अदम्य साहस का दरख़्त: ‘शाल्मली’

समीक्षा

अशोक तिवारी

सात नदियाँ एक समंदर (बहिश्ते जहरा) उपन्यास के बाद नासिरा शर्मा का काम ‘ठीकरे की मँगनी’  उपन्यास पर होता है, जिसके बाद ‘शाल्मली’ उपन्यास अपने वजूद में आता है। इत्तेफ़ाक़न ‘शाल्मली’ उपन्यास ‘ठीकरे की मँगनी’ से पहले प्रकाशित होता है। हमें बेहद खुशी है कि हम आज ‘शाल्मली’ उपन्यास को लेकर विस्तार से बातचीत करेंगे और जानने की कोशिश करेंगे कि ‘शाल्मली’ उपन्यास की संरचना और बुनावट में कैसे एक स्त्री के अंदर की ताकत, साहस और भावों का उतार चढ़ाव होता है और यह सब व्यावहारिक पहलुओं के साथ कैसे संरक्षित होता है।

शाल्मली एक उपन्यास है जिसमें नायिका के ज़रिए लेखक ने स्त्री पुरुष संबंधों का गहन अध्ययन करते हुए कुछ मानकों को हमारे समक्ष रखा है। इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों की चर्चा को व्यापक तौर से आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है। स्त्री के मेहनतक़श स्वरुप से लेकर प्रेमाभिव्यक्ति, केयर (देखभाल) एवं काम के प्रति समर्पण आदि गुणों को बड़ी सटीकता के साथ इसमें पिरोया गया है। वैसे भी अगर हम देखें तो दुनिया की आधी आबादी - औरत, के काम करने का प्रतिशत आधे से कहीं बहुत ज्यादा है। नायिका शाल्मली किसी परम्परागत नायिका की भाँति नहीं है बल्कि विचार-भूमि तैयार करती हुई एक ऐसी महिला है जो आरम्भ से लेकर अंत तक लगातार अपने ऊपर काम करती है। अपने आचरण, अपने व्यवहार एवं क्रिया-कलापों में वो स्वयं को पारदर्शी एवं निश्छल व्यक्तित्व की तरह सामने आती है।

नवें दशक में ‘शाल्मली’ उपन्यास तब आया जब नासिरा शर्मा ‘ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास के साथ-साथ शामी कागज़ जैसी कहानियाँ भी लिख रही थीं। जहाँ परिवार की संरचना और बुनावट पर उनका काम बेहद बारीकी के साथ देखा जा सकता है। इन तीनों ही कथाओं में परिवार संस्था प्रमुखता के साथ दाखिल होती है। महरुख एक अलग ही वैचारिक अवधारणा के साथ सामने आती है, जहाँ एक स्त्री का घर पिता या पति के घर से अलग उसका अपना होता है। एक ऐसा घर जहाँ  वो स्वच्छंदता के साथ अपने अनुसार जी सके। वही ‘शामी कागज़’ में पाशा अपने महरूम पति मोहसिन की यादों को जे़हन में संजोए महमूद के प्रस्ताव पर कहती है- “अपनी जिंदगी को मेरे साथ खराब न करो महमूद! मुझसे बेहतर जगह इसका इस्तेमाल करो। जहाँ इसकी जरूरत है .... जहाँ इसकी क़द्र हो सके।” पाशा परिवार के साथ इस क़द्र जुड़ी थी कि उस परिवार से अलग कोई और रिश्ता सोचना भी नहीं चाहती थी। वो सँभलकर कहती भी है “और फिर महमूद में भी कोई शामी कागज थोड़े ही हूँ कि जब जरूरत  पड़ी, उसे धोकर दूसरा फ़रमान लिख दिया - मैं इंसान हूँ और इंसान के दिल पर लिखे हर्फ़ बार-बार धोए नहीं जा सकते हैं।’

शाल्मली मध्यवर्ग की एक महिला पात्र है, जिसके अंदर जीवन के जीने की तमाम हिलोरें उठती हैं। वो तमाम सपने बुनती है एवं आत्मनिर्भर बनना उसका एक महत्त्वपूर्ण सपना है। जो कहीं न कहीं उसे अपने पिता से मिला है उसका पिता कहता भी है - ‘मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी ससुराल में जाकर राज करे, अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। किसी पत्नी के अतिरिक्त भी उसकी अपनी एक पहचान बन जाए’ (पृ. 20) 

अपनी शिक्षा - औपचारिक और अनौपचारिक दोनों के प्रति शाल्मली शुरू से ही बेहद जागरूक रही है। उसका लक्ष्य स्पष्ट है जिसकी प्राप्ति के लिए वो निरंतर कोशिश करती है और नरेश के साथ हुए विवाह के बाद वो अपने बंतममत की शुरूआत करती है। सीधा-सादा, सदाचारी दिखता लड़का जिसकी जड़ें गाँव में थीं और जो अच्छी खासी नौकरी में है। शक्ल-सूरत एवं कद में अच्छा लड़का नरेश देखने-सुनने में सबको पसंद आया - खुद शाल्मली को भी। मगर क्या सचमुच? इसके उत्तर हम आगे जानने की कोशिश करते हैं। 

नरेश मध्यवर्ग की मानसिकता को दर्शाते हुए एक ऐसे इंसान के रूप में सामने आता है जो कहीं न कहीं मध्यवर्गीय कुँठाओं का शिकार है जिसके लिए उसने अपने मापदंड भी तय कर रखे हैं। मसलन शुरू से ही उसका ढुलमुलपन उपन्यास में अच्छे-से निकलकर आता है...। “भाइयों और पिताजी से जी भर लताड़ खाई कि मिलती लक्ष्मी को ठुकराया क्यों?” 

उसके कहने भर से दहेज न  लेने का अफसोस ज़ाहिर तौर पर निकलकर आता है। नरेश जो स्वकेंद्रित होने के साथ-साथ दूसरे के नज़रिए को सुनने, समझने व स्वीकार करने में एक ज़बरदस्त प्रतिरोध महसूस करता है। वह औरत के प्रति कितना सम्मान भाव रखता है - यह उपन्यास के पहले हिस्से में ही स्पष्ट हो जाता है, जब विवाह के कुछ दिन बाद शाल्मली की नौकरी के इंटरव्यू की तारीख़ आ जाती है तो उस पर नरेश कहता है - “क्या करोगी नौकरी करके...” और अंत में यह कहकर बात को ख़त्म करता है कि “ठीक है इंटरव्यू में बैठो, बाद में सोचूँगा इस पर।” इसके क्या मायने हैं, इसे समझना किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत मुश्क़िल नहीं है। बावजूद इस सबके शाल्मली बेबुनियादी बातें लगातार सुनने को अभिशप्त होती है। मसलन नरेश शाल्मली से उसके पढ़ाई करने पर कहता है - 

“पढाई लिखाई को अब गोली मारो! जीवन भर इस मग़्ज़पच्ची से क्या मिलना है? विवाह हो गया बस!”

