अकाल में उत्सव: पूंजीवाद और सरकारी तंत्र का मारा एक भारतीय किसान

   अतुल वैभव, शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय, इमेल-vaibhavatul7@gmail.com, मो. 7827563795

पंकज सुबीर, पंकज सुबीर, सीहोर, (म.प्र.), मो.: 9977855399


वर्तमान दौर में साहित्यिक रचनाएँ तो बहुत लिखी जा रही हैं लेकिन उनमें से कुछ ही ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद पाठक समाज की उन सच्चाईयों से अवगत हो पाता है, जिन सच्चाईयों को जानते हुए भी वो अंजान बना रहता है। वाकई में रचना वही जिसे पढ़ कर पाठक सामाजिक यथार्थ से रुबरु हो साथ ही मन में कुछ यथार्थ प्रश्न आए और उन प्रश्नों के कुछ हद तक उत्तर भी। कुछ रचनाएँ ऐसी भी होती हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद पाठक के मस्तिष्क में अनेक सवाल उथल-पुथल करने लगते हैं और उन सवालों का उत्तर खुद से ढूँढने की कोशिश भी करने लगता है। साहित्य सिर्फ पाठक का मनोरंजन ही नहीं करता है बल्कि समाज के यथार्थ से भी रूबरू कराता है। आज सोशल मीडिया के ज़माने में जब क्षणिक लेखकों और रचनाओं की बाढ़ सी आ रखी है, वैसे में सामाजिक मुद्दों को गंभीरता से अपनी लेखनी का विषय बनाकर समाज को सजग करने वाले गिने-चुने रचनाकार ही रह गए हैं। वर्तमान समय में सोशल मीडिया जैसे माध्यमों पर रोज सैकड़ों लेखक पैदा होते हैं और कुछ दिनों में ही वे गायब भी हो जाते हैं। सोशल मीडिया आज भले ही लोगों की अभिव्यक्ति का बड़ा माध्यम बन गया है परंतु यह लेखन से अधिक लेखक के प्रचार का माध्यम लगता है। अगर कहा जाए कि सोशल मीडिया पर रचना से अधिक रचनाकार का प्रचार होता है तो गलत नहीं होगा। वैसे वर्तमान कठिन समय में बहुत कम ऐसे रचनाकार हैं जो वाकई में अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए लिखते हैं, उनमें से एक नाम है ‘पंकज सुबीर’ का है।

हिंदी कथा साहित्य में अपनी कलम की आवाज़ से समकालीन कथा जगत के पाठकों को चैकन्ना करने वाले रचनाकारों में पंकज सुबीर जी का नाम आता है। सुबीर जी पिछले एक दशक से जनता की आवाज बुलंद कर रहे हैं। समकालीन उपन्यासकार, कहानीकार, व्यंग्यकार, संपादक, आलोचक पंकज सुबीर का लेखन इक्कीसवीं सदी के नई सामाजिक समस्याओं एवं मुद्दों का यथार्थ लेखन है। ‘ये वो शहर तो नहीं’, ‘ईस्ट-इण्डिया कंपनी’, ‘महुआ घटवारिन’, ‘एक सच यह भी’, ‘चैपड़े की चुड़ैलें’, ‘कसाब.गांधी/यरवदा-इन’, ‘अकाल में उत्सव’ जैसे उपन्यास और कहानी संग्रह लिखने वाले इक्कीसवीं सदी के यथार्थवादी कथाकार को पढ़ने के बाद कितना भी कठोर दिल वाला पाठक क्यों न हो उसका भी कलेजा पसीज जाता है। एक ऐसे विषय पर लिखा गया उपन्यास जो वर्तमान में समाज का सबसे उपेक्षित वर्ग है, जिसके लिए घोषणाएँ तो हर चुनावी मौसम में कर दी जाती हैं लेकिन चुनावी पर्व समाप्त होते ही सारी घोषणाएँ फाइलों में कैद हो जाती हैं। नेता एक से एक वादे करके चले जाते हैं फिर उन वादों की कोई खोज खबर लेने वाला नहीं रहता। सरकार की योजनाएँ जिसके लिए होती हैं उनको या तो कभी पता ही नहीं चलता है या पता चल भी जाता है तो वें योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।

‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास में ‘रामप्रसाद’ जैसे किसान की आत्महत्या सरकार की उदासीनता और भ्रष्टाचार को बयां करने के लिए काफी है। जो किसान करोड़ों लोगों को निवाला देता है, आज वह खुद के निवाले के लिए ही लाचार है। अगर एक कृषि प्रधान देश में किसान को अपने जीवन यापन के लिए ही संघर्ष करना पड़े और उस संघर्ष से त्रस्त होकर उसे अपनी इहलीला समाप्त करने को विवश होना पड़े तो यह समाज और सत्ता दोनों के ही मुंह पर तमाचे से कम नहीं है। अगर एक कृषि प्रधान देश में किसान आत्महत्या करता है तो उसके लिए जिम्मेदार ‘अत्महत्या’ करने वाला है या फिर वह व्यवस्था जिससे त्रस्त हो कर उसे यह कदम उठाना पड़ता है। व्यवस्था के निकम्मेपन और किसानों को दोयम दर्जे का नागरिक मानकर चलने वाले नेताओं, अधिकारियों, बाबुओं, मीडिया के ठेकेदारों तथा सामाज में अलग-अलग वेष में मौजूद हत्यारों की कथा है ‘अकाल में उत्सव’।

एक अनुमान के मुताबिक देश में प्रति वर्ष दस हजार से अधिक किसान तो वहीं तीस हजार से अधिक दिहाड़ी मजदूर शासन तंत्र की नाकामियों की वजह से आत्महत्या करने को विवश होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ों के मुताबिक देश में प्रति वर्ष हजारों किसान आत्महत्या करते हैं। ‘द इकोनोमिक्स टाइम्स के मुताबिक 2019 में 42,480 किसान और दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या किया। पिछले 25 वर्षों में लगभग तीन लाख किसानों ने आत्महत्या किया है।’ केंद्र सरकार ने 2020 में तीन कृषि कानूनों को पारित किया और उसके खिलाफ देश भर में किसान पिछले कई महीनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन फिर भी सरकार उनकी मांगें सुनने को तैयार नहीं है। कोरोना महामारी के बीच भी किसान अपनी जान हथेली पर लेकर आंदोलन करने को आखिर क्यों विवश है ? इस प्रश्न का कुछ हद तक उत्तर पंकज सुबीर का यह उपन्यास देता है। यह सब बताना यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ‘अकाल में उत्सव’ उपन्यास इन्हीं किसानों में से मध्यप्रदेश के एक किसान ‘रामप्रसाद’ की कहानी है, जहां उसे सत्ता और व्यवस्था की नाकामियों की वजह से पहले तो उसे दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती है और फिर आखिर में सिस्टम के आगे हार मानकर उसे फंदे में झूलना पड़ता है। और ऐसे हजारों रामप्रसाद देश में हर वर्ष मौत को गले लगा लेते हैं।

कथानक मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव सूखा पानी का है। रामप्रसाद के अलावा इस कहानी में लगभग दर्जनभर ऐसे पात्र हैं, जो समाज के अलग-अलग कार्य क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। सरकारी कर्मचारियों से लेकर राज नेताओं तक, ऐसा लगता है मानों सिस्टम बदल जाने की बातें सिर्फ फाइलों में ही करते हैं और हकीकत कुछ और ही है। ‘रामप्रसाद’ को पहले तो प्रकृति की मार झेलनी पड़ती है फिर बाद में व्यवस्था के सामने विवश होना पड़ता है और आखिर में दर-दर भटकने के बाद खुद को असहाय मानकर जिंदगी को समाप्त कर लेता है। ऐसी ही सामाजिक व्यवस्थाओं की परतें खोलने की मार्मिक कथा इस उपन्यास की है। कहने को तो आज हम विज्ञान और नई तकनीक की इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन वास्तव में ये कुछ प्रतिशत लोगों के लिए ही सत्य है। किसान, दिहाड़ी मजदूर और समाज के अन्य निर्धन लोगों के लिए आज भी शोषक और शोषितों वाली व्यवस्था ही है।

वर्तमान राजनीतिक एवं सरकारी कार्यालयों की कड़वी सच्चाई, जिला अधिकारी से लेकर पंचायत के कलर्क तक में व्याप्त भ्रष्टाचार, लचर सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था और इन सब के बीच किसानों की बेबसी का यथार्थ चित्रण है ‘अकाल में उत्सव’। उपन्यास में दो कथाएँ समानांतर चलती हैं। वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि सभी पहलुओं को उपन्यासकार ने बखूबी पाठक के समक्ष रखा है। ‘सूखा पानी’ हिंदुस्तान के लगभग सभी गाँवों का प्रतीक है तो ‘रामप्रसाद’ सम्पूर्ण भारतीय किसान का और ‘कमला’ पीड़ित किसान परिवार की महिला का। ‘श्रीराम परिहार’ अँग्रेजी राज की मानसिकता वाले कलेक्टर, ‘राकेश पांडे’ उप जिलाधिकारी, ‘मोहन राठी’ राजनीतिक कार्यकर्ता और ‘राहुल’ जैसे पत्रकार मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के लगभग सभी राज्यों के प्रतीक हैं। पटवारी, बैंक कर्मचारी, चैरसिया, मिश्रा जैसे पात्र भी देश के सभी राज्य, जिलों, गावों के प्रतीक हैं। ये सभी पात्र भेड़ियों की तरह शिकार की तलाश में अपनी आँखें गड़ाए रहते हैं कि कब कोई शिकार मिले और उसपर वे टूट पड़ें। 

