दुर्घटना

आज की डाक में शोक संदेश आया है।

एक कोने से फटे पोस्ट कार्ड साइज सफेद कार्ड में छपे काले अक्षर। इबारत पढ़ते हुये रामजसी सोच रही है- ऐसे संदेश छपे हुये काले अक्षर मात्र नहीं होते, किसी का शेष हो गया जीवन होते हैं। शिथिल भाव में बोली-

‘’इरावान इस तरह चला गया। सत्ताईस-अट्ठाइस साल का रहा होगा।‘’

पति रहीस सिंह ने उसके कातर मुख को देखा ‘’हाँं आनंद से डेढ़ साल ही बड़ा था।‘’

‘’पर्सों तेरही है। बरखेड़ा चले जाना।‘’

‘’बरखेड़ा लगभग सौ किलोमीटर दूर है। आने-जाने में समय लगेगा। अदालत में कई पेशी लगी हैं। तेरही के बाद अवस्थी जी बरखेड़ा (अवस्थी का पैतृक गाँव) से कृपालपुर लौट आयेंगे। वहाँ मिल आऊँगा। तुम भी चलना।‘’

’’इरावान दोनों बहनों से छोटा अकेला भाई था। निरूपा की क्या दशा होगी ?’’

’’वे तो माँं हैं। इतना बड़ा दुःख सहन करना आसान नहीं होगा। अप्रैल में इरावान की शादी होनी थी। सोचता था शादी में जायेंगे। मातमपुर्सी में जाना पड़ेगा।‘’

अवस्थी का जमीन को लेकर नातेदारों से विवाद चल रहा था। उन्होंने रहीस को अपना वकील लगाया। रहीस दीवानी और फौजदारी के सक्षम अधिवक्ता माने जाते हैं। फैसला अवस्थी के पक्ष में हुआ। तब से दोनों परिवारों में मित्रता है। मोबाइल पर बात होती रहती है। रहीस ने मोबाइल पर काँल कर मालूम कर लिया अवस्थी कृपालपुर लौट आये हैं-

‘’रामजसी, अवस्थी जी आ गये हैं। कचहरी के बाद शाम पाँंच बजे कृपालपुर चलेंगे। रात आठ-नौ बजे तक वापस आ जायेंगे।‘’

‘’कचहरी से जल्दी लौटना। ठंड के दिन हैं। अँधेरा जल्दी होता है।

‘’लांग रूट पर अक्सर रामजसी ड्राइव करती है। इस तरह कुछ अभ्यास कर लेती है। जैसे ही वे शहर की सीमा से बाहर आये वह ड्राइविंग सीट पर आ गई। रहीस उसकी सीट पर चले गये। स्वभाव के अनुसार उसे निर्देश देने लगे-

‘’मजे से चलो.... स्पीड कम........ अँधेरे में गड्ढे ठीक से नहीं दिख रहे हैं........सामने गड्ढा, उधर काटो...... दुर्घटना का एक कारण सड़कों की बुरी हालत है। 

रामजसी का मन भारी है ‘’दुर्घटना शब्द डराने लगा है। इरावान सड़क दुर्घटना में ही तो गया।‘’

अनायास उसका ध्यान आनंद की ओर चला गया-पूना में पढ़ता है। बाइक तेज चलाता है। इस समय कहाँं होगा ?  सड़क पर तो  नहीं ? 

आनंद लम्बे इंतजार के बाद जन्मी इकलौती संतान है। वह कहती- ‘’आनंद, बच्चे हमारी जिंदगी का सबसे सुंदर पक्ष होते हैं। तुम न होते तो जिंदगी पता नहीं कैसी होती ?’’

वह छाती फुला कर हँस पड़ता ‘’मेरा एहसान मानती हो न।‘’ 

रामजसी आनंद के ख्यालों में है।

ठीक सामने अंधा मोड़। मोड़ के इस पार से उस पार का आभास नहीं मिलता। अँधेरे ने जैसे मोड़ का वजूद ही खत्म कर दिया है। उस पार से आ रही तेज प्रकाश वाली बाइक जैसे एकाएक प्रकट हो गई हो। वह पहली बार जान रही थी हादसा इस तेजी से घटता है। उसने तेज टंकार सुनी। हाथ स्टेयरिंग से छिटक गये। डगमगाती कार मोड़ के उस पार आकर रुक गई। नहीं जानती उसने रोकी या स्वतः रुकी। नहीं जानती बाइक अँधेरे में कहाँं गई। उसमें कितने लोग सवार थे। मानो उसका तंत्रिका तंत्र शून्य हो गया हो। रहीस की चीख सुनाई दी- 

‘’क्या करती हो ?’’

