सृजन ही धर्म है उनका

  डॉ. रजनी बाला, हिन्दी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय जम्मू 180006, ईमेल: rbalajmu@gmail.com,
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नरेन्द्र मोहन एक ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने लगभग सभी विधाओं को न केवल छुआ बल्कि उन्हें व्याख्यायित और स्थापित कर मुख्य धारा में लाते हुए, नये सिरे से अपने समकालीन साथियों को सोचने-विचारने और परिवर्तन को स्वीकारने के लिए तैयार किया। डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने सबसे पहले कोई बीस साल की उम्र से कविता रचना शुरू किया। तदन्तर वह आलोचना की ओर मुड़े क्योंकि उनका मानना है कि आलोचना से साहित्य की बारीकियाँ बेहतर ढंग से समझी जा सकती हैं। संभवतः इसीलिए वह विचार कविता को एक अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में रख सके और उसके अगले चरण में लम्बी कविताओं की रचना की। कविता और अन्य कलाओं का समन्वय और सम्बन्ध स्पष्ट करते हुए वह कलाओं का समग्रतः प्रयोग करने वाली विधा नाट्य लेखन की ओर गतिशील हुए। इसी के साथ साहित्यिक केन्द्र से अलग-थलग पड़ी और समझी जाने वाली विधाओं - संस्मरण, साक्षात्कार और पत्र-संवाद के ज़रिए उन्होंने वैयक्तिक स्मृति को ऐतिहासिक स्मृति की भाँति ख़ास तव्वजो दी - जीवनी, डायरी और आत्मकथा इसी का परिणाम हैं।

सच के लिए जीने-मरने वाले काव्य चरित्रों और नाटकीय पात्रों की रचना करने वाले नरेन्द्र मोहन ने अनुभव और सच के कटघरे में खड़े होकर स्वयं को उधेड़ने और पाठकों के सामने लाने की ईमानदार कोशिश ‘कमबख़्त निंदर’ और ‘क्या हाल सुनावाँ’ आत्मकथाओं में की है। 

उनकी इतिहास-चेतना में मूलतः तीन प्रकार की स्मृतियाँ हैं। एक, वैयक्तिक स्मृति जिसमें विभाजन के दौर का 11-12 साल वाला निंदर है। दूसरी, परिवेश से जुड़ी स्मृति जिसके कारण यूसुफ़ जैसे पात्र मिथकीय चरित्र बन गये और तीसरी, स्वयं के भोगे अनुभव के साथ पूर्व की अलक्षित स्मृति जैसे जन्म-घड़ी के समय शूट एट साइट का आदेश। आत्मकथा में आयी इन सभी स्मृतियों का वैशिष्ट्य इस बात में है कि उन्होंने दृश्य को भीतर तक समझ और उसे एक संगठित निजी अर्थ प्रदान किया है। पहली आत्मकथा कमबख्त निंदर भारत विभाजन और इमरजेंसी के बीच लिखी जीवन-कथा है। हमें ऐसा लगता है कि वस्तु के साथ प्रस्तुति में भी दूसरी आत्मकथा अभिव्यंजना शिल्प की दृष्टि से एक अलग चमक लिये हुए है। यहाँ आत्मगत धरातल पर रचना-कर्म की दृष्टि से नरेन्द्र मोहन ने अपने नाटकों को ख़ासतौर पर रेखांकित किया है। नाटकों की ओर उनके रुझान, प्रकाशन, रंगमंचीय प्रस्तुतियों और प्रतिबन्धों से जन्मे हास-उल्लास और अकथनीय वेदना बार-बार उन्हें विभाजन और आपातकाल की कारुणिक स्मृति दिलाती है। पंजाब की 1984 की त्रासदी, बाबरी मस्जिद और गोधरा नरसंहार जैसे हवाले उनके भीतर चुप्पी और सन्नाटे की एक सिल सरकाते जाते हैं। लेखकों और मित्रों को सहेजने वाले नरेन्द्र मोहन की ख्याति दिल्ली से बाहर कुछ इस तरह फैली कि वह मस्कत, शिमला, लाहौर, औरंगाबाद, बैंगलोर, चंडीगढ और न जाने कहाँ-कहाँ गये और वहाँ के अनुभव आत्मकथा मे नत्थी किये।

नरेन्द्र मोहन की शख़्सीयत की भरपूर पहचान करनी हो तो आत्मकथाओं के साथ उनकी तीनों डायरियाँ साथ-साथ मेरा साया, साये से अलग तथा साहस और डर के बीच का अध्ययन ज़रूरी है।  लेखकीय स्वाधीनता को बचाये और बनाये रखते हुए कुछ भी कहने की आड़ यहाँ नहीं ली गयी है। सच चाहे व्यवस्था से जुड़ा हो अथवा व्यक्ति से, उसे बेख़ौफ कहा गया है। एक तरह की गद्यगत और अर्थगत लय के चलते, बिना किसी अतिरंजना के कि यह लेखक के आत्मालाप की परिणति है, इन्हें पढ़ा जा सकता है। बल्कि यों कहें कि कहीं बहुत गहरे इसके भीतर से उभरते हुए विविध संदर्भ पाठक की ग्राहक क्षमता के गवाक्ष खोलते चले जाते हैं जिनमें झाँकती एक ऐसी लेखकीय छवि को देखने का अवसर मिलता है जो अन्य किसी विधा में संभव नहीं। बहरहाल, एक नये कला-माध्यम की तलाश यहाँ की जा सकती है क्योंकि सभी साहित्यिक विधाओं, मानसिकताओं और संवेदनाओं का संगुफन और संयोजन इन डायरियों के भीतर छिपा हुआ है।

