हँसो हँसो यार हँसो

  हरिशंकर राढ़ी, वसंतकुंज एन्क्लेव, नई दिल्ली, मो. 09654030701

इधर व्यंग्य और हास्य के अंतर्संबंधों को लेकर विमर्श का एक अघोषित दौर चला है जिसमें व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति हो या नहीं, हो तो कितनी हो, इस पर तर्क दिए जा रहे हैं। इस संबंध में प्रेम जनमेजय का स्पष्ट मत है कि व्यंग्य को हास्य की वैशाखी की आवश्यकता नहीं होती। व्यंग्य के एक विद्यार्थी के रूप में मैं भी प्रेम जनमेजय के इस कथन का समर्थक हूँ। असली व्यंग्य तो वही है जो पाठक सहित लक्षित व्यक्ति या व्यवस्था को मरोड़ दे, झकझोर दे। विसंगति को इतना चुभे कि वह संगति में आ जाए। किंतु ऐसा व्यंग्य कम पैदा होता है। वस्तुतः आजकल परंपरा और पठनीयता की दृष्टि से हास्य को व्यंग्य का एक अनिवार्य हिस्सा मान लिया गया है। पाठकीय मानसिकता कुछ इस तरह की बन गई है या बना दी गई है कि व्यंग्य में हास्य होगा ही।

प्रेम जनमेजय के उपरोक्त मत को देखते हुए जब उनके नए व्यंग्य संग्रह ‘हँसो हँसो यार हँसो’ पर दृष्टि जाती है तो एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि हास्य को व्यंग्य की वैशाखी न मानने वाले जनमेजय ने इस संग्रह का नाम ऐसा क्यों रखा? क्या इस संग्रह के व्यंग्यों में हास्य की प्रचुरता है? इसमें संदेह नहीं कि हास्य अपनी समस्त अच्छाइयों के बावजूद विषय की गंभीरता को कम कर देता है। प्रथम दृष्टि में ही यह प्रश्न उठने लगता है कि क्या पे्रम जनमेजय अब हास्य को प्रमुखता देने लगे हैं? लेकिन संग्रह के अंदर उतरने और कुछेक व्यंग्यों को पढ़ने के बाद लगता है कि यह शीर्षक तो मौजूदा व्यवस्था पर ही एक व्यंग्य है। कभी-कभी विसंगतियाँ जब ज्यादा बढ़ जाती हैं तो एक ऐसी स्थिति आती है कि उन पर हँसी के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता। अर्थात् हमारे परिवेश की जो स्थिति हो गई है, उस पर केवल हँसा जा सकता है। इस संग्रह के तमाम व्यंग्य व्यक्ति एवं व्यवस्था की सीवन ऐसे उधेड़ते हैं कि उन पर हँसी आ ही जाती है।

अमन प्रकाशन कानपुर से प्रकाशित इस व्यंग्य संग्रह में कुल चालीस व्यंग्य हैं। सामग्री में कथ्य और शैली की दृष्टि से विविधता दिखती है किंतु चुभन और चिकोेटने से लेकर मरोड़ने की विशिष्टता लगभग हर शीर्षक में समानरूप से मिलती है। पहले व्यंग्य ‘हँसो हँसो यार हँसो’ को ही संग्रह का नाम दिया गया है जिसमें आज की परिस्थिति में हँसी को लेकर प्रकारान्तर से प्रश्न उठाए गए हैं। वास्तविक हँसी को तो समाज के स्वार्थ, भ्रष्टाचार और पाखंडों ने खा लिया है। शेष रह गई है बनावटी हँसी या बेशर्म हँसी। हँसी के कृत्रिम बाजार सजने लगे हैं और न हँस पाने वाले लोग कटघरे में खड़े कर दिए गए हैं। अपने पात्र के माध्यम से व्यंग्यकार एक जगह कहता है- “कॉमेडी चैनल में आपको हँसी नजर आती है? औरत का सरेआम मजाक उड़ाया जाए, कोई पैंट के ऊपर लंगोट पहनकर आ जाए या किसी का कच्छा उतर जाए तो आपको हँसी आती है!”

