गुफाओं वाली हवेली और उफनता समुद्र

 यात्रा संस्मरण

13 अक्तूबर, 2007 की शाम गोवा एयरपोर्ट पहुँचा। हिन्दी विभाग के रवीन्द्रनाथ मिश्र ने बताया था कि वह एयरपोर्ट पर होगा और पहचान के तौर पर उसके हाथ में ‘प्रयास‘ पत्रिका होगी। मैं दूर से उसे बाहरी गेट के साथ सटा देखता हूँ और मुस्कराता हूँ। वह भी मुस्कराता है और हम यूनिवर्सिटी की कार में सवार हो गेस्ट हाउस के लिए चल पड़ते हैं। 

अंधेरा अभी-अभी उतरा है और दूर-पास कहीं कुछ नहीं दिख रहा जबकि आसपास ही होंगी पहाड़ियाँ और समुद्र। अंधेरे में हरियाली का आभास होता है और इधर-उधर छितरे पड़े हैं घर और दुकानें। कोई बड़ी आबादी नहीं दिखती। गेस्ट हाउस पहुँचने पर कमरा मिल जाता है। गहरी थकान महसूस कर रहा हूँ। अजीब-सा है यह गेस्ट हाउस। एक सीढ़ी चढ़ता हूँ तो दूसरी उतरता हूँ और तीसरी फिर चढ़नी शुरू कर देता हूँ। सुबह उठ कर देख लूँगा इसकी बनावट और वास्तु-कला। अभी तो सो जाने का मन है।

‘रोहिताश्व चेन्नई गया हुआ है कोई वायवा लेने‘, रवीन्द्रनाथ बताता है, ‘परसो लौटेगा। आप चिन्ता न करें। मैं हूँ न।‘ रवीन्द्रनाथ भला मानुष लगता है। लगने और होने में कितना फर्क है, यह तो समय ही बताएगा। कितना मुश्किल होता है चेहरों को पढ़ पाना। ऊपर से जैसा दिखता है, ठीक वैसा ही हो तो बात ही क्या है ?

पहली बार गोवा आया हूँ। रोहिताश्व ने विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर बुलाया है और वही गायब है। सरसरी-सी निगाह डालता हूँ आसपास, ऊपर-नीचे। लगता है कई गुफाओं वाली हवेली में आ गया हूँ और एक गहरा सूनापन मुझे घेरने लगा है। इस वक्त एक पेग वाईन या व्हिस्की की तलब है। रवीन्द्रनाथ की तरफ देखता हूँ। उससे कोई उम्मीद नहीं है। इस ‘जंगल‘ में कोई अपना नहीं है। नींद की चादर मुझे लपेटने लगी है।

सुबह बाहर आ कर गेस्ट हाउस का मुआइना करता हूँ। इस तरह की शक्ल वाला गेस्ट हाउस मैंने इससे पहले नहीं देखा। एक विशाल सुरंग का खुला हुआ मुँह जो अपने भीतर कई छोटी-छोटी सुरंगों को लपेटे हुए है, जो कभी नीचे की तरफ चली गयी है, कभी ऊपर की तरफ। मैं खुद को नीचे की तरफ धकेला जाता देखता हूँ, कभी ऊपर की तरफ। मेरे अन्दर गड्डमड्ड होने लगे हैं कई कलाकारों के चित्र - कभी पिकासो, कभी हुसैन। तभी देखता हूँ रवीन्द्रनाथ आ रहा है। मैं उससे पूछता हूँ, ‘यह गेस्ट हाउस किसने बनाया है ?‘ वह बताता है सतीश गुजराल ने इसका नक्शा तैयार किया है। मुझे अहसास हुआ - हाँ वही कर सकता है इस तरह की वास्तु-कला हरकत। वही जोड़ सकता है किसी निर्माण कला में एलोरा और अजन्ता की गुफाएँ एक साथ। अपनी कल्पना के नक्शे में उसने भित्ति-चित्रों को भी उकेरा होगा मगर भवन निर्माताओं के हाथों वे चित्र पिछवाड़े में डाल दिये गये होंगे और बची रह गयी होंगी पत्थर और कंकरीट की दीवारों वाली गुफाएँ। मुझे लगा जैसे मैं एक दूसरे में खुलती हुई गुफाओं वाली हवेली में दाखिल हो गया हूँ।