एक छोटे जोत वाला किसान पीढ़ी दर पीढ़ी अपने किसान होने की बेबसी की मार झेलता आ रहा है। बीसवीं सदी में प्रेमचंद के किसानों की जो हालत थी, आज 21वीं सदी के दूसरे दशक के किसानों की भी लगभग वैसी ही दशा है। पिछले सौ वर्षों में सिर्फ बदला है तो बस इतना कि तब सेठ और जमींदार किसानों का शोषण करते थे और आज नेता और सरकारी तंत्र। आजादी के बाद से कितनी ही सरकारें और योजनाएँ बनीं परंतु किसानों के हालात बिलकुल भी नहीं बदलें। किसानों को कर्ज़ का बोझ पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता आ रहा है। कर्ज़, ब्याज, शोषण, आत्महत्या फिर अगली पीढ़ी भी इसी कुचक्र का हिस्सा बनती आ रही है। एक तरफ रामप्रसाद दो एकड़ ज़मीन का किसान अपने खेत में लगे फसल के पकने और कट कर बाज़ार तक पहुँचने की आस में अपनी पत्नी कमला को उसकी शादी में माँ से मिले ‘तोड़ी’ को बाजार के एक आभूषण दुकान पर बेचकर आ रहा है। दूसरी तरफ शहर में राज्य के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा एक तीन दिवसीय स्पोर्ट्स एडवेंचर उत्सव के लिए बड़े आयोजन की तैयारियां चल रही हैं। वैसे तो यह उत्सव नाम के लिए है, वास्तव में इस आयोजन का उद्देश्य है, सांस्कृतिक मंत्रालय की तरफ से जिले के हिस्से के लिए आवंटित सरकारी राशि का वर्ष के आखिर में बंदरबाट करना। कहीं राशि वापस न चली जाए इस डर से उत्सव के सफल आयोजन के लिए जिले के कलेक्टर सहित सभी अधिकारी दिन-रात एक किए हुए हैं।

कथानक में रामप्रसाद के परिवार में उसकी पत्नी कमला उनके तीन बच्चें, बहनें और बहनोई हैं। कथानक का केन्द्रीय पात्र रामप्रसाद है। एक कज़दार किसान परिवार किस प्रकार सरकारी तंत्र की हरामखोरी का शिकार होता है और उस व्यवस्था के सामने कैसे विवश होकर घुटने टेक देता है, उसका यथार्थ रूप इस उपन्यास में पाठक महसूस करता है। ‘अकाल’ रामप्रसाद का यथार्थ है तो वहीं ‘उत्सव’ सरकारी खजाने को लूटने का तरीका, तरीका क्या बल्कि इसे उत्सव कहना ही ज़्यादा सही होगा। रामप्रसाद के दुखद अंत और सांस्कृतिक उत्सव के सफल आयोजन होने के बीच कथानक में 21वीं सदी की उन सभी विसंगतियों को बहुत ही बारीक और सजीवता से पंकज सुबीर जी ने उकेरा है, जो आज मानव को दानव बनाने में लगा है। देश के प्रशासनिक अधिकारियों की अंग्रेजी मानसिकता अंग्रेजों के देश छोड़ के चले जाने के 70 वर्ष बाद भी किस प्रकार से सिस्टम का अंग बना हुआ है और वह सिस्टम यहाँ के गरीब, किसान और निम्न वर्ग के लोगों का दिन-रात शोषण कर रहा है। “कलेक्टर नाम के इस प्राणी को अंग्रेजों ने बहुत फुर्सत में बनाया था। सारी कूटनीति घोलकर डाल दी थी उसमें।” (पृष्ठ-174)