रामजसी को लग रहा था  चेतना खो देगी पर चेतना कठोर होती है। एक अज्ञात मजबूती उसे खोने से बचाये रखती है। उसने पीछे देखा। अँधेरे में सब कुछ स्याह था।

‘’कौन था ? कहाँं गिरा ?’’

‘’मेरे सिर पर गिरा। गाड़ी चलाने का भूत सवार है। स्टार्टिंग ट्रबुल आ गई होगी तो एकांत में पड़ी रहना। इधर बैठो।‘’

वह रहीस की सीट पर आ गई। रहीस ड्राइविंग सीट पर बैठकर कार स्टार्ट करने का प्रयास करने लगे।

‘’कौन था ? कहाँं गिरा ?’’ 

‘’होश की बात करो रामजसी। तुम्हारा ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बना है। बिना लाइसेंस के वाहन चलाना गैर कानूनी है। सड़क के दोनों ओर खेत हैं। यदि वहाँं आदमी होंगे, इधर आ सकते हैं, बाइक वाला आ सकता है, कार स्टार्ट नहीं हो रही... थैंक गाँड स्टार्ट हो गई।‘’

वकालत करते हुये रहीस को कानून की धाराओं का विषद ज्ञान है। तेजी से सोच रहे हैं पकड़े जाने पर रामजसी पर कौन सी धारा लागू होगी। रामजसी को रहीस का आचरण अव्यवहारिक लग रहा था। भय से आवाज नहीं खुल रही थी लेकिन बोली-

‘’कार रोको। हमें देखना चाहिये वह कौन है। अकेला है या .............’’

‘’एक बात रट रही हो। सदमें में हो।‘’

‘’वापस चलो। मुझे घबराहट हो रही है। अवस्थी जी के घर में नारमल नहीं रह पाऊँगी।‘’

रहीस समझ गये हैं टक्कर तेज थी। कुछ न कुछ हो गया है पर इस तरह बोले जैसे टक्कर होना गम्भीर बात नहीं है-

‘’लौटेंगे तो पकड़े जायेंगे। हो सकता है बाइकर वहाँं मौजूद हो। कार का नम्बर देख लिया हो। हो सकता है खेतों में जो लोग रहे हों वहाँं आ गये हों। हमें पकड़ लें। वैसे तेज टक्कर नहीं हुई है। बाइकर अपनी राह चला गया होगा। अपने चेहरे को ठीक करो। चेहरे से लग रहा है तुमसे कुछ गलत हुआ है।‘’ 

रामजसी जानती है रहीस अपनी सुरक्षा और पक्ष को सर्वोपरि मानते हैं। एक बार वह रहीस के साथ कार से जा रही थी। कार साइकिल पर सवार स्कूल के विद्यार्थी से टकरा गई। वि।ार्थी गिर गया। कार से उतर कर रहीस ने वि।ार्थी के गाल पर दो तमाचे लगा दिये-

‘’हीरो बनता है। गलती करेगा, मरेगा, मुसीबत मेरी कि मैं कार ठीक से नहीं चलाता .................

स्तब्ध विद्यार्थी स्थिति समझता, लोग जुहाते तब तक रहीस कार भगा ले गये। वह हैरान थी-

‘’क्रिमिनल केस लड़ते हुये हिंसक होने लगे हो।‘’

‘’मैं उसे न मारता तो लोग मुझे मारने लगते। लड़का पैसे माँंगता। आजकल यही होता है।‘’

विद्यार्थी बच गया था। बाइकर का पता नहीं क्या हुआ ? 

रहीस मजबूत दिखना चाहते हैं पर शिथिल पड़ रहे हैं। कृपालपुर की तीस किलोमीटर वाली दूरी पलक झपकते पूरी हो जाती थी। आज मानो पथ खत्म नहीं हो रहा था। किसी तरह अवस्थी के घर पहुँचे। उनका घर गली में है। वहाँं कार नहीं जा सकती। गली के मुहाने पर एक ओर कार खड़ी कर रहीस, कार का अवलोकन करने लगे। हेड लाइट फूट गई थी, कुछ हिस्सा पिचक गया था।

‘’रामजसी नारमल हो जाओ। असाध्य रोग की रोगी लग रही हो।‘’

रामजसी चुप रही। गली पार कर वे अवस्थी के घर पहुँचे। घर वीरान बल्कि करुण प्रतीत हो रहा था। अपने प्रिय के अवसान पर पदार्थ भी शायद दरकता होगा तभी तो रौनक से भरा रहने वाला घर भुतहा लग रहा है। रामजसी को तेज रुलाई आई। वह जब भी यहाँं आई है यदि इरावान मौजूद होता था, सबसे पहले वही बाहर आकर पैर छूता था। 

वह आशीर्वाद देती-

‘’खुश रहो।‘’

वह हँसता ‘’एक नहीं कई आशीर्वाद चाहिये। आई. आई. टी. में अच्छा परसेन्टेज, अच्छा जाँब, अच्छा पैसा, अच्छी कार, अच्छी लड़की...।‘’

निरूपा कहती ‘’यह मुम्बई चला जाता है, इसकी हँसी यहीं रह जाती है।‘’

उसकी हँसी के बिना घर साँंस कैसे ले रहा होगा ?

