साक्षात्कार,

 22 अगस्त 1948 को इलाहाबाद में जन्मी नासिरा शर्मा हिंदी साहित्य की अग्रपंक्ति में स्थान रखती हैं। उन्होंने फारसी भाषा और साहित्य में एम.ए. किया। हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, पश्तो एवं फारसी पर उनकी गहरी पकड़ है। वह ईरानी समाज और राजनीति के अतिरिक्त साहित्य, कला व संस्कृति विषयों की विशेषज्ञ हैं। ‘साहित्य अकादमी’ सम्मान से विभूषित नासिरा शर्मा ने उपन्यास, कहानी, लेख, रिपोर्ताज, संस्मरण, अनुवाद, आलोचना आदि अनेकानेक विधाओं में अपने समय के प्रति जिम्मेदार लेखन किया है। ईराक, अफगानिस्तान, सिरिया, पाकिस्तान व भारत के राजनीतिज्ञों तथा प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों के साथ उन्होंने साक्षात्कार किये तथा कई नाटक लिखे जो बहुचर्चित हुए। ‘अदब में बायीं पसली’ के छह खंडों में एफ्रो-एशियाई कवियों लेखकों की कविताओं, कहानियों आदि का प्रकाशन एक ऐतिहासिक योगदान है। उन्होंने रेडियो धारावाहिक तथा टी.वी. धारावाहिक लिखकर भी अपनी तरह का अनूठा योगदान दिया है। इराक़ के रमांदी कैम्प में ईरानी युद्ध बंदियों पर बनी फिल्म में भागीदारी की, जिसमें उनके साक्षात्कार के बाद 100 बाल बंदियों की पहली खेप की आज़ादी की शुरूआत हुई। आपने इंग्लैंड, ईरान, इराक़, सिरिया, दुबई, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, फ्रांस, थाइलैंड, हांगकांग, नेपाल आदि देशों की सांस्कृतिक एवं साहित्यिक यात्राएं की हैं।


     नासीरा शर्मा

     डाॅ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’


प्रो. चमोला:  आप अपने जन्म, शिक्षा-दीक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएं। आप को अपने पिता से किस तरह की शिक्षा मिली और उनकी यादें.....

नसिरा शर्मा: मेरा जन्म इलाहाबाद में उर्दू प्रोफेसर एस.एम. जामिन अली के यहाँ हुआ था। मेरे नौ बहन भाई थे। जिस में से हम पाँच ज़िन्दा रहे। दो भाई और दो बहनें। मैं चैथी औलाद थी। बड़े भाई हैदर अली जो अंग्रेजी भाषा के अध्यापक थे। उनसे छोटी बहन फात्मा हसन जो उर्दू भाषा में कहानियाँ लिखती थीं। उनका कुछ काम उतर प्रदेश के खनाबदोशों और क़बीलों पर था। उनसे छोटी बहन मंसूरा हैदर थीं। वह हिस्टोरियन थीं और उर्दू में शायरी करती थीं। मगर उन्होंने कभी छपवाने की ख़्वाहिश नहीं रखी फिर मैं और मेरे बाद मेरा छोटा भाई मज़हर हैदर जो अंग्रेजी के पत्रकार थे। हमारे यहाँ लिखने-पढ़ने की खुली छूट थी घर में बहुत शानदार लाइब्रेरी थी जिस में नायाब पुस्तकें व पाण्डुलिपियाँ थीं। हमारा ख़ानदान सादगी पसंद था मगर उस में सौन्दर्यबोध था। हम लोग ज़िला रायबरेली के मुस्तफाबाद गाँव के हैं जो अब ऊँचाहार ट्रेन के चलने से इसी नाम से जाना जाता है। हमारा खानदान तीन-चार विचारधाराओं व पार्टी के अनुयायी रहे हैं-कांग्रेस, साम्यवादी, किसान आन्दोलन, धार्मिक मगर उन सब की मूलप्रवृत्ति ख़ालिस साहित्यिक रही। ज़मींदारी के समय और बाद में नौकरी पेशा अपनाने के बाद भी वह साहित्य-संगीत से जुड़े हुए हैं उसका कारण उनकी सोच में कर्बला जीवित रहा जिसकी याद में हर वर्ष कुछ नए सोज, मर्सिये और नौहे लिखते और उसकी धुनें तैयार करते हैं जिस में क़सीदे भी शामिल हैं मोहर्रम व चैहल्लुम भर, यह सोग मनाने यानी रोने और साथ में संगीत का बेहतरीन नमूने, खुशआवाज़ में दो माह तक बराबर चलते रहते हैं। मैंने बचपन में ही उन्हें खो दिया था मगर उनके चर्चे शहर के विभिन्न वर्गों के इंसानों से बहुत सुने हंै। उन्हें गोल्फ खेलने का शौक़ था। मुशायरों की महफिलें तो जमती ही थीं। शायर हमारे मेहमानख़ाने में रहते जो बाहर से आते। अंगे्रज़ों का भी ख़ूब आना-जाना था। गाँव में आस-पास के अदीबों-कवियों की महफिलें जमती मगर यह सब मैंने नहीं देखा। पंडित नेहरू व गाँधी जी भी तश्रीफ़ लाते थे। मैं आज़ाद भारत में पैदा हुई जब होश संभाला तो मेरे अपनी दुनिया व उसका परिवेश था। जो बिल्कुल एक दूसरे से जुदा था। मैंने शुरुआत में कानवेंट से पढ़ाई शुरु की फिर लड़कियों में शिक्षा फैले उस आन्दोलन व विचार के चलते मैंने गे्रजुएशन दूसरे काॅलेज से किया और आखरी एम.ए. की डिग्री मार्डन फारसी में ली।

प्रो. चमोला:  आपने कानवेन्ट में पढ़ाई शुरु की फिर एकाएक हमीदियां गल्र्स काॅलेज में जाना अखरा नहीं ?

नसिरा शर्मा: मुझे तो बहुत फर्क महसूस होता, मैं चुपचाप रहती और ख़ामोशी से खाने की छुट्टी में क्लास में बैठी बैठी पेन्टिग बनाती और क्लास की दीवारों पर लगाती। लड़कियाँ मेरी दोस्ती के लिए बेचैन रहतीं। दो साल बाद सातवीं कक्षा में मेरा घुलना, मिलना और दोस्ती की शुरुआत हुई जो बाद तक चलती रही।

प्रो. चमोला:  साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण का अवसर आपको विरासत के रूप में मिला अथवा इसके लिए आपको ख़ुद की ज़मीन तराशनी-तलाशनी पड़ी!

नसिरा शर्मा: दोनों ही बातें सच हैं। हमारे वारिसों का सिलासिला रहा है जिस में कवि और लेखक दोनों रहे हैं। कुछ अपने समय के लोक प्रिय एवं मशहूर साहित्यकार रहे। जिनकी किताबे छपीं वह दीमकों से बच नहीं पाई और यही हाल पाण्डुलिपियों का हुआ। इस सब तबाही के बाद जो बचीं वह हस्त-लिखित हैं जिनकी सियाही अभी तक मद्धिम नहीं पड़ी है जो हैरत में डालती हैं। हमारे पुरखों ने कई भाषाओं में रचनाएँ लिखी-अवधी, उर्दू, फारसी, अरबी, अंग्रेजी और नई पीढ़ी ने उस में हिन्दी भाषा जोड़ दी। अब रहा मेरा सवाल तो मैं उस समय बड़ी हुई जब ख़ानदान का शानदार शामियाना उतर चुका था। बटवारा देश का और जमींनदारी व्यवस्था का टूटना एक साथ हुआ। संयुक्त परिवार टूटा, जो पढ़ लिख कर बेकार बने रहे और कुछ समय की डोर पकड़ हर तरह से तरक़्क़ी की तरफ बढ़ने लगे। उन से गांव और खेत छूटने लगे वह नौकरी पेशा होकर शहर के बन गए। मेरी किशोर अवस्था तन्हा रही। बड़े भाई-बहनों की शादियाँ और वालिद की मौत ने मुझे ऐसा कोई बुज़ुर्ग या साथी नहीं दिया जो मेरी रहनुमाई कर सकता सिवाए अम्मा के प्रोत्साहन के जो शिक्षा एवं साहित्य के प्रति बहुत उत्साहित और जागरूक थीं। स्कूल की क्रिश्चियन प्रिंसिपल जो नए हिन्दूस्तान के लिए हमें हर तरह से तैयार कर रही थीं और हमारे अंदर छुपी हर खूबी को निकालने के लिए कोशिश में कार्यक्रम व पुरस्कार रखती थीं उनके रिटायरमेन्ट के बाद नई प्रिंसिपल जो आई वह हमें जागरूक नागरिक और रचनात्मकता से भरपूर बनाने की जगह हमें पीछे ले जाने लगीं जिस से हमारा दम घुटता था। जब हम विश्वविद्यालय पहुँचे तो सतही सियासत के चलते छह माह कोई क्लास ही नहीं हुई जैसे तैसे हम सब ने बी.ए. की डिग्री ली। यही हाल साहित्य में रहा कि न कोई उस्ताद रहा न गाडफादर न ही कोई रिश्तेदार, इसलिए लेखन में भी मुझे अपनी ज़मीन ख़ुद खोदनी और तराशनी पड़ी। 

प्रो. चमोला:  आपकी पहली रचना कब और कैसे प्रकाशित हुई? बल्कि इस से पहले मैं यदि यह बात पूूछूँ कि लेखन की प्रेरणा आपको किससे व कैसे प्राप्त हुई ?

नसिरा शर्मा: घर जब तक भरा पुरा था लिखने पढ़ने का माहौल रहा इसलिए ख़ुद भी लगता था कुछ लिखना चाहिए। काॅलेज की मैगज़्ाीन में एक रिर्पोताज आस्टेªलिया पर वहाँ जाए बिना लिखी थी उसका कारण घर की लाइब्रेरी में एक सचित्र पुस्तक थी उसे पढ़ने और देखने में बहुत मज़्ाा आता था। दूसरे एक कहानी ‘बच्चों की पत्रिका में छपी थी। कुछ चीेज़ें लिखती रही। माँ तो ख़ुश होती थीं साथ ही मेरी सहेलियाँ और टीचर भी मगर सच तो यह है कि अदब पढ़ने और उस पर बातें करने से लिखने के प्रति आकर्षण किशोर अवस्था से ही हो गया था।

प्रो. चमोला:  विभाजन से पूर्व का यह समय निश्चित रूप से बालिकाओं के लिए इतना उदारवादी समय तो नहीं था। ऐसे संक्राति काल में आपका लेखन के क्षेत्र में पदार्पण करना परिवार, संबंधियों, भाई-बहनों व अन्य मित्र-सहेलियों के लिए क्या कोई ईष्र्या का विषय तो नहीं था ? या फिर दूसरे शब्दों में यह कहूँ कि जिस क्षेत्र का वरण आपने मन ही मन कर लिया था, वह आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के अनुरूप था, अथवा नहीं? क्या इसके लिए आपको अपने परिवार या ससुराल से कोई असहयोग जैसा भाव तो नहीं महसूस हुआ, दोनों घरों में कुछ तो समानता होगी ? इस पर कुछ प्रकाश डालिए।

नसिरा शर्मा: इस तरह के सवाल जब मुझ से पूछे जाते रहे हैं तो मैंने कभी इतनी गहराई से सोचा नहीं मगर आपने जब विभाजन से पूर्व का समय उठाया तो मुझे सोचना पड़ा कि आखिर हिन्दुस्तान के किस वर्ग को नज़्ार में रख कर यह सवाल लोग मुझ से पूछते हैं जबकि मैं तो विभाजन के बाद पैदा हुई और कह सकती हूँ कि हिन्दुस्तान जब आज़ादी के बाद की मुश्किलों से निकल आया तो वह समय तो देश का बड़ा जागता और ऊर्जा से भरपूर समय था। साठ से लेकर नब्बे के दशक तक देश और उसके नागरिक उपलब्धियों और हर जीवन क्षेत्र के विकास से मुतमईन और गौरन्वित थे। गाँव की दशा में भी तबदीली आ रही थी। मेरा सारा लेखन, यात्रा, टीवी प्रोग्राम, नाटक का यही दौर तो था। अब मैं विभाजन के पहले का समय लेती हूँ जब हम ग़्ाुलाम थे। शोषित थे तब देश में लड़कियों की क्या स्थिति थी। यहाँ भी मुझे लगता है कि किसी खास वर्ग के पिछड़ेपन को नज़्ार में रख कर सवाल किया गया है। देश आज भी कई अर्थों में पिछड़ा है उसके कई कारण हैं। उस समय को जब मैं देखती हूँ तो सब से पहले मैं अपने परिवार पर नज़्ार डालती हूँ जहाँ मेरी बहनें उस समय इलाहाबाद के बेहतरीन स्कूल में जाती थीं। घर में दीनी व दूसरे विषय के अध्यापक हमारे घर पर रहते थे जो ख़ानदान के सारे लड़के लड़कियों को पढ़ाते थे दूसरे अंगे्रज़्ाी पढ़ाने अलग से एक मास्टर आते थे। उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापिकाएँ भी थीं। डाॅक्टर, इंजीनियर, नर्स, और राजनीति में भी औरतें सक्रिय थीं और उसी तरह वह अपने विषय में दक्ष और स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही थीं तो यह स्थिति तो भारत के दूसरे शहरों में भी थी तो सवाल उठता है कि यह औरतें आई कहाँ से थीं ? क्या हमारी ग़्ाुलामी के दौर में हम सब बुरा बुरा ही देख रहे थें या फिर अंग्रेज़ सरकार सोच, विकास, नीति कूरीतियों का विरोध और उत्पादन में कुछ बेहतर योगदान कर ही नहीं रही थी, मान लेती हूँ कि वह अपने लिए सहुलियतों के चलते कर रहे थे जिससे भारतीयों का वर्ग भी लाभान्वित तो हो ही रहा था। लिखना पढ़ना, कला साहित्य भी साथ साथ पनप रहा था। लेकिन जो संकीर्णता, द्वेष, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, नब्बे दशक के आख़िरी वर्षों से पनपना शुरु हुआ है और आज जहाँ पहुँचा है उसे आप औरतों, लड़कियों को नज़र में रखते हुए उदारवादी सोच के ढकोसले के पीछे क्या सचमुच आपने अपने लोकतंत्र को बहाल रखा और स्कूल, काॅलेजों, स्पेस पर जाती औरतों को आपके आज 2021 के समाज में पूरी आज़ादी दी और सही तरीके़ से इंसाफ रखा ? बच्चियों से बलात्कार, कामक़ाजी औरतों का बढ़ता तलाक़ दर, कार्यस्थलों पर उनका हरेसमेंट, मज़्ादूरी में फर्क, खाप पंचायतों की मनमानी, तेज़ाब से लड़कियों का चेहरा बिगाड़ उनकी जि़्ान्दगी तबाह करना, जहेज़ हत्याएँ, धर्म गुरुओं और कठमुल्लाओं की जिहालत इत्यादि गिनती बहुत लम्बी हो जायेगी क्योंकि आज सवाल बहुत हैं। स्वतंत्र भारत में शिक्षित वर्ग में ऐसी घटनाएँ और शोषण का शिकार औरतें हो रही हैं जिनके तरीके़ नए हैं। अब सवाल उठता है मैंने क्या व्यक्तिगत रूप से महसूस किया अपने लेखन के दौर में, तो मैं कहूँगी कि दोनों घरों में अपने लिखने-पढ़ने और सोचने पर न कोई पाबन्दी कभी लगाई न कोई एतराज़ किया गया कि तुमने ऐसा क्यों लिखा। रहा ईष्र्या का, उसका सामना मैंने भाई-बहनों व बचपन की सहेलियों और रिश्तेदारों के बीच कभी नहीं किया उल्टा मुझे प्यार के साथ सम्मान भी मिला। हाँ, जब तक मेरे लेखन व पत्रकारिता के दायरे को कुछ क़लमकारों ने नहीं समझा तो वह ज़रूर कुछ न कुछ कहते थे मैं काफी परेशान भी होती थी। लेकिन जो आदर और प्यार मुझे साहित्यकारों व पाठकों से मिला वह मेरी सब से बड़ी दौलत और प्रेरणा रही हैं। दूसरे मेरी बचपन से तमन्ना टीचर और राइटर बनने की थी वह पूरी हुई। जहाँ तक परिवारिक संस्कृति की समानता का प्रश्न हैं, दोनों परिवारों ने बराबर की समानता थी और है। मैंने इनके मुँह से सुना है कि घरमें आए मेहमान बिना खाना खाए कभी नहीं गए और वही आदत प्रो. शर्मा की थी चाहे वह एडिनवर्ग का घर हो या जे.एन.यू. या इलाहाबाद का और चाहे शिलाँग, मिजोरम या फिर नागालैंड में तन्हा रहने का वह ख़ातिर करना नहीं भूलते थे। हमारे घर का खाना सब बहुत याद करते हैं। वही हाल मेरे घर का  था बचपन में जो मेहमान आता उसके रिकशे का किराया दिया जाता और दोपहर हो या रात खाना खाकर या चाय नाश्ता करके जाना ज़रूरी था। अगर मेहमान देर तक बैठे तो घर के किसी ख़िदमतगार या फिर ज़िम्मेदार साहब को साथ किया जाता था वही हाल जे.एन.यू. में था। डाॅ. शर्मा और मैं या तो उसे बस स्टाॅप तक छोड़ने जाते या फिर कार से उन्हें छोड़ा जाता। मेरे इलाहाबाद व मुस्तफाबाद में दावतों के खानों की बहुत चर्चा होती थी। दरअसल मेरी फूफी ज़बर्दस्त मजे़दार नई नई डिशंे बनाती थीं जो यक़ीनन बुजुर्गों से सीखी होगी। दावतों का खाना ज़्यादातर घर की औरतें अपनी निगरानी में पकवाती थीं। मोहर्रम में एक खास क़िस्म की मसालेदार चाय बनती थी जो बड़े से देग़ में मसालों की पोटली डालकर बनाई जाती थी।

प्रो. चमोला:  आपके लेखन की शुरुआत कब और कैसे हुई? ऐसी कौन-सी दिलचस्प, मार्मिक घटना और असंतोष आपके बालमन को खरोंच गया कि जिसकी व्यथा-कथा किसी को कहने बताने के बजाए आपको लिखने में सुखानुमुक्ति हुई ? इसकी कोई विशेष वजह ?

