अभिनव इमरोज़ सितंबर अंक 2021



 इस अंक में

  1. किरण यादव, ग़ज़ल
  2. श्री अजित कुमार राय, कविताएँ
  3. प्रो. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, सम्पादकीय
  4. प्रो. दिनेश चमोला का प्रो. शिवगोपाल मिश्र के साथ साक्षात्कार
  5. प्रो. शिवगोपाल मिश्र, सम्मतियाँ
  6. श्रीमती मेधावी जैन, आत्मकथ्य
  7. डाॅ. सरोजिनी प्रीतम, व्यंग्य
  8. डाॅ. नमिता सिंह ‘‘आराधना’’, कविता
  9. डाॅ. रंजना जायसवाल, व्यंग्य
  10. श्री हृषीकेश वैद्य, कविता
  11. डाॅ. शोभा रतूड़ी, कविताएँ
  12. श्रीमती मुक्ति वर्मा, कविता
  13. श्रीमती प्रभा कश्यप डोगरा, संस्मरण
  14. श्रीमती अरुणा शर्मा, कविता
  15. डाॅ. प्रज्ञा शारदा, कविता
  16. डाॅ. विभा रंजन ‘कनक’, कविता
  17. डाॅ. सान्त्वना श्रीकांत, कविता
  18. श्रीमती नेहा वैद, कविताएँ
  19. डाॅ. रवि शर्मा ‘मधुप’, लेख
  20. श्रीमती दीपक शर्मा/गगन गिल, प्रतिक्रिया
  21. श्री राकेश गौड़, कविताएँ


1.

किरण यादव, दिल्ली, मो. 9891426131


ग़ज़ल

अब तो  बस ये  ठाना है

इक दिन तुझको पाना है


वक्त   लगेगा   भरने  में

दिल का जख़्म  पुराना है


छोड़ो  मेरे  दिल  का क्या

पागल   है,    दीवाना   है


रिश्ते क्या हैं ?  अपनों  से

हरदम   धोखे    खाना   है


जीवन   है   बहता   दरिया

जिसको   बहते   जाना   है


2.  

अजित कुमार राय, -कन्नौज, उत्तर प्रदेश, मो. 9839611435


कविता

नरमेध (टीचरश्स डे पर)



(एक नया दलित-सौन्दर्य-शास्त्र)

हमारी ‘निराकारता‘ पर माया का ‘पर्दा डालने वाले 

शिक्षा-सचिव ने

चलाया है ‘शब्दभेदी बाण‘, 

माता-पिता की काँवर ढोने वाले 

न जाने कितने श्रवणों को आहत करने के लिए;

 हुई है ‘मनुष्यता‘ क्षत-विक्षत, 

जारी किया है बेहूदा ‘फतवा‘ 

‘मानकातीत‘ शिक्षकों को निर्वासित करने के लिए 

‘असहायिक‘ महाविद्यालयों से। 

‘यूज एण्ड थ्रो‘ संस्कृति के पुरस्कर्ता 

आक्रमण करते हैं उन ठठरियों पर-

जो जली खिचड़ी खाकर, 

फटा जूता पहने 

दौडते हैं विद्यालय की ओर रविवार को भी, 

अपनी जुबान सिले-शीतलहर में भी, 

ग्रीष्म के तप्त अन्धड़ में भी, 

‘एक्स्ट्रा पीरियड‘ पढ़ाने के लिए 

46 किमी. ‘बूढ़ी‘ साइकिल चलाकर, 

खुद को ‘जलाकर‘, 

जो रोशनी पैदा करते हैं, 

वे खुद ‘अँधेरे‘ में हैं,

8 वर्ष 90 प्रतिशत रिजल्ट देकर भी

वे अयोग्य हैं, 

अनुभव की आँच में पककर भी। 

प्रथम श्रेणी के छात्रों को पैदा करने वाले 

ये शिक्षक अभी पैदा नहीं हुए, 

नहीं हुआ है जन्म उनका आयोग की आँख में। 

ये संस्थाएँ आचार्य राम चन्द्र शुक्ल‘ पैदा करती हैं, 

जो इण्टर पास कर एम.ए. को पढ़ाते हैं, 

जिन्हें स्वर्ग के वैभव के बीच, 

अपने ‘नन्दनवन‘ में विहार करने वाले 

आयोग के पैगम्बरों‘ ने अभी नहीं नापा है

धरती के ‘गुरुत्वाकर्षण‘ से बँधे 

इन आश्रमी साधकों का ‘आदम कद‘। 

‘सामान्य ज्ञान‘ के स्केल से नापा जाना है 

इन असामान्य, आसाधारण प्रतिभाओं को। 

ये धृतराष्ट्र सदा से 

पांडवों को ‘निर्वासित‘ करने के लिए 

जारी करते रहे हैं- ‘अन्धा-कानून‘। 

इस प्रकार इन साधकों की ‘योग्यता‘ पर 

प्रश्न-चिन्ह लगाकर स्वयं 

प्रशासन ने दे दिया है अपनी अयोग्यता का प्रमाण-पत्र‘। 

इन शिक्षकों का 

प्रायोजित ‘चीरहरण‘ देखने वाले 

भीष्म और द्रोणाचार्यों की भी कमी नहीं है, 

‘शिक्षक-संघ‘ सर्वोत्कृष्ट ‘तमाशाई‘ है, 

जिनमें अधिकांश ‘थर्ड डिवीजनर्स‘ 

और ‘नॉन पी. एच. डी.‘ हैं, 

और कुछ ‘बौद्धिक विकलांग‘ भी। 

किन्तु उन्हें तो आयोग ‘आरक्षण‘ देता है।

और अपने ‘शिक्षा-नीति‘ निर्धारकों 

(सांसदों-विधायकों)  

की योग्यता पर

(जिनकी न्यूनतम योग्यता ‘निरक्षरता‘ है) 

कभी नहीं खड़े करता सवाल। 

उनके लिए कभी खाली नहीं होता ‘कुबेर‘ का खजाना 

उनका वेतन दिन-दूना, 

रात चैगुना बढ़ता है 

उनका ‘पुष्पक विमान‘ चाँद पर चढ़ता है। 

रोज लागू होती है ‘रस्तोगी कमीशन‘ की 

सिफारिशों पर सिफारिशें;

किन्तु जिन्हें अगणित छात्रों और अभिभावकों का 

‘लोकतांत्रिक‘ समर्थन प्राप्त है, 

जिन्होंने संस्था की प्राचीर पर 

घिस दी अपनी ‘भाग्य-लिपि‘, 

अपनी जवानी की लाश पर खड़ी की 

संस्था की इमारत, 

ज्ञान-यज्ञ के अनुष्ठान में 

ेकर दिया अपना सर्वस्व स्वाहा, 

खुद को जला दिया 

उनकी आँखों के काजल‘ के लिए, 

उन प्राणायामी ‘भिक्षुओं‘ के लिए 

कुबेर के घर में ‘छूतक‘ है, 

मर गया है उनके भीतर का आदमी, 

दीवालिया हो गई है अकादमी।

नोच डाले हैं ‘सोन चिरैया‘ के पंख 

इन मांसभक्षियों ने, 

ये कुशल ‘आखेटक‘ हैं। 

पर ये नहीं जानते कि

कृष्ण केवल ‘बाँसुरी‘ नहीं बजाता, 

वह ‘चक्र‘ उठाना भी जानता है, 

इन ‘दधीचि‘ की हड्डियों में वह ताकत है, 

कि कर सकती हैं सहस्रों ‘वृत्रासुरों‘ का बध।

अर्थ-तंत्र के ‘टूटे पहिए‘ से 

अभिमन्यु की तरह 

‘ब्रह्मास्त्रों‘ से ले सकती हैं लोहा। 

इन ‘महावीरों‘ को मत छेड़ो 

‘विराट रूप‘ दिखाने के लिए, 

अन्यथा तुम्हारी ‘सोने की लंका‘ भस्म कर दी जाएगी। 

वह ‘स्वर्ण भस्म‘ उपचार के काम आएगा उनके, 

जिन पर बिना एक पैसा खर्च किए 

आयोग अभिभावक बन जाता है, 

जैसे बिना ‘प्रसव-पीड़ा‘ झेले

मैनेजर महतारी बन जाते हैं।

ये जीवन का नहीं,

‘मृत्यु का बीमा‘ कराते हैं, 

हमें किश्त दर किश्त ले जाते हैं।

‘‘ये जिसकी पीठ ठोंकते हैं

उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है।‘‘ 

ये जिसे सूंघते हैं, 

उसकी चेतना सदा के लिए सो जाती है। 

ये हर जगह षड्यन्त्र ‘सूंघते‘ हैं, 

ये उस शिक्षक को पसन्द करते हैं 

जो इनके ताल पर ‘टेर‘ भरता हो। 

ये ‘जूते‘ की तरह रोज शिक्षक बदलते हैं, 

हमारे कंधे पर पैर रखकर चलते हैं। 

हम तो ठेले वाले और ‘खोंमचेवालों को भी 

प्रणाम करते चलते हैं,

क्या पता, कल वह 

हमारे महाविद्यालय का मैनेजर हो जाय। 

माना कि मैनेजर ‘बौने‘ हैं, 

पर हम उनके हाथ के ‘खिलौने‘ हैं। 

ये हमारा खून पीकर मोटे हो जाते हैं, 

हमें बड़ा करने पर खुद छोटे हो जाते हैं।

ओ मार्क्सवादियों! 

मजदूर-किसान के इकलौते अभिभावक!! 

आओ देखो, 

हम मजदूरों के भी मजदूर हैं, 

एक मजदूर के बराबर भी

हमें ‘दैनिक मजदूरी‘ नहीं मिलती;

हम जितना रोज कमाते हैं, 

उतना एक मजदूर सिगरेट के धुएँ में उड़ा देता है। 

सरकारी कर्मचारी जितना 

‘इन्क्रीमेन्ट‘ लगवाने के लिए हड़ताल करते हैं, 

हम उतना ही वेतन पाते हैं, 

फिर भी वे पड़ताल करते हैं। 

वे ‘रामराज्य‘ जीते हैं 

और हम ‘कृष्ण जन्माष्टमी;

जाने हमारी कितनी आकांक्षाओं 

की ‘भ्रूणहत्या‘ की है उन्होंने। 

हम वसुदेव की भाँति बेड़ियों में बँधे हैं;

सात पीढ़ियाँ पैदा की हैं हमने;

किन्तु अब समय आ गया है 

चेतना को ‘मुक्ति‘ का उपहार देने का। 

अपने हक के लिए 

एक नए महाभारत के प्रस्थान के लिए 

शंख फूंकने और सिंहनाद करने का,

कि हमारी हुंकार से 

डोल उठे धरती,

काँप उठे आकाश

और सागर आन्दोलित हो उठे;

हमारे गम्भीर घोष की प्रतिध्वनि 

तोड़ दे नींद ‘इन्द्र के सिंहासन‘ की। 

रक्त में सने कापालिकों के। 

भैरव-नृत्य के छन्द में गूंजती धनुष-टंकारों से, 

ध्वनि-संघातों से ज्वालाएँ फूटें और 

फूत्कार करें ‘मणिधर‘ नाग 

कि हमारे ‘अग्निबाण‘ से 

सागर का पानी खौल उठे;

काम आघूर्णित-आवर्तनशील 

अरुण नील जल-राशि के तट पर 

आयोजित हो शौर्य सूचक शूरों का ‘महाकुम्भ‘ 

क्रान्तिनाद की यात्रा में 

घोड़ों की टापों से उड़ने वाली धूल 

बादल बन कर ढाँक ले ‘सूर्य मण्डल‘ 

सुदर्शन चक्र की भाँति, 

ताकि हो सके हमारी प्रतिज्ञा पूरी। 

हमारी आणविक ऊर्जा का विस्फोट 

तुम्हारी हिरोशिमा पर 

बना दे अपना पद-चिह्न, 

शैल-शृंग ‘समतल‘ हो जायें, 

इस आशय की चोट लगा दें, 

‘नक्षत्र‘ टूट कर पिघल-पिघल कर 

बह जाएँ-वह आग लगा दें। 

कि आज भी तलवार की नोंक से 

लिखा जाएगा इतिहास,

भूख कर रही है अट्टहास, 

‘समान आचार संहिता‘ वाले

इस देश के हम ‘नागरिक‘ तो हैं, 

पर हमें जीने का अधिकार नहीं 

जीने का अधिकार उन्हें है, 

जिन्हें आयोग या प्रशासन का ‘वरदान‘ प्राप्त है। 

हम तो अपने शिविरों में ‘शरणार्थी‘ की तरह जीते हैं। 

हमें भी अपनी जमीन की तलाश है। 

हम दलितों के लिए धरती पर तो नहीं, 

यमलोक की सेवाओं में, 

‘स्वर्ग‘ में आरक्षण प्राप्त है।  

आप ‘परियों के ख्वाब‘ से 

हमारी भूख का पेट भरता रहता है

और ‘चुभलाते‘ रहते हैं हम सपनों की मिठास को। 

मान लो, हम स्वर्ग के अभ्यर्थियों को 

स्वर्ग मिल भी जाय, 

तो क्या वहाँ उर्वशी हमें गले लगाएगी - 

जब पॉकेट में अठन्नी‘ भी नहीं पाएगी? 

या किसी ‘हर्षद मेहता‘ के साथ भाग जाएगी, 

‘सूक्ष्म शरीर‘ की शेष हड्डियों की नीलामी कराएगी 

स्वर्ग में भी तो हमें 

‘वित्तविहीन‘ मान्यता ही मिलेगी। 

तुम किस दलित-साहित्य के 

‘पिंगलशास्त्र‘ में ढूँढते हो 

नायक और ‘नायिका-भेद‘? 

करो हमारा ‘नख-शिख‘ वर्णन, 

हम तीस वर्ष के ‘बूढ़े हो गए हैं, 

गरीबी की आँच में पक गए हैं हमारे बाल। 

‘विषाद‘ हमारा स्थायी भाव‘ 

और उल्लास ‘संचारी भाव‘। 

क्या हमें भी ‘कंचन-मृग‘ लंका तक भटकाएगा? 

हे देवताओं! 

क्यों ‘पत्थर‘ हो गए हो हमारे लिए? 

नित नए ‘भोग‘ तो चढ़ते ही हैं तुम्हारे लिए। 

जहाँपनाह!

 आप तो ‘पुष्पक विमान‘ पर चलते हैं, 

शरीर पर ‘अंगराग‘ और ‘कस्तूरी‘ मलते हैं, 

पर हम तो अपने ‘भस्म‘ से छात्रों की ‘नजर झाड़ते‘ हैं, 

रोज अपने जीवन-ग्रन्थ का एक पन्ना फाड़ते हैं, 

पूरा करते हैं एक ‘महाकाव्य‘। 

हे संस्था के पुरोहितों! 

आज राजनीति के ‘पाठ्यक्रम‘ रोज बदलते हैं, 

समय के पंचांग‘ पिघलते हैं, 

सत्ता की सम्पूर्ण सुविधाओं पर कुंडली मार कर बैठे 

अजगर ‘मनुष्य‘ को निगलते हैं। 

हम संस्था के ‘अंडे‘ को मुर्गी सा सेते हैं, 

किन्तु जब उसमें ‘पंख‘ आते हैं, 

तो वह हमारी ‘पकड़‘ से बहुत दर निकल जाती है। 

हम संस्था के खिलने वाले फूल के लिए 

‘खाद‘ बन जाते हैं, 

किन्तु उसके फूल ‘सेज‘ बन जाते हैं 

प्रबन्धक के ‘साले-सालियों के लिए;

तब संस्था भावज‘ की भाँति 

वाली हमसे शर्माती है,

आँख चुराती है। 

‘आत्म-दान‘ की प्रेरणा से परिस्फर्त्त 

हम ‘लोकमंगल‘ के लिए खुद को निचोड़ देते हैं 

‘द्राक्षारस‘ की भाँति

इस निचुड़े दामन के ‘श्रम-जल‘ से 

फरिश्ते भी ‘वजू‘ करेंगे। 

‘‘बादलों की चादर ओढ़कर सोने वाले 

ओ चाँद! 

तुम्हारी तबीयत तो ठीक है!’’


3.

प्रोफेसर (डॉ.) दिनेश चमोला ‘शैलेश,‘’, डीन,  आधुनिक  ज्ञान  विज्ञान संकाय एवं अध्यक्ष,  

भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान विभाग, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार

* 23, गढ़ विहार,  फेज -1, मोहकमपुर, देहरादून -248005, मो. 09411173339


संपादकीय

ऐसे विरल व्यक्तित्व होते हैं जो स्वाध्याय, तप व लेखन से ज्ञान, विज्ञान और साहित्य की त्रिवेणी को प्रवाहित कर इस सुदीर्घ परंपरा को अक्षुण्ण  रखते हुए स्वयं ही परंपरा के पर्याय हो जाते हैं। ऐसे लोकोपकारी वटवृक्ष की छाया में एक साथ ज्ञानोन्मुखी जीवों की कई-कई पीढियां न केवल प्राश्रय पाती हैं, बल्कि उनकी असाधारण साधना व शक्ति से प्राण-प्रतिष्ठित होकर, वे उस प्राप्त ज्ञान-संपदा से समूचे जड़-चेतन का दिशाबोध कर स्वयं को धन्य मान इस परंपरा के सतत प्रचार-प्रसार में सनद्ध रहते हैं। ज्ञान परंपरा के संवाहक ऋषि-तुल्य स्वप्नद्रष्टाओं की जीवनयात्रा के शुभारंभ से संकल्प के निकष तक, न वाणी विश्राम लेने का नाम लेती है, न चिंतन की नैसर्गिक स्फुरण धारा.. और न लेखनी का अजस्र प्रवाह ही। इनकी अटूट साधना के सम्मुख  स्वयं काल भी अपनी उपादेयता सुनिश्चित करने में हिचकिचाता है। ऐसे ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं प्रो. शिवगोपाल मिश्र।

प्रो. मिश्र, साहित्य व विज्ञान के उन विरल लेखकों, चिंतकों, अनुसंधानकर्ताओं व विज्ञान संचारकों में हैं जिन्होंने अपनी ऊर्जावान लेखनी से साहित्य, विज्ञान व अनुसंधानात्मक साहित्य की पावन भावधारा, विगत सात दशकों से देश-विदेश में प्रवाहित की है। वे आज भी इस भावसेतु की सुदृढ नीव बन, शब्द की साधना कर रहे असंख्य भावप्रवण जिज्ञासुओं, शिक्षकों, शोधार्थियों व हिंदी-सेवियों को सृजन-चिंतन की अनन्य प्रेरणा प्रदान कर सुखानुभूति का अनुभव करते हैं। उनके सृजनात्मक साहित्य का अवलोकन व अध्ययन करने वाले सुधी पाठकों के लिए उनके प्रखर वैज्ञानिकता वाले गंभीर विषयों के लेखन की कल्पना अवश्य विस्मित कर सकती है व ठीक उसी के समानांतर उनके विज्ञान लेखन व अनुसंधानात्मक विशद कृतित्व को देखने वालों के लिए उनके प्रभूत लोक-चेतनापरक साहित्य की प्रभविष्णु शैली भी। उनका अधिकांश समय स्वयं के सृजन तथा दूसरों के लिए अध्ययन, चिंतन व सृजन की प्रेरणाभूमि जुटाने में ही व्यतीत होता है। जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण ज्ञानदान व ज्ञानचिंतन के लिए समर्पित हो, ऐसे सारस्वत मनीषियों के संसर्ग व सान्निध्य की कल्पना आने वाले समय में अत्यंत दुर्लभ होगी। आज भौतिकता की दौड़ में, साधना के ऐसे विरल व्यक्तित्वों का सुखद सहचर्य प्राप्त होना परम सौभाग्य का विषय है। अबाध गति से विगत उनहत्तर वर्षों से विज्ञान लेखन तथा छियासठ वर्षों से साहित्य सृजन में तल्लीन ऐसे मनीषि की छत्र-छाया में निर्दिष्ट गंतव्य की ओर अग्रसर होना निश्चित रूप से किसी के लिए भी गर्व का विषय हो सकता है। इतने विशिष्ट व गरिमापूर्ण व्यक्तित्व व कृतित्व के धनी होते हुए भी उनकी धीर, वीर, गंभीरता व सहजता मुग्ध करने वाली है।

मिश्र जी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी है। विज्ञान परिषद के प्रधानमंत्री के रूप में आपकी विलक्षण सेवाओं को निरंतर याद किया जाएगा।

आपके प्रमुख संपादन में अनवरत प्रकाशित हो रही ‘विज्ञान‘ पत्रिका का पत्रकारिता व विशेषकर हिंदी विज्ञान लेखन एवं विज्ञान पत्रकारिता के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जिस समर्पण, निष्ठा व कर्तव्यपरायणता के साथ आपने विज्ञान पत्रकारिता व विज्ञान संचार को दिशा व नवीन दृष्टि प्रदान की, उस मार्ग का अनुसरण कर सफल होना किसी के लिए भी गौरव के क्षण हो सकते हैं।

सी.एस.आई.आर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान से लगभग 22 वर्षों तक चर्चित हिंदी पत्रिका ‘विकल्प‘ के संपादन के दौरान प्रो. मिश्र की सुदीर्घ हिंदी सेवा व हिंदी में विज्ञान लेखन की इस अपूर्व परंपरा का परिचय व सहयोग पाने के अनेक सुअवसर प्राप्त हुए जिनमें उनका भरपूर सहयोग मिला। मेरा प्रयास रहता कि कुछ वैज्ञानिक महत्त्व के ऐसे विषयों पर विशेषांक निकाले जाएं जिन पर हिंदी में सामग्री की अत्यल्पता हो। जब भी मैं इन विषयों की सामग्री की बात प्रो. मिश्र जी से करता वे तत्काल परिषद की ओर से लेख भिजवाने का न केवल आश्वासन देते बल्कि हर विशेषांक के लिए स्वयं भी लेख लिखकर उस कार्य में भरपूर सहयोग देते। वे विज्ञान के विषयों पर हिंदी में कार्य करने वालों का अत्यंत सम्मान करते। तन, मन, धन से विज्ञान परिषद की गतिवधियों को पूरी तत्परता व निष्ठा से इस वय में भी वे सतत नेतृत्व प्रदान करना उनके परिश्रमसाध्य व कर्मशील व्यक्तित्व का परिचयक है।

इधर विगत कुछ माहों से ‘अभिनव इमरोज़‘ के विशेषांकों की कड़ी में इस यात्रा को गति देने के उद्देध्य से बहल जी के आग्रह पर कुछ विशिष्ट व्यक्तित्वों के साक्षात्कार की शृंखला कड़ीवार चल रही है जिसका विद्वत समाज में भरपूर स्वागत हो रहा है।  विभिन्न प्रांतों के हिंदी सेवियों की इस साक्षात्कार शृंखला में प्रो. मिश्र जी का यह व्यक्तित्व व कृतित्व की समग्रता लिए यह साक्षात्कार निश्चित रूप से पत्रिका के पाठकों को चिंतन के नवीन क्षेत्रों में निरंतर आगे बढ़ने की ऊर्जा व प्रेरणा देगा। इससे कार्यालयों में हिंदी में मौलिक लेखन करने वाले लेखक, अधिकारी व कर्मचारीवर्ग भी लाभान्वित होंगे।

प्रो. मिश्र जी के सुखद स्वास्थ्य, निरंतर विज्ञान लेखन एवं साहित्य के भंडार की श्रीवृद्धि करने तथा अपनी सारस्वत साधना जारी रखने हेतु अनंत मंगलकामनाएं। पुनः हिंदी दिवस, 2021 की हार्दिक शुभकामनाओं  के साथ



4.


प्रो. चमोला: मिश्र जी, सर्वप्रथम अपने जन्म, शिक्षा-दीक्षा, प्रारंभिक दिनों के बारे में तथा अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताएं।

प्रो. मिश्र: मेरा जन्म एक ग्रामीण परिवार में हुआ। मेरे पिता साक्षर थे किन्तु माता निरक्षर थीं फिर भी उन्होंने अपनी सभी सन्तानों को शिक्षित बनाया। हम छः भाई और दो बहने थीं। हमें पढ़ने प्राइमरी स्कूल में जाना पड़ता जो गाँव से 5-6 मील दूर था। गाँव के कई अध्यापक उसमें पढ़ाते थे। 

1940 में पिता जी का अचानक देहान्त होने के कारण मुझे कक्षा 4 उत्तीर्ण करने के बाद अपने बड़े भाई पं. रामगोपाल मिश्र के पास रहकर आगे की पढ़ाई करनी थी। वे किशुनपुर डाकखाने में पोस्टमास्टर पद पर थे, यही पिताजी ने अन्तिम सांस ली थी। एक वर्ष में घर पर रहकर अंग्रेजी सीखता रहा। अगले वर्ष मेरे भइया का तबादला फतेहपुर हो गया तो वे मुझे भी साथ लेते गये और वहां के गवर्नमेंट हाई स्कूल में कक्षा 6 में भर्ती करा दिया। मैंने 1946 में वहीं से प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। मैं पढ़ने में अच्छा था। कक्षा 6 से 10 तक सर्वप्रथम आता रहा। हाई स्कूल में मुझे मेरिट स्कालरशिप मिली। 

प्रो. चमोला: आठ बहन भाइयों के परिवार में आप का रहन-सहन, खान-पान जैसेे कुछ ऐसे रोचक तथ्य जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे, उनके बारे में बताएं। तब के परिवार भाई-बहन और अब के परिवार में कितनी साम्यता अथवा अंतर आपको दिखाई देता है?