“तुम सोचते हो कि लडकियाँ केवल विवाह के लिए पढ़ती हैं?”

“और नहीं तो क्या? खाली बैठने से तो कही अच्छा है कि लड़कियाँ अच्छा पति मिलने की ढंग से प्रतीक्षा करें?”(पृ. 25)

और ये संवाद किसी मज़ाक के मूड से ज़्यादा गंभीरता लिए होते हैं जिसका अंत होता है इस संवाद से - “बाल की ख़ाल मत निकला करो! मुझे बहस करती औरतें बड़ी बुरी लगती हैं।”    

शाल्मली जो अपने पिता से हर तरह की बहस करती थी, मुद्दों पर विचार करती थी, मगर नरेश के साथ विचार या संवाद का ये रंग उसे अपने अंदर कुँठित भाव महसूस कराता है। यहाँ तक कि वो पहले मज़ाक भी करती थी, मगर विवाह के बाद नरेश के साथ जिस तरह के खुलेपन से बातचीत करने की ख़्वाहिश लिए शाल्मली धीरे-धीरे ‘थिंक टैंक’ बन जाती है। जो अंदर ही अंदर तमाम चीज़ों को सोचती है, विचारती है, सभी पक्षों को एक साथ जोड़कर देखती है। अपने ही अंदर कहीं न कहीं अंकुश भी लगाती चली जाती है। 

सवाल उठता है कि नरेश को बहस करती औरतें बुरी क्यों लगती हैं? यह सवाल किसी एक व्यक्ति या किसी ख़ास वर्ग समूह का सवाल नहीं है-  यह सवाल दरअसल कहीं न कहीं मर्दों की आहत होती उस धारणा को पुष्ट करता है जो औरत को व्यावहारिक तौर पर समान दर्जा देने के हक़ में नहीं है। वे कहीं न कहीं औरत को दोयम दर्जे का समझते हैं। यही कारण है कि स्त्रियों के प्रति सम्मान में तमाम शास्त्र, ग्रंथ भरे पड़े हैं। उन्हें देवी या तमाम तरह से पूजनीय बताया जाता है, मगर वही जब व्यवहार में आपके समक्ष होता है तो आप उनके व्यक्तिगत सम्मान को चीर-चीर कर देते हैं। सोचने का विषय है।

शाल्मली जिस तरह मित्र सरीखे पिता के साथ छोटी-बड़ी हर बात को शेयर करती है, स्वस्थ बहस करती है, उसी तरह वह उम्मीद करती है कि अपने पति नरेश के साथ खुलकर बात करे। ख़ूबसूरत जिं़दगी के ख़ूबसूरत लम्हों को सँभाले। कोई मेरा-तेरा न हो, कोई छोटा-बड़ा या ऊँच-नीच न हो। एक दूसरे के प्रति सम्मान हो। और इसके लिए शाल्मली का विश्वास और संघर्ष एक बेहतरीन कोशिश के रूप में सामने आता है।

शाल्मली नाम की सार्थकता को भी इस उपन्यास में विस्तार से नासिराजी ने लिखा है?

संस्कृत में सेमल के वृक्ष को शाल्मली कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम वायवेक्स सेइवा जबकि सामान्य रूप से अंग्रेजी में इसे बवजजवद जतमम कहते हैं। हम जानते हैं, सेमल के पेड़ पर जब फूल आते हैं तो सभी पत्ते झड़ जाते हैं। उस पर एक उक्ति कही जाती है - 

“पत्ता नहीं एक, फूल हजार

क्या खूब छाई है सेमल पर बहार”

हम जानते हैं सेमल के फूल, फल, पत्तियाँ एवं छाल आदि का विभिन्न रोगों के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है।

अपने नाम के अनुसार शाल्मली जीवन के प्रति हमेशा सकारात्मक रही, हमेशा खुली सोच और वैज्ञानिक नज़रिए से सभी के अंदर अपनी पहचान बनाती रही बिलकुल सेमल- मतलब शाल्मली के वृक्ष की तरह। 



शाल्मली दिल्ली में पैदा हुई, शहर में सीमेंट के जंगल को उसने लगातार उगते देखा। मगर उसके अपने घर में जिस तरह उसकी परिवरिश हुई, माँ-बाप ने मानवीय सरोकारों को जिस तरह उसके अंदर भरा, उस शहरीय संस्कृति की कोई भी झलक उसके अंदर देखने को नहीं मिलती है, जहाँ लोग अक्सर आत्मकेन्द्रित होते हैं और जिनके लिए अपने से बाहर कोई और दुनिया नहीं होती है। ऐसी संस्कृति से उलट शाल्मली आसपास के उन इलाक़ों के बारे में बचपन से ही सोचती कि इतने सारे लोग दिल्ली शहर में कहाँ से आ जाते हैं? क्यों आ जाते हैं? यहाँ कितने अभावों में किस-किस तरह से रहते हैं। अभावग्रस्त लोगों के प्रति उसकी संवेदना हमेशा जागृत रहती है। शाल्मली गाँवों से आए लोगों के प्रति गहराई से विचार करती है। मगर इसके उलट नरेश जो गाँव में पला-बढ़ा, वहाँ  से शहर आया और शहर में आकर जिस तरह गाँव की व्याख्या करता है - वह सब उसके वर्गीय दृष्टिकोण को अच्छे से दिखाता है। नरेश उस शहरीय संस्कृति के पोषक के तौर पर सामने आता है जिसका शाल्मली की ज़िंदगी में कोई महत्त्व नहीं है। 

शाल्मली विवाह के बाद जब-जब गाँव जाती है, हमेशा प्रसन्नचित्त रहती है। वो महसूस करती है कि गाँव के लोगों के आपसी संबंधों में कितना प्यार, कितना दुलार, निश्छल व्यवहार और अपनापन भरा होता है। नरेश के भरे-पूरे कुटुंब और संबंधियों की भीड़-भाड़ देखकर शाल्मली बेहद मुग्ध थी। उसने महसूस किया कि दिल्ली शहर की संस्कृति से दूर, ये ग्रामीण संस्कृति कितनी मुखर है - किसी भी बनावट से दूर। नासिरा जी ने उन सभी सामाजिक रीति रिवाजों और परंपराओं का ज़िक्र उपन्यास में खूबसूरती से किया है जो गाँव में भली-भाँति निभाए जाते हैं।   

गाँव के बारे में अपनी राय व्यक्त करता हुआ नरेश कहता है “एक सप्ताह के लिए गाँव जाना अच्छा लगता है, उससे अधिक खल जाता है। लगने लगता है सो-जागकर अपना समय नष्ट कर रहे हैं।” वह शाल्मली को संबोधित करते हुए कहता है कि “अभी तो खुश हो, जब साथ रहना पड़ जाएगा, तो पता चलेगा, फिर होगी चख-चख!”