ज़ाहिर है कि आज की हँसी कुछ ऐसी ही अनैतिक और मूल्यहीन हो चुकी है। अब प्रायः वही हँसी सुनने को मिलती है जो द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय गूँज रही थी। या फिर मूल्यों के मामले में कंगाल हो चुके समाज में प्रायः हर हँसी खोखली हो चुकी है या फिर दंभ का उद्घोष मात्र। यहाँ एक व्यंग्यकार का दायित्व होता है कि वह आडंबर को उधेड़कर रख दे जिससे समाज को अपना सही अक्स दिखाई दे।

प्रेम जनमेजय अपने तमाम व्यंग्य शीर्षक प्रसिद्ध उक्तियों, पंक्तियों, कहावतों और मुहावरों से खींचते हैं। कभी उनमें किंचित परिवर्तन करते हैं तो कभी ज्यों का त्यों रख देते हैं। किंचित परिवर्तन से शीर्षक में ही व्यंग्य उपज जाता है जो आगे की विषयवस्तु को इंगित कर देता है। इस संग्रह में भी उन्होंने अपनी इस खासियत को बनाए रखा है। ‘कबिरा खड़ा बजार में’, ‘लौट के बुद्धू घर न लौटे’, ‘जैसे शूकर के दिन बदले’, ‘बंदउं संत असज्जन चरना’, ‘मेरे पदपति! मेरे विशाल!’ और ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’ आदि उल्लेखनीय हैं। कथा, संवाद और चिंतन शैली का प्रयोग करके व्यंग्यकार ने अपने व्यंग्यों से मारक प्रहार किया है। व्यंग्य जैसे-जैसे गंभीर होता है, वह स्वभावतः चिंतन शैली को पकड़ने लगता है। कथा एवं संवाद शैली से भी अच्छे व्यंग्य लिखे गए हैं किंतु चिंतन में जाते ही व्यंग्य का अपना एक दर्शन शुरू हो जाता है। इस हिसाब से ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’ एक सधा, विद्रूपता का दर्शन उद्घाटित करता हुआ प्रमुख व्यंग्य है। इस व्यंग्य से कुछ पंक्तियां तो सर्वथा उद्धरणीय हैं - ‘‘संपन्न परिवारों में जवानी की कोई उम्र नहीं होती। साधन संपन्न बच्चे जल्दी जवान होते हैं और साधनहीन जल्दी बूढे़ होते हैं। मध्यमवर्गीय उम्र के हिसाब से जवान होता है। पर इस वर्ग को जल्दी जवान करने के फेर में बाजार लगा हुआ है।” दूसरा उदाहरण यहीं से देखिए- “सत्ता के मजनूं कब्र में पैर सहित धड़ जाने तक जवान रहते हैं। उनको निकम्मा करने की हिम्मत गालिब में भी नहीं है। उनको तो केवल हाई कमांड ही निकम्मा कर सकता है।’’

व्यंग्य में कहीं अतिशयोक्ति का पुट होता है तो कहीं कटु यथार्थ का। इस व्यंग्य संग्रह के अनेक व्यंग्य कटु यथार्थ लेकर चलते हैं। जन्मदिन के बहाने परोसे जा रहे दिखावटी प्रेम पर प्रेम जनमेजय ‘मेरा जन्मदिन और होलीदिन’ में अच्छी चुटकी लेते हैं। नई पीढ़ी की बेपर उड़ान पर बढ़िया कटाक्ष देखने को मिलता है। वे लिखते हैं- “आप मुझसे पूछ रहे हैं कि क्यों डरने लगा हूँ। जरा आप अपने आपसे सवाल कीजिए कि आप अपने बेटे/बेटी से क्यों.... आपको जवाब मिल जाएगा। जवाब क्या मिल जाएगा, आगे से आप ऐसा बेहूदा सवाल तक नहीं करेंगे। हुजूर, आजादी के आस-पास जन्मी हमारी पीढ़ी ऐसी पीढ़ी है जो अपने पिता से भी पिटी है और आजकल अपनी संतानों से भी....।” एक और गहन निरीक्षण देखें - “मेरा बेटा भी मुझे बर्थ-डे विश करता है। पहले वो माँ के हाथ की बनी गुजिया खा लिया करता था, अब उसे गुजिया खाने में शर्म आती है।” बाजारवाद किस तरह हमारे जीवन और पारिवारिक संबंधों पर हावी हुआ है, यह इस कथन में तलाशा जा सकता है।

इधर प्याज बार-बार उछली है। प्याज पर सरकार जाने का रिकॉर्ड बन चुका है। प्याज पर लिखा भी खूब गया है। ‘प्याज भया उदास’ में प्रेम जनमेजय ने प्याज के बहाने कई विद्रूपताओं पर प्रहार करते हैं। यहाँ वे लिखते हैं- “पर अज्ञानी धोबी नहीं जानता कि चुनाव में वोट देने वालों के दिन नहीं बदलते, चुनाव जीतने वालों के दिन बदलते हैं।” आगे और देखिए - “इस देश में जो जितना महँगा और अनुपलब्ध है, वो उतना ही महान है। महान बनने के लिए अनुपलब्ध होना पड़ता है।”