प्रो. मिश्र: हम आठ भाई-बहन थे। एक भाई छोटा था और दोनों बहनें भी मुझसे छोटी थीं। ऐसा कोई स्मरण नहीं है जब हम भाई बहन झगड़े हो। माता जी भोजन बनातीं, सभी चैक से बाहर जमीन पर बैठ कर खाते। दोपहर तथा शाम दो बार भोजन बनता। दाल रोटी, बाजरे का भात। घर में भैंस थीं। खूब दूध होता था किन्तु भोजन के साथ दूध या दही परोसने का रिवाज न था। हम गाँव के ब्राह्मण परिवार में प्रतिष्ठित पद पर थे क्योंकि सभी सदस्य शिक्षित थे। भाई-बहन का प्यार, कजलियाॅँ, रक्षाबन्धन, गुड़िया आदि त्योहारों में दिखता। हम सबों के बहुत ही सादे कपड़े होते। बहनें तो धोती पहनतीं किन्तुु हम भाई लोग गांठो तक धोती, कुर्ता या बनियाइन पहनते। गर्मी की छुट्टी में हम सभी घर में एकत्र होते। हमारे आम के बाग थे, प्रायः वहीं जाकर दोपहर बिताते। आम तोड़ने, चूसने में मजा आता। अब तो वेषभूषा, खानपान सभी बदला है। पहले गाँव के गरीब परिवारों को तन ढकने के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं होते थे, बेचारे रूखी-सूखी रोटी खकर गुजर करते किन्तु उच्च जाति के लोगों के प्रति वे विनम्र थे।

प्रो. चमोला: एक किसान परिवार से जुड़े होने के कारण खेती-किसानी के बजाय आपके भीतर वैज्ञानिक बनने अथवा वैज्ञानिक दुनिया के बारे में जानने की जिज्ञासा कैसे पैदा हुई? क्या इसके पीछे किसी विशेष अथवा बृहद व्यक्तित्व का कोई वरद हस्त रहा?

प्रो. मिश्र:  यद्यपि मेरा जन्म किसान परिवार में हुआ था किन्तु खेती का कार्य पिताजी की मृत्यु के बाद सबसे बड़े भइया ही सँभालते थे। माता जी उनका साथ देतीं। पढ़ने वाले भाई खेती के कार्य में हाथ नहीं बढ़ाते थे। बहने भी खेती में हाथ नहीं बंटाती थीं। यह सच है कि खेतिहर परिवार से सम्बद्ध होने पर भी खेती-बारी में रुचि नहीं थी-कारण शरीर से दुर्बलता तथा पढ़ाई। गर्मियों की छुट्टियों में ही हम लोग बड़ंे भइया की कुछ मदद कर पाते। 

कक्षा 4 तक विज्ञान से पाला नहीं पड़ा था। कक्षा 6 में सामान्य विज्ञान पढ़ाया जाने लगा तो जीव विज्ञान में रुचि नहीं हुई, गणित तथा रसायन विज्ञान अच्छे विषय लगे। हाई स्कूल के हमारे शिक्षक श्री ब्रिज बिहारी सक्सेना ने एक बार एक पुस्तक देकर कहा कि इसका अमुक चित्र बनाकर आओ। तब मुझे लगा कि ये तो लेखक हैें- क्या मैं नहीं हो सकता? किन्तु अभी तो हाई स्कूल की परीक्षा देनी थी। गर्मियों में घर नहीं गया। फतेहपुर म्यूनिसपिल के पुस्तकालय में जाकर पढ़ने लगा। धीरे धीरे मस्तिष्क खुलने लगा। विज्ञान को ही अपना कैरियर चुनना था। इसके पूर्व किसी भी भाई ने न तो हाई स्कूल के आगे पढ़ा था, न ही विज्ञान विषय चुना था। मेरे लिए चुनौती थी। मुझे स्मरण है कि मेरे बड़े भाई जयगोपाल जी जो इलाहाबाद में रेलवे में नौकर थे, मेरे लिए The Frog पुस्तक लाये थे। मैंने उसे पढ़ा। मुझसे न तो चित्र बन पाते, न ही जीव विज्ञान में रुचि आती। अतः आगे विज्ञान में भौतिकी रसायन, तथा गणित विषय लेकर पढ़ना था। इलाहाबाद आकर के.पी.काॅलेज में भर्ती हो गया। रसायन विज्ञान के अध्यापक बाबू जाल्पा प्रसाद बहुत अच्छा पढ़ाते थे। भौतिकी के अध्यापक गुरू जी (भार्गव जी) थे, वे जो भी पढ़ाते किन्तु समझ में न आता अतः भौतिकी पढ़ने में पूरा जी न लगता। अभी इण्टर द्वितीय वर्ष में था कि काॅलेज में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विभाग के डाॅ. सत्यप्रकाश जी अपने साथ सर सी वी रामन को लाये थे, उनका लेक्चर था। मुझे स्मरण है रामन जी ने कहा था कि पुस्तक के अन्त में दी गई शब्द सूची से किसी भी विषय के बारे में जाना जा सकता है। मुझे लगा कि इतना बड़ा वैज्ञानिक इतनी छोटी छोटी बातों पर ध्यान देता है। खैर! मुझे अपनी विज्ञान शिक्षा के प्रति विश्वास बढ़ा। मैंने अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। विषय थे- गणित, भौतिकी, रसायन विज्ञान। अब गणित तथा भौतिकी कठिन लगने लगे। रसायन विज्ञान कुछ रुचिकर लगा। तभी हमें रसायन विभाग के अध्यक्ष डाॅ. नीलरत्न धर का लेक्चर सुनने को मिला। वे जिस तरह विषय को समझा रहे थे उससे लगा कि मुझे तो आगे रसायन विज्ञान ही पढ़ना है। और इसे संयोग ही कहा जावेगा कि मैंने डाॅ. धर के शीलाधर मृदा विज्ञान शोध संस्थान में प्रवेश लेकर मृदा विज्ञान में एम.एस-सी की डिग्री प्राप्त की, शोधकार्य किया और डाॅ. धर की मृत्यु के बाद उनके शोध संस्थान का निदेशक बना। आखिर किसान का पुत्र मृदा (मिट्टी) में ही स्थान बना सका।

प्रो. चमोला: विज्ञान के क्षेत्र में उच्च अध्ययन करने तथा अनुसंधान जैसा असंभव कार्य करने का बीजारोपण आपके बाल मस्तिष्क में किन कारणों अथवा परिस्थितियों से हुआ?

प्रो. मिश्र:  इसका उत्तर मेरे पिछले उत्तर में आ चुका है।  

प्रो. चमोला: सुना है कि बचपन से ही हिन्दी के साहित्यकारों के सानिध्य पाने का सुयोग आपको यदा-कदा प्राप्त होता रहा। उन महापुरुषों के साथ हुई चर्चा ने क्या आपके बाल मन के भीतर कुछ नया करने का संकल्प नहीं जगाया? सबसे अधिक सान्निध्य और स्नेहाशीष आपको पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला एवं विदुषी कवयित्री महादेवी वर्मा जी का प्राप्त हुआ। उनके साथ के कोई ऐसे अविस्मरणीय क्षण जिन्हें आप आज भी न भूल पाये हों, उनके बारे में कुछ बताने का कष्ट करें। आपके बालमन पर उनके साथ हुए साहित्य-संवादों का कौन सा ऐसा प्रभाव पड़ा जो आज भी कहीं न कहीं आपके मस्तिष्क में उसी संजीदगी के साथ उपस्थित है?

प्रो. मिश्र: 1950 ई. में मुझे दारागंज जाकर हिन्दी के महाकवि निराला जी के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने मेरा नाम पूछा, यह बताने पर कि विज्ञान का छात्र हूँ , उन्होंने कहा कि मेरे पास अपनी गणित की पुस्तक लाना। मुझे एक गड्ढे का घनफल ज्ञात करना है। धीरे धीरे पता चला कि यह तो उनकी बहक थी। यह बताने पर कि डाॅ. धर मुझे पढ़ाते हैं, वे बोले मैं शायद उन्हें जानता हँ। वस्तुतः मैंने हिन्दी साहित्य सम्मेलन की विशारद तथा साहित्यरत्न की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली थीं अतः हिन्दी के कवियों के विषय में मुझे ज्ञात था।

उन्हीं दिनों साहित्यकार संसद को लेकर चर्चा छिड़ी थी। निराला जी उस स्थान को छोड़कर दारागंज में अपने एक पूर्व परिचित कलाकार मित्र श्री कमलाशंकर सिंह के मकान के एक कमरे में रह रहे थे। निराला जी बहुत उत्तेजित रहते थे। तभी दारागंज स्थित छोटी कोठी में पं. जवाहर लाल नेहरू आये तो निराला जी मिलने के लिए आतुर हो उठे। पर गार्डों ने नहीं जाने दिया तो वे क्रुद्ध होकर लौट आये और तरह तरह की भद्दी गालियां बकने लगे। निराला जी के रहने की कोठरी एक पतली गली में थी। प्रायः छात्र-छात्राएं या बाहर से लोग उनसे मिलने पहुंचते। थोड़ी दूरी पर पं. श्रीनाराण चतुर्वेदी जी की बगिया थी, जहां साहित्यकार एकत्र होते। निराला जी भी पहुंच जाते। 

दारागंज में निराला जी जगन हलवाई के यहाँ से आगन्तुकों के लिए मिठाई लाते। उनकी कोठरी के बगल में वैद्य जी का मकान था। वे संगीत प्रेमी थे। निराला जी प्रायः वहां भी जाते। प्रायः सन्ध्या के समय छड़ी लेकर इक्का अड्डे की तरफ से गंगा की ओर चले जाते। मैं प्रायः प्रातःकाल साइकिल से निराला जी के आवास पर जाता। वे मुझसे खुलकर बातें करने लगे थे। एक बार बोले हम तुम्हें शेक्सपियर पढ़ावेंगे। फलतः मैं तैयार हो गया और 1953 तक यह क्रम चला। तब कलकत्ते में उनके अभिनन्दन की तैयारी हो रही थी। हम कई लोग निराला जी के साथ कलकत्ता गये। मैं निराला जी के संस्मरण लिखने लगा था। मुझे प्रेरणा मिली थी Little Boswell पुस्तक पढ़कर जिसमें जान्सन के संस्मरण थे। इस तरह मैं 1961 तक संस्मरण लिखता रहा जिन्हें अब मैंने ‘निराला संस्मरणों में’ दे दिया है। इससे निराला के जिज्ञासुओं को प्रचुर सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। मैंने निराला विषयक एक पुस्तक ‘ऐसे थे हमारे निराला’ भी लिखी है जिसमें कुछ अधिक सूचनाएं हैं। निराला जी की बीमारी का हाल सुनकर कुछ साहित्यकार तथा कुछ राजनीतिक लोग आते रहते थे। निराला जी के यहां ही मुझे पृथ्वीराज कपूर तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन के दर्शन हुए। शिवपूजन सहाय भी मिलने आये थे और डाॅ. राम विलास शर्मा तथा पं. जानकी वल्लभ शास्त्री से भी यहीं मेरी भेंट हुई। मुझे ‘घर बैठे गंगा स्नान’ जैसा सुयोग प्राप्त हुआ। मैं निराला जी का कृतज्ञ हुआ। 

मैं 1956 में विश्वविद्यालय में अध्यापक नियुक्त हो चुका था। अध्यापन के बाद जो भी समय मिलता उसमें निराला जी के यहां पहुंचता। वे दिनभर में आये लोगों या घटनाओं का वर्णन करते। मेरा ज्ञान बढ़ता रहता। अब वे मुझे अधिक चाहने लगे थे। वे मेरे विवाह में सम्मिलित हुए। मेरे घर पर आये। उस समय मै अशोक नगर में रहने लगा तो मेरी पुत्री के अन्नप्राशन में आये। पास ही श्रीमती महादेवी जी का मकान था, वहां भी गये। मेरे लिए ये विशेष उत्सव के अवसर होते।

इतना ही नहीं, मेरे जनपद के सूचना अधिकारी के आमन्त्रण पर फतेहपुर गये, कवि सम्मेलन में भाग लिया। वे मेरे स्कूल (हाई स्कूल) में भी गये। वे किशनपुर के अपने रिश्तेदारों की बातें भी करते रहते। निराला के परिवार के लोग- उनके पुत्र रामकृष्ण, उनके भतीजे बिहारी तथा केशव भी आते तो मेरे घर आते। निराला जी की नातिन छाया भी मेरे शहराराबाग वाले मकान में आई थीं। मेरी पत्नी, मेरी माँ, मेरे परिवार के अन्य प्राणी भी निराला जी के दर्शनार्थ पहुंचते रहे। वे सबों से बातें करते। 

मेरे आने जाने से निराला जी ने काव्यरचना प्रारम्भ की। अर्चना, आराधना, गीतगुंज जैसी कृतियां हिन्दी जगत को दीं। निराला जी के कारण हिन्दी साहित्य के प्रति मेरा रूझान बढ़ा। इसका लाभ यह हुआ कि मैं विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी लेखन के प्रति प्रतिबद्ध हुआ। तमाम ग्रंथों की रचना की- विज्ञान लेखन के क्षेत्र में इतिहास,आत्मचरित, कोश रचना पर कार्य किया। आज हिन्दी विज्ञान लेखन सभी तरह से समृद्ध है।

प्रो. चमोला: इलाहाबाद उन दिनों साहित्य का गढ़ हुआ करता था, ऐसे में वहां अनेक नामी-गिरामी साहित्यकार निवास ही नहीं करते बल्कि समय≤ पर बहुत ही प्रभावी गोष्ठियों संयोजन भी किया करते थे। साहित्य सृजन की चेतना आपके बाल मन में किस प्रकार जगी? क्या आपके परिवार में कोई साहित्यिक संस्कारों वाला व्यक्ति था जिसने आपको प्रेरित कर उनसे मिलने अथवा उनके दर्शन करने हेतु प्रेरित किया हो, कोई ऐसा रोचक संस्मरण?

प्रो. मिश्र: इसका उत्तर पिछले उत्तर में आ चुका है। 

प्रो. चमोला: युवा काल में प्रख्यात हिन्दी साहित्यकारों के सानिध्य में आपको अपने जीवन के स्वर्णिम दिन बिताने के अनेक दुर्लभ अवसर प्राप्त हुए। उन दिनों सभी साहित्यकारों में आपको सबसे अच्छे साहित्यकार कौन लगते थे और क्यों लगते थे? आप में साहित्यिक समाज, साहित्यिक चेतना का संस्कार बसाने वालों में क्या दीर्घजीवी बड़े साहित्यकार ही थे?

डाॅ. मिश्र: आपके पिछले कई प्रश्नों की तरह यह भी उलझा हुआ है। मेरे सर्वप्रिय कवि, लेखक पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला थे। उनके प्रिय कवि लेखकों में डाॅ. रामविलास शर्मा, पं. जानकी वल्लभ शास्त्री या फिर गंगाधर मिश्र-ये मेरे आदरणीय कवि/लेखक थे। दुर्भाग्यवश मैंने कविता नहीं की, किन्तु कविता का प्रशंसक रहा हूँ। निराला के आलोचकों में बच्चन सिंह, डाॅ. नन्द दुलारे बाजपेयी अथवा निराला के प्रशंसकों में श्री शिवपूजन सहाय, पृथ्वीराज कपूर, सेठ गोविन्ददास, महापंडित राहुल सांकृत्यायन या रूसी साहित्यकार वारान्निकोव, चेलिशेव से मेरा सम्पर्क हुआ। मैं देख रहा था कि निराला ने किस तरह मतवाला के बाद लखनऊ में सुधा, माधुरी और फिर इलाहाबाद में संगम तथा मुम्बई के धर्मयुग या दिल्ली साप्ताहिक हिन्दुस्तान में निरन्तर छपते रहे हैं। उनकी रचनाएं प्रकाशनार्थ भेजता था। जब मैंने निराला जी के असंकलित निबन्धों को ढूँढ़ कर उन्हें ‘चयन’ तथा ‘संग्रह’ के रूप में प्रकाशित किया तो निराला जी  बहुत प्रसन्न हुए। बाद में डाॅ. नन्द  किशोर नवल ने निराला रचनावली (8 खंड) के रूप में निराला की सम्पूर्ण रचनाओं को तिथिक्रम से प्रकाशित करा दिया तो मैं सर्वाधिक प्रसन्न हुआ। निराला जी यह देखने के लिए जीवित नहीं रहे किन्तु हिन्दी वालों ने निराला के महत्व को समझा।

प्रो. चमोला: विज्ञान की धुन आपके बाल मस्तिष्क में किस तरह से सवार हुई? आपको किन-किन वैज्ञानिकों का सहयोग व स्नेहाशीष मिला जिन्होंने न केवल आपको वैज्ञानिक क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिए प्रेरित किया बल्कि विज्ञान के इस दुर्लभ चित्र को अनुवाद आदि के माध्यम से आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान की।

प्रो. मिश्र: एक बार एमएस-सी कर लेने पर स्वायल साइन्स के क्षेत्र में ही अध्यापन शोध करना था। मुझे अपने गुरुवर डाॅ. धर के अलावा जिन वैज्ञानिकों से उत्साहवर्धन मिला वे थे दिल्ली के आईएआरआई के प्रोफेसर डाॅ. एस. पी. राय चौधरी, आनन्द (गुजरात) के डाॅ. बी. वी. मेहता, दिल्ली आईसीएआर के डाॅ. कनवार। कानपुर कृषि काॅलेज के डाॅ. ए.एन.पाठक, कृषि काॅलेज, बीएचयू के डाॅ. सन्त सिंह उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय के डाॅ. के.बी.पालीवाल। कई शोध प्रोजेक्टों पर कार्य कराना पड़ा। फलतः कई दर्जन शोध छात्रों ने इस दिशा में सहयोग किया। उनमें से आज कई महत्वपूर्ण पदों पर हैं और मेरा स्मरण करते रहते हैं। 

हिन्दी विज्ञान लेखन के कारण शब्दावली आयोग से परिचित हुआ। विज्ञान परिषद् का प्रधानमंत्री बना तो इलाहाबाद में न जाने कितनी कार्यशालाएँ आयोजित हुई। बाद में बम्बई BARC के सहयोग से भी कार्यशालाएं हुई। विज्ञान प्रसाद के सहयोग से दो कार्यशालाएं हुई। मुझे विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में भाग लेने का अवसर मिला। एक अन्य कार्य था- 1970 में 2 वर्ष के लिए PID में ‘भारत की सम्पदा’ का सम्पादन। इससे तमाम लेखकों से परिचय हुआ। तभी डाॅ. रमेश दत्त शर्मा, देवेन्द्र मेवाड़ी, डाॅ. महन्ती, यहाँ तक कि नारायण दत्त जी से सम्बन्ध जुड़ें। 

मेरा एक पक्ष जो सर्वथा प्रच्छन्न रहा वह श्रीलप्रभुपाद के ग्रंथों का हिन्दी अनुवाद। मैंने 12 वर्षों में लगभग 35000 पृष्ठों का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जिसे श्रील प्रभुपाद ने 12 वर्षों में पूरा किया था। उनकी जन्म शताब्दी पर यह कार्य हरे कृष्ण, जुहू वालों ने श्री निवासाचार्य के माध्यम से कराया। 

प्रो. चमोला: ख्यातिलब्ध वैज्ञानिकों एवं हिन्दी साहित्यकारों के सान्निध्य में आपके भीतर की रचनात्मकता ने कब कल्पना के पंख फैलाना व भावना के संसार में डूबना उतरना शुरू किया...आप की सबसे पहली रचना कब, कहाँ और कैसे प्रकाशित हुई, इसके बारे में विस्तार से बताइए।

प्रो. मिश्र :  सर्वप्रथम शब्दावली आयेाग से हिन्दी विज्ञान लेखन पर पुस्तक लिखने का आमन्त्रण मिला। फिर एनसीईआरटी से भी पुस्तक लिखने का अनुरोध था ‘मिट्टी का मोल’ पुस्तक लिखी। तत्पश्चात् प्राइवेट प्रकाशनों के पर्यावरण प्रदूषण, जैव विविधता, ओजोन परत आदि पर पुस्तकें लिखाईं। विज्ञान परिषद् ने 1956 में ही मेरी ‘भारतीय कृषि का विकास’ पुस्तक प्रकाशित की थी। बाद में इसका परिवर्धित संस्करण अन्यत्र से प्रकाशित हुआ। दिल्ली के कई प्रकाशकों के लिए परिषद् के अन्य मित्रों ने भी पुस्तकें लिखीं। इधर भोपाल के आईसेक्ट के अनुरोध पर मैंने एक पुस्तक लिखीं - ‘‘हिन्दी विज्ञान लेखन- भूत,वर्तमान और भविष्य।’’ अब तो परिषद् के उत्थान हेतु लेखन/प्रकाशन चलता रहता है। बहरहाल 1956 से लेखनी चली तो चलती ही जा रही है। मैं कह सकता हूँ कि मैंने विज्ञान लेखन की सभी विधाओं पर पुस्तकें लिखकर मार्गदर्शक का काम किया है। अब कोई यह नहीं कह सकता कि हिन्दी दरिद्र है। उसे हम प्रारम्भ से राष्ट्रभाषा कहते रहे हैं। और अब सिद्ध कर दिया है कि यही हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा होगी। 

प्रो. चमोला: मिश्र जी, आपकी धर्मपत्नी जी हिन्दी साहित्य से गहराई से जुड़ी रहीं। क्या यही तो मूल कारण नहीं रहा कि आपका विज्ञान लेखन के साथ-साथ हिन्दी साहित्य के साथ भी रिश्ता गहराता गया और आप अपने अवदान की ऊर्ध्वमुखी यात्रा इसमें तय करते रहे। आप अपना विज्ञान लेखन अंग्रेजी में करते तो शायद आज से अधिक चर्चित होते....और अधिक लाभान्वित भी। कृपया अपने हिन्दी-प्रेम के इस वृतांत पर भी विस्तार से प्रकाश डालने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: मेरा विवाह 1957 में हुआ किन्तु इसके पूर्व मैं हिन्दी साहित्य सम्मेलन की मध्यमा (विशारद) तथा उत्तमा (साहित्यरत्न) परीक्षाएं उत्तीर्ण कर चुका था। साहित्यरत्न परीक्षा में मैंने रत्नाकर जी को विशेष कवि के रूप में चुना था। अतः आपका यह अनुमान कि मैं अपनी पत्नी के कारण हिन्दी के प्रति उन्मुख हुआ, सही नहीं है। 

यदि मैं अंग्रेजी में लिखता- यानी विज्ञान की अंग्रेजी पत्रिकाओं में लेख लिखता या शोधपत्र प्रकाशित करता तो शायद ज्यादा नाम कमा सकता था। आपका कहना ठीक है मैंने अंग्रेजी में भी लगातार लिखा, कई पुस्तकें भी अंग्रेजी में लिखी। अपने समकालीन मृदावैज्ञानिकों के मध्य मेरा शोधकार्य प्रशंसित था। किन्तु मेरा ध्यान लगातार हिन्दी विज्ञान लेखन को समर्थ बनाने पर रहा। मेरे मार्गदर्शक के रूप में डाॅ. सत्यप्रकाश (बाद में सत्यप्रकाश सरस्वती) सदैव रहे। उनसे मुझे लगातार प्रेरणा मिलती रही। प्रो. फूलदेव सहाय वर्मा भी मुझे हिन्दी में ही लिखने के लिए उत्साहित करते रहे। हिन्दी विश्वकोश के लिए उन्होंने मुझसे तमाम जीवनियाॅ लिखवायी। मैंने हिन्दी या अंग्रेजी में अपने विचारों को प्रकट करने में कभी दुविधा नहीं अनुभव की। हिन्दी हो या अंग्रेजी, दोनों में अपने समसामयिक विज्ञानियों में मैं चर्चा का विषय बना। उत्तर भारत में मृदा विज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य करने वालों में शीलाधर मृदा विज्ञान शोध संस्थान का नाम सर्वोपरि रहा। 

प्रो. चमोला: साहित्यकार, कल्पना के आकाश में विचरण करने वाला स्वच्छंद प्राणी होता है जबकि एक वैज्ञानिक तथ्य व सत्य के धरातल की कसौटियों पर खरा उतरने वाला एक प्रामाणिक तथ्यान्वेषी। एक म्यान में दो तलवारें कैसी? सत्य का कल्पना के साथ सीधा-सीधा सामंजस्य कैसा? क्या दोनों में से एक में अभिनेयता थी या फिर दोनों में नैसर्गिकता? ऐसा तो नहीं था कि आप विज्ञान की साधना करते हुए साहित्यकार को भूल जाते थे या फिर साहित्यिक कल्पनाओं के विमान में सवार होते हुए एक तथ्यान्वेषी वैज्ञानिक को। कृपया इस पर विस्तार से अपनी बेबाक टिप्पणी देने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: जिस तरह ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग साथ साथ होता है उसी तरह विज्ञान और साहित्य का प्रयोग भी होना चाहिए किन्तु साहित्य वाले विज्ञान वालों से दूरी बनाये रखना चाहते हैं। उन्हें भय है कि विज्ञान उन्हें कहीं विधर्मी न बना दे। 

