एक बनिया-पंजाबी लड़की की जैन स्कॉलर बनने की यात्रा

आपकी विकास यात्रा आपके होश सम्भालते ही आरंभ हो चुकी थी, आपकी महत्वाकांक्षाओं का बहता नीर, जिज्ञासाओं के आवेग से बहता हुआ अंतस की खोज में निरंतर गति से अब एक सरिता का रूप धारण कर चुका है। आपकी आत्मविकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आप की साकारात्मकता है जो आपके सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की प्रेरणा देता है, साहित्य के प्रति निष्ठा भी संपुष्ट संस्कारों की देन है। दो अलग-अलग परिवारों की सांस्कृतिक परिवेश से उपजा आप का व्यक्तित्व उस साकारात्मकता से निर्मित हुआ है जिसने आपकी विचारधारा को संपुष्ट ही नहीं सशक्त एवं संप्रेषणीय भी बनाया है। यह आपकी साकारात्मकता ही है जिसने आप के व्यक्तित्व को परिष्कृत और जीवन मूल्यों से समृद्ध भी किया है। मेरी शुभकामनाएँ -संपादक


आत्मकथ्य


डॉ. मेधावी जैन, गुरुग्राम, मो. 981120773

मेरा जन्म एक मिश्रित सांस्कृतिक वाले परिवार में जनवरी, 1977 को हुआ। मेरे पिता श्री बिमल गुप्ता, बनिया एवं मेरी माता श्रीमति शशि किरण पाहुजा, पंजाबी जाति से हैं। बचपन से ही मुझे इन दोनों संस्कृतियों को नजदीक से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दोनों ही सभ्यताओं के लोग बेहद प्यारे एवं अन्य लोगों की ही भांति अपनी-अपनी कमियां और ख़ूबियां लिए हुए हैं। भारत वर्ष की सबसे बड़ी विशेषता यही है, चाहे हम किसी भी परिवार में जन्म लें किंतु बड़े होने के दौरान हम सभी भिन्न संस्कृतियों से कभी न कभी, किसी न किसी पड़ाव पर वास्ता रखते ही हैं। और यह हमारे व्यक्तित्व को किस कदर उज्जवल एवं भिन्न विचारों को स्वीकारने हेतु अनुकूल बनाता है, इस विषय पर शायद हम कम ही चिंतन कर पाते हैं। इसी संदर्भ में पाठकों को बताना चाहूंगी कि अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान कक्षा छठी एवं सातवीं में मुझे एक सिख स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। अद्भुत बात यह रही कि वहां पंजाबी भाषा सीखना अनिवार्य था एवं उन दो वर्षों के दौरान मैं बाकी सभी सिख लड़कियों के बीच पंजाबी की सर्वोत्तम छात्रा रही। तत्पश्चात कक्षा आठ से कक्षा बारह तक की शिक्षा मसूरी में UP बोर्ड के एक विद्यालय से ग्रहण की, जहां मसूरी में बहुत सी गढ़वाली लड़कियां मेरी अच्छी मित्र रहीं, वहीं UP बोर्ड की कठिनतम हिंदी से भी परिचय हुआ। 

मेरे पास विज्ञान विषय था एवं मसूरी में एक ही डिग्री कॉलेज था जहां इस विषय में उच्च शिक्षा उस समय उपलब्ध नहीं थी। सो मेरा दाखिला फरीदाबाद के एक कॉलेज में कराया गया जहां मैं अपनी मौसी, जो निकट ही बल्लभगढ़ में रहतीं हैं, के घर रही। किंतु हमारी बनाई योजनाओं से नियति को कुछ लेना-देना नहीं होता। कॉलेज में प्रथम छमाही की परीक्षा देते ही कुछ ऐसे हालात बने कि मेरे लिए एक सभ्य जैन परिवार से रिश्ता आया। मेरे पिता ने लड़के को देखा, पसंद किया एवं बहुत ही जल्द मेरी शादी एक जैन परिवार में हो गई। पढ़ाई लिखाई जिसकी कि लंबी योजना थी सब बीच में ही छूट गई। 

आज महसूस होता है कि जीवन में घटित प्रत्येक घटना के पीछे एक ऐसा कारण होता है जो हमारे हित के लिए ही होता है। विवाह के उपरांत मैं एक पूर्णतः भिन्न परिवेश में आ गई चूंकि चाहे लोग बनिया एवं जैन जातियों को एक सा मानें क्यूंकि अधिकतः व्यापारी वर्ग इन दोनों समुदायों से ही ताल्लुक रखते हैं एवं दोनों का खान-पान भी लगभग एक सा ही होता है किंतु सत्य तो यह है कि धर्म की दृष्टि से ये दोनों पूर्णतः भिन्न हैं। शादी से अगले दिन ही पति श्री प्रवीण जैन जी मुझे निकट के एक जैन मंदिर ले गए, जहां उन्होंने नवकार मंत्र से मेरा परिचय कराया। यह मेरा जैन धर्म से प्रथम साक्षात्कार था। हालांकि ससुराल में भी काफी खुला माहौल था क्यूंकि उस समय मेरे आदरणीय श्वसुर स्वर्गीय श्री सुभाष चंद जैन एवं सासू माँ श्रीमति त्रिशला जैन जी एक पंजाबी गुरु माँ को मानते थे, जो हमारी शादी में भी निमित्त बनीं थीं। ख़ैर यह परिचय यहीं तक रहा और मैं गृहस्थी में रम गई। एक-एक कर दोनों बच्चों का जन्म हुआ, पुत्री दिव्यांशी एवं पुत्र सिद्धार्थ हमारे जीवन में आए। समय अपनी गति से चलता रहा।