आहट पाकर अवस्थी ने सदर द्वार खोला। दोनों खामोशी से बैठक में आ गये। बड़ी बेटी अपने घर लौट गई है। छोटी आराधना रुकी हुई है। वह दोनों को बैठा कर निरूपा को भीतर से बुला लाई। न कहने को कुछ, न बताने को। एक मुश्त समय मौन में बीता। रामजसी, इरावान की पुष्पहार वाली तस्वीर देखती रही। बुरे ख्याल जकड़ने लगे-बाइकर तस्वीर तो नहीं बन गया ? आनंद इस समय कहाँं होगा ? सड़क पर तो नहीं ? इरावान-बाइकर-आनंद तीन नाम फेंट रहे हैं। बाइकर को नहीं देखा फिर भी लग रहा है उसका चेहरा इरावान या आनंद से मिलता होगा। उसने आराधना को कहते पाया-

‘’इरावान अपने साथ जाँब करने वाली नीली को पसंद करता था। इसी अप्रैल में दोनों की शादी होने वाली थी। सब खत्म।‘’

रामजसी को लगा इरावान नहीं मरा है, कई संबंध मर गये हैं। किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का मित्र, किसी का भावी पति मर गया है। एक होते हुये भी व्यक्ति अनेक हिस्सों में बॅंटा होता है। बोली-

‘’एक्सीडेन्ट करने वाले पकड़े नहीं गये ?’’

अवस्थी और निरूपा शिथिल हैं। सूचनायें देने का भार पूरी तरह आराधना पर है-

‘’नहीं। किसी की जान चली जाती है, जान लेने वाले छुट्टा घूमते हैं। मेरा दिल कहता है वे जहाँं होंगे, सुखी नहीं होंगे। जो किसी को मरने के लिये अकेला छोड़ जाये वह सुखी नहीं रह सकता। इरावान को वक्त पर उपचार नहीं मिला। मिल जाता तो शायद बच जाता।‘’

रामजसी, रहीस को झिंझोड़ डालना चाहती है-बाइकर की सहायता क्यों नहीं की ? उसे उपचार मिलना चाहिये था। आनंद बाइक तेज चलाता है, यदि उसके साथ ............. उसने बावरी सी दिख रही निरूपा को देखा। निरूपा को ढाढ़स देने आई है पर खुद इतनी विचलित है कि शब्द नहीं मिल रहे हैं। किसी तरह बोली-

‘’बहुत बुरा हुआ। इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता।‘’

आराधना मानो बेसुध में कह रही है ‘’इरावान को साँंप और मौत से बहुत डर लगता था। यदि वह होश में रहा होगा, अपने मरने को समझ रहा होगा, वह समय उसके लिये भारी रहा होगा। खुद को अकेला और लाचार पाया होगा। मुझे उसके न रहने का दुःख तो है ही यह दुःख अधिक है कि वह किस असहायता में गया।‘’

बाइकर भी साँंप और मौत से डरता होगा ? असहायता में मरा होगा ? क्या बच गया होगा ? भगवान करे बच गया हो।

‘’विश्वास नहीं होता इरावान नहीं है।‘’

आराधना इस तरह बोल रही है जैसे उसकी बातें करके ही जीना सम्भव हो सकेगा। 

‘’सेंटीमेंटल था। हाँस्टल में रहता था। एक बार रूम मेट सदानंद के साथ बाइक पर जा रहा था। बाइक सदानंद चला रहा था। पैदल चले आ रहे आदमी से बाइक टकरा गई। आदमी गिर गया। सदानंद बाइक नहीं रोक रहा था। बाइक रुकवा कर इरावान ने आदमी को सम्भाला। सदानंद, इरावान को छोड़कर बाइक भगा ले गया। आदमी ने इरावान के पूरे पैसे छीन लिये। इरावान हाँस्टल पहुँचा। घटना सुनकर सदानंद बोला तुम बेवकूफ हो इसलिये आदमी ने तुम्हारे पैसे छीन लिये। इरावान बोला मेरे पैसे छिन गये पर मेरे दिल पर बोझ नहीं है। इतना सेंटीमेंटल था ..... 