साहित्य शब्द में सहित होने का भाव है। इसमें स$हित (उपकार,लाभ) का भी भाव है। इसका विलोम राहित्य है। निराला जी प्रायः साहित्य के साथ राहित्य की भी विवेचना करते। भारत शब्द की व्याख्या भा$रत के रूप में करते। मुझे आश्चर्य होता है कि वे शब्दों की ऐसी व्याख्या के पीछे क्यों पड़े रहते हैं। अवश्य ही मंथन से विचाररत्न प्राप्त हो सकते हैं। कहा भी गया है -

अन्धकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं है / मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नहीं है।

अथवा

साहित्य संगीत कला विहीनः / साक्षात् पशुः पुच्छ विषाण हीनः।

इस तरह भारतीय साहित्य की मनोभूमि विस्तृत सीमाहीन है। उसे अनेकानेक भाषाओं एवं बोलियाँ में अभिव्यक्ति मिली है। उसे समय एवं स्थान की सीमाएं बाँध पाने में संभव नहीं हैं। इसमें भारतीय संस्कृति,सभ्यता एवं चिन्तन की शाश्वत धड़कने हैं। कच्छ से मणिपुर तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक जिस साहित्य का सृजन होता आ रहा है, वही भारतीय साहित्य है। भारतीय साहित्य की रचना किसी एक स्थान पर नहीं अपितु अनेक साधना केन्द्रों में सम्पन्न हुई है। 

अब हम विज्ञान पर आते हैं। विज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान। किसी वस्तु अथवा धारणा के विषय में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करना। इसके लिए न जाने कितना श्रम अपेक्षित है किन्तु ऐसे ज्ञानधारी यानी विज्ञानी को यह सब करना पड़ता है जो उसके उद्देश्य पूर्ति के लिए अपेक्षित हो। विज्ञान का क्षेत्र तपस्या का क्षेत्र है। वैज्ञानिक वह तपस्वी है जो धूनी रमा कर बैठा नहीं रहता बल्कि लक्ष्य पूर्ति के लिए अहर्निश खून पसीना एक कर देता है। उसे नामवरी (प्रसिद्धि) की नहीं अपितु उद्देश्य पूर्ति की चिंता रहती है। ‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी-गीता की यह उक्ति मानो उसी के लिए है।

इस दृष्टि से साहित्य तथा विज्ञान में प्रचुर साम्य है। दोनांे ही विशिष्ट ज्ञान के सूचक हैं। उनका उद्देश्य समान रूप से लोकहित है। यदि साहित्य सुरुचिपूर्ण हुआ तो वह हितकर कैसे हो सकता है? इसी तरह यदि विज्ञान ध्वंसकारी होगा तो  वह अपने लक्ष्य से, कर्तव्य से, विपथ होगा।

प्रायः विज्ञान को धर्म विरोधी घोषित किया जाता है किन्तु जिन्हें विज्ञान का इतिहास ज्ञात है वे इस तथ्य से परिचित हैं कि विज्ञान ने किस तरह धर्म में व्याप्त अन्धविश्वासों को समाप्त किया और इस लड़ाई में वैज्ञानिकों को प्राणदण्ड भोगना पड़ा। साहित्य और विज्ञान दोनों महापुरुषों को, सूरमाओं को जन्म देते आये हैं। वे ऐसी प्रेरक शक्ति प्रदान करते हैं कि सत्य की खोज में कुछ भी सहने को उद्यत रहते हैं।

यहाँ पर हम हिन्दी साहित्य के निराला और विज्ञान क्षेत्र के गैलीलियों का दृष्टान्त प्रस्तुत करना चाहेंगे। दोनों का जितना विरोध एवं उत्पीड़न हुआ, वह वर्णनातीत है किन्तु द्योतक है। सत्य की खोज के लिए कंटकाकीर्ण पथ का अनुसरण करने में किसी प्रकार के भय न होना। विज्ञान का मार्ग सत्य का मार्ग है, व्यवहार का मार्ग है जो कंटकाकीर्ण है किन्तु इसी पर चलना वैज्ञानिकों को भाता आया है। 

हिन्दी के महाकवि निराला ने अपने एक लेख में ‘‘साहित्य की समतल भूमि’’ में क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या ईसाई- सबों के विचारों में तुल्यता पाई है। यह अकारण नहीं था। इसी तरह विज्ञान के क्षेत्र में देश, जाति, धर्म से निरपेक्ष रहते हुए सभी के प्रवेश करने एवं कर्म करने का स्वागत है। चाहे साहित्य हो या विज्ञान, भाषा बाधक नहीं। वाल्मीकि से लेकर तुलसीदास और निराला तक भाषा क्रमशः संस्कृत, अवधी और खड़ी बोली हुई किन्तु उसके उच्च विचार एक जैसे रहे हैं। इसी तरह होमर, शेक्सपियर आदि के साथ है। भाषा या धर्म नहीं अपितु कर्म की समानता ही विश्वभर में व्याप्त रही है। बंगला के काजी नजरूल इस्लाम, शरत चन्द्र टैगोर और तमिल के सु्रब्रमण्यम भारती में भावों के स्तर पर साम्य ही साम्य मिलता है और वही पूरे विश्व को एक बनाने वाला है-विश्वबन्धुत्व का प्रेरक है। 

कभी-कभी मन में विचार उठता है कि यदि किसी भी सर्जक (लेखक, कवि) की पृष्ठभूमि विज्ञान की हो तो वह अधिक मौलिकता प्रदर्शित कर सकता है। तब ममुझे हिन्दी के कवि अज्ञेयजी या पं. विष्णुकान्त शास्त्री के नामों का स्मरण हो आता है जिनकी पृष्ठभूमि में उनका विज्ञान अध्ययन रहा है। 

प्रायः विज्ञान और धर्म में टुंटू की चर्चा चलती है और तब वैज्ञानिकों को नास्तिक कहा जाता है किन्तु जिन्हें ज्ञान है, उन्हें यह पता है कि हमारे देश के डाॅ. एम.जी.के.मेनन, डाॅ. रामन, डाॅ. नार्लिकर आदि वैज्ञानिक धर्मनिष्ठ थे या हैं। उन्हें रामायण प्रिय है, उन्हें गंगा नदी प्रिय है। इसी प्रकार विदेशी वैज्ञानिकों में आइंस्टाइन नास्तिक नहीं अपितु आस्तिक थे। हाकिंग भी आस्तिक ही हैं। इसका कारण यह है कि उनकी दृष्टि में ईश्वर एक है, चाहे वह हिन्दुओं का हो, मुसलमानों का, या पारसियों अथवा ईसाइयों का। ईश्वर एक परम सत्ता है। चराचर जगत में उसी की व्याप्ति है। ईश्वर को भगवद्गीता में ऐश्वर्यो से युक्त कहा गया है। इस युग में भी कुछ महापुरुष हुए हैं-विशेषतया श्री चैतन्यमहाप्रभु जिनमें षडैश्वर्य थे। 

यह कहना या सोचना अन्याय होगा कि भारत में साहित्य के साथ-साथ विज्ञान की उन्नति नहीं हुई। हम यदि साहित्य में वाल्मीकि, कालिदास के कृतित्व की चर्चा करते है तो साथ ही हमें विज्ञान में आर्यभट्ट तथा भास्कर को भी देखना होगा। राष्ट्र के उत्थान हेतु साहित्य और विज्ञान दोनों आवश्यक है और भारत इसीलिए जगद्गुरु कहलाता रहा। देवता तक भारत में जन्म लेने की स्पृहा रखते थे। 

गायन्ति देवाः किल गीतकानि, धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे। 

आप जानते हैं कि साहित्य में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा जैसे अलंकार दो वस्तुओं दो व्यक्तियों में समान गुणों का आरोप है। कवियों ने इसे अतिशयोक्ति तक पहुंचा दिया, अभिव्यक्ति के लिए साहित्य में काव्यशास्त्र में ये ऐसे उपकरण है जिनसे भावों का चरमोत्कर्ष प्रदान किया जाता है। 

वैज्ञानिकों ने संसार के छोटे से छोटे कण, परमाणु को जिस गहनता से अध्ययन करके उसी में सम्पूर्ण सृष्टि का कारण ढूँढ़ निकाला, उसी तरह दार्शनिकों को कण कण में ईश्वर के दर्शन होते रहे। 

अतः हमें विशुद्ध साहित्य वालों से अपील करनी है कि वे विज्ञान को अस्पृश्य न मानें क्योंकि जहां साहित्य हमें प्राणशक्ति और ऊर्जा देता है वही विज्ञान हमें दृष्टि प्रदान करता है। अतः दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। दोनों के समुचित समन्वय से ही मानव कल्याण संभव है। 

प्रो. चमोला: आपके विज्ञान लेखन के विषय क्या-क्या रहे? विज्ञान के लोकप्रियकरण के संदर्भ में आपने विज्ञान-संचारकों, विज्ञान-लेखकों की एक वृहद फौज तैयार की। आप विज्ञान लोकप्रियकरण से लेकर गूढ़ अनुसंधानात्मक विषयों के साथ-साथ अपने संपूर्ण विज्ञान संचार विषयक  लेखन को कितनी श्रेणियों में बांटना चाहेंगे....और इन श्रेणियों में से आपको सबसे अधिक आनंद की अनुभूति किस विधा में लिखते हुए होती रही और क्यों? 

प्रो. मिश्र: मैं विज्ञान के उन्हीं पक्षों पर लिखता आया हूू जिनका मैंने भलीभाँति अध्ययन किया है। इस तरह मैंने मृदा विज्ञान, रसायन विज्ञान के साथ ही कुछ सामान्य चर्चित विषयों पर ही लेखनी चलाई है। यह सच है कि मैंने विगत 50-60 वर्षों में अनेकानेक युवा लेखकों को हिन्दी से विज्ञान विषय पर लिखने के लिए प्रेरित किया है।

सम्पूर्ण विज्ञान संचार विषयक लेखन बहुविध हुआ है। इसको श्रेणीबद्ध करना कठिन है। फिर भी सुविधा के लिए शैलीगत विचार से निम्नांकित श्रेणियां की जा सकती हैं।

1. निबन्ध (आलेख) 2. कहानी-उपन्यास, 3. कविता 4. इतिहास लेखन 5. जीवनी परक जिसमें आत्मचरित भी सम्मिलित है 6. डायरी लेखन 6. पत्र साहित्य 7. अनुवाद (अन्य भाषाओं से ) आप यह जानना चाहते हैं कि इन विधाओं में से मुझे सर्वाधिक आनंद की अनुभूति किस विधा में सबसे अधिक होती रही और क्यों?

एक लेखक के लिए यह कह पाना मुश्किल होता है कि वह किसी एक विधा को क्यों सर्वाधिक महत्व देता है? साहित्य में कवि यदि कविता ही करता रहे तो साहित्य में उसे पूर्ण साहित्यकार नहीं माना जाता। उसे उपन्यास, जीवनी आदि भी लिखनी चाहिए। पद्य के साथ गद्य भी। प्रारम्भ में मैंने सूचनाप्रद लेख लिखने शुरू किये। जब पुस्तक लिखने के लिए आमन्त्रण मिलने लगे तो पर्यावरण, जैव विविधता, ओजोन परत आदि पर पुस्तकें लिखीं। बाद में देश में प्राकृतिक आपदाओं के प्रकरण में काफी श्रम करके ‘प्राकृतिक आपदाएं’ पुस्तकें लिखीं। मुझे हिन्दी विज्ञान लेखन में इतिहास के प्रारम्भ से ही रुचि रही। इधर मैंने ‘हिन्दी विज्ञान लेखन-भूत, वर्तमान और भविष्य’ पुस्तक लिखी है। काफी श्रम किया, जितना ज्ञान था, सब उड़ेल दिया। चूंकि मृदा विज्ञान मेरा मुख्य विषय रहा अतः 1956 से ही मैंने विज्ञान परिषद् के लिए भारतीय कृषि का विकास’ पुस्तक लिखी। बाद में इसका परिष्कृत संस्करण अन्यत्र से प्रकाशित हुआ। 

मुझे बारम्बार यह विचार कचोटता रहा कि ऐसी तमाम विधाएं हैं जिन पर कोई साहित्य नहीं है तो क्यों न उन पर लेखनी चलाऊँ। फलस्वरूप मैंने आत्मचरित (मेरा जीवन पथ) लिखा, मैंने अपने पास आये हजारों पत्रों को ‘बोलते पत्र’ (भाग 1, भाग 2) नाम से प्रकाशित किया। मैंने कुछ वैज्ञानिकों की शोधपूर्ण जीवनियां लिखीं। मैंने सरस्वती पत्रिका में पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखे वैज्ञानिक लेखों का सम्पादन ‘विज्ञान मंजूषा’ नाम से किया। इसी तरह बँगला लेखक बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा लिखे वैज्ञानिक लेखों का हिन्दी अनुवाद ‘विज्ञान रहस्य’ नाम से प्रकाशित किया। मैं यह सिद्ध करना चाहता रहा हँू कि ‘हिन्दी का विज्ञान लेखन सर्वाशतः पूर्ण है। जिस हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनना है वह विज्ञान लेखन में प्रयुक्त हिन्दी होगी। 

प्रो. चमोला: यौवन के उन उत्साही दिनों में जब आप विज्ञान लेखन के प्रति आकर्षित हो रहे थे तो आपके समक्ष क्या चुनौतियां, क्या जिज्ञासाएं एवं क्या महत्वाकांक्षाएं थीं? प्रायः उस उम्र में व्यक्ति या तो धनार्जन के लिए हाथ-पांव मारता रहता है या ज्ञानार्जन कर कुछ पद-प्रतिष्ठा पाना चाहता है या कोई पुरस्कार आदि के लोभ व लाभ से वशीभूत हो कोई लेखन-कार्य करना चाहता है....अािखर आपको उस मार्ग पर अग्रसर होने की मूलभूत प्रेरणा किसने दी...और आप साहित्य की रोमानी दुनिया को छोड़कर विज्ञान के नीरस और खुरदरे जीवन की ओर आकर्षित होने के लिए क्यों उत्प्रेरित हुए।   या फिर दूसरे शब्दों में कहूँ कि विज्ञान के उस खुरदरे और लिजलिजे, शुष्क जीवन से आपका साहित्य की इस मनोहारी दुनिया के प्रति आकर्षण आपमें किस तरह से पैदा हुआ....क्या इसमें आपकी श्रीमती जी की प्रभविष्णु लेखन-शैली अथवा श्वसुर गृह का हिन्दी प्रेम तो परोक्ष रूप से नहीं छुपा हुआ था?

प्रो. मिश्र:  मेरे साथ अध्यापन मुख्य कार्य था। लेखन तो अपनी ज्ञान परिधि बढ़ाने हेतु था। धनार्जन कभी उद्देश्य नहीं रहा। पुरस्कार पाने के लिए न तो कोई लेखन किया, न पद प्रतिष्ठा हेतु। विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य सर्वोत्तम सर्वोच्च एवं गरिमामय कार्य था। हिन्दी प्रेम तो जन्मजात था और कुछेक अध्यापकों ने इसे धार देने में उत्साहित किया। आपका यह सोचना कि श्रीमती जी अथवा श्वसुर गृह से हिन्दी प्रेम उपजा, गलत होगा। मेरा विवाह मेरे हिन्दी लेखन के बहुत बाद में हुआ। 

प्रो. चमोला: मिश्र जी, क्या आप अपने वैज्ञानिक को, वैज्ञानिक बनाने का अधिक श्रेय देना चाहेंगे यह उस भावप्रवण साहित्यकार, को कल्पना व आनंद की उस अलौकिक दुनिया में ले जाकर आपको रसानुभ्ूाति करवाकर साहित्य-सृजन के प्रति प्रेरित करता रहा, को (देना चाहोगे)..या फिर दोनों को? वैज्ञानिक व साहित्यकार..एक देह में दो आत्माओं का समावेश, लालन-पालन व पल्लवन-पुष्पन एक साथ कैसे? इन दाोनों में आप अधिक क्या होना चाहते थे....जो आप आज हो या फिर जो आप चाहकर भी नहीं हो सके....या फिर दोनों? क्या अपनी इस लंबी साधना से संतुष्ट हैं?

प्रो. मिश्र: मुझमें वैज्ञानिक और साहित्यकार दोनों साथ साथ चल रहे थे। अध्यापन एवं शोध कार्य के बाद बचे समय में हिन्दी साहित्य का अनुशीलन, फिर निराला, राहुल आदि के सम्पर्क से मेरा मनोबल सदैव दृढ़ रहा। हिन्दी में भी मुझे कुछ करना है। मैंने सारा लेखन सोची-समझी नीति के अन्तर्गत किया। मेरी पुस्तकें मेरे हिन्दी लेखन के विकास को बतावेंगी। मेरी विज्ञान विषयक हिन्दी की पुस्तक विज्ञान प्रवाह इसका प्रमाण है। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में मेरी रुचि प्राचीन पाण्डुलिपियों के आधार पर पाठालोचन, लोकसाहित्य के संकलन एवं अज्ञात कवियों की रचनाओं को प्रकाश में लाने की रही हैं। मैं यह दिखाना चाहता था कि विज्ञान का व्यक्ति साहित्य के क्षेत्र में वह कुछ कर सकता है जो विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागों को करना चाहिए था। मैंने कभी किसी साहित्यकार की अवमानना नहीं की, न ही ख्याति या नामवरी के पीछे गया। चाहें तो आप इसे स्वान्तः सुखाय कह सकते हैं। या एकोऽहं बहुस्याम। मैंने अपने भीतर छिपी प्रतिभा को प्रकट करने का लगातार प्रयास किया फलस्वरूप मैंने मेरा जीवन पथ, बोलते पत्र, जैसी कृतियां प्रकाशित की-इनमें अधिकांश मेरे अपने धन से प्रकाशित हैं। मैंने रायल्टी प्राप्त करने की दृष्टि से लेखन नहीं किया। 

प्रो. चमोला: आप विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त अनुसंधान लेखन एवं शोध कार्य कर रहे थे..यदि वही शोध कार्य आप अंग्रेजी अथवा विदेशी भाषाओं में जाकर करते तो आप को वैश्विक स्तर पर अपने कार्य के लिए अनुसंधान के लिए वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए आज से कई गुना अधिक महत्व श्रेय, पुरस्कार, लाभ अथवा पहचान अर्जित होती। किंतु आपने अंग्रेजी व अन्यान्य भाषाओं में अपने जीवन, पद, प्रतिष्ठा की परवाह न करते हुए केवल और केवल हिन्दी में विज्ञान लेखन को अपने जीवन अथवा चिंतन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। कृपया इसके पीछे आप अपनी सोच अथवा अवधारणा को स्पष्ट करने का कष्ट करें कि हिन्दी को अपनी अभिव्यक्ति का मूलाधार बनाने के पीछे आपकी मंशा अथवा अवधारणा क्या थी?

प्रो. मिश्र: आप यह क्यों सोच रहे हैं कि यदि मैं अंग्रेजी में लेखन करता तो ज्यादा ख्याति अर्जित  करता। मैंने मृदा विज्ञान के क्षेत्र में जो शोध कार्य किया है और जो भी प्रकाशन किये हैं वे अंग्रेजी के सर्वोच्च जर्नलों में प्रकाशित है और मृदा वैज्ञानिकों द्वारा प्रशंसित हैं। 

हिन्दी में विज्ञान लेखन मेरी अतिरिक्त रुचि रही है और मुझे सन्तोष है कि मैंने उच्चस्तरीय लेखन किया है। हिन्दी विज्ञान लेखन की सभी विधाओं को समृद्ध किया है। मेरे मन में राजनीतिक व्यक्तियों का यह  कथन कि हिन्दी में कुछ नहीं है,’ सदैव खलता रहा है। मेरा उनसे सीधा कहना है कि वे हिन्दी विज्ञान साहित्य का आलोडन करें, तब कोई मत व्यक्त करें। हमने विज्ञान लेखन के द्वारा हिन्दी को समृद्ध किया है। मैं जिस विज्ञान परिषद्  प्रयाग से 1952 से जुड़ा उसका मूल उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी के द्वारा विज्ञान का प्रचार प्रसार करना था और मुझे यह घोषित करने में तनिक भी हिचक नहीं कि मुझ जैसे मेरे अग्रजों तथा समानधर्माओं ने विज्ञान को हिन्दीमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

मुझे हर्ष है कि मैं अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में  विज्ञान परिषद् का शताब्दी समारोह आयोजित कर सका, राष्ट्रपति अब्दुल कलाम द्वारा उसका उद्घाटन हुआ। 

हमारी प्रतिष्ठा को देखते हुए ही ‘विज्ञान प्रसार’ ने हिन्दी विज्ञान लेखन के सौ वर्ष भाग 2) तथा हिन्दी विज्ञान लेखन के व्यक्तिनिष्ठ प्रयास, नामक ग्रंथों का सम्पादन मेरे द्वारा कराया।

विज्ञान परिषद् ने हिन्दी विज्ञान लेखकों  की एक पूरी टीम तैयार कर दी है जो सामयिक कठिन से कठिन विषय में मौलिक पुस्तकें लिख सकते हैं और लिखा है।

विज्ञान  परिषद् प्रयाग ने 1915 से ही हिन्दी माध्यम से एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो आज भी निरन्तर प्रकाशित हो रही है।   

प्रो. चमोला: प्रो. मिश्र जी, आपने विज्ञान के माध्यम से जो हिन्दी को दिया, उससे सारा हिन्दी जगत परिचित है....लेकिन हिन्दी ने आपको इस लंबी रचना यात्रा में आपकी साधना व हिन्दी सेवा के लिए आपको क्या दिया... इस पर विस्तार से प्रकाश डालें? प्रायः हिन्दीमें लेखन करने की प्रकृति और प्रवृत्ति को कई दृष्टियों से कुछ कमतर आंका जाता है...अंग्रेजी और अन्य भाषाआंे के बनिस्वत (की तुलना  में),लेकिन आपने पर्याप्त नाम और ख्याति हिन्दी में ही कमाई। आप उन अंग्रेजी मानसिकता वाले डोलते हुए लेखकों को क्या संदेश देना चाहेंगे जो अपनी भाषा से अधिक,चर्चित होने के मोह में दूसरी भाषाओं के पीछे, न केवल आकर्षित होते हैं बल्कि कुछ पाने के लिए हाथ धो के भागते ही रहते हैं?

प्रो. मिश्र: आप यह जानना चाहते हैं कि मेरे लम्बे विज्ञान लेखन के बाद भी मेरी साधना या हिन्दी सेवा ने मुझे क्या दिया भला? जब कोई कार्य करता है तो पुरस्कार प्राप्त करने की दृष्टि से नहीं करता। कार्य की महत्ता तथा उसका परिमाप निश्चित करता है कि उसको किस तरह पुरस्कृत किया जाय। अपने ही लोगों द्वारा सम्मानित या पुरस्कृत होने में कोई लाभ नहीं। जो अंग्रेजीदां हैं, वे बहुत काल तक अपनी श्रेष्ठता अपने मुख से बखानते रहे किन्तु जब हिन्दी में विज्ञान लेखन की सभी विधाओं में उत्तमोत्तम ग्रंथ प्रकाश में आने लगे तो वे Science Communicater की श्रेणी में हिन्दी वालों को परिगणित करने लगे। Science Communication तो विज्ञान परिषद् प्रयाग विगत 100 वर्षो से करता रहा है। उसी के परिणामस्वरूप इण्टर कक्षाओं तक हिन्दी को मान्यता मिली और 1970 के दशक में हिन्दी ग्रंथ अकादमियों की स्थापना के बाद उच्च कक्षाओं के लिए उत्तमोत्तम विज्ञान साहित्य हिन्दी में उपलब्ध हो गये किन्तु इसे पराधीनता की मानसिकता ही कहें कि तमाम अध्यापकों में फिर भी हिन्दी में अध्यापन नहीं किया, किताबें भले ही लिख दी हों।

मैं यह कहने में तनिक भी हिचक का अनुभव नहीं कर सकता कि डाॅ. सत्यप्रकाश, प्रो. फूलदेव सहाय वर्मा, डाॅ. नन्दलाल सिंह जैसे हिन्दी समर्थकों के उत्साह एवं सद्प्रेरणा से उत्तर भारत में हिन्दी को विज्ञान अध्यापन का माध्यम बनाया जा सका, शब्दावली आयोग का गठन हो सका। आज मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के तमाम विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हिन्दी का वर्चस्व है। अब समय आ गया है कि दासता की निशानी अंग्रेजी को त्याग कर देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही विज्ञान का पठन पाठन, अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य हो। मैंने देखा है कि डाॅ. जयन्त विष्णु नार्लिकर मराठी भाषा के प्रेमी हैं किन्तु वे हमारी हिन्दी की विज्ञान पुस्तकों को पढ़ते हैं वे हमारे द्वारा आयोजित सेमिनारों में पधारते और अपने विचार व्यक्त करते हैं।

प्रो. चमोला: इलाहाबाद में प्रो. नील रत्नधर, डाॅ. मेघनाद साहा, स्वामी सत्यप्रकाश, डाॅ. आत्माराम जैसे चर्चित वैज्ञानिक रहा करते थे। इलाहाबाद के नामचीन वैज्ञानिकों के अवदान के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में हिन्दी विज्ञान लेखन की विशद परंपरा के बारे में भी कुछ बताएं, अभी ‘विज्ञान’ पत्रिका के वृहद अवदान को मैं इसमें शामिल नहीं कर रहा हँू, वह तो एक अलग युग है....उस पर बाद में स्वतंत्र रूप से विस्तार से चर्चा करूंगा। आपके वैज्ञानिक चिंतन की मनोभूमि तैयार करने में कहीं इन्हीं मनीषियों का ही सान्निध्य, स्नेह व मार्गदर्शन तो नहीं छुपा है?