नसिरा शर्मा: मुझे याद नहीं पड़ता कि ऐसी कोई घटना जो मेरे दिल को ख़रोंच गई हो और मैं उसके किसी को बताने की जगह लिख पाई हूँ। वैसे बहुत सी ऐसी घटनाएँ आईं और गईं। उनकी गिनती करना मुश्किल है। मगर छपाने वाली या ऐसी कोई घटना नहीं घटी जो शर्मनाक हो। तीसरी कक्षा में जब थी तो स्कूल की प्रतियोगिता में कहानी लिखी कि लगातार कुछ न कुछ लिखती रही थी। फिर 1976 में सारिका के नवलेखन अंक में ‘बुतखाना’ छपी तब कमलेश्वर उसके सम्पादक थे। 

प्रो. चमोला:  जैसे किसी ख़ास उम्र के बाद लड़कियों में दैहिक परिवर्तन आने शुरु हो जाते हैं, क्या उसी तरह का कोई बौद्धिक परिवर्तन, चिंतन के स्तर पर आपके बाल मस्तिष्क में भी आने लगा था, इस बात को आपने कब महसूस किया? फिर अपनी पढ़ाई-लिखाई, घर का कामकाज व लेखन के मध्य संतुलन आपने कैसे बिठाया ?

नसिरा शर्मा: सोचने और ख़ामोश रहने की आदत मुझ में बचपन से थी। मैं अपने परिवेश की हर छोटी-सी तब्दीली और लोगों के तौर-तरीके़ को महसूस भी करती और उसको समझने की कोशिश भी करती थी। मैंने किताबों से कहीं ज़्यादा अपने देखने और सुनने से सीखा है इसलिए मैं कही बातों को उस आदमी के आचरण से समझती थी। अगर वह वैसा है जैसा कह रहा है तो ठीक है अगर वह उससे अलग लगता तो मेरा विश्वास टूटता। उसे क्या फर्क़ पड़ता मगर मेरे अन्दर एक समझदारी सी आने लगी थी। इसके अलावा बहुत सी ऐसी घटनाएँ घटी जिसने अक़्ल और सोंच के स्तर पर मुझे एक नतीजे पर पहुंचाया कि यह सच है ऐसा भी हो सकता है। सोंच के स्तर पर मेरी जड़ता टूटती और मैं बौद्धिक रूप से किसी न किसी नतीजे पर पहुँचती रही। इलाहाबाद वाले घर में नौकर थे। मगर जब वह बीमार पड़ते या छुट्टी पर जाते तो हम सब काम भी करते थे। सवाल का दूसरा हिस्सा शायद शादी के बाद की जि़्ान्दगी के बारे में आप पूछना चाह रहे हैं तो मैं कहूँगी जब गम्भीरता से मैंने क़लम पकड़ा तो मेरे दो बच्चे उस समय छोटे ही थे। श्रछन् परिसर में रहने का एक अलग अनुशासन व सुरक्षा थी। मुझे पूरा वक़्त अपने लेखन के लिए मिलता था। उन दिनों घर में मेहमानदारी भी बहुत होती थी। इसके बाद सब से अच्छी बात यह थी कि डाॅ. शर्मा सारा बोझ मुझ पर नहीं डालते थे न बच्चे ही मेरे लिखने में खलल डालते थे। इस सब के बावजूद हम न बच्चों से लापरवाह थे और न ही एक दूसरे के साथ समय गुज़्ाारने में कोई कोताही बरती।

प्रो. चमोला:  लेखन की भावप्रवण व सतरंगी दुनिया में ख्वाबों की काग़ज़ी नाव में तैराना इतना आसान तो नहीं था। लेकिन पहले-पहल अपने मन के भावों को काग़ज़ पर अंतरित करने के लिए आपको सब से सशक्त विधा कौन लगी और क्यों लगी? आपके लिए सब से सरस विधा कौन-सी थी ?

नसिरा शर्मा: ऐसा कुछ सोंच कर मैंने क़लम नहीं उठाया। जब बच्चों के लिए लिख रही थी उसी के साथ लम्बी कहानियाँ, लेख भी लिख रही थी और अनुवाद भी कर रही थी। सब कुछ बहुत छोटे पैमाने पर बिना किसी पूर्व योजना या पसंद को लेकर क़लम नहीं उठाया मगर जब कोई विषय कहानी के लिए मुझे नहीं लुभाता और मैं सीधे-सीधे कुछ कहना चाहती थी तो लेख लिखा। हर विधा अपनी जगह सशक्त है।

प्रो. चमोला:  कहा जाता है कि हर रचनाकार के लेखन की शुरुआत प्रायः कविता से होती है क्या आपके साथ भी यह बात लागू हुई ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस रचनात्मक संचार के साथ-साथ आपके भीतर सौन्दर्य अथवा प्रेमानुभूति के अंकुर भी साथ-साथ अंकुरित होते जा रहे थे जो रचना की पृष्ठभूमि के समानान्तर आपके लिए ऊर्जा का पर्याय भी थे, कृपया इस पर प्रकाश डालें।

नसिरा शर्मा: शुरु से मेरा झुकाव गद्य की तरफ था जो भी क़लम से निकला वह शुरु में गद्य ही था। मुझे शायरी पढ़ना और सुनना अच्छा लगता है। पत्रिकाओं में छपी कविताओं को आज भी पढ़ती हूँ और नए और स्थापित कवियों के संग्रहों को भी बड़ी रूचि के साथ पढ़ा है लेकिन कविता लिखने की तरफ मेरा रूझान कम रहा है गोकि बीच-बीच में कुछ कविताएँ लिखी ज़रूर हैं जो समाजिक मुद्दों और प्रकृति के सौन्दर्य पर रहीं मगर उन में भी इन्सान मौजूद था क्योंकि वह भी कायनात का हिस्सा है चूंकि प्रेम-गीत या कविताएँ मैंने नहीं लिखीं इस लिए प्रेम और साहित्य की कोई घुलावट रोमान्टिक नहीं हुई मगर प्रेम तो हर इन्सान के अन्दर अपने विस्तृत अर्थों और अभिव्यक्तियों में विभिन्न रिश्तों से जिसे इन्सानी रिश्ते कहते हैं वह हमेशा मौजूद रहता है। यही सम्वेदनाएँ लेखन की कसौटी है जो मानवीय सरोकारों से जुड़ी होती हैं।

प्रो. चमोला:  आपने हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं में व्यापक लेखन कार्य किया है? आपकी सब से पसंदीदा विधा क्या है और उसके पीछे कोई ख़ास वजह ?

नसिरा शर्मा: मैं ऐसा तो नहीं कह सकती हूँ कि कौन-सी विधा मुझे ज़्यादा पसन्द है मगर अब मुझे महसूस होता है कि हर विधा का एक मौसम होता है जैसे एक ज़माने में मैंने कहानियाँ ज़्यादा लिखीं और कोई उपन्यास नहीं लिख पाई। ‘जि़्ान्दा मुहावरे’ मेरा चैथा उपन्यास 1999 में आया, और उसके बाद कहानियों और लेखों का संग्रह आता रहा। अब इधर अरसे से मेरा कोई कहानी संग्रह नहीं आया और 2003 से 2017 तक कुल आठ उपन्यास आए नवां प्रेस में है। फिर भी कहानी लिख कर आप को जल्द मुक्ति मिल जाती है और ख़ुशी का अहसास होता है मगर उपन्यास में लम्बे समय तक आपको उस में डूबा रहना पड़ता है तब जाकर आप सृजन की पीड़ा से मुक्त हो पाते हैं।

प्रो. चमोला:  आप देश की पत्र-पत्रिकाओं में पिछले लगभग छह दशकों से अधिक समय से अनवरत लिख रहे हैं, अपने पाठकों पर आपकी कोई प्रतिक्रिया ?

नसिरा शर्मा: दरअसल पाठक लेखक की दौलत होते हैं और सच्चे पारखी, जबकि आलोचक निष्पक्ष नहीं हो पाते, कहीं पर साहित्यिक सियासत तो कहीं पर पसन्द न पसन्द और कहीं पर विषय को गहराई से न समझ पाने के कारण वह पूरी तरह न्याय नहीं कर पाते हैं मगर पाठक, अपने अन्दर उपजे सवाल पूछते हैं संवाद करते है और कृति को समझने की कोशिश करते हैं साथ ही वह कुछ जगहों पर अपनी असहमति भी प्रकट करते हुए अपना दृष्टिकोण भी रखते हैं। इन सारी बातों को नज़्ार में रखते हुए कह सकती हूँ पाठक लेखक के सही पारखी होते हैं।

प्रो. चमोला:  बाल साहित्य के प्रति लोगों का रूझान घट रहा है, पत्र-पत्रिकाओं से यह दिन-ब-दिन गायब हो रहा है। इसके पीछे आप क्या कारण समझते हैं ?

नसिरा शर्मा: सम्पूर्णता में ‘बाल साहित्य कोना’ कम से कम होता जा रहा है। कुछ समाचार-पत्र अभी भी उसको सुरक्षित रखे हुए हैं। रहा सवाल बाल-साहित्य का तो भारत में उसकी अपनी कोई विशेष जगह पहले नहीं थी। मौलिक लेखन की जगह जातक कथाएँ, पंचतंत्र और दन्त-कथाएँ ही बच्चों को पढ़ने के लिए मिलती रही है मगर समय के साथ काॅमिक, सचित्र सीरिज़्ा पत्रिकाएँ पुस्तक आनी शुरु हुईं। पत्रिकाएँ निकलने लगी और बाल-साहित्य लिखने वाले लेखकों की संख्यां भी बढ़ी और मौलिक रचनाओं को पढ़ने के प्रति रूचि भी बढ़ी। यह एक बहुत बड़ा बदलाव था। सेमिनार व वर्कशाप भी हुए। नेशनल बुक ट्रस्ट का भी योगदान रहा जो आज भी है मगर धीरे धीरे कर के पराग चन्दामामा, नन्दन, पत्रिकाएँ बंद हुई और एक बार फिर बच्चों की पुस्तकें व काॅमिक की कमी आ गई। बच्चे पहले रशियन बाद में अंग्रेज़्ाी बाल साहित्य की तरफ बढ़े। हिन्दी में कोई ऐसा आन्दोलन नहीं चलाया गया जिस में सुन्दर पुस्तकों व चित्रों के साथ बच्चों को आर्कषित कर हिन्दी पढ़ने की आदत डाली जाए। हिन्दी में बच्चोें की किताब बिकती कम है जिससे प्रकाशकों का उत्साह उन्हें छापने में नहीं रहता। सरकार विशेष रूप से इस ओर ध्यान दे।

प्रो. चमोला:  आपको लेखक बनाने में किसका प्रमुख योगदान रहा परिस्थितियों का या अपने जि़्ाद्दी अथवा हठी स्वभाव का ?

नसिरा शर्मा: मुझे लेखक बनाने में दोनों का कोई योगदान नहीं रहा। कोई किसी को कैसे लेखक बना सकता है यदि उस में सृजन की क्षमा व गुण न हों मगर प्रोत्साहन ज़्ारूर दे सकता है। सही और ग़्ालत की समझ दे सकता है कि लेखन में क्या ज़्ारूरी और क्या ज़्ारूरी नहीं होता है। किसी भी कृति की तराश ही उसको कसौटी पर खरी उतारती है। दूसरे यही बात आपके सवाल के दूसरे पक्ष पर भी लागू होती है। परिस्थितियाँ ठोकरें मार कर आपको परिपक्व बना सकती हैं। समझ बढ़ा सकती हैं मगर लेखक कैसे बना देंगी? लेखक किसी मजबूरी की तहत नहीं बनता बल्कि मजबूरी और जि़्ान्दगी का उतार चढ़ाव उसके लेखकिय गुण व दृष्टि में गहराई की क्षमता व अनुभूतियों की बारीकियाँ बढ़ाता है। बेशक कोई जि़्ाद या हठ में लेखक बन भी गया तो मेरी नज़्ार में लिखना और सृजन करना दो अलग बातें हैं। इसलिए यह दोनों ही चीज़ें मुझे लेखक बनाने में सीधे कारगर साबित नहीं हुई। हर इन्सान में कुछ न कुछ ख़ूबियाँ होती हैं उन ख़ूबियों को अगर निखरने का अवसर मिल जाता है तो वह कुछ कर दिखाती हैं।

प्रो. चमोला:  आपके साहित्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पीएचडी और एम फिल स्तरीय कई शोध कार्य संपन्न हो रहे हैं। आज के शोधार्थियों के प्रति आपकी कोई खास प्रतिक्रिया ? 

नसिरा शर्मा: स्तर तो गिरा है इसमें कोई शक नहीं है। पहले जो शोध विद्यार्थी थे उन में लगन और अपना एक दृष्टिकोण होता था जिसका समर्थन उनके गाइड करते थे धीरे-धीरे सब कुछ स्त्री विमर्श के दायरे से सिमटता चला गया जिसमें ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती और दूसरी थेसिसों और लेखों और ख़ुद के अन्दर के गुबार को निकाल शोध-पत्र लेखक के साक्षात्कार के साथ तैयार हो जाता है यदि विद्यार्थी नया विषय या नए दृष्टिकोण से शोध-पत्र लिखना चाहे तो अकसर उसके गाइड उसके लिए दिक़्क़तें पैदा कर देते हैं तो भी यह कह सकती हूँ कि कुछ गाइड और विद्यार्थी बहुत दिल से बहुत मेहनत से काम करते और करवाते हैं। लेखक को बहुत सुकून मिलता है जब उसका लेखन दूसरों की नज़्ारों मंे क्या है और उसमें  से क्या निकाला गया जो स्वयं लेखक की आँखों से ओझल था। पी.एच.डी. ज़्ारूरी बना कर टीचर बनने से पहले विद्यार्थी कुछ पढ़ और लिख लेता है मगर हर टीचर जरूरी नहीं है कि वह शोध भी बढ़िया करे यदि उसकी रूचि नहीं है, बेहतर है कि एक अच्छा निष्ठावान अध्यापक बने। 

प्रो. चमोला:  जब आपके लेखन का नोटिस उच्च शैक्षणिक संस्थाएँ एवं प्रबुद्ध साहित्यकार, हिन्दी सेवी व आलोचक प्रभृत्ति लोग भी लेने लगते हैं तो आपके लिए अपने कर्तव्य-पथ पर अधिक तीव्रता व सजगता से बढ़ने का दायित्वबोध भी उसी अनुपात से बढ़ जाता है। यह लेखन धीरे-धीरे प्रसिद्धि के साथ-साथ समाजिक स्वीकृति का भी प्रतीक व पर्याय भी बन जाता है क्या आप इस बात से से सहमत हैं ?

नसिरा शर्मा: जी बिल्कुल! आपको अपना काम सामने लाना होता है और काम खुद बोलता है।

प्रो. चमोला:  बचपन की अबोध क्षणों में क्या आपने किसी से प्रेम किया है ? वह प्रेम की पारदर्शी व स्वच्छ दृष्टि से कितना स्थायी और शाश्वत थी ? क्या उस अनुभूत प्रेम को आपने अपनी कहानियों अथवा लेखन मंे अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है ? 

नसिरा शर्मा: जिन अर्थो में आप पूछ रहे हैं वैसे किसी अनुभव से मैं अपनी किशोर अवस्था में नहीं गुज़्ारी मगर हाँ एक दो टीचरों को लेकर ज़्ारूर मैं इस तरह की भावनाओं से गुज़्ारी हूँ जब वह बहुत अच्छी लगती थीं। जब काॅपी चेक करती और मैं पास खड़ी होती तो मेरा दिल कानों में धड़कता और एक दो बार अकेले में उन को मैंने फूल भी दिए यह कह कर कि फूल तो मुरझा जाते हैं मगर अक़ीदत के फूल कभी नहीं मुरझाते। अब आप इसे जो समझें। 

प्रो. चमोला: एक मुस्लिम परिवेश में पली बढ़ी बालिका के मन में अनायास हिन्दू परिवार से जुड़ने की क्या इच्छा जागृत हुई ..... जिसने जीवन के समस्त विरोधों व विसंगतियों की परवाह न करते हुए यह सब स्वीकार किया। क्या इसके पीछे भी किसी प्रेम की प्रकाश कहानी की ही भूमिका तो नहीं थी ? जिसने जाति, धर्म व संप्रदाय से ऊपर उठा कर अपने मंतव्य व गंतव्य की ओर अग्रसर होने के लिए आपको प्रेरित किया ? 

