्रसाद जी अपने बेटे के लिए क्या-क्या सोचते थे और उनका बेटा....

आज जानकी का कलेजा सीना चीर कर बाहर आ गया था। कैसे करके भी यह तेरह  दिन बीत गए थे और आज की घटना ने जानकी को गुरुजी के सभी मकसदों से उनका चिट्टा खोल कर रख दिया था।  अब जानकी को जीते-जी समझ आ गया था कि कैसे गुरुजी अपने चेलों का उपयोग व उपभोग करते हैं।

तेरहवीं वाले दिन ब्राह्मणभोज था। पूजा-पाठ व संस्कारों से जुड़ा सब विधिवत निबट गया। जानकी ने दुनियादारी निभाने को बेमन से जतिन की पगड़ी रस्म भी करवाई। ताकि लोग उसकी किसी भी प्रतिक्रिया को देखकर प्रश्न न करने लगे। 

अब जानकी भी काफी संभल चुकी थी। पति की क्षति से जुड़े हुए निमित्त को स्वीकारने के अलावा उसके पास कोई चारा भी नही था।  पर अब जल्द से जल्द जानकी को बहुत जरूरी निर्णय लेने थे। वो इतनी समझदार व सक्षम थी कि किसी भी निर्णय को लेने में उसकी ममता बाधक नहीं बनती। जो लड़का अपने बाबूजी के जीते जी घर नहीं लौटा तो अब क्या लौटता। 

जानकी अब चाहती भी नहीं थी कि उसके बेटे के संग-संग गुरुजी की पूरी फौज उनके घर-मंदिर या ऑफिस में प्रविष्ट हो.....और अपनी कुदृष्टि उसके पति की मेहनत की गाढ़ी कमाई पर डाले। जानकी अपने सम्मोहित बेटे को वक़्त के हाथों छोड़ जल्द से जल्द ठगों को घर से निकाल बाहर करना चाहती थी। 

जब पुत्र ही अपना नहीं था तो जानकी उससे जुड़े स्नेह-प्रेम से भी बाहर आना चाहती थी....क्यों कि इन तेरह दिनों में उसके सारे पुत्र-मोह टूट चुके थे। 

  प्रगति गुप्ता, जोधपुर, मो. 9460248348