प्रो. मिश्र: आपका यह सोचना सही है कि इलाहाबाद में प्रो. नीलरत्नधर, डाॅ. मेघनाद साहा, डाॅ. आत्माराम जैसे वैज्ञानिक रहा करते थे। इसके फलस्वरूप उत्तर भारत में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रसिद्धि थी। इन महापुरुषों के प्रभाव से ही देशभर के प्रखर से प्रखर छात्र आते, शिक्षा प्राप्त करके और अपनी योग्यता के अनुसार अपना प्रभाव डालते तो सौभाग्यवश मुझे प्रो. नीलरत्न धर के निर्देशन में शोधकार्य करने और अध्यापन करने का सुयोग मिला। वे अत्यन्त अनुशासनप्रिय एवं समय के पक्के थे। वे सादगी की प्रतिमूर्ति होने के साथ ही प्रकाण्ड विद्वान थे। वे बँगला में बातें करते, अपने गुरु डाॅ. प्रफुल्ल चन्द्र राय के उच्चादर्शों पर चलते। यही नहीं विदेशों में जिन जिन शिक्षकों के साथ कार्य किया था उनका गुणगान करते। वे निस्पृह एवं निडर थे। वे राष्ट्रपति डाॅ. रोन्द्र प्रसाद जी तक को बोलने से रोक सकते थे। वे रोम जाकर कार्बनिक पदार्थ की महत्ता पर भाषण दे चुके थे। वे मृदाओं में कार्बनिक पदार्थ की उपस्थिति एवं उनके लाभों से छात्रों को परिचित कराते रहे। 

उनका मृदा संस्थान एक गुरुकुल था जिसमें छात्र-छात्राओं की संख्या असंख्य थी। मुझे उनका शिष्य होने और बाद में उन्हीं की संस्तुति से निदेशक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

प्रो. चमोला: आप अपने पढ़ाए हुए विद्यार्थियों में से किनकी सेवाओं अथवा किनके विज्ञान-लेखन के अवदान का स्मरण करना चाहेंगे?..जिन्होंने न केवल विज्ञान लेखन को नई ऊँचाइया दी बल्कि आज भी अनवरत उस क्षेत्र में उसी समर्पण से कार्यरत हैं। विज्ञान लेखन में आप विज्ञान पत्रिकाओं की भूमिका, विज्ञान परिषद् की पत्रिका को छोड़कर पर क्या कहना चाहेंगे?..इसने किस तरह से हिन्दी विज्ञान लेखन को नई ऊर्जा व नई दिशा प्रदान की तथा अन्यान्य लेखन के माध्यम से इस परंपरा को नित्यप्रति अभिसिंचित किया?

प्रो. मिश्र: मेरे शिष्यों में डाॅ. रमेश चन्द्र तिवारी तथा डाॅ. दिनेश मणि-ऐसेे दो शिष्य रहे जिन्होंने मेरे साथ पुस्तकें लिखीं-हिन्दी में ही नहीं अंग्रेजी में भी। डाॅ. रमेश तिवारी ने कृषि विषयक पाठ्य पुस्तकें लिखने में सहयोग दिया। डाॅ. दिनेश मणि (अब प्रो. मणि) दीर्घकाल से मुझसे जुड़ कर लेखन करते रहे-हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों में। उन्हांने स्वतन्त्र रूप से भी कई मौलिक ग्रंथ लिखे हें। अब तो विज्ञान परिषद् में मेरे सम्पर्क में आने वाले जिज्ञासु युवक भी हिन्दी विज्ञान लेखन करते हैं। मैं श्री देवव्रत द्विवेदी को अपना सहयोगी मानता हँू। 

प्रो. चमोला: मिश्र जी, विज्ञान लेखन में प्रामाणिक शब्दावली यानी मेरा संकेत वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के द्वारा तैयार की गई शब्दावली से है, की भूमिका के बारे में भी प्रकाश डालने का कष्ट करें कि शब्दावली की भूमिका उन्नत विज्ञान लेखन में कितनी महत्वपूर्ण है...खासकर विज्ञान लोकप्रियकरण के संदर्भ में? अधिसंख्य लोगों का यह मानना होता है कि आयोग द्वारा तैयार की गई शब्दावली अत्यधिक दुरूह,क्लिष्ट व कठिन होती है...जबकि भाषा वैज्ञानिकों का मानना है कि विज्ञान तथा प्रशासन के प्रति हिन्दी के मोह में कहीं अवरोधक सिद्ध हो रही है....ऐसे में आप क्या कहना चाहेंगे कि क्या विज्ञान लोकप्रियकरण जैसे लोकप्रिय कार्य को जन सामान्य तक पहुंचाने के लिए शब्दावली की प्रामाणिकता का ध्यान रखना उतना आवश्यक नही है, इसके आलोक में आप क्या कहना चाहेंगे?

प्रो. मिश्र: आपने हिन्दी में तैयार की गई वैज्ञानिक शब्दावली के विषय में जानना चाहा है। चूंकि पारिभाषिक शब्दों पर ही विज्ञान अभिव्यक्ति निर्भर करती है अतः पारिभाषिक शब्द ऐसा होना था जोे हिन्दी के अलावा बँगला, तमिल, मराठी, गुजराती लेखकों के भी समझ में आ सके और व्यवहार से लाई जा सके। सौभाग्यवश जो पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी में प्रस्तुत की गई है उसका मूलाधार संस्कृतनिष्ठ है। संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसे विभिन्न प्रान्तवासी समझते हैं। अतः शब्दावली आयेाग द्वारा तैयार शब्दावली पूरे भारत में प्रयुक्त हों सकती है। इसके लिए विज्ञान छात्रों एवं शिक्षकों को प्रारंभिक संस्कृत का ज्ञान अर्जित करना होगा। तब उन्हें शब्दावली सुगम लगेगी। बारम्बार प्रयोग करने से भी तथाकथित क्लिष्ट शब्दावली सुगम लगने लगेगी। मुझे तो ऐसा ही लगा है। 

प्रो. चमोला: मिश्र जी, जीवन के अल्हड़ दिनों में यानी युवाकाल में क्या आपने किसी से प्रेम किया है? जब एक ओर आपके मस्तिष्क में खेत-खलिहान, ग्राम्य जीवन एवं विज्ञान के गहन अभयारण्य के स्वप्न विचरण कर रहे थे तो ऐसे में क्या आप अपने पहले प्रेम की रक्षा कर पाए? यौवन जीवन-वृक्ष पर एक बार प्रेम का बसंत अवश्य आता है...प्रायः लोग अपने मांसल प्रेम को कहीं छुपा देना चाहते हैं, कहीं मिटिया देना चाहते हैं...किंतु मुझे लगता है...अतीत के उस उर्वर, आत्मीय,स्नेहिल व रोमानी बीज से ही भावनाओं से संभावनाओं तक का बहुआयामी स्फुरण यानी बहुरंगी चिंतन धाराओं का अभ्युदय अथवा आरोह काल का शुभारंभ होता है। आप अपने इस अभिव्यक्त प्रेम का शत प्रतिशत श्रेय किसे देना चाहेंगे?

प्रो. मिश्र: युवावस्था तक ऐसी परिस्थितियाँं रही है कि मांसल प्रेम की ओर ध्यान ही नहीं गया। एक तो कृश शरीर फिर पढ़ाई पर ध्यान और पास पड़ोस या विद्यालय में भी लड़कियां नहीं पढ़ती थीं, सिनेमा देखा नहीं था। मित्रों में भी कोई प्रगल्भ न था अतः किसी युवती से प्रेम-प्रसंग नहीं हुआ। अतः छिपाने की कोई बात नहीं। प्रेम के मामले में निरा बुद्धू रहा। 

प्रो. चमोला: आपके श्वसुर डाॅ. उदय नारायण तिवारी जी प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक रहे- उस दुनिया में उनका अपना नाम और अपना काम रहा। सुविख्यात होने के नाते यह तय है कि उनके पास अन्य प्रबुद्ध योग्य व होनहार युवाओं की लंबी सूची रही होगी...किंतु अपनी पुत्री के लिए उन्होंने वर रूप में आपका चयन किया...इसके पीछे का कोई विशेष आकर्षण या रहस्य? आप बेवाक बताने का कष्ट करें...कि क्या आपका वह प्रेम-विवाह था अथवा परिवार द्वारा विधिवत सुनियोजित विवाह? भाषा-वैज्ञानिक परिवार से एक विज्ञान के प्रशिक्षु युवा का संपर्क,घनिष्ठता या आत्मीयता कैसे बढ़ी?

प्रो. मिश्र:  मेरे श्वसुर ने अपनी पुत्री के लिए मुझे ही वर रूप में क्यों चुना-इसका  कारण था महापंडित राहुल सांकृत्यायन तथा पं. कृष्णदत्त बाजपेयी के दबाव। ये मुझसे परिचित थे और तब तक मैं  विश्वविद्यालय में लेक्चरर बन चुका था। डाॅ. तिवारी इधर उधर वरखोजी कर रहे थे। उपयुक्त वर नहीं मिल रहा था। उनकी पुत्री एम.ए. करने के बाद शोध कार्य करने लगी थी: फलतः डाॅ. तिवारी अपनी पुत्री का विवाह मेरे साथ करने को राजी हो गये-यद्यपि उनकी पत्नी लगातार कहती रहीं कि वर का परिवार धुर देहाती है उसमें लड़की देना ठीक नहीं होगा। भला यह प्रेम विवाह कैसे  हो सकता है? यूं डाॅ. तिवारी हम दोनों भाइयों को खूब जानते थे, निराला जी के यहाँ भेंट होती थी। विवाह तै करते समय भाषा विज्ञान या  विज्ञान पर ध्यान नहीं दिया जाता ।

प्रो. चमोला: मिश्रा जी, प्रायः कहा जाता है कि जिस क्षेत्र में कोई अग्रणी व समर्पित विद्वान काम कर रहा होता है...उसका परिवार यानी उसके पुत्र पुत्रियां, संयोग से अथवा चाहते हुए भी उस परंपरा का निर्वहन आगे नहीं करना चाहते या कहूँ अपने उस पैतृक गुणधर्म को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। क्या आपके परिवार में आपकी इस आठ दशकों की विशद वैज्ञानिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले हैं, यद्यपि आपका शिष्य-परिवार बहुत व्यापक व विस्तृत है...किंतु फिर भी कृपया अपने परिवार के बारे में बताने का कष्ट करें क्या आप की इस दीर्घ वैज्ञानिक साधना से प्रेरित होकर कौन इस क्षेत्र में स्वेच्छा से उत्साहपूर्वक कार्य करने के लिए अग्रसर हुआ? 

प्रो. मिश्र: अपने परिवार में मैं ही विश्वविद्यालय तक पहुंचा था। अतः मेरे अन्य भाइयों की सन्तानें भी , वहाँ तक नहीं पहुंच पाई। अतः उनके द्वारा मेरा अनुकरण असम्भव था। मेरी पुत्रियां तथा एकमात्र पुत्र सबों ने उच्चतम तक शिक्षा प्राप्त की-एक पुत्री ने तो रसायन विज्ञान में एम.एस-सी डिग्री ली किन्तु विवाह हो जाने पर वह शोध कार्य नहीं कर सकी। अन्य तीन पुत्रियां कला वर्ग में एम.ए. डिग्री प्राप्त करके अच्छे पदों पर कार्यरत हुईं। मेरी एक पुत्री इंटर से ही नेत्र रोग से पीड़ित थी किन्तु उसने एम.ए. तक शिक्षा पूरी की और रिसर्च ज्वाइन किया। थीसिस पूरी करनी थी कि उसकी दृष्टि जाती रही। तब उसने हिन्दी में Blind Relief Association में  अंधो के लिए दिये जा रहे प्रशिक्षण को पूरा किया। तत्पश्चात वह कई वर्षों तक मरुधर अन्धविश्वविद्यालय जोधपुर में शिक्षण कार्य करती रही। सौभाग्य से उसे आई सी ए आर से एक प्रोजेक्ट मिला जिसमें कार्य करते हुए उसे माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से अध्यापक पद पर कार्य करने के लिए चुन लिया गया। वह इलाहाबाद के एक डिग्री काॅलेज में नियुक्त होकर अपने परिवार में आ मिली। मेरा एकमात्र  पुत्र विज्ञान विषय लेकर पहले IIT कानपुर में पढ़ने गया। फिर वहाँ से अमरीका में शोध कार्य करके अच्छे पद पर नियुक्त हो गया। अब उसका अपना घर है, परिवार है। साल-दो साल में भारत आकर हम लोगों से मिल जाता है। 

प्रो. चमोला: विज्ञान परिषद् से आपका नाता अपने अध्ययन काल से ही रहा और लगभग सात-आठ दशकों की आपकी इस अनवरत साधना के चलते हुए भी आप प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से परिषद् की गतिविधियों एवं उसके कामकाज से सीधे जुड़े रहे। इसके विद्वानों की समृद्ध परंपरा उनका निर्देशन, मार्गदर्शन, स्नेह, अभिप्रेरण एवं ज्ञान-लाभ आपको समय≤ पर मिला होगा....कृपया विज्ञान परिषद् से अपने संबंधों के साथ-साथ विज्ञानलेखन की वृहद परंपरा पर भी विस्तार से प्रकाश डालने का कष्ट करें जिसने कहीं न कहीं आपके भावी वैज्ञानिक जीवन का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रो. मिश्र: मैं 1952 से ही विज्ञान परिषद् से जुड़ा और धीरे धीरे विज्ञान का सम्पादक, फिर विज्ञान परिषद् का प्रधानमंत्री बनाया गया। विश्वविद्यालय में अध्यापक, शोधकार्य करने के साथ साथ अतिरिक्त समय में विज्ञान परिषद् की गतिविधियों में मनोयोग से भाग लेता रहा। विज्ञान परिषद् में कार्य करने की प्रेरणा डाॅ. सत्यप्रकाश जी से मिलती रही। वैसे विज्ञान परिषद् के जितने भी सभापति रहे,सबों ने मेरी कर्तव्यनिष्ठा को सराहा जिससे मैं आज तक विज्ञान परिषद् से जुड़ा हुआ हूँ। 1992 ई. में विश्वविद्यालय से अवकाशप्राप्त करने के बाद मैं विज्ञान परिषद् से पूरी तरह जुड़ गया। 

विज्ञान परिषद् का उद्देश्य राष्ट्रभाषा हिन्दी के माध्यम से विज्ञान का प्रचार-प्रसार रहा है। मेरा हिन्दी प्रेम विज्ञान परिषद् के उद्देश्य के अनुकूल था। मैंने अपने हिन्दी प्रेम के वशीभूत तमाम संगोष्ठियों या सेमिनारों में सहभागिता की। मुझे देखकर परिषद् के अन्य सहयोगी भी लेखन करने लगे।

1958 में डाॅ. सत्यप्रकाश जी ने वैज्ञानिक शोधपत्रों का हिन्दी में प्रकाशित करने के उद्देश्य से एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसका सारा कार्यभार मेरे उपर डाल दिया जिसे मैं आज तक पूरे मनोयोग से पूरा करता आ रहा हँू। इससे कई विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों का संबंध विज्ञान परिषद् से जुड़ा और विज्ञान परिषद की ख्याति बढ़ी। 

हमने समय समय पर विज्ञान तथा अनुसंधान पत्रिका के विशेषांक भी निकलवाये। डाॅ. सत्यप्रकाश जी आवश्यक सामग्री और धन जुटाते रहे। मैं उनका सबसे विश्वस्त व्यक्ति बन गया। इसी तरह 1970 में डाॅ. आत्माराम जी द्वारा मेरा चुनाव ‘भारत की सम्पदा’ के लिए हिन्दी विशेषज्ञ अधिकारी पद पर किया गया। मैंने वर्षाें के भीतर ही अनुवाद कार्य पूरा करा दिया। अब मझे दिल्ली के विद्वान भी जानने लगे। यह सब जैसे ईश्वर द्वारा पूर्व नियोजित था। मेरी कर्तव्यनिष्ठा से सभी प्रभावित थे। 

प्रो. चमोला: मिश्र जी, विज्ञान परिषद् की पत्रिका ‘विज्ञान’ अपने अस्तित्व की 112 से अधिक वर्ष पूर्ण करने जा रही है...भारत में जब भी विज्ञान लेखन एवं वैज्ञानिक चिंतन व विज्ञान पत्रिकाओं की बात पर चर्चा-परिचर्चा,संवाद-परिसंवाद अथवा इतिहास-लेखन का विवेचन-विश्लेषण किया जाएगा तो उसमें विज्ञान पत्रिका के अवदान को नींव के पत्थर की भूमिका के रूप में रेखांकित किया जाएगा। कृपया विज्ञान के एक जिज्ञासु पाठक, लेखक, संपादक एवं परिषद् के प्रधानमंत्री तक के विभिन्न हैसियतों से अपने जुड़ाव के बारे में विस्तार से बताएं कि अन्यत्र भिन्न-भिन्न विभागों में वरिष्ठ पदों पर आसीन होते हुए भी विज्ञान और विज्ञान परिषद् से आपका नाता निरंतर बना रहा और उम्र के इस पड़ाव पर आज भी जारी है। यूँ तो देश के अनेक विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक विभाग व संकाय होते हैं...उनमें अनेक प्राध्यापक, आचार्य व प्रबुद्ध जन होते हैं....लेकिन सभी को सेवा, सृजन व साधना का ऐसा विकल्प या सुअवसर नहीं सुलभ हो पाता जो आप को हुआ है...क्या आप इस रूप में अपने आप को देश के अन्य प्राध्यापकों से कुछ हटकर समझते हैं...इस बारे में क्या आप कहना चाहते हैं?

प्रो. मिश्र: आपका कहना ठीक है कि विज्ञान पत्रिका का प्रकाशन एक अभूतपूर्व घटना थी और यह तबसे निरन्तर प्रकाशित होती आ रही है ऐसा नहीं है कि प्रकाशन यात्रा सरल थी। तमाम अवरोध आये। 1936 में तो श्री हरिशरणानन्द जी इसे पंजाब से प्रकाशित करते रहे। परिषद् का कोई भवन न था, प्रायः सम्पादक को घर पर ही आफिस होता। 1956 में पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा भवन की नींव रखी गई तो शीघ्र ही भवन तैयार हो गया और कार्यालय सुचारू रूप से चलने लगा। तब भी एक कार्यालय प्रभारी और एक चपरासी हुआ करता। धीरे धीरे परिषद् की गतिविधियां बढ़ी तो परिषद् में एक व्याख्यानशाला का निर्माण हुआ। और शताब्दी वर्ष में 1 करोड़ रूपये का अनुदान दिल्ली से मिलने पर परिषद् भवन का कायाकल्प हो गया। अब तो हमारा बहुत बड़ा पुस्तकालय है। छात्राओं के लिए कम्प्यूटर सेंटर, अतिथियों के लिए अतिथि भवन है। 

हमारे प्रकाशनों की संख्या बहुत बड़ी है। शताब्दी वर्ष पर भव्य स्मारिका निकली। विज्ञान के शताब्दी वर्ष पर भी ‘विज्ञान’ का विशेषांक निकला। आज विज्ञान परिषद् की देशभर में कई शाखाएँ हैं जहाँ सदस्यों की संख्या भी अधिक है। परिषद् ने डाॅ. साहा और डाॅ. आत्माराम के कृतित्व को हिन्दी में अनुवाद कराकर प्रकाशित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

मैंने सदैव यही समझा कि शिक्षक का काम अध्ययन, अध्यापन एवं मौलिक साहित्य सृजन है। सभी को ऐसा करना चाहिए किन्तु जो नहीं कर पाते वे अन्य प्रकार के धन्धों में रुचि लेते हैं। उन्हें उसी दिशा में संतोष मिलता है। बुद्धिजीवी होने के नाते नित नूतन साहित्य सृजन करना हमारा कर्तव्य है। किन्तु जो ऐसा नहीं समझते, वे हम जैसों को मूर्ख समझते हैं। उनका ध्येय भौतिकतावादी होता है। वे अन्य प्रकार से यश अर्जन करते हैं और अपने ध्येय में सफल भी होते हैं। 

प्रो. चमोला: विज्ञान के क्षेत्र में विज्ञान परिषद् देश की अत्यंत सुविख्यात एवं प्राचीनतम संस्था है जिससे देश के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का जुड़ाव प्रारंभ से ही रहा है। विज्ञान पत्रिका के अतिरिक्त विज्ञान के क्षेत्र में परिषद् की योजनाएं क्या-क्या रही हैं....किन-किन स्वनामधन्य वैज्ञानिकों व मनीषियों का सान्निध्य किस-किस रूप में तब से आज तक परिषद् को मिलता रहा है....कृपया परिषद् की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डालने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: विज्ञान परिषद् प्रयाग को देश की अग्रणी विज्ञान संस्था होना चाहिए था किन्तु इसको अनुदान देने या  अन्य सुविधाएँ प्रदान करने में सरकार ने कभी ज्यादा रूचि नहीं ली। डाॅ. आत्माराम जी जब सी एस आई आर के निर्देशक थे तो उन्होंने विज्ञान पत्रिकाओं के लिए पहली बार 10-10 हजार रूपये का अनुदान स्वीकृत किया। यह वर्ष 1972-73 था। तब से विज्ञान परिषद् को अन्य स्रोतों से अनुदान प्राप्त करने में सफलता मिलती रही। फिर तो जैव प्रौद्योगिकी विभाग से श्रीमती मजु शर्मा ने अनुदान दिया। इतना ही नहीं परिषद् को जैव प्रौद्योगिकी कोष तैयार करने की स्वीकृति और अनुदान भी दिया। बाद में विज्ञान प्रसार से श्री नरेन्द्र सहगल ने परिषद् को कई योजनाएं सौंपी जिनके लिए आवश्यक धन भी दिया। परिषद् ने निर्धारित समय में यह कार्य सम्पन्न करा दिया। 

अन्य भी योजनाएं परिषद् को मिलीं-यथा हिन्दी में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विषयक पुस्तकों की सूची तैयार करना। यह कार्य भी सम्पन्न हुआ किन्तु खेद है कि यह सूची प्रकाशित नहीं हो पाई। 

परिषद् ने सरस्वती में पं.महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित वैज्ञानिक लेखों का संग्रह विज्ञान मंजूषा नाम से प्रकाशित किया है। यही नहीं, श्री वंकिम चन्द्र द्वारा लिखे वैज्ञानिक निबन्धों का बंगला से हिन्दी अनुवाद ‘विज्ञान रहस्य’ नाम से प्रकाशित किया है। विज्ञान परिषद् के पदाधिकारियों के अनुकूल होनंे  के कारण हम नई नई योजनाओं पर कार्य करते आ रहे हैं। परिषद् को आभास है कि नवीनतम विचारों या लेखन को बढ़ावा दिया जाय और अपने लेखकों से मौलिक कृतियाँ लिखवाई जायें। परिषद् का शताब्दी समारोह परिषद् के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय कार्य रहा-डाॅ. कलाम ने उद्घाटन किया, विज्ञान की स्मारिका छपी। विज्ञान परिषद् का इतिहास, स्वामी सत्यप्रकाश, भारत के कृषि वैज्ञानिक जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुई। अधुना कोरोना नाम से पुस्तक का प्रकाशन सामयिक सोच का परिणाम है। विज्ञान परिषद् अनुसंधान पत्रिका का 1956 से लगातार प्रकाशन भी हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में हमारा हर प्रयास रहा है और रहेगा।   

प्रो. चमोला: मिश्र जी, आप की साहित्य साधना लगभग 8 दशकों की हो चुकी है। इस लंबी अवधि की सृजन यात्रा के उपरांत क्या आपको अपनी आत्मकथा अथवा अपनी रचनावलियों को प्रकाशित करने अथवा करवाने की बात प्रासंगिक नहीं लगती? आज जबकि अपनी स्वर्ण जयंती अथवा सेवानिवृत्ति पर लोग अपने ग्रंथों, अभिनन्दन ग्रंथों आदि की योजना बनाने लगते हैं...आप तो अमृतोत्सव से भी आगे निकल चुके हैं....और हमारी प्रभु से प्रार्थना हे कि आप शतायु हों....आपके व्यक्तित्व व कृतित्व से वैज्ञानिक व विज्ञान जगत लाभान्वित होता रहे....तो इस संबंध में आपकी क्या राय है? क्या आप का समग्र लेखन प्रकाशित रूप में पाठकों के समक्ष आ चुका है...मेरा अपना सुझाव है कि क्या विज्ञान परिषद् इस प्रकार के समर्पित वैज्ञानिकों, सुधी विद्वानों की  रचनावलियों को प्रकाशित कराने का भविष्य में संकल्प नहीं ले सकता? क्योंकि विज्ञान व वैज्ञानिकों को अंतरंगता से समझने का जितनी भिज्ञता व प्रासंगिकता विज्ञान परिषद् को हो सकती है...संभवतः उतना व्यवसायिक वृत्ति की दूसरे प्रकाशन संस्थानों की नहीं....इस विषय में आपका क्या सोचना है?