रंगों और रूपों की अनेक छवियाँ तीनों डायरियों में क्रमशः परिवर्तित होती गयी है। साथ-साथ मेरा साया में आत्म से जुड़े पहलू अधिक हैं जबकि साये से अलग में आत्म के गलियारे से बाहर जब-तब बाहर झाँका गया है इसलिए सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों और उन पर लेखकीय प्रतिक्रिया के अंश अधिक हैं। यायावरी प्रकृति के नरेन्द्र मोहन की दूसरी डायरी में ऐसी कई प्रविष्टियाँ हैं जिन्हें यात्रा संस्मरण के तौर पर भी देखा जा सकता है। किसी स्थान विशेष पर वर्तमान में खड़े रहकर वह कब अतीत की सुरंग में झाँक कर इतिहास की धमक सुनने लग जायें, कुछ कहा नहीं जा सकता। आत्म के साथ अतीत, इतिहास और वर्तमान की आवाजाही तीसरी डायरी साहस और डर के बीच में कुछ इस तरह होती रहती है कि पाठक काल की सीमाओं को लाँघ वर्तमान और अतीत के समीकरण के बीच खुद को महसूस करता है। इन डायरियों में प्रत्यक्ष और स्थूल घटनाओं के साथ सूक्ष्म संदर्भ भी नत्थी हैं। किसी रचना को पढ़ते हुए, चित्र या नृत्य कला का आस्वादन करते हुए, घरेलू रिश्तों की अदृश्य गुत्थियों से रू-ब-रू होते हुए नरेन्द्र मोहन को इन डायरियों में एक साथ एक ही समय पर हास-रूदन, उल्लास और अकेलेपन के साथ देखा जा सकता है। बड़ी बात यह है कि इस सारी प्रक्रिया में कलागत सम्बन्धों, व्यक्तिगत रिश्तों के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक आशय भी खुलते गये हैं। इनका पाठ करते हुए इतिहास, परिस्थिति और दौर विशेष की पहचान होती चलती है इसीलिए ये डायरियाँ तथाकथित और परम्परागत अर्थ में सिर्फ़ रोज़नामचा नहीं हैं बल्कि अपने युग की नब्ज़ की पहचान का धड़कता अहसास भी हैं। 

एक लम्बे समय तक विभिन्न माध्यमों में अभिव्यक्ति करने वाले नरेन्द्र मोहन के जीवन, रचना-प्रक्रिया, कविता, लम्बी कविता, नाटक, रंगमंच, आलोचना, डायरी के साथ आज के दौर की नयी अवधारणाओं जैसे मीडिया और अनेक कलाओं के अन्तर्सम्बन्धों के व्यापक फलक को साक्षात्कार पर केन्द्रित स्वतन्त्र पुस्तकों ‘बात से बात चले’ एवं ‘सृजन की मनोभूमिः मेरे साक्षात्कार’ ने नये आयाम दिये हैं। नरेन्द्र मोहन से उनके समकालीन रचनाकारों, मित्रों की बातचीत और अपने दौर के साहित्यकारों से नरेन्द्र मोहन की बातचीत में मर्यादा पर बराबर ध्यान दिया गया है। साक्षात्कार का एक रूप बड़ा दिलचस्प है जो पूरी तरह से इस लेखक के प्रिय रचनाकार सआदत हसन मंटो पर केन्द्रित है। ‘मंटो का इन्तज़ार’ साक्षात्कार विधा में एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसमें मंटो को केन्द्र में रखकर नरेन्द्र मोहन से जो प्रश्न किये उनके उŸार में मंटो के कई रचनात्मक और निजी पहलू इस तरह खुलते चले जाते हैं मानो स्वयं मंटो ही जवाब दे रहे हो। किसी रचनाकार के विविधआयामी पहलुओं की दूसरे रचनाकार द्वारा इस तरह की प्रस्तुति से यह पुस्तक साक्षात्कार जगत में अलग पहचान रखती है। 

संस्मरणकार के तौर पर नरेन्द्र मोहन की फ्रेम से बाहर आती तस्वीरें पुस्तक के अतिरिक्त कुछ प्रविष्टियाँ उनकी रचनावली के खंड बारह में भी हैं। नरेन्द्र मोहन रचनाकार की कुल मानसिकता के पीछे उसके बचपन या यों कहें बच्चे को खोज लाते हैं। यही कारण है कि रवीन्द्र कालिया के भीतर वह एक ‘मसखरे लड़के‘ की पहचान कर लेते हैं। विष्णु प्रभाकर के बारे सोचते हुए भी वह प्रभाकर के चरित्र को परिचालित करने वाली कुल मानसिकता के पीछे एक बच्चे को तलाश लेते हैंै। संस्मरणकार नरेन्द्र मोहन कई बार पाठक और सम्बन्धित लेखक के बीच समीक्षक की भूमिका निभाते हुए सेतु का काम करते हैं। उनके संस्मरण में आँकड़े बेशक यथातथ्य हों लेकिन उनके प्रति लेखकीय प्रतिक्रिया निजी है।

स्मृति के साथ आत्म संवाद करते हुए नरेन्द्र मोहन ने यात्रा संस्मरण की पाडुलिपि ‘यात्राएँ-अन्तर्यात्राएँ’ शीर्षक से तैयार की, जो प्रकाशनाधीन है। यात्रा वृत्तान्त की इतिवृŸाात्मक और वर्णनात्मक शैली से अलग उन्होंने डायरीनुमा शैली में अपनी यात्राओं के ज़रिए अन्तर्यात्रा की है। भौगोलिक यात्रा के साथ ऐसा टैक्सचर अपनाते हुए वह आत्म के साथ वर्तमान और अतीत को एक वेवलेंथ पर ले आते हैं। इसीलिए यात्रा सम्बन्धी उनकी नोटिंग्स स्थान, प्रान्त, प्रकृति आदि की बायोस्कोपिक तस्वीर के साथ सामाजिक अनुभव बनने की क्षमता रखती हैं। महाराष्ट्र की संत कवयित्री बहिणा बाई को लेकर उनकी लम्बी कविता प्रिय बहिणा..., संत कवि तुकाराम पर केन्द्रित उनका नाटक अभंग गाथा और अंबर हब्शी की रचना उनकी यात्राओं का ही परिणाम हैं। मस्तानी सरोवर को देख और शिवाजी के बारे अपने मराठी मित्रों से जानकारी का असर रहा कि वह मस्तानी तथा छत्रपति शिवाजी को केन्द्र में रखकर दो नाटक लिखना चाहते थे।

