संपादकीय

                             



‘साहित्य नंदिनी‘ की साक्षात्कार शृंखला का प्रथम पुष्प अर्पित करते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है। इस शृंखला का सूत्रपात सहज बातचीत के सिलसिले में ही हो गया। चर्चा साक्षात्कारों की चली तो बहल जी ने विशेष दिलचस्पी प्रदर्शित की। विद्यार्थी काल से ही साक्षात्कारों की तलब ऐसी लगी कि अभी तक भी छूटने के नाम नहीं लेती... जहां कुछ विशिष्ट दिखा व लगा....उसको जानने व पाठकों तक पहुंचाने की उत्कंठा कहीं न कहीं इसका हेतु बन जाती। विशिष्ट रचनाकार की इन विशिष्ट अनुभूतियों व अनुभव का आनंद व्यष्टिपरक ही न रह जाय, इसे समष्टिपरक बनाने का तात्पर्य है किसी पत्र-पत्रिका की तलाश।

कुछ न कुछ अंतराल बाद, किसी न किसी बहाने उसका दैवीय उपक्रम गाहे-बगाहे स्वतः ही बन बैठता। इसकी व्यावहारिकता का अनुभव यानी उनसे मुलाकात की बात का रहस्य उन्हें पूर्व से था ही, यह सुन बहल जी का आग्रह रहा कि ....कुछ इस तरह का सहयोग आप ‘साहित्य नंदिनी‘ को भी दे दें तो मजा आ जाएगा। यद्यपि ‘अभिनव इमरोज‘ के कुछ विशेषांकों को तो हमने पूर्व में निकाला ही था......तो ‘साहित्य नंदिनी‘ व उनकी बात अवश्य विचारणीय लगी। उन्होंने पत्रिका के प्रत्येक अंक में रचनाकार की जयंती के अनुरूप एक साक्षात्कार देने की बात कही... जो पत्रिका की रूप-सज्जा व स्तरीयता में किंचित सहायक हो।

उनके वृद्ध मन में उमड़ते बाल-उत्साह को देखकर हमने उनकी जिज्ञासा की रेखा और लंबी खींच दी कि.....‘ऐसा क्यों न करें कि उस माह का पूरा का पूरा अंक उसी व्यक्तित्व व उनके कृतित्व को ही समर्पित हो जाय.... लिहाजा उनकी संपूर्ण साहित्य साधना एक ही साक्षात्कार के माध्यम से प्रतिबिंबित करने का प्रयास किया जाय।  प्रायः साक्षात्कार किसी विशिष्ट घटना अथवा प्रयोजन पर ही अवलंबित होते हैं। एक दौर में पत्र-पत्रिकाओं में इसकी धूम रहती थी....व उसी अनुपात में पाठकों की छटपटाहट व बेसब्री भी।

यह सुन उनकी हिमालयी मुखाकृति पर मानों वासंती आभा खिल आई। यह कैसे संभव होगा ?..... नौकरी, लेखन, मैं....देहरादून-हरिद्वार व वे दिल्ली....! मैं भी सोचता..... लेकिन ‘जिसने विचार दिया.... वही संयोजन भी करेगा....होगा। जून माह में किस बड़े साहित्यकार की जयंती पड़ती है ? ‘विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी की‘ बहल जी का तपाक उत्तर था। समय कम है लेकिन प्रयास करेंगे। 

कोरोना महामारी को प्रकोप चरम पर.....इसी अनुष्ठान की प्रमुख अगली कड़ी....अगले अंक में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नरेंद्र मोहन जी का साक्षात्कार, जिसकी प्रश्नावली का उत्तर देते-देते उनका विदा होना अत्यंत हृदय विदारक रहा....  प्रो. तिवारी जी भी अस्वस्थता से जूझ रहे थे .....लेकिन पत्रिका के संकल्प व प्रयोजन को समझ उन्होंने स्वस्थ होते ही उत्तर प्रेषित करने का न केवल आश्वासन दिया अपितु अपने कथनानुसार नियत तिथि तक उत्तरों का प्रेषण कर उत्साहवर्धन किया और तभी अभीष्ट की इस प्रथम कृति की सहज संकल्पना यथार्थ रूप में साकार हो सकी। 

साहित्यकार की मूल संवेदना का सुस्पष्ट दर्पण होता है.....उसका भावप्रवण साहित्य ....जिसे वह अपनी तपश्चर्या व साधना से सींच-सींचकर प्राणवान बनाता है। यद्यपि साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व का समूचा आकलन उसकी अन्यान्य कृतियों के माध्यम से खंड-खंड रूप में प्रतिबिंबित होता हुआ सुधी पाठकों के समक्ष पहुंचता ही है..... किंतु जब लेखक की कहानी उसी की जुबानी में अक्षरशः अभिव्यक्त होती है तो वह पाठकों में रोचकता व जीवंतता के समानांतर जिज्ञासा भी जगाती है। 

इस शृंखला का गंतव्य व मंतव्य, भविष्य के गर्भ में है .......किंतु प्रयास रहेगा कुछ-कुछ अंतराल बाद इसका नैरंतर्य बना रहे। इससे सुधी पाठकों को रचनाकार के वृहद व्यक्तित्व का हेंडी संस्करण संक्षिप्त रूप में समग्रता के साथ मिलता रहेगा। 

श्रद्धेय प्रो. तिवारी जी के सहयोग हेतु आभार व बहल जी का यह उत्साह कुछ नया करने के संकल्प को अवश्य मूर्त रूप देगा......पाठकों को भी यह उपक्रम अवश्य रुचिकर लगेगा...साहित्य व संस्कृति के विविधमुखी वैचारिक सोपानों के इस भावमाल का सौरभ को सुखद लगे,...यह प्रयास रहेगा।  इसी विश्वास के साथ,

आपका,

प्रोफेसर (डॉ.) दिनेश चमोला ‘शैलेश’, डीन,  आधुनिक  ज्ञान  विज्ञान संकाय एवं अध्यक्ष,  भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान विभाग, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार

23, गढ़ विहार,  फेज -1, मोहकमपुर, देहरादून -248005, मो. 09411173339

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