तहख़ाने की सीढ़ी पर बैठी लड़की

 आत्मकथ्य

   नासिरा शर्मा

मुझे साफ नज़र आ रहा है।

पाँच-छह साल की बच्ची किसी बात पर तनतनाई हुई अंधेरे तहख़ाने की पत्थर की सीढ़ियाँ तय करती आखरी सीढ़ी पर जाकर बैठ जाती है।

घुटनों पर दोनों कोहनी टिकाए। हाथों की हथेलियों पर अपना चेहरा रखे वह अंधेरे में कुछ तलाश कर रही है। 

आंगन की तरफ खुलने वाले चैड़े-पतले रौशनदानों से रौशनी की धुंधली पीली झिरों के साथ घर के लोगों के चलने और बोलने की आवाज़ों को मोटी जाली उस तक पहुंचा रही है, मगर वह इन आवाज़ों से बेगाना अपने अंदर डूबी है।

आंखें, अंधेरे की आदी हो गईं तो उसे तहख़ाने की सफेद दीवारों में बनी अलमारियां नज़र आने लगती हैं और चैकियों पर सजे बड़े-बड़े बक्स।

छत पर सलीक़े से लिपटे ख़स के पर्दे। उसकी नज़रें उसमें अटक जाती हैं। कोई घोंसला तलाश करने के लिए, मगर वहां कोई चिड़िया या चिड़्ड़ा ख़स के तिनके खींचता फड़फड़ाता उसे नज़र नहीं आता है।

आंखें घुमा वह शीशे की नाज़ुक नलियों एवं मोतियों से बने पर्दे को ताकती है, जो कई रंगों में अपनी आभा फैला रही है।

यह यहां क्यों लटका है? सोचकर वह उठती है और अपने हाथों से उस झालर को बार-बार छूती है। दिल चाहता कुछ दाने तोड़ वह अपनी मुट्ठी में बंद कर ले, मगर वह लड़ी तोड़ नहीं पाती और अलमारी पर रखे सामानों को तकती है।

शीशों में बड़े-बड़े लैम्प हैं, जिनकी सफेद चिमनियों पर सफेद बेल बूटे बने हैं, वे अलमारी के खाने पर औंधी रखी हैं। उसे याद नहीं पड़ता कि उसने तेल के इन लैम्पों को कभी जलते देखा है। 

नीचे के खाने में कुछ और ची़ज़ें हैं, जिसको वह समझ नहीं पाती और बढ़कर दूसरी अलमारी को देखती है, जहां ढेरों पेट्रोमैक्स और लालटेनें रखी हैं। दूसरे खाने पर चीनी की प्लेटों और क्टोरों का मीनार-सा बना है। तांबे के बड़े-बड़े नक़्क़ाशीदार जग और डोंगे सजे हैं। वह झुककर नीचे भी देखती है, जहां कई उगलदान और पीतल के फूलदान सजे हैं। 

अब उसके चेहरे पर कौतूहल है। तहख़ाने की सीली ठंड उसे अच्छी लगती है और ऊपर से आती अपने नाम की पुकार उसे बेचैन नहीं करती है। वह अपने में डूबी उस हवादान को देखती है, जिससे ताज़ा हवा के झोंके उसके नथुनों में दाखिल हो रहे हैं। कुछ पल वह चैकोर छोटे से मुख्खे को हैरत से देखती है। सामने की अलमारी में पानदान छोटे बड़े रखे हैं। चांदी का वह बड़ा पानदान कहां है, जो उस दिन निकलता था जब घर में मजलिस होती थी। उसने सामने देखा जहाँ जाली के रौशनदानों की जगह उसे किसी के पैर दिखे। यह ज़रूर कुलसुम बाजी के होंगे, जो दालान के दर पर बैठ स्वेटर बुन रही होंगी। उसने अंदाज़ा लगाया। 

मुड़ने में उसकी फ्राक अटकी तो उसने बड़े बक्स को खोला। जिसमें सुनहरे चीनी के बर्तन भरे थे, प्लेटें काब, डोंगे और कटोरे। उसने बक्स बंद कर पास का बक्स खोला जिसमें चम्मचे थे। इतने छोटे भी जिसको देख वह सोचने लगी कि इससे बच्चे खाते होंगे, मगर कितने छोटे बच्चे?