रामजसी के दिल पर बोझ है। उसे इरावान से 

अधिक बाइकर अधीर कर रहा है। तस्वीर की ओर संकेत कर एकाएक कहने लगी-

‘’इतना खूबसूरत बच्चा था। उसकी यह तस्वीर कभी नहीं भूलेगी।

आराधना ऐसे बोल रही है जैसे बोलने से ही छाती पर रखी शिला पिघलेगी-

‘’मरने के बाद भी बेचारे की दुर्गति हुई। पोस्ट मार्टम हुआ। बड़े टाँंकों से देह सिली गई। चेहरा ऐसा काला हो गया था कि लग नहीं रहा था वही इरावान है जो इस तस्वीर में है।‘’

अवस्थी कंधे झुकाये बैठे हैं।

निरूपा की सिसकियाँं तेज हो गईं।

रामजसी पूरी तरह ग्लानि में डूबी हुई।

रहीस ने निरूपा को देखा। रामजसी को देखा। समझ गये रामजसी अधिक देर तक बैठी नहीं रह सकेगी। उन्होंने अवस्थी से चलने की अनुमति माँंगी। फिर आने को कहा। चोरों की भाँंति दबी चाप से बाहर निकल आये।

वापसी के लिये बाई पास वाला लम्बा मार्ग चुना। उनकी वकील बुद्धि विलक्षण रूप से सतर्क थी-हो सकता है बाइकर सड़क पर पड़ा हो। हो सकता है किसी ने पुलिस को सूचित कर दिया हो। हो सकता है वाहनों की चेकिंग चल रही हो, उनकी क्षतिग्रस्त कार पर संदेह .............। 

देर रात घर पहुँचे।

दोनों को नींद नहीं आ रही थी। दिल पर बोझ हो तो नींद नहीं आती। वे, रामजसी को दिलासा देने लगे-

‘’आजकल लोग जान हथेली पर रख कर चलते हैं। तेज गाड़ी चलायेंगे, मर्दानगी झाड़ेंगे, मरेंगे। दस-बीस मिनिट देर से पहुँचोगे तो भारी नुकसान नहीं हो जायेगा। वह बाइकर 

अंधाधुंध स्पीड में रहा होगा।‘’

‘’हो सकता है उसकी गलती रही हो पर ठहर कर देखना चाहिये था।‘’

‘’मैं कम परेशान नहीं हूँ। कार चलाने की तुम्हारी सनक ने यह दिन दिखाया।‘’

‘’जी घबरा रहा है। अच्छी बात करो।‘’

‘’क्या हम चाहते थे ऐसा हो ? हो गया। पछता रहा हूँ। मदद करनी चाहिये थी। मैं इतना असंवेदनशील हो गया। कुछ सूझ नहीं रहा था। तुम घटना को भूलने की कोशिश करो। कई बार अपराधी अपनी बेवकूफी और हड़बड़ाहट के कारण पकड़ा जाता है। पुलिस चाह ले तो अपराधी को पाताल से ढूँढ़ लेती है।‘’

रामजसी को रात भर नींद नहीं आई। सुबह स्थानीय अखबार पढ़ते हुये हृदय गति बढ़ रही थी। पेज नम्बर चार दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या, बलात्कार, मार-पीट जैसी अपराधिक खबरों से भरा रहता है। वह इन्हें पढ़ कर चैंकती नहीं थी। आज समझ में आ रहा है ऐसी खबरों में कितना त्रास और हाहाकार छिपा होता है। उसने अधीरता में पूरा पृष्ठ बाँंच डाला। अंधे मोड़ वाली दुर्घटना का जिक्र नहीं है। उसे तात्कालिक दिलासा मिली। खबर नहीं छपी इसका मतलब मामूली घटना रही होगी। नहीं सोच रही थी अगले दिन का अखबार हृदय को विदीर्ण कर देगा। घटना की जानकारी मिलने से पूर्व अखबार छप चुका था अन्यथा यह आज की नहीं कल की प्रमुख खबर होती। ‘अंधे मोड़ ने ली एक और बली’ जैसे शीर्षक के साथ घटना का सचित्र समाचार छपा है। चित्र में घटना स्थल पर बाइकर औंधा पड़ा था। चित्र के ऊपरी कोने में इन सेट में उसकी जीवित अवस्था की तस्वीर थी। आनंद और इरावान की तरह युवा और खूबसूरत। ................ पीताम्बर पाण्डेय (मृतक) मित्र की बर्थ डे पार्टी में सम्मिलित होने के लिये घर से निकला तब नहीं जानता होगा घर न लौटेगा। वह अंधे मोड़ पर अज्ञात वाहन की चपेट में आ गया। टक्कर इतनी तेज थी कि बाइक से दूर गिर गया। सिर पर गहरी चोटें आईं... पी.एम. रिपोर्ट के अनुसार मृत्यु रात ग्यारह के आस-पास हुई। अधिक रक्त स्त्राव और ठंड को मृत्यु का कारण माना जा रहा है ................. समय पर उपचार मिल जाता तो शायद किसी घर का चिराग असमय न बुझता ........... लोग खुदगर्ज और क्रूर होते जा रहे हैं ................... 