नसिरा शर्मा: इत्तफ़ाक़ है और इस से ज़्यादा क्या कह सकती हूँ। रहा हिन्दू-मुस्लिम घराना तो हम दोनों उस दायरे से ऊपर उठ चुके थे। हम दो धर्म या दो समाज, की तरह नहीं मर्द-औरत की तरह भारतीय समाज में अपने मानवीय सरोकारों की तरह रहे। हमारे घरों में हमारी इज़्ज़्ात भी हुई और प्यार भी मिला।

प्रो. चमोला: नासिरा जी, आप का लालन-पालन मुस्लिम परिवार में हुआ और शेष जीवन यापन हिंदू परिवार में... तो आपके पास अपनी रचनाधर्मिता के लिए जो संवेदना का व्यापक कैनवस था... या दूसरे  शब्दों में कहूँ जो (रॉ मटेरियल) कच्ची सामग्री  है ....वह अधिक अपने मायके के परिवेश से मिली अथवा अपने ससुराल के परिवेश से?  दोनों में आप क्या समानता अथवा असमानता या विपरीतता पाती हैं...... और किस प्रकार इससे आपका लेखन प्रभावित होता है ?   

नसिरा शर्मा: हम ज़रूर मुस्लिम परिवार में पैदा हुए मगर भारतीय परिवेश में पैदा हुए जिसका समाज भाँति-भाँति के धर्म, जात-पात, नस्ल और रीति-रिवाजों व मान्यताओं से बना है। हमारे घरों की कैफियत बंद दरवाज़्ो या इकहरी नहीं रही। गाँव की ज़्ामीनों पर काम करने वाले हलवाहे, बाग़्ाों के रखवाले, घरों में अनाज की सफाई करने वालियाँ अलग-अलग जात, धर्म और आस-पास के गाँव के भी रहे हैं। जिन्हें हमारे घरों में कोई न कोई रिश्तों के नाम के साथ बच्चे जोड़ देते थे और बड़े उन्हें नाम से पुकारते थे जिस से नई पीढ़ी के कान और आँखें इनको बेगाना नहीं अपना समझते थे और उन से अवधी भाषा में बोलते थे जिसमें उर्दू-हिन्दी के शब्द अपनी सुन्दर सजावट के साथ मौजूद रहते थे। शादियों और अन्य समारोहों में वेज व नाॅनवेज का बाक़ायदा इंतज़्ााम होता था। एक सम्मान व प्यार का रिश्ता था। घर के मुशायरों और महफ़िलों में हिन्दू शायर भी शिरकत करते थे और उर्दू के रसिया भी। वहाँ भी न कोई भेदभाव था न अलगाव का अहसास! ऐसे खुले माहौल में जीने वाला लेखक वही लिखेगा जिस माहौल में उसकी परवरिश हुई। सांझी भारतीय संस्कृति जो मेरे लेखन में बड़े सहज भाव से उभरती हैं। और मेरे लेखन को जि़्ान्दगी की, ख़ासकर भारतीय समाज की धड़कन देती है।

सवाल का दूसरा हिस्सा ब्राह्मण से विवाह और ससुराल के  क़ायदे क़ानून तो जवाब है मेरे सरोकारों, संस्कार ओर विचार का विस्तार हुआ। बंदिशें नहीं थीं। ससुराल के माहौल में राजस्थान (अजमेर) में ज़्यादा रह नहीं पाई। उसका कारण था कि माँ यानी मेरी सास शादी के चन्द साल बाद गुज़र गई और सभी बहन-भाई नौकरी के हिसाब से अन्य नगरों में बस गए जिनसे सम्पर्क और मिलना-मिलाना बना है। ईद, बख़रीद, नया साल, होली-दिवाली में हम एक दूसरे को मुबारकबाद देना नहीं भूलते हैं। मेरे मायके में धार्मिक जकड़न नहीं थी ख़़्ाुद प्रो. शर्मा में धर्म को लेकर कर्मकांड या मंदिर जाना जैसी कोई पाबन्दी न थी। वह धर्म पर बात नहीं करते थे। हमारे बीच यू.पी. और राजस्थान को लेकर न रिश्तेदारों को लेकर कभी मज़्ााक या कटाक्ष हुआ। हमने इन्सानी रिश्तों पर यक़़ीन रखा और एक नई तरह की बुनियाद घर की डाली जिस में कोई बंद दरवाज़ा नहीं रखा। 

अब सवाल के तीसरे हिस्से का जवाब है इंसानियत, शराफत, शिक्षा, रिश्तों का सम्मान, किसी भी तरह की जड़ता या संकीर्णता का न होना यह हमारी समानता रही है। लेकिन मेरे लेखन में पानी की समस्या को लेकर लिखे उपन्यास ‘कुंइयाजान’ में राजस्थान के गाँव का हाल उभर कर आया जहाँ मैं गई और लोगों से मिली उनसे बातें की। वह हिस्सा उपन्यास का बेहद सुन्दर और हिला देने वाला है। मेरा ध्यान राजस्थान की तरफ जाता भी नहीं अगर प्रो. शर्मा के ज़रिए उनके बचपन में पानी की कमी का ज़िक्र न सुनती।

प्रो. चमोला: उस दौर में विवाह जैसे मुद्दे पर धर्म परिवर्तन का साहस रखना एक लड़की के लिए निश्चित रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहा होगा तो क्या आपके परिवेश ने आपके इस प्रस्ताव को सहज रूप में स्वीकार कर लिया था? ..... या फिर आपको इसके लिए कुछ बगावत करनी पड़ी ? प्रायः व्यक्ति जिस परिवेश में अथवा भाषा-संस्कारों में जन्म पाता है.... उसी में अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य को भी अनुभव करता है लेकिन एक दूसरे संस्कृति में आने पर आपको किसी प्रकार की कोई भाषा के स्तर पर अथवा सांस्कृतिक रूप में किन्हीं अंतरों अथवा अंतर्विरोधों का सामना तो नहीं करना पड़ा...जब आपको अभिव्यक्ति व चेतना के स्तर पर अपना निर्णय कुछ हल्का महसूस हुआ हो... क्या आप अपने को उसी तरह से सहज महसूस करती रही जिस तरह से आप अपने मायके के परिवेश में रहती थी ? हिंदू रीति-रिवाजों को समझने अथवा अपनाने में आपको किसी प्रकार की कोई असुविधा जैसी अनुभूति तो नहीं हुई ?... या फिर इसके समानांतर अपने रीति-रिवाजों को उस शिद्दत व प्रवाह के साथ न मना पाने की विवशता के घुटन आपको कचोटती तो नहीं  थी ? क्य आपको कभी मुसलमान होने का दंश सहना पड़ा ?   

नसिरा शर्मा: पहले तो मैं आपकी ग़्ालतफ़हमी दूर कर दूँ। हम में से किसी ने धर्म नहीं बदला था न धार्मिक रीतिरिवाज से विवाह किया था। हम दो लोगों ने साथ रहने का तय किया था न कि धर्म के साथ जीने का इसलिए हम दोनों अपनी-अपनी हक़ीक़तों और पहचान के साथ रहे। इसलिए घुटन, पछतावा, दुःख, कुंठा ऐसे भावों का हम दोनों को कभी अहसास नहीं हुआ। उन्हें सिंदूर भरना, मंगलसूत्र पहनना या दूसरी बातों का कोई शौक़ नहीं था बल्कि उनको पसंद नहीं था तो मैंने कभी उनकी इच्छा के विरुद्ध ऐसा कुछ नहीं किया जिसे वह पसंद न करते हों। उन्हें छोटे बाल पसंद थे। मैंने कमर तक झुलते बालों को कन्धे तक कटवा लिया। उन्हें औरतों का सिगरेट पीना, ड्रिंक करना पसंद था। जो औरतें पालिटिक्स पर बात करती थीं उन्हें भाता था। मगर उन्होंने यह सब कुछ ज़्ाोर ज़्ाबरदस्ती से नहीं करवाया बल्कि बार-बार अपनी पसंद को दोहराया। हमारी जि़्ान्दगी एडिनबर्ग में शुरु हुई जहाँ इन्हें ब्रिटिश कौन्सिल स्काॅलरशिप मिला था जिस में पत्नी और बच्चों का खर्च भी शामिल था। इनका टाॅपिक पी.एच.डी. का थार रेगिस्तान था प्रोफेसर वास्टन के अंडर थेसिस पर काम हो रहा था जो अपने समय के सीनियर और बेहतरीन ज्योग्राफरों में गिने जाते थे। हमारा उठना बैठना, मिलना मिलाना वहाँ के क्रीम इंटेलेकचुअलस के बीच था जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्कालर व प्रोफेसर शामिल थे जो ब्रिटिश कौन्सिल के स्काॅलरशिप पर थे। दरअसल हम खुले आकाश पर उड़ानें भर रहे थे वैचारिक, व्यवहारिक ज्ञान और नए देशों की फैमली से घुलमिल कर बहुत कुछ सीख रहे थे। हमारे पास इन सारे पुराने सवालों, जड़ता, सर्कीणता की कोई जगह नहीं थी। वहाँ हुई मित्रता आज भी कायम है जो नहीं रहे उनकी यादें व तस्वीरें हैं। ‘इब्नेमरियम’ की कई कहानियाँ इन्हीं अनुभूतियों की देन हैं। जहाँ तक मुसलमान होने का दंश की बात है मुझे याद नहीं आता। वैसे भी भारत में सहने वाला वर्ग सियासत या ग़रीबी के कारण मार खाता है। मगर हाँ प्रोफेशनली तो जरूर कुछ सहना पड़ा वह तो संर्कीणता थी हमारे विवाह को लेकर मगर ऐसा कोई हादसा या अपमान सिर्फ मुसलमान होने के करण नहीं सहना पड़ा। 

प्रो. चमोला: क्या भाषा, अनुभूति एवं व्यवहार के स्तर पर आने वाली ये परिवर्तनगत चुनौतियां कहीं न कहीं आपके लेखन की विचार- सामग्री में सहायक तो नहीं बनीं ? दो संस्कृतियों के मध्य के सामंजस्य में कौन सी ऐसी समस्याएं व अनुकूलताएं थीं जिन्हें आप सकारात्मक मान सदैव अपने गंतव्य की ओर अग्रसर होती रहीं ? और क्या कुछ नकारात्मक भी ?   

नसिरा शर्मा: सच पूछें मैंने दो संस्कृतियों को गंगा-जमुनी संस्कृति के रूप में जिया है। उसी नज़्ारिए से अपने मायके व ससुराल को देखा। उस में न टकराहट थी न ही कसैलापन मगर एक बात जो मैं अपने आत्मतर्पण ’वह एक कुमारबाज़ थी’ में लिख गई थी वह वास्तव में मेरा सच है अगर मैं यह शादी न करती तो आधा हिन्दुस्तान ही जी पाती। संवाद में क़लम से जुम्ला निकल पड़ा था मगर आप जितने भी खुले दिमाग़ और दूसरे समुदायों के दोस्त रखते हों मगर इस तरह के रिश्ते एक अलग तरह की मधुरता लाती है अब रहा सवाल लेखन पर प्रभाव क्या रहा तो उसका जवाब है जब क़लम हाथ में आता है तो सृजन अपना काम करता है वह चरित्रों को समाज से उठाता है हिन्दू-मुस्लिम समझ कर नहीं बल्कि इन्सान समझ कर उसके दुःख सुख की बात करता है।

प्रो. चमोला: पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते आप अपने लेखन एवं चिंतन के लिए समय कैसे निकालती थीं ? निश्चित रूप से भोज्य-तालिका (डमदनम) के अनुरूप ही लेखन की भी कोई मेन्यू होता होगा... तो दोनों डमदनमे को आप किस प्रकार व्यवस्थित करती थीं ?.... खानपान का मेन्यू और अपने चिंतन लेखन का मेन्यू....जिसके निकष पर पति, पुत्र- पुत्रियां, पारिवारिक दायित्व एवं घर गृहस्थी के असंख्य कार्य भी थे... इन सबके चलते किस प्रकार आपने अपने बिखरे हुए अनुभवों को संयोजित कर कथा-सूत्र में पिरोना प्रारंभ किया ?   

नसिरा शर्मा: सारी ज़िम्मेदारियों के बावजूद मुझे लिखने का पूरा मौक़ा मिला मगर जब जामिया में अध्यापन कार्य कर रही थीं तब ज़रूर घर-नौकरी के बीच लिखने का समय रहता ही नहीं था तब खोयापन और घुटन-सी लगती थी इसके बावजूद मेरी यात्राओं का भी सिलसिला लगातार चलता रहा और प्रो. शर्मा ने जि़्ाम्मेदारियों को बांटा भी। घर से मेरी माँ खाना पकाने वाली पुरानी बुआ को कभी भेज देती थीं। बच्चों का भी सहयोग मिला क्योंकि उनकी आदते ठीक थीं।

प्रो. चमोला: यह मानना कितना औचित्यपूर्ण होगा कि कोई भी लेखक अपनी अनुभूति को प्रथमतः कविता में ही अभिव्यक्त करने में ज्यादा सहजता महसूस करता है । क्या आप के संदर्भ में यह बात सही है ? आपने लिखना किस विधा में प्रारंभ किया.....उस विशेष विधा की वजह क्या थी ?   

नसिरा शर्मा: गद्य से मैंने अपना लेखन शुरु किया। मेरा ख्याल है कि हमारा समय गद्य लेखन का है। वैसे मैं कविता व उर्दू शायरी व अनुवाद खूब पढ़ती हूँ मगर शायरी की तरफ मेरी रूझान नहीं रहा। 

प्रो. चमोला: मैं स्वयं एक लेखक हूं और यह महसूस करता हूं कि लेखक का समग्र व्यक्तित्व कहीं न कहीं उसके कृतित्व यानी रचनाओं में खंड- खंड रूप से उपस्थित रहता है । यदि किसी लेखक के समग्र व संपूर्ण व्यक्तित्व के चित्र को देखना हो या उसे उसकी समग्र कृतियों को जोड़कर देखा जा सकता है ।  क्या आप इस बात से सहमत हैं या आप भी ये मानती हैं कि भोगा हुआ जीवन-यथार्थ ही अधिकांशतः अपनी रचनाओं में रूपांतरित हो जाता है...... क्या आपकी कोई ऐसी विशेष रचना है जो जीवन के आत्मीय यथार्थ से उपजी हो ?   

नसिरा शर्मा: मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि लेखक का व्यक्तित्व उसके साहित्य से झलकता है उसके विचार सरोकार, समय के प्रति जागरूकता, जरूरी प्रश्नों से मुठमेड, आलोचना, आक्रोश, अन्याय, शोषण इत्यादि इत्यादि उसके पक्ष को उजागर करता है मगर उस में लेखक को ढूँढना क़तई ज़्ारूरी नहीं है विशेष कर मेरे लेखन में ऐसा नहीं है। मैंने जाने कितने अपने भारतीय समाज और विदेशी धरती से चरित्र पेश किये हैं, कैसे सम्भव हो सकता है कि मैं उस में अपने दुख डाल सकती हूँ ? दूसरे, मैं किसी असली चरित्र की हूबहू तस्वीर नहीं उतारती मेरी रचनाशीलता ख़ुद किरदार का रूप लेती है।

प्रो. चमोला: किसी भी रचना का जन्म, विचार की बुनियाद पर होता है। क्या आप यह महसूस करती हैं कि जो विचार जितना अधिक बहिर्मुखी अर्थात कागज पर अभिव्यक्त होता है...तो उससे कई गुना अधिक वह आंतरिक रूप से कल्पना अथवा मंथन में विवेचित-विश्लेषित होता है । वैचारिक-परिपक्वता की अवधि के उपरांत ही रचना का जन्म होता है  या कागज पर उतरती है... आप इस संदर्भ में क्या कहना चाहेंगी ?   

नसिरा शर्मा: काफ़ी हद तक सही है। सम्वेदना का भी बहुत बड़ी भूमिका रहती है। मेरे साथ कई तरह की प्रक्रिया चलती हैं। कभी कोई वाक्य किसी का चुभ जाता है या फिर कोई शब्द बहुत दिलचस्प लगता है और वह मेरी सृजन की ज़मीन को चिटखा देता है और तब मंथन चलता है फिर सम्वेदना और विचार अपने साथ अनुभूतियों को अहसास दिलाता है मगर अक्सर यह भी होता है कि अचानक क़लम, काग़्ाज़्ा पर दौड़ने लगता है, तब लगता कोई शक्ति है या फिर लिखने की ललक है। यह भी सही है कभी भावना को व्यक्त करने में शब्द मुनासिब नहीं मिलते तो कभी शब्दों की गुलकारी कुछ ज़्यादा बयान कर जाती है। 

प्रो. चमोला: लघु कथा से कहानी; कहानी से लघु उपन्यास और लघु उपन्यास से वृहद उपन्यास तक की कथा-यात्रा के विस्तारण के पीछे का रसायनशास्त्र क्या है ? क्यों कोई रचना लघु कथा में समा जाती है, कोई कहानी में, कोई लघु उपन्यास में... और कोई वृहद उपन्यास में भी समाये, नहीं समाती.... इस कायिक विस्तार के बारे में विस्तार से बताने का कष्ट करें...अखोट रचना विस्तार क्यों चाहती है ?   

