‘कमबख्त निंदर’ के बचे होने के मायने









आरती स्मित, सहायक प्रोफेसर, सेंट स्टीफेंस काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, मो. 8376836119, Email : dr_artismit@gmail.com

झुटपुटे दिन की वाचालता जब ख़ामोशी सुनाने लगती है, तब एक साहित्यकार याद आता है। एक ऐसा साहित्यकार, जो समय के चक्रव्यूह को बार-बार तोड़ने का माद्दा रखता हो, सीना ठोंककर कुछ कहने की वृत्ति जीता हो; सीने के भीतर चीड़ वन का दावानल और कपिलधारा का समृद्ध सोता एक साथ बहाता हो और ख़ुद को अतीत और वर्तमान का सेतु बनाए रखने के लिए अपने बालपन को अपना जीवट स्वरूप मानता हो और उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मुस्कुराकर कहता हो.... ‘देख लो, जितना बचा है मेरा होना!’’

आलोचक मन तलाश शुरू करता है उसके बचे होने की- उस निंदर के बचे होने की जिसे उसने पाया था ‘कमबख़्त निंदर’ में और ‘क्या हाल सुनावाँ’ में भी वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र मोहन के अंतस में पैठे हुए.... पूरे दम-खम के साथ अपने अनूठेपन को जीते और चिर-परिचित मुस्कान बिखेरते हुए। तब यह अनुभूति हुई कि ‘निंदर’ को आत्मसात किए बग़ैर साहित्यकार नरेंद्र मोहन की कलम के पैनेपन को समझना और जज़्ब करना कठिन है।

एक दिन ‘निंदर’ ने उँगली पकड़ी और रंगमंच की दुनिया में ले गया जहाँ ‘नो मेस लैंड’, ‘सींगधारी राजा’, ‘कबीरा खड़ा बाज़्ाार में’, तथा ‘मलिक अंबर की प्रस्तुति के पीछे की गहरी सोच ने एक-एक कर, चकित करने का क्रम आरंभ किया और मैं ठगी-सी रह गई।

अभी आत्मकथा के दोनों खंडों तथा चारों नाटकों के प्रभाव से उबरी भी नहीं थी कि ‘साहस और डर के बीच’ खड़े निंदर से फिर मुलाक़ात हो गई। एक के बाद एक रचनाओं से गुज़्ारते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँची ही थी कि नरेंद्र मोहन शरीर है और निंदर आत्मा, मेरे लिए उस आत्मा को पकड़ना ज़रूरी होने लगा क्योंकि बिना उसे साथ लिए बड़ा कठिन था नरेंद्र मोहन की चुनिंदा कविताओं के नए संकलन ‘जितना बचा है मेरा होना’ को समझ पाना।

दरअसल, नरेंद्र मोहन स्वभाव से कवि हैं, किंतु उनकी समस्त विधाओं के बीच एक रागात्मक संबंध है। जैसे, उनकी आत्मकथा की पूरी यात्रा किए बग़ैर, उनकी कविताओं को एक स्तर तक समझना संभव है, किंतु उन ध्वनियों को पकड़ पाना कठिन है जिनमें कविताएँ पिरोई गई हैं.... स्वभावतः। 

ध्वनियों का यही चमत्कार उनके नाटकों को विशिष्ट बनाता है। कविता में नाटक, नाटक में कविता, दोनों में दोनों के विलीन होने के अद्भुत सौंदर्य के पीछे झाँकने के लिए उनकी डायरी से गुज़्ारना अनिवार्य हो जाता है। यों तो उनके कई काव्य संग्रह-एक अग्निकांड जगहें बदलता, इस हादसे में, हथेली पर अंगारे की तरह आदि से पहले ही रू-ब-रू हो चुकी हूँ, किंतु यह संग्रह इसलिए ख़ास हो गया क्योंकि यह चुनिन्दा कविताओं का संकलन है जो कवि द्वारा चयनित है यानी उनके दिल के क़रीब। किसी साहित्यकार को समझने के लिए उनकी पंसदीदा रचनाओं से बेहतर सहयोगी भला कौन हो सकता है ?

पुस्तक हाथ आई, सबसे पहले दृष्टि टिकी शीर्षक पर ‘जितना बचा है मेरा होना’ फिर ठहर गई आवरण चित्र पर। एक आलोइन/एक बिखराव/त्रासदी जीवन की और उससे भी कहीं अधिक वैचारिक/भावानात्मक। नैतिक मूल्यों के हनन और देश विभाजन की घोषणा के साथ ही शुरू हुए अमानवीयता के नृशंस तांडव का ख़ामोशी को अतल तक चीरता अंतर्नाद, आतंक, भय, आशंका, अविश्वास का विस्तार, लहू का लिजलिजापन चित्र से निकलकर मन पर फैलता गया। अब मेरे सामने थे- शीर्षक और चित्र- और उनसे ध्वनित अंतर्कथा।

पुस्तक के भीतर प्रवेश करने से पूर्व अनुक्रम पर दृष्टि डालना लाजि़्ामी था। चार खंडों में गूँथी चैरासी कविताएँ। हर खंड अपने भीतर समाहित कविताओं के चरित्र बताता हुआ-सा! पाँचवें खंड में दो लंबी कविताएँ रखी गई थीं, जिन्हें व्यथा-कथा कहा जा सकता है। ये कविताएँ अपने आप में एक मुकम्मल कहानी ध्वनित करती हैं जिनमें रेखाचित्र का टशन भी है।

‘दो शब्द’ से गुज़्ारते हुए कवि के तेवर और भीतरी वात्याचक्र का अंदाज़्ा हो जाता है। ‘दो शब्द’ के अंतर्गत रखे गए तमाम शब्द, इस संकलन से कवि के रागात्मक जुड़ाव ओर उद्देश्य के प्रकटीकरण में सक्षम हैं। कवि अपने कहन के प्रति सर्वथा सचेत प्रतीत होते हैं। हर प्रस्तुति सोद्देश्य! इस पुस्तक को उलटने-पलटने पर, संकलन तैयार करते समय कवि की एकाग्रता का भान होता है जिसने समस्त आवेगों पर विजय पा ली हो। यही ‘निंदर’ के बचे होने का पुख्ता प्रमाण है।

यों तो कविताएँ पढ़ना और पढ़ते जाना बहुत कठिन नहीं। ....किंतु इस संग्रह की कविताएँ रोकती हैं, बार-बार रोकती हैं विमर्श के लिए। आग, नदियाँ और पेड़ कविता में प्रयुक्त ऐसे सशक्त और केंद्रीय रूपक हैं जो विभाजन और विस्थापन की त्रासदी का दंश, उनकी स्मृतियों से उठती-लहकती लपटों से पाठक को झुलसाने में समर्थ हैं। ये ही वे रूपक हैं जो बार-बार कलम से उतरकर पिछले सात दशकों और उनसे भी पहले की स्थितियों से रू-ब-रू कराते हैं..... कुछ इस तरह कि संवेदनशील पाठक स्वयं को भोक्ता मान बैठे और उसकी जलन से उभरी छटपटाहट से बचने की कोशिश में हाथ-पाँव पटके, ठंडा पानी पिये, बार-बार चेहरा धुले, शावर के नीचे घंटों खड़े रहे कि कहीं तो राहत मिले! नरेंद्र मोहन की इन कविताओं में उतरना स्वयं को काठ की नाव के सहारे आग की दरिया में उतारना है; आग की लपटों में घिरना है; झुलसना है और स्वयं से पूछना है.... कितना बचा है मेरा होना ?