मैं रवीन्द्रनाथ के साथ ऊँची-नीची सीढ़ियों से होता हुआ कमरा न. 49 में आता हूँ। ‘गर्मी है और गर्म है यह कमरा। रात नींद नहीं आयी‘, मैं रवीन्द्रनाथ से कहता हूँ। वह सिर हिलाता है। मैं और रवीन्द्र नीचे-ऊपर जाती सीढ़ियों से होते हुए रिसेप्शन पर पहुंचते हैं। रिसेप्शन से लड़का सीढ़ियाँ चढ़ता-उतरता रूम नं. 29 में ले जाता है- एक सेट नीचे एक ऊपर । एक और रूम देखा नं. 01 नीचे की तरफ। मैं इस रूम में शिफ्ट कर जाता हूँ। रवीन्द्रनाथ मेरी तरफ देखता है। उसने समकालीन कविता/लम्बी कविता पर प्रोजेक्ट पूरा करना है। मैं उसे कुछ अध्ययन सामग्री सौंप देता हूँ। शाम को उसके साथ कला अकादमी में संगीत-नृत्य प्रदर्शन देखा। संगीत नृत्य में नृत्य संगीत में एकरस एक तान। वहाँ से एस.बी. रोड समुद्र तट पर। एक तरफ मांडवी नदी, दूसरी ओर समुद्र। शाम गहराने लगी है। अंधेरे में समुद्र को डूबते हुए देखता हूँ। एक पल में सैंकड़ों छवियाँ बनती-मिटती दिखती हैं।

अगले दिन 11 बजे रोहिताश्व गेस्ट हाउस आ गया। थोड़ा बदला-बदला ढल गया सा लग रहा है चेहरे-मोहरे में, स्वभाव में भी। हर वक्त हड़बड़ाहट में क्यों लगता है ? पहले तो ऐसा नहीं था। वह मुझे अपने घर की तरफ ले जा रहा है। मांडवी नदी के साथ चलते हुए हम एक पहाड़ी पर चढ़ने लगे हैं। कई खतरनाक मोड़ काटती टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों से होते हुए हम ऊपर चढ़ते जा रहे हैं। मुझे शिमला याद आ गया है - ऊपर-नीचे चक्कर काटती सड़कें और वैसी ही ढलान वाली छतें। उसका घर आ गया है। सामने देखता हूँ- मांडवी पेड़ों को रौंदती मेरे करीब आती हुई। रोहिताश्व के घर की खिड़की से झाँकता हूँ तो मांडवी ही मांडवी चारों तरफ। ‘कुछ साल पहले जब मैं भयंकर रूप से बीमार हो गया था- अपंग और लाचार‘, रोहिताश्व कहता है, ‘मांडवी ने मुझे बचाया था। स्मृतियों से निकलने पर वह कहता है, ‘चलो आपको मांडवी नदी में ले चलें‘-‘लहरों के अवगुंठन में-आदिम यौवन सी लहराती नदी में और मैं उसके स्कूटर पर सवार पहाड़ी से उतरता हुआ नदी के मुहाने पर लगे क्रूज पर चढ़ जाता हूँ। ऊपर जाने की बजाय हम पहले नीचे के हॉल की तरफ आ जाते हैं जहाँ डांस प्रोग्राम है। गोवा की धुनों पर नाचती-थिरकती दो लड़कियाँ और दो लड़के वेश बदल-बदल कर आते हैं और यहाँ के लोक-जीवन के कई पहलुओं को उजागर कर जाते हैं। तीसरी बार वे आकर्षक पुर्तगाली वेशभूषा में आते हैं। संगीत की लोक धुनों के अनुरूप उनके अंग संचालन और नृत्य भंगिमाओं में गजब की गति और रिद्म है। क्रूज वापसी पर है। हम ऊपर छत पर आ जाते हैं। दूर तक फैली समुद्र जैसी मांडवी नदी ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है।