नसिरा शर्मा: मैं समझती हूँ सब कुछ विषय पर आधारित है। विषय का चयन ही लेखक को महसूस करा देता है कि विस्तार और फैलाव के लिए इसमें कितनी गुँजाइश मौजूद है। मैंने ‘अक्षयवट’ में शहर इलाहाबाद को मुख्यपात्र के रूप में लिया जिसके चार चरित्रों को उठाया या कहूँ उन असमाजिक तत्वों के रूप में उन शक्तियों को उठाया जो सफेद लिबास में अत्याचार, भ्रष्टाचार और क़ानून को खिलौने की तरह इस्तेमाल करते हैं पहला भ्रष्ट पुलिस, दूसरा जालसाज वकील, तीसरा, अराजक गुंडे, चैथा बगुला भगत नेता। यह स्तम्भ मेरे उपन्यास में आम आदमी की ज़िन्दगी में किस तरह का हस्तक्षेप करते हैं और न्याय करने वाले भी परेशान हो उठते हैं। अपने ही विभाग के चन्द लोगों के चलते पूरी तरह बदनामी का ठीकरा उन्हीं पर टूटता हैं इसमें बेकार मगर पढ़े लिखे लड़कों का संघर्ष है। मोहल्ले और गलियाँ जिनके अलग-अलग चरित्र हैं। यह लघु उपन्यास या कहानी में अपनी बात कह सकती थी मगर पूरा शहर न उठा पाती। इसी तरह ‘कुइयाँजान’ है जो इलाहाबाद से राजस्थान, पटना, गाँव, कस्बा से लेकर विदेश तक जल की समस्या को लेकर चलता है यह भी कई सौ पेज का उपन्यास है जैसे परिजात जो इलाहाबाद - लखनऊ को लेकर चला है मगर उस में विदेश की धरती का ब्यान है मगर ‘जिन्दा मुहावरे’ बटवारे के 45 वर्ष बाद लिखा मेरा उपन्यास है जो सिर्फ डेढ़ सौ पेज का है। जिस में हिन्द व पाक के बीच के रिश्तों के साथ मानसिकता भी उभरी हैं जिस तरह ‘अजनबी जज़्ाीरा’ या ‘दूसरी जन्नत’ ‘अल्फा-बीटा-गामा ’यह सवा सौ पेज पर ख़त्म हो जाते हैं। मेरी कुछ कहानियाँ 20-25 पेज की हैं और कुछ दस और कुछ केवल एक पन्ने या आधे पन्ने पर अपनी बात कह जाती हैं। मेरा पहला उपन्यास ‘बहिश्ते ज़्ाहरा’ (सात नदियाँ एक समन्दर) तो हज़्ाार पेज का बन सकता था यदि मैं आज लिखती। ईरान की क्रान्ति पर लिखा वह उपन्यास समय का दस्तावेज तो है जो चाह कर भी अब वह सब नहीं लिख सकती है क्योंकि उस समय की मैं गवाह रही हूँ और अब दूर बैठ कर वह सारे 35-40 वर्षों को खबरों, दूसरों के लिए बयानों से उठाती तो उस की भाषा व आभिव्यक्ति अलग तरह से उभरती। वैसे कहा जाता है कि यादों से निकल कर जो चीज़्ों लिखी जाती है उसका रंग कुछ और ही होता है। मगर वक़्त को शब्दों में कैद करना भी एक अहम काम होता है।

प्रो. चमोला: आपने हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं में व्यापक लेखन-कार्य किया है ? आपकी सबसे पसंदीदा विधा क्या है और इसके पीछे कोई खास वजह ?

नसिरा शर्मा: पहले मेरा जवाब होता था कहानी मगर अब जवाब दूसरा है। जो विषय जिस विधा के लिए मुनासिब समझती हूँ उस में रस भरती हूँ खूब चाव से लिखती हूँ। अब मेरी अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है मेरे लिए कोई विशेष विधा नहीं।

प्रो. चमोला: आप अपने कथा के पात्रों का विन्यास किस प्रकार करते हैं ?  क्या आपके पात्र कल्पना की लिजलिजी भावुकता से उपजे हुई पात्र होते हैं अथवा अपने पास परिवेश के जीते-जागते, देखे-भाले... सामान्य जीवन के किरदार ? उन पात्रों की रचना में क्या कहीं नासिरा जी का अपना चिंतन व व्यक्तित्व भी आंशिक रूप से प्रतिबिंबित होता है अथवा नहीं ?

नसिरा शर्मा: न तो मेरे पात्र कोरी कल्पना से निकलते हैं और न हूबहू किसी चरित्र को वैसा का वैसा ही उतार देती हूँ। मैं कई किरदार कहें या इन्सान कहें उन्हें मिला कर अपने चरित्र रचती हूँ उस में बेशक मेरे विचार व सम्वेदना आती होगी मगर किरदार अपनी बात कहता है तब वह संवाद जाने कहाँ से ज़हन में आ जाते हैं और बात बनना शुरु हो जाती है। पुलिस से मेरा साबक़ा बहुत पड़ा है उनकी चाल-ढाल बोलने का अन्दाज़ लगातार सड़कों, न्यायालय और थानों में देखा है फसाद के दौर में, चिलचलाती दोपहर में खड़े देखा है। उनकी गालियों से भरी और बेहद मुलायम स्वर में शिष्टता से बात करते देखा है जो ‘अक्षयवट’ के त्रिपाठी का चरित्र उन सब का मिश्रण हैं उस में यक़ीनन मेरे अवलोकन, मेरी देखी घटनाओं और उनको गहराई से समझने की कोशिश शामिल है जो मेरी सृजनात्मकता से मेरी अपनी भाषा-शैली में उभरती है। दूसरी अहम बात जब मैं कोई चरित्र को तख़लीक़ की प्रक्रिया में होती हूँ तो उसका पूरा ख़ाका तैयार करती हूँ उसकी शक्ल, पसन्द वह कहानी के पात्र के रूप में कहाँ और कैसे अपनी भूमिका दर्ज करने वाला है। वह संवाद में शब्द का चयन कैसा करेगा। गर्ज कि किरदार को शब्दों में खड़ा करना आसान काम नहीं है यदि वह अपने वजूद का असली चेहरा लेकर नहीं उभरता तो किरदार पाठक को कितना प्रामाणिक और अपना लगेगा और कोई भी छाप वह पाठक के दिल व दिमाग़ पर नहीं छोड़ पायेगा। उसका ग्राफ भी देखना होता है कि कितना सधा हुआ है जो पाठक को बाँध सके और पाठक उसके साथ-साथ चले।

प्रो. चमोला: आप अपनी नायिकाओं का चयन समाज की किस तबके  से और कैसे उठाती हैं ? अपनी कथा यात्रा में या अपने साहित्य में आप नारी को किस रूप में चित्रित करना चाहती हैं.....या फिर उसका कौन सा रूप देखना चाहती हैं...भोली-भाली, क्षमाशील, गो-स्वरूपा... या प्रतिक्रियावादी व क्रांतिकारी.....अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सर्वथा सचेत?...  या फिर नारी का वह जीवन, जो स्वयं नासिरा जी ने जिया है या फिर वह... जो उनके सपनों का यथा-संभावित परिष्कृत, परिमार्जित और समादृत जीवन ?

नसिरा शर्मा: जब शुरु में लिखना आरम्भ किया था तो तय किया था कि औरत की छबि कभी भी नकारात्मक नहीं दिखाँऊगी और हमेशा उस का एक विशिष्ठ स्थान रहेगा। वही चरित्र उठाऊँगी जो स्वाभिमानी, ग़लत बात पर न झुकने वाली, जुल्म के ख़िलाफ मुंह खोलने वाली मगर जैसे-जैसे अनुभव का दायरा बढ़ता गया भ्रम टूटता रहा कि औरत भी षडयंत्री, प्रतिक्रियावादी, अत्याचारी, ज़्ाहर घोलने वाली होती हैं जो भोली भाली क्षमाशील बड़े दिल वाली औरतों को ही नहीं बल्कि मर्दों को चकमा देने वाली भी होती हंै चाहे वह संख्या में कम हो या पर्दा दर पर्दा अपनी हरकतें मिठास का लबादा पहन अंजाम देती हैं आख़िर वह भी तो इंसान है अपनी अच्छाई और बुराई के साथ, तो फैसले की घड़ी थी कि क्या उन्ळें भी सामने लाया जाए ? लेकिन क़लम हमेशा उन औरतों के पक्ष में उठा जिनको जरूरत थी कि उन चरित्रों द्वारा समाज की रूढ़ीवादिता, संकीर्णता और औरतों पर होने वाले ज़्ाुल्म को उजागर किया जाए मगर एक वक़्त ऐसा आया कि मैं उन औरतों के किरदार भी उठाने लगी। अब रहा मेरी चाहत का सवाल तो मैं चाहूँगी कि लड़कियाँ क्रान्तिकारी बने, परंतु आधी क्रान्तिकारी नहीं। अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति सचेत रहें खासकर मानव अधिकार की कल्पना को केवल अपने तक न समेटे बल्कि रिश्तों की समझ और अहमियत को समझें। क़दम ऐसा उठाएं जो समाज को बदलाव की तरफ ले जाए और यह काम धीरे-धीरे होता है शगूफा छोड़ने से नहीं। अब रहा मेरा सपना तो मैं चाहूंगी हर औरत को उसका सपना पूरा करने का मौका मिले वह नासिरा शर्मा से बेहतर से बेहतर बने।

प्रो. चमोला: आप एक सफल लेखिका के साथ-साथ एक सफल माँ,  गृहणीय,  बहन, पत्नी आदि अनेकानेक अन्य संबंधों की भूमिकाओं का भी सफल निर्वहन करती रहीं, लेकिन आपको एक स्तरीय लखिका बनाने में आपके परिवार की क्या भूमिका रही ?.... क्योंकि परिवार के बनावट और बुनावट आपकी चिंतन की प्रथम प्राथमिकताओं में से एक रहा... लेकिन आपके  लेखन को  मिले अपने परिवार के सहयोग को आप किस रूप में याद करना चाहेंगी?

नसिरा शर्मा: बेहद ख़ूबसूरत और बेहतरीन भावनाओं के साथ मैं शुक्रिया अदा करती रही हूँ और करती हूँ। मुझे  लेखन की स्वतंत्रता, यात्राओं की आज़्ाादी बोलने पर अंकुश नहीं। संक्षेप में मेरे लेखक को आदर और सम्मान के साथ हर तरह की सहूलियत मिली जिस में मेरे बच्चे भी शामिल हैं। लेकिन साथ ही जहाँ यह माहौल मिला वहीं मेरे प्रोफेसर शौहर ने फैमली के लिए कुर्बानी भी दी। जब वह शिलंाँग में भूगोल विभाग की स्थापना कर रहे थे तब हम लोग तीन साल दिल्ली में रहे। मेरा फारसी में पांच वर्ष की एम.ए. की पढ़ाई और एयरफोर्स स्कूल में बच्चे पढ़ रहे थे। उस समय प्रोफेसर शर्मा डीन और प्रोफेसर की पोजिशन पर थे। उन्हें लगा यदि वह सिर्फ अपना करियर की ऊँचाईयां देखेंगे तो हम सबको एक अलग तरह के इलाके में बाक़ी जि़्ान्दगी गुज़ारनी पड़ेगी। विभाग स्थापित हो चुका था। कोर्स बन चुका था। वह अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करके जे.एन.यू. में अपने पुरानी पोजिशन ‘रीडर’ की पोस्ट पर वापस आ गए। कुछ दिन वह मिस करते रहे मगर कभी हम को इस बात का अहसास नहीं दिलाया। मैं आज जो भी हूँ अपने परिवार से मिले प्यार, सम्मान और सहयोग के कारण हूँ  जहाँ हमने बच्चों को बेपनाह प्यार दिया और दोस्तों के साथ दोस्ती निभाई। जब जिसने चाहा हमने गैरों की भी मदद की अगर वह हमारे बस में होती थी।

प्रो. चमोला: आपका लेखन  दो संस्कृतियों का सेतु  है । दोनों संस्कृतियों को अपने करीब से देखा-भाला है... इसमें आपको किस संस्कृति का चित्रण करने में अधिक सुखद अनुभूति होती है और क्यों ?  साथ ही आपके पाठकों में कौन सा वर्ग आपको आपके लेखन की किन विशेषताओं या विशिष्टताओं के लिए याद करता है....पाठकीय प्रतिक्रिया के आधार पर अपने किन्हीं संस्मरणों से इस बात को सिद्ध करने का कष्ट करें... क्योंकि आप या कोई भी लेखक, पाठकों को पूंजी (दौलत) ही  मानता है ?

नसिरा शर्मा: मैं पूरे भारतीय परिवेश से अपनी कहानी उठाती हूँ। मेरे लिए कोई विशेष वर्ग, धर्म या जेंडर अहम नहीं है। मैं परिधियों को तोड़ती हूँ मिसाल के तौर पर आप  ‘शाल्मली’ और ‘ठीकरे की मंगनी’ या फिर शब्द ‘पखेरु’ और ‘दूसरी जन्नत’ को समाने रख सकते हैं जो परिवेश, भाषा-शैली में एक दूसरे से अलग हैं। मगर उस में एकाकी माहौल नहीं बल्कि साझा समाज उभरता है। मेरी ढेरों कहानियाँ भी इसी तरह से है चाहे वह ‘इब्ने मरियम’ हो या फिर ‘चार बहने शीशमहल’ की या ‘सबीना के चालिस चोर’ हो या फिर ‘सरहद के इस पार’ हो। लेकिन एक बात ज़रूर कहना चाहूँगी कि जिनको ‘शाल्मली’ पसन्द आई उन्हें ‘ठीकरे की मंगनी’ उतना प्रभावित नहीं कर पाई या जो ‘ठीकरे की मंगनी के दीवानें हुए वह शाल्मली को पसन्द नहीं कर पाए मगर कुछ ऐसे उपन्यास मेरे हैं जो हर पाठक की पसंद बने उसमें कोई बटवारा न था जैसे ‘जि़्ान्दा मुहावरे’ ‘कुइयाँजान’, ‘बहिश्ते ज़हरा’ (सात नदियाँ एक समन्मर) ‘परिजात’ इत्यादि। रहा पाठकों को अपनी दौलत समझना तो यह मेरा ही कहा जुम्ला है। हिन्दी के लेखन को पसन्द करने वाले हिन्दी पाठक हैं जिनकी प्रेरणा और प्यार बराबर मिलता रहा, हाँ जो रचनाएँ उर्दू में आईं उन्हें उर्दू वालों ने बड़े चाव से पढ़ा। हिन्दी-उर्दू के बीच सेतू की तरह वह पाठक भी हैं जो हिन्दी-उर्दू जानने वाले हैं। वह हिन्दी में छपी मेरी रचना पढ़ते हैं दिल चाहा तो उर्दू में अनुवाद भी कर देते हैं।

प्रो. चमोला: दो संस्कृतियों को नए वैचारिक चिंतन, नवोन्मेष, नई भूमिका एवं भावोवेश के साथ प्रस्तुत करने के लिए क्या कभी आपको अपने समकालीनों के द्वारा ईर्ष्या की दृष्टि से तो नहीं देखा गया ? 

नसिरा शर्मा: जी बिल्कुल। पता नहीं क्यों मेरी ज़रा सी तारीफ सुनना कई साथियों से सहन नहीं होता। यह देख  दुख होता था अब हंसी आ जाती हैं। मेरे पाठक ही उनको जवाब देते हैं फिर मुझे फुर्सत कहाँ कि इस तरह की बातों को गम्भीरता से लूं।

प्रो. चमोला: आपने जितना व्यापक स्तर पर कार्य किया है उसका मूल्यांकन.... उसकी तुलना में काफी कमतर प्रतीत होता है...। क्या आपको ऐसा लगता है कि आजकल के आलोचकों की दृष्टि विषय अथवा रचना पर केंद्रित न होकर व्यक्ति विशेष या खेमे विशेष पर अधिक केंद्रित होती है जिससे मूल्यांकन परदर्शिता का सर्वथा अभाव दिखाई देता है... या फिर यथार्थ को छुपाकर... अस्तरीय को स्तरीय बनाने की जद्दोजहद का बोलबाला वाला भाव मुखरित होता दिखाई देता है... आलोचकों की आलोचना दृष्टि के बारे में आपका क्या कहना है ?

नसिरा शर्मा: आपके सवाल से मैं पूरी तरह सहमत हूँ जो आलोचक पहले नम्बर पर गिने जाते थे उन्होंने मेरे ऊपर एक शब्द भी न बोला न लिखा मगर मेरे ऊपर जिन आलोचकों ने लिखा उनकी मैं शुक्रगुजार हूँ। एक तरह से अच्छा ही हुआ कि मुझे आलोचकों ने नजर अंदाज किया। मैं सोचती हूँ इस तरह मैं पाठकों के ज़्यादा नजदीक हुई और लगातार अपना काम करती रही। कमी तो उन पाए के ओलाचकों की कम नज़री है जिन्होंने अपने समय के लेखन को सम्पूर्णता में परखा नहीं और साहित्यिक दंगल करते रहे। या एक ख़ास ग्रुप या प्रकाशक के लेखकों की किताबों की परिक्रमा आलोचना के नाम पर करते रहे। मुझे जो लिखना था लिखा जो पाना था वह पाया, जो छीना गया उसने मुझे ऊर्जा दी।

प्रो. चमोला: यद्यपि पुरस्कार किसी रचना और रचनाकार के मूल्य-निरूपक नहीं होते..... फिर भी स्तरीय रचनाओं पर गुणता आधारित प्राप्त पुरस्कारों का अपना महत्त्व होता है ।  पुरस्कारों का साहित्यिक रचनाधर्मिता में या जीवन में क्या योगदान है  ? क्या वही रचना श्रेष्ठतम मानी जाती है ...जो श्रेष्ठतम पुरस्कारों से सम्मानित होती है ?. किंतु दूसरी और इतिहास गवाह है कि अद्भुत और विलक्षण रचनाएं भी तथाकथित बड़े पुरस्कारों से पुरस्कृत नहीं हैं.... किंतु वे तब भी कालजयी रचनाएं हैं । क्या आज के पुरस्कार, रचनाकार की योग्यता, रचना की स्तरीयता पर दिए जाते हैं.......आप पुरस्कारों की चयन-प्रक्रिया के बारे में एक लेखिका के रूप में क्या अवधारणा रखती हैं ?