अपने समकालीनों के साथ पत्र-संवाद को उन्होंने क्यों तेरा राह ग़ुज़र याद आया में नत्थी किया है। आज के दौर में कलम की जगह की-बोर्ड, कागज़ के बजाय स्क्रीन, फेस टु फेस को मुँह चिढ़ाता फेसबुक, आमने-सामने ‘कैसे हो’ पूछने की जगह वाट्सैप प्रमुख हो गया है। इस मुहिम ने जैसे आदमी से आदमी के संवाद और जज़्बाती रिश्तों को नेपथ्य में डाल दिया है। ऐसे में किसी को पत्र लिखना या किसी की चिट्ठी पाना ताज़ी खुशबू की तरह मन में नयी उजास भर देता है। नरेन्द्र मोहन को लिखे और उनके द्वारा लिखे गये पत्रों की यह पुस्तक तमाम तरह की इन्फाॅरमेशन टेक्नोलाॅजी के बीच रूह की गहराई से रचे पत्रों की ज़रूरत और महत्व को प्रतिपादित करती हैं।

मंटो ज़िन्दा है मात्र एक जीवनी नहीं बल्कि मंटो पर केन्द्रित ऐतिहासिक और दस्तावेज़ी हलफनामा है जिसमें सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि से केन्द्रीय चरित्र से जुड़े हर पहलू से शोध किये गये हैं लेकिन एक आत्मीय रवानगी के साथ जीवनीकार ने मंटो को जीवनी के फ्रेम में सहेजा है। जिस प्रकार के हवाले, संदर्भ, घटनाएँ जीवनी में नत्थी हैं उनमें ऐसा ही रचनाकार जन्म ले सकता है, यह ‘मंटो जिन्दा है’ की स्थापना है। मंटो के बहाने पाठक तत्कालीन और समकालीन युग-परिवेश में झाँकता जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में वह अपनी मान्यताओं, मंटो से जुड़े पुराग्रहों को झाड़ता चलता है और पूर्वाग्रहों पर पुनर्विचार के लिए बाध्य होता है। इस जीवनी की आत्मीय शैली, मंटो के पत्रों, उनसे जुड़े स्थानों, पूर्व कार्यों को नरेन्द्र मोहन ने नया सर्जनात्मक रंग देकर हिन्दी गद्य की नयी पहचान के अवसर और संभावनाएं खोली हैं।

मंटो पर सर्जनात्मक लेखन के साथ मंटो की कहानियाँ  एवं मंटो के नाटक का संपादन करते हुए नरेन्द्र मोहन ने भूमिका स्वरूप लम्बी समीक्षाएं लिखीं। उनकी कहानियाँ अकेले कहानीकार की बेचैनी का सबब नहीं वरन् मुल्क और क़ौम की बेचैनी से जुड़ी हैं इसीलिए उनमें सुन्दर शब्दों की कमी बेशक हो लेकिन कथ्य को झलकाने की शक्ति भरपूर है। स्थितिगत विडम्बना के साथ तीव्र आक्रोश और तीखा व्यंग्य मर्यादा और अश्लीलता की दुहाई देने वालों को नाराज़ करता है जबकि नरेन्द्र मोहन मानते हैं कि उन्हें अश्लील कहना साजिश है अपने समय के लोगों से उनके साहित्य को छिपाने की क्योंकि वह समाज, धर्म और सत्ता के नंगेपन को सामने लाते हैं। इसीलिए उन्हें लगता है मंटो काली तख़्ती पर सफेद चाक से लिखने वाले ऐसे लेखक हैं जो उपमा-प्रतीकों का घना जंगल खड़ा नहीं करते।

नरेन्द्र मोहन की लेखक और आलोचक के धरातल पर प्रवृत्त रही है कि रचनाकार के साथ चरित्रों एवं घटनाओं की अन्दरूनी पड़ताल करते हुए उनकी अन्तःवृत्तियों की छानबीन करते हैं। इस सारी प्रक्रिया में दो बिन्दु उनकी लेखकीय मानसिकता में ख़ासतौर पर मार्क किये जा सकते हैं। एक है आत्म चाहे स्वयं का हो या अन्य किसी रचनाकार का 

आलोचना करते हुए उसे घटनाओं के संदर्भ में देखते हैं। दूसरे, वह कथ्य और केन्द्रीय चरित्र एवं पात्रों के शारीरिक-मानसिक व्यवहार के कारणों की तलाश करते हुए एक तरह से उनकी ‘बाॅडीलैंग्वेज़’ को समझते हैं। इन दोनों विशेषताओं के कारण यह संभव हो पाता है कि वह पूर्ववर्ती आलोचकों और पूर्वाग्रही धारणाओं को सहज भाव से निरस्त कर अपनी स्थापनाएँ प्रस्तुत करने में सफल होते हैं। दूसरे सम्बन्धित रचनाकार, उसकी केन्द्रीय मनोभूमि और प्रवृत्तियों की जानकारी हासिल कर, उसकी रचनाओं के प्रशंसात्मक और विवादास्पद पहलुओं और उनके कारणों को खोलते हुए, जहाँ तक संभव हो रचना और रचनाकार, घटना और पात्र, कथ्य और ऐतिहासिक तथ्य, यथार्थ और शैली के अन्तरंग सम्बन्धों पर विचार कर चर्चित लेखक और उसके लेखन को एक खुली ताजी हवा में ले आते हैं। इस क्रम में पाठक और आलोचक भी पूर्व मान्यताओं पर पुनर्विचार की ज़रूरत महसूस करते हुए एक बार फिर नये सिरे और नज़रिए से सम्बन्धित रचनाकार और उसके रचना-पाठ के लिए तैयार हो उठता है। एक लेखक का दूसरे लेखकों के प्रति दरअसल यह अपने उत्तरदायित्व का आभास है जिसका ज्ञान और भान नरेन्द्र मोहन को रहा है।