इसपर शाल्मली कहती भी है-“मुझसे नहीं होने की चख-चख!” सवाल है कि जब आप दूसरे के दृष्टिकोण को सुनने और समझने को तैयार होंगे, अपनी बात को ठीक से रख पाएँगे तो चख-चख की नौबत संभवतः आएगी ही नहीं। मगर नरेश का भी एक अनुभव था- उसने अपने घर भाभी, चाची, मामी, और माँ के आपसी संबंधों को न केवल देखा था बल्कि उससे उसने जो सोच बनाई, वह इस बात को पुष्ट करके गई कि गाँव के लोगों में ऐसा होता है- जो पूरी तरह सच नहीं है। ऐसा तो शहर में भी उतना ही देखने को मिलता है जितना गाँव में। सवाल उठता है कि उन संबंधों की बारीक़ियों  को हमने कितना समझा है। और उन संबंधों के मनोविज्ञान के साथ आपने कितनी ईमानदारी के साथ अपने आपको जोड़कर देखा है - स्वयं को और दूसरों को समझते हुए। दोनो में बैलेंस मेरे हिसाब से बहुत ज़रूरी होता है। 

शाल्मली के चिंतन अमूमन उन लोगों के प्रति होता है जो उसके आसपास रहते हैं, ख़ासकर उन लोगों के प्रति जो अभावग्रस्त हैं, भूखे-प्यासे हैं, काम करने की जगह पर जो तरह-तरह के अत्याचार सहते हैं, इतनी मँहगाई में किसी तरह अपना गुज़ारा चलाते हैं। शाल्मली की सोच पर नरेश टिप्पणी करता रहता है - “प्लीज बोर मत करो, जरा भी मन नहीं है इन दार्शनिक बातों को सुनने का।”

एक कमरे की बरसाती में रहते हुए शाल्मली को कभी कोई दिक़्कत नहीं हुई परन्तु नरेश समय≤ पर शाल्मली को तरह-तरह से उपालंभ भरी बातें कहता रहता, व्यंग्य कसता रहता कि तुम तो सरकारी घर एलॉट कराने के लिए सीरियस नहीं हो, मेरे दोस्त मुझसे मिलने आते हैं... क्या कहेंगे... वगैरा वगैरा। मगर शाल्मली ने कभी उफ तक न की। वो नहीं चाहती थी कि मकान के एलॉटमेंट के लिए किसी की सिफ़ारिश कराई जाए या किसी का एहसान लिया जाए। मगर इसके लिए नरेश की मानना शाल्मली से कुछ उलट ही था। वो शाल्मली पर बराबर दवाब बना रहा था। नरेश के अंदर का पुरुष बार बार जग उठता है। सरकारी मकान के एलॉटमेंट के संदर्भ में ग़लत तरीक़ों को अपनाने के बारे में उनके संवाद देखे जा सकते हैंः “क्यों किसी का उपकार लिया जाए, जब अपने आप कुछ वर्ष बाद हमारा नंबर या जाएगा।” शाल्मली के तेवर खींच जाते। 

“तुम हर महत्त्वपूर्ण चीज़ को इतनी सरलता से टाल देती हो कि मुझे गुस्सा आने लगता है। तुम किसी से नहीं कहलवाओगी तो कोई और सिफ़ारिश और घूस देकर अपने नाम निकलवा लेगा।” नरेश उसे हठधर्मी के साथ कहता। 

“तुम हर छोटी-बड़ी बात पर इतने उत्तेजित क्यों हो जाते हो?” शाल्मली ने नरेश को घूरा। 

“इसलिए कि यूं औरत हो, इन बातों को गहराई से नहीं समझतीं। मैं कुछ कहता हूँ तो उसे भी लापरवाही से टाल जाती हो, तो मुझे गुस्सा आएगा या नहीं?” नरेश ने झुँझलाकर कहा। 

“एक तो तुमसे विनम्र निवेदन है कि बार-बार औरत कहकर मुझ पर टीका-टिप्पणी मत किया करो। दूसरे औरत की अक़्ल पर शक़ करना छोड़ दो। एक स्तर के बाद हम औरत-मर्द नहीं रह जाते हैं, बल्कि हमारा काम हमारी पहचान होती है, हमारी अक़्ल हमारी कसौटी होती है।” शाल्मली ने गंभीरता से कहा। (पृ.56)  

मैं कई बार सोचता हूँ ये शाल्मली थी कौन? क्या वो एक वास्तविक चरित्र थी जिसके अंदर ग़ज़ब की सहिष्णुता ही नहीं थी, ग़ज़ब का धैर्य ही नहीं था, विचारों का ज़बरदस्त स्रोत के साथ-साथ वो एक झरना थी - साफ पानी की। वो एक नदी थी जो लगातार बहने में यक़ीन करती थी- सभी को साथ लेकर- चाहे किसी भी तरह की कोई गन्दगी साथ आए या कोई रुका हुआ मलबा हो, वह सबको साथ बहाकर ले जाने और लगातार सभी को बहने के लिए प्रेरित करती थी। मगर ऐसा क्या था जो नरेश को सतत रूप से उसके विरुद्ध बनाता चला गया, क्यों उसके अंदर पैदा हुआ ठहराव गति न पा सका।

इस उपन्यास के अंदर एक बहस जो प्रकट तौर पर सामने आई है वो है मर्द और औरत का सवाल। नासिरा शर्मा ने इसमें उन सभी संदर्भों को उठाया है जहाँ एक पुरातन सोच का एक मर्द अपने को आधुनिकता की दिखावटी दुनिया का पहरुआ भी कहता है, मगर अंदर ही अंदर उसे ये बात गहरे में कचोटती है कि उसकी पत्नी जॉब और रुतबे में उससे कहीं बहुत बड़ी है। धीरे-धीरे उसके अंदर की पुरुषवादी सोच उसपर हावी होती जाती है जो शाल्मली पर तरह-तरह से प्रहार भी करती है- व्यंग्य भी करती है, ताने कसती है, तरह-तरह के दबाव शाल्मली के ऊपर बनाने की कोशिश करती है। मसलन- “तुम ठहरी एक आधुनिक विचार की महिला... विचारों में स्वतंत्र, व्यवहार में उन्मुक्त....”