नसिरा शर्मा: आप ने सही कहा मगर जहाँ सब कुछ बदल रहा है वहाँ यह धारणा भी बन चुकी है कि पुरस्कार आपके लेखन की कसौटी तय करता है जो कि मेरी नज़र में ग़ैरज़रूरी बात है। जब कमज़ोर कृतियों को पुरस्कार घोषित होता है तो धक्का लगता है फिर अपना मापदंड पर आँच न आए तो कुछ अच्छी पुस्तकों को मिल जाता है तो ख़ुशी होती है। सब बातें सब की समझ में आती है मगर कर कुछ नहीं पाते हैं। कई तरह का दबाव, पक्षपात सब सुनने को मिल जाता है।

प्रो. चमोला: नासिरा जी, आप लेखिका के साथ-साथ स्वयं एक प्रबुद्ध स्त्री हैं.... अपने लेखन में आपने स्त्री को किस रूप में उकेरना चाहा है ? .....और आप समकालीन संदर्भ में स्त्री के किस रूप को अधिक प्रभावी व प्रभुत्वशाली देखना चाहती हैं ?  आपके स्त्री पात्रों में क्या विशेषता है जो आपके लेखन, चिंतन व आपको अन्यों से पृथक करती है ?

नसिरा शर्मा: मेरी ख़्वाहिश है कि औरतें अपनी लड़ाई का कैनवास बड़ा करें। अभी तक हम बेसिक लड़ाइयों में फंसे हुए हैं क्योंकि अधिकतर न समाज की सोच न मर्द का नज़रिया औरत को लेकर बदला है जो थोड़ी बहुत तब्दीली आई है या तो वह मंचों और भाषणों तक सीमित होकर रह गई है या फिर वह तब्दीली एक जगह पर उसे स्वतंत्रता देती है मगर अगले कदम पर रोड़े अटका देती है जिस से वह पुरुष भी परेशान हो उठते हैं जो वास्तव मंे औरतों की मदद करना चाहते हैं मगर समाजी जकड़न जिस में जड़ सोच के मर्द-औरत दोनों शामिल रहते हैं वह न अपनी सत्ता छोड़ना चाहते हैं न खुद को बदलना चाहते हैं। जहाँ-जहाँ औरतें एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए लड़ी है वहाँ उन्होंने लड़ाई जीती हैं। चाहे चिपको आन्दोलन हो या नशाबन्दी या मज़दूरी बढ़ाने जैसे मुद्दे हों का असर तो हुआ मगर जहाँ वह आपस में लड़ती हैं वहाँ वह कमज़्ाोर पड़ जाती हैं। ज़्यादातर शिक्षित औरतें एवं अधिकारों के प्रति ज़ागरूक औरतें, अपना बुनियादी  अधिकार चाहती हैं जहाँ उन्हें काम करने की आज़ादी हो और बराबरी की मानवीय हिस्सेदारी हो, वह जब नहीं मिलती तो घर टूटते हैं और जिसका असर बच्चों पर पड़ता है। कहीं कहीं पर कमाने की आज़ादी मिलती है मगर सिर्फ वहीं तक जहाँ तक घर वाले चाहते हैं। इन बातों की प्रतिक्रिया जो उभरती हैं वह मर्द विरोधी रूप में सामने आती हैं और औरत की सारी इनर्जी खा जाती है। कमाने और तरक़्क़ी के बावजूद वह अकेली पड़ जाती है। हिन्दुस्तान एक बड़ा देश है जात-पात धर्म, रीति रिवाज अलग अलग प्रान्तों और वर्गों के हिसाब से हैं जिनकी परेशानियाँ भी तरह तरह की है। हर औरत व लड़की का सपना भी उसी की पसन्द और हालात से निकलता है जो दूसरी महिला से जुदा हो सकता है मगर बुनियादी ज़्ारूरतें व प्यार-सम्मान तो हर इन्सान का अधिकर है उस में मर्द-औरत में भेद करना उचित नहीं समझती हूँ। यह तो मैं नहीं बता सकती हूँ कि मेरा लेखन मुझे दूसरों से किस रूप में पृथक करता है मगर यह बात बहुत से लेखकों, पत्रकारों और पाठकों का भी कहना है। रहा विचार और सम्वेदना को लेकर तो मैं कभी एक पक्ष, एक नज़रिए, अपने व्यक्तिगत अनुभवों को कुंठित अभिव्यक्ति या आक्रोश को अपने लेखन में नहीं उतराती हूँ मेरा तेवर, मेरा क्रोध, मेरा दुःख दरअसल अन्याय और उस सामाजिक जकड़न व जड़ता के विरुद्ध उमड़ता है जो मैं सहन नहीं करती हूँ। मगर कभी अपने फफोले नहीं फोड़ती हूँ।

प्रो. चमोला: अरबी और इराकी साहित्य के बारे में आपका लगाव कैसे बढ़ा ? क्या भारतवर्ष के अन्य प्रदेशों अथवा भाषाओं का साहित्य पढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं था.......जो आपको अपने कथा संसार की ज़मीन तलाशने के लिए विदेश की धरती की ओर रुख़ करना पड़ा.....ऐसा सोचने के पीछे कोई ख़ास वजह ?

नसिरा शर्मा: यदि ऐसा होता तो मैं सब से ज्यादा कहानियाँ स्काटलैंड पर लिखती जहाँ मैं काफी लम्बे अरसे के लिए रही बनिस्बत ईरान व इराक़ के जिस को आप अरबी-फारसी साहित्य कह रहे हैं। मेरे लिए अरबी व फारसी के प्रति न लगाव रहा न मैंने कभी सोचा कि मैं इस भाषा को पढ़ूंगी या वहाँ जाऊँगी। मैं ज्योग्राफर बनना चाहती थी मगर अपना एम.ए. उस सब्जेकट में नहीं कर पाई। जे.एन.यू. स्कूल आॅफ में लैग्वेजेज़्ा का सेन्टर जब खोला गया तो एक दो वर्ष बाद महसूस किया गया कि उन भाषाओं को जिनमें एक ही विद्यार्थी है उसे बन्द कर देना चाहिए। एक घबराहट तो उन भाषाओं के अध्यापकों में फैल गई। फारसी की अध्यापिका के सामने बहुत बड़ा संकट था। उनकी बहन बीमार थीं और माँ-बाप बूढ़े। उनकी नौकरी बचाने के लिए मैंने और रजिस्टार की पत्नी ने फारसी में एडमिशन ले लिया। तब फारसी में डिप्लोमा था अब उसके बाद वही सवाल पश्तो-भाषा के लिए आन खड़ा हुआ मैं वहां चली गई। तीसरे वर्ष फारसी का पांच साल का कोर्स शुरु हो गया तो उसमें संकेण्ड ईयर में दाखला मिल गया। फारसी में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। वहाँ ईरान में पहले दूसरे कक्षा में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों से कोर्स शुरु हुआ और बाद में मार्डन और क्लासिक फारसी व भाषा-साहित्य का इतिहास, सियासी समाचारों का अनुवाद सभी कुछ कोर्स में पढ़ना पड़ा। उसी बीच पहलवी साम्राज्य की पचासवीं सालगिरह आ गई जिस में दुनिया भर के फारसी अध्यापकों और विद्यार्थियों को तीन महीने की दावत दी गई। उस परीक्षा में पास होने पर 1976 में मेरी पहली यात्रा ईरान की हुई। ईरान की प्रकृति और वहां के लोगों के स्वभाव की सुन्दरता और अपनापन बहुत भाया ख़ास कर यह जानकर कि केवल भाषा से जुड़े ईरानी नहीं बल्कि आम और जवान पीढ़ी भारत के प्रति बहुत प्यार व सम्मान रखते हैं। यही बात मुझे इराक व सीरिया में नज़्ार आई जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया कि जिन देशों के बारे में कभी जाना नहीं सोचा नहीं वह मेरे हिन्दुस्तान को अपने इतना क़रीब समझते हैं। वहाँ से इंडो-ईरान सम्बन्धों के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ी। फिर जब ईरान शाहनामा पर काम करने दोबारा ईरान ख़ुद के ख़र्चे पर गई तो वहाँ क्रान्ति की जो सुगबुगाहट पहले वर्ष में जबानी सुनी थी वह अचानक खुल कर सामने आ गई।

प्रो. चमोला: मध्य पूर्वी देशों खासकर ईरान जैसे देशों के प्रति आपके लगाव का मूल कारण क्या रहा ?   क्या वहां आपको लेखन की अधिक उर्वरा ज़मीन अथवा पात्र संरचना या कथा संसार की सामग्री अन्य देशों से अधिक आपको मिली ? इस खिंचाव का कारण क्या था....... शाह के विरोध में लिखने की आपकी कोई विशेष वजह ?

नसिरा शर्मा: मैंने शाह के विरुद्ध क़लम नहीं उठाया मगर हाँ उन बुद्धिजीवियों व लेखकों-कवियों के प्रति लिखा जो क़लम, ज़बान की स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठा रहे थे। उस आवाज़ के साथ बहुत कुछ और जुड़ता गया। मैंने अपने जीवन में इन्सान का इतना ख़ूबसूरत रूप नहीं देखा था जब वह अपने अधिकार के लिए गोली खाने को तैयार हो। भारत में वही सारे दृश्य स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हुए होंगे जिसकी मैं चश्मदीद गवाह नहीं थी मगर उस दौर की चीजे़ पढ़ कर उस जज़्बे को तो समझी थी। बटवारे की त्रासदी का साहित्य पढ़ कर गहरे प्रभावित रही और अपनी ज़िन्दगी मंे यह सब देखकर मैं उस से पूरी तरह जुड़ गई। फिर लेखकों व कवियों से मंत्रियों या मौलवियों के इन्टरव्यू लिए। रेजा शाह और आर्या मेहर ने ईरान के लिए बहुत कुछ किया था। मगर जब पेट्रोल का नैश्नालाइजेशन डाॅ. मुस्दिक़ के दौर में हुआ तो ईरान से भागे हुए शाह को अमेरिका दोबारा सत्ता में ले आया और तब से सावक पुलिस और सी.आई.ए. का शासन बड़ी खामोशी से दाखिल हो गया। शाह आर्या मेहर धीरे-धीरे सारी सियासत समझ चुके थे मगर अब पावर उनके हाथ में नहीं रह गया था। साम्यवादी तूदेह पार्टी का वजूद ईरान में सवा सौ साल पुराना रहा है मगर अंकुश के साए तले बहुत से विभिन्न ग्रुप अमरिका के विरोधी थे जो बाद में उभरे। ईरान को सोवियत लैंड से भय रहा है मगर हावी अमरिका रहा। इस तरह से मौलवी आम आदमी को साथ लेकर साम्यवादियों के साथ एक मंच पर शाहविरोधी अर्थात अमेरिका विरेाधी बन गए। मानी बात है जब आप इम्पराडोर व्यवस्था की आलोचना करेंगे तो जो सरकार सत्ता में होंगी उसे तो निशाना बनाना होगा। अमेरिका सफल नहीं हुआ उसका सोचा कुछ नहीं हो पाया मगर उसने ईरान पर आर्थिक अंकुश लगाए तरह तरह से परेशान किया मगर ईरान झुका नहीं। इराक को भड़का कर दोनों देशों को लड़वा दिया चूंकि कुछ सत्ताधारी व नेता लालच में आ गए और इराक़ की दावा पार्टी ईरान समर्थक भी उस उम्मीद पर सद्दाम के ख़िलाफ़ हो गई और इराक़ लगभग तबाह हो गया। ईरान में ख़ुमैनी शासन के ख़िलाफ़ लोग थे और हैं भी मगर उन्होंने अमेरिका से हाथ नहीं मिलाया। संक्षेप में आपको बता रही हूँ। यह सब ताकि आप समझ सकें कि मैं इलाक़ाई शांति व सुरक्षा के प्रति सचेत हो गई क्योंकि हमारे दौर में अफ़ग़्ाानिस्तान और ईरान क्राँति हुई। अमेरिकन आर्मी इस इलाक़े में घुसने का बहाना ढूँढ रही थी। अफग़्ाान मुजाहिदीनों को अमेरिका उकसा रहा था जो भी रूस ने वहाँ विकास किया उस में भारत भी शामिल था वह सत्यानाश होता रहा फिर अमेरिका दाखिल हुआ उसने भी विकास की योजनाएँ चालाई मगर वह भी तालिबान को न ख़त्म कर पाया और न ही वहाँ ठहर पाया। हमारे सीमावर्ती देशों में यदि इतनी हलचल हो और प्रान्तों में भी तो समय के प्रति एक पत्रकार जो उस इलाक़े को थोड़ा बहुत जानता है वह ज़रूर अपना क़लम उठाएगा। हमारे बहुत से पत्रकारों ने छपी व सुनी खबरों के आधार पर लिखा कुछ ने वहाँ जाकर भी रिर्पोटिंग की मगर उस में इलाकाई या एशियाई समझ के स्थान पर अमेरिकन या रशियन या फ्राँस, जर्मनी का ही नज़रिया लेकर वह चले। मेरा जुड़ाव विश्व स्तर पर ईरान, इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के स्कालर, पत्रकार और शरणार्थियों से बन चुका था जो इस एरिया पर शोधकर्ता व सियासी एनालिसेस करते थे। मैं दिमागी तौर पर एक ऐसी ज़हनी दुनिया में पहुँच चुकी थी जिसके दरवाज़ा व खिड़कियाँ खुल चुके थे वही सूक्ष्म व गहरी दृष्टि भारत पर भी मेरी रौशन थी इसलिए दोनों स्थान मेरे लेखन से जुड़े। ढेरों लेख, रिपोर्ताज, उपन्यास कहानियाँ और अनुवाद हर विधा में अपने को व्यक्त करती चली गई। दरअसल आप सपने कुछ संजोते हैं और जि़्ान्दगी आपको कहीं और घसीट ले जाती है।

प्रो. चमोला: आप अपने कथा संसार के पात्रों का चयन मानवता के किस तबके से करती हैं ?  पुरुष और स्त्रियों दोनों की तुलना में आप किसको सबल व अधिक कौशलयुक्त देखना चाहती हैं ? जब आप स्त्री के गुणावगुणों का विश्लेषण करती हैं तो उन स्त्रियों के चरित्र में क्या कहीं नासिरा जी स्वयं भी होती हैं ?  आपके लिए स्त्री-पुरुष संबंधों के मायने क्या हैं ?

नसिरा शर्मा: जहाँ जुल्म और अन्याय है वहाँ मैं हूँ चाहे वह किसी वर्ग का हो? दोनों इन्सानों के दो रूप हैं जिनमें पक्षपात की मैं क़ायल नहीं हूँ। कुछ तो मेरे नज़्ारिए और पसन्द न पसन्द का अक्स झलकता होगा मगर मैं लेखन में अपने को थोपने से बचती हूँ और उस किरदार की सोच और सम्वेदना को पकड़ने की ज़्यादा कोशिश करती हूँ। हिन्दी में औरत-मर्द सम्बन्धों पर बहुत लिखा गया है। मगर ज़्यादातर लेखन शिकवे-शिकायत और अत्याचार से भरे एडोलेसंट पीरियड की कोरी भावुकता से लिखे गए हैं जो इकहरापन लिए हैं जहां बयान करने वाला अपने को मासूम पेश करता है। अभी हम रिश्तों को लेकर बालिग नहीं हो पाए हैं और परिपक्वता जो आनी चाहिए वह ज़्यादातर ग़ायब नज़्ार आती हैं चाहे वह जितना भी पढ़ा लिखा और अपने कार्यक्षेत्र में दक्ष हो। इस से एक दूसरे को समझने की जगह एक दूसरे को अपनी तरह बदलने की कोशिश होने लगती है। दो लोग दो अलग अलग घर में पले एक तरह से कैसे व्यवहार कर सकते हैं उस के लिए समय चाहिए जबकि घर में साथ पलने वाले बच्चे भी एक दूसरे से अलग व्यवहार आदत व सोच वाले होते हैं। ज़िन्दगी की कौन-सी ख़ुशियाँ आपको मिलने वाली हैं आपको पता नहीं होता है जब तक आप उस रिश्ते को जीते नहीं हैं। मगर कहीं कहीं बहुत बेजोड़ शादियाँ हो जाती हैं और प्रताड़ना व अत्याचार होता है वहाँ रिश्तों में ज़्ाबरदस्ती का पेवन्द लगाने की जगह अलग हो जाना ही बेहतर है। रहा मेरी सोच तो वह मैंने उपन्यास ‘शाल्मली’ और ‘ठीकरे की मंगनी’ में व्यक्त की है ‘औरत के लिए औरत’ और ‘औरत की आवाज़’ और ‘औरत की दुनिया’ लेखों के संग्रह व साक्षात्कारों में व्यक्त की हैं फिर भी संक्षेप में इतना कहूँगी कि मर्द-औरत को अपनी तरह फलने-फूलने और खिलने का मौका दे और इन्सानी अधिकारों के साथ उसको जीने दे।

प्रो. चमोला: आपको अपनी कौन सी नायिकाएं अच्छी लगती हैं..... हिंदू पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाली अथवा मुस्लिम पृष्ठभूमि की ?  इन दोनों में आप किस आधार पर अंतर देखती हैं ? दोनों के रचनाशिल्प पर आप को सराहना अथवा प्रतिक्रिया किस वर्ग से अधिक मिलती है ?