प्रो. मिश्र: आपका सोचना ठीक है। मैंने इसका अनुभव किया तभी तो मैंने ‘मेरा जीवन पथ’, ‘बोलते पत्र’ तथा अपने वैज्ञानिक निबन्धों को ‘विज्ञान प्रवाह (2006), इतस्ततः तथा क्वचिद्न्यतोऽपि शीर्षक पुस्तकों के रूप में अपने रूपयों से) परिषद् के लिए प्रकाशित किया है। मेरे प्रशंसक बहुत हैं किन्तु उन्हें मेरी रचनाओं को पढ़ना चाहिए, मेरी वैज्ञानिक लेखन यात्रा का सही सही अनुमान हो सकेगा। भावी पीढ़ी के लिए ऐसा होना आवश्यक है।

प्रो. चमोला: मिश्र जी, युवा वैज्ञानिकों, लेखकों, पत्रकारों, संपादकों को प्रोत्साहित करने में आपका विशेष योगदान रहा है। मुझे याद है कि जिन दिनों में भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून (सीएसआईआर) में कार्यरत था....मेरे संपादन में निकलने वाली पत्रिका ‘विकल्प’ के न जाने कितने महत्वपूर्ण विशेषांक मैंने आपके तथा अन्य विज्ञान लेखकों के परामर्श व प्रेरणा से निकाले थे....जिनकी देश के वैज्ञानिकों, लेखकों एवं विद्वानों ने मुक्त कंठ से सराहना की थी...ऐसे ही न जाने कितनी विज्ञान पत्रिकाओं, लेखकों एवं जिज्ञासु पाठकों को आपने विज्ञान लेखन के लिए प्रेरित किया था। क्या आप इस विषय पर अपना किसी संस्मरण से पाठकों को अवगत कराना चाहेंगे? 

प्रो. मिश्र: आपका कथन शत प्रतिशत सही है। मैंने ‘विज्ञान’ सम्पादक के रूप में तथा स्वयं लेखक होने के नाते सदैव दृष्टि रखता कि कौन से वरिष्ठ लेखक हैं कौन उदीयमान हैं। हमने विज्ञान पत्रिका की ओर से उनसे अनुरोध करके उनके परिचिता से लेख लिखाये और 40-60 पृष्ठों तक के विशेषांक निकाले। सम्भवतः ‘विज्ञान’ ही एकमात्र ऐसी पत्रिका है जिससे 40 से अधिक व्यक्ति विशेषांक निकाले है। इससे लेखकों को अच्छा लगा है। 

प्रो. चमोला: सुना है आप तथा परिषद् के अन्य समर्पित वैज्ञानिकों ने अपने जीविकोपार्जन में से बहुत कुछ हिस्सा परिषद् के जीर्णोद्वार अथवा अन्यान्य योजनाओं के लिए दान दिया है। प्रायः यह सामान्य अवधारणा रहती है कि व्यक्ति किसी संस्था, पद अथवा दायित्व से कुछ पाने के लिए...कुछ अर्जित करने के लिए संबद्ध होता है....किंतु परिषद् से संभवतः आपका जुड़ाव अवैतनिक ही रहा ....बल्कि इसके विपरीत आप कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: विज्ञान परिषद् के सभी पदाधिकारी प्रारंभ से ही अवैतनिक कार्य करते रहे हैं। फलतः इस संस्था से वे ही व्यक्ति जुड़ते रहे जिनमें कुछ पाने की नहीं अपितु देने का विचार रहा। यही परंपरा है इससे जुड़े लोग दीर्घकाल तक कार्य करते रहे। विज्ञान परिषद् को श्री लोकमणि लाल, स्वामी सत्यप्रकाश, विज्ञानरत्न श्री लक्ष्मण प्रसाद जी ने आर्थिक सहयोग किया है। मैंने भी अपनी पत्नी के नाम पर परिषद् प्रांगण में एक अतिथि भवन का निर्माण कराया है। परिषद् द्वारा कई स्मृति व्याख्यान सम्पन्न कराये जाते हैं। इसके लिए लोगों ने आवश्यक धनराशि परिषद् को दे रखी है। 

प्रो. चमोला: मिश्र जी, आपका लेखन बहुआयामी है। आपने विज्ञान लोकप्रियकरण से लेकर अनुसंधान की विभिन्न पक्षों पर...चाहे वह शब्दावली की बात हो, हिन्दी विज्ञान लेखन की या फिर किसी विशिष्ट प्रकार की विषयपरक लेखन की...आपने अद्भुत कार्य किया है। ऐसे में आप किस प्रकार के लेखन में स्वयं को अधिक मुखर पाते है अथवा आपको लगता है यह लिखने की अपेक्षा मैं उस अमुक क्षेत्र में अधिक प्रभावी ढंग से लिख सकता हूं। आप विज्ञान लेखन करते हुए मुख्यतः किन-किन बातों का ध्यान रखते हैं...कृपया विज्ञान लेखकों के लिए विज्ञान गल्प अथवा वैज्ञानिक लेख लिखते हुए किन-किन चीजों की सावधानियां रखनी चाहिए...इन प्रमुख बिंदुओं पर कुछ निर्देशात्मक सूत्र बताने का कष्ट करें। 

प्रो. मिश्र: आपका यह कहना ठीक ही है कि मैंने विगत 50 वर्षों में बहुविध लेखन किया है। किन्तु मैं किसी एक विधा को वरीयता नहीं देना चाहूँगा। आवश्यकतानुसार लेखन करता रहा हूँ और विज्ञान लेखन के जो जो पक्ष निर्बल जान पड़े उन पर लेखनी चलाई किन्तु मैं उन्हीं विषयों पर लेखनी चलाता रहा जिनसे मैं पूरी तरह परिचित रहा। मैंने बहुत सा अनुवाद भी किया या कराया। मेरा उद्देश्य हिन्दी विज्ञान लेखन को समृद्ध बनाना रहा है और अपने सहयोगियों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करता रहा।

मैंने कभी भी विज्ञान गल्प नहीं लिखा। डाॅ. राजीव रंजन उपाध्याय की इस दिशा में रुचि थी अतः हमने एक ऐसा पत्रिका निकालने के लिए उन्हें प्रेरित किया और वे इसे सम्पन्न करते आ रहे हैं।

विज्ञान परिषद् की देश भर में तमाम शाखाएँ हैं। उनमें भी अच्छे अच्छे लेखक हैं। कुल मिलाकर सम्प्रति हो रहे विज्ञान लेखन से सन्तुष्ट हूूँ। किन्तु मैं यह मानता हूँ कि नये लेखकों को सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।  

प्रो. चमोला: मिश्र जी, कहा जाता है एक सफल व्यक्तित्व के निर्माण की पृष्ठभूमि में एक सफल नारी का विशेष सहयोग, भूमिका एवं विशेष हाथ रहता है...तो आपके साहित्यकार एवं वैज्ञानिक के पल्लवन-पुष्पन में डाॅ. राजकुमारी मिश्र यानी आप की श्रीमती जी की क्या भूमिका रही?...या दूसरे शब्दों में कहू....कि एक स्वभावी किसान व संभावी वैज्ञानिक, युवा के मन में एक सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक परिवार से जुड़ने की बात गर्वानुभूति कराती थी या डराती थी...कि क्या मैं गुणता के आधार पर उनके सम्मान व प्रतिष्ठा की रक्षा कर पाऊँगा या नहीं...? आपकी साहित्यिक व वैज्ञानिक गतिविधियों के चरमोत्कर्ष तक की यात्रा में आप डाॅ. रामकुमारी मिश्र एवं तिवारी परिवार के सर्जनात्मक योगदान को आप किस रूप में याद करना चाहेंगे?

प्रो. मिश्र: मैं नही समझता कि मेरी पत्नी या मेरे श्वसुर के कारण मेरा हिन्दी विज्ञान लेखन किसी प्रकार प्रभावित हुआ। हाँ बाद में मेरी पत्नी मेरे लेखन के लिए उपयुक्त वातावरण बनाये रखती थीं। हम कभी भी सिनेमा या अन्यत्र जाने के लिए तैयार नहीं रहते थे। पहले से तै हो जाता था कि अमुक तिथि को बच्चों सहित सिनेमा देखने या किसी मित्र के घर जाना है। 

मेरे लेखन में मेरे श्वसुर का कोई भी रोल नहीं रहा। वे विख्यात भाषा वैज्ञानिक एवं शोधकार्यों के निर्देशक थे। उनके पास शोधछात्रों का जमावड़ा लगा रहता था। 

प्रो. चमोला: आपके अध्यवसायी जीवन में परिवार के लिए तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए समय निकालना किसी प्रकार के तनाव व विवशता का पर्याय तो नहीं बना?..क्योंकि एक लेखक, चिंतक विचारक व वैज्ञानिक का अधिकाधिक समय अपनी साहित्य साधना में चला जाता है....ऐसे में जीवन का एक बड़ा हिस्सा यूँ ही निकल जाता है....आपके होते हुए भी आपके न होने का एहसास लगातार बना रहता है....क्या परिवार को आपकी उपेक्षा या आपको परिवार की उपेक्षा जैसी स्थिति की अनुभूति तो नहीं हुई?

प्रो. मिश्र: न तो मुझे, न मेरे परिवार वालों को कभी लगा कि दो में से किसी की उपेक्षा हुई है। गृहस्थ जीवन व्यतीत करने का अर्थ ही है बौद्धिक कार्यकलापों के साथ ही गृहस्थी के लिए समय निकालना। वह सब मैंने हँसी खुशी के साथ निबाहा है। 

प्रो. चमोला: आप अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताएं कि प्रारंभ से लेकर और आज तक आपने किस प्रकार अपने लेखन की समय-सारणी तय की? क्योंकि आप विश्वविद्यालय के एक जिम्मेदार प्राध्यापक भी रहे....इसके समानांतर कई-कई संस्थाओं का पदभार भी निरंतर आपके ऊपर रहा...ऐसे में परिवार, सामाजिक दायित्व, अध्ययन, सृजनात्मक तथा वैज्ञानिक लेखन के मध्य सामंजस्य कैसे हुआ? एक लेखक व वैज्ञानिक के रूप में आप अपनी कार्ययोजना को कार्य रूप में परिणत कैसे करते थे.....क्योंकि वह युग सूचना-प्रौद्योगिकी की दृष्टि से इतनी पराकाष्ठा यानी सुख-सुविधाओं का युग भी नहीं था....बल्कि मैनुअल (शारीरिक श्रम) हस्तलेखन का सा युग था....कृपया इस पर विस्तार से प्रकाश डालने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: मैंने लेखन के लिए कोई निश्चित समय सारिणी नहीं बना रखी थी। कार्यभार के अनुसार प्रातः जल्दी उठकर लिखने की मेज में बैठ जाता। इसी तरह रात में देर तक लिखना-पढ़ता रहता। पत्नी तथा बच्चे- वे भी पढ़ने वाले थे, अपने अपने कार्यों के अनुसार सोते जागते रहे। मुझे लेखन कार्य कभी बोझ नहीं लगा। मैं पहले अध्यापन के लिए सामग्री तैयार कर लेता तब अन्य लेखन कार्य करता। मैं कभी किसी से अपने लेखन के बारे में चर्चा या परामर्श नहीं करता रहा।

मेरे शोधछात्र अपने अपने कार्यों से घर पर भी आते और उचित निर्देश पाकर चले जाते। जब किसी पुस्तक के लेखन में किसी शोधछात्र का भी हाथ रहता तो वह किसी भी समय लिखित सामग्री दिखला सकता था। 

प्रो. चमोला: संयोग से आपके पास साहित्य और विज्ञान का मणिकांचन सहयोग था और ऐसे में आप विज्ञान में सृजनात्मक लेखन अत्यधिक प्रभावी तरीके से कर सकते थे क्योंकि आपके पास एक वैज्ञानिक सत्य का अन्वेषण करने वाला वैज्ञानिक मस्तिष्क भी था तो उसको भाव प्रवण कल्पनाओं की सतरंगी आंखों में चित्रित करने की संवेदनशील तूलिका भी किंतु आपने अधिकांशतः अनुसंधानात्मक अथवा विज्ञान के गूढ़ विषयों अथवा विज्ञान के लोकप्रियकरण के क्षेत्र में ही कार्य क्यों किया? आज इस पड़ाव पर संभवतः इस बात को आप भी स्वीकार करेंगे कि यदि आप उस क्षेत्र की ओर किंचित भी प्रयास करते तो आप उत्कृष्ट वैज्ञानिक उपन्यासों, वैज्ञानिक कहानियों अथवा काव्य-कृतियों का सृजन करने में सफल हो सकते थे....लेकिन यह सब नहीं हुआ....इसके पीछे क्या वजह रही?

प्रो. मिश्र: मैंने न तो धनार्जन के लिए, न ही पुरस्कार पाने के उद्देश्य से या शोहरत अर्जित करने के उद्देश्य से कोई लेखन कार्य किया। प्रायः प्रकाशकों के अनुरोध पर पुस्तकें लिखीं उससे धनार्जन होना स्वाभाविक था। सरकारी या अन्य अनुवाद कार्य में पारिश्रमिक तो मिलना था ही। 

पुरस्कार के लिए पुस्तकें आमन्त्रित होतीं तो भेज देता। यदि पुरस्कार मिल जाता तो वाह वाह। मैं आपको बता चुका हूँ कि 1950 के पूर्व ही हिन्दी साहित्य के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ तो वह मेरे वैज्ञानिक कार्यकलापों के साथ-साथ चलता रहा। हिन्दी साहित्य में मुझे ऐसे कई क्षेत्र लगे जिनमें वैज्ञानिक ढंग से कार्य करने की आवश्यकता थी यथा पाठालोचन। मैंने हिन्दी साहित्य की ‘भूली बिसरी राहे’ पुस्तक में ऐसे ही पक्षों पर लिखा है। मेरे पास अपने मित्रों के यहां से तमाम प्राचीन पाण्डुलपियां प्राप्त थीं जिनका सम्पादन आवश्यक था। मेैने कुतुबन, मंझन जैसे सूफी कवियों की महत्वपूर्ण कृतियों का न केवल प्रामाणिक पाठ निर्धारित किया अपितु उनके विषय में विस्तार से भूमिकाएं लिखीं। 

लोक साहित्य पर अपने जनपद (जो अन्तर्वेद कहलाता है) से प्रचुर सामग्री मैंने 1960 के दशक में एकत्र की थी। मैंने पं. रामनरेश त्रिपाठी जी द्वारा लिये गये कार्य का अध्ययन किया था। मेरा लोक-साहित्य संकलन 2010-2012 में प्रकाशित हो पाया।

मैंने महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘दक्षिणी हिन्दी काव्यधारा’ पढ़ी तो मुझे अपने पास सुरक्षित दक्खिनी हिन्दी के कवि नजीब शाह कृत हीररांझा, चित्रमुकुट तथा प्रेमनामा कृतियों के सम्पादन हेतु उक्त पाण्डुलिपियों का फारसी लिपि से हिन्दी में कराना पड़ा तब सम्पादन कार्य हुआ।

मेरे श्वसुर की मृत्यु के बाद मुझे उनके घर से महापंडित राहुल के तमाम पत्र मिले जिनका मैंने हिन्दुस्तानी एकेडमी से प्रकाशन करा दिया। जो कार्य हिन्दी विभाग के प्रोफेसरों को करना था वह उनकी अकर्मण्यता  के कारण मुझे करना पड़ा। इसीलिए हिन्दी वाले शायद ही मेरे नाम का उल्लेख करते हों। 

प्रो. चमोला: आज का रचनाकार अपने लेखन से वशीभूत होकर नहीं लिखता बल्कि कई प्रकार के आकर्षणों यथा-पुरस्कार,प्रतिष्ठा,पद व लोभ के हिसाब से अपने लेखन और चिंतन के तेवर व कलेवर में भी गिरगिटिया प्रवृत्ति या स्वभाव का परिचय देता है...क्या एक लेखक को वही लिखना चाहिए...जो वह लिखना चाहता है या फिर वह लिखना चाहिए जो कोई सत्ता,व्यवस्था अथवा आकर्षण उससे लिखवाना चाहता है? आपकी इस लंबी साहित्यिक और वैज्ञानिक साधना की यात्रा में निश्चित रूप से ऐसे अनेक प्रलोभन आए होंगे जिनको अपने अपनी सैद्धांतिक साधना के निकष पर ठुकरा दिया होगा....कृपया कुछ दृष्टांत देकर ऐसे वैचारिक दलबदलू रचनाकारों को संदेश देने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: मैंने न तो पुरस्कार, या पद प्रतिष्ठा की दृष्टि से कोई लेखन किया, न ही कभी परवाह की कि कोई मुझे किस दृष्टि से देख रहा है। मैं विश्वविद्यालय का प्रतिष्ठित शिक्षक होने के साथ ही इतर लेखन कर रहा था। मुझे दलबदलू लेखकों का कोई ज्ञान नहीं था, न है। 

प्रो. चमोला: आज का समय स्पाॅन्सरशिप (प्रायोजन) का समय है....आज स्पोंसर्ड (प्रायोजित) लेखन से लेकर स्पाॅन्सर्ड पुरस्कार तक....सब है....यहां तक कि बड़े-बड़े पदों के निर्धारण तक में भी यह स्पाॅन्सरशिप ही सहायक बनती है....यदि आप यह अर्हता नहीं रखते तो आपकी सृजनात्मक तमाम गुण-लब्धियाँ भी किसी अर्थ की नहीं रह जातीं....पदलोलुपता अथवा कुछ पाने की महत्वाकांक्षा या फिर सत्ता के मोह में किसी के लिए अपने संपूर्ण जीवन का लेखन-चिंतन गिरवी रख देना कितना औचित्यपूर्ण है? आज किसी के लिए घोस्ट राइटिंग (भाड़े पर साहित्य लिखने वाले) करने वालों की कोई कमी नहीं है। स्पाॅन्सरशिप का आॅफर प्राप्त करने का ऐसा दुर्भाग्य क्या कभी आपको तो नहीं प्राप्त हुआ? क्या एक सर्जनात्मक लेखक को इस दुर्लभ मानव जीवन में आकर किसी और के लिए वैचारिक रूप से जीवित रहना कितना तर्कसंगत है?....ऐसा कर क्या वे दोनों ही किसी हीनग्रंथि का शिकार नहीं हो जाते....क्योंकि चिंतन, अनुभूति और अभिव्यक्ति के धरातल पर न लिखने वाले ने न्याय किया है और नहीं लिखवाने वाले ने...ऐसा प्रायोजित लेखन भला समाज व युवाओं को क्या दिशा-दृष्टि देगा? इस प्रकार के स्पाॅन्सर्ड लेखन के बारे में एक दीर्घजीवी रचनाकार व वैज्ञानिक के रूप में आप क्या सोचते हैं?....क्या यह परंपरा, साहित्य अथवा विज्ञान लेखन की जीवंतता के लिए घातक विकल्प नहीं है?....क्या आप अपनी बेबाक टिप्पणी से ऐसे रचनाकारों के लिए कोई सार्थक संदेश देना चाहेंगे?

प्रो. मिश्र: भाड़े पर लिखने वाले हैं और होते आये हैं- धनार्जन की दृष्टि से ऐसा होता रहा है। इस तरह से द्वितीय कोटि की रचनाएं सम्मुख आती रही हैं। चूंकि शिक्षक समाज में साहित्यसेवी या साहित्यकार का सम्मान है यदि यह सम्मान खरीदा जा सके (प्रच्छन्न रहकर) तो इसका लाभ उठाने के लिए तमाम तैयार हो जावेंगे। मैं एक रचनाकार को जानता हँू जिसने मुझसे स्पष्ट बताया कि मझे तो धन की आवश्यकता है मैं किसी भी विषय पर इधर उधर से सामग्री जुटा कर लिख देता हूँ। मुझे पैसे मिले और जिसके लिए लिखा उसने नाम कमाया। यह तो गुप्त प्रेम प्रसंग जैसा है। इससे साहित्य का कल्याण सम्भव नहीं। राजवंश के तमाम नपुंसकों के भी सन्तानें होती रहीं-कैसे? अतः इस घातक प्रवृत्ति की जितनी निन्दा की जाय, थोड़ी होगी।

प्रो. चमोला: मिश्र जी, एक प्रकार का वैज्ञानिक लेखन वह है जो स्वयं वैज्ञानिक द्वारा, जिसके अध्ययन का विषय अधिकांशतः अंग्रेजी रहा, सहज-सरल अथवा टूटी-फूटी हिन्दी में किया जाता है तथा दूसरा वह जो किसी अनुवादक द्वारा अनूदित किया जाता है। पहले प्रकार के लेखन को करने में वैज्ञानिक असहजता अथवा संकोच का अनुभव होता है जबकि अनुवादक किसी रूप में उस विज्ञान लेखन का अनुवाद कर देता है....इस प्रकार दोनों में किस विज्ञान लेखन को आप वैज्ञानिक विषयों की स्पष्टता, उपयुक्त शब्दावली के प्रवाह तथा मौलिकता की दृष्टि से अधिक उचित मानते हैं?

प्रो. मिश्र: मौलिक लेखन के लिए किसी एक भाषा में निपुण होना आवश्यक है अन्यथा टूटी फूटी भाषा से विचार स्पष्ट नहीं होंगे। यही कारण कि जब ऐसी कृति का अनुवाद होता है तो वह चमक उठती है। विदेशी वैज्ञानिकों के समक्ष भी भाषा का प्रश्न था-लैटिन में विचार व्यक्त करना सहज न था। न्यूटन आदि को ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। यदि अनूदित होकर कोई कृति अधिक स्पष्ट , सहज बन जाती है तो मूल अनुवाद का भेदभाव छोड़ देना चाहिए। 

मौलिकता तो अपने स्थान पर है, उसकी सहजता, सर्वग्राह्यता के लिए मूल लेखक को किसी अनुवादक की सहायता लेनी चाहिए। विदेशों में तो वैज्ञानिकों की पत्नियों ने अनुवाद प्रस्तुत किये हैं। जनसामान्य की समझ के लिए पारिभाषिक शब्दों के ग्राह्य अनुवाद ही प्रयुक्त होने चाहिए। 

प्रो. चमोला: विज्ञान लेखन करते हुए पारिभाषिक शब्दावली की क्या भूमिका है? राष्ट्रीय स्तर पर क्या वैज्ञानिकों को एक प्रामाणिक अर्थात वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार द्वारा तैयार की गई शब्दावलियों का ही प्रयोग विज्ञान लेखन में करते हैं, शब्दावली के स्तर पर इस अराजकता के संबंध इस बारे में आपका क्या कहना है?

प्रो. मिश्र: 1960-61 के पूर्व तक, जब तक प्रामाणिक पारिभाषिक शब्दावली कोश नहीं बने थे, लेखक अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार शब्दों के अनुवाद करते रहे। डाॅ. रघुबीर द्वारा प्रस्तुत पारिभाषिक शब्द प्रयोग में लाते रहे। फलस्वरूप बहुत सा साहित्य 1960 के बाद एक तरह से निरर्थक हो गया। 

भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई पारिभाषिक शब्दावली संस्कृत आधारित होने से हिन्दी क्षेत्रों के अलावा देश के अन्य भागों में भी समझी जा सकी थी। फलतः इसके बाद जितना हिन्दी विज्ञान लेखन हुआ उसमें एकरूपता आई और आज वही सर्वमान्य है। अब चाहे छात्र हो, अध्यापक या लेखक, नई पारिभाषिक शब्दावली से अवगत हैं और उन्हीं का प्रयोग करते हैं फलतः हम विज्ञान में प्रयुक्त हिन्दी के रूप को भारत की राष्ट्रभाषा कह सकते हैं। इस पारिभाषिक शब्दावली ने 4 लाख नये शब्द दिये हैं, हिन्दी के कोष को समृद्ध किया है।  

प्रो. चमोला: मिश्र जी, प्रायः वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा निर्मित पारिभाषिक शब्दावली पर वैज्ञानिकों एवं सामान्य विज्ञान लेखक द्वारा क्लिष्ट,दुरूह और अव्यावहारिक होने का आरोप लगाया जाता है...ऐसे में क्या आप शब्दावली की दुरूहता के चलते उत्कृष्ट वैज्ञानिक लेखन के लिए प्रामाणिक शब्दावली को महत्व देना चाहेंगे अथवा इसे विज्ञान लेखक की क्षमता अथवा उसकी शब्दावली सामथ्र्य पर छोड़ देंगे, कृपया स्पष्ट करें।

प्रो. मिश्र: जो लोग शब्दावली को दुरूह कहते हैं, वे अपने अज्ञान को ही उजागर करते हैं। हिन्दी के साथ साथ संस्कृत का ज्ञान होने पर शब्दावली दुरूह नहीं लगेगी। आज अनुवाद का युग है। विदेशी साहित्य का अनुवाद होता आया है और आगे भी होता रहेगा। यदि वर्तमान पारिभाषिक शब्दावली का अनुवाद में प्रयोग करेंगे तो जो अनुवाद सामने आयेगा वह सर्वग्राह्य होगा और मूल के निकट होगा। 

अनुवाद को द्वितीय कोटि का साहित्य मानना भूल होगी। अब निजी शब्दावली के लिए कोई स्थान नहीं रहा। 

प्रो. चमोला: प्रो. मिश्र जी, अनुवादक,भाषा एवं शब्दावली का ज्ञाता होता है। वह एक शब्द के लिए दूसरे प्रासंगिक पर्याय दे सकता है...किंतु विषय की दृष्टि से उसकी उत्तमता का दावा नहीं कर सकता। ऐसे में ज्ञान-विज्ञान संबंधी लेखन अथवा विज्ञान लोकप्रियकरण विषयक अनूदित लेखों की मौलिकता कितनी संरक्षित रहती है...क्योंकि आज हमारे पास देश-दुनिया का जो ज्ञान विज्ञान पहुंच रहा है....वह अनुवाद के अनुवाद का अनुवाद है। विश्वास किया जाना चाहिए कि बहुत कुछ मौलिकता का क्षरण अनुवादक की विषयकगत असमर्थताओं के कारण संभव होता हो किंतु दूसरी ओर यह भी मानना उतना ही आवश्यक है कि आज अनुवादक के माध्यम से ही वैश्विक भाषाओं एवं संस्कृतियों की सामग्री अनूदित होकर पाठकों तक पहुंचती है। ऐसे में अनुवाद के भविष्य और विज्ञान लेखन के संदर्भ में आपका क्या कहना है?