ये सोच दरअसल उस पुरातन संकीर्ण मध्यवर्गीय चेतना को आगे लेकर आती है जो यह मानती है कि औरत का काम घर के अंदर है, जिसके अंदर आधुनिकता का थोडा छोंक लगाते हुए यह मान लिया जाता है कि नौकरी करे या कुछ अन्य काम करे- घर के सारे काम करने की ज़िम्मेवारी सिर्फ उसी की बनती है। मर्द कुछ काम करे, न करे- चलेगा, मगर औरत हर हाल में न केवल सब कुछ करेगी बल्कि पुरुष की तमाम इच्छा-अनिच्छा का सदाचारिता के साथ पालन भी करेगी। इस उपन्यास में नासिरा जी ने यह व्यवहार कई-कई परतों में दिखाया है। 

नरेश बात नहीं करता। वक्त-बेवक्त़ घर आता है। शाल्मली कई बार चाहती है कि वो तमाम मसलों पर कुछ बात करे। मगर नरेश काम से आता है, खाता है, टीवी देखता है, सो जाता है। जब शाल्मली बात करने के लिए उससे कहती है तो नरेश का बात करने का सिर्फ एक ही मतलब होता है। उसे किसी की इच्छा-अनिच्छा से कोई मतलब नहीं। शादी के बाद एक बार शाल्मली जब अपने माँ बाप के पास आती है तो उसके पिता शाल्मली से पूछते हैं- 

“तू सुखी है ना?”

“सुख से आपका अभिप्राय क्या है पिताजी?” शाल्मली उल्टा सवाल कर देती।

“सुख से मतलब है कि तू अपनी घर-गृहस्थी में जम गई है कि नहीं ? संतोष है तुझे अपने उस नए जीवन से? और...” पिताजी व्याख्या करने लगे।

“बस-बस समझ गई पिताजी, आप क्या कहना चाहते हैं। मगर यह बताइए, आप क्या पूर्ण सुखी अपने को कह सकते हैं?” शाल्मली ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें पिता पर गाढ़ीं।

“पोस्टमार्टम करना चाहती है?” पिता फीकी हँसी हँसकर बोले।

“नहीं पिताजी, में केवल इतना कहना चाह रही हूँ कि सुख और आनंद अपने में निरंतर बहने वाली क्रियाएँ नहीं हैं। यह पल हैं जो सार्थक बना देते है पूर्ण जीवन को, वरना इनका महत्त्व ही समाप्त हो जाए, यदि यह निरंतर आपके जीवन से बहने लग जाए। मनुष्य के इस जीवन में सब कुछ मिला-जुला होता है। कुछ भी तो पूर्ण नहीं है इस संसार में पिताजी, फिर मेरा जीवन इतना नीरस क्योंकर हो जाए कि सुबह शाम केवल आनंद की वर्षा हो, सुख की अनुभूति हो? कितना कुंठित, कितना ठहरा, कितना ठस हो जाएगा मेरा जीवन?” (पृ.27)

शाल्मली की इस व्याख्या में जीवन में सतत आने वाले सुख-दुःख को भलीभाँति समेटा गया है। जीवन में जहाँ सुख आते हैं-वहीं दुःख भी आते हैं - मगर उन दुखों का सकारात्मकता के साथ अगर हम सामना करें तो कदाचित वे पल भी बेहतरी के साथ गुज़र जाते हैं। 

दरअसल नरेश एक आत्मकेन्द्रित पुरुष है- वह अपने को केंद्र में रखकर बातें करता है, और व्यवहार भी।

एक बार शाल्मली जब मसूरी की ट्रेनिंग के दौरान छुट्टियों में नरेश के पास आई तो नरेश ने उसे सूचना दी कि उसने आज अपने कई मित्रों को भोजन पर आमंत्रित कर लिया है। शाल्मली को बुखार था बावजूद इस सबके शाल्मली ने खाना बनाया, मगर शाम होते-होते बुखार में वह बेसुध- सी पड़ गई। मगर नरेश ने घर पर रखी गई मित्रों की पार्टी नहीं हटाई और बुखार की हालत में शाल्मली को अपनी माँ के पास छोड़कर आने को राजी हो गया। शाल्मली ने मन ही मन सोचा- “जिसे उसके बुखार से अधिक मित्रों की चिंता सताए, उसके बीच में आकर, उसकी परीक्षा लेकर क्या मिलेगा, सिवाए दुःख के।” (पृ.35)

नरेश के अंदर मौजूद हीन भावना (पदमितपवतपजल बवउचसमग) इस हद तक है कि वह अपने को श्रेष्ठ (ेनचमतपवत) दिखाने के चलते अजीब-अजीब तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। दरअसल ये उसकी मूल प्रवृत्ति को उजागर कर जाता है। यह दिखाने के लिए कि उसे शाल्मली की कोई परवाह नहीं है, वो कई बार घर का खाना छोड़कर ढाबे पर खाने महज़ ये कहकर जाता है- “फिर वही सब्जी।” नरेश की दिनचर्या में उसका दोस्तों के साथ पार्टी मनाना, देर से घर आना, काम का बहाना लगाना, आदि लगा रहता है। शाल्मली ऑफिस से घर आकर प्रायः नरेश की प्रतीक्षा करती है मगर कभी काम की अधिकता के चलते, वो खुद लेट हो जाए और कदाचित नरेश जल्दी घर आ जाए तो शाल्मली की खैर नहीं! तमाम ताने, कहा-सुनी, और तनाव। एक बार माँ-बाप से मिलने शाल्मली ऑफिस से सीधे चली गई। उस दिन नरेश को देर से घर आना था। जब लौटकर शाल्मली घर पहुँची, नरेश भी तभी पहुँचा था। इस पर नरेश के साथ उसके संवाद मर्दवादी सोच की अभिव्यक्ति को साफ तौर पर सामने रख देते हैं-

“काफी स्वावलंबी होती जा रही हो?” शाल्मली जब नींद में डूबने लगी तो उसके कानों में नरेश की आवाज़ गूँजी। पल भर वो समझ नहीं पाई कि वह सपने में सुन रही थी या...।

“तुमने मुझसे कुछ कहा?” शाल्मली ने ख़ुमार में डूबी आवाज से कहा। 

“हाँ”

“मैंने तुम्हें नौकरी करने की छूट दी, इसका यह अर्थ नहीं कि तुम अपने को पूर्ण स्वतंत्र समझने लगो” नरेश का घुन्नाया-सा स्वर गूँजा।