संग्रह के पहले खंड ‘जितना बचा है मेरा होना’ तेईस कविताओं का गुलदस्ता हैं जिसमें संवेदना का प्रवाह, व्यंग्य की तीक्ष्णता और करुणा की निर्झरता महसूसी जा सकती है। यों तो ये गुण प्रायः सभी कविताओं में है, किंतु कुछ कविताओं में लालित्य भी है, जीवन के मधुर पलों की कोमलता भी है, साथ ही, रंग और मंच की मिली-जुली अभिव्यक्ति कवि के लहूलुहान हृदय के एक नन्हे अबोध और कलाप्रिय अंश का साक्ष्य-स्वरूप उपस्थित है। इस खंड की पहली कविता ‘मैं मरना नहीं चाहता’ में देश की वर्तमान स्थिति के उद्भूत पीड़ा के अंतर्दाह के झुलसते मन से उद्भासित भाव शब्द का चोला पहन, उतर आते हैं काग़ज़ पर। एक बानगी ...

गलती हुई रीढ़ की हड्डी / और तनी हुई गरदन की नसों को लेकर / मैं मर्सिया पढ़ रहा हूँ / और तैयार कर रहा हूँ / देश का ब्ल्यू प्रिंट / ...... मेरी मदद करो महाकवि / मैं मरना नहीं चाहता !

जब से होश संभाला है / मस्तकों को झुकते और लुढ़कते ही पाया है

रोष से शुरू हुई कविता व्यंग्य-कटार चलाती हुई विडंबनाओं में घिरकर करुणा की स्थिति में पहुँच जाती है। ऐसे में वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल का कहा याद आ जाता है.... सही व्यंग्य वही है जो हास्य का पुट लेते हुए विद्रूपताओं पर वार करे और उसकी परिणति करुणा में हो। इस दृष्टि से कई कविताएँ ‘विशुद्ध व्यंग्य’ की श्रेणी में स्वतः आ जाती हैं। यों तो कविता का हर खंड एक अलग तेवर, एक अलग मानसिकता का स्राव करता है। कवि के मन में उमड़ती-घुमड़ती बदलियों का रंग बदलना साफ़-साफ़ दिखता है।

‘दीवारें कँपाती हँसी’ सत्ता, शिक्षा, मीडिया और साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में पदासीन महामहिमों पर तीखा कटाक्ष है। व्यंग्य की धार इतनी तेज़्ा है कि बिना अवसर दिए शब्दों के नश्तर से लहूलुहान कर देती है। कवि ने नेताओं, शिक्षकों, पत्रकारों और आलोचकों के कृत्य पर सीधी चोट करते हुए, समाज की अराजक स्थिति उँगली रखी है। अपने-अपने कर्तव्य से विमुख होकर चाटुकारी में व्यस्त बुद्धिजीवियों को कटघरे में खड़ा किया है। भाषा के मनमाने प्रयोग पर तीखी टिप्पणी जायज़ है और भाषा के स्वरूप को लेकर उनकी चिंता प्राध्यापक एक सजग साहित्यकार होने के नाते स्वाभाविक प्रतीत होती है। एक बानगी.....

दाद दूँगा जिगरे की आपके / झूठ बोलने और सहने की कुत्ता फ़ज़ीहत में / कमज़ोर नहीं हुए आप.... नरेंद्र मोहन के जिस तरह शिक्षा, जनसंचार और साहित्य-तंत्रों के भीतर राजनीति की दुर्गंध फैलाते और भाषा का शोषण करते कथाकथित पुरोधाओं को आड़े हाथ लिया और फटकारा है, एकबारगी नैतिक अवमूल्यन पर कबीर की फटकार स्मृति में तैर जाती है। कम ही कविताएँ ऐसी होती हैं जो बार-बार अपनी ओर खींच और हर बार अर्थों की नई परत खोले।

तीसरी कविता ‘हँसी फूटने पर’ एक गोली है जो दनदनाती हुई आती है और सीने में धँस जाती है। साहित्य के क्षेत्र में पल रहे गुर्गे, राजनीति की आड़ में राजक तत्वों को बढ़ावा देने वाले सफे़दपोशों और आतंकवाद, उग्रवाद, माओवाद के समापन के नाम पर निर्दोश ग्रामीणों/जनजातियों की सहनशक्ति चुकने तथा प्रतिकार करने की वृत्तियों को खुलासा करती है यह कविता। व्यंग्य तो इस खंड कि हर कविता की साँस में है। देश में दंगे फैलानेवाले हाथ, अराजक तत्वों को पालनेवाले हाथ और अपने ही देश की सेना के कुकृत्यों से छलनी होनेवाले वे चेतन प्राणी जो अपनी अस्मिता के बूँद-बूँद निचुड़ जाने से पहले जाग जाते हैं, विरोध करते हैं, प्रतिकार करते हैं और मारे जाते हैं.... कवि देखता है सब कुछ; दंश झेलता है उनके साथ और प्रतिकूल मौकों (दोषी नेता या दोषी सुरक्षा दलों की मृत्यु) पर उसके भीतर का आक्रोश कहकहों में बदल जाता है।

क्षणिका ‘हँसते-हँसते’ तीन पंक्तियों में ‘गागर में सागर’ भरने की कहावत चरितार्थ करती है। ‘विसंगति’ कविता पुरस्कारों की होड़ में लगे चाटुकारों / लोलुप साहित्यकारों पर क़रारा व्यंग्य है। कवि चोट करते हैं और विसंगतियों से टीसते मन से फूट पड़ती है करूणा। कवि की संवेदना कराहती हुई पूछती है...

रूँधी रूँधी आवाज़ / शब्द कहाँ है / शक्ल कहाँ है / आवाज़ और शब्द और शक्ल तीनों में / कोई रिश्ता क्यों नहीं है?