दिनकर की पंक्ति ‘मेरे नगपति! मेरे विशाल!’ की पैरोडी करते हुए ‘मेरे पदपति! मेरे विशाल’ को लेखक ने एक पूर्ण व्यंग्य निबंध बना दिया है जिसमें जगह-जगह पद लालित्य का बोध होता है। एक बानगी देखने योग्य है - “हे पदपति, तू शहद का छत्ता है जिससे मनचाहा शहद पाने को ज्ञानीजन लार टपका रहे हैं। तेरे आते ही भ्रष्टाचार की कोयल कूकने लगती है और वसंत छा जाता है...।” 

संग्रह में जनमेजय जी के प्रिय पात्र राधेलाल यत्र-तत्र दिख ही जाते हैं। उनकी टिप्पणी, अन्य पात्रों से संवाद लेखन को प्रवाहित करता है। कहा जाए तो इस संग्रह में अधिकतर व्यंग्य चिंतन या निबंध शैली के हैं। कथात्मक प्रयोग कम दिखता है। संवादों का प्रयोग भी यत्र-तत्र ही दिखता है। हालाँकि ऐसा जरूर लगता है कि व्यंग्य के विषय अनायास आते गए हैं किंतु उन पर कटूक्तिप्रद चिंतन के लिए आसन लगाया गया है। जो कुछ भी बारीक निरीक्षण से होकर गुजरा है, उसे बिना गंभीर टीप के लेखक ने जाने नहीं दिया है। कहीं-कहीं उसे पाठक की समझ के लिए छोड़ दिया गया है किंतु प्रायः उसका सत्त निकालकर सामने रखने की कोशिश की गई है। व्यंग्य के लिए यह आवश्यक है कि अब वह एक कड़वा ही सही, अपना दर्शन देता चले। संभवतः यह व्यंग्य की प्रौढ़ावस्था होती है जो व्यंग्यकार के अनुभव एवं सूक्ष्म दृष्टि से ही साकार होती है।

संग्रह की भूमिका में लेखक ने व्यंग्य को लेकर आवश्यक एवं उपयोगी विमर्श किया है। यह सच है कि आज जब व्यंग्य एक विधा के रूप में स्थापित हो चुका है तब कई व्यंग्यकार या आलोचक अपनी दशकों पुरानी धारणा को लेकर बैठे हैं और व्यंग्य को विधा मानने के बजाय एक स्पिरिट मानकर ही चल रहे हैं। इतनी लंबी और गंभीर यात्रा कर लेेने के बाद व्यंग्य के आज के स्वरूप को विधा मानकर व्यंग्य के वर्तमान और भविष्य की ओर देखना चाहिए। बातें तो और भी हैं, लेकिन वे बहस और विमर्श की विषय हैं।

देखा जाए तो ऐसे व्यंग्य संग्रह समय की आवश्यकता हैं। अखबारी व्यंग्यों के चलन के बीच तीन-चार पृष्ठ के व्यंग्य अलग स्वाद देते हैं। मुझे लगता है कि ऐसे व्यंग्य का एक अंदरूनी फार्मेट होता है, एक पूरा शरीर होता है और पूरे शरीर का अपना आकर्षण और शक्ति होती है। ऐसे व्यंग्य लिखे जाने चाहिए जो अपेक्षाकृत लंबी यात्रा करा सकें, जिनमें सफर का आनंद हो। छोटे व्यंग्य की सत्ता को नकारा नहीं जा सकता, किंतु एक निंबंधात्मक व्यंग्य  साहित्य  एवं  समाज दोनों के लिए बेहतर हो सकता है। यह संग्रह इस मानक को काफी हद तक पूरा करता है।

मेरे पास पहुंचा यह संग्रह पेपर बैक में है। मुद्रण और मुद्रा की दृष्टि से इसे उचित कहा जा सकता है। हाँ, शीर्षक ‘हँसो हँसो यार हँसो’ में यदि विराम चिह्नों का उचित प्रयोग कर दिया गया होता तो बेहतर होता। मुखपृष्ठ पर भी कुछ अतिरिक्त ध्यान दिया गया होता तो अच्छा होता। 

पुस्तक का नामः ‘हँसो हँसो यार हँसो’ (व्यंग्य संग्रह), लेखकः प्रेम जनमेजय, प्रकाशकः अमन, प्रकाशन रामबाग, कानपुर - 208012, पृष्ठः 144, मूल्यः 195/- (पेपर बैक संस्करण)