तू बड़ी खर्चीली है

तू बड़ी खर्चीली है 

मां बचपन में मुझसे कहा करती थी

तेरी फिक्र रहती है मुझे

तू अपनी सारी गुल्लक दूसरों पर लुटा देती है 

याद आती है मुझे उसकी फिक्र 

बात-बात पर मेरा अपनी जरूरतों पर ध्यान ना देने का जिक्र

सच्ची अब कितनी बड़ी हो गई हूं

मां भी नहीं रही अब तो, सो रोके कौन

अजीबोगरीब सी मेरी फिजूलखर्ची पर टोके कौन 

जब भी जिंदगी की राहों पर नजर दौड़ाती हूं 

अपने बारे में यही पाती हूं बस-

कि कितनी फिजूल खर्च हूं मैं

अपने मन का प्यार दुलार

वक्त-बेवक्त, चेत अचेत, हर पल दूसरों की फिक्र

गुल्लक की बातें छोड़ो

खुद को ही खर्च कर देती हूं, बेहिसाब, बेवजह, बेसबब 

अपना समय, अपनी भावनाएं, लुटाती रहती हूं।

कोई उनका मूल्य समझे ना समझे 

अपने आंसू, अपनी मुस्कुराहटें, मोहब्बतें और चाहतें....

उफ्फ !!!

कैसे खर्च कर देती हूं सब 

कई बार वादा करती हूं खुद से 

आज से थोड़ा वक्त,

थोड़ी परवाह तेरी भी करूंगी

पक्का.....

और रात को आईने से नजरें चुरा के सो जाती हूं,

चुपके से, खुद के कान में बोल कर,

अच्छा चल, पक्का कल

कितनी फिजूल खर्च हूं,

कि जिंदगी की गुल्लक से 

ढूंढ ही नहीं पाती अपने लिए कुछ पल







मीनाक्षी मैनन, होशियारपुर, मो. 9417477999