एक जिलाधिकारी की किसानों के प्रति नज़रिया देखिये-“हिंदुस्तान का किसान बहुत लालची होता है, इसको जरा सा लालच दे दो तो, यह कुछ भी करने को तैयार रहता है। कर्ज़ ले लेगा तो फिर कर्ज़ा माफ़ी के लिए चिल्लाएगा, बिजली का यूज़ कर लेगा फिर बिजली के बिल माफ करने के लिए रोएगा। फसल खराब हो गयी तो मुआवज़े के लिए छाती पिटेगा। इससे लालची कोई हो ही नहीं सकता है। सरकार भी वोट के चक्कर में गोद में बिठा कर खिलाती है इनको। इनकम टैक्स यह नहीं भरें, दूसरा कोई टैक्स यह नहीं भरें, पहले लगान भरते थे, तो वह भी खतम-सा हो ही गया है। एक बार खेत में बीज डाल दिये, फसल काट ली, और उसके बाद कोई काम नहीं। भारत के किसानों के साथ तो केवल अंग्रेज़ ही सही तरीके से डील करते थे, उस तरीके के बिना तो यह लोग मानने वाले भी नहीं है।” पृष्ठ- 174-75 जिस कलेक्टर के हाथों में जिले की समूची आबादी की ज़िम्मेदारी होती है, जिसके हाथों में सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचने की ज़िम्मेदारी होती है और उस जनता के लिए अगर ऐसी निर्दयी सोच रहेगी तो वाकई में सभी गरीब, ज़रुरतमन्द और किसानों का जीवन उसके भाग्य के भरोसे ही रहेगा। जब तक हमारे देश में श्रीराम परिहार जैसी मानसिकता वाले जिलाधिकारी और सरकारी तंत्र रहेगा तब तक किसान तो क्या बल्कि देश का भी भला होने वाला नहीं है। अब हाल ही में मई 2021 में देश कोरोना महामारी की दूसरी लहर से कराह रहा था और उस बीच देशभर के कई जिलाधिकारियों और अन्य अधिकारियों की असंवेदनशील करतूतें मीडिया में देखने को आईं। इक्कीसवीं सदी के भारत की यह कड़वी सच्चाई है, चाहे कलेक्टर हो या अन्य सरकारी नौकरशाह, सभी अपने पदों पर बैठे तो हुए हैं जनता की सेवा करने के लिए लेकिन सेवा तो दूर जनता से ऐसे पेश आते हैं मानो वो कोई गुलाम हों और जनता पर एहसान कर रहे हों।

आज समाज में जिस प्रकार से धार्मिक अंधविश्वास हावी होता जा रहा है और धर्म को व्यवसाय बनाया जा रहा है, वह समाज को मजबूत नहीं बल्कि और खोखला करते चला जा रहा है। धर्म के नाम पर चुनाव में वोट करना, उपद्रव और अन्य कुकृत्य करना आज इस ज्ञान और विज्ञान की सदी में न तो स्वीकार्य है और न ही प्रासंगिक। वैसे तो कोई भी धर्म कुकृत्य करने की छूट कभी नहीं देता है। धर्म के इस विकृत होते रूप को रचनाकार ने बहुत बेचैनी से पाठक के समक्ष रखा है। अब धर्म को व्यवसाय और अपने फायदे के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग में लाया जाने लगा है। 

धर्म के ढकोसलेबाजी और धंधा बनते जाने के यथार्थ रूप को भी पंकज जी ने तमाम पात्रों के संवादों के माध्यम से पाठक के समक्ष रखने की कोशिश की है। समाज में धर्म को लेकर ऐसी संकीर्णता है कि लोग भूखे पेट रह कर भी अपने ईश्वर के प्रति अनास्था नहीं रख सकतें। जिसे खाने के लाले पड़े हों वह भी अपने धर्म की कट्टरता को नहीं छोड़ता। धर्म के असली स्वरूप को मानने को कोई भी तैयार नहीं है। जिसे धर्म का साधारण अर्थ तक नहीं पता, वह धार्मिक उपदेश देता है और धर्म के नाम पर न जाने अपना कितना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेता है। आज धर्म जिस प्रकार हमारे जीवन में हावी होता जा रहा है, वह मानव के अस्तित्व के लिए कहीं न कहीं खतरे की घंटी है। धर्म के नाम पर धर्म गुरुओं के द्वारा अमीर तो अमीर गरीब जनता से भी वसूली की जाती है। “आपके अपने घर का जीर्णोद्धार भले ही नहीं हो पाए लेकिन, आपको भगवान के घर के जीर्णोद्धार के लिए तो पैसा अनाज की शक्ल में देना है।” पृष्ठ-184 धार्मिक पाखंड के विषय में उपन्यासकार कई जगह चर्चा करते हैं।