प्रो. मिश्र: साहित्य में भी रामायण,महाभारत के अनुवाद अन्य भाषाओं में हुए हैं। विज्ञान के क्षेत्र में तो विदेशी कृतियों के अनुवाद परमावश्यक हैं। अनुवाद के बिना उन्हें अपने अपने देशों में समझा नहीं जा सकता।  अनुवाद अब कला बन चुका है। अनुवाद का स्थान अनुवाद ही ले सकता है।

प्रो. चमोला: मिश्र जी, विज्ञान संचार क्या है? आज देश में विज्ञान संचार और विज्ञान संचारकों की स्थिति क्या है?....एक विज्ञान संचारक, वे, जो विधिवत रूप से विज्ञान की शिक्षा-दीक्षा लिए हुए हैं... उनकी भाषा.... तथा एक विज्ञान संचारक या विज्ञान संचार में रूचि रखने वाले वे लोग, जो शौकिया तौर पर वैज्ञानिक विषयों पर लिखते हैं... लेकिन मूलतः विज्ञान विषयों के नहीं हैं...उन दोनों प्रकार के लेखकों की शब्दावली के मध्य आप कैसा अंतर पाते हैं और दोनों में से विज्ञान संचार लेखन के लिए किस प्रकार की शब्दावली को आप अधिक उपयुक्त व प्रामाणिक पाते हैं?

प्रो. मिश्र: विज्ञान संचार (Science Communication) नया गढ़ा शब्द है। पहले इसे हम विज्ञान लोकप्रियकरण कहते थे, वे लेखक अबScience Communicator कहलाना पसन्द करेंगे’कारण कि कुछ ऐसी हवा बही है कि हम पुनः अंग्रेजी की ओर उन्मुख हो रहे हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि जो लोग स्वयं को लोकप्रियकरण में असमर्थ पा रहे थे, वे इस नई शब्दावली से अग्रणी पंक्ति में आ गये और विज्ञान प्रसार की ओर से एक बार विज्ञान परिषद् प्रयाग में भारत भर के Science Communicator  का जमघट हुआ। 

जो वैज्ञानिक हैं और साथ ही हिन्दी भाषा में पटु हैं वे अपने विषय को अधिक प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत कर सकते हैं किन्तु जो द्वितीय श्रेणी के लेखक हैं अर्थात जो लिखने के लिए अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन करके परिश्रमपूर्वक लिखते हैं, वे भी आदरणीय है। इतने बड़े देश में, हिन्दी पट्टी के लिए लेखकों की जमात चाहिए- और विभिन्न स्तरों का वैज्ञानिक साहित्य भी चाहिए क्योंकि छात्रों, अध्यापकों तथा जनसामान्य को वैज्ञानिक जानकारी तो चाहिए ही। इस विज्ञान युग में आप कंठीमाला लेकर नहीं बैठ रह  सकते। आप यह दोषारोपण नहीं कर सकते कि हमें अंग्रेज बनाया जा रहा है। हमें विधर्मी बनाया जा रहा है। आज जैसा वैज्ञानिक वातावरण है उसमें आप को जीना है तो आपको जो परोसा जा रहा है, उसे ग्रहण कीजिये- उससे उर्जा प्राप्त कर स्वयं भी लेखन कीजिए। देने के लिए हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ होता है।

प्रो. चमोला: आपने विभिन्न विधाओं में इतना बहुआयामी लेखन किया है। क्या आपके वृहद विज्ञान लेखन एवं अनुसंधानपरक साहित्य पर देश के किन्हीं विश्वविद्यालयों में पीएचडी स्तरीय शोध-कार्य संपन्न हुआ है? कृपया इस पर भी प्रकाश डालने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: भले ही मैंने विज्ञान लेखन की सभी विधाओं में लेखनी चला कर विज्ञान लेखन के क्षेत्र को विस्तीर्ण किया है किन्तु अभी तक इस ओर विश्वविद्यालय के तथाकथित शोध निरीक्षकों का ध्यान नहीं गया। अतः मेरे विज्ञान लेखन पर किसी विश्वविद्यालय में अभी तक कोई शोधकार्य सम्पन्न होने की सूचना नहीं है। वैसे हिन्दी साहित्य में पहले जीवित कवियों या लेखकों पर शोध नहीं करवाया जाता था। सम्भवतः मेरे साथ कुछ वैसा ही संयोग हो। 

प्रो. चमोला: विज्ञान लेखन एवं वैज्ञानिक क्षेत्र में आप भारतवर्ष में किस वैज्ञानिक को अपना आदर्श मानते हैं तथा आपके लेखन एवं चिंतन को किसने सर्वाधिक प्रभावित किया? अंग्रेजी तथा विभिन्न भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन कर रहे वैज्ञानिकों के बारे में आपकी क्या राय है....क्या विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखा गया विज्ञान हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के विज्ञान लेखन को समृद्ध करने के लिए कुछ सहयोग प्रदान कर सकता है?

प्रो. मिश्र: मैं किस वैज्ञानिक को या हिन्दी विज्ञान लेखक को अपना आदर्श कहूँ- कठिन है। मृदा विज्ञान के क्षेत्र में मेरे गुरु डाॅ. नीलरत्नधर विख्यात वैज्ञानिक थे। विज्ञान परिषद् के कर्णधार डाॅ. सत्यप्रकाश जी भी मेरे गुरु रहे और बाद में मैं उनका सहकर्मी बना। उसी तरह प्रो. फूलदेव सहाय वर्मा, डाॅ. आत्माराम जी मेरे मार्गदर्शक रहे। अतः मैं इन सबका ऋणी हँू। मैंने एक पुस्तक भी लिख दी है ‘जिनका मैं कृतज्ञ हूँ’ जिसमें 29 पुरुषों/महिलाओं के प्रति मैंने कृतज्ञता प्रकट की है। अपने 60 वर्ष के दीर्घ लेखन काल में मैं अनेक महापुरुषों,महिलाओं के सम्पर्क में आया और उनसे कुछ न कुछ सीखा। जब चाहूँ तो कह दूँ ‘‘एकोऽहं बहुस्याम’’ देश की अन्य भाषाओं-बंगला, मराठी, तमिल में प्रचुर विज्ञान लेखन हुआ है जो उच्च कोटि का है। हमने अभी तो बंकिम चन्द्र द्वारा अपनी पत्रिका के लिए लिखे वैज्ञानिक लेखों का बंगला से हिन्दी अनुवाद ‘‘विज्ञान रहस्य’ नाम से प्रकाशित किया है। हमें परिषद् के द्वारा डाॅ. मेघनाद साहा तथा डाॅ. आत्माराम जी के सम्पूर्ण कृतित्व को जो अंग्रेजी में है, उसका हिन्दी अनुवाद कराकर प्रकाशित कर चुके हैं। हम प्रयत्नशील है कि डाॅ. रामन के कृतित्व को जो लगभग 3500 पृष्ठों के होगें हिन्दी में ला सकें। इसके लिए हमें आर्थिक सहयोग की अपेक्षा है। 

प्रो. चमोला: भारत, आस्थाओं का देश है। यहां के जीवन मूल्यों में संस्कारों में देव परंपरा का आविर्भाव नैसर्गिक रूप से समाहित है। ऐसे में एक वैज्ञानिक के रूप में आप ईश्वरीय आस्था, धर्म,अध्यात्म के बारे में किस प्रकार सोचते हैं? वैज्ञानिक,प्रयोग व तथ्यों की कसौटी पर ही विश्वास करता है जबकि आस्था में अनेकानेक किंवदंतियों, कपोल-कल्पित,यद्यपि वे भी कभी न कभी जरूर घटित हुई होंगी, तभी तो चित्रित हैं...परंपराओं का समावेश होता है। क्या आप ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करते हैं? विज्ञान और आध्यात्म या धर्म का अभीष्ट क्या है?

प्रो. मिश्र: आपने आस्था, धर्म आदि की बात उठाई है। मैं बचपन से ही आर्य समाज के सिद्धान्तों से परिचित था और यह कह सकता हूँ कि प्रभावित भी। मेरे गांव में स्वामी नन्द जी थे जिन्होंने हमारा नामकरण किया था, बाद में इलाहाबाद में डाॅ. सत्यप्रकाश जी मेरे मार्गदर्शक रहे, जो स्वयं आर्यसमाजी थे, उनके पिता भी। अतः हमने विज्ञान को तथ्यों पर आधारित ज्ञान समझ कर लेखन किया। हमें आस्था या धर्म के विषय में सोचने का अवसर ही नहीं मिला। ये दोनों ही संकुचित विचारों को जन्म देते हैं। यूँ हिन्दी साहित्य प्रेमी होने से भक्ति, उपासना, ईश्वर के बारे में पूरा पूरा ज्ञान है किन्तु मैंने स्वयं को न तो भक्त समझा, न ही अन्य कुछ। तर्क द्वारा जो उचित जान पड़ा, उसे अपने गृहस्थ जीवन में उतारा। न तो हनुमान चालीसा का भक्त बना, न ही भगवद्गीता का। इन सबमें जो कुछ भी ग्रहणीय था,  उसे ही ग्रहण करने की कोशिश की। निस्सन्देह इससे मुझंे दुःख झेलने, विपत्ति में भी कार्य करते रहने का सम्बल मिला। मैं श्रील प्रभुपाद जी के ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद करते समय स्वयं को ईश्वरमय मानता रहा। किन्तु यदि मुझसे कोई पूछे कि आप वैष्णव हो, शाक्त हो, बौद्ध हो- या कुछ अन्य तो मैं तो यही कहूँगा कि मेैं सांसारिक मनुष्य  हूँ, परिस्थितियों से प्रभवित होता आया हूूँ। कर्म को ही धर्म माना है-कर्मण्येवाधिकारस्ते। और इसके ‘मा फलेषु कदाचन’ पर विश्वास रखता  हूँ। मैंने हिन्दी विज्ञान लेखन के साथ साथ हिन्दी साहित्य की भी जो सेवा की है-उससे मुझे संतोष मिलता रहा है। मैंने कभी फल-यश,पुरस्कार की दृष्टि से कोई कार्य नहीं किया। शायद विश्वविद्यालय का शिक्षक रहने के कारण मुझमें आत्मतुष्टि कुछ अधिक ही रही। यूं तो सुदामा जी का वाक्य याद आता रहेगा-‘शिक्षक हौं सिगरे जग को’।

प्रो. चमोला: क्या आप पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं? तो यह बताएँ कि अगले जन्म में आप क्या बनना चाहेंगे और क्या अपने परिवार के उन्हीं सदस्यों को फिर परिवार के रूप में पाना चाहेंगे या फिर एक विरक्त साधु होकर धर्म,अध्यात्म और विज्ञान की दुनिया में खोएं रहेंगे?

प्रो. मिश्र: आपका प्रश्न जटिल है। मैं तो इसी जन्म में सब कुछ कर लेना चाहता हँू तो पुनर्जन्म क्यों चाहूँगा। मेरा पुनर्जन्म में विश्वास नहीं। मैं ब्राह्मण रूप में उत्पन्न होकर एक कर्मयोगी की तरह जीवन यापन करता रहा हूू तो पुनर्जन्म में क्या पाऊंगा। जब पुनर्जन्म में विश्वास ही नहीं तो फिर से इसी परिवार को पाने की आशा व्यर्थ है और यह कहना कि मैं संन्यस्त, अध्यात्म और विज्ञान की दुनिया में रहँूगा कठिन है। यदि पुनर्जन्म होता भी तो शायद मैं यह मैं नहीं होऊंगा।

प्रो. चमोला: मिश्र जी, जब आप अपने आठ दशकों के जीवन के सबसे प्रिय व सुखद क्षणों को आप याद करते हैं तो वे क्या हैं? और यदि इसके विपरीत बात करूँ तो ऊब, उदासी सन्नाटा एवं खोफनाक अवसाद के दुखद क्षण कौन से थे? इन आह्लादपरक अथवा अवसादग्रस्त क्षणों में आप के साथ विज्ञान था या अध्यात्म?... इन दोनों के मध्य आपको जीवन की सार्थकता क्या लगती है?

प्रो. मिश्र: मनुष्य जीवन में सुख-दुख आता जाता रहता है। विद्यार्थी जीवन में जिस तंगी से रहना पड़ता था उसे दुख के क्षण कहूँ। शिक्षण, शोध, लेखन,पारिवारिक जीवन को सुख कहूँू तो यह ठीक न होगा। जो सुख-दुख में समान भाव से रहले, वही असली मनुष्य है। अध्यात्म और विज्ञान में अन्तर नहीं है दोनों में कर्मठता आवश्यक है। हां, लक्ष्य सुनिश्चित होना चाहिए।

प्रो. चमोला: मिश्र जी इस भौतिक संसार की वस्तुतः उपलब्धि क्या है? क्योंकि जिन उपलब्धियों के पीछे जीवन भर हम अपने चिंतन, मनन, लेखन, आदर्श एवं मूल्यों की गठरी को कस्तूरी मृग के समान दौड़ते-भगाते रहे....वह सब एक दिन इस नश्वर जगत में धरा का धरा रह जाएगा। प्रतापी राजाओं के स्वर्ण महल, शीश महल सब के सब काल के गर्भ में धूल-धुसरित हो गए...जो कुछ अर्जित किया...सब यहीं का यहीं रह गया...फिर इस भौतिक जगत में आकर वास्तव में हमने क्या पाया? कौन सी ऐसी उपलब्धि है जो हमें परमानंद की अनुभूति करा सकती हैं?...कृपया एक वैज्ञानिक व आध्यात्मिक चेतना को....एक साथ जीने वाले सुधी साधक के रूप में इस पर अपने विचार प्रकट करने का कष्ट करें।

प्रो. मिश्र: यह संसार नश्वर है का अर्थ है कि जितने भी प्राणी हैं, प्राणी ही क्यों अन्य भौतिकी वस्तुएं भी नष्ट होती आई हैं। अमरत्व की कल्पना दुराशा है। इसलिए वर्तमान में, जो आपके समक्ष है, उसमें कर्म करते जाइये। फल की चिन्ता मत कीजिए। भौतिक जगत में आकर हमने क्या पाया? हमें मनुष्य जीवन मिला, जो दुर्लभ है। अतः इसका सदुपयोग कर्म करके कीजिये। परमानन्द की अनुभूति तभी हो सकती है जब हम अपने कार्य को पूर्ण मनोयोग से करते हैं। योगः कर्मसु कौशलम्। योग की अवधारणा योगी के लिए ही नहीं, हर व्यक्ति के लिए है। इसके लिए प्रारम्भ से ही समुचित शिक्षा दी जानी चाहिए। पहले के गुरुकुलों में आचार्यगण अपने शिष्यों को जीने का मार्ग बताते थे। आजकल इस ओर ध्यान नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी के कारण बच्चों को अपना दिमाग लगाने की आवश्यकता ही नहीं रह गई, उन्हें अपने  चरित्र निर्माण के लिए जिन गुणों की आवश्यकता है। उन्हें विकसित करने पर ध्यान ही नहीं जाता। बस, सूचना प्रौद्योगिकी के बल पर लाभप्रद नौकरी मिलनी चाहिए। यही आज के विद्यार्थियों का अभीष्ट है। देश की संस्कृति को आत्मसात किये बिना, मात्र बुद्धि से विज्ञान के सहारे जीवन का अभीष्ट प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं। 

आज के शिक्षित युवा से ग्रामीण युवक श्रेष्ठ है, क्योंकि उसे जीवन में संघर्ष करने का मन्त्र अपने अभिभावकों से मिला रहता है। मध्यम वर्ग के परिवारों के बच्चों को जीवन की कठिनाइयों का कोई पूर्व ज्ञान नहीं रहता न ही वे समझना चाहते हैं।

प्रो. चमोला: आपको अपने इस दीर्घ साधनात्मक जीवन का सबसे बड़ा मलाल (असंतोष) क्या है और सबसे बड़े संतोष का विषय क्या है?...जिसे आप इस दुर्लभ जीवन की वास्तव में विशिष्टतम उपलब्धि किसे मानते हैं?

प्रो. मिश्र: मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूूँ क्योंकि मैंने विद्यार्थी जीवन में कष्ट सहें, पारिवारिक जीवन को जिया और अब संन्यस्त जीवन में विज्ञान परिषद् प्रयाग में बौद्धिक कार्य करते हुए, सहयागियों का मार्गदर्शन करता हूँ। मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि आत्मतुष्टि है। मुझे दूसरे की उन्नति होतें देखकर हर्ष होता है।

प्रो. चमोला: मिश्र जी, आप भी मानते होंगे जितने निष्ठा,समर्पण, संघर्ष, अपनत्व एवं मूल्यपरक चेतना से आपने अपनी साधना की इस जीवन वाटिका को टुकड़ा टुकड़ा सहेज कर एक बहुत बड़े मूल्यादर्श के रूप में स्थापित किया है...आप के बाद वह समूची परंपरा, वह समूचा चिंतन,समूचा लेखन क्या इसी रूप में सुरक्षित व संरक्षित रहेगा अथवा कोई उसको याद करेगा? क्या इस बात की अनुभूति, चिंता व भावी परिकल्पना आपको क्षुब्ध करती है? ....क्योंकि परंपराओं के निर्माण में सदियों का समय लगता है और उसको तोड़ने, विखंडित करने, उखाड़ने या समाप्त करने में चंद मिनटों का समय....। क्या आप इस पर कुछ सोचते हैं?

प्रो. मिश्र: मैं अपने परिवार के मुखिया के रूप में जो कुछ करणीय था कर चुका, अब मेरे परिवार में, मेरे पास कोई नहीं-मैं ही बचा  हूँ। विज्ञान परिषद् ही मेरा परिवार है। इसमें मैंने जो संघर्ष करके मानदण्ड स्थापित किया, उसकी भावी सुरक्षा के लिए यह सहयोगियों से ही कामना करता हँू। मेरा विश्वास है कि वे मेरी कार्यशैली का अनुकरण करेंगे तो 100वर्ष पुरानी इस संस्था को आगे बढ़ाते चलेंगे। हमारे ऊपर राष्ट्रीय उत्थान का जो बोझ है उसे वहन करते रहने के लिए विज्ञान परिषद् प्रयाग स्थली है- अवैतनिक सेवाएं प्रदान करना,निर्लिप्तता,कर्मठता, दूरदृष्टि- इन सबों से परिषद् गतिमान रहेगी।ऐसी परम्परा बन चुकी है जिस पर चलना अब सरल हे। मैं आशावादी हूँ। 

प्रो. चमोला:  प्रो. मिश्र जी, यह साक्षात्कार आपको कैसा लग रहा है? जिसका न कोई ओर है ना कोई छोर ही....बल्कि झंझावातों की तरह, चक्रवातों की तरह, स्मृतियों की बोझिल हवाओं के बवंडर की तरह....वह न जाने किस दृष्टि व दिशा की ओर से आकर किस दिशा में जाकर खो जाता था.....मैं भी नहीं जानता....आप इस साक्षात्कार के बारे में क्या कहना चाहेंगे क्योंकि इसमें आपका किसान भी सुरक्षित है: आपका वैज्ञानिक भी सुरक्षित है, आपका चिंतक, विचारक, साधक,आध्यात्मिक और दैवीय चिंतन वाला व्यक्ति भी उड़ उड़ कर सामने आता है....आपको क्या लगता है....क्या यह साक्षात्कार आपकी इस साधना की अक्षय झोली से कुछ अपने पाठकों के लिए, शोधार्थियों के लिए, अपने युवाओं के लिए कुछ बटोर पाया होगा....आपको इन टेढ़े-मेढ़े प्रश्नों का उत्तर देने में किसी प्रकार के कष्ट, परेशानी अथवा असहजता की अनुभूति तो नहीं हुई?

प्रो. मिश्र: यह साक्षात्कार तो आपकी जिज्ञासा का प्रमाण है। आपने मेरे विषय में पढ़कर, सुनकर, गुनकर तमाम तरह के प्रश्न पूछे- उनके जो उत्तर मैंने दिये हैं उनमें मेंैने ध्यान रखा है कि ये उत्तर पाठकों, शोधाथर््िायों को अपने जीवन में झाँकने के लिए विवश करें। यदि मेरे किसी एक वाक्य से उसको लाभ हो सका तो आपका प्रयास सफल हुआ-समझना होगा।  बहुत-बहुत धन्यवाद।

5.