संवाद की यह प्रक्रिया सरल होते हुए भी सरोकारों के जटिल दरवाजे खोलती है। ‘इस हादसे में’ कवि ने नेता से संवाद स्थापित किया है-सीधे-सीधे, बेलौस आवाज़ में, पूरी ठसक के साथ व्यंग्य की पैनी धार से भीतर तक चीरते हुए....। जनता की पीड़ा के प्रति संवेदनशून्य नेता से कवि का संवाद ....  मैं नहीं मान सकता / आपकी चमड़ी है ही नहीं 

देश की आंतरिक और बाह्य स्थितियों के अराजक होने में सत्ताधारियों का कितना हाथ है, इसका बेकाक खुलासा करते हुए कवि ने अंत में विरोध को बुलंदी तक पहुँचाया है। वर्तमान में जब साहित्य और जनसंचार सत्ता का पिट्ठू बनने और नाम-पद के जुगाड़ में लगे हैं, कवि सीधे-सीधे चुनौती देते हैं और दहकती आग में झुलसने के लिए तैयार रहते हैं। इस आग में तपकर कविता की आत्मा निखर-निखर उठती हैं।

आज़ादी के बाद सत्ता के प्रभाव ने और सत्ता की कृपादृष्टि के प्रलोभन ने देश की जो दुर्दशा की है, कवि-मन छिल गया है भीतर तक, तभी ‘रक्तपात की शुरुआत करता है... कुछ इस तरह .... पड़े पड़े मरूँ या कुछ करूँ / आत्मघाती स्थिति से कैसे बचूँ ?

ये जो उहापोह, जो द्वंद्व हैं, वे शब्दों से परे की पीड़ा को बाँधते ही नहीं, उनसे हौले-हौले गुज़्ाारते ही हैं। कवि बर्बर नहीं हैं, अचेतन भी नहीं! इसलिए सक्रिय होना चाहते हैं अन्याय, अत्याचार, हिंसा के विरुद्ध .... जहाँ चोट खाना तय है। निम्नांकित पंक्तियों में कवि के अंतद्र्वंद्व में विलोपन की स्थिति उभर-उभर आती है.....

ख़त्म होता हूँ मैं ही चुनते हुए / और देख्ता हूँ चैखट के बाहर भीतर / एक पंजे की सर्राहट और ख़ून

ये खौलती हुई पंक्तियाँ कितनी तहें खोल देती हैं। यकायक सारा मंजर तैर जाता है आँखों के सामने और चिपक जाती तलवों से लिसलिसाहट ख़ून की और गरदन पर क्रूर पंजों की मज़बूत पकड़ का एहसास सहज होने नहीं देता! मुक्तिबोध पर लिखी गई कविता का तेवर भी वही है-उजास के पीछे के 

अँधेरे को टटोलती हुई.... उजाले में से / अँधेरा फूटता दिखे / लक़दक़ .....

इसी प्रकार, वर्तमान के बजबजाते स्वरूप को रेखांकित करतीं कुछ पंक्तियाँ कहे से अधिक अनकहा परोस जाती हैं और पाठक उन पंक्तियों को ओढ़ता-बिछाता, बदलते पलों के साथ नूतन अर्थ ग्रहण किए चलता है....

उजाले की शक्ल में / फैल रही धुंध के अंबार में से उतरती क्यों दिखती हैं दिव्य प्रतिमाएँ / अँधेरे को ओट किए / गुनाहों को बख्शतीं / लताड़तीं-सँवारतीं / दान-मुद्रा में चापलूसों की भीड़ में दबा ईमानदार मन किस क़दर हैरान-परेशान होता है, यह तो वही समझ सकता है जिसने झेला हो, भोगा हो, भोगने के लिए अभिशप्त हो। एक बानगी ....

सर्वग्रासी उजाले की चैंध में / अंधा हो गया हूँ

‘धोड़ा’ कविता सत्ता के सामने दुम हिलाते हुए तीव्र गति से प्रसिद्धि पाने के लोलुप साहित्यकारों पर सुंदर रूपक बन पड़ा है। ‘सेवकराम’ व्यंग्य की तीक्ष्ण धार लिए हुए हैं। कहना पड़ता है कि नरेंद्र मोहन व्यंग्य-वाण निशाने पर साधने में गज़्ाब का हुनर रखते हैं। एक बारगी बाबा नागार्जुन की कविताएँ स्मृति में जीवंत हो उठती हैं। 

नरेंद्र मोहन की कविता भक्ति/समर्पण के नाम पर चारण प्रवृति रखने वाले, वैचारिक अंधता भोगते व्यक्ति समूह पर खुला वार करती हुई देश की वर्तमान स्थिति की कलई खोलती है। हालाँकि यह और इस जैसी कविताएँ पुरानी हैं कितुं आज पहले से अधिक प्रासंगिक! यह देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है! बानगी देेखें ....

लार टपकाता पीछे-पीछे रामजी के / लिसलिसाता पाता है / दो गुनी हो गई है उसकी ताक़त / दैत्याकार हो गया है क़द

व्यंग्य के हथौड़े से सत्ता पर सीधे-सीधे चोट करतीं कवि की अनेक कविताएँ जब करुण दशा के प्रकर्ष को प्राप्त करने लगती हैं, तब कवि मन की करुण दशा की बानगी ‘एलर्जी’ की इन पंक्तियों में उभर आती हैं..... देश के नाम पर / मेरे सामने रूखी-सूखी पत्तियाँ / क्यों जलने लगती हैं ?

आज़ादी के नाम पर जो लहू पूरे मुल्क में बहा, निश्चय ही वह किसी इंसान का नहीं बल्कि इंसानियत का था, जिसने गाँधी को रुलाया, सीमांत गाँधी को तड़पाया और दहलाया मंटो, 

कृष्णा सोबती, राजी और कवि सदृश संवेदनशील मन को। विभाजन के कारण विस्थापन ने कवि के बालमन पर गहरे घाव किए। वे ही घाव उनकी कविताओं में यहा-वहाँ फूट पड़े हैं। ‘एलर्जी’ की कुछ पंक्तियाँ..... रक्त में एलर्जी के कीटाणु हैं / जो देशकाल का नाम सुनते ही / लाल लाल चकत्तों के रूप में फैल जाते हैं। / पूरे शरीर में

‘घ्राणशक्ति’ मौकापरस्तों पर सीधे वार करने वाली कविता है। कविता से गुज़रने के क्रम में दृष्टि के समक्ष कई ऐसे चरित्र उभर आते हैं जो हमारे आसपास अक्सर इन्हीं विशेषताओं के साथ डोलते दिख जाते हैं। मन में क्रौंध उठती है तब....‘अरे! यह कविता तो अमुक व्यक्ति को रेखांकित करती है।’

‘कहाँ ख़त्म होती है बात’ कई तहों में खुलती जाने वाली कविता है। तत्कालीन समाज और स्थिति-परिस्थिति का ताना-बाना बुनती यह कविता कवि के भीतर की कचोट, खुलकर प्रतिरोध न कर पाने की छटपटाहट को स्वर देती है.... अपने सत्य के लिए लज्जित होना सीख रहा हूँ..... क्या कुछ नहीं कह जाती यह पंक्ति और इस जैसी अन्य पंक्तियाँ!

