संपादकीय









एक चिंतक शापेनहावर ने खूब कहा है:

‘‘जीवन के पहले चालीस साल मूल पाठ है

और अगले चालीस साल इस पर व्याख्या’’

इस फलसफे का अभ्यास, अनुकरण एवं निर्वाहन करते हुए भाई साहब धनसिंह खोबा ‘सुधाकर’ जी स्वतः प्रमाण हैं। भारतीय राजस्व सेवा (I.R.S.) आयकर विभाग, दिल्ली में संयुक्त आयकर आयुक्त के पद से सेवानिवृत्ति उपरांत दिल्ली हाईकोर्ट के एडवोकेट रहते हुए साहित्यिक स्वाध्याय एवम् साहित्य सृजन में रत। परिणाम एवं प्रमाण.... 

6 ग़ज़ल, दोहा-संग्रह और अन्य कृतियाँ और जब 7वाँ ग़ज़ल संग्रह की पांडुलिपि मेरे पास आई तो इस बुलंद ख्याल शख़्सियत के प्रति मेरा सर श्रद्धा से झुक गया और मुझे अज़ीम शायर आनंद नारायण मुल्ला की याद आ गई जो पेशे से वक़ील और बाद में जज बने थे।

‘सुधाकर’ जी के ग़ज़लों से गुजरते हुए मैंने महसूस किया कि उनकी रचनाओं का चिंतन मूलतः उनके अपने ही संशयों और संघर्षों और उनसे मुक्ति का प्रयास है। उसी में उन्होंने अपने लिए समाधान भी ढूँढ लिए हैं। और अपनी ही शख़्सियत को खुद ही साकारात्मक दृष्टिकोण से परिभाषित भी किया है। 

यूँ तो शबनम-सा लगता हूँ ठंडा

इक निहां 1 शोला-सा मैं शरर 2 हूँ

संघर्ष करते हुए जो ताप उन्होंने झेला उसकी आँच अपने तक ही महदूद रखी और जो सुख से अर्जित प्रेम और सद्भाव वह दूसरों के साथ साझा किया-

ताप पीकर दूँ ठंडी छाया

रह गुज़र में खड़ा एक शजर 3 हूँ 

लेखक अपनी शख़्सियत को पारदर्शी धरातल पर आंकते हुए लिखते हैं:

इश्क़ में जल चुका है जो लौ पर

मैं वही इक पतंगा अमर हूँ

खुद को समझ अनल्हक 4 ‘सुधाकर’

लोग कहते हैं मैं आशुफ्ताः 5 सर हूँ

इस ग़ज़ल संग्रह की तमाम ग़ज़लें तजुर्बात की वीना पर अदबी बुलंदी के आसपास पहुँची हुई महसूस होती हैं। अक्षर-अक्षर सुधाकर जी का साहित्य के प्रति समर्पण प्रतिविम्बित होता हुआ नज़र आता है। ‘सुधाकर’ जी को इस ग़ज़ल संग्रह के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ:-


1. छुपा हुआ, 2. चिंगारी, 3. वृक्ष, 4. मैं ब्रह्म हूँ, 5. सिर फिरा, पागल