नसिरा शर्मा: ऐसा भेदभाव लेखक व पाठक के मन में रहता नहीं है खासकर उर्दू जानने वालों के मन में क्योंकि उर्दू को आगे बढ़ाने और लिखने वाले दूसरे धर्मों से रहे हैं। जिनके किरदार, परिवेश हमें उन से हमदर्दी और प्यार करना सिखाते हैं जैसे प्रेमचन्द, राजेन्द्र सिंह बेदी, रामलाल, कृष्णचन्दर, इत्यादि उसके अलावा ख्वाजा अहमद अब्बास, कर्रातुलएन हैदर, रजि़्ाया सज्जाद ज़हीर इसी तरह नए उर्दू के लेखक अपने पात्र हिन्दू, ईसाई, दक्षिण भारत के उठाते हैं तो मैं उसी गंगा-जमुनी सांस्कृतिक की पैदावार हूँ मेरे यहाँ ‘ततइया’ कहानी भी है जहाँ पत्तल बनाने वाली बारिन की कहानी है- तो ‘इमाम साहब’ मस्जिद में नमाज पढ़ाने वाले हैं। असली बात यह है कि आपने जिया क्या है? उस पर आपकी पकड़ कितनी है? उस समाज को कितना जानते-समझते हैं ? सिर्फ नामरख कर आप उखड़ा उखड़ा चरित्र केवल दिखाने के लिए गढ़ते हैं तो वह बेहद बनाउटी लगता है। मेरे उपन्यास ‘शाल्मली’ को बिहार भाषा परिषद का ‘महादेवी’ पुरस्कार मिला और जब अरसे बाद वह उर्दू में छपा तो उसे न सिर्फ दिल्ली-उर्दू बल्कि बिहार उर्दू अकादमी का पुरस्कार मिला। इसका साफ मतलब है उर्दू के लिखने वालों के लिए अच्छा लेखक और उत्कृष्ट साहित्य का महत्व है न कि धर्म, नाम या जातपात का। पाठकों द्वारा तीन तरह की अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं पहली कुछ पाठकों व लेखकों को मेरी मुस्लिम परिवेश की कहानियाँ ज़्यादा भाती हैं और कुछ मेरी दोनों तरह की और कुछ तो यह भी कह देते हैं कि आप केवल विदेशी परिवेश कहानियाँ लिखिए, बाक़ी तो सब लिख रहे हैं। मैं सरहदों को नहीं पहचानती मुझे जहाँ इंसान मेरी सृजनशीलता का शीशा चिटखा देता है वहीं से मेरी कहानी जन्म ले लेती है। लेकिन मैंने जिन पात्रों और परिवेश को जिया है उसी पर मेरी पकड़ सधती है बिलावजहा मैं दूर की कौड़ी नहीं ला पाती हूँ।

प्रो. चमोला: प्रायः कहा जाता है कि एक रचनाकार के सृजन के लिए भूगोल और इतिहास की दृष्टि से परिसीमित पृष्ठभूमि ही पर्याप्त है ........ अपने छोटे से जीवन काल में वह उन्हीं संवेदनाओं को पूरी शिद्दत के साथ चित्रित करने में सक्षम नहीं हो पाते....... लेकिन आपने सरहदों के भीतर न रहकर सरहदों के पार जाकर अपने साहित्य के लिए जमीन तलाशी .... क्या भारतवर्ष में ऐसी ज्वलंत समस्याएं अथवा हृदय को हिला हिला देने वाली संवेदनाएं नहीं बची थीं कि आपको इसके लिए कहीं और भटकना पड़ा ........ इस पूरे वृतांत पर आप क्या तर्क देना चाहेंगी ?

नसिरा शर्मा: मैं कहीं भटकने नहीं गई थी न अनुभव करने गई थी न भारत में मेरे लिए कोई कमी थी जो जहाँ जरूरी लगा अपने समय के प्रति जवाबदेही और ज़िम्मेदारी महसूस की वह विषय उठाया। कुछ लेखक चाहते हैं कि वह अपने परिवेश की गहरी पड़ताल करें उसे ही अपने लेखन का आधार बनाएँ तो वह आज़ाद हैं। साहित्य आप से कुछ नया और ताज़्ाा की उम्मीद करता है कला चाहती है कि कुछ नया जुड़े, कोई दोहराव नहीं पसंद करता है। पारखी आँखें उथलेपन को ताड़ लेती हैं इसलिए चलते फिरते आप का जो दिल में आया लिख दिया और कहा कि यह सच्चा क़िस्सा था मेरी आँखों ने देखा था मगर वह सम्वेदनाओं को सही तरह से चित्रित नहीं कर पाते हैं लेखन या सृजन कुछ भी घसीट देने का नाम नहीं है। इलाहाबाद को मुझे खंगालना था अपने अंदाज में मैंने चार उपन्यास एक कहानी संग्रह लिखा मगर मुझ से पहले भारती जी, कमलेश्वर जी और न जाने कितने रचनाकारों ने उस पर लिखा अभी नए लेखकों में बालेन्दू द्विवेदी का उपन्यास ‘वाया फुरसतगंज’ बिल्कुल नए कोण से इलाहाबाद को उठाया है वह भी उस समाज और शहर की सच्चाई है। अगर में अपनी ज़्ामीन पर न लिखती तो बेशक आप यह कह सकते थे मगर मेरे लेखन के कैनवास का विस्तार हुआ है मूल रूप से वेदना की वही सरिता मेरी भारतीय कहानियों में बहती है जो विदेशी परिवेश के अन्य उपन्यासों व कहानियों में बहती हैं।

प्रो. चमोला: आपका, लेखक के साथ-साथ एक पत्रकार का व्यक्तित्व भी है। आपका पत्रकार आपको लिखने के लिए प्रेरित करता रहा या फिर आपका लेखक पत्रकारिता के अनुरूप किन्हीं खोजी बिंदुओं  यानी एक सशक्त कथावस्तु की तलाश के लिए आपको भारत से बाहर विदेशों की धरती तक भी जाने के लिए प्रेरित अथवा विवश करता रहा...... इन दोनों में आप सामंजस्य किस प्रकार बिठाकर चलतीं रहीं ?

नसिरा शर्मा: इराक़ से बुलावा जब भी आया एक पत्रकार के रूप में आया मगर ईरान की पहली यात्रा को छोड़कर तीन बार मैं अपने ख़र्चे पर गई। जो थी तो ‘शाहनामा; को लेकर मगर ईरान-क्रांति को देखा तो तीसरे चैथी यात्रा में वीज़ा तो लेखक व शोधकर्ता के नाम पर मिला मगर वहाँ प्रेस कार्ड बनवाना पड़ा क्योंकि उसके बिना मैं इन्टरव्यू लेने और प्रेस-काॅनफ्रेंस में शिरकत नहीं कर सकती थी। पाकिस्तान एक बार नई दुनिया उर्दू समाचार पत्र की तरफ से पत्रकार वीज़ा पर राष्ट्रपति जि़्ायाउलहक़ के फियूनरल को कवर करने गई थी। दूसरी बार मुजाहिद्दीनों से इन्टरव्यू लेने ‘सुब-ए-सरहद’ की ओर अपने ख़र्चे पर गई। सीरिया तो साहित्य अकादमी की तरफ से गई थी। यहाँ पर खुलकर विवरण इसलिए दिया कि अफ़ग़ानिस्तान में तो इतना नहीं मगर ईरान उस समय पत्रकारिता व पत्रकारों को विशेषकर विदेशी पत्रकारों को लेकर बहुत सावधानी और शंकित था इसलिए मैंने अपने को किसी से न जोड़ कर फ्रीलानसिंग पत्रकार ही रखना उचित समझा जिस से मुझे दिक्कतों के बावजूद काम करने का मौक़ा मिलता रहा। मैं पहले भी कई बार यह बात कह चुकी हूँ कि जो मैंने चाहा वह मुझे नहीं मिला। तेहरान विश्वविद्यालय में दाखिला मिलने के बावजूद मैं न जा सकी क्योंकि क्रांति में विश्वविद्यालय बन्द और वह एक तरह का सियासी ग्राउन्ड बन चुका था जहाँ भाषण और सामूहिक नमाजें़ जनता की एकता को दर्शाने के लिए 60,000 या 80,000 मर्द औरतों की हर जुमे को होती थी। लेकिन जो मैंने नहीं सोचा, न ही इच्छा की उसके दरवाज़े ज़िन्दगी मेरे लिए खोलती गई कि उधर नहीं इधर आओ। मैं इसको एक इत्तफाक़ कहूँगी। अब रहा सवाल कि मुझे एक सशक्त कथावस्तु की तलाश के लिए मुझे विदेश जाना पड़ा। ऐसा नहीं रहा। मेरे उपन्यास और कहानियाँ जो सियासत से उपजी इंसानी तकलीफों से भरी आई हैं वह बहुत बाद में आई है मगर मानवीय सरोकारों व इन्सानी रिश्तों पर लिखा मेरा पहला कहानी संग्रह ‘शामी कागज़’ पहली ईरान यात्रा के बाद लिखी कहानियों का आया और बाद में भारतीय परिवेश पर लिखा दूसरा कहानी संग्रह ‘पत्थर गली’ आया। रहा पत्रकारिता और सर्जन में तालमेल बिठाने का तो वह आपको मैं पहले उत्तर दे चुकी हूँ कि एक रचनाकार को तय करना पड़ता है और एक समझ भी आ जाती है कि हर घटना कहानी नहीं बन पाती और न हर दुख रिर्पोटिंग में या लेख के लिए उपयुक्त हो सकता है।

प्रो. चमोला: आपका कथा-विन्यास चाहे वह कोई कहानी हो अथवा उपन्यास, इसकी संरचना में आप किन-किन बिंदुओं का विशेष रूप से क्या खयाल रखती हैं ? ........ एक अच्छे उपन्यास में, एक सफल कथाकार के रूप में आप किन किन तत्वों, संवेदनाओं एवं घटनाओं को होना अनिवार्य मानती हैं और आपने अपने उपन्यासों के सृजन में इनका निर्वहन किस तरीके से किया ?

नसिरा शर्मा: परिवेश का उभरना मैं ज़रूरी समझती हूँ। जिस में प्रकृति हो इन्सानों के साथ पशु-पक्षी भी किसी न किसी बहाने ले आती हूँ। दरख्त, धूप, आसमान, परिन्दे और आवाज़ों के उतार-चढ़ाव को अपने वर्णन में लाना मुझे अच्छा लगता है। खाने व पकवानों का जि़्ाक्र करना मैं जरूरी समझती हूँ उस से बहुत कुछ कहे बिना चरित्र की आर्थिक स्थितियों और भूगौलिक वातावरण उभर आता है। किसी भी घर की रौनक उसकी रसोई घर होता है भले ही ड्राईंगरूम बहुत सजा हुआ हो मगर बघार की आवाज़, छौंक की खुशबू, भूनने की महक घर के बाहर तक तैर जाती है। बहुत सी चीज़्ो, अपने आप उभर कर आने लगती है जिसमें मौसम भी अपनी भूमिका निभाता है। निर्वाह में संतुलन रखना पड़ता है ग़ैरज़्ारूरी विस्तार उबा देता है कभी कभी संकेत ही दृश्य उभारने के लिए पाठक के लिए काफी होता है। कभी कभी चन्द पंक्त्यिाँ ही घटना की गम्भीरता को समझने में सफल हो जाती हैं। भाषा बोझिल और लच्छेदार बनाने की चाह में लेखक कहना क्या चाह रहा है वह उलझ कर रह जाता है जिस से मैं बचती हूँ। उचित शब्दों का संवाद के लिए चयन करने में भी समय लगाती हूँ।

प्रो. चमोला: आपने भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के कथा साहित्य को देखा-परखा  है।  वहां की साहित्यकारों से आप का वास्ता रहा है ......आप भारतीय कथाकारों और विदेशी कथाकारों में शिल्प व कथा संरचना की दृष्टि से किस प्रकार एक दूसरे में भिन्नता पाती हैं ? विदेशों में किन कथाकारों ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया तथा वही भारतीय तथा विशेषकर हिंदी कथाकारों  के संदर्भ में भी ..... कृपया इस पर विस्तार से प्रकाश डालने का कष्ट करें।

नसिरा शर्मा: जब मैंने फारसी में पी.एच.डी. के लिए फार्म भरा था तो उसका टाॅपिक जेनेसेज एन्ड क्वालिटी आॅफ़ प्रोटेस्ट पेायटरी रखा था मगर विभाग में सियात चल पड़ी और कुछ वर्षों बाद मैंने तय कर लिया कि मैं हिन्दी में पी.एच.डी. करती हूँ तब तीन टाॅपिक लिए थे। अमीर खुसरू दूसरा ईरानी व हिन्दी कवियों का तुलनात्मक अध्ययन। तय हुआ कि अमीर खुसरू का टाॅपिक बेहतर होगा। आज आपके सवाल से बात याद आ गई कि केदारनाथ सिंह चाहते थे मैं दूसरे विषय पर काम करूं। मुझे महसूस हुआ कि यह काम तो कभी भी कर लूंगी मगर दूसरे टाॅपिक से मेरा ज्ञान बढ़ेगा। बहरहाल न पी.एच.डी. हो पाई और न ही तुलनात्मक अध्ययन। कुछ और हवा मुझे दूसरी स्मित बहा ले गई जबकि मैटर मैं बराबर जमा कर रही थी किताबें खरीद रही थी। उन पर काम करने वालों से मिल रही थी। उसी बीच अमीर खुसरू पर एक बड़ा सेमिनार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हुआ जिस में बहुत कुछ सुनने और समझने को मिला था। अब आपके सवाल पर लौटती हूँ।

ईरान का क्लासिक लिटरेचर बहुत शानदार है जहाँ इश्क, इरफान, दर्शन इतिहास और भी अनेक विधाओं पर लिखे शाहकर मिलते हैं जिन पर पूरी दुनिया के स्कालर काम करते हैं। यूनेस्को की तरह से उन कवियों पर विश्व-स्तर पर कभी पाँच और कभी तीन वर्षों तक उनकी जन्मशताब्दी पर काम होता रहता है चाहे वह मौलाना रूमी हों या फिरदौसी हों। भारतीय फारसी कवियों पर भी ईरान व भारत में काम होता रहता है जैसे ‘बेदिल’ का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है और उस पर किताबें और थेसिस दोनों देशों के विद्यार्थी और अध्यापक करते रहते हैं। उसी के साथ इक़बाल पर भी सेमिनार होते रहे हैं जिस में ‘भारतीय फ़ारसी शैली’ को अलग से जगह मिली है उसमें अमीर ख़ुशरू के साथ सैकड़ों छोटे बड़े कवियों व गद्यकार व अनुवादकों का नाम याद किया जाता है जिस में पंचतंत्र का लगातार अरबी, फारसी कभी गद्य और पद में अनुवाद होता रहा जो वर्तमान समय में बच्चों के कोर्स का हिस्सा है जिसको मैंने फारसी में पढ़ा है अपने एम.ए. के दौरान। जो संस्कृत में लिखी नायाब पुस्तकें किसी हादसे से नष्ट हुई वह फारसी भाषाओं में अनुवाद के रूप में मौजूद हैं। कहा यह भी जाता है कि फारसी और संस्कृत आपस में बहने हैं। मिसाल के तौर पर थान-स्थान। यान ‘त’ में बदल जाता है जैसे गुलिस्तान, उज़बे-किस्तान इत्यादि। पहले फारस में पहलवी भाषा बोली जाती थी जिसके बोलने व लिखने में अन्तर था। अरब सत्ता के आने के बाद अरबी भाषा का चलन आया और अरबी लिपि अपना ली गई जो ज़्यादा सांईटिफिक थी। पढ़ने लिखने और बोलने में एक थी जो फारसी कहलाई। पहलवी जानने वाले कम बचे। लेखक सादिक़ हिदायत ने इस भाषा पर काफी काम किया और वह इस भाषा को जानते भी थे।