‘बाहु फोर्ट से तवी’ कवि के जलते मन की भीतरी सतह में मौजूद ठंडक का स्पर्श कराती कविता है। जम्मू के बाहु फोर्ट से सटकर बहती हुई तवी नदी का नायिका के रूप में मानवीकरण अपने भीतर एक तरंग समेटे हुए हैं.... सुन लिया संगीत में थिरकता / उसका ज़िस्म .... एक नदी के साथ अंतरंगता स्थापित कर, अपने लिए प्रेम की रसधार महसूसते हुए नरेंद्र मोहन नायक के रूप में नज़र आते हैं। संयोग श्रृंगार का ऐसा प्रयोग आधुनिक कविताओं में विरल है।

‘क्या नदी मर चुकी है’ मानव-स्वार्थ के प्रदूषण को ढोती और दम तोड़ती नदियों की पीड़ा कवि के अंतस में बह निकलती है। नदी की जीवंतता समाप्त होने के कारणों की ओर संकेत देते नरेंद्र मोहन ‘अकथ’ में बहुत कुछ कह जाते हैं। कवि का अनकहा अपेक्षाकृत अधिक मुखर है, फिर भी कहे की सशक्तता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। एक बानगी....

इंतज़ार और रफ़्तार के बीच स्तब्ध / शहर के एहसास में / क्या नदी मर चुकी है ?

प्रश्न अनुत्तरित है। उतर समाज को देना है। शहरी समाज को... और ठहरकर सोचना है। हालाँकि आज प्रकृति ने स्वयं उत्तर दे दिया मानव समाज को..... और सुधार लिया अपना स्वरूप किंतु कवि की चिंता अतीत या वर्तमान में सिमटी नहीं, भविष्य के ख़तरे को लेकर है। ‘आज़्ाादी’ ‘बिंदु में सिंधु’ की उक्ति चरितार्थ करती ‘लघु में विशाल’ कविता है। लघुता में प्रभुता की स्थिति पाकर पाठक ठगा-सा स्थिति-परिस्थिति पर विचारता रह जाता है।

कवि की चिंता में देश की राजनीतिक, सामाजिक, सेवैधानिक स्थिति-परिस्थितियाँ तो हैं ही, भाषा के बिगड़े स्वरूप को लेकर स्वरूप को लेकर भी उनकी चिंता स्वाभाविक है। एक शिक्षाविद जब रचनाकार होता है या एक रचनाकार जब शिक्षा जगत से जुड़ता है तब भाषा के प्रति उसकी चिंता दोहरी होती है और यह स्वभावतः होता है। भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, बावजूद इसके जब अभिव्यक्ति की राह में सत्ता, पद और हैसियत पाषाणशिला बन खड़ी होती है, तब कवि मन उस मुक्ति के लिए स्वयं को समाज की नब्ज़ टटोलने से रोक नहीं पाता और एक उम्मीद के साथ अपना बयान समेटता है....

हो सकता है / मरते हुए आदमी की पहचान का नाम और ठोस संकेत / भाषा देना शुरू कर दे/ और हमारे हाथ और तलवे / महसूस करने लग जाए आग!

‘क्या यह गिद्ध तुम्हारी भविष्यवाणी में था‘ में पिता से जुड़ी स्मृतियों का मर्मस्पर्शी वर्णन है, वहीं ‘पेड़‘ कविता मनुष्य की स्वार्थ वृत्ति का कच्चा चिट्ठा खोलती है। मनुष्य ने स्वार्थांधता में प्रकृति को ही विनष्ट नहीं किया, उसके साथ अपने संबंध को भूलकर अपने जीवन की जड़ें ही खोद लीं। ‘थोड़े लिखे को बहुत समझना दोस्त! पत्र शैली में लिखी कविता है। पत्रलेखन एकालाप रचता है और भावों से लबालब भरी, छलकती नजर आती है पीड़ा। इस कविता में विभाजनकाल के दंगों की मर्मांतक पीड़ा अंट नहीं पा रही है, बस छलक ही जा रही है और उसे सुबोध बनाने के लिए कवि ‘रिरियाते हए‘ बोली के शब्द प्रयोग करते हैं। बिहार-यूपी में ‘रिरियाना‘ क्रिया रूप भाव में कातरता प्रतिबिंबित करता है। वहाँ ऐसे प्रयोग अनायास होते हैं... बोलचाल के दौरान, किंतु लाहौर और फिर दिल्ली से संबद्ध कवि द्वारा ऐसे प्रयोग अनायास नहीं कहे जा सकते!... और यदि इस देशज शब्द का यह स्वाभाविक रूप प्रयोग है, तो देशज शब्द के विस्तार और काल-सीमा से परे उसकी शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है! बहरहाल, यह कविता भय का आतंक झेलती है, अविश्वास को पथराती है, सौंदर्य की स्मृति को परे ढकेल दिल्ली की वर्तमान आबोहवा का दिग्दर्शन कराती है और अंतिम पंक्ति में अनकहे की शक्ति समायोजित कर, पाठक के चिंतन-सामथ्र्य पर छोड़ देती है कि वे उसकी कितनी तहें खोलते हैं....।

कविता ‘हथेली पर अंगारे की तरह‘ में पीड़ा का अद्भुत विस्तार है। अंतस की गहराइयों में लावा बनती पीड़ा फूट पड़ती है इन शब्दों में... कैसे बचाऊँ कविता के पौधे को / आग की लपलपाती जीभों से?.... कैसे साधू कला की ऊँची साधना

पेड़ की त्रासदी में कविता की त्रासदी का बिंब जहाँ एक ओर आलंकारिक सौंदर्य बिखेर रहा है वहीं भाव पक्ष चिंता में सना है। दो राय नहीं कि बिंब विधान में कवि अनूठे हैं, ध्वनियों को पकड़ने की कला अनूठी है साथ ही भाव का वैभव उनके लेखन को ऐश्वर्यशाली बनाता है। कला को साधने की बेचैनी मूर्त होनेलगती है। यह उलझन कवि को छीलती है, जख्मी करती है तभी तो मन महसूसता है कविता को हथेली पर रखे अंगारे की तरह!