घर लौटते हुए रात के सवा नौ बज गये हैं। चारों तरफ चुप्पी है। सूनेपन को धुनती कोई आवाज नहीं है, बस एक मांडवी है जो मन के सूने कोनों में बज रही है। जल प्रवाहों में ये प्रकाश वर्तुल कैसे हैं ? चाँद इतना फीका और श्रीविहीन क्यों है ? रोहिताश्व मुझे चाँद में खोया देख कहता है, ‘रोमैंटिक कवियों की तरह क्या चाँद-वांद में खोये हो, सुनो कविता में इतिहास और वह इतिहास बनाने वाले कविता सुनाता है। इतिहास के सन्दर्भो को नये रूपों में आलोकित करती यह कविता आज के समय-सन्दर्भो को कुछ इस तरह तानती है कि कई अर्थ-व्यंजनाएँ आलोकित हो उठती हैं- समझ में नहीं आता किसको पकडूं, किसे छोड़ दूँ। कविता की अन्तिम पंक्तियाँ हैं: ‘वे आ रहे हैं हमारी भाषा को रौंद कर/संगीत को झुलसा कर/हमारी धरती-धारित्री को कुचल कर एक नया इतिहास बनाने के लिए/इक्कीसवीं सदी में ले जाने के लिए...‘ तभी उसकी मित्र, पुर्तगीज की प्रोफेसर नीलोफर आ गयी और बातों का सिलसिला ही बदल गया।

गेस्ट हाउस में सुबह के वक्त चाय का कोई इंतजाम नहीं है। चाय के बिना खाली-खाली सा महसूस करता हूँ। आज उसकी तलाश में निकल पड़ा हूँ। बाहर धुंध है। धुंध में सड़क पगडंडी सी दिखती है। एक स्कूटर दूध के डिब्बे लटकाये मेरे पास से गुजर जाता है। मैं यूनिवर्सिटी स्टेट बैंक के निकट पहुँच गया हूँ। आगे दिखता है धुंध में लिपटा एक चैराहा और मैं एक लोकल बस के नीचे आता-आता बचता हूँ। बायीं तरफ मुड़ता हूँ। चाय की महक महसूस हो रही है। कच्चे रास्ते से नीचे उतरता हूँ कि देखता हूँ दो महिलाएँ चाय के गिलास लिये खड़ी हैं। एक छोटे से कमरे में चाय बन रही है। बिस्कुट के पैकेट पड़े हैं। चाय बनाने वाला काकरा गाँव का अमित सावन्त है। मुझे अमित की याद आती है। वह मुम्बई में होगा। मैं चाय पीने लगता हूँ। चारों तरफ नजर दौड़ाता हूँ। साथ ही यूनिवर्सिटी का पोस्ट ऑफिस है, यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध एक होमियोपैथी की डिस्पेंसरी भी।

कला अकादमी गोवा का स्कूल ऑफ ड्रामा मांडवी के किनारे पर है। कल रिपर्टरी के इंचार्ज अफसर हुसैन और स्कूल की डायरेक्टर पद्मश्री से बात हुई थी। अकादमी के सचिव पांडुरंग फलदेसाई से भी। उनका आग्रह था कि नये नाटक का पाठ मैं उनके बीच करूँ। सो मंच अंधेरे में का पाठ अकादमी में रखा गया हैं। यूनिवर्सिटी से कई लोग आ गये हैं। मंगला वैष्णव भी। उसके कला अकादमी के गेस्ट हाउस में कमरा मिल गया है। मैं नाटक का पाठ करने से पहले नाटक के केन्द्रीय मुद्दे के बारे में बताता हूँ और स्कूल के लड़के-लड़कियों और आमन्त्रित दर्शकों के सामने नाटक का पाठ करता हूँ। एक दो लड़के-लड़कियाँ सवाल पूछते हैं और मैं उनको उत्तर देता हूँ। छात्र-छात्राओं में नाटक को लेकर भरपूर उत्साह दिखा। अफसर हुसैन ने कहा कि उन्हें पूरा नाटक मंच पर होता हुआ दिखा। नाटक सुनते हुए उनके सामने मनोहर सिंह और सुरेखा की जिन्दगियों के कई पहलू खुलते गये, वे कहते हैं। उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वे इस नाटक को हिन्दी या मराठी में करना चाहेंगे। पद्मश्री भी उत्सुक हैं। मंगला उन्हें मराठी अनुवाद भेजने का वायदा करती है।