अब मैं पहलवी साम्राज्य के दौर की बात करती हूँ। आर्यामेहर ने फारसी भाषा को एक नई सुन्दरता व भाव दिया। उनके काल में अकादमियों में लगे भाषा विद इस काम में जुट गए और फारसी में जो अरबी शब्द दाख़िल हो चुके थे उनकी जगह सरल और सौन्दबोध से भरी, अभिव्यक्तियों और शब्दों को सजाया जिस से फारसी सीखना, समझना और पढ़ना आम लोगों के लिए बहुत आसान हो गया। यह वह दौर था जब हमने ‘मार्डन फारसी’ के नाम से डिग्री ली और उस फारसी को लिखना-पढ़ना और बोलना सीखा जिसमें ‘नए लिखने वाले रचनाकार’ अपने को व्यक्त कर रहे थे। इतना बड़ा फर्क नहीं आया कि फारसी दो भाषाएं लगने लगे मगर जरूरी शब्दों से उसे निखारा व सजाया गया। आज 40 वर्ष बाद फारसी जबान ने फिर करवट ली और अरबी शब्दों का प्रयोग बढ़ गया। एक अलग तरह का वाक्य विन्यास एक अलग सी जबान जो बहुत शाॅटकट वाली या बाज़्ाार में बोली जाने वाली या स्थानीय शब्दों वाली है उसका प्रयोग साहित्य रचना में शुरु हो गया जिसको पहले की तरह समझना कभी कभी मुश्किल सा लगता है। लेकिन अब दोनों तरह की पसंद से लेखक व कवि भाषा को बरत रहे हैं। मुझे शायद यह कर्फ इसलिए साफ दिखता है कि मैं पैंतीस वर्ष तक न ईरान गई न उसके दूतावास जहाँ इस बदलाव को ईरानियों के साथ बोलचाल में सहज रूप से ले लेती। ईरान पर मेरा लेखन बराबर चलता रहा। उन ईरानियों से भी टेलिफोन पर सम्पर्क बना रहा जो ईरान छोड़ तीन चार दशकों से विदेश में बस चुके थे। हर भाषा समय के साथ अपना रूप ग्रहण करती है यह बदलाव तो हिन्दी व उर्दू में नजर आता है जहाँ शब्दों के चयन से आप समय को पकड़ लेते हैं। 

चन्द वर्ष पहले मैंने अंग्रेजी, हिन्दी और उर्दू में झुटपुट अरबी व इजरायली साहित्य को पढ़ा और आश्चर्य में पड़ गई। फिर जो पुस्तकें मुझे इराक़, सीरिया, मिस्र की भेंट मंे मिली थी उन्हें पढ़ना शुरु किया और महसूस हुआ कि यह कहानियाँ तो नई अनुभूतियों, संवेदनाओं, अनुभवों पर लिखी है जो इन्सान की उन गुत्थियों को खोलती और बताती है जिन की आत्मा तक हम नहीं पहुँच पाते केवल खून-ख़राबा और नकारात्मक सियासी खबरों के। वहाँ से मेरी रुचि बढ़ी और बहुत कुछ जाना और जो पसन्द आया वह अनुवाद किया मगर यह सारे अनुवाद अंग्रेज़्ाी से किये थे, फारसी की तरह सीधे फारसी से नहीं रहे। मुझे महसूस हुआ कि यह कितने शानदार होंगे यदि मैं सीधे अरबी में यह शेर और कहानियाँ पढ़ती। पहली बार अरबी न जानने का अफसोस रहा मगर यह भी दिलचस्प बात है कि सीरिया में एक फिलिस्तीन कवि से मिली। तय पाया कि मैं अंग्रेज़ी में सवाल पूछूंगी और वह अंग्रेज़्ाी में बोलने की आदत न होने के कारण अरबी में जवाब दें मैं उसका अनुवाद भारत में करवा लूँगी मगर अफसोस उनकी अरबी यहाँ मेरे जानने वालों में कोई नहीं समझ पाया तब राज़ खुला कि अरबी में भी फर्क है। हर देश का अपना उच्चारण और भाषा का प्रयोग है। जो अरब देशों के डिप्लाॅमेट भारत में रहे, वह कवि हुए तो कविता उन्होंने भारत पर लिखी। सृजनकर्ता का स्रोत कहाँ उबल पड़े, जैसे सादिक़ हिदायत ने अपना बेहतरीन उपन्यास ‘बुफेकूर’ (अन्धा उल्लू) मुम्बई में रह कर लिखा और वहीं छपा; उस में भारत का काफी ज़िक्र है- शिवमंदिर बौद्ध दर्शन इत्यादि इत्यादि।  

अरबी भाषा के कवि उमर अबू रिशा जो सीरिया देश से हैं, उन्होंने भारत में डिपलोमैट की तरह चन्द वर्ष गुज़ारे और बहुत सारी कविताएँ भारतीय खंडहरों, खुज़ाराहो की मूर्तियों और एवरेस्ट पर लिखी थीं। अब अगर हम अरबी भाषा शायरी को नज़र में रखकर बात करें तो मोटे तौर पर इस्लाम से पहले और बाद की शायरी का फर्क़ देखते हैं। पहले की शायरी को ‘ज़मानेजहालत’ का नाम देकर नए कवियों ने छन्द और अलकांर को रद्द कर उसमें नए विचार और लय की बात की और बहुत सख़्त शब्दों में उसकी आलोचना की मगर कुछ लोगों का ख़्याल है कि उस दौर की बहुत महत्त्वपूर्ण शायरी है जिसका भी साहित्य में मुक़ाम है। यह तब्दीली नई कविता के नाम से हर भाषा-साहित्य में देर-सबेर आई। फारसी में नीमा योशीज ने पहला क़दम उठाया और आम ज़िन्दगी की उलझने व सियासी घुटन को जगह दी। इन देशों में भारत की तरह सामाजिक जकड़न, जड़ता और सोच का पिछड़ापन है मगर उस से ज़्यादा राजनीति का दबाव ज़्यादा है जो उनके अपने समाज में आपसी सम्बन्धों व विचारों को लेकर इतनी नहीं हैं जितनी की विदेशी सत्ता की है, जिसके विरोध में बुद्धिजीवियों की आवाज़्ों बराबर उठती रही हैं। ईरान में यह विरोध इश्क़ व मुहब्बत की ढाल में अपनी बातें कवि व लेखक करने लगे तो भी सेंसर बोर्ड की नज़र में आ गए तो सजा थी जेल और यातनाएं दी जाती रही हैं, जो फरार हो सकते थे वह दूसरे देशों मंे अपनी गतिविधि जारी रखते। ऐसा कोई दबाव हमें भारत के इतिहास में नजर नहीं आता अपवाद की बाद अलग है मगर भारत में कलम की आज़्ाादी ही नहीं खुल कर बोलने की भी छूट रही है। लिख और बोल कर बुद्धिजीवी अपना प्रतिवाद या प्रतिक्रिया देते रहे हैं। अरबी भाषा के कवियों ने अपनी बात कहने की सजा पाई और विदेश में जाकर बेहतरीन साहित्यिक शायरी व अपने कलात्मक जौहर दिखाए मगर उन्होंने अपने साहित्य को प्रतिशोध या प्रोटेस्ट पोयटरी कहना पसन्द न कर के उसे ‘जिलावतनी’ की शायरी का नाम दिया जिस में किसी एक देश के कवि नहीं थे बल्कि समूचे अरब देशों के साहित्यकारों का एक समूह था। अब सवाल यह है कि इन बुद्धिजीवियों ने ऐसा क्या लिखा, क्या कहा वह सब आप आज भारतीय परिप्रेक्ष्य में गहराई से समझ सकते हैं। जब सच बोलने पर ज़बान पर ताले और सही दृष्टि अपनाने को देशद्रोही कहा जाने लगा हो तब आप सोचें यह देश सियासी व आर्थिक रूप से कितना शोषित है और इसके हाकिम एक तरह के बंदी जो बग़ावत करके सत्ता में रह नहीं सकते हैं और सत्ताधारी जब अकड़ दिखाता है जो उन देशों पर विकसित देश किस तरह की तबाही मचाते हैं मल्टीनेशनल आर्मी के साथ। इसलिए हमारे विरोध, प्रतिरोध का स्वर कहीं तेज, कहीं बेहद कटु हो सकता है मगर वेदना एक सी है। अपने पसंदीदा भारतीय व विदेशी कवियों के नामों की एक लम्बी सूची है तो भी मैंने जिन्हें पसन्द किया उनकी कविताओं व कहानियों, उपन्यासों एवं ड्रामों का अनुवाद किया है जो मेरी छह खण्डों की श्रृंखला ‘अदब में बाईं पसली’ में आप देख सकते हैं जिस में उर्दू, फारसी और अरबी के साहित्यकार मौजूद हैं। कुछ हिन्दी के लेखकों व कवियों पर लेख व संस्मरण लिखे हैं जो मेरे पुस्तक ‘किताब के बहाने में मौजूद हैं। यह एक छोटा सा काम है लेकिन इन प्रिय रचनाकारों के अलावा भी अन्य रचनाकार हैं जिनके नाम और ज़िक्र मेरे लेखों व कालमों में मौजूद हैं।

प्रो. चमोला: एक रचना के चिंतन से एक रचना की अभिव्यक्ति तक की ऊध्र्वमुखी यात्रा में एक लेखक की क्या भूमिका रहती है ? क्या सृजन का वह बीज निरंतर उसके मस्तिष्क में पनपता रहता है और जब अनुभूति परिपक्व हो जाती है तभी वह कागज के कैनवस पर अंकित हो अपने को  किसी विधा के रूप में अभिव्यक्त हुआ पाता है। आप लिखने की समय सारणी में किस प्रकार उसकी रचना प्रक्रिया को व्यवस्थित कर पाती हैं क्या कभी-कभी तात्कालिक आधार पर अति महत्वपूर्ण लगने वाली विषय वस्तु समय बीत जाने के बाद ‘आउटडेटेड’ जैसी तो नहीं महसूस होती ? अपनी कथा संरचना अथवा कथा विन्यास की प्रक्रिया को विस्तार से विवेचित करने का कष्ट करें कि एक फर्निश्ड रचना तक का सफर आपका कैसा रहता है ?

नसिरा शर्मा: पहले झटके में महसूस किया हुआ और सोंचे विषय का एक खाका सौ-दो सौ पेज में क़लम से निकल आता है फिर असली काम शुरु होता है चरित्रों, परिवेश और अपनी बात कहने का कि उसको संवाद, बयान और विचार के साथ कैसे गूँधा जाए ताकि सम्वेदना अपने संतुलित रूप से परिवेश के साथ उभरे। उपन्यास छह माह से लेकर साल भर का समय लेता है। प्रमाणिकता का भी सवाल अहम होता है। सृजन के साथ कल्पना व यथार्थ की घुलावट मेरे लिए बहुत अहम है। एक चैपटर कई कई बार भी लिखना पड़ता है। पहले ख़ाके की लकीरें खो जाती हैं और एकदम नया सा रूप गद्य लेने लगता है चाहे उपन्यास के दो ड्राफ्ट बनें या चार मगर जब तक पूरा संतोष नहीं होता है और रचना आप से कट कर अलग नहीं होती आप परेशान रहते हैं शब्द व भाषा को लेकर, संवाद और चरित्र को लेकर। आप कहानी या कविता लिख कर मुक्त हो जाते हैं बस नोक-पलक दुरुस्त करना पड़ता है, मगर उपन्यास में ऐसा नहीं होता है। वह लेखक को निचोड़ लेता है। लेखक उस बस्ती या शहर में जा बसता है जो उसने बसाई है। मेरे सथ ऐसा होता है कि हर उपन्यास की रचना प्रक्रिया का अपना अंदाज़ होता है। हर नई कृति को उठाते समय आप एक अनुभव से नहीं गुज़रते हैं मगर यह भी विचित्र बात है मेरे साथ कि मैं हर बार लिखना इस तरह शुरु करती हूँ जैसे पहली बार लिखना शुरु किया है। उबाल ज़रूर काग़जों पर फैल जाता है मगर एक भय और हल्की झिझक बनी रहती है कि जो लिखा है वह कैसा निकल रहा है दिमाग में पुराना अनुभव कोई ख़ास मदद नहीं करता है क्योंकि हर बार आपको नए विषय के साथ क़लम चलानी पड़ती है और नए किरदारों को उठाना पड़ता है।

प्रो. चमोला: नासिरा जी, आपने बाल साहित्य भी लिखा है। आप बाल साहित्य सृजन के लिए किस प्रक्रिया या कथ्य सामग्री को अधिक प्रभावी मानती हैं...? जो लेखक द्वारा अपने अनुभव के आधार पर लिखा जाता है अथवा बालक के मनोविज्ञान के आधार पर तैयार की गई सृजन सामग्री ?

नसिरा शर्मा: दोनों ही ज़रूरी है मेरे लिए क्योंकि आपका बचपन भी आपको याद आता है और सामने जो बच्चे हैं उनका मनोविज्ञान भी समझ में आता है मगर फोकस मेरा पूरे का पूरा उस बच्चे और उसके माहौल पर रहता है जिस पर मैं क़लम उठाती हूँ। कुछ कहानियाँ मैंने देसी फ़लों पर लिखीं जो मेरी यादों का हिस्सा है जिन्हें लोग भूल गए हैं। मैं उसे नई पीढ़ी को बताना चाहती हूँ जैसे कसेरू, खिन्नी और जंगल जलेबी वैसे तो फालसा भी अब कम देखने को मिलता है जिसका शरबत पीना नफास्त की बात थी। बच्चों को कहानी के ज़रिए अपनी ज़मीन से जोड़ना मुझे भाता है।

प्रो. चमोला: रचनाकार जिन अनुभवों को अपनी रचनाओं को पिरोने का प्रयास करता है....ज्ञान-विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को मद्देनजर रखते हुए वे आउटडेटेड सिद्ध हो जाती हैं....क्योंकि उनका अभाव व ज्ञान बहुत पुराना है...जिसे बाद के पाठक समझने व आत्मसात करने में प्रायः स्वयं को असहज पाते हैं। ऐसे में लेखक तथा बालक के मध्य सामंजस्य अथवा उसकी जो मूल स्थिति है, उसको स्पष्ट करने की असली स्थिति कौन सी हो सकती है... क्योंकि जो लेखक देना चाहता है... उसे बालक नहीं पकड़ पा रहा और जो बालक लेना चाहता है, वह लेखक देने की स्थिति में नहीं है ?

नसिरा शर्मा: जी यह संकट है और इसका सब से अच्छा उदाहरण हिन्दी की पाठ पुस्तकें है। जिस में स्कूल को मास्टरों और लेखकों द्वारा पाठयक्रम बनना चाहिए वहाँ युनिवर्सिटी व काॅलेजों के अध्यापक व प्रोफेसर पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करते हैं जिस में बच्चे को एक साथ ज्ञान पिलाने की कोशिश होती है। हिन्दी के प्रति बच्चों की दिलचस्पी कम हो जाती है। वह बस किसी तरह पास होना चाहते हैं। वही बातें कुछ लेखकों के लेखन में होती है जिन में रस नहीं होता है। वह उनके पाठ का एक हिस्सा सी लगती हैं। बच्चों के लिए लिखना आसान लग सकता है मगर लिखना इतना आसान नहीं है आपको कहानी में सूचना, ज्ञान, जो भी देना है वह किस्सागोई की तर्ज़ पर देना चाहिए तभी वह कहानियों बच्चों के दिल व दिमाग में जम जाती है और उन्हें याद रह जाती है, जैसे प्रेमचन्द की ईदगाह, बूढ़ी काकी जो पुराने दौर में लिखी कहानियाँ हैं मगर वह समस्या नए रंग व रूप में आज भी ‘ईदगाह’ कहानी की मौजूद है, रोटी सेंकने वाला चिमटा भी और बुजुर्गों के प्रति की गई लापरवाही ‘बूढ़ी काकी’ भी। कोई भी सूचना या ज्ञान का स्तर सब का समान नहीं होता है। शहर का रहने वाला बच्चा गाँव के बच्चे का परिवेश कैसे समझ सकता है जब तक वह कहानियों द्वारा जानेगा नहीं या फिर वह गाँव कभी गया हो या वह कभी कभार जाता रहा हो। पहले शहर और गाँव से सम्बन्ध मज़बूत थे क्योंकि हमारे इन्सानी रिश्ते मजबूत थे। हमारे शौक़ और खान-पान में इतना फ़र्क नहीं था जैसा आज है। बाज़्ाार सामानों से, मीडिया सूचनाओं से समय की रफ़्तार नए नए अविष्कारों से भरा रहता है। हर एक विषय की ढ़ारों सूचनाएं आपको नेट पर मिल जायेंगी। बच्चों के हाथ में मोबाइल है तब वह ऐसा क्या पढ़े जो उन्हें नया कुछ दे सके। यह संकट तो आज के लेखकों के सामने आन खड़ा हुआ है और दूसरा सच यह भी है कि काम चलाऊ मोबाइल तो सब के हाथों में है मगर स्मार्ट फोन कितनों के पास है। लेखक तो सजग रहता है अपने लेखन और समय के प्रति तो भी परिवर्तन की गति बहुत तेज़ है।

प्रो. चमोला: बाल साहित्य की चर्चा करते हुए लेखक अथवा समीक्षक प्रायः पूरी शिद्दत के साथ ये चर्चा करते हुए मिलते हैं कि अमुक कहानी इस तरह की होनी चाहिए थी... अमुक उपन्यास ऐसा होना चाहिए था... अमुक उपदेशात्मक है... अमुक परी कथा है... जैसा निधार्रण बड़ों द्वारा किया जाना क्या उपयुक्त है ? क्या देश-विदेश के एक ही उम्र के बच्चों के लिए, समीक्षकों अथवा सुधारात्मक पाठ विचारानुसार, एक ही प्रकार की वैचारिक भोज्य-तालिका परोसना, किस हद तक तक सही है ? अपने रचना-कौशल में निखार लाने के बजाय अपने स्वादानुसार किसी के चिन्तन की दशा व दिशा निर्धारित करना कितना न्यायोचित है ? आप किन  मानकों को ध्यान में रखकर बाल साहित्य की रचना करते हैं ?