‘ज़िस्म अब भी थरथरा रहा है‘ कविता मोटे आवरण में लिपटी है। परत-दर-परत उधेड़ना अनिवार्य तो है, किंतु सहज नहीं! यह बार-बार तहों के सीवन के खोले जाने की माँग करती हुई कविता है। उज्जैन में प्रकृति का लावण्य कवि को अनिवर्चनीय सुख में लपेटे हुए है।

दूसरा खंड ‘शब्द एक आसमान‘ अट्ठारह कविताओं का समुच्चय है। तत्कालीन परिवेश में व्याप्त भय और आशंका, आवाम की अंतहीन पीड़ा, टूटन-विखंडन और इन सबकी अनुभूतियों से जूझता कवि मन! व्यथा संभाले नहीं संभलती तब फूट पड़ती हैं ऐसी कविताएँ! पहली कविता ‘सपना‘ विभाजन की त्रासदी, शरणार्थी होने की अव्यक्त पीड़ा, मौत के आतंक से भयभीत और जीवन की कठोरता से रू-ब-रू होने की स्थिति, जो समय के साथ थिर हो गई, में गति का स्वप्न और जीवन में स्पंदन की उम्मीद जगाती है। ‘मैं सुंदरी की वापसी चाहता हूँ महाकवि‘ में कवि की मनोव्यथा की थाह लेना कठिन है और थाह पाने के बाद उबरना और भी कठिन। ‘पहाड़ नीली कमीज-सा‘ में प्रकृति के साथ कवि की अंतरंगता छलक पड़ी है। सुंदर बिंब-विधान! रोचक और आकर्षक भी। वहीं ‘जरा छूकर देखिए न!‘ में 

गाँधी से संवाद चुटीला रूप लिए है। ‘चुप्पी‘ विभाजनकाल में हुए कत्ल-ए-आम के मंजर की दहशत को ओढ़ती-बिछाती प्रतीत होती है। कवि के बालमन ने या कहा जाय ‘निंदर‘ ने जो भोगा उसे नरेंद्र मोहन कभी भुला न सके। इसलिए गाहे-ब-गाहे वे बचपन के दंश को आज भी झेलते प्रतीत होते हैं और कहते हुए भी कि ‘निंदर मुझे इनसे उबरने नहीं देता। वही लिखवाता सबकुछ!‘ अपने बचपन की अनुभूतियों के प्रति कवि की यह स्वीकारोक्ति उनकी लेखनी को सहज और ईमानदार बनाती है। पारिस्थितिक भय ने ‘निंदर‘ को इस क़दर आक्रांत किया कि अचानक उनकी बोली चली गई। दवा से अधिक माता-पिता के स्नेह और दुआओं के असर से डेढ़ महीने में आवाज लौट आई, मगर हकलाहट के साथ। उस पीड़ा की लहर उमगती दिख रही है ‘चुप्पी‘ में। शब्द-स्मृति कवि की अंतर्यात्रा का सुंदर गुंफन है....

बोलती हुई एक उजली लकीर है / और एक लय / लय में छिपा है कहीं / एक आदिम शब्द / लौटता हूँ उसी में 

कवि ने अपने में लौटने‘ या आत्मन्वेषण को केंद्र में रखकर कई कविताएँ रची हैं। वे शब्द में प्रवेश कर, शब्द के सहारे, धरती-आसमान, दृश्य-अदृश्य, शून्यता में पूर्णता सब खंगाल कर लौटते हैं और उनकी अनिवर्चनीय अनुभूतियाँ एक-एककर कविता की पोशाक पहनती चली हैं-... ‘शब्द-स्मृति‘, शब्द: एक आसमान‘, ‘सृजन का मुहूर्त‘ इसी धुरी पर घूमती कविताएँ हैं। संदर्भ में भिन्नता है। ‘सृजन का मुहूर्त‘ कवि के जन्मकाल से संदर्भित कविता है। कवि की आत्मकथा ‘कमबख़्त निंदर‘ में भी इस शिल्प को देखा जा सकता है-अपने जन्म का भव्य रेखांकन और कयूं का यथार्थ चित्रण। ‘शब्द: एक आसमान‘ में...

शब्द मुझे बाँधे है / मैं बाँधे हूँ शब्द को इस तरह कि / बंधन नहीं महसूस होता कहीं 

में कवि की अभिव्यक्ति अपनी सहजता में अनूठी जान पड़ती है। ‘एक लकीर खाली-सी‘ में लाहौर-प्रसंग लिखते हुए निंदर की पीड़ा बह निकली है स्याही बनकर.... । ‘बाहर से कौन आया होगा!‘ में दंगे के बाद की स्थिति का बेहतरीन चित्रण है .... मरा हुआ शहर / जिंदा हो रहा है। धीरे-धीरे ‘लड़की डरी हुई है‘ में परिस्थितिवश भयकंपित जनता की मनः स्थिति चित्रित है तो ‘खून की भाषा‘ में कवि का निंदर बनकर अतीत को टटोलना। भाषा का चमत्कार यहाँ भी ....

मैं कुतरने लगता हूँ / पिता की यादें / उतरने लगता हूँ / अब्दुल मजीद की पथराई आँखों में

इस संकलन में विभाजन से जुड़ी कविताओं का आधिक्य कवि के भीतर पैठे ‘निंदर‘ की अनुभूति की गहराई और प्रबलता को रेखांकित करती है। कम ही कविताएँ हैं जहाँ निंदर मौजूद नहीं; जहाँ उसकी पीड़ा पाठक को उसके साथ-साथ चलने, छिलने और अश्रुपूरित होने के लिए विवश नहीं करतीं। ‘क्यों‘ कविता कटु सत्य परोसती है कि अंतपीड़ा का भोक्ता दूसरा नहीं हो सकता! ‘पहली बार‘ अनुभूति की अनुभूति को रेखांकित करती सुंदर बन पड़ी है। सचमुच, किसी भी विषयवस्तु से जुड़ा एहसास पहली बार जितना रोमांचित करता है, दूसरी बार नहीं। दूसरी बार कोरे आस्वादन की चाह अधूरी ही रह जाती है। एक खिड़की खुली है अभी‘ उम्मीद, साहस के साथ ही संभावनाओं को जन्म देती है। ‘खूशबू‘ पत्नी के साथ बिताए अनगिन पलों की दास्तान है। घर की दर-ओ-दीवार पर चस्पाँ पत्नी की यादों की मर्मस्पर्शी व्यंजना है... लौट आएगी / मेरी ही दस्तक / चक्कर काटती / मुझे बरजती....

इस संग्रह का तीसरा खंड... ‘जैसे हम पाते हैं प्रेम‘ तेईस कविताओं से सजी नन्ही फुलवारी है जहाँ हर फूल के साथ नरेंद्र मोहन दिखते हैं। इस खंड में, रंगों/चित्रों में समाहित रंगों को कई दिशाओं/कई संदर्भो में बिखेरती कविताएँ हैं। सभी कविताएँ अतिसूक्ष्म, बेधक, भेदक और अनुभूति के गहरे कुएँ से आवाज लगाती हुई प्रतीत होती हैं। ‘जैसे हम पाते हैं प्रेम‘ मानव मनोविज्ञान को साधती, बेहतर कविताओं में से एक है। ‘रचना क्षण‘ में कवि का नियंता भाव से अपनी उपस्थिति ख़ारिज करते हुए, अपने प्रिय को नवल रूप देने की संवेदना रंग-ब्रश को माध्यम बनाकर प्रकट हुआ है। एकालाप शैली में कवि की कल्पना वाकई कमाल की है। ‘कंपकंपाती रंग-परते‘ में दंगे का असर उभरता है तो ‘पुतली नाच‘ में कवि के कथ्य और शिल्प का। हर कविता एक-दूसरे से इतर, देश की नई जमीन.राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक स्थिति को रेखांकित करती हुई! चरित्र और चारित्रिक विडंबनाओं का सुंदर अंकन! व्यंग्य का पुट लिए हुए। व्यंग्य का यही पुट ‘मुर्दा या जिंदा‘ में भी नज़र आता है... मैं मरा अधमरा / कठपुतली जिंदा