विभाजन की पीड़ा से मुक्ति पाने के प्रयास में उन्होंने सिक्का बदल गया, बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्धः हिन्दी कहानी, दो खण्डों में भारतीय भाषाओं की कहानियाँ, विभाजन की त्रासदीः भारतीय कथा दृष्टि एक के बाद समीक्षात्मक पुस्तकें दीं और विभाजन सम्बन्धी भारतीय भाषाओं की कहानियों को हिन्दी में अनूदित करवा कर प्रकाशित किया। विभाजन की एक साथ कई तस्वीरें और व्याख्याएँ प्रस्तुत कर उन्होंने विभाजन सम्बन्धी आलोचना को ऐतिहासिक दस्तावेज़ी महत्व प्रदान किया है। इस दृष्टि से हिन्दी कहानीः बीसवीं शताब्दी का उतरार्द्ध में विभाजन की नृशंसता के बीच मानवीय करुणा को उभारने वाली कहानियों की उन्होंने सामीक्षा की। 

विभाजन के त्रासद मंजर और उनसे चकनाचूर होती इन्सानियत के दृश्य तथा उनका ब्लू प्रिंट विभाजनः भारतीय भाषाओं की कहानियाँ खण्ड एक-दो में संकलित हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, सिन्धी और बांगला की बयालीस अनूदित कहानियों में उन्होंने चिह्नित किया है। विभाजन पर केन्द्रित कहानियों पर व्यापकता के साथ काम करने वाले नरेन्द्र मोहन की पुस्तकों 

आधुनिकता के संदर्भ में हिन्दी कहानी, हिन्दी कहानीः दो दशक की यात्रा (सहयोगी सं.), समकालीन हिन्दी कहानियाँ दो खण्डों में (सं.) तथा रोज़ एक कहानी (सं.) में भी कहानी आलोचना की खास प्रवृत्तियाँ मार्क की जा सकती हैं। वह यथार्थ के साथ गहरे जुड़ाव, गहरे लगाव और गहरे उतरने की बात करते हैं जो उनकी आलोचकीय मानसिकता का केन्द्रीय घटक है। 

आधुनिकता और समकालीनता को दशक के अनुसार वर्गीकृत कर कहानी का विवेचन तथा विश्लेषण करते हैं। नरेन्द्र मोहन ने दर्जनों उपन्यासों और अनेक उपन्यासकारों का आधुनिकता, समकालीनता और यथार्थ की दृष्टि से मूल्यांकन किया है। आधुनिक हिन्दी उपन्यास पुस्तक से यह तथ्य सामने आता है कि उनकी औपन्यासिक आलोचना में ब्यौरे और कथ्य, आत्म और परिवेश, घटना और वैचारिक धरातल, चरित्र और स्थिति, उपन्यासकार की शैली के साथ औपन्यासिक भाषा की समवर्ती धाराएँ प्रवाहित होती रहती हैं। इसका फ़ायदा यह होता है कि कथा या उपन्यास किसी एक चरित्र अथवा लेखक तक सीमित न रह कर अपने दौर से जुड़कर परिदृश्य की दृष्टि से आधुनिक तथा मानवीय अस्तित्व एवं संघर्ष के नज़रिए से समकालीन हो जाता है। कथा-साहित्य में प्रतिमानों का अभाव उन्हें खटकाता है। दूसरे, उन्हें इस बात से भी शिकायत है कि इस अभाव की पूर्ति पूर्वाग्रह से ग्रस्त सिद्धान्त तथा काव्य-प्रतिमानों पर घटाकर की जाती है। भाषा की वर्णनात्मक शक्ति से घटना, प्रसंग, स्थिति, चरित्र, विरोध-अन्तर्विरोध को ख़ोलने की क्षमता बेशक कथा साहित्य को विशिष्ट बनाती है किन्तु इस शक्ति का सर्जनात्मक प्रयोग ज़रूरी है। इस दृष्टि से उन्होंने प्रेमचंद का कथा संसार में प्रेमचंद की कहानियों एवं उपन्यासों पर सारगर्भित टिप्पणियाँ करते हुए उन्हें अपने युग और काल की पहचान रखने वाले बड़े कथाकार के तौर पर स्थापित किया है। नरेन्द्र मोहन ने समीक्षक रूप में पंजाब के लोकगाथा गीत पर महत्वपूर्ण काम करते हुए लोक साहित्य, लोकगीत, लोकगाथा गीत, लोकवार्ता, पद्यात्मक दंतकथा को स्पष्ट कर लोकगाथा गीत को स्वतन्त्र माध्यम के रूप में चिह्नित कर, लोक से जुड़ी विधाओं सम्बन्धी भ्रम को दूर किया।

हिन्दी नाटक और रंगमंच से जुड़ा कुछ ऐसा नज़रिया रहा है, जिसने पूर्वाग्रह अथवा किंवदन्ती का रूप ले लिया है। जबकि डाॅ. नरेन्द्र मोहन समकालीन हिन्दी नाटक और रंगमंच (सं.) एवं नाटकीय शब्द और रंगमंच के माध्यम से नाटक और रंगमंच के रिश्ते की परस्पर पूरकता और सबलता को सामने लाते हैं। वह नाट्यकर्म, रंगकर्म और नाट्यालोचकीय कर्म - इन तीनों के विभिन्न पहलुओं से जुड़े सराकारों की पहचान करते हैं। इसीलिए व्यावहारिक धरातल पर वह अपने नाटकों के मंचन से पहले निर्देशक, अभिनेताओं के साथ स्वस्थ बातचीत के कई दौरों में शामिल होते रहे हैं।