पाठक के सभी प्रश्नों का उत्तर उपन्यासकार अपने पात्रों के माध्यम से दिलवा देता है। “अगर किसान खेती नहीं करेगा तो आप और हम खाएँगे क्या ? और वैसे भी अब किसान धीरे-धीरे मजदूर होता जा रहा है इस देश में। उसकी जमीनें जा रही हैं। कुछ दिनों बाद इस देश में मल्टीनेशनल कंपनियाँ ही खेती केरेंगी सारी।” पृष्ठ-194 धर्म को व्यवसाय बनाने वालों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। “काश जिस प्रकार से देश में मंदिर बाबा पैदा हो रहे हैं, उस तरह से गावों में कोई स्कूल बाबा, अस्पताल बाबा या सड़क बाबा भी पैदा होना शुरू हो जाएँ, जो कसम खाएँ कि पचास गाँव में स्कूल, अस्पताल तथा सड़क बनवाएँगे।” पृष्ठ-186 धर्म और आस्था लोगों में डर पैदा करता है और उस डर की वजह से ही धर्म का कारोबार फलता-फूलता है। “दुनिया के सारे धर्म स्थल असल में भय का कारोबार करने वाली दुकानें हैं। इन दुकानों की बिक्री ही भय पर टिकी है, जितना अधिक भय उतनी अधिक बिक्री। डराओ और कमाओ।”  पृष्ठ-186 अगर कहें कि जिस तीव्र गति से विश्व में पूंजीवाद का विस्तार हो रहा है उसी तीव्रता से धार्मिक कट्टरता का भी विस्तार हो रहा है तो शायद गलत नहीं होगा।

देश की जर्जर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को उपन्यास के माध्यम से जनता के सामने रखा है। सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों की बदहाली और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर भी पाठक को ध्यान दिलाया है। आए दिन हम अखबारों में सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत से दवाई की कालाबाजारी और निजी लैब में जाँच के नाम पर लूट के रैकेट के बारे में पढ़ते हैं। सरकारी डॉक्टर, सरकारी अस्पताल में आए मरीजों को अपने निजी नर्सिंग होम में भर्ती करवाने, बाहर से दवाइयाँ खरीदने और अनगिनत टेस्ट करवाने को विवश करवाते हैं। “यहाँ सरकारी अस्पताल में तो सब ऐसा ही चलेगा कामचलाऊ, तुम लोग उनको डॉक्टर साहब के घर ले जा कर दिखा लो एक बार। वहाँ पर अच्छी तरह से देख लेंगे। यहाँ तो एक बार में इतने सारे मरीजों को देखना होता है कि बस देखा न देखा एक बराबर ही होता है। घर ले जाकर दिखा दो, उनकी फीस दे दो, अच्छी तरह से देख लेंगे और अगर तुम्हारी गुंजाइश होगी, तो किसी नर्सिंग होम में भी भर्ती कर देना, वहाँ दिन भर डॉक्टर साहब का चक्कर लगता रहता है।” पृष्ठ-65 कोरोना महामारी में एक तरफ हमने सरकारी अस्पतालों की बदहाली देखी तो वहीं दूसरी तरफ निजी अस्पतालों द्वारा आपदा को अवसर बनाने की अनगिनत घटनाएँ सुनने, देखने और पढ़ने को मिली। सरकारी स्वास्थ्य तंत्र के प्रति सरकार की बेरुखी और वहाँ व्याप्त अव्यवस्था का खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ता है। अमीरों के लिए तो मॉल नुमा बड़े-बड़े सुपर स्पेसिलिस्ट हॉस्पिटल है हीं।

आज किसानों की बेबसी और पीड़ा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब एक किसान को कर्ज के बोझ से बेबस हो कर अपनी स्त्री के उन आभूषणों को बेचना पड़ता है जिसे वें पुरखों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा मानता है। पहले तो आभूषणों को गिरवी रखता है और बाद में कर्ज़ बढ़ने पर उसे बेचना पड़ जाता है और फिर उसके बाद परंपरा का आगे बढ़ाने का सिलसिला टूट जाता है। फसल बोने के लिए गए कर्ज़ की लाचारी को उपन्यासकार ने पाठक के सामने रखा है। “कमला की तोड़ी बिक गई। बिकनी ही थी। छोटी जोत के किसान की पत्नी के शरीर पर के जेवर क्रमशः घटने के लिए होते हैं। और घटाव का एक भौतिक अंत शून्य होता है, घटाव की प्रक्रिया शून्य होने तक जारी रहती है। पुरुष पुरखे, खेत, जमीन और उन पर लदा हुआ कर्ज छोड़ कर जाते हैं, तो महिला पुरखिनों की ओर से जेवर मिलते हैं। कुछ धातुएँ। जब परिवार की महिला के पास इन धातुओं का अंत हो जाता है, तब यह तय हो जाता है कि किसानी करने वाली बस यह अंतिम पीढ़ी है, इसके बाद अब जो होंगे, वह मजदूर होंगे।” पृष्ठ-122 और इसी प्रकार से देश में छोटे जोत के किसान कर्ज़ के बोझ तले दबते चले जा रहे हैं और फिर मजदूर बनने को विवश होते हैं। “हर छोटा किसान किसी न किसी का कर्ज़दार है, बैंक का, सोसायटी का, बिजली विभाग का या सरकार का।” पृष्ठ-29 आज किसानों का यही यथार्थ है। लिए गए कर्ज़ को न चुका पाने की दशा में हजारों किसान प्रति वर्ष मौत को गले लगा लेते हैं और हजारों मजदूर बनने को शहरों की ओर पलायन करते हैं।