पणजी से हम यानी मैं, मंगला और किरण मंगेशी मन्दिर की तरफ जा रहे हैं। पहाड़ों और जंगलों में से बनाई गयी सन्नाटे भरी सड़कें और समुद्र! रास्ते में दोनों तरफ नारियल, कटहल, जामुन, केले, काजू, दालचीनी, अनानास, सुपारी, काली मिर्च के पेड़ दिखते हैं। पणजी से 5 कि.मी. के फासले पर रवीन्दर है जिसे राय बन्दर भी कहा जाता है। इस बन्दरगाह के दूसरी तरफ दीवार टापू और शिरोव जैसे सुन्दर इलाके हैं। आगे बढ़ते हुए हम मंगेशी के साढ़े पाँच सौ साल पुराने प्रसिद्ध मन्दिर आ गये हैं-मंगेश यानी शिव मन्दिर। इसका गर्भगृह चाँदी से मढ़ा है और बीचों-बीच मंगेश की मूर्ति स्थापित है। यहाँ शिव प्रतिमा अन्य जगहों पर पायी जाने वाली शिव प्रतिमाओं से भिन्न है।

अब हम बोम जीजस के महागिरजाघर में आ गये हैं। इसमें दायीं तरफ आर्ट गैलरी है और बायीं तरफ म्यूजियम। बोम जीजस यानी नेक या शिशु जीजस। इसका निर्माण 1594 में तथा अभिषेक सन् 1605 में हुआ। अन्दर प्रवेश करते ही दायीं ओर सेंट अन्थोनी की वेदी है और बायीं तरफ सेंट फ्रांसिस जेवियर की काष्ठ मूर्ति है। प्रार्थनालय में सेंट फ्रांसिस जेवियर का पवित्र शारीरिक अवशेष है। इसका भीतरी भाग सेंट के जीवन दृश्यों से सुसज्जित है। सेंट जीजस देखकर मैं कई मंजिलों वाली झूलती हुई किसी इमारत का तसव्वुर करने लगता हूँ। मुझे लगता है जैसे रहस्यों का एक मायाजाल हो जिसमें कई मंजिलें लटकी हुई हो और एक को छूने से दूसरी खुल जाती हो - भीतरी भाग, बाहरी भाग, भाग के ऊपर भाग, भाग के नीचे भाग- देखते देखते महागिरजाघर मेरे सामने खुफाओं वाली रहस्यमय हवेली जैसे यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में बदल जाता है। मेरी एक नजर में ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर आती-जाती गुफाएँ ही गुफाएँ हैं।

गिरजाघर से वापसी पर रोहिताश्व और जेनिफर को लेते हुए हम सीधे फोर्ट आग्वादा की तरफ चल पड़े। मांडवी को लांघते हुए, कई टेढ़ी-मेढ़ी, ऊँची-नीची सड़कों से होते हुए हम फोर्ट आग्वादा पहुँच गये। निपट सुनसान। समुद्र की धीमी-धीमी गर्जना। एक पंछी आसमान को चीरता हुआ ऊपर से निकल गया। फोर्ट आग्वादा की बड़ी-बड़ी पथरीली दीवारें साँझ के झुरपुटे में कुछ ज्यादा ही काली और डरावनी लग रही हैं। नुकीले पत्थरों की राह पर मेरा हाथ थामे रोहिताश्व बताता जाता है, ‘इस जेल में बड़े-बड़े क्रान्तिकारी बन्द रहे हैं, लोहिया भी जिसे तुम बहुत मानते हो। हम ऊबड़-खाबड़ सी एक पगडंडी पर चलने लगते हैं। दोनों तरफ घनी झाड़ियाँ हैं। अजब है! इन घनी झाड़ियों में गुफाओं वाली हवेली कहाँ से आ गयी मेरा पीछा करती। हवेली है कि तिलस्म कभी नमूदार हो जाती है कभी गायब हो जाती है।