जीवन में कुछ भिन्न करने की अभिलाषा निरंतर मेरे हृदय में बनी रही। पुस्तकें पढ़ने का शौक बचपन में भी था, जिस शौक ने एक बार पुनः सिर उठाया और सन 2005 के आस-पास मैंने पुनः पुस्तकें पढ़नी आरंभ कीं। इस दौरान जीवन को रूपांतरित करने का माद्दा रखने वाली रॉबिन शर्मा जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘द मॉन्क हू सोल्ड हिज फेरारी‘ पढ़ी। यह पुस्तक जीवन में कुछ शांति लाई। फिर सन 2009 में डॉ. ब्रायन एल. वीस की पुस्तक ‘मैनी लाइव्स मैनी मास्टर्स‘ पढ़ी। इस पुस्तक ने कर्म सिद्धांत एवं जीव तत्त्व को समझने एवं जानने की जिज्ञासा दिल में जगाई। कम शिक्षा ग्रहण कर पाने की कचोट निरंतर दिल में बनी रहती थी इसलिए इस दौरान मैंने कॉरेस्पोंडेंस से BA में दाखिला ले लिया था।

उन दिनों मम्मी-पापा, अब समाधिस्थ, आचार्य बाहुबली महाराज जी के अनुयायी थे एवं कुछ दिनों पश्चात् उन्हीं की शिष्या आर्यिका श्रुत देवी माता जी हमारे घर आई हुईं थीं। मैंने अपनी जिज्ञासाएं उन संग साझा कीं। सन 2010 में गुडगाँव के DLF-4 के जैन मंदिर में शीघ्र ही उनका चातुर्मास आरंभ होने जा रहा था जहां वे तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ का अध्ययन करवाने वालीं थीं। मेरे प्रश्न देख उन्होंने मुझे प्रतिदिन वहां आकर अध्ययन करने का निमंत्रण दिया। मैं कदाचित अनभिज्ञ थी कि जीवन जीने के एक विशाल मकसद से मेरा परिचय होने के साथ ही मस्तिष्क में उपजे-अन उपजे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर मिलने की यात्रा का आरंभ होने वाला है। सदा से ही भीतर उपस्थित एक ऐसी दिव्य ऊर्जा से सामना होगा जो मुझे इसके बाद जीवन में शांति से बैठने नहीं देगी। जो सकारात्मक होगी और निरंतर मुझे ज्ञान पथ पर आगे बढ़ने हेतु प्रेरित करेगी। 

मुझे याद है 26 जुलाई, 2010 का वह दिन, जब मैंने जैन दर्शन की प्रथम कक्षा अटेंड की, शुरू की दो कक्षाओं के बाद ही भीतर एक ऊर्जा का बहाव अनुभव हुआ। कुछ ऐसा अनुभूत हुआ जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। शीघ्र ही भीतर से कुछ विचार उपजने आरंभ हुए जिन्हें कॉपी-पेन ले अभिव्यक्त करना आवश्यक लगा। यह लेखिका बनने की दिशा में कुछ पहले, कच्चे कदम थे। अद्भुत बात यह रही कि इन विचारों का जैन धर्म अथवा दर्शन से कोई लेना-देना न था। वह कुछ ऐसा था जैसे कि कोई यात्रा पहले कभी बीच में कहीं छूट गई हो एवं ज्ञानार्जन ने उस छूटी, सोई यात्रा को जगा दिया हो। ख़ैर चातुर्मास के चार महीने समाप्त हुए जो उस औसत पुरानी 

मेधावी के पुनर्जन्म का निमित्त बने। इस नवीन जन्म ने ज्ञान की अलख पिपासा भीतर जगा दी। कहते हैं न कि जब हम किसी चीज को दिलोजान से चाहते हैं तो संपूर्ण सृष्टि हमें उससे मिलाने हेतु कार्य करती है। ऐसा ही कुछ हुआ जब माता जी ने गुडगाँव मंदिर से विदा होने से पहले एक दिन मुझे एक अंग्रेजी पुस्तक देते हुए कहा, ‘मेधावी, यह मेरे पास कहीं से आई थी किंतु अंग्रेजी से हमारा क्या काम, यह तुम रख लो।‘ पुस्तक थी आचार्य गोपी लाल अमर जी द्वारा लिखित ‘विक्ट्री ओवर वायलेंस‘। 