वर्तमान भारतीय राजनीति के यथार्थ रूप को पात्रों के बीच होने वाले संवादों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। जो राजनीतिक पार्टियां लोकतंत्र की आवाज बुलंद करती हैं उन पार्टियों में ही लोकतंत्र नहीं है। “यह होता है पार्टियों का अंदरूनी लोकतंत्र। विरोध करेंगे, तो हाशिये पर डाल दिये जाएँगे। और हाशिये पर जाने से अच्छा है कि बहते रहो धारा के साथ। सबसे अच्छा पार्टी कार्यकर्ता वह होता है, जो ऊपर से आए हुए हर निर्णय को, आँख बंद कर अपना समर्थन देता है। पार्टियों को कार्यकर्ता नहीं चाहिए होते, उन्हें अंधे, बहरे और गूँगे लोगों की फौज चाहिए होती है। और इन अंधे, बहरे, गूँगे लोगों के पास दिमाग या विचार जैसी किसी चीज का तो अंश भी नहीं होना चाहिए। न सुनो, न देखो, न बोलो और सबसे जरूरी, सोचो भी मत।” पृष्ठ-96 आज जिसे अंध भक्त कहते हैं यहाँ कथाकार उन्हीं अंध भक्त रूपी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को रेखांकित करते हैं। आज ऐसा लगता है मानो राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता विवेक शून्य हो रखे हैं। वर्तमान राजनीतिक अंध भक्तों में न तो तर्क करने की क्षमता है और न ही आलोचना करने की समझ। 

पत्रकारिता के गिरते मूल्य पर कथाकार की चिंता उपन्यास में कई जगह ज़ाहीर होता दिखता है। पत्रकारिता और पत्रकार किस प्रकार सत्ता की दलाली कर रहे हैं, उसका सटिक उदाहरण उपन्यास में पाठक को मिलता है। “जनसम्पर्क विभाग के पास एक विशेष फंड है, जिसको सीधी भाषा में कहें तो वह पत्रकार-मनोरंजन फंड होता है। इस फंड से पत्रकारों को चाय-नाश्ता आदि करवाने का प्रावधान होता है। ताकि वह सरकार के खिलाफ नहीं लिखे।” पृष्ठ-18 आज हम अपने आस-पास ऐसी अनगिनत घटनाएँ देखते है, जहां बलात्कार, किसान आत्महत्या, सरकार विरोधी आंदोलन, सरकारी भ्रष्टाचार की खबरों को सरकारें चाहती हैं कि दबा दिया जाए और ऐसा करने की कोशिश भी करती हैं (यह बात अलग है कि आज सोशल मीडिया सरकार को उन कोशिशों में बहुत कामयाब होने नहीं देती है)। और इसमें सरकार को जिस तरीके के पत्रकार मदद करते हैं, वैसे ही पत्रकारों की ओर लेखक पाठक का ध्यान आकृष्ट करवाते हैं। जिले के कलेक्टर पत्रकार राहुल से कहते हैं “और हाँ राहुल एक बात जरा ध्यान रखना कि सारे पत्रकारों को इस कार्यक्रम को लेकर विश्वास में ले लेना। जरा मैनेज करके रखना मीडिया को।” पृष्ठ-40 

जिले के लाखों लोगों की जिम्मेदारी जिस ‘कलेक्टर’ के हाथों में होती है, वह पत्रकारों को मैनेज करने की बात कर रहा है। जिलाधिकारी श्रीराम परिहार एक बार फिर पत्रकार राहुल से कहते हैं- “राहुल मैनेज करो कुछ....सीएम साहब बहुत गुस्साए हुए हैं। बार-बार जो मुख्यमंत्री के क्षेत्र में किसान ने आत्महत्या की है, मीडिया पर आ रहा है, उससे उनकी छवि खराब हो रही है। देखो कहीं कुछ मैनेज हो सकता हो तो कर लो।” पृष्ठ-238 इसके बाद पत्रकार राहुल कलेक्टर साहब को सुझाव देता है- “सर अब इलेक्ट्रोनिक मीडिया रात में तो जाएगी नहीं वहाँ गाँव में। सारे सुबह ही भागेंगे अपने-अपने कैमरे लेकर। तो एक तो यह कीजिए कि रात को ही मैनेज करवाइये वहाँ गाँव भेजकर किसी को। कोई डिफरेंट स्टोरी करवाने की कोशिश कीजिये, ताकि किसान शब्द हट जाए स्टोरी में से। बाकी अब जो टिकर चलने से डैमेज हो गया है, वह तो हो ही गया है। प्रिंट में देख लेता हूँ मैं कि न्यूज कुछ डैमेजिंग नहीं हो ज़्यादा। बाकी छपने से तो नहीं रोक सकते अब हम क्योंकि, इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर आ गई है।” पृष्ठ-238-239 वर्तमान मीडिया को आखिर गोदी मीडिया क्यों कहा जाता है, उसका उत्तर उपन्यास में पत्रकार और सत्ता की सांठ-गांठ के रूप में सामने आता है और सामान्य पाठकों के लिए भी पत्रकारिता के इस गिरते मूल्य को समझना आसान हो जाता है। “आजकल अखबार पढ़ता कौन है ? अखबार का काम अब अगले दिन पोहा-समोसे बाँधने का ही रह गया है।” पृष्ठ- 57 यह व्यंग्य अपने आप में पत्रकारिता की शर्मनाक स्थिति को बयां  करने के लिए काफी है। 