समकालीन साहित्य के नये पैटर्न रेखांकित करते हुए उन्होंने आलोचना के कुछ नये मानदण्ड स्थापित किये हैं जिन पर ग़ौर करने की ज़रूरत है। उन्होंने विचार कविता के साथ लम्बी कविता एवं काव्य भाषा के साथ कवि की रचना-प्रक्रिया का आकलन करने की पहल की। विचार कविता के न केवल प्रतिमानों की खोज और स्थापना की बल्कि इस माध्यम को कविता की एक विधा के रूप में चर्चित भी किया। विचार कविता विशेषांक एवं विचार कविता की भूमिका संपादित पुस्तक उनके इस सारे उपक्रम का कुल परिणाम है, जिसके माध्यम से उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया है कि विचार कविता का विद्रोह मात्र वैचारिक न होकर अनुभूति और कर्म से सम्बद्ध है। विचार कविता में व्यंजित विद्रोह महज़ नकार या निषेध तक सीमित है, इस भ्रम का निराकरण उन्होंने कविता की वैचारिक भूमिका शीर्षक आलोचनात्मक पुस्तक में किया एवं विचार कविता के लिए एक स्वस्थ दृष्टिकोण की प्रस्तावना प्रस्तुत की।

उनके संपादन में लम्बी कविता का रचना विधान व्यापक धरातल पर स्वीकृत हुई। आख्यान से बिम्ब से विचार तक की अन्तर्यात्रा शीर्षक से उन्होंने लम्बी कविता पर भूमिका रूप में जो चर्चा की है, उसे समझे बिना हमें ऐसा लगता है कि लम्बी कविता का पाठ और मूल्यांकन संभव नहीं है। इस पुस्तक से उठे सवालों और पाठकीय/आलोचकीय जिज्ञासाओं का शमन उन्होंने कहीं भी कविता खत्म नहीं होती तथा विचार और लहू के बीच संपादित पुस्तकों की भूमिकाओं में किया है। इसके अतिरिक्त समय≤ पर उन्होंने लम्बी कविता पर केन्द्रित बातचीत में अनेक प्रश्नकर्ताओं के रू-ब-रू होकर इस काव्य माध्यम की भरपूर पैरवी कर इसकी ज़रूरत का अहसास कराया है। एक स्वतन्त्र विधा के तौर पर लम्बी कविता से उनका लगाव इतना अधिक है कि 2021 में उन्होंने अनुपलब्ध ‘लम्बी कविता का रचना विधान’ के अतिरिक्त लम्बी कविता दस्तावेज एक, दो, तीन शीर्षक से तीन खण्डों को प्रकाशित कराया। लम्बी कविता की पहचान हिन्दी जगत से बाहर करते हुए भारतीय भाषाओं की लम्बी कविताओं को हिन्दी में अनूदित कराकर तीन खण्डों में पाण्डुलिपि तैयार की। कवि होने के साथ एक आलोचक की माध्यम विशेष के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता निश्चय ही मायने रखती है। 

कविता को भाव-स्फूत्र्त, आवेग त्वरित, स्फुट और मुक्तक जैसे विशेषणों के बाड़े तक सीमित करने वाले खेमों के बावजूद नरेन्द्र मोहन ने एक के बाद एक पाँच लम्बी कविताओं की सर्जना की। जिनका विषय विभाजन, पंजाब का आपरेशन ब्लूस्टार, साम्प्रदायिक हिंसा के बीच मानव प्रेम, घरेलू हिंसा के बावजूद अपनी पहचान बनाती महाराष्ट्र की संत कवयित्री बहिणा बाई और अफसपा के विरोध में 14 वर्षों तक आमरण अनशन करने वाली मणिपुर की शर्मिला इरोम से जुड़ा है। दरअसल आत्म, स्मृति और इतिहास या यों कहें कि इतिहास, स्मृति और आत्म का ताना-बाना उनके अवचेतन में कुछ इस तरह बुना कि घटना हो या पात्र उनके यहाँ रचना का हिस्सा बन मिथकीय रूप ले लेते हैं। 

उनकी प्रत्येक लम्बी कविता का अन्त एक उम्मीद, आश्वासन के साथ हुआ है। एक अग्निकांड जगहें बदलता की आखिरी पंक्तियों में युवक जिसकी आँखों में आग है, की पीठ को पथराई आँखों वाले युसूफ़ द्वारा थपथपाना अनेक अर्थछवियों को खोलता है। एक अदद सपने के लिए के शुरू में चेतावनी देने और दुःस्वप्न देखने वाला सहमा कवि सांस्कृतिक विरासत की जड़ों तक पहुँचता है और इस नये स्वप्न को भाषा में तथा भाषा को प्रतीकों में ढालकर साकार करता है। खरगोश चित्र और नीला घोड़ा में दबी-सहमी सुचित्रा दौड़ती है प्रेम के घोड़े पर, लिखती है ज्वालामुखी की कविता, पाती है सलमान को और खोखली रिवायतों को कचरे की भाँति जलाती है। प्रिय बहिणा...में बहिणा बाई घर से बाहर आ, घर पाकर अंततः अपनी पहचान पाती है, स्वयं को व्याख्यायित और स्थापित करती है। खुशबू, परछाई और शर्मिला इरोम में शर्मिला की सन्नाटे भरी चीख़ से बाहुबली को कहीं छिपने की जगह नहीं मिलती। सभी लम्बी कविताएँ सृजन के धरातल पर कवि के भोक्ता से द्रष्टा होने की प्रक्रिया का परिणाम हैं और इन दोनों के बीच का जो महत्वपूर्ण तनाव क्षण वह है वह इनके केन्द्र में है। भोक्ता से मुक्ति के अहसास तक पहुँचने की दृष्टि से ये लम्बी कविताएँ एक ही श्रृंखला की कड़ियाँ कही जा सकती हैं।