“मैं तो घर गई थी।” शाल्मली अचकचाकर बोली।

“कहीं भी गई, मगर मेरे बिना क्यों गईं ? मैं पूरे समय इस भ्रम में रहा कि तुम घर पर हो” नरेश के स्वर का ताप बढ़ गया था। 

“एकदम से मन किया था, सो चली गई।” सुबह सब कहकर शाम को काम करना हर समय संभव तो नहीं हो सकता, जैसे तुम्हारा कार्यक्रम एकाएक बन गया और....।” शाल्मली ने संयत होकर कहा। 

“अब तुम मेरी नकल मत करो! में मर्द हूँ, कहीं भी आ-जा सकता हूँ। तुम औरत हो और अपनी मर्यादा को पहचानो! इतनी रात गए वो भी अकेली...।” नरेश क्रोध से काँपते हुए उठ बैठा। गुस्से के मारे बाकी शब्द हल्क में अटक गए। शाल्मली के दिल पर चोट लगी। वह चुपचाप भरी-भरी आँखों से नरेश को देखती रही। नरेश बहुत कुछ कहता रहा। शाल्मली ख़ामोशी से सुनती रही।

“कल मेरा रेज़िगनेशन लेते जाना। मुझे तुमसे स्वतंत्रता की भीख नहीं चाहिए। तुम्हारा दान किया हुआ कारावास मेरे लिए काफी है।” शाल्मली एकदम से फट पड़ी। आँखों से भरा पानी गालों पर बह आया।”

“ये नाटक बंद करो...।” 

“ये नाटक तब तक चलेगा जब तक मैं अपना अधिकार नहीं पा लेती हूँ।” शाल्मली ने रोष में भरकर कहा। 

“तुम्हें अधिकार देने वाला मैं हूँ, समझीं।” नरेश ने तड़पकर कहा।

“मुझे अधिकार देने वाला भले ही तुम अपने को समझो मगर याद रखो, कोई भी किसी को आसानी से उसका 

अधिकार नहीं देता है। अधिकार लेने वाला तो लड़कर उसे प्राप्त करता है।” शाल्मली तिलमिला कर बोली। उसका रोम-रोम अपमान और दुःख की आग में मकई के दानों की तरह भुनने लगा था। नरेश मुट्ठी भींचे शाल्मली को घूरता रहा। शाल्मली घुटनों में सर दिए सुबकती रही। जब काफी देर गुज़र गई और नरेश का संताप कुछ कम हुआ, तो उसका मन उसे धिक्कारने लगा, उसे क्या हो गया था एकाएक? शाल्मली अपने घर ही तो गई थी, फिर कोई ऐसा व्यवहार करता है पत्नी से?”

सच यह था कि नरेश के अंदर एक डर समाया था कि शाल्मली का कद उसके व्यक्तित्व से ऊँचा उठता जा रहा है- उसपर छाता जा रहा है।

एक औरत क्या है-इस पर शाल्मली की सोच का विस्तार हम लेखिका के शब्दों में सुनना बेहद जरूरी है- इस में एक बेहतरीन कविता है, जिसे यक़ीनन पढ़ा जाना चाहिए।  

“मैं तुम्हारी छाया, तुम्हारी प्रतिध्वनि, तुम्हारा विस्तार नहीं हूँ नरेश! इस भ्रम में मैं नहीं जीती। इसे मेरी कमी कह लो या खूबी कि मैं अपनी अच्छाई और बुराई दोनों को ही जानती हूँ. मैं यह भी जानती हूँ कि मैं कोरा कागज नहीं थी, जिस पर तुम अपने अधिकार का हस्ताक्षर कर सकते। मैं तो फुलवारी का वो रेखाचित्र थी, जिसे बचपन में पिताजी ने बड़े जतन से खींचा था। प्रत्येक रेखा में उनकी आत्मा का उजाला भरा है। पिताजी पूरे बीस वर्ष एक फूल को आकार देते रहे। मैं खुली आँखों से उनके छलकते पानी की बूँद-बूँद अपने शरीर पर गिरती महसूस करती रही हूँ और तुम चाहते हो कि मैं पिछले बीस वर्ष का जीवन भूल जाऊँ और तुम्हारे ही मशीनी डिज़ाइन को अपने व्यक्तित्व पर चिपका लूं, जिसमें न तुम्हारी लगन का पसीना है, न संबंध की गहराई का विस्तार! हमें साथ रहते अभी कुल चंद वर्ष ही तो गुज़रे हैं और तुम मुझे एकाएक बदल डालना चाहते हो...! क्या ये संभव है?

“मान लो आज सारे जतन करके तुम्हारी दृष्टि को आँख बंद करके अपना लूँ और एक लंबे समय तक तुम्हारी खुशी के लिए अपना पिछला जीवन भूल जाऊँ। जब तुम्हारी मेहनत की महक की आदत पड़ जाएगी, तो एक दिन बेटा अपनी इच्छा के अनुसार मुझे ढालने की कोशिश करेगा। बताओ, हम औरतें क्या हैं? गीली मिट्टी? कितनी बार हम अपने को मिटाकर नए-नए रूप में ढलें? यानी हमारा कोई अस्तित्व नहीं, 

अधिकार नहीं, विवाह का अर्थ है - अपना जन्म-स्थान भुला देना और एक मनुष्य की इच्छा और रुचि का दास बन जाना?”  

एक  औरत जो सुबह मुँह-अँधेरे से उठकर अपने काम पर लग जाती है और निरन्तरता के साथ घर का हर काम सिलसिलेबार करती चली जाती है। घर के काम ख़त्म करने के बाद अपनी नौकरी के हर काम को भी उतनी ही ईमानदारी और मुस्तैदी के साथ निभाती है। कोशिश करती है कि घर का कोई तनाव उसके साथ ऑफिस न जाए। मगर एक इंसान होने के नाते ये कितना संभव है - हम जानते हैं। मगर वो संभव बनाने की कोशिश करती है। काम से लौटने के बाद घर के हर कोने के बारे में सोचती है। उन सभी कामों के बारे में जो उसीके जिम्मे घर पर मुँह-बाए खड़े होते हैं। चाय बनाना, नाश्ता देना, खाना बनाना, सबको खिलाना, रसोई के काम से निपटकर बिस्तर लगाना..... बगैरा बगैरा। अपने इस नियमित काम के अतिरिक्त वो सब काम भी जो एक मर्द अपने मर्दानगी के चलते उस पर रौब गाँठता है। ये सहयोग नहीं, अधिकार और रुतबा दिखाने की उनकी आधिकारिक (ंनजीवतपजंजपअम) सोच है जो किसी बेहतरीन घर को नहीं बल्कि एक परंपरावादी सामंती व्यवस्था को पुष्ट करती है। कहना न होगा शाल्मली इस सबका हिस्सा है। कदाचित ‘ठीकरे की मँगनी’ में महरुख अपने निर्णय लेने के लिए जिस तरह एक स्वतंत्रता महसूस करती है (यक़ीनन जिसे उसने खुद प्राप्त किया है।), उसके उलट शाल्मली कदाचित् अपने बेहतरीन घर के एक सपने के लिए सब कुछ धैर्यपूर्वक सहती जाती है। यहाँ तक कि वो इसके चलते एक ‘थिंक टैंक’ बन जाती है। 