विश्व-स्तर पर व्याप्त अमानवीय हिंसा, आतंक, दहशत के वातावरण में कोई भी संवेदनशील व्यक्तित्व शांत या अपने ही सुख में लिथरा हुआ-सा नहीं रह सकता। ‘मेरा नाचना‘ में कवि का कठपुतली में स्वयं प्रतिबिंबित होने का एहसास पीड़ा के उत्स तक ले जाता है। ‘नाच‘ कविता में प्रेम के आत्मरूप के आस्वादन का प्रभाव छलक-छलक पड़ता है। नृत्यकला से समागम, आकंठ निमज्जित होने की हद तक साधारणीकरण करा पाने में समर्थ है यह कविता। ‘एक नृत्य लगातार‘ बालसखी नन्दिता की झलक प्रस्तुत करती कविता है। बचपन का स्नेह बढ़ती उम्र के साथ आत्मीयता में रूपायित होता है। उस अंतर्भाव की मादकता नर्तकी की थिरकन में अभिव्यक्त है। ‘सृजन एक सिलसिला‘ भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर बढ़ते क़दम को चिह्नित करती समृद्ध कविता है। ‘वक़्त और कैनवस‘ गागर में सागर भरती क्षणिका है। चित्रकार द्वारा रंगों से वक़्त को बाँध लेने की कोशिश दर्शाती क्षणिका बेहद रोचक है। पाठक से कवि का संवाद आकर्षक है। संग्रह की कई अन्य कविताएँ भी संवाद/एकालाप शैली में अपना पूरा प्रभाव छोड़ती हैं।

‘रंग बोलने लगे हैं‘ में कवि के चित्रकार मन ने संवेदना को रंगों में उकेरा है। कई परतें हैं इस कविता की। सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को स्वयं में समेटे, मौन की चीख सुनाई देती है यहाँ जिसे कवि ने अनुत्तरित प्रश्न के साथ पाठक को सौंप दिया है। ‘कला दर्शन नहीं है‘ कला की अमूर्त महत्ता को रेखांकित करती है। ‘मृदंग की थाप पर‘ सत्ता के विरोध में आवाज उठाने और त्रासदी भोगने.... त्रासदी की कोख से नई संभावना को जन्म देने की कथा है। ‘नृत्य छवि‘ पाठक की दृष्टि बाँध लेती है। सम्मोहन से बंधा पाठक दर्शक की भाँति प्रत्येक पंक्ति के रूप-लावण्य को निहारता रह जाता है। ‘कोई और हो जैसे!‘, ‘नृत्य भाषा‘, ‘क्या करूँ?‘ नृत्य के सूक्ष्म प्रभाव को उकेरती, उसके सम्मोहन में बाँधती, ठगे-से रह जाने की स्थिति में ला खड़ा करती है। ‘कोई और हो जैसे‘ में कवि के उल्लझन की बानगी देखें....

एक को पकड़ता हूँ / दूसरी छूट जाती / पंखुरी-दर-पंखुरी खिलती / पपड़ियों-सी उतर आती / कभी बाहर की तरफ खुलती / कभी अंदर की तरफ मुड़ती

‘अलात-चक्र सहित कई कविताओं में कवि के चित्रकला, नृत्यकला, नाट्यकला से संबद्ध विशद ज्ञान और उसमें सूक्ष्मता से उतरने, गहराई में पैठने और पाठक को अपने सम्मोहन में बाँधने... बाँधे रखने के विलक्षण शिल्प-कौशल की प्रशंसा न करूँ तो अनुचित होगा। कवि के लेखन को समग्रता से आँकें तो यह कहना ही पड़ता है कि भाव पक्ष की समृद्धि अन्य समकालीन कवियों में मिल भी जाए किंतु विषय-वैविध्य, भाषा, शैली, शिल्प, बिंब-विधान, गद्यात्मकता में अनूठी लयात्मकता, सरगम और संगीत सहित थिरकन और स्पंदन जो यहाँ मौजूद है, एक साथ अन्यत्र दुर्लभ है। साहित्य और कला से संबद्ध पाठक ही इस खंड की कविताओं के रेशे-रेशे में समाहित अर्थों को परत-दर-परत खोल सकते हैं। ये कविताएँ हर बार एक नए अर्थ के साथ प्रकट होकर चकित-चमत्कृत करती हैं। आम पाठक इतनी परतें खोल नहीं पाएंगे। यह विशिष्ट श्रेणी को या कहें कि कला-मर्मज्ञों को संबोधित करती कविताएँ हैं।

चतुर्थ खंड ‘कविता मुझे बचा लो‘ के अंतर्गत बीस कविताओं का गुंचा है। पहली कविता मुंतजर अलजैदी से मिले पलों का समुच्चय है और उनके बहाने से इराक़ की त्रासद साँसों का भी। मुंतजर अलजैदी से हाथ मिलाने के बाद की पंक्तियाँ .....

मैंने हरारत महसूस की / सिसकते हुए एक मुल्क की / और इराक़ मेरे खून में उतर गया 

‘कुर्सी और बहेलिया‘ स्वार्थसिद्धि और पदोन्नति की होड़ में नैतिक मूल्यों का हनन करते हुए मानव द्वारा स्वयं को नैसर्गिकता से दूर किए जाने की आम प्रवृत्ति का सुंदर रेखांकन है। ‘दुख‘ प्रतिरोध के समर्थ की कविता है। प्रतिरोध और विरोध आदिवासियों का, जिसे होना ही चाहिए लोकतंत्र में। कवि की संवेदना टीसती है जब बेगुनाह ग्रामीण आदिवासी भूख और उससे भी अधिक सुरक्षाबलों के अत्याचारों के शिकार होते हैं और कोई कुछ नहीं कहता! ... किंतु बेगुनाहों की मौत का तांडव जब कुछ युवाओं को विद्रोही बना देता है तब वे देश के दुश्मन और सुरक्षाबल के जवान शहीद कहलाते हैं। ऐसे में कवि का व्यंग्य कितना पैना है...

शिकार करते रहे जो वर्षों से / खुद शिकार हो गए

‘सिलसिला‘ में लाहौर में बीते समय को निंदर की आँखों से निहारते हुए कवि ने अपने और नन्हो के घर में व्याप्त जीवंतता को जीवंत रूप में रेखांकित किया है। ‘खुद आकर देख क्यों नहीं लेते?‘ कविता वैश्विक स्तर पर हिंसा के नए रूप में प्रकट उदारीकरण के नाम पर और विकास के नाम पर मची तबाही का दृश्य उकेरती है। पहले भी कहा है कि बिंब विधान और ध्वनि पकड़ने की कवि की कला अद्भुत है। एक बिंब ....