उदारीकरण नाम की जिस चिड़िया ने सन् 90 के दशक में उड़ना शुरु किया था, उसकी यात्रा आज तक यथावत चलती ही जा रही है। वह न तो पीछे मूड़ कर देखती है और न ही दायें-बाएं। इसका एकमात्र लक्षय है पूंजीवादी व्यवस्था के उत्थान नामक स्थान पर ही जा कर रुकना। जिस उदारीकरण को लोगों के आर्थिक विकास और उन्नति के लिए खोला गया था आज उसने समाज में आर्थिक खाई को पहले से भी अधिक गहरा कर दिया है। उदारीकरण ने देश में एक ऐसे पूंजीवादी वर्ग को जन्म दिया है जिसका सरोकार किसान, मजदूर, गरीब, निम्न-मध्यम वर्ग से तो दूर-दूर तक नहीं है, है तो सिर्फ खुद को मालामाल करने भर से। “कितना बड़ा मज़ाक है कि गरीब किसान की मक्का का तो न्यूनतम समर्थन मूल्य तय है मगर उस मक्का से कॉर्न-फ्लैक्स बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए कोई भी समर्थन मूल्य नहीं है। डेढ़ रुपये किलो की मक्का को बहुराष्ट्रीय कंपनी कॉर्न-फ्लैक्स बना कर तीन सौ रुपये किलो में बेचती है।” पृष्ठ-48 अब जब देश में ऐसी व्यवस्था रहेगी तो शायद सदियाँ बीत जाएंगी फिर भी इन किसानों की हालत ऐसी ही रहेगी। सरकारें आज पूंजीवाद के सांठ-गांठ से चलती हैं तो भला उन पूँजीपतियों के फायदे के बारे सरकारें कैसे नहीं सोचेंगी। जनता को गुमराह करके वोट लेना और बड़े-बड़े उद्योगपतियों के हित में नीतियाँ बनाना तो अब सरकारें खुलकर कर रही हैं।

समाज का एक और ऐसा सच देखिये जिसे हम सब जानकर भी अंजान बने रहते हैं। “नीचे की तरफ पानी में नमक और मिर्च घोल के झोल सा बना है, उसमें ही मीड़-मीड़ कर रोटी खा रहा है। एक तरफ कुचला हुआ प्याज रखा है। और एक दो हरी मिर्च रखी है, जिनको हर कौर के साथ कुतल लेता है वो।” पृष्ठ- 49 नियति का कितना बड़ा खेल है कि जिस किसान के उपजाए फसल से हजारों प्रकार के व्याजन बनते हैं और उन व्यंजनों को खाने के लिए करोड़ों की गाड़ियों में चलने वाले लोग एक से एक होटल में टोकन लेकर घंटों लाइन में लगते हैं। जो पूरी दुनिया को निवाला देता है, उसके नसीब में मात्र हरी मिर्च, नमक और प्याज है। क्या इसे ही पूंजीवाद का चरम परिणति कहते हैं ? क्या सन् 1991 ई. में (एलपीजी पॉलिसी) उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विकरण की नीति किसानों के इसी दशा के लिए शुरू की गयी थी ? अगर नहीं तो वो वादें और सपनें कहाँ हैं, जो सन् 1991 ई. में अर्थव्यवस्था को उदार बनाने के नाम पर किए गए थें ? क्या देश में किसानों की बदहाली सन् 1991 ई. के पहले भी ऐसी ही थी ? किसानों की स्थिति में सन् 1991 के पहले और आज 30 वर्ष बाद भी कोई सुधार आया है ? ये तमाम ऐसे प्रश्न हैं जो पाठक के मस्तिष्क में उपन्यास पढ़ते-पढ़ते आते हैं और अगर पाठक सजग है तो फिर इन प्रश्नों के उत्तर उसके दिमाग में खुद ब खुद आ जाते हैं ।