लम्बी कविताओं के अतिरिक्त उनके कुल काव्य-विकास को मोटे तौर पर चार चरणों में रेखांकित कर सकते हैं। विद्यार्थी जीवन से कविता करने वाले इस कवि का पहला काव्य-संग्रह 1975 में आया। प्रारम्भिक संग्रहों इस हादसे में, सामना होने पर और एक अग्निकांड जगहें बदलता का मूल स्वर राजनीतिक दुष्चक्र के प्रति वैचारिक आक्रोश से जुड़ा हुआ है। हथेली पर अंगारे की तरह में इस स्वर में थोड़ा परिवर्तन होता है। यहाँ व्यवस्था के दुष्चक्र को ख़त्म करने की जद्दोज़हद के लिए अपना स्वर बुलन्द करता कवि है, साथ ही कुछ प्रेमपरक कविताओं की फैंटेसीपरक अभिव्यक्ति है। एक सुलगती खामोशी से उनके काव्य विकास का तीसरा पड़ाव कविता और कलाओं के सम्बन्ध को रेखांकित करता है। यह सहसम्बन्ध शर्मिला इरोम तथा अन्य कविताएँ, रंग आकाश में शब्द, रंग दे शब्द में परिपक्व होकर नृत्य से कविता संग्रह में चरम उपलब्धि को प्राप्त हुआ। अन्य स्तर पर निजी संदर्भों से जुड़े आत्मगत अनुभव की काव्यात्मक अभिव्यक्ति विभाजन सम्बन्धी कविताओं के अतिरिक्त एक खिड़की खुली है अभी कविता संग्रह में हुई है। 

अपने पहले ही कविता संग्रह में नरेन्द्र मोहन ने आपातकाल की धमक सुन ली थी। उन्हें लगता है ‘मैं वार्तालाप के लिए आतुर होता गया था/और वार्तालाप के लिए अयोग्य बनता गया था!’ मोहभंग की कठोर चट्टान से आज़ाद भारत की चकनाचूर और लहूलुहान तस्वीर एक अग्निकांड जगहें बदलता कविता संग्रह में कई कोणों से ‘सृजन कल्पना’, ’महानगर बोध’, कविता पड़ताली’ में उभरी है। 

प्रारम्भिक तीनों संग्रहों में कवि ने हँसी का मारक सर्जनात्मक प्रयोग किया है। ‘हँसी फूटने पर’, ‘आज़ादी’, ‘हँसते-हँसते’ ‘दीवारें कँपाती हँसी’ कविताओं का कुल निचोड़ है कि सन्नाटा तानाशाह की जान है/और हँसी तानाशाह के सीने में धँसता हुआ तीर’ है।

आतर्नाद और दर्द की लकीर से उपजा अनुभव जब कविता में मेटाफर का रूप लेता है तो काफी प्रभावी होता है। स्त्री और प्रेम पर बहुत कम कविताएँ लिखने वाले नरेन्द्र मोहन ने पत्नी की स्मृतियों से संत्रस्त होकर डायरियों-आत्मकथा में नोटिंग के अतिरिक्त एक खिड़की खुली है अभी, किरदार निभाते हुए कविता संग्रहों में अकेलेपन से भरे दर्द की अभिव्यक्ति की। ‘वह चेहरा’, ‘कलश’ ‘स्मृतिः एक हादसा’, ‘चिड़िया’, ‘एक साल बीत गया’ में कवि के जीवन में पत्नी का महत्व और उनके न होने से आयी स्थायी रिक्तता का अहसास है।

विभाजन के कारण जन्मभूमि लाहौर से बिछड़ने और विस्थापित होने का दर्द निजी के साथ सामाजिक सत्य के रूप में नरेन्द्र मोहन के सम्पूर्ण साहित्य में बार-बार दर्ज़ होता रहा है। ‘कब से’, ‘बाहु फोर्ट से तवी’, ‘क्या नदी मर चुकी है’, ‘वह घर’ कविताएँ विभाजन की स्मृति को वर्तमान तक लाने वाली हैं। नदी का सूखना, रावी में यमुना और यमुना में रावी की छवि, शहर में बेगानापन, बुद्ध की टूटी प्रतिमा, आज़ाद देश में हत्याकांड तथा नरसंहार इन कविताओं की मूल आत्मा है। इस सारे परिदृश्य में शब्द को लेकर सर्जक की मनस्थ्तिि के अनेक रूप काव्य-शिल्प की दृष्टि से देखे जा सकते हैं। इस प्रयास में फैंटेसीपरक विधान, रहस्यात्मक स्पर्श वाली भाषा, विरोधी साहचर्य और बिम्बों का प्रतीकात्मक रूपान्तरण ख़ास है। रंग दे शब्द काव्य-संग्रह के दूसरे अन्तराल ‘शब्द रंग’ की कविताएँ इसी प्रकार की हैं।

कलाओं के प्रति नरेन्द्र मोहन का प्रेम और अनुभूति की प्रबलता इस कदर प्रखर हुई कि पेंटिंग्स और कविता को साथ-साथ रखकर रंग आकाश में शब्द उनका स्वतन्त्र काव्य-संग्रह सामने आया। इस संग्रह में प्रत्येक पेंटिंग और कविता के साथ यह आभास होने लगता है मानो पेंटिंग को देखकर कविता लिखी गयी है और कविता को पढ़कर चित्रकार शामा ने पेंटिंग रची है। नरेन्द्र मोहन पेंटिंग के प्रत्यक्ष बिम्बों के पीछे से झाँकते अप्रत्यक्ष रूपों, अर्थों, ध्वनियों-प्रतिध्वनियों को पकड़ते हुए चित्र और चित्रकार, कला और कलाकार का रिश्ता तलाशते हैं। रंग दे शब्द संग्रह के पहले खण्ड में पेंटिंग आधारित रंगों की भाषा समझने के बाद कवि को पेंटिंग एक कविता लगती है और रंग उसकी अभिव्यक्ति माध्यम, इन रंगों के माध्यम से वह पेंटिंग से आत्म तक और आत्म से अलौकिक लोक तक पहुँचते हैं।  