एक समर्पित विज्ञान एवं हिन्दी साहित्य साधक के प्रति सहयोगियों द्वारा अभिव्यक्त समन्वित सम्मतियाँ

डॉ. शिवगोपाल मिश्र का साहित्यिक अवदान

डॉ. शिवगोपाल मिश्र के साहित्यिक अवदान को हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में या तो नितान्त हाशिये पर डाल दिया गया है अथवा संज्ञानित ही नहीं किया जाता क्योंकि वह हिन्दी विज्ञान पत्रकारिता के अप्रतिम कलमकार और हिन्दी विज्ञान लेखन के शीर्षस्थ हस्ताक्षर हैं। किन्तु, किसी विशिष्ट हस्ताक्षर के साहित्यिक क्षेत्र में अवदान को ऐसे ही नहीं भुलाया जा सकता। 

डॉ. मिश्र द्वारा हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की विशारद एवं साहित्यरत्न की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर फिर हिन्दी के प्रति जो अनुराग जगा उसके फलस्वरूप वे महाकवि निराला के सम्पर्क में आये और हिन्दी साहित्य के इतिहास का गहन अध्ययन किया। इस बीच उनका सम्पर्क महापंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ उदय नारायण तिवारी, पं. कृष्ण दत्त बाजपेयी प्रभृति विद्वानों से हुआ। फलस्वरूप उनमें लोक साहित्य एवं पुरातत्व के प्रति भी अनुराग जागा। 

डॉ. मिश्र ने हसवा (फतेहपुर) के कवि चन्ददास तथा गुनीर के संत लक्षदास, रायबरेली के कवि ललचदास के हस्तलिखित ग्रन्थों के आधार पर कई लेख लिखे। पं. श्री नारायण चतुर्वेदी के प्रोत्साहन के फलस्वरूप जनपद फतेहपुर में हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज की और निबन्ध लिखे।

इसका परिणाम यह हुआ कि डॉ. मिश्र ने सर्वप्रथम ईश्वरदास कृत सत्यवती (एक प्रेमाख्यान) का सम्पादन किया जिसे ग्वालियर के हिन्दीसेवी श्री हरिहर निवास द्विवेदी ने प्रकाशित किया।

फिर तो हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय से सूफी कवि मंझनकृत मधुमालती का प्रकाशन हुआ जिसकी प्रशंसा डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, पं. परशुराम चतुर्वेदी तथा डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने की। तत्पश्चात् हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने सूफी कवि कुतुबनकृत मृगावती का प्रकाशन किया। इसकी हिन्दी जगत में काफी प्रशंसा हुई क्योंकि अभी तक इस ग्रंथ की प्राप्ति नहीं हुई थी। इसी क्रम में साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने डॉ. मिश्र द्वारा सम्पादित भीमकवि कृत डंगवै तथा चक्रव्यूह कथा का प्रकाशन किया।

डॉ. मिश्र विज्ञान का कार्य करते हुए हिन्दी साहित्य का कार्य करते रहे। उन्होंने आलमकृत माधवानल कामकन्दला का भी सम्पादन किया।

पाठालोचन के क्षेत्र में डॉ. माता प्रसाद गुप्त की परम्परा में डॉ. मिश्र द्वारा उपर्युक्त ग्रंथों का सम्पपदन-उनके प्रामाणिक पाठ का निर्धारण तथा कवि परिचय, भाषा का विश्लेषण आदि किया गया। दुर्भाग्यवश आज हिन्दी के क्षेत्र में पाठालोचन विधा का अवसान हो चुका है। कारण कि कोई भी शोध छात्र न तो हस्तलिखित ग्रंथों की खोज करता है, न ही उनके सम्पादन, विश्लेषण में रुचि लेता है।

हिन्दी पाठालोचन के क्षेत्र में डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त ने भी महत्वपूर्ण कार्य किया है-चन्दायन का सम्पादन करके। डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल तथा पं. परशुराम चतुर्वेदी का नाम अग्रगण्य इसलिए है क्योंकि उन्होंने प्रामाणिक पाठों के आधार पर व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं।

डॉ. मिश्र ने हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद से हरिचरित्र तथा सत्कवि गिरा विलास का प्रकाशन किया है। ये दोनों कृतियां पाठालोचन की ही उपज हैं किन्तु इन पर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। डॉ. किशोरी लाल गुप्त जैसे साहित्य मर्मज्ञ ने ही इनका महत्व समझा था। वे भी महान खोजी थे।

डॉ. मिश्र की विगत 60 वर्ष से अधिक की साहित्य साधना के मूल्यांकन की आवश्यकता है। काश! हिन्दी वाले इनकी साहित्य सेवा का आकलन करते।

डॉ. मिश्र का दूसरा सबसे बड़ा योगदान है महाकवि महाप्राण निराला के जीवन तथा साहित्य पर कई ग्रंथों की रचना। शायद ही किसी ने किसी कवि का इतनी अन्तरंगता से अध्ययन किया हो। इस क्षेत्र में उनकी मुख्य कृतियां हैं

‘ऐसे थे हमारे निराला’, ‘महामानव निराला’, ‘निराला के सम्पर्क में’, ‘निराला के संस्मरण’, ‘निराला एक दृष्टि अनेक तथा कवि निराला’: ‘एक पुनर्मूल्यांकन’।

डॉ. मिश्र अभी भी मौन नहीं हैं। ये निराला जी पर लिखी प्रथम पुस्तक-ऐसे थे हमारे निराला का द्वितीय संशोधित संस्करण निकाल चुके हैं। जिसमें काफी नवीन सामग्री सम्मिलित की गई है- विशेषकर निराला पर जो गोष्ठियां हुई हैं उनकी जो मूर्तियां स्थापित हुई हैं, उनके नाम पर जहाँ-जहाँ निराला नगर, निराला मार्ग या निराला भवन स्थापित हुए हैं, उनके विवरण हैं। उनके मित्रों, आलोचकों की भी सूची दी गई है। निराला, महाप्राण नामक पत्रिकाओं का भी उल्लेख हुआ है।

इतनी अटूट सेवा हेतु उन्हें हिन्दी गौरव, हिन्दी वाचस्पति या पद्मश्री जैसे सम्मानों से कभी का विभूषित हो जाना चाहिए था किन्तु निस्पृह डॉ. मिश्र के लिए सेवाभाव मुख्य रहा है। वे मौन रहकर विज्ञान तथा साहित्य की सेवा करते आ रहे हैं। वे विज्ञान परिषद् को अपनी कर्मभूमि बनाकर उसकी प्रगति हेतु मनसा वाचा कर्मणा समर्पित हैं। वे हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा मानते हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक “हिन्दी में विज्ञान लेखन-भूत, वर्तमान, भविष्य‘‘ के उपसंहार में अपना दृढ़ विचार व्यक्त किया है-विज्ञान की भाषा हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी होगी। विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली ने हिन्दी शब्दकोश में लाखों नये शब्द जोड़े हैं।‘‘ 

ऐसे उदार दृष्टि वाले, समन्वयवादी लेखक डॉ. मिश्र शीघ्र ही 90 वर्ष के कर्मठ सर्जक होंगे। उन्हें हमारा विनम्र प्रणाम।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र . संयुक्त मंत्री एवं सहायक सम्पादक ‘विज्ञान‘, विज्ञान परिषद प्रयाग प्रयागराज-2


साहित्यकार डॉ. मिश्र, आपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में मिश्र बन्धुओं के योगदान के विषय में अवश्य पढ़ा होगा। लगभग वैसा ही कार्य बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में डॉ. शिवगोपाल मिश्र ने किया है। वे मूलतः मृदा विज्ञान के जाने-माने विद्वान है, किन्तु उन्होंने महाकवि निराला के सम्पर्क में आने के बाद हिन्दी साहित्य के विभिन्न अंगों पर जो शोधकार्य किया, जिस तरह प्राचीन पांडुलिपियों की खोज करके उनका संपादन किया और साहित्य, जीवनी, लेखन, डायरी लेखन, पत्र-संकलन आदि विधाओं के जो शोधपूर्ण कार्य किये हैं तथा निराला जी के अन्तिम 12 वर्षों का जिस विस्तार से लेखन किया है वह अपने आप में अद्वितीय है और सबसे मजेदार बात यह है कि 90 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर भी वे पूर्ववत् साहित्य सेवा में संलग्न है। हिन्दी जगत् के लिए यह गौरव का विषय है किन्तु शायद आजकल के आत्म विज्ञापन के युग में डॉ. मिश्र की ओर हिन्दी इतिहास लेखकों एवं आलोचकों का ध्यान नहीं गया।

कोई भी साहित्यिक व्यक्ति कविता लेखन से अपना जीवन प्रारम्भ करता है। कवि को मनीषी स्वयंभू तक कहा गया है। धीरे-धीरे वह गद्य की ओर मुड़ता है तो कहानी और उपन्यास लिखा गया है। प्रायः कहानीकार और उपन्यासकार ही बहुत चर्चित होते हैं।

डॉ. मिश्र ने भी 1952 में कविता शुरू की। वे चित्रकूट यात्रा के दौरान रत्नावली प्रसंग से प्रेरित हुए और मैथिलीशरण गुप्त की ‘यशोधरा‘ को आधार मानकर एक खण्डकाव्य ‘रत्नावली‘ की रचना कर दी। जब उसे निराला जी को दिखाया तो उन्होंने कहा कि अभी इसे रख दो। पंद्रह-बीस वर्ष बाद इसे खोलना।

तब तक निराला जी नहीं रहे। वह पांडुलिपि पड़ी रही। 2019 में पुराने कागजों में यह पांडुलिपि मिली तो डॉ. मिश्र ने इसे प्रकाशित कर दिया, ताकि सनद रहे, काम आवे। परन्तु डॉ. मिश्र कवि होने की न तो मंशा रखते हैं, न ही दावा करते हैं।

कविता तो तुलसीदास की है-‘वे स्वान्तः सुखाय‘ थी किन्तु विश्वविख्यात हुई। डॉ. मिश्र ने न कोई कहानी लिखी, न कोई उपन्यास। हाँ, उन्होंने गद्य की अन्य सभी विधाओं में काफी सृजन कार्य किया और उसी के बल पर उन्हें साहित्यकारों की श्रेणी में परिभाषित किया जाना चाहिए।

निराला पर जो उन्होंने ग्रन्थ लिखे हैं-कुल 7, वे उन्हें ‘निराला के बास्वेल‘ कहलाने वाले हैं ठीक वैसे ही जैसे प्रेमचन्द जी के समस्त साहित्य के संकलन कर्ता डॉ. कमल किशोर गोयनका को ‘प्रेमचन्द का बास्वेल‘ कहा गया है। 

डॉ. मिश्र ने एक ही समान वैज्ञानिक हिन्दी लेखन तथा हिन्दी साहित्य लेखन में योगदान किया है। यदि कोई अभाव है तो उनके इस दुहरे सृजन के मूल्यांकन की ओर यह मूल्यांकन कार्य अब और अधिक टाला नहीं जा सकता। डॉ. मिश्र का हिंदी साहित्य के विविध अंगों में योगदान निम्न प्रकार है:

  1. लोक साहित्य-अन्तर्वेदी लोक काव्य, अन्तर्वेदीय लोक कथाएँ 
  2. शोध साहित्य-हिन्दी साहित्य की भूली-बिसरी राहें 
  3. निबन्ध-विविधा, इतस्ततः
  4. सम्पादित अवधी काव्य ग्रंथ-सत्यवती, मृगावती, मधुमालती. माधवानल कामकंदला, हरिचरित्र, भीमकवि कृत डंगवै तथा चक्रव्यूह कथा ,सत्कवि गिरा विलास।  
  5. सम्पादित कृतियों में हिन्दी की प्रेम काव्य-शाह नजीब कृत हीररांझा, प्रेमनामा
  6. पत्र साहित्य-बोलते पत्र, भाग 1-2 
  7. कोश, सामान्य हिन्दी विश्वकोश 
  8. निराला साहित्य: (1) ऐसे थे हमारे निराला, (2) महामानव निराला, (3) निराला एक: दृष्टि अनेक,
    (4) निराला के सम्पर्क में, (5) संस्मरणों में निराला, (6) कवि निराला: पुनर्मूल्यांकन।
  9. जीवनी साहित्य-वेदान्त केसरी स्वामी विवेकानन्द

सूफी काव्य ग्रंथों का सम्पादन डॉ. मिश्र द्वारा पाठालोचन के मान्य सिद्धान्तों के अनुसार किया गया है और पहली बार कई-कई सूफी ग्रंथ प्रकाश में लाने पर श्रेय डॉ. मिश्र को है। डॉ. मिश्र ने डंगवै कथा का भी उद्घाटन पहले पहल किया है जिस पर आगे चल कर शोध कार्य हुआ है। 

सत्कवि गिरा विलास बदलेव कवि द्वारा ‘ब्रजभाषा के प्रमुख कवियों का संकलन है‘ जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई है।

डॉ. मिश्र ने हिंदी के अनेक शोध छात्रों की विविध प्रकार से सहायता की है, उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर दिया है और डॉ. माता प्रसाद गुप्त, डॉ. वासुदेवशरा अग्रवाल, डॉ. परमेश्वर लाल गुप्त. पं. कष्णदत्त बाजपेई. राहुल सांकत्यायन से उनकी अभिन्नता रही है। कोलकाता के डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र, डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी व भोपाल के श्री कैलाश चन्द्र पंत, पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, श्री बसन्त निर्गुणे जी से आत्मीयता है। 

डॉ. मिश्र आज भी हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि के लिए प्राणपण से समर्पित है उनका विश्वास है कि विज्ञान में प्रयुक्त हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा होगी क्योंकि वह स्थिर है, सुस्पष्ट है, परिभाषित है और उसका आधार संस्कृत भाषा है जो पूरे देश में मान्य है। डाॅ. मिश्र पर “दुहूं हाथ मुद मोदक मोरे‘ वाली कहावत चरितार्थ होती है। शतायु हों।    -देवव्रत द्विवेदि, कार्यकारी सचिव, विज्ञान परिषद् प्रयागराज


निराला के बास्वेल: डॉ. मिश्र, बास्बेल ने जानसन की अत्यन्त अंतरंग जीवनी लिखी है। डॉ. कमल किशोर गोयनका ने हिंदी के उपन्यास तथा कहानीकार श्री प्रेमचन्द जी पर इतना शोधपूर्ण कार्य किया है कि उन्हें प्रेमचंद का बास्बेल कहा जा रहा है। छायावादी कवि पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के अन्तिम 12 वर्षों के जिस गहराई से डॉ. शिव गोपाल मिश्र ने संस्मरण लिखे हैं, उनके आधार पर उन्हें यदि निराला का बास्वेल‘ कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

डॉ. मिश्र मूलतः रसायन विज्ञानी हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 36 वर्षों तक कृषि रसायन के शिक्षक रहे हैं। उन्होंने 1950 के बाद हिंदी साहित्य में रुचि के कारण साहित्य सम्मेलन की विशारद तथा साहित्यरत्न की परीक्षा उत्तीर्ण की। इससे निराला साहित्य के अध्ययन के प्रति उनकी रुचि बढ़ी और निराला की समस्त कतियों के अलावा निराला जी पर उपलब्ध तमाम आलोचनात्मक ग्रंथों का आलोडन किया।

इसे संयोग ही कहेंगे कि 1950 में डॉ. मिश्र ने इलाहाबाद के दारागंज मुहल्ले में रह रहे महाकवि निराला से भेंट की। तब से वे लगातार प्रायः प्रतिदिन साइकिल से निराला जी के पास जाने लगे। वे निराला के अन्तिम समय तक, मृत्यशय्या में लेटे निराला के निकट रहे। विज्ञान के छात्र होने से उनमें यह भाव जगा कि निराला जी की हर गतिविधि को वे लेखनीबद्ध करते चलें। निराला जी ने भी उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया। डॉ. मिश्र ने निराला जी द्वारा अर्चना, आराधना तथा गीतगुंज के गीतों की रचना करते देखा। विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ निराला जी के गीत भेजे। 

यही नहीं उन्होंने निराला जी के असंकलित निबन्धों को साहित्य सम्मेलन तथा नागरी प्रचारिणी सभा जाकर उतारा और उन्हें प्रकाशित करने के लिए प्रकाशकों को तैयार किया। इस तरह उन्होंने चयन तथा संग्रह सम्पादित किये। गीतगुंज के गीतों की भूमिका भी लिखी। फलतः निराला जी 12 वर्षों तक हिंदी साहित्यकाश में किसी-न-किसी रूप में छा गये।

किन्तु इसी अवधि में निराला जी को जब बाहु पीड़ा हुई, हाथ न उठने लगा, हस्ताक्षर करना भी दूभर हो गया तो डॉ. मिश्र ने अपने ज्येष्ठ भ्राता पं. जयगोपाल मिश्र सहित निराला के हाथ की मालिश की। समाचार-पत्रों में निराला की बीमारी का समाचार दिया। फलस्वरूप कई जगहों से निराला के लिए तेल आए। कुछ आर्थिक सहायता भी और हिन्दी जगत में वरिष्ठ लेखकों ने निराला के स्वास्थ्य को जानने के लिए पत्र भेजे व निराला जी से भेंट करने आते रहे।

बीच में 1853 में कोलकाता में निराला जी का अभिनन्दन हुआ, उसमें डॉ. मिश्र तथा इलाहाबाद के कई लोग कोलकाता गये। डॉ. मिश्र हर घटना को, नित्य प्रति लिखते रहे और 12 वर्षों में बीसियों कापियाँ संस्मरण से भर गयीं। डॉ. मिश्र ने इन 12 वर्षों में निराला जी पर उनके काव्य के विषय में देश की विभिन्न प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में लेख भी लिखे।

निराला की मृत्यु डॉ. मिश्र के लिए बहुत बड़ा आघात था। तब वे अध्यापन और शोधकार्य में लग गये और निराला के शताब्दी वर्ष में जाकर पुनः जागृत हुए।‘                           

-चंद्रभान सिंह, कार्यालय प्रभारी विज्ञान परिषद्, प्रयाग


डॉ. मिश्र को बधाई, डॉ. मिश्र ने पाठालोचन की दिशा में 1957 से ही मंझनकृत मधुमालती के संपादन का कार्य प्रारंभ कर दिया था। उन्होंने डॉ. माता प्रसाद गुप्त द्वारा रामचरित मानस, पद्मावत तथा पृथ्वीराज रासो की अनेक हस्तलिपियों के आधार पर प्रामाणिक पाठ प्राप्त करने की जो विधि अपनाई गई थी उसका अनुसरण किया। तत्पश्चात् उन्होंने मृगावती, हरिचरित्र, सत्कविगिरा विलास प्रभृति कृतियों का भी प्रामाणिक पाठ तैयार किया।

वैसे तो रामचन्द्र शुक्ल ने पद्मावत का पाठ प्रस्तुत किया था। माता प्रसाद गुप्त ने जायसी के पद्मावत का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत किया जिसके आधार पर डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने संजीवनी व्याख्या की। पाठालोचन के फलस्वरूप सूफी कवियों की रचनाएँ मूल रूप में प्रस्तुत की जा सकीं। दुर्भाग्यवश विश्वविद्यालयों में पाठालोचन के प्रति रुचि नहीं दिखाई गई। व्यक्तिगत प्रयास ही होते रहे। 

डॉ. माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में डॉ. पारसनाथ तिवारी ने कबीर ग्रन्थावली (प्रामाणिक पाठ) का सम्पादन किया। परशुराम चतुर्वेदी ने सूफी काव्य संग्रह तथा सन्त  साहित्य पर विशेष कार्य किया। डॉ. नन्द दुलारे बाजपेयी ने सूर संग्रह संपादित किया। बाद में माता प्रसाद गुप्त तथा पं. विद्यानिवास मिश्र ने हाथ लगाया किन्तु कार्य अधूरा रहा।

चन्दायन के प्रामाणिक पाठ के लिए सर्वप्रथम माता प्रसाद गुप्त फिर डॉ. परमेश्वरी लाल गुप्त ने प्रयास किया। इन सबसे भिन्न विज्ञान के अध्यापक डॉ. मिश्र ने अपनी। साहित्यिक अभिरुचि के कारण न केवल सूफी कवियों की कृतियों का प्रामाणिक पाठ निर्धारित किया अपितु अवधी कवि ललचदासकृत हरिचरित्र तथा शाहन जी बकृत हीररांझा, व चित्रमुकुट कथा का भी सम्पादन किया।

डॉ. मिश्र की पत्नी डॉ. रामकुमारी मिश्र ने अपने डी.फिल् शोध कार्य के दौरान बिहारी सतसई का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करते हुए बिहारी सतसई का भाषा वैज्ञानिक प्रभात अध्याय भी प्रस्तुत किया। पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने अपनी विधि से तथा श्री जगन्नाथ दास रत्नाकर ने अपने विवेक से बिहारी सतसई प्रस्तुत पाठ किया है। हिन्दी जगत् को कृतज्ञ होना चाहिए डॉ. मिश्र दम्पति का जिन्होंने जिस तरह से पांडुलिपियों का मंथन करके अनेक रत्नों को बाहर निकाला है। डॉ. मिश्र की पत्नी का तो 2012 में स्वर्गवास हो गया। डॉ. मिश्र अभी भी सक्रिय हैं। उनकी 90वीं वर्षगांठ पर हम उनका अभिनन्दन करते हैं और हिन्दी साहित्य के प्रेमियों, शोधार्थियों से अनुरोध करेंगे कि वे उनके द्वारा सम्पादित कृतियों का अध्ययन करें।  -बलराम यादव पुस्तकालय सहायक विज्ञान परिषद् प्रयाग


6.


डॉ. मेधावी जैन, गुरुग्राम, मो. 981120773
Writer, Life Coach, Researcher
Facebook: Life Coach Medhavi Jain
Blog: Dharma For Life
Academic Profile: Academia
YouTube: MJ Talks
Podcast: Mann ki Medha

आपकी विकास यात्रा आपके होश सम्भालते ही आरंभ हो चुकी थी, आपकी महत्वाकांक्षाओं का बहता नीर, जिज्ञासाओं के आवेग से बहता हुआ अंतस की खोज में निरंतर गति से अब एक सरिता का रूप धारण कर चुका है। आपकी आत्मविकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आप की साकारात्मकता है जो आपके सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की प्रेरणा देता है, साहित्य के प्रति निष्ठा भी संपुष्ट संस्कारों की देन है। दो अलग-अलग परिवारों की सांस्कृतिक परिवेश से उपजा आप का व्यक्तित्व उस साकारात्मकता से निर्मित हुआ है जिसने आपकी विचारधारा को संपुष्ट ही नहीं सशक्त एवं संप्रेषणीय भी बनाया है। यह आपकी साकारात्मकता ही है जिसने आप के व्यक्तित्व को परिष्कृत और जीवन मूल्यों से समृद्ध भी किया है। मेरी शुभकामनाएँ -संपादक


आत्मकथ्य

मेरा जन्म एक मिश्रित सांस्कृतिक वाले परिवार में जनवरी, 1977 को हुआ। मेरे पिता श्री बिमल गुप्ता, बनिया एवं मेरी माता श्रीमति शशि किरण पाहुजा, पंजाबी जाति से हैं। बचपन से ही मुझे इन दोनों संस्कृतियों को नजदीक से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दोनों ही सभ्यताओं के लोग बेहद प्यारे एवं अन्य लोगों की ही भांति अपनी-अपनी कमियां और ख़ूबियां लिए हुए हैं। भारत वर्ष की सबसे बड़ी विशेषता यही है, चाहे हम किसी भी परिवार में जन्म लें किंतु बड़े होने के दौरान हम सभी भिन्न संस्कृतियों से कभी न कभी, किसी न किसी पड़ाव पर वास्ता रखते ही हैं। और यह हमारे व्यक्तित्व को किस कदर उज्जवल एवं भिन्न विचारों को स्वीकारने हेतु अनुकूल बनाता है, इस विषय पर शायद हम कम ही चिंतन कर पाते हैं। इसी संदर्भ में पाठकों को बताना चाहूंगी कि अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान कक्षा छठी एवं सातवीं में मुझे एक सिख स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। अद्भुत बात यह रही कि वहां पंजाबी भाषा सीखना अनिवार्य था एवं उन दो वर्षों के दौरान मैं बाकी सभी सिख लड़कियों के बीच पंजाबी की सर्वोत्तम छात्रा रही। तत्पश्चात कक्षा आठ से कक्षा बारह तक की शिक्षा मसूरी में UP बोर्ड के एक विद्यालय से ग्रहण की, जहां मसूरी में बहुत सी गढ़वाली लड़कियां मेरी अच्छी मित्र रहीं, वहीं UP बोर्ड की कठिनतम हिंदी से भी परिचय हुआ। 

मेरे पास विज्ञान विषय था एवं मसूरी में एक ही डिग्री कॉलेज था जहां इस विषय में उच्च शिक्षा उस समय उपलब्ध नहीं थी। सो मेरा दाखिला फरीदाबाद के एक कॉलेज में कराया गया जहां मैं अपनी मौसी, जो निकट ही बल्लभगढ़ में रहतीं हैं, के घर रही। किंतु हमारी बनाई योजनाओं से नियति को कुछ लेना-देना नहीं होता। कॉलेज में प्रथम छमाही की परीक्षा देते ही कुछ ऐसे हालात बने कि मेरे लिए एक सभ्य जैन परिवार से रिश्ता आया। मेरे पिता ने लड़के को देखा, पसंद किया एवं बहुत ही जल्द मेरी शादी एक जैन परिवार में हो गई। पढ़ाई लिखाई जिसकी कि लंबी योजना थी सब बीच में ही छूट गई। 

आज महसूस होता है कि जीवन में घटित प्रत्येक घटना के पीछे एक ऐसा कारण होता है जो हमारे हित के लिए ही होता है। विवाह के उपरांत मैं एक पूर्णतः भिन्न परिवेश में आ गई चूंकि चाहे लोग बनिया एवं जैन जातियों को एक सा मानें क्यूंकि अधिकतः व्यापारी वर्ग इन दोनों समुदायों से ही ताल्लुक रखते हैं एवं दोनों का खान-पान भी लगभग एक सा ही होता है किंतु सत्य तो यह है कि धर्म की दृष्टि से ये दोनों पूर्णतः भिन्न हैं। शादी से अगले दिन ही पति श्री प्रवीण जैन जी मुझे निकट के एक जैन मंदिर ले गए, जहां उन्होंने नवकार मंत्र से मेरा परिचय कराया। यह मेरा जैन धर्म से प्रथम साक्षात्कार था। हालांकि ससुराल में भी काफी खुला माहौल था क्यूंकि उस समय मेरे आदरणीय श्वसुर स्वर्गीय श्री सुभाष चंद जैन एवं सासू माँ श्रीमति त्रिशला जैन जी एक पंजाबी गुरु माँ को मानते थे, जो हमारी शादी में भी निमित्त बनीं थीं। ख़ैर यह परिचय यहीं तक रहा और मैं गृहस्थी में रम गई। एक-एक कर दोनों बच्चों का जन्म हुआ, पुत्री दिव्यांशी एवं पुत्र सिद्धार्थ हमारे जीवन में आए। समय अपनी गति से चलता रहा।

जीवन में कुछ भिन्न करने की अभिलाषा निरंतर मेरे हृदय में बनी रही। पुस्तकें पढ़ने का शौक बचपन में भी था, जिस शौक ने एक बार पुनः सिर उठाया और सन 2005 के आस-पास मैंने पुनः पुस्तकें पढ़नी आरंभ कीं। इस दौरान जीवन को रूपांतरित करने का माद्दा रखने वाली रॉबिन शर्मा जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘द मॉन्क हू सोल्ड हिज फेरारी‘ पढ़ी। यह पुस्तक जीवन में कुछ शांति लाई। फिर सन 2009 में डॉ. ब्रायन एल. वीस की पुस्तक ‘मैनी लाइव्स मैनी मास्टर्स‘ पढ़ी। इस पुस्तक ने कर्म सिद्धांत एवं जीव तत्त्व को समझने एवं जानने की जिज्ञासा दिल में जगाई। कम शिक्षा ग्रहण कर पाने की कचोट निरंतर दिल में बनी रहती थी इसलिए इस दौरान मैंने कॉरेस्पोंडेंस से BA में दाखिला ले लिया था।