पतला लम्बा बक्स खोला तो उसमें हुक़्क़े की नलकियां सजी थीं, पेचवान और गुड़गुड़ आवाज़ निकालने वाली रंगबिरंगी छड़ियां। उसने उधर की अलमारी देखी जिस पर चिलम और हुक़्क़े रखे थे। वह कुछ देर बक्सों के बीच खड़ी रही। पलकें झपकाती कुछ ढूंढती, समझती-सी। 

पांचवीं अलमारी में बैड पैन, क़ैरूरा की बोतल और तसले मग भरे थे। उसके बाद एक हौज़ था सूखा जो ‘चोरखाना‘ कहलाता था। जिसमें बड़ी-बड़ी तांबे की देगें रखी थीं। उन्हीं के ऊपर लकड़ी के खान रखे थे, जिन पर सजकर मजलिसों का हिस्सा घर-घर परइयों में भेजा जाता था। उसकी समझ में बात आई, जब उसने पास की अलमारी में रंगीन डलियां और दौरियां सजी देखीं। 

ढ़ेरों कुर्सियां और अलमारी, बर्तनों से भरे बक्स देखते-देखते जब ऊब गई तो उसने बाहर जाने की सोची वह थक गई थी तभी झक से बिजली जल गई। 

अंधेरा तहख़ाना झिलमिला उठा और आखरी सीढ़ी पर खड़ी गुलचमन हँस रही थी। उसे वहां खड़ी देखकर वह लड़की चुपचाप सीढ़ियां चढ़ ऊपर की तरफ बढ़ी और गुलचमन पानी रखने की टंकी उठा बत्ती बुझा लड़की के पीछे-पीछे पत्थर की सीढ़ियां चढ़ने लगीं। 

उस लड़की ने उन बेजान चीज़ों से क्या सुना, क्या सीखा मगर यह सच है कि जब भी वह क़लम उठाती हैं तो उसी तहख़ाने की सीढ़ियों को तय करती वह अंधेरे में जा बैठती हैं। मैं उस लड़की के बचपन से वाक़िफ़ हूँ, मगर वह लड़की अपने घर के अतीत को नहीं जानती। सुनती है तो समझती है कि उन बैठकों, उन मुशायरों, उन पार्टियों, उन महफिलों का तहखाने की उन चीजों से क्या संबंध रहा है, तब वह उन पत्थरों के तराशे छोटे-छोटे पायों की ज़रूरत समझती है, जिन्हें उसने तहखाने में सजे देखा था, जो ‘मीर मजलिस‘ कहलाते थे। जमीन व दालान पर बिछी दरियों के ऊपर की सफेद चादरें उड़े न इसलिए उन्हें बीच-बीच में सजाया जाता था। अपने चारों तरफ फैली चीज़ों को बारीकी से देखने और समझने की वह समझ उस तहख़ाने ने दी थी, जिसमें वह तनतनाती हुई तेजी से उतर जाती थी।

ख़्वाबों में स्कूल, वह तहख़ाना और एकज़ामिनेशन हाल आज भी नए-नए रूप भर कर आता है और अक्सर सवाल छूट जाने के डर से आंखें खुल जाती हैं। शायद वही डर है, जो हर रचना के समाप्त होने पर संतोष के बावजूद डराता है कि इस नई कृति को पाठक कैसे लेंगे। क्या मैं इस उपन्यास को वैसा लिख पाई जैसा लिखना चाहती थी या फिर कुछ और समझना बाकी रह गया था? घर का माहौल अदबी था। शायरों का सिलसिला था। मर्सिया. सोज़. नौहे लिखने और पढ़ने का रिवाज कई पुश्तों से था। ग़ज़ल का कहना और सुनाना, घर के आदाब में शामिल था। उस खानदान में क़लम उठाना उपलब्धि नहीं थी, बल्कि ऐसा कुछ लिखना चुनौति थी, जो परिवार के स्तर से नीचे का न हो! इसका अपना एक तनाव और लुत्फ़ दोनों है।