वैचारिक भिन्नता या मत भिन्नता होना गलत नहीं है, बशर्ते हम सामने वाले के पक्ष को उतनी ही गंभीरता से सुनें, समझें, उस पर विचार करें। मगर जब एक पक्ष अपने अलावा कुछ और सोचना, समझना, जानना व मानना नहीं चाहे, वह पक्ष दूसरे को सुनना तक नहीं चाहे तो वहाँ पर संवादहीनता ही बनती है। यहाँ तक कि शाल्मली अपनी सास को जब गाँव से लेकर आती है और अपने पास रखती है, तो वह उनका पूरा ध्यान रखती है - दवा का, खाने का, उनके साथ बात करने का। वह उन्हें किसी भी तरह के अकेलेपन का अहसास नहीं होने देती। उनके बीच सास-बहू का एक बेहतरीन रिश्ता बनता है। कई बार जब नरेश शाल्मली से अनाप-शनाप बोल जाता, उल्टा-सीधा व्यवहार कर जाता तो शाल्मली की सास अपने बेटे की सब हरकतें देखती रहती। नरेश का देर रात नशे की हालत में लौटना, तमाम तरह की टिप्पणियाँ करना और शाल्मली का सब कुछ चुपचाप सहते चले जाना, बल्कि नरेश की इन आदतों को शाल्मली का उसकी माँ से छिपाना जिन्हें जानकार एक माँ को पीड़ा हो और दिखाना कि सब कुछ ठीक है, दरअसल शाल्मली के धैर्य की इँतिहा को दिखाता है। मगर माँ का अनुभव भी तो कम नहीं था मर्दों को देखने का। वो शाल्मली से कहती भी है-“हम तो बहू री, दासी थे! तुझे देखा तो मन में सोचा कि चल कहीं तो औरत स्वतंत्र है। भयभीत भी हुई थी कि तू निभाएगी भी या नहीं? शहर की लड़की ... बहुत बातें सुन रखी थीं। इन वर्षों में तेरे साथ रहकर जान पाई बहू री! औरत जन्मजली कहीं स्वतंत्र नहीं। कहीं खूँटे से तंग बँधी, तो कहीं उसके गले में बँधी रस्सी थोड़ी लंबी या अधिक लंबी। अपना बेटा है। नौ महीने कोख में रखा, दूध पिलाया। तुझे तो मैंने जन्म नहीं दिया, मगर दोनों को देख रही हूँ। उसके व्यवहार से तू कितनी सुखी है, मैं नहीं जानती, बहू री! पर भगवान को साक्षी मानकर कहती हूँ, तेरे लिए मेरा मन कुढ़ता है। मैं बहुत दुखी हूँ। क्या कहूँ उसे?मुझ अनपढ़ से वो सीख लेगा, मेरे उपदेश सुनेगा, मेरे लिए जिसके पास तनिक भी समय नहीं?

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“तू कुछ कह न सके वह अलग बात है पर मुझे कहने में लाज नहीं कि हमारे यहाँ के मर्द नहीं जानते औरत का आदर सत्कार करना, सम्मान देना तो बहुत दूर की बात है।”

बात जब औरत के मान-सम्मान और उसके आदर करने की चली है तो उस माँ की पीड़ा शायद हमारे सारे पुराने से पुराने आख्यानों में भी भरी पड़ी है। नारी के सम्मान की दुहाई देने वाले समाज में आज वही लोग औरत के सम्मान को तार-तार कर रहे है जो बड़े ही आकर्षक और लुभावने नारों के साथ हमारे सामने आते हैं। वे महिलाओं को कदम-कदम बार बेइज़्जत कर रहे हैं। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ के नारों को किस तरह बेमानी किया जा रहा है - यह हम सबने पिछले कई-कई सालों में देखा है। सरकारों की क्या प्राथमिकता है और क्या सरोकार हैं - यह बात की स्पष्टतः सामने आई है। मेरा कहना यह भी है कि यह सिर्फ आज ही नहीं हो रहा है, बल्कि प्राचीन ग्रंथों एवं साहित्य में औरतों के प्रति जिस तरह का सम्मान, सरोकार और आदर की बात की जाती है, वहाँ भी पुरुषवादी वर्चस्व एवं सत्ता का ही बोल-बाला रहा है। सीता, अहिल्या, तारा, सूर्पनखा, परशुराम की माता एवं उर्मिला आदि के साथ-साथ और भी तमाम महिला किरदारों में से किसी को भी उठा लिया जाए, आपको उन सबमें महिलाओं के शोषण और उन पर होने वाली हिंसा की अनगिनत दास्तानें नज़र आएँगी। और इस सब में पुरुषों ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये किसी एक धर्म या मत में ही नहीं, तमाम धार्मिक संरचनाओं का हिस्सा रहा है। जो शुरूआत में उन्हें देवी बताता है, खुलेपन से स्वीकार करते हुए सृष्टि का निर्माण करने की एक विशेष कड़ी बताता है, वही कालांतर में उन्हें शोषण का या अपनी इच्छा पूर्ति का तरह-तरह से साधन बनाता है। ये  प्रश्न गंभीर हैं जो नासिरा शर्मा ने शाल्मली उपन्यास में तमाम तरह से उठाए हैं। 

 नरेश की चाल-ढाल, व्यवहार, उसके चारित्रिक बदलाव और घर में पैदा होने वाले किसी भी तनाव की कोई खबर शाल्मली अपने माता-पिता को नहीं होने देती। उसका मानना है कि “यह भेद छिपा रहे तो अच्छा वरना इस उम्र में यह आघात क्या वे सह पायेंगे?” (पृ.112)