कहीं न कहीं अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा पर पाश्चात्य हमला लेखक को कचोटता है और यह उपन्यास में कई जगह दिखता है। “सही कह रहे हो आप मोहन जी। यह किसी षड्यंत्र के तहत ही किया जा रहा है। हमारी भाषा, हमारी संस्कृति को समाप्त करने के लिए।, हाँ सर, अब तो घर में भी कहावतों का उपयोग करने में डर लगता है, कॉन्वेंट स्कूल में पढ़े बच्चे डांट देते हैं कि क्या गंदी बातें कर रहे हैं। एक दिन मैंने अपनी पोती को किसी बात पर कह दिया कि ‘गोदड़े में पादने का लाड़ नहीं होगा हमसे’, तो वह रोती रही देर तक कि दादू हमसे ऐसा कह रहे हैं। बताइये क्या किया जाए ? बच्चों से बात ही न की जाये क्या, क्योंकि, मुहावरें और कहावतें तो जबान पर चढ़े हैं, दिमाग में फीड हैं, वह तो बात-बात में निकलेंगे ही, उनको निकलने से कैसे रोका जाए?” पृष्ठ-140-41 समाज में आधुनिक शिक्षा के मिल जाने से भलें ही मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरियाँ मिल जा रही हैं लेकिन उसके साथ मानवीय मूल्यों का हृास होते जाना बहुत ही चिंतनीय है। अपनी भाषा, बोली और संस्कृति को भूलना, अपनी पहचान को मिटाना है।

कथानक ऐसा है कि पाठक इसे एक बार पढ़ने के लिए बैठता है तो फिर कोशिश करता है कि समाप्त कर के ही उठे। पात्रों के संवादों में इतनी जीवंतता है कि हर एक पात्र के बीच का संवाद पाठक को खुद के जीवन या आस-पास की घटना ही लगती है। एक मुख्य कथानक के साथ अनगिनत छोटी-छोटी कथाएँ, लोक कथाएँ, लोकोक्तियाँ, कहावतें, मुहावरें आदि कथानक की रोचकता को बनाएँ रखती हैं। स्थानीय बोली और शब्दों का प्रयोग कथा को यथार्थ के और करीब ला देता है। ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, खान-पान, रीति-रिवाज, धार्मिक आस्था, स्त्री की सामाजिक और पारिवारिक स्थिति को भी बखूबी स्थान दिया है। भाषा का बेहतरीन प्रयोग किया है। जैसे पात्र हैं, वैसी भाषा का प्रयोग किया है। अधिकारी, समाजसेवी, राजनेता, पत्रकार, अस्पताल और बैंक कर्मचारी, पटवारी आदि की भाषा में उसके पेशे के साथ-साथ आज के अंग्रेजी और हिन्दी मिश्रित शब्दों का प्रयोग किया हैं। आज सोशल मीडिया के ज़माने में आम बोल-चाल की यही भाषा है। वैसे तो यह उपन्यास एक कर्ज़ तले दबे किसान ‘रामप्रसाद’ पर केन्द्रित हैं परंतु इसके माध्यम से उपन्यासकार ने समाज के उन सभी पहलुओं का पोल बखूबी खोला है, जिसका सरोकार देश के बहुसंख्य वर्ग से है। इस एक कथा में समाज के सभी महत्वपूर्ण विषयों/मुद्दों पर बात की है।

सुबीर जी ने व्यंगों के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था की खोखली परतों को खोलते हैं, चाहे वह सरकारी शिक्षा व्यवस्था हो या फिर स्वास्थ्य, सभी के यथार्थ रूप को पाठक के सामने रख दिया। सरकारी कार्यालयों की कार्य प्रणाली और उसमें व्याप्त लूट-खसोट को उसी रूप में रखा है जिस रूप को अमूमन हममें से हर किसी ने कभी न कभी सामना किया होगा या फिर उन परिस्थितियों को अपने जीवन में यथार्थ रूप में झेला होगा। ऐसा लगता है मानो सभी पात्र हमारे जीवन से किसी न किस रूप में संबद्ध हैं और हमारे जीवन के यथार्थ की तस्वीर आँखों के समाने आ जाती है। उपन्यासकार सामाजिक समस्याओं को जिस संवेदनशीलता से पाठक को बताते हैं वह अद्वितीय है। जैसे-जैसे पात्रों के संवाद कथानक को आगे बढ़ाते हैं वैसे-वैसे सरकारी सिस्टम के प्रति पाठक का गुस्सा बढ़ता ही जाता है। यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे पढ़ने के बाद हर एक गंभीर पाठक को कुछ न कुछ लिखने का मन करेगा।