एक खिड़की खुली है अभी संग्रह में मुख्य रूप से मूर्तिकला और कविता का अभिन्न सम्बन्ध उभरा है। ‘बिन साज संगीत’, ‘त्रिधारा’, ‘पहली बार’, ‘वह मूर्ति’, ‘देखो ज़रा’, ‘तुम्हीं बताओ’, कीर्तिधर!’, ‘प्रश्न’ ‘झिलमिलाता एक साया’ अजन्ता-एलोरा की बिम्बात्मक प्रस्तुति के साथ स्थापत्य कला के जुड़ी कविताएँ हैं। शर्मिला इरोम तथा अन्य कविताएँ के पहले खण्ड में पुतली नाच से जुड़ी कविताओं में जैसे पाषाणी मौन बोल उठा है। नृत्य से कविता संग्रह में नृत्यानुभव की कविताओं के ज़रिए नृत्य में कविता और कविता में नृत्य की लय, गति, ताल का आभास होता है। सभी कलाओं का समग्रता से प्रयोग करने वाले माध्यम रंगमंच पर केन्द्रित उनकी तीन कविताएँ ‘अभिनय में’, ‘रंगमंच में एक परिन्दे का वास है’ तथा ‘ऐसा तो कभी नहीं सोचा था’ कविता में रंगमंच को उतारती है। गद्यात्मकता के बावजूद उनकी ‘डायरी कविताएँ’ शब्दगत तथा अर्थगत लय के मुकाबले बहुत गहरा प्रभाव डालती हैं। एक खिड़की खुली है अभी तथा किरदार निभाते हुए कविता संग्रहों की ‘डायरी कविता’ श्रृंखला में एक असहनीय और अपरिमित अकेलेपन का दर्द भरा अहसास और स्मृतियों का साया चित्त को अशान्त किये रहता है।

हादसों से विचार तक, आत्म से परिवेश तक, कविता से कला तक अन्तर्यात्रा करते हुए नरेन्द्र मोहन ने समकालीन परिदृश्य के बीच वैचारिक बेचैनी को अनुभव एवं विचार के संतुलन से साधा है। इस प्रक्रिया में बाहरी दृश्य ने भीतरी कंदराओं को अनेक धरातल पर झकझोरा। परिणामस्वरूप मिनी या माइक्रोस्कोपिक कविता के साथ विचार कविता, लम्बी कविता, डायरी कविता के विविध विधानों को काव्याभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर प्रयोगधर्मिता से परहेज़ नहीं किया। इस प्रकार उन्होंने कविता के संदर्भ में सनातन तौर पर घोषित कर दी गयी सामन्ती मान्यताओं को न केवल तोड़ा बल्कि उनके स्थान पर बहुत कुछ रचनात्मक और मौलिक प्रदान किया।

कलाओं का समग्रतः प्रयोग करने वाले अभिव्यक्ति माध्यम नाट्य सृजन की ओर वह 1980 से गतिशील हुए। कुल नौ नाटकों के इस रचयिता को सच का जोखिम उठाने और उसके लिए सिर हथेली पर सजाकर चलने वाले चरित्र - चाहे वह ऐतिहासिक हो या अपने दौर के - हमेशा ही प्रभावित करते रहे हैं। दूसरे, अपनी ही राख से फीनिक्स पक्षी की तरह फिर से अस्तित्व सम्पन्न होने वाले विद्रोही उनके नाटकों में कभी कबीर (कहै कबीर सुनो भाई साधो), तो कभी तुकाराम (अभंग गाथा), कभी रंगनाथ और उसका परिवार (मंच अंधेरे में), तो कभी मलिक अंबर (मलिक अंबर)जैसे केन्द्रीय चरित्र बन जाते हैं। विद्रोह और मौन, सच और स्वप्न, तख़्त और तख़्ता, व्यक्ति और व्यवस्था के विरोधी छोर के बीच उनके नाटक आज के विसंगत माहौल में हरक़त भरे शब्दों के माध्यम से ज़िन्दा रहने का अहसास कराते हैं। कथ्य के अभाव में शैलीप्रधान होते जा रहे नाटकों के बीच कबीर, कलन्दर, तुकाराम, जिन्ना, अंबर हब्शी जैसे चरित्रों की रचना से अभिनेताधर्मी रंगमंच की परिकल्पना को उन्होंने साकार किया तथा कलन्दर, कहै कबीर सुनो भाई साधो, सींगधारी, अभंग गाथा जैसे नाटकांे ने जनजीवन में व्याप्त लोकधर्मिता को प्रश्रय दिया।

नरेन्द्र मोहन अपने चिर-परिचत नाटकों कहै कबीर सुनो भाई साधो, सींगधारी, कलन्दर, नो मैन्स लैंड, अभंग गाथा और मलिक अंबर में इतिहास से जुड़े रहे हैं। एक तो स्मृति और इतिहास नाटककार के सृजन का मूल आधार है। दूसरे, उनके नाटक किसी-न-किसी रूप में विसंगति से जुड़े हैं - राजनीतिक विसंगति (सींगधारी), विभाजन से विसंगत हो गयी आज़ादी (नो मैन्स लैंड), सामाजिक हित में आडम्बरपूर्ण जीवन शैली के प्रति विद्रोह करने वाले का संकट (कहै कबीर सुनो भाई साधो), निर्मम सच से बौखलाई व्यवस्था का आतंक (कलन्दर), धर्म, हाकिम और सŸाा की कपटपूर्ण भाषा के सामने शब्द के लिए जीने-मरने की करुणामय स्थिति (अभंग गाथा), राजनीतिक-सामाजिक दुराग्रह (मिस्टर जिन्ना), रंगमंच और कलाकार पर ख़तरा (मंच अंधेरे में, हद हो गई यारो!), गुलाम से वज़ीरे आज़म बनने की गाथा (मलिक अंबर)। उन्हें सच जानने, मानने, कहने की सामर्थ्य रखने वालों ने हमेशा आकर्षित किया है - कभी उन्हें कबीर का विद्रोही रूप भाता ह,ै तो कभी कलन्दरों की अक्खड़ता और कभी तुकाराम का सत्य कहने और उसे अमल में लाने का साहस। यहाँ ध्यान देने की बात है कि ये सभी चरित्र व्यवस्था के जंगलीपन का शिकार हुए हैं, लहूलुहान हुए हैं और उसे सभ्य बनाने की छटपटाहट सभी में है।