अमेरिकन गर्म कोट उधर / और पतलूनें इधर / लड़ती रहीं

‘घर‘ में बचपन की स्मृतियों को जीता कवि मन बार-बार उस ओर भागता है और उस स्पंदन को महसूसता है जो कहीं पीछे छूट गया है....

.... और महसूस करने लगा / उँगलियों में साँस लेता /वह घर / जो अब मेरा नहीं है

निंदर कवि को चैन लेने नहीं देता। वह बार-बार उन्हें अपनी अवस्था में घसीटता है। दर-ओ-दीवारें पुकारती हैं कभी तो, कभी वे गली-कूचे। विभाजन के कारण हुए दंगे की सिहरन और विस्थापन की पीड़ा भोगा निंदर जब-तब कवि के भीतर जाग जाता है। लाहौर की भीनी यादों और विस्थापन के बाद की अवस्थाओं ने संवेदना की अजस्र धार बहा दी है। बंटकर कहीं का भी न होने का दुख ‘दिल्ली में लाहौर लाहौर में दिल्ली‘ कविता में उभरा है। पूरी कविता विस्थापन की पीड़ा से भीगी-नहाई है। दो जगहों में बंटे शरीर के साथ ही बंटे मन की अवस्था का करुण चित्रण है। आजादी के सात दशक बाद भी कवि अपने बिखरे बचपन की टीस से उबर नहीं पाए हैं। हत्या, आगजनी, मानवता का बार-बार शर्मसार होना, क़ौम के नाम पर संकुचित मानसिकता का छिछोरा प्रदर्शन, दहशत की धुंध कवि को अतिसंवेदनशील बना गई है, जिसकी झलक ‘मैं ही मरा हूँ आसपास‘ में मिलती है। बानगी देखें ....

दहशत में लब खुले हैं आजाद / बेख़्वाब / बेआवाज /कलबुर्गी हो आ इखलाक़ / मैं ही मरा हूँ - आसपास

‘बर्बरता के अँधेरे में‘ नाटक से साधारणीकरण के पश्चात जन्मी कविता है जिसमें निर्वासन की अकथ कथा को कवि ने एकालाप शैली में पिरोया है। कवि ने नाटक/नाटककार/निर्देशक को चिह्नित किए बिना वे सारी बातें कह दी जो कहे बिना उन्हें चैन न पड़ता। कविता पीड़ा का विरेचन ही तो करती है। कवि अपने लिए इसका प्रयोग मानो औषधि के रूप में करते हों। साहित्य और कला की समग्र विधाएँ, ख़ासकर नृत्यकला, चित्रकला और सबसे बढ़कर नाट्यकला कवि के हृदय को पोषित करती प्रतीत होती है। रंगमंच की इतनी बारीक समझ रखे बिना कोई अच्छा नाटककार हो भी नहीं सकता! अपने नाटक ‘मि. जिन्ना‘ और ‘कलंदर‘ के सफल मंचन से प्रसन्न नरेंद्र मोहन ने कलाकार हरीश भाटिया (जिन्ना) और अतुलवीर अरोड़ा (कलंदर) की अदाकारी पर मंत्रमुग्ध होकर कविता को जन्म दिया । अभिनय को लेकर उनकी स्वीकारोक्ति ... खुद को विलीन किए बगैर / दूसरों को जीते हुए / अपने से विलग हो जाना /तुम्हीं बताओ कहाँ संभव है / अभिनय के सिवा

दूसरी कविता ‘किरदार निभाते हुए‘ बेहद सूक्ष्म अनुभूतियों से भरी है जहाँ तक आम पाठक की पहुँच कठिन है। कविता बार-बार पढ़े जाने की माँग करती है और हर बार नए अर्थ खोलती है.... पंखुरी-दर-पंखुरी। ‘राजा नंगा है‘ लोककथा नरेन्द्र मोहन की कल्पना से जुड़कर नुक्कड़ नाटक, फिर रंगमंच के नाटक का रूप लेती है। नाटककार नरेंद्र मोहन का कवि मन तुष्ट नहीं होता तो उसी कथावस्तु से जन्म लेती है कविता जिसे गीतिनाट्य कहना अधिक उचित होगा। व्यंग्य की नोक बरछी-भाले से कम पैनी नहीं। यहाँ भी निंदर का जवाब नहीं! बचपन में सुनी लोककथा की, रचना के स्तर पर दो विधाओं में इतनी जीवंत प्रस्तुति और इनके माध्यम से सत्ताधारियों पर कटाक्ष वाक़ई क़ाबिल-ए-तारीफ है। भाषा-सौष्ठव और शिल्प-प्रयोग के कारण लगभग हर विधा में, ख़ासकर आत्मकथा, डायरी, नाटक और कविता लेखन में अपनी अलग से पहचाने जाने वाले रचनाकार नरेंद्रमोहन की कविता ‘खंभे मुँह ताकते रहे‘ में पुतली के माध्यम से तत्कालीन राजनीति का स्वरूप और आजादी के बाद के परिणाम का सुंदर नियोजन हुआ है। व्यंग्य-सौष्ठव अपने उत्कर्ष पर है।

‘परिंदा‘ कविता मन की उड़ान को बाह्य परिवेश के आकर्षण से बंधा दिखाती है, वहीं ‘मुक्ति की चाह‘ बंदिशों से घिरे मन, दबोची गई अभिव्यक्ति और सुलगते विचारों की मुलीजुली व्यथा-कथा है। दमन और प्रतिरोध के दोनों पक्षों को कवि ने चित्रकार के रंगों से उजागर किया है। कविता ‘बहुत दिनों के बाद‘ अपने शीर्षक से एकबारगी नागार्जुन की ‘अकाल‘ की याद दिला देती है, किंतु यहाँ विषयवस्तु अलग है। दलितों, दमितों, शोषित वर्गों, सताए गए आदिवासियों के प्रति कवि की संवेदना इतिहास के पन्नों को खंगालती हुई रोशन पक्ष के पीछे छिपाए गए अँधेरे को दर्शाती है जो मानवता पर आघात करते पक्ष हैं और बेख़बर संसार रोशन पक्ष का गुणगान कर रहा। कवि ने इतिहास से वर्तमान तक शोषणचक्र की एकरूपता को बखूबी रूपायित किया है। शंबुक का शोषण इतिहास का अँधेरा पक्ष है तो रोहित विमुला के साथ घटित अमानवीयता वर्तमान, जिससे कोई भी संवेदनशील प्राणी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। कवि की अंतिम दो पंक्तियाँ पीड़ा के अतिरेक प्रवाह को व्यंजित करती है.... फंदे पर लटका समूचा वजूद, बहुत दिनों के बाद ‘कहाँ हो तुम‘ रोहित विमुला की हत्या और जख्मी व लापता नजीब अहमद के साथ घटित वाक़या कवि को भीतर तक चीरता है। कवि शोषण के विरुद्ध उठाई आवाज के लावे के ठंडा होने से पहले अपनी पुकार उन जाबाजों तक पहुँचाना चाहते हैं.... जितना बचा है मेरा होना / उसी के बूते / पुकारता हूँ-कहाँ हो तुम?