शाल्मली बार-बार जानने की कोशिश करती है कि आखिरकार नरेश उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है? बात-बात में नरेश के द्वारा कहा गया यह जुमला कि ‘वो उसका पति है’, शाल्मली को सोचने को मजबूर करता है। शाल्मली इस जुमले के मनोविज्ञान को पकड़ने की कोशिश करती है ताकि वो नरेश के अंदर की कुंठा की गिरह को किसी तरह खोल सके। नरेश को खुश रखने, उसको प्रसन्न रखने के हर काम को वो कई बार अपनी अनिच्छा के बावजूद करने को तैयार हो जाती है कि शायद इससे नरेश के साथ संबंधों में बेहतर समझ पैदा हो सके। विवाह के पांच साल बाद जब वो गर्भवती थी तो नरेश को वापस पाने की एवज़ में एक नन्हे जीवन की आहुति भी दे दी थी।

शाल्मली नरेश को खुश करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ती। तमाम चिंताओं, वर्तमान स्वरूप पर अपनी टिप्पणी बड़ी ही सोच समझकर रखती, मगर कहीं न कहीं से कोई न कोई बात ऐसी निकल ही आती कि शाल्मली विचार के मंथन के दौर से गुज़रने लगती, उसे लगने लगता कि उसे सोचने की बीमारी हो गई है। एक बार पिताजी ने उसके बारे में माँ से कहा था- ‘दिमाग़ वाले ही सोच सकते हैं भाग्यवान!’ यह बात पिताजी ने माँ के इस सवाल पर कही थी कि ‘तू हर समय सोचती क्यों रहती है?’

इस मायने में मुझे लगता है कि शाल्मली, ‘ठीकरे की मँगनी’ की महरुख, ‘शामी कागज’ की पाशा, ‘बहिश्ते जहरा’ की तय्यबा, ‘पारिजात’ की रूबी और ‘कागज़ की नाव’ की मलकानूर एक ही धरातल पर सोचती हैं, मगर हालातों से जूझने और संघर्ष करने के तरीक़े सबके अलग-अलग है। शाल्मली का विश्लेष्णात्मक पहलू अपने किरदार में ज़बरदस्त तरीके से निकलकर आता है। उसका विश्लेषण एक तरफा न होकर संतुलित रहता है। दूसरे की स्थितियों को भी समझते हुए अपने एक्शन का वह मूल्यांकन करती है, वहीं इसके उलट अपनी स्थितियों एवं सामर्थ्य को पहचान कर दूसरों के साथ बर्ताव करती है। 

शाल्मली नरेश के साथ अपने व्यवहार को हमेशा सामान्य बनाए रखने की हामी होती है। छोटी-मोटी टिप्पणियों को वह यह सोचकर नजरंदाज़ कर देती है कि समय के साथ-साथ शायद नरेश चीज़ों को बेहतरीन तरीके से समझेगा।  मगर नरेश के अंदर की हीन भावना अक़्सर उसके व्यवहार में निकलकर आ ही जाती थी। इसे नरेश के इस कथन से समझा जा सकता है- “तुम कभी-कभी मुझे इतनी ऊँची और गहरी लगती हो कि मेरे जैसा व्यक्ति न इतनी ऊँचाई पर चढ़ सकता है, न गहरे उतर सकता है। तुमसे मुझे भय लगने लगता है। जो मैं नहीं जानता वो भी तुम मेरे बारे में जानना चाहती हो।” (पृ.152)

शायद यही भय है जो नरेश को शाल्मली के आगे खुलने से रोकता है, जिसके परिणामस्वरुप वो लगातार शाल्मली से दूरी बनाता है, किसी और के साथ संबंध बनाता है और शराब पीकर देर रात घर लौटता है।

नरेश के द्वारा किए जा रहे लगातार उत्पीड़न पर ऐसा भी नहीं है कि शाल्मली ने अपनी स्थिति के बारे में कुछ और निर्णय लेने के बारे में गंभीर रूप से न सोचा हो। वह सोचती है, घर के बाहर इतना सम्मान पाने वाली एक औरत घर में इस क़दर उपेक्षित एवं उत्पीड़ित महसूस करे, तमाम वक़्त उन क्षुद्रताओं को बर्दाश्त करती रहे जिनका जीवन में कोई मतलब नहीं होना चाहिए। 

नरेश के व्यवहार, नशा एवं उसके किसी और के साथ संबंध होने की बात शाल्मली को तोड़ जाती है। मगर वो अपने व्यवहार में संतुलन बनाए रखती है। बात करती है। इस उत्पीड़न से बचने के लिए कोई मुक्ति मार्ग ... मुक्ति .... संबंध विच्छेद, तलाक।   

तलाक के बाद एक स्वावलंबी बनकर जीते हुए क्या उसे पूर्ण संतोष मिल पाएगा? जो कुछ उसके पास है, वो एकदम से छूट जाएगा तो क्या इसका दुख क्या उसे नहीं सताएगा - ये एक सवाल की तरह शाल्मली के जे़हन में कौंधता है। दूसरे, वो इसको एक सामाजिक व्याख्या की तरह भी देखती है। तलाक़शुदा होने पर क्या ये समाज उसे उसी दृष्टि से देख पाएगा, उसी तरह का आदर दे पाएगा? वो तमाम आरोपों, व्यंग्यों और लगने वाले लांछनों का कैसे-कैसे जवाब देगी? तलाक़शुदा जानकार लोगों के व्यवहार में क्या हलकापन नहीं आएगा?  तमाम छींटाकशी को कैसे बर्दाश्त कर पाएगी वो? शाल्मली इस तथ्य को पहचानती है कि सबंधों को तोड़ने में ज़्यादा देर नहीं लगती मगर उन्हें टूटने से बचाए रखना लोहे के चने चबाना है। उसने अपनी सहकर्मी और साथी सरोज का सुझाव भी बड़े ध्यान से सुना। उसकी विवेचना भी की। साथ में अपना निर्णय भी। तलाक़ के सवाल पर शाल्मली सरोज से साफ कहती है- “तुम्हारे यहाँ जो अंतिम उपाय है, वह समस्या का पहला समाधान क्यों बन जाता है।” 

सरोज उसे समझाती हुई कहती है कि “ वो इस नरक से निकल क्यों नहीं जाती? बुरी आदतों को छुड़ाना पड़ता है, तब वह छूटती हैं।” शाल्मली उसकी बात को बड़े धैर्य के साथ सुनकर जवाब देती है। उसका मानना था कि हर व्यक्ति का एक अनुभव संसार होता है जो दूसरों से निःसंदेह भिन्न होता है। इसलिए किसी एक का निर्णय सभी का निर्णय नहीं बन सकता है। 