रामजसी आगे न पढ़ सकी। लगा ठीक इसी क्षण दिमाग की कोई शिरा फट जायेगी। हेमरेज हो जायेगा। उसके स्याह मुख को देख रहीस बोले-

‘’क्या हुआ ?’’

‘’देखो।‘’

रहीस ने अखबार थाम लिया ‘’हे भगवान .................’’ 

‘’आनंद के साथ ऐसा हो तो ....................’’

‘’तुम सदमे में हो। भूलने की कोशिश करो।‘’

‘’यह भुला देने जैसी घटना नहीं है। कुछ कहानियाँं ऐसी होती हैं जो नहीं भूलतीं। सच्ची घटना कैसे भूलेगी ?’’ वह मानो बेसुध में कहानी सुनाने लगी‘’... अस्पताल के एक रूम में दो बीमार भर्ती थे। दोनों के बेड आमने-सामने की दीवार से लगे थे। पहले बीमार को हड्डियों की गम्भीर बीमारी थी। वह उठ-बैठ नहीं पाता था। दूसरे बीमार के बेड के पास खिड़की थी। वह खिड़की से दिखने वाली गतिविधियों को सुनाकर पहले का मन बहलाता-बाहर मौसम सुहाना है ........... क्यारियों में फूल खिले हैं........ आज पीले फूल अधिक हैं ....... बच्चे स्कूल जा रहे हैं ................ चारों ओर जीवन है .................। एक दिन दूसरा मर गया। पहला परेशान हो गया। वे गतिविधियाँं कौन सुनायेगा जो उम्मीद देती हैं। नर्स से बोला सिस्टर मुझे खिड़की वाले बेड में शिफ्ट होना है। शिफ्ट होते हुये उसने देखा खिड़की के बाहर काली भद्दी दीवार है। पूँछने लगा खिड़की के बाहर सुंदर बगीचा था न। नर्स बोली नहीं। वह हैरान हुआ इस बेड का मरीज बगीचे के दृश्य मुझे बताता था। नर्स ने चैंक दिया वह तुम्हें हताशा से बचाने के लिये अच्छी बातें करता था ..................।‘’

रामजसी से आगे न बोला गया। वह जी भर कर रोना चाहती है। रोना उसकी जरूरत है। 

उसे हिलक कर रोते देख रहीस को लगा यही स्थिति रही तो दिमागी संतुलन बिगड़ सकता है। उन्हें एकाएक लगने लगा गलती को छिपाना गलती करने से अधिक घातक होता है। यदि मदद की होती, पीताम्बर नाम का यह युवक शायद बच जाता। 

‘’रामजसी खुद को सम्भालो। लोग कहते हैं जन्म और मृत्यु के समय को टाला नहीं जा सकता। जब जहाँं होना होता है, हो जाता है। पीताम्बर को मौत वहाँं खींच ले गई वरना दो-चार मिनिट आगे-पीछे वहाँं पहुँचता। समझ लो यही होना था।‘’

‘’कहानियों से हम कब सीखेंगे ? एक बीमार, दूसरे बीमार को उम्मीद देना चाहता है। हमने पीताम्बर को मरने के लिये छोड़ दिया ............. संवेदनायें मरने लगें तब मान लेना चाहिये दुनिया खत्म होने वाली है।‘’

रहीस को रामजसी से डर लगने लगा। इस घटना ने इसके शब्द, अर्थ, संदर्भ, प्रयोजन बदल दिये हैं। किसी के सम्मुख भेद खोल सकती है। इसे सदमे से बाहर लाने के लिये कुछ अच्छी बातें करनी होंगी।

अफसोस।

उन्हें एक भी अच्छी बात नहीं सूझ रही थी।

द्वारा श्री एम. के. मिश्र, 

    सुषमा मुनीन्द्र] रीवा रोड, सतना (म.प्र.), 

    मो. 08269895950