इस खंड की अंतिम कविता ‘कविता मुझे बचा लो‘ में कवि की पीड़ा सत्ता और पूँजी के आगे झुकते-बिकते साहित्यचेता के व्यवहारों को देखकर बढ़ रही। अपने आसपास की साहित्यिक राजनीति देखकर कवि-मन आशंकित है कि साहित्य की पारदर्शिता और उसकी बुलंदी खो न जाय, वह आशंकित है चाटुकारिता और सच पर झूठ के आलेपन से। कोई राह नहीं सूझती तब पीड़ा का विरेचन करती है कविता .....

पाबंदी में बंदगी में मस्तकों को झुकते-लुढ़कते देखध् लज्जित पराजित हूँ कंपकंपाती रूह / कल्पना काठ / कविता मुझे बचा लो/ मेरे भीतर बेचैनियाँ भर दो

पुस्तक के अंतिम खंड में दो लंबी कविताएँ हैं। पहली कविता ‘एक अग्निकांड जगहें बदलता‘ में विभाजन से पूर्व, कवि की बाल-स्मृतियों में उभरे लाहौर के भीतर पैठी मास्टर यूसूफ की यादें कवि को झकझोरती हैं, बेचैन करती हैं। पूरी कविता देश के टुकड़े होने की ख़बर से विक्षिप्त हुए मास्टर युसुफ की अंतर्दशा एवं बहिर्दशा का मार्मिक चित्रण है। पढ़ते-पढ़ते कलेजा मुँह को आने लगता है। औचक ही याद आते हैं गाँधी! विभाजन के फैसले से टूटे हुए! फिर भी सबको हाथ जोड़- जोड़कर, प्यार से- मनुहार से समझाते हुए कि आपस में खूनखराबा न करें। दोनों हाल में हिंदुस्तान की संतान ही मारी जा रही है। मगर गाँधी को मिलती है ‘पंचमांगी‘ की गाली और गोली। गाँधी की पीड़ा एक बार फिर मेरे भीतर करवट लेने लगी है युसुफ की पीड़ा का रूप लेकर ... असह्य है पीड़ा, असंभव है हू-ब-हू इसकी अभिव्यक्ति! यह कविता आज भी, आजादी के तेहत्तर वर्ष बाद भी सोचने को विवश करती है। कवि मास्टर युसुफ को इतिहास में स्थान नहीं दिला सकते। आमजन इतिहास में दर्ज नहीं होते। मास्टर युसुफ की उम्मीद का दीया गाँधी की शहादत के साथ बुझ गया और उसने आत्महत्या कर ली। कवि युसुफ, गाँधी और अपने जीवन के गलियारे से गुजरते हुए पाठक के मर्मस्थल पर जा खड़े होते हैं और सवाल दागते हैं.... गोली की तरह! रेखाचित्र के ताने-बाने में प्रस्तुत कविता विभाजन के कारण हुए दंगे, विस्थापन की त्रासदी का जनमानस पर पड़ते दुष्प्रभाव को इस तरह उधेड़कर रख देती है मानो हादसों से उत्पन्न दहशत से भीत मानव मन का सिटी स्कैन और एमआरआई किया गया हो। ऐसी कविता विरल है।

दूसरी लंबी कविता ‘खरगोश चित्र और नीला घोडा‘ में सलमान और सुचित्रा जितने यथार्थ पात्र हैं उतनी ही यथार्थ स्थितियाँ-परिस्थितियाँ भी। मनः स्थितियों के अंकन में कवि लाजवाब हैं ही। खरगोश का बिंब सशक्त है। पेंटिंग और कलाकार और दर्शक के माध्यम से स्त्री के साथ घटित दुर्घटना, अदृश्य बन्दिशें, अभिव्यक्ति की मुक्ति के लिए छटपटाहट का अद्भुत चित्रण है।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, नरेंद्र मोहन की इस या इन जैसी कई रचनाओं को परत-दर परत खोलने और उसके भीतर प्रवेश कर, कई-कई अर्थ पा लेने के लिए उनकी आत्मकथा और नाटक के साथ अंतर्यात्रा करना कई बार अनिवार्य प्रतीत होता है। आत्मकथा में वर्णित प्रसंगों/संदर्भो से विभाजनकाल का वह हिंसक वातावरण, कयूं के बीच कवि का जन्म, उनकी आवाज का जाना, विस्थापन का मंजर, मास्टर युसुफ, आसिफ, नन्हो और लाहौर को समझना तो आसान होता ही है, मंटो और उनकी रचना ‘टोबा टेक सिंह‘ और पत्नी अनुराधा से सम्बद्ध संवेदना की गिरह खोलना कुछ हद तक आसान हो जाता है। नरेंद्र मोहन शोषितों / पीड़ितों के भीतर सुलगती आग की आवाज हैं। चाहे वह दलित हो या आदिवासी / हिंदू हो या मुस्लिम / अबोध हो या परिपक्व, कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी कलम इन सबकी जुबान बन जाती है।

यह स्वीकारोक्ति अतिशय नहीं कि इस पुस्तक को दो-तीन बार पढ़ने के बाद भी ऐसा लगता रहा जैसे कुछ अब भी पकड़ से छूट रहा- कोई सिरा / कोई बिंदु। कुछ कविताओं ने रोका-टोका, छीला, टीसा तो कुछ ने रंगों-लकीरों में सामाजिक / साहित्यिक / राजनीतिक विद्रूपताओं को उकेरा, कुछ नरम-सी, कोमल-सी शीतल लगी तो कुछ नाटक में कविता, कविता में नाटक का भ्रम पैदा करती-सी। निश्चित तौर पर कवि शब्द-साधना करते हैं और इस साधना के प्रतिफल को पूरी तरह समझ पाना तो विद्वज्जनों के लिए ही संभव है। ख़ासकर, लंबी विशिष्ट कविताएँ। इस संग्रह की कविताओं को पंखुरी-दर पंखुरी खुलते-खोलते समालोचना की पुस्तक तैयार हो जाए, इतनी संभावनाएँ हैं। अर्थों की विराटता अपना वैभव बिंब और ध्वनियों के माध्यम से पसारती है तो बुद्धि चकित रह जाती है। नरेंद्र मोहन भावों, ध्वनियों, कथ्य-शिल्प सहित अन्य समस्त कलाओं/साज-सज्जा को एक वितान पर लाकर तान देते हैं ..... कुछ इस तरह कि रंग-डूबे ब्रश से छितराए गए रंगों की विविधवर्णी आभा कविता को आभासित करती है। समालोचकों के यह कृति अर्थों की दुनिया का एक नया अध्याय खोल पाने में समर्थ है। साधुवाद! साधुवाद!