चित्रकार सतीश गुजराल के एक रंग स्पर्श के साथ कितनी रंग परतों के साये कि मैं देखता रह गया। ‘कहाँ खोये हो सामने देखो‘ रोहिताश्व कहता है और मैं सामने देखता हूँ - हम रेग मोजेस पहाड़ी से नीचे की तरफ लुढ़क रहे हैं। कभी मंगला मेरा हाथ पकड़ लेती है कभी जेनिफर। बीच बीच में रोहिताश्व भी। हम पहाड़ी के लगभग एक कोने पर पहुँच गये हैं। ऊपर चाँद है और सामने विशाल समुद्र। मेरे अन्तर्मन में सन्नाटा गूंजने लगा है- एक विराट मौन... देखो, नरेन्द्र मोहन, सामने अन्तर्राष्ट्रीय जहाजों का बेड़ा‘, मैं देखता हूँ- दूर समुद्र में जहाज चमचमाते हुए। ‘और वह देखो लाईट हाउस-उन्हें दिशाओं की पहचान देता।‘ मैं ऊपर देखता हूँ। हाँ, लाईट हाउस ही है। फोर्ट आग्वादा पर उसकी धीमी रोशनी पड़ रही है। ‘थोड़ा पहले आते तो तुम्हें यहाँ लड़के-लड़कियों के जोड़े श्रृंगार चेष्टाओं में निमग्न दिखते‘, यह बात रोहिताश्व तीसरी बार कह रहा है। मैं उसे चुप रहने को कहता हूँ। वह चुप हो जाता है। समुद्र का विस्तार मेरे भीतर समाने लगा है। क्या मैं और समुद्र एक हो गये हैं ? मैं एक पहाड़ी जंगल में खड़ा हूँ और समुद्र मेरे साथ चलने लगा है। मैं क्या करूँ ?

फोर्ट आग्वादा से हम ताजमहल के सामने सिक्वेरियम बीच पर आ गये। यहाँ चाँदनी और अंधेरे का अजब संगम है। उत्ताल तरंगें गरजती हुई टूटती हैं-आधी अंधेरे में और आधी चाँदनी में। पूरे समुद्र में चाँदनी और अंधेरे का खेल चल रहा है-लहरों के भीतर अंधेरों को जगमगाता-कभी अंधेरा लहरों पर इठलाता, कभी चाँदनी। अंधेरे और चाँदनी की संगत में समुद्र का संगीत पहली बार सुन रहा हूँ।

कोलन्गुत समुद्र तट पर आ गये हैं - दौड़ता-उफनता हुआ समुद्र। रेत पर दौड़ते हुए हम समुद्र के करीब पहुंच जाते हैं। समुद्र हमारे पैरों से लिपट कर क्या कह जाता है कि गीली रेत के कण पैरों की उँगलियों में चमचमाते लगते हैं। रोहिताश्व मस्ती के आलम में आ गया है। अब उसे रोकना मुश्किल है। वह समुद्र में दूर तक चला जाता है और आते हुए कोई रोमैंटिक फिल्मी गीत गुनगुनाने लगा है। समुद्र की लहरों की तरह एक प्रेमी उस में हमेशा पंख फड़फड़ाता रहता है।

हम दोनों पावला के समुद्र के तट पर आ गये हैं। यहाँ से समुद्र की छटा निराली है। समुद्र और पहाड़ के बीच होड़ मची है। समुद्र अपना उत्ताल तरंगी आरा चट्टानों पर चला रहा है और प्रेम की दीवानी चट्टानें टूटने के बजाय समुद्र के गले में बाँहें डाल देती हैं। बड़ी-बड़ी चट्टानों में समुद्र कभी भिंचता है, कभी गरजता हुआ उन्हें तोड़ता-फोड़ता निकल जाता है। मैं उल्लास और सहम से देखता हूँ- मेरे अन्दर खड़ी बेतरतीब, ऊबड़-खाबड़ चट्टानों को रौंदता समुद्र मेरे भीतर प्रवेश कर गया है।