कुल पन्द्रह दृश्यों वाला नाटक कहै कबीर सुनो भाई साधो पहले दृश्य में वर्तमान से जुड़कर भी दूसरे दृश्य से इतिहास की ओर छलांग लगाना शुरू करता है। कबीर के दोहे तथा पदों की संगीतात्मक अभिव्यक्ति से भक्तिकालीन इस संत कवि के साथ सच को कहने, सच को जीने और सच के लिए हर क़ीमत चुकाने वाले किसी भी दौर के इन्सान का संघर्ष रूपायित हुआ है। कलन्दर नाटक में तेरहवीं शताब्दी की स्थितियों को काल्पनिक पात्र बुद्धू के माध्यम से बीसवीं सदी के संदर्भ से सीधे-सीधे जोड़ दिया गया है इसलिए नाटक में वर्णित इतिहास हमारा अपना लगता है। 21वीं शताब्दी में शब्द को मीडिया से मुक्त कराने की जो कोशिश की जानी चाहिए वह ‘अभंग-गाथा’ में 16वीं सदी के मराठी संत कवि तुकाराम के माध्यम से शब्द को व्यवस्था से मुक्त कराने की छटपटाहट और संघर्ष के रूप में मिलती है। नाटक में यह संघर्ष बहुआयामी बन पड़ा है। अभंग की भाषा मौन की अभिव्यंजना शक्ति को स्पष्ट करती है। नाटक में शब्द का सटीक और सार्थक प्रयोग कई स्थानों पर इस खूबी के साथ किया गया है कि वहाँ शब्द विपर्यय की गुंजाइश ही नहीं रहती। नाटककार ने प्रत्यक्ष दखलअंदाजी न करके पात्रों के संवादों के बीच से उनकी चारित्रिक विशेषताओं को उभारा है। सींगधारी में लोककथा की संगति में यथार्थ और यथार्थ की संगति में लोककथा के नाट्य विधान की परिकल्पना से वर्णनात्मकता पर अंकुश संभव हो सका है। अपने प्रारम्भिक रूप में ज़िन्दा-मुर्दाबाद शीर्षक से खेला गया नाटक नो मैन्स लैण्ड बंटवारे की त्रासदी के साथ उसकी विसंगति को भी तल्खी से पेश करता है। मिस्टर जिन्ना में सच कहने और उसे सामने लाने का जोखि़म खुद नाटककार ने उठाया है। हिन्दुस्तानी मनस् में बसी जिन्ना की छवि को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने के क्रम में ‘मिस्टर जिन्ना’ नाटक लिखा गया है। पूर्वाग्रहों से मुक़्त हकीक़त से रू-ब-रू होकर लिसलिसाती भावुकता और साम्प्रदायिक ईष्र्या से परे इतिहास के आईने में मनोवैज्ञानिक नज़रिए से जिन्ना की पहचान नाटक में की गयी है। 

मंच अंधेरे में नरेन्द्र मोहन का ऐसा नाटक है जिसमें नाट्यधर्मिता के कई नये और अनछुए पहलू पहली बार उजागर हुए हैं। व्यवस्था और रंगमंच के विरोधी ध्रुवों पर गतिशील इन नाटक में एक तरफ सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक अवमूल्यों का बढ़ता वर्चस्व है। दूसरी ओर सकारात्मक परिवर्तन की चाह से उत्पन्न वैचारिक संकल्प विचार, अभिव्यक्ति और कर्म के धरातल पर रूपायित होना चाहता है। इन दोनों की परस्पर टकराहट के कलेवर में यह नाटक बुना गया है। इसे लिखने के पीछे नरेन्द्र मोहन के नाटक मिस्टर जिन्ना के प्रदर्शन पर लगी रोक से जन्मी लेखकीय मानसिकता है। एक अन्य कारण आपातकाल में मानवता को शर्मसार करने वाले घटनाचक्र को रूपायित करना है जिस में आज़ादी से लिखने और वैचारिक अभिव्यक्ति की क़ीमत चुकाने का ज़िक्र है। इस नाटक में कठपुतली और मुखौटों के धरातल पर सर्वथा भिन्न और नवीन प्रयोग मिलता है। सीधे-सीधे देखें तो कठपुतली प्रयोग से पात्र-आधिक्य पर रोक संभव हुई है। लोक परम्परा में कठपुतली लोकरंजन करती है जबकि नाटक में दहशत का कारण है। हद हो गई यारो! नाटक स्थापत्य के धरातल पर ऐतिहासिक कथा से मुक्त है। नाटक में राजतन्त्र है ज़रूर किन्तु वह लोकतान्त्रिक व्यवस्था का ही रूपक है। जिसके चार पायदान हैं - दलित (बाबर), धर्म (स्वामी), बाहुबली पूंजीपति (कुंदन), जज (कानून)। नाटक की कथा पूरी तरह से नाटककार की सर्जनात्मक कल्पना पर केन्द्रित है। इसकी भाषा चरित्रों की प्रकृति के अनुसार है। नाटककार की स्मृतियों का कहीं दखल नहीं है। नाटक में बोल्ड शब्दावली की भरमार चरित्रों की  वास्तविकता को उघाड़ती है। नाटक के भीतर एक रंगमंच है जो रंगकर्म के साथ विद्रोह की चेतना जगाने का काम करता है।

साहित्यिक मंच पर सर्जनात्मक कला के माहिर नरेन्द्र मोहन में लेखकीय जुनून इस हद तक रहा कि कोरोनाग्रस्त होने के बावजूद उन्होंने अस्पताल में भी कलम का साथ नहीं छोड़ा। 7 मई 2021 की उनकी हस्तलिखित नोटिंग से यह अन्दाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है कि उनकी उंगलियों में लाखों बार क़लम-कागज़ का साथ निभाने वाली जुंबिश नहीं रही लेकिन लेखकीय सरोकार ज्यों के त्यों बल्कि कहना चाहिए पहले से भी ज़्यादा पुरज़ोर उड़ाने भर रहे हैं। भला ऐसा क्यों न हो? आखि़रकार यही तो उनकी इच्छा रही कि इस जन्म का लेखक अगले जन्म में भी उनका पीछा करता रहे। ऐसे सृजनधर्मी क़लम के सच्चे सिपाही को सादर प्रणाम!