नसिरा शर्मा: आपके सवाल ने मुझे उज़बेक चित्रकार रानो हबीब की बरसों पहले कही बात याद दिला दी जब सोवियत यूनियन अपना वजूद रखता था। उनका कहना था कि हमारे यहाँ सब कुछ एक सा चलता है। उसी तरह जापानी प्रोफेसर ने कहा था कि हमारे यहाँ यूनिफार्म सा समाज है जिसमें भिन्नता व अनेकता नहीं है। जब मैंने लेखन शुरु किया था तो मेरे लेखन में परियों का भी ज़िक्र होता जो यथार्थ की ज़मीन से मिलकर कुछ क़िस्सा गढ़ता। उस समय एक वैचारिक टकराहट शुरु हुई कि बच्चों को झूठी दुनिया न दिखा कर सच से परिचय कराया जाए ताकि उनकी सोच साइंटिफिक हो सके। यह बिल्कुल सही है और मैं उस झूठी या ख्याली दुनिया का वर्णन भी ज़रूरी समझती हूँ, बच्चों की सोच और कल्पना की उड़ान के लिए। बच्चे को समय से पहले बूढ़ा बनाना मुझे पसंद नहीं है। मुझे बहुत ज्ञान से भरी रुखी-रुखी कहानी भी लिखना पसन्द नहीं है। बच्चा अपनी उम्र के साथ धीरे-धीरे सब कुछ जानने व समझने के क़ाबिल हो जाता है। यह भी एक सच है कि कहा जाता है कि अलिफ लैला, सिन्दबादसेलर जैसी कहानियों व क़िस्सों से योरूप के लेखकों को प्रेरणा मिली थी। आज दुनिया का ऐसा कौन सा देश है जहाँ यह कहानियाँ अनुवाद में न हुई हो। रहा आलोचकों या आलोचना की बात तो मैं सिर्फ इतना कहूँगी की जैसे सब सृजन नहीं कर सकते उसी तरह हर कोई आलोचक नहीं बन सकता है। जब समीक्षा करने वाला सुझाव दे और अपनी इच्छाएँ लादे तो समझ लेना चाहिए कि उसकी पकड़ उस कृति पर गहरी नहीं है क्योंकि वह उस पर बात नहीं कर रहा है जो सामने है और जो नहीं है वह उस पर सवाल उठा रहा है।

प्रो. चमोला: आपने बाल साहित्य लिखना क्यों पसंद किया...अपने बाल साहित्य में आप सबसे अच्छी रचना कौन सी मानते हैं और क्यों ? क्या बाल साहित्य लिखते हुए आपको ऐसा तो नहीं लगता कि यह महज समय यापन का माध्यम है... इससे मुझे व मेरे पाठकों को कुछ लाभ होने वाला नहीं है... इन संबंध में कुछ बताएं।

नसिरा शर्मा: मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा कि लाभ पाठकों को होगा या नहीं, न ही बहुत योजना बना कर लिखने की शुरुआत की बस कुछ लिखना शुरू किया उसी तर्ज़ पर जिस तर्ज़ पर रात को सोने से पहले क़िस्से कहानी सुनाए जाते रहे हैं। मेरे लिए लेखन कभी लेबल नहीं रहा न लेखक कहलाने का कोई शौक़ बल्कि मेरे अन्दर कुछ रचने का जो उबाल उठता था उस बहाव में लिखती, पेन्ट करती और जाने क्या क्या करती रही फिर टिक गई यात्रा और लेखन पर और बच्चों के लिए मैं अभी भी लिखती हूँ। इधर मैंने एक नया प्रयोग किया कि बचपन में सुने क़िस्से को नए ज़माने से जोड़कर अपनी भाषा-शैली में लिखा है मगर क़िस्सों को मूल कहानी को नहीं बदला है। बचपन मंे रूसी बच्चों की किताबें पढ़ना बहुत पसंद था। ख़ासकर उसकी चित्रकारी और रंगों के शेड मन पर बड़ा अच्छा असर डालते थे। दिमाग़ भी तरोताज़ा हो जाता था। वैसी पेन्टिग हमारी कहानियों में नहीं बनती थीं जो चित्रकार बनाते थे वह बच्चों के मासूम चेहरे की जगह बड़ों के पक्के चेहरे बनाते थे। बहुत बाद में परिवर्तन आया मगर अभी भी ईरानी, अरबी और दूसरी भाषाओं में लिखे बच्चों के साहित्य की तरह हमारे चित्रों में वह गहराई व लुभावनापन नहीं आया है मगर परिवर्तन तो आया है। यह भी एक चित्रकारी का तरीक़ा शुरु हो गया है जिस में चित्रकार ख़ाका या रेखाएँ नहीं खींचता बल्कि नेट से वह कुछ चित्र उठा कर उस में थोड़ा बहुत परिवर्तन कर पेश कर रहा है जो पब्लिशर को भी सस्ता पड़ता है। तकनीक ने चीज़ों को सरल तो बनाया है मगर मौलिकता की कमी नज़र आती है। लिखे शब्द तो बोले जाते हैं मगर तस्वीरें भी बहुत कुछ कहती हैं जिसे बच्चे देखते और समझते हैं और उनका दिमाग उड़ान भरता है। 

इधर मैंने बच्चों की अंग्रेज़ी की पुस्तकें देखीं जिन में लिखे शब्द कम और चित्र ज़्यादा थे। यह भी एक ख़ूबसूरत अंदाज़है। अपनी रचना का चयन करना कि वह सब से अच्छी लगती है तो फिर बाक़ी लिखी ही क्यों ? हर कृति की अपनी एक जगह और अहमियत होती है। दूसरे मैंने बच्चों के लेखन को बहुत गम्भीरता से लिया है, समय गुज़ारने के लिए और भी मेरे शौक़ थे मेरी पसन्द थी।

प्रो. चमोला: आपको अपनी बाल कहानियों की कौन सी नायिकाएं अच्छी लगती हैं.... हिंदू पृष्ठभूमि से ताल्लुख रखने वाली अथवा मुस्लिम पृष्ठभूमि की ?  इन दोनों में आप बचपन के प्रति अधिक सजग किसको पाती हैं ... कौन आपका ध्यान अधिक तीव्रता से लेखन हेतु खींचता है ?

नसिरा शर्मा: मेरे दिमाग में धर्म हर समय सवार नहीं रहता है। उस का अपना एक मुक़ाम और भूमिका है। बहुत से लेखक हिन्दू-मुस्लमान साहित्य में ज़रूर करते होंगे तभी आपने पूछा है वरना इंसान के वजूद के बहुत बाद धर्म वजूद में आया है तो मेरा रिश्ता इंसान से बहुत पुराना है। उसी रिश्ते से मैं बच्चों को भी देखती हूँ। मुझे अस्सी के दशक में जब जामिया में पढ़ा रही थी तो वायसचान्सलर किदवई साहब ने कहा कि तुम अपनी उर्दू कहानियाँ ‘मकतब-ए-जामिया’ में छपवाओं मैं ख़ुद उन्हें फोन करूँगा। मैंने बच्चों की हिन्दी कहानियाँ उर्दू लिपि में कीं और कुछ उूर्द की बाल पत्रिका में छपी कहानियों की पाण्डूलिपि लेकर प्रकाशक के पास पहुँची, वह कहानी पढ़ते रहे। पसन्द आईं फिर कहने लगे आपको कुछ नाम बदलने होंगे जैसे जोज़फ की जगह ज़फर या कोई और नाम। सुनकर मैंने कहा कि कहानी तो शिलोंग की है जहाँ खासी आदिवासी है। जो ईसाई धर्म के है वहाँ पर तो कहानी ज़फ़र नाम अपना असर गुम कर देगी। उनका जवाब था कि हमारे बच्चे इस नाम से....मैंने जवाब दिया कि यह तो हिन्दुस्तान है उन्हें मालूम होना चाहिए कि उनके मुल्क मंे और कौन कौन कहाँ-कहाँ किस नाम से रहता है। बहरहाल पाण्डुलिपि मैं वापस ले आई क्योंकि यह उनकी व्यक्तिगत सोच थी भारतीय मुस्लमानों की सोच नहीं थी क्योंकि उर्दू का आधा अदब तरह तरह के नामों से भरा पड़ा है और उर्दू में यह तास्सुब नहीं था। बहरहाल प्रकाशक की नज़र बाज़ार पर रहती है उसकी अपनी मजबूरी हो सकती है। मगर एक लेखक के लिए ऐसी जड़ता व सर्कीणता मुझे पसन्द नहीं है।

प्रो. चमोला: प्रायः बाल साहित्य लेखन को अथवा बाल साहित्य लेखकों को दोयम दर्जे का माना जाता है.... जबकि उत्कृष्ट समझे जाने वाला साहित्य भी बाल साहित्य की ही तरह साहित्य होता है...... साहित्य चाहे वह बड़ों के लिए लिखा जाए अथवा छोटों के लिए..... फिर मूल्यांकन की दृष्टि से बाल साहित्य के प्रति ऐसा संकुचित दृष्टिकोण क्यों ?

नसिरा शर्मा: यह सिर्फ भारत की सोच है जो अब बदल रही है। साहित्य अकादमी ने पुरस्कार रखा है। शंकर का नाम से पिछली पीढ़ी के लोग अनजाने नहीं होंगे। एन बी टी भी इस सिलसिलें से काम कर रहा है। प्रकाशक भी पुस्तकें छापने लगे है। लेकिन भारतीय सोच में या तो बच्चाें की शिक्षा या फिर उनके लिए विरासत के नाम पर ज़मीन या धन छोड़ना ही बसा था या फिर माँ बाप का हाथ बटाना। बात साहित्य की होती भी तो वही पुराने किस्से या फिर पुराण, दन्तकथा इत्यादि मौलिक साहित्य की तरह ध्यान नहीं दिया गया मगर बड़े से बड़े लेखकों ने अपनी बेहतरीन कहानियाँ बच्चों के चरित्र को उठा कर लिखी है मगर उन्हें बाल साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा गया है। इन सब के कारण बाल-साहित्यकारों को वह दर्जा नहीं मिला जैसे अनुवादकों को कुछ समय पहले तक महत्व नहीं दिया जाता था।

प्रो. चमोला: आपने अपने बाल साहित्य में किन समस्याओं को प्रमुखता है उजागर करने का प्रयास किया है और किस समाज अथवा तबके के बच्चों ने आपको अधिक लिखने के लिए वैचारिक आयाम प्रस्तुत किए हैं इन सब में आपका अपना बचपन कहां तक सुरक्षित रहा है ?

नसिरा शर्मा: मेरे बाल चरित्र में निम्न व मध्यवर्ग के बच्चे ज़्यादा आए है जिन में रेगपिकर्स भी है, बाल मज़दूर भी है। खोये और घर से भागे बच्चे भी है और स्कूल जाने वाले खाते-पीते घर वालों के भी बच्चे हैं मेरी कहानियों में बच्चों के साथ पशु-पक्षी का भी ज़िक्र रहता है वह भी मेरे चरित्र का रूप भरते हैं। उस में मेरा बचपन मौजूद है क्योंकि मेरे अन्दर का बच्चा अभी बच्चा है। 

प्रो. चमोला: जब आप बड़ो का साहित्य धाराप्रवाह लिख रहे थे तो ऐसे समय में आपको एकाएक बाल साहित्य लिखने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई ?... क्या आपको इससे पहले कभी यह साहित्य लिखने की प्रेरणा अथवा फुर्सत नहीं मिली.. कहीं ऐसा तो नहीं कि... आपको लगा हो कि बाल साहित्य लिखने से सम्मान, यश प्रतिष्ठा का स्तर बड़ों की अपेक्षा अत्यल्प होगा... या इसके पीछे कोई और प्रमुख कारण था ?

नसिरा शर्मा: इन में से कुछ भी मेरे दिमाग़ में नहीं था। मैंने बच्चों के लेखन से ही अपने लेखन की शुरुआत की है। जो अभी तक जारी है। जैसा मैंने पहले बताया कि मेरी पहली कहानी बाल-पत्रिका में छपी थी जब मैं सातवीं कक्षा में थी। बच्चों के लेखन की तरफ मेरा झुकाव और लगाव बहुत पहले से है। नंदन, पराग, बाल भारती, चंपक, खिलौना, फुलवारी और दूसरे अखबारों में बराबर छपती रही हूँ मगर पुस्तकें बहुत बाद में आई। 

प्रो. चमोला: आपने भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के कथा साहित्य व बचपन को भी देखा-परखा है। वहां बाल साहित्य की क्या स्थिति है... और अपने देश में बाल साहित्य के प्रति लोगों की मानसिकता से लेकर पुरस्कार एवं उनकी राशि तक की संकुचित दिशा-दृष्टि के बारे में आपको क्या कहना है ?

नसिरा शर्मा: जैसा कि मैं पहले कह चुकी हूँ कि दूसरे देशों में बाल साहित्य पर बहुत ध्यान दिया जाता रहा है। जापान में इतनी पत्रिकाएँ, कामिक्स और बाल पुस्तकें मैंने देखी कि आँखें फटी की फटी रह गई। देर में ही सही मगर अब बाल-साहित्य को लेकर नज़रिया बदला है। बाल-साहित्यकार तो बड़ी ख़ामोशी और लगन से पिछले 55-60 वर्षों से बराबर लिखते रहे हैं। उन्होंने न हिम्मत छोड़ी न लिखना छोड़ा। इसलिए बाद की पीढ़ी लगातार अपने मौलिक बाल-साहित्य के साथ अपनी संख्याँ बढ़ाती रही है और साहित्य भंडार ने मुझे दर्जन भर बाल साहित्यकारों की पुस्तकें भेंट की जिसे देखकर मैंने भी उन्हें अपनी दो पुस्तकें दीं। मुझे अफसोस केवल बाल भवन की तरफ से बढ़ती उदासीनता से दुख पहुँचा है जहाँ बच्चों की अन्दर की दुनिया को खोलने और अपने अन्दर यात्रा कर के ख़ुद को खोजने का काम पेन्टिग, कहानी, संगीत इत्यादि द्वारा करते थे। मैं छह वर्ष वहाँ की मिम्बर रही। वह अमिता शाह का दौर था जब मैंने मांडी बाल भवन और जवाहर बाल भवन में ‘आओ कहानी सुनाए और लिखे’ शुरु किया था। तीन वर्षों में कितना कुछ बच्चों ने लिखा और सुनाया। उनका उच्चारण ठीक किया। खासकर मांडी के बाल भवन में जहाँ मज़दूरों के बच्चे ज़्यादा आते थे। तीन वर्ष मेरा साथ मधुपंत जी के साथ रहा जो बाल-साहित्यकार हैं, और अपने समय में कई सेमिनार कराए और लेख संग्रह भी छापे मगर जब मैंने बाल-भवन छोड़ा तो उसकी हालत सियासत के चलते बहुत बदल गई और अब क्या स्थिति है पता नहीं। मैं जयपुर, जम्मु ‘दमन एंड दिउ’ अन्य कई जगहों पर डायरेक्ट मिटिंग में गई जहाँ के बाल भवन देखे और पूरे भारत से आये डायरेकटर्स की गतिविधियों व कठिनाइयों पर चर्चा हुई। उस समय चेयरपर्सन श्रीमती बिलकीस लतीफ थीं। मेरी कोशिशों से पटना में बालभवन खुला जिसके लिए मैं अंजनी कुमार जी की शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने पूरी लगन से किलकारी की शुरुआत की थी। 

प्रो. चमोला: जिस बचपन ने जिंदगी में आपको भावनाओं व संभावनाओं की अपूर्व बुनियाद दी... क्या वह बचपन एवं बचपन से जुड़ा हुआ साहित्य भी कहीं आपकी भावी अनिवार्य योजनाओं में से एक है ?... अथवा आपने भी बाल साहित्य को केवल हल्के में ले कर अपनी रचना यात्रा में महज उल्लेख भर करने के लिए लिख दिया है....बाल साहित्य के प्रति आप अपने गंभीर प्रयासों को किस रूप में याद करेंगे ?

नसिरा शर्मा: मैंने बहुत कुछ करना चाहा था। एक से एक योजनाएँ दिमाग़ में आती थीं मगर बाल साहित्य को लेकर उस समय सम्भावनाएँ और अवसर नहीं थे। जब हुए तो मुझे मौक़ा नहीं मिला क्योंकि मैं लेखन से जुड़ी थी। फिल्म लाइन या छोटे पर्दे से नहीं तो भी मेरी बाल कहानी ‘माँ’ पर टी.वी. फिल्म बनी। प्लेटफार्म 7 के नाम से एक पचास एपीसोड का रेडियो ड्रामा प्रसारित हुआ। कुछ और सिरियल बच्चों पर डी.डी. आकाशवाणी द्वारा बनाए गए थे। जामिया के माक्र्स कामुनिकेशन से बहुत शुरु में जुड़ी मगर वहाँ की ज़्ाबर्दस्त सियासत के आगे बात कुछ बन नहीं पाई। हर सपना पूरा होने का वायदा नहीं करता है।