छीन ले कोई हाफज़ा मेरा

 खुदकलामी

नासिरा शर्मा

कुछ साल पहले झुँझलाई हुई तमन्ना अचानक मेरे दिल में किसी बद्दुआ की तरह परवाज़ भरती थी कि खुदा मेरी स्टडी में आग लग जाए और मेरा पढ़ा लिखा सब कुछ जल कर राख हो जाए ताकि मैं इन कागजों, फाइलों और किताबों को संभालने, रखने और ज़्यादातर ढूँढने की जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाऊँ। जे.एन.यू. के घर और सरिता विहार के फ्लेट में स्टोर की जगहें काफी थीं। हर कमरे की अलमारी के ऊपर कारनिसों तक में मेरा सामान भरा था। अक्सर राम एक जुम्ला कहते जो सच भी था कि यहाँ तो हर जगह नासिरा जी ही नासिरा जी हैं। मुझे उनके मज़ाक़ में कहे जुम्ले बुरे न लगतें मगर मै खुद एक कागज़ को ढूँढने के लिए जिस तरह सारा अम्बार लगा लेती थी वह मुझे पसन्द न था। उन दिनों मेरा दूसरा नाम गिरजाकुमार जी था जो जे.एन.यू. लाइब्रेरी के पहले लाइब्रेरियन थे।

मेरे पास कुछ छॉटने को न था मगर मैंने दरिया दिली से या कहें सीने पर पत्थर रख पुस्तकालयों को अपनी जमा पूंजी बांटनी शुरू की तो भी कुछ किताबें ऐसी थीं जो मुझे जान से भी ज़्यादा अज़ीज़ थी। जिन्हें भेंट स्वरूप भी मुझे किसी को देना पसन्द न था। मेरी परेशानी दरअसल कागज़ के वे टुकड़े थे जिस पर कुछ अधूरा लिखा था। कुछ ‘‘नोटस थे जो बेहद कीमती थे। टेपों का अम्बार था जिसमें जाने कितनों की आवाज़े कैद थीं। यात्राएँ समन्दर की लहरों की तरह मेरे सीने पर पूरे जोश व ख़रोश से आती और अनुभव के सीप व घोघे बिखेर कर चली जातीं और मैं बड़े जतन से उन्हें चुनने में लग जाती मगर यह सिलसिला आखिर कब तक ?

जब मैं तीस साल की थी तो मैंने अपने से वायदा किया था कि पचास की उम्र में धुँआधार तरीक़े से देश की सियासत में दाखिल हूँगी और यात्राओं पर लगाम लगा दूँगी, मगर ऐसा नहीं हो सका। सियासत और समाज सेवा दोनों मेरे उसूलों और ख़्यालों के दरीचे से दूर चली गई और मैं कागज़ और क़लम को सच समझ इन दोनों जगहों की सैर करती रही बेटे के इस जुम्ले की परवाह किये बिना कि सर झुका कर आप कब तक लिखती जायेंगी ? गर्दन उठाकर देखें दुनिया में क्या हो रहा है वह किधर जा रही है ?

कितना अजीब है कि हर रंगीनी से कट कर मैंने जो दुनिया बसाई थी उसी में आग लग जाने की तमन्ना करने लगी थी ! अपने को अपने से छीन कर किसी गुमनाम वादी में खो जाने की दबी दबी ख़्वाहिश थी जहाँ कोई आँसू कोई चीख मुझे आवाज़ न दे सके और किसी के जज़्बात को कागज़ पर दर्ज करने का फ़र्ज़ मैं निभा न सकूँ। उस बहाने की तरह कि मेरा मोबाइल खो गया परिचितों के सारे नाम पते नम्बर सहित खो गये। ठीक उसी तरह मैं कह सकूँ “अरे, मेरा तो सब कुछ जल कर राख हो गया वरना’’।

इस इच्छा के बावजूद जो मैंने सदी के अन्त में, हरिद्वार में साफ़ शफ़्फ़ाफ़ गंगा की मचलती लहरों की तेज़धार देख कर की थी कि मेरे इन्सानी रिश्ते नदी के किनारे बने रहे और मैं लगातार बहती रहूँ पूरे वेग से ... बरसों के रुके आँसू बह निकलें। मैं जी भर कर रोना चाहती थी। मगर वह दवा भी मेरे ज़ख़्मों पर मरहम ज़्यादा दिन नहीं लगा सकी। ग़म तो फल की तरह लगते हैं। ज़ख़्म फूल की तरह खिलते हैं। दुनिया में ऐसे बाग़ानों की कमी नही। मैंने बहुत पहले ख़ुदा से कहा था कि अगर तू है तो मेरे सवाल का जवाब दे कि अगर अक़्ल दी है तो वह माहौल भी दो जहाँ इस समझ का इस्तेमाल कर सकें वरना मुझे उठा लो। समझ जख़ीरा बन कर बोझ बने और मेरे वजूद को इस तरह बेचैन न करे जैसे कोई दीवाना। मेरी तमन्ना मेरी ख़्वाहिश कितनी रूमानियत से भरी थी आज मैं सोचती हूँ ठीक किसी के इस जुम्ले की तरह जो मेरे ग़म को समझ ही नहीं पाए और बोल उठे, “कैसी परेशानी, आपने बहुत लिख डाला अब आराम करें।‘‘ लिखना मेरे लिए साँस लेने की तरह है तो क्या मैं जीना छोड़ दूँ? .