शाल्मली कहीं न कहीं नरेश की आदतों, उसके गलत आचरण को देखकर दुखी तो होती है परंतु वो यह समझती है कि यही नरेश उसे कहीं न कहीं प्यार भी करता है। उसे भरोसा होता है कि चाहे जितनी बातें हो जाएँ मगर वो नरेश को अपने व्यवहार के ज़रिए वापस लेकर आएगी। सहन-शक्ति के बारे में वो तो यहाँ तक सोचती है कि “हमारी शिक्षा से क्या लाभ जो हममें सहन-शक्ति समाप्त होती जा रही है।” उसका मानना था कि किसी भी अंग की बीमारी का इलाज सिर्फ यह नहीं हो सकता कि उस अंग को ही काटकर अलग कर दो, बल्कि धैर्य और सहन-शक्ति के साथ उसके कारणों की पड़ताल करते हुए, उस अंग को पुनः उसी तरह सुचारू बनाते हुए शरीर का अभिन्न अंग बनाए रखा जा सकता है। और सामाजिक ढाँचे में आई किसी दरार पर भी वो इसे लागू करती है। यहाँ सरोज को दिया शाल्मली का तर्क बेहद महत्त्वपूर्ण है।

“....पाप से घृणा करेंगे न कि पापी से। कुछ लड़ाइयाँ व्यक्तिगत होकर भी व्यक्तिगत नहीं रह पाती हैं और विशेषकर वह लड़ाई जिसके बीज हर घर में मौजूद हों। बात इस तरह से उठाओ कि वह सबकी बात लगे, न कि किसी राजनीतिक पार्टी का नारा, जो केवल अपनी स्वार्थसिद्धी के लिए कहा गया हो। मुझ पर पड़ी है, मैं झेल रही हूँ। मुझे पता है, यह समस्या जितनी गंभीर है, उतनी ही जटिल और उसका समाधान भी बड़ा पेचीदा और उलझा हुआ है। सुलझाना है तो देर लगेगी। वरना तो जहाँ तागा उलझे, वहीं कैंची से काट दो, फिर लगाओ स्थान-स्थान पर गाँठें और प्रयोग करो उसका। कुछ बन पाएगा उससे? मैं ये प्रमाणित करती हूँ कि मेरे व्यवहार से और हमारे बीच हुए संवादों से समस्या हल हो जाएगी और नरेश वापस आएगा। मगर मेरे अवसर देने के बाद भी कुछ न हुआ तो मुझे पछतावा नहीं होगा, आत्मग्लानि नहीं होगी।”(पृ. 158) 

शाल्मली के अंदर का आत्मविश्वास उसके निर्णय को बल प्रदान करता है। और ये बल किसी बनी-बनाई किसी लीक से हटकर काम करने और निर्णय लेने पर मजबूर करता है। निर्णय लेने के प्रति शाल्मली की साफगोई उसे किसी भी परंपरावादी सोच से बहुत अलग करती है। कई बार ये लगता है कि शाल्मली उन बंधनों से मुक्त न होने के पीछे उसके अपने संस्कार, अनुभव एवं डर हैं, मगर वहीं, निर्णय के प्रति उसके तर्क एवं स्थितियों की विश्लेषणात्मक समीक्षा उसे और विश्वसनीय बनाते हैं। जो हालत से जूझने की ताकत अर्जित करते हुए एवं चुनौतियों को स्वीकार करते हुए हर बदलाव में विश्वास करती है। उसके अपने अंदर का यकीन उसे सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ने व बेहतर भविष्य के सपने देखने की ओर अग्रसर करता है। 

नासिरा शर्मा का यह उपन्यास समाजशास्त्र की उन पेचीदगियों को समेटता है जो ये  दिखाता है कि इंसान-इंसान के बीच के संबंधों को कैसे दुरुस्त रखा जाना चाहिए। 

सबंधों में उथलापन एवं प्रतिक्रियावादी नज़रिया कभी भी बहुत दूर तक नहीं ले जा सकता। सबंधों में परिपक्वता लाने के लिए धैर्य, सहनशीलता, बातचीत, तार्किक नज़रिया, गंभीरता एवं समझदारी का होना ज़रूरी है। ऐसे में जितनी जिम्मेवारी शाल्मली की बनती थी, ठीक उतनी ही नरेश की भी।

“ये कैसी विडंबना है कि यातना झेलती औरत सबके आकर्षण और सम्मान का केंद्र होती है मगर वो सहने से इनकार कर दे तो सारी हमदर्दी घृणा और अपमान में बदल जाती है।” मर्दों की फितरत पर बात करते हुए शाल्मली को लगता है कि “औरतें मर्दों के घुटे घरों का रोशनदान होती हैं, जिनके द्वारा उनके घरों में प्रकाश और हवा का गुजर होता रहता है और वह ताज़ा हवा का सेवन करते हुए उनके अस्तित्व को नकारते रहते हैं।” (पृ. 151)

अंबेडकर की एक उक्ति मुझे याद या रही है- “मैं किसी समुदाय की प्रगति महिलाओं ने जो प्रगति की है, उससे मापता हूँ।” मुझे लगता है तबसे अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका, मगर ये सवाल अभी भी हमारे सामने ज्यों का त्यों है। महरुख जैसे चरित्र की जीवटता एवं जीवंतता और शाल्मली का सभी को साथ लेकर चलने का संकल्प एवं धैर्य क्या आज की पीढ़ी को रास आएगा जो स्थितियों को समझने की बजाए त्वरित करने एवं त्वरित प्रतिक्रिया देने में यक़ीन करने के चलते अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी में तमाम तरह के शॉर्ट कट अपनाती है। 

जेंडर के सवालों को अपने अंदर गूँथता शाल्मली उपन्यास नासिरा जी के बेहतरीन उपन्यासों में से एक है। तमाम सामाजिक एवं पारिवारिक संबंधों की पड़ताल करता यह उम्दा उपन्यास खूबसूरत संवादों की अभिव्यक्ति के साथ न केवल पठनीय है, बल्कि तात्कालिक परिस्थितियों को यह ज्यों का त्यों हमारे सामने खोलकर रख देता है। यही कारण है कि पाठक अपने आपको भी इसका एक अभिन्न हिस्सा समझने लगता है और इसके पात्रों की बेचैनी अपने अंदर कहीं गहरे में महसूस करता है। यक़ीनन पात्रों के अनुकूल भाषा का प्रवाह देखते ही बनता है। एक औरत जो न केवल अपने में यक़ीन रखती है बल्कि क़ायनात को चलाने का अदम्य साहस रखते हुए कहती है कि “मैं एक घाटी हूँ, जहाँ पर खड़े होकर तुम जैसे आवाज दोगे, वैसा ही जवाब पाओगे।” दुनिया को उपयुक्त और मुनासिब उत्तर देना अगर हमें सीखना है, तो यक़ीनन हमें शाल्मली से मिलना होगा।

अशोक तिवारी, नई दिल्ली, मो. 9312061821