माता जी के जाने के पश्चात् मैंने वह पुस्तक पढ़ी एवं आचार्य गोपी लाल जी से संपर्क कर उनसे ज्ञान अर्जित करने की इच्छा व्यक्त की। अभी भी मैं अनभिज्ञ थी कि रूपांतरण की जो यात्रा शुरू हुई है यह तो उसका आगाज भर है। फिर क्या था आचार्य जी से मैंने आगे की पढ़ाई की, उन्होंने मेरा परिचय जैन दर्शन के समस्त सिद्धांतों से कराया एवं मेरी जिज्ञासा देख मुझे जैनिज्म में पीएचडी करने का सुझाव दिया। मैंने उनसे कहा भी कि मेरी रूचि डिग्री हासिल करने में नहीं अपितु ज्ञान अर्जित करने में है। किंतु आज दस वर्ष पश्चात् जब मेरी पीएचडी पूरी हो चुकी है, और अभी हाल ही में अगस्त 2021 में मुझे यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में डिग्री अवॉर्ड की गई है। मैं उनकी आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे अपनी शिक्षा पूर्ण करने का अप्रतिम सुझाव दिया एवं सोचे अनुसार मैंने अपनी थीसिस उन्हें अर्पित की है। उन्होंने तब भी कहा था कि पीएचडी आपका परिचय न केवल देश-विदेश में उपस्थित उम्दा विद्वतजनों से कराएगी अपितु आपके ज्ञान को और सुदृढ़ कर आपके व्यक्तित्व को उन्नत बनाएगी, जो कि सच साबित हुआ।

सन 2012 मेरी ग्रेजुएशन पूरी हुई और 2013 में मैंने जैन विश्व भारती, लाडनूं से जैनोलॉजी में मास्टर्स के लिए अप्लाई कर दिया एवं 2014 में मास्टर्स पूर्ण कर 2015 में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद से पीएचडी में दाखिला लिया। इन सबके दौरान लेखन यात्रा सतत चलती रही एवं प्रतिदिन मेरी लेखनी में और निखार आता गया। 2011 में मैंने अपना ब्लॉग dharmaforlife.com भी आरंभ किया जहां प्रतिदिन अपने विचारों को साझा करना शुरू किया। ठीक इसी नाम से फेसबुक पर पेज भी बनाया। साथ ही 2015 में ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा से ‘मास्टर स्पिरिट लाइफ कोच‘ का ऑनलाइन कोर्स पूर्ण किया, इस कोर्स ने न केवल सोच को और निखारा अपितु लेखन के नवीन आयामों में भी वृद्धि हुई। 

सच कहूं तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जीवन में कुछ ऐसा मोड़ आएगा जो एक औसत सा जीवन जीती, साधारण भारतीय ग्रहणी को कुछ विलक्षण बना जाएगा। मेरी माँ से कई बार फोन पर बात करते हुए मैंने उन्हें ख़ुशी के आंसू छलकाते सुना है। वे कहती हैं कि हमने तो अपनी मासूम सी कच्ची बुद्धि वाली बच्ची कम उम्र में ही ब्याह दी थी। कभी सोचा न था कि वह जीवन में कुछ ऐसा अद्भुत हासिल कर जाएगी कि सारी दुनिया हतप्रभ रह जाएगी। इस दौरान मुझे मेरे परिवार का भी पूर्ण सहयोग मिला जिसके लिए मैं अपने पति श्री प्रवीण जैन जी का जितना धन्यवाद दूं कम है। हालांकि मुख्य श्रेय जैन दर्शन को ही जाता है जिसके प्रचार-प्रसार हेतु अब यह जीवन अर्पित है।

वर्तमान समय तक मेरी आठ साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें हिंदी एवं अंग्रेजी कविताओं एवं बृहद लघु कथाओं के संकलन हैं। जैन दर्शन के भिन्न विषयों पर मेरे नौ रिसर्च पेपर्स विभिन्न शोध पत्रिकाओं में छप चुके हैं। और स्पष्ट आभास है कि ये तो बस शुरुआत है। अगस्त 2020 में मुझे हिंदुस्तान टाइम्स की ओर से पॉडकास्ट शुरू करने का निमंत्रण आया। जिसे मैंने सहर्ष स्वीकारा एवं पिछले एक साल में मेरे पॉडकास्ट ‘मन की मेधा‘ ने काफी प्रसिद्धि अर्जित की है। जब माननीय चंद्रमोहन शाह जी ने मुझसे कहा कि मैं अपनी यात्रा के विषय में लिखूं तो पहले तो कई महीने आलस्य में टालती रही किंतु जब लिखने बैठी हूं तो स्वयं ही अचंभित हूं कि अरे, पिछले दस वर्षों में वाकई काफी काम कर लिया।