उस लड़की को देश और काल ने बड़ा किया था। इसलिए जहां एक खुलापन था, वहीं पर अपनी जड़ों को पूरी तरह न समझ सकने की बदनसीबी थी, जिसने बार-बार पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर किया। आज़ादी के बाद देश की व्यवस्था जहां ताज़ा सांस ले रही थी वहीं पर ख़ानदानी वैभव अपने खण्डहर होते भविष्य की तरफ बढ़ रहा था। नए-पुराने की आमद और बिदाई के बीच उसे खुद को संभालना और बनाना था। अच्छे-बुरे की तमीज़ खुद करनी थी। बग़ावत के बीज ने शायद तभी अपनी जगह बना ली हो । यही वजह रही कि उसे अपनी नज़र पर ज़्यादा यक़ीन रहा।

अक्सर मैं उस लड़की को उस घर में भटकते देखती हूं। जहां वह छोटे भाई के गद्दे पर बकरी के छोटे बच्चे को सुला उसे रजाई में लपेटे बैठी है और सारे घर में उसकी ढुंढाई हो रही है। कभी बकरी की भूसी निकाल कर कुढ़कुढ़ करती बत्तख़ों को देने के चक्कर में बकरी सींग माथे पर खा उबलते बहते खून को देखकर रोती नहीं है। सोने से पहले देर तक छत और कारनिस पर बने सीमेंट के गुलबूटे को देख उनकी बारीकियां नापती रहती है या फिर मेहराबदार दरीचे के गुलकारी वाले खम्भे से लिपट आंगन में लगी मधुमालती की बेल पर चिड़ियों की चहचहाहट को सुनती बेक़रार हो उठती है कि इनको आखिर क्या कहना सुनना है, किस बात पर ये सब इतना चीख़ रही हैं?

तब उसे पता नहीं था कि हर चीज़ को जानने और देखने की यह जिज्ञासा उसे इंसानों के दिलों में छुपे जज़्बातों को कागज़ पर फैलाने पर एक दिन मजबूर करेगी। सारे दिन घर का चक्कर लगाना और हर बात की ख़बर रखना उसका मशगला था। तहख़ाने के दरवाज़े से मिले कमरे सिंगारखाने में बड़ी-सी कपड़ों की अलमारी के आइने के सामने अपने गरारे के पायचों को उठाकर नाचना उसका शौक़ था। एक दिन सुबह उसने मर्दाना मकान के कोने को नारंगी पीली रौशनी से दमकते देखा था। वह दरवाज़ा खोल दंग रह गई थी। ऊपर चढ़ उसने जंगले से बाहर झांका तो फैले आसमान पर पेड़ों और घरों के पीछे से पीला सोने-सा चमकता सूरज निकल रहा था। सूरज के उस शानदार चेहरे से वह कभी मुक्त नहीं हो पाई और उसकी रचनाओं में सूरज नए-नए अंदाज़ से अपनी जगह उसी तरह बनाता रहा जैसे चांद और परिन्दे। 

इस लड़की को लिखने का यह जुनून जब नहीं था। तब सबकी देखा-देखी कागज़ और क़लम से उसका रिश्ता बना था। एक दिन देखा कि उस शहर, उस सड़क, उस घर और स्कूल की यादों से जाने कितने कंवल खिल उठे हैं। यह चरित्र हुबहू वैसे नहीं थे, जैसा उसने देखा था। सड़क पर चलते एक व्यक्ति को पीछे छोड़ दूसरे व्यक्ति के सामान खरीदने और तीसरे आदमी का घर में खांसने से जाकर मिल जाता था। चरित्र का यह गठन उसने कहां से सीखा...किसी कुम्हार या गुड़िया बनाने वाली औरत से, कह नहीं सकती मगर वह किसी सुनार की तरह नए-नए किरदार जेवरों की तरह गढ़ने जरूर लगी थी।

वक्त बहुत बेदर्द होता है। 

वह तहख़ाना खाली हो चुका है। वहां अब कोई सामान नहीं सिवाए टूटेपुराने फर्नीचर और कबाड़ के। 

वह मुख्खा जो ताज़गी का हवादान था, वह बंद कर दिया गया, बिना समझे। 

वह सारे सामान चोरी हुए, बिके, इस्तेमाल हो गये, मगर सच यह है कि वह कालखंड समय से कटे यादों का हिस्सा बन चुका है। 

उन यादों में क़िस्सागोई का सुना हुआ यथार्थ जब मिलता तो उसके जे़हन में ढेरों प्रश्न उठते मगर वे प्रश्न अपना उत्तर उसकी प्रिय जगह तहख़ाने से नहीं पूछे जा सकते थे। जहां वह मूक तमाशाई बनी होती। 

वह क़ब्रों में गहरी नींद सोए अपने बुज़ुर्ग़ों को जगा उनसे भी नहीं पूछ सकती थी जो उसके बड़े होने से पहले एक एक करके अतीत में खो चुके थे जिनकी परछाईयां उसके जे़हन में उभरतीं मगर आँखों के सामने चेहरा धुंधला ही बना रहता। उसे याद आता है कि एक बार उसने यह तहख़ाना सामानों से खाली देखा था। वहाँ बाँध से बुनी कटावदार पायों वाली बड़ी बड़ी पलंगें पड़ी थीं जिन पर रंगीन दरी पर सफेद चादर बिछी और तकियों पर झालरदार सफेद गिलाफ चढ़े थे। कोई लेटा था और दूसरा कोई बैठा था। वह फ्राक पहने पट्टी से लगी खड़ी थी। उसको उनके चेहरे जरा भी याद नहीं जो वह घर की दीवारों पर लगी बड़ी बड़ी तस्वीरों में उन्हें ढूँढ सके। 

बस कहीं से भटका एक जुम्ला जरूर कानों में अभी तक पड़ा है कि इन्हें न बिजली के पंखे न कपड़े के डोर वाले पंखों के नीचे नींद आती है। यह वाक्य भटक कर गाँव के घर की तरफ चला जाता है जिसके सामने पेड़ों एवं फूलों से भरा कभी ‘चमन‘ हुआ करता था। जिस पर किसी और ने अपना मकान बिना किसी सूचना या इजाज़त के बना लिया। क्या ये लोग उस ‘चमन‘ में पेड़ों के साए या लतरों के सायबान में कुदरती ठंड में सोने के आदी थे ? 

दिन ब दिन पढ़ी क़िताबों, गुज़री तारीख़ों और बढ़ती जे़हनी फिज़ा के चलते वह अपने को तलाश करना चाहती है मगर उसके रास्ते उसे कहीं और भटका देते हैं जहाँ नए से नए आदमियों से परिचय होता है और अपना कोई मिलता नहीं।

इसलिए या किस लिए कहा नहीं जा सकता है कि उसकी कहानियों की बुनावट में मौत किसी उत्सव की तरह, इन्सानी अहसास किसी आबशार की तरह गिरते नज़र आते हैं जिसका तरन्नुम ज़्यादातर ग़मग़ीन होता है। 

मैं उस लड़की को जानती हूँ। इन गुज़रे वर्षों में उसे पहचानने भी लगी हूँ। इसलिए आपसे एक बात कहना चाहती हूँ कि वह ज़रा भी नहीं बदली है ! 

आज भी तनतनाती हुई किसी भी समस्या के तहख़ाने में निडर हो अंधेरे में उसी तरह तेज़ी से उतरते देखा है जहाँ आखिरी सीढ़ी पर बैठ घुप अंधेरे में जाने क्या खोजती है फिर अंधेरे से अभ्यस्त आँखों में बहुत कुछ संभाल कर वह सहज हो पत्थर की सीढ़ियो पर कदम रखती ऊपर खिली रोशनी में आ जाती है जहाँ उसकी मेज़ पर रखा क़लम उसका इन्तज़ार कर रहा होता है।

-छतरपुर हिल्स, नई दिल्ली, मो. 98111 19489