इस नए घर मे मेरा स्टडी रूम ऊपरी मंजिल पर है। वहाँ जगह ही जगह है। छोटी खिडकी से बाहर देखो तो पेड की एक शाख पत्तियों भरी, आसमान का तिरछा कोना और पड़ोसी के घर की बिना प्लास्टर वाली दीवार। बड़ी खिड़की से बाहर देखो तो धूल से भरी फ़िज़ा में दूर खड़ी क़ुतुबमीनार खुले आकाश पर किसी जिन्नाती मोमबत्ती की तरह बुझी नज़र आती है। बिस्तर पर लेट कर छत ताकूँ तो छत पर बने गोल झरोखे से झाँकती कोई चिड़िया या फिर खुद झरोखा सारे दिन धूप की लालटेन कमरे में गोल गोल घूम कर दिखाता है। रातों को तारों भरा आसमान और पीले चाँद की कलाएँ। यानी कि दायें बायें जगह ही जगह मगर मैंने इसके बावजूद बहुत सी मैगजीनें और किताबों के आठ दस बड़े बड़े पैकेट मुझसे छाँटवा दिये गए यह कह कर कि पुराने काग़ज़ आपको बीमार कर रहे हैं फिर पुराने अधूरे काम? 

कैसे उन्हें समेटूं और किताब की शक़्ल दे डालूं ? पूछना चाहती हूँ मगर पूछ नहीं पाती हूँ क्योंकि इसका जवाब उनके पास नहीं बल्कि ख़ुद मेरे अन्दर बैठा लगातार मुझसे पूछता रहता है। 

सोचती हूँ इस कमरे में ख़ुद को मेरा आग लगाना कितना आसान है फिर मैं यह काम इत्तफ़ाक़ पर क्यों छोड़े हुए हैं ? सारी रात कागज़ धीमे धीमें जलें, कैसिट धीरे धीरे पिघलें। लपटों में यादों का रंग बिखरे तो भी घर में किसी शख़्स को उसके राख होने का पता नहीं चलेगा। मेरा स्टडी बाक़ी कमरों से हट कर है। जलने की गन्ध भी यह कह कर टाल दी जायेगी कि आज फिर श्मशान में कोई चिता जली है। कमरे में एकाएक आग लगने की तमन्ना कुछ दिनो से किसी मुर्दा परिन्दे की तरह मेरे अतीत की गुफ़ाओं में गुम हो चुकी है क्योंकि मुझे बात ज़्यादा गहराई से समझ में आई है कि सारे झगड़े की जड़ तो यह ज़ेहन है और मैंने फौरन अपने लिए दूसरी बददुआ गढ़ ली है कि या खुदा ! मेरी याददाश्त मुझसे छीन ले ताकि मुझे कुछ याद न रहे और न मैं किसी को पहचान सकूँ। और किसी मासूम बच्चे की तरह, हैरत की कुदरत के हुस्न को देख बाकी जिन्दगी उसमें खोई रहूँ।

दुख की यह पर्त्तदार चट्टानें अब मुझसे नहीं सँभाली जातीं जिनके बीच दबे क़ब्रिस्तान में मेरे पहचान वालों के चेहरे आकार ले चुके हैं। जिनकी हसरतों से मेरे अन्दर फेले मैदान बंजर हो उठे हैं और उनकी आहों की हवा पगलाई सी भटकती रहती है। इसलिए एक आखरी ख़्वाहिश है कि मेरे माबूद। मेरी याददाश्त मुझसे ले लो और एक कोरी स्लेट मुझे थमा दो ताकि मैं ग़म की खेती को काटने की आदत छोड़ दूं। इस रात दिन को अज़ियत से मुझे आज़ाद कर दो कि मैं किसी के लिए कुछ न कर पाई।

तुम दुनिया बदल नहीं सकते, न सही मगर मुझे आज़ाद तो कर सकते हो ताकि मैं हर पल उदास रहने की जगह बेवजह खुश रहूँ। हँस सकूँ ... सिर्फ हँस सकूँ ... इतना हँसू कि हँसते हँसते मेरी आँखें आँसुओं से तर हो जायें और तब मैं एक नई इबारत बिल्कुल नई इबारत कोरी स्लेट पर लिखने की कोशिश कर सकूँ।   

-छतरपुर हिल्स, नई दिल्ली, मो. 98111 19489