उन दिनों मम्मी-पापा, अब समाधिस्थ, आचार्य बाहुबली महाराज जी के अनुयायी थे एवं कुछ दिनों पश्चात् उन्हीं की शिष्या आर्यिका श्रुत देवी माता जी हमारे घर आई हुईं थीं। मैंने अपनी जिज्ञासाएं उन संग साझा कीं। सन 2010 में गुडगाँव के DLF-4 के जैन मंदिर में शीघ्र ही उनका चातुर्मास आरंभ होने जा रहा था जहां वे तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ का अध्ययन करवाने वालीं थीं। मेरे प्रश्न देख उन्होंने मुझे प्रतिदिन वहां आकर अध्ययन करने का निमंत्रण दिया। मैं कदाचित अनभिज्ञ थी कि जीवन जीने के एक विशाल मकसद से मेरा परिचय होने के साथ ही मस्तिष्क में उपजे-अन उपजे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर मिलने की यात्रा का आरंभ होने वाला है। सदा से ही भीतर उपस्थित एक ऐसी दिव्य ऊर्जा से सामना होगा जो मुझे इसके बाद जीवन में शांति से बैठने नहीं देगी। जो सकारात्मक होगी और निरंतर मुझे ज्ञान पथ पर आगे बढ़ने हेतु प्रेरित करेगी। 

मुझे याद है 26 जुलाई, 2010 का वह दिन, जब मैंने जैन दर्शन की प्रथम कक्षा अटेंड की, शुरू की दो कक्षाओं के बाद ही भीतर एक ऊर्जा का बहाव अनुभव हुआ। कुछ ऐसा अनुभूत हुआ जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। शीघ्र ही भीतर से कुछ विचार उपजने आरंभ हुए जिन्हें कॉपी-पेन ले अभिव्यक्त करना आवश्यक लगा। यह लेखिका बनने की दिशा में कुछ पहले, कच्चे कदम थे। अद्भुत बात यह रही कि इन विचारों का जैन धर्म अथवा दर्शन से कोई लेना-देना न था। वह कुछ ऐसा था जैसे कि कोई यात्रा पहले कभी बीच में कहीं छूट गई हो एवं ज्ञानार्जन ने उस छूटी, सोई यात्रा को जगा दिया हो। ख़ैर चातुर्मास के चार महीने समाप्त हुए जो उस औसत पुरानी 

मेधावी के पुनर्जन्म का निमित्त बने। इस नवीन जन्म ने ज्ञान की अलख पिपासा भीतर जगा दी। कहते हैं न कि जब हम किसी चीज को दिलोजान से चाहते हैं तो संपूर्ण सृष्टि हमें उससे मिलाने हेतु कार्य करती है। ऐसा ही कुछ हुआ जब माता जी ने गुडगाँव मंदिर से विदा होने से पहले एक दिन मुझे एक अंग्रेजी पुस्तक देते हुए कहा, ‘मेधावी, यह मेरे पास कहीं से आई थी किंतु अंग्रेजी से हमारा क्या काम, यह तुम रख लो।‘ पुस्तक थी आचार्य गोपी लाल अमर जी द्वारा लिखित ‘विक्ट्री ओवर वायलेंस‘। 

माता जी के जाने के पश्चात् मैंने वह पुस्तक पढ़ी एवं आचार्य गोपी लाल जी से संपर्क कर उनसे ज्ञान अर्जित करने की इच्छा व्यक्त की। अभी भी मैं अनभिज्ञ थी कि रूपांतरण की जो यात्रा शुरू हुई है यह तो उसका आगाज भर है। फिर क्या था आचार्य जी से मैंने आगे की पढ़ाई की, उन्होंने मेरा परिचय जैन दर्शन के समस्त सिद्धांतों से कराया एवं मेरी जिज्ञासा देख मुझे जैनिज्म में पीएचडी करने का सुझाव दिया। मैंने उनसे कहा भी कि मेरी रूचि डिग्री हासिल करने में नहीं अपितु ज्ञान अर्जित करने में है। किंतु आज दस वर्ष पश्चात् जब मेरी पीएचडी पूरी हो चुकी है, और अभी हाल ही में अगस्त 2021 में मुझे यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में डिग्री अवॉर्ड की गई है। मैं उनकी आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे अपनी शिक्षा पूर्ण करने का अप्रतिम सुझाव दिया एवं सोचे अनुसार मैंने अपनी थीसिस उन्हें अर्पित की है। उन्होंने तब भी कहा था कि पीएचडी आपका परिचय न केवल देश-विदेश में उपस्थित उम्दा विद्वतजनों से कराएगी अपितु आपके ज्ञान को और सुदृढ़ कर आपके व्यक्तित्व को उन्नत बनाएगी, जो कि सच साबित हुआ।

सन 2012 मेरी ग्रेजुएशन पूरी हुई और 2013 में मैंने जैन विश्व भारती, लाडनूं से जैनोलॉजी में मास्टर्स के लिए अप्लाई कर दिया एवं 2014 में मास्टर्स पूर्ण कर 2015 में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद से पीएचडी में दाखिला लिया। इन सबके दौरान लेखन यात्रा सतत चलती रही एवं प्रतिदिन मेरी लेखनी में और निखार आता गया। 2011 में मैंने अपना ब्लॉग dharmaforlife.com भी आरंभ किया जहां प्रतिदिन अपने विचारों को साझा करना शुरू किया। ठीक इसी नाम से फेसबुक पर पेज भी बनाया। साथ ही 2015 में ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा से ‘मास्टर स्पिरिट लाइफ कोच‘ का ऑनलाइन कोर्स पूर्ण किया, इस कोर्स ने न केवल सोच को और निखारा अपितु लेखन के नवीन आयामों में भी वृद्धि हुई। 

सच कहूं तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जीवन में कुछ ऐसा मोड़ आएगा जो एक औसत सा जीवन जीती, साधारण भारतीय ग्रहणी को कुछ विलक्षण बना जाएगा। मेरी माँ से कई बार फोन पर बात करते हुए मैंने उन्हें ख़ुशी के आंसू छलकाते सुना है। वे कहती हैं कि हमने तो अपनी मासूम सी कच्ची बुद्धि वाली बच्ची कम उम्र में ही ब्याह दी थी। कभी सोचा न था कि वह जीवन में कुछ ऐसा अद्भुत हासिल कर जाएगी कि सारी दुनिया हतप्रभ रह जाएगी। इस दौरान मुझे मेरे परिवार का भी पूर्ण सहयोग मिला जिसके लिए मैं अपने पति श्री प्रवीण जैन जी का जितना धन्यवाद दूं कम है। हालांकि मुख्य श्रेय जैन दर्शन को ही जाता है जिसके प्रचार-प्रसार हेतु अब यह जीवन अर्पित है।

वर्तमान समय तक मेरी आठ साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें हिंदी एवं अंग्रेजी कविताओं एवं बृहद लघु कथाओं के संकलन हैं। जैन दर्शन के भिन्न विषयों पर मेरे नौ रिसर्च पेपर्स विभिन्न शोध पत्रिकाओं में छप चुके हैं। और स्पष्ट आभास है कि ये तो बस शुरुआत है। अगस्त 2020 में मुझे हिंदुस्तान टाइम्स की ओर से पॉडकास्ट शुरू करने का निमंत्रण आया। जिसे मैंने सहर्ष स्वीकारा एवं पिछले एक साल में मेरे पॉडकास्ट ‘मन की मेधा‘ ने काफी प्रसिद्धि अर्जित की है। जब माननीय चंद्रमोहन शाह जी ने मुझसे कहा कि मैं अपनी यात्रा के विषय में लिखूं तो पहले तो कई महीने आलस्य में टालती रही किंतु जब लिखने बैठी हूं तो स्वयं ही अचंभित हूं कि अरे, पिछले दस वर्षों में वाकई काफी काम कर लिया। 


7.

सरोजिनी प्रीतम, नई दिल्ली, मो.  981039862


व्यंग्य

विपक्ष का कील


दुखीकुमार जब चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे थे उनकी परेशानियां बढ़ गयी थीं। चुनाव भी उस मौसम में जीते जिसमें आसमान टूट पड़ने का खतरा बना रहता है। लगातार छींटाकशी होती है। कोई गरजता है तो कोई बरस पड़ता है। कहीं वज्रपात तो कहीं वज्राघात। ऐसे मौसम में मैदान जीतने वालों के लिए निरन्तर भविष्यवाणियां होती रहती हैं। दुखीकुमार जी को लगता था कहीं कोई बड़ी गलती कर बैठे हैं। मौसम के हाल पर वे हमेशा यों कान लगाये रहते कि कान के साथ यदि हथेली हरदम न टिकी रहती तो वह भी अब तक उखड़ चुका होता। भौंहें हमेशा के चिन्तन के कारण कुछ ऊंची-सी रहने लगी थीं। मुंह से बार-बार निकलता, ‘कमबख्तों, हमारे बखिये मत उधेड़ो।’ यहां कौन दूध-धुला है और फिर जो दूध-धुला है, उस पर मक्खियां आना स्वाभाविक हैै। स्वाभाविक प्रक्रिया पर भी तुम उंगली उठाते हो। दल की दलदल में समूचा दल कीचड़ग्रस्त हो जाता है। कहो तो जो नये-नये चुनकर आये हैं, जिन्होंने अभी बहार का एक भी गुल खिलता नहीं देखा, न ही खिलाया, जिनका दामन अभी बेदाग है, वे सब भी इस कीचड़ की लपेट में आ जायेंगे।’’

सोच-सोचकर दुखीकुमार को नींद नहीं आती। हर किसी की बात से बात निकालते। उनकी हरकतों पर नजरें गड़ाये रहते। डिस्को-डिस्को की धुन में उन्हें खिसको-खिसको सुनाई देने लगा। कहीं कोई गीत, कोई नाच-धुन न सुहाती।

मन भी कितना अनमना हो जाता है। यही मन जो चुनाव से पहले युवा लोगों के साथ युवा होने के लिए अपनी उम्र तीस साल पीछे धकेलकर नाच उठता था, उन्हें आन्दोलन करने  को उकसाता था, हर छोटी बात से भी बात निकालकर नारे लगाने को कहता था, आज उन्हीं की हरकतों से खिन्न हो रहा था। संसद में शायद वाॅकआउट की ज्यादा नौबत आज जाए, इसलिए वे पूरे घर में तेज-तेज चहलकदमी करते। सुबह-सवेरे जब ऊंचे शोर की आदी पीढ़ी के नवाब अठकर तेज म्यूजिक चला देते, तो दुखीकुमार जी सिर पीट लेते। और उस रात तो गजब ही हो गया। वे अपनी व्यस्त दिनचर्या से  घर लौटे तोे अभी चाय का पहला घूंट भी गले से न उतरा था कि उनकी नातिन ने फिर  रेडियो चला दिया। तेजी से एक 

धुन बजी, कुछ प्याले खनके और जोरोें की आवाज आयी- ‘‘मैं तो गिरी रे... कोई संभालो, मुझे संभालो...’’

ऐं... दुखीकुमार को लगा कि गीत की धुन बदल गई है। सरकार नाच नचाती रही, अब सरकार ही दुहाई दे रही है- मुझे संभालो, कोई संभालो !

दुखीकुमार का जी चाहा, हांक लगाकर वह भी चिल्लायें, ‘कोई है... मुझे संभालो... हमारी सरकार संभालो... गिरी... रे...’ अब वे एक-एक शब्द पर चिन्तन करने लगे-गिरना तो एक प्रक्रिया है। वस्तुतः गिरता वह है, जो ठीक तरह से चलना नहीं जानता। चलना वास्तव में जन्मजात गुण नहीं है, हाथ पकड़कर चलना सिखाया जाता है। उस सिखाने के पीछे एक चलन ही दृष्टिगत होता है। चाणक्य की संतान की चाल कुछ और होती, नन्द के बेटों की कुछ और ! नेताओं के बेटे पहले चरण में ही अपना कमाल दिखाते और ऋषि-मुनियों की कृपा से पैदा संतानें हाथ में सर्वदा कोई-न-कोई फल लिये हुए ही आगे बढ़तीं। हर तरह की चाल चलने वाले के लिए अलग-अलग रास्तों का निर्माण होता और निर्माण के रास्ते जाने वाले लोग फिर सड़क पर न होते।

तेज चहलकदमी करते हुए सहसा उनके पांव में एक छोटा-सा कील गड़ गया।

 अरे, कोई है, कोई यह कील निकालो !

उनकी हांक सुनकर न पत्नी आयी, न बेटा, न बेटी। बल्कि उन्होंने सुना, उनकी अपनी धर्मपत्नी बेटों को कह रही है, ‘जा, बेटा, तेरे पिताजी के पांव में एक विपक्ष का कील गड़ गया है। असल में यह मुए विपक्षी इन पर हमेशा कौओं की तरह मंडराते रहे हैं। जिस दिन से चुनाव जीते हैं, एक-न-एक कांटा हमेशा खटकता रहा। अब यह कील बनकर इनके पांव में आ लगा है। अरे भई, कील में अपने गुण हैं ठोंक पीटकर लगा दो, किसी को भी टांग दो। कील दीवार में हो तो ठोंक-पीट करते समय दीवार की मजबूती का पता देता है। कोई कील गड़ जाए तो आदमी कुछ भी कर गुजरने पर उतर आता है - जा बेटा, देख तो सही, तेरे पिताजी को अब कौन-सा कील गड़ गया है ...’

प्रिय पत्नी के प्रवचन का अमृत अभी पूरी तरह से समाप्त भी न हुआ था कि उन्हें अपने होनहार बेटे की जोर की हांक से ज्यों काठ मार गया। वह बोला, ‘कुछ नहीं, अम्मा, इनके मन में कील-सी गड़ रही है।’ गीत की पंक्तियों से उन्हें लग रहा है, उनकी सरकार गिर जायेगी। ‘मुझे संभालो’ की हांक लिये वे एक-एक विपक्षी को ताक रहे हंै। इस वक्त ये विपक्षी चाहे किसी दल के हों, उनके दल को नाकों चने चबाने पर तुले हैं। ये सभी लोग एक तुला में बैठे हैं। पलड़ा कभी ऊंचा, कभी नीचा। किसको अपने में समेटें कि समूचे तुल जाएं और इन्हीं का पलड़ा भारी हो जाए। कोई कौड़ी के दाम बिके या अशर्फियों के मोल, हर किसी का अपना ही वजन है, अपनी ही तौल। इसी तौल को नापकर, उसका बाजार भाव भांपकर, उसे विपक्षी से पक्षी बनाना, उसके नये ‘पर’ लगाना हरेक सरकार का पहला कर्म होता है। इस क्षेत्र में यह कतर-ब्योंत तो दैनिक कर्म-दिनचर्या है। फिर पिताजी में यह हीनता की भावना क्यों आने लगी है। इसीलिए पिताजी की हाय-तौबा से ध्यान हटाकर हमारे नाशते, चाय-पानी का  प्रबन्ध करो, पिताजी के पांव में यह कील गड़ा रहने दो।

यह वह कील है, जिससे न खून बहेगा, न शरीर में खरोंचआयेगी, न कहीं छेद होगा, न ही सैप्टिक। इसका जहर नहीं फैलता, बल्कि जहर को पचाने की क्षमता देता है। यह कील पांव में गड़कर पांव को भी मजबूत करता है। यही कील गड़ा हो तो प्रेम की फिसलन-भरी राहों पर भी आदमी न फिसले, बल्कि मां-बाप को, समाज को मुंहतोड़ जवाब दे- तलवों में अगर कील-ही-कील हों तो जीतने की इस दौड़-भाग में पांव स्केट्स पहने पहिए लगे हुए स्वतः चलित आटोमेटिक व्हील का पर्याय होंगे। फिर यह गिरी रे ... गिरी रे के गीत, यह कोई ‘मुझे संभालो’ की जगह ... टिकट लगाकर तमाशा देखो का गीत गूंजेगा। मैं तो कहता हूं कि कील शक्ति का प्रतीक है, वकील में कील ही तो उसे वकालत की गरिमा देता है। चमड़े के सादे टुकड़े को कली ही ठोंक-पीटकर उसको सिलाई आदि द्वारा रूपाकार प्रदान करता है-मैं तो कहता हूं, अगर पिताजी के मन में यह विपक्षी कील की तरह गड़े हैं, तो पिताजी स्वयं उस कील के दर्द से शक्ति पाकर अपने-आपको झिंझोड़ने की स्थिति में आ जायेंगे। आज तक लोगों ने बखिये ही उधेड़े हैं। जहां कील ठुकी, वह ठुकी रही। अतः मैं ठोंक-पीटकर कह सकता हूं कि उन्हें सिर्फ इस गीत की कील गड़ रही है। एक ही पंक्ति बार-बार गड़ रही है-सरकार गिरी रे-और उनके हाथ फैलकर एक ही दुहाई दे रहे हैं-मुझे बचाओ।

इधर तीन मिनट का वह गीत इस लम्बे चिन्तन को जन्म देकर खत्म हुआ। दुखीकुमार जी का वह कील तो अलग हो गया, पर बेटे और पत्नी ने इतने सारे कील ठोंक दिये थे, दुखीकुमार जी नये दर्द से कराहने लगे। 


8.


नमिता सिंह ‘‘आराधना‘‘, अहमदाबाद,  nvs8365@gmail.com


कविता

सावन की बरसती रातों में

सावन की बरसती रातों में

दिल पर ना कोई जोर चले ।

छोड़कर नेह का दामन

तुम ना जाने किस ओर चले।


पुरवाई चीरे है हृदय को

अँखियों से बस नीर बहे।

कह ना पाऊँ मैं कुछ मुख से

बिजली कड़के है दिल में।


शोर मचाए तेरी यादें

सन्नाटा पसरा गलियों में।

मंद समीर के झोंकों से

यौवन खिलता कलियों में।


घटाएँ लगें मुझे सौतन जैसी

चाँद  है उनके पहरों में ।

राजे दिल मैं कहूँ किससे?

सावन की बरसती रातों में।


सिंहनाद सा घन गरजे

दामिनी भी खूब दमके

बारिश की रिमझिम बूँदें

संगीत सृजित करे मन में।


हृदयांगन में फूल खिले

प्रियतम के नेह-निमंत्रण से

मन- मयूर झूमे गाए

प्रेम-रस की फुहारों में।


मन में उमंग ,तन में तरंग

प्रियतम के मधुर संवादों से

मन कुछ भीगा भीगा सा

सावन की बरसती रातों में।



9.

डॉ. रंजना जायसवाल, मिर्जापुर, मो. 9415479796
Email : ranjana1mzp@gmail.com


व्यंग्य

‘‘हाई स्कूल पास...’’

जी हाँ! मैं हाई स्कूल पास हूँ... होने को तो मैं इंटर और बी. ए.  भी पास हूँ पर सबसे खास बात ये है कि मैं हाई स्कूल पास हूँ, जब हमारे प्रदेश में हाई स्कूल का परिणाम सत्रह प्रतिशत गया था। मैं उस समय का हाई स्कूल पास हूँ हाल ही में एक फिल्म आई थी बी. ए. पास.. फिल्म तो हमने नहीं देखी पर यकीन है कि फिल्म के निर्देशक ने बी ए पास किया होगा और शायद बड़ी मेहनत के साथ.. तो बात हो रही थी हमारे हाई स्कूल पास होने की... भाई हाई स्कूल तो हमारे जमाने में होता था। आजकल के जमाने की तरह थोड़ी कि झोला भर-भर नम्बर ला रहे हैं। पता नहीं इनकी मायें खाने में क्या खिला रही है नम्बर तो ऐसे आते हैं उतने तो हमारा थर्मामीटर में बुखार भी न आता था। 

इनके नम्बर देखकर इत्ती शर्म आती है कि पूछो मत इत्ते नम्बर में तो हम तीनों भाई-बहन निपट जाते थे। ये बच्चें शेयर और केअर पढ़ते जरूर है पर अमल नहीं करते, एक हम थे बचपन से ही हर चीज मिल-बांट कर करते थे,हमारी मम्मी हमको बचपन से समझाई थी,‘ ‘बचवा हर चीज आपस में मिल-बांट कर किया करो‘‘ हम मम्मी की बात गांठ में बांध लिए... जितना तुम्हारे अकेले के नम्बर आते हैं न उतना हम तीनों भाई-बहन के इकठ्ठे आ जाते थे। कहते हैं पहला सावन, पहला प्यार और पहला बोर्ड उसकी तो फीलिंग ही कुछ और होती है। बोर्ड तो इंटर में भी दिए थे पर कसम से पहले बोर्ड में जितना डर लगा उतना कभी न लगा।क्योंकि ये अनुभव खुद के कमाये नहीं थे,मुफ्त में पंजीरी की तरह बंटा था।

इस देश मे कुछ मिले न मिले सलाह मुफ्त में मिल जाती है। हम तो उस जमाने के हाई स्कूल है जहाँ पास होना भव सागर पार करने जैसा था। पास हो गए.. वही बड़ी बात थी डिवीजन और परसेंटेज कौन पूछे। पूरे खानदान का सीना छप्पन इंच का हो जाता, पूरे मोहल्ले में लड्डू बंट जाते थे। माता जी आँखों में आँसू भरे भगवान के हाथ जोड़े शुक्रिया करना नहीं भूलती। हमें तो आज तक हाई स्कूल का रोल नम्बर भी याद है पाँच लाख चैरासी हजार पाँच सौ इकतालीस... सच बताये इस चैरासी नम्बर ने हमे चैरासी लाख देवी-देवताओं की याद दिला दी थी।

ऊपर से इन रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने अलग खून पी रखा था। कोई भी रिश्तेदार भूले-भटके घर टपक जाए तो वो ऊपर से नीचे ऐसे देखते लगता खड़े-खड़े भस्म कर देंगा। एक तो रिश्तेदार बिन बुलाये टपक जाये और माता जी का आदेश पैर तो छू आओ, बचपन मे बड़ा मजा आता था पैर छूने के बदले में दो या पाँच रुपये मिल ही जाते थे पर जैसे-जैसे बड़े होते गये, वो भी मिलना बंद हो गए। ऊपर से एक दनदनाता हुआ सवाल जरूर हमारे सर पर लैंड कर जाता। हम सबसे छोटे थे इसलिए सामान्य ज्ञान का सवाल पूछा जाता। पता नहीं रिश्तेदारों को हम भाई-बहनों से क्या दुश्मनी थी, देखने में तो हम तब भी शरीफ ही दिखते थे। बड़े भाई साहब से एक तड़कता-भड़कता ट्रांसलेशन तो छोटे भैया से गणित का सवाल दाग दिया जाता। बड़े भैया छत और छोटे भाई न जाने क्यों जमीन की तरफ उन सवालों का जवाब ढूंढने लगते। हमारे हाथ-पाँव बिना सवाल के ही फूलने लगते, कलेजा मुँह को आने लगता धौकनी दस फीट दूर से ही सुनी जा सकती थी।

‘‘भारत के विदेश मंत्री कौन है?‘‘ अब ये क्या बात हुई जब हम प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम याद किये हैं तो वो ये सवाल क्यों पूछ रहे। पिछली बार जब वो आये थे तब तो वो हम से यही सवाल पूछे थे और हमेशा की तरह हम उस दिन भी जवाब नहीं दे पाये थे। पिता जी ने माता जी को कितना कुछ सुनाया था और माता जी ने हम पर अपने शस्त्रों का प्रयोग कर अपना गुस्सा ठंडा किया था। उसी रात हमने आगे-पीछे सारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का नाम याद कर लिया अब ये ऐंन मौके पर पलटी क्यों खा गये।

‘‘बेटा! बोर्ड है नंवी तो ऐसे-वैसे सब पास हो जाते हैं,लापरवाही ठीक नहीं।‘‘ और हम कबूतर की तरह हर बात पर बस गर्दन हिलाकर रह जाते। बोर्ड का भूत सिर्फ हमारे घर पर नहीं पूरे मोहल्ले पर सवार रहता था। बोर्ड के नाम पर तो हमसे ज्यादा तो हमारी माता जी डरी हुई थी,भई आखिर उन्हें भी तो मोहल्ले में मुँह दिखाना था,वैसे तो वो माता रानी का अवतार थी हर काम चुटकियों में निपटा देती थी, एक दिन गलती से उन्होंने पड़ोस वाली आंटी जी से दही जमाने के जामन मंगवा लिया, उनका घर दो मकान छोड़कर ही था पर हम तफरीह मारने के इस सुनहरे अवसर को खोना नहीं चाहते थे, हम हाथ में कटोरी पकड़े निकल पड़े अपने लक्ष्य की ओर... घूमते-घुमाते दुआ सलाम लेते-देते हम जामन लेकर घर पहुँचे अब हमें क्या पता था कि माता रानी की अवतार माता जी पर स्वयं माता रानी उतर आई, वो दिन था और आज का दिन हमने कभी दही की ओर मुड़कर नहीं देखा।

असल में गलती माता जी की भी नहीं थी,हम थोड़े मासूम और मिलनसार टाइप के जीव थे। हमारे कुछ ऐसे मित्र भी थे जो पंचवर्षीय योजना पर विश्वास रखते थे। माता जी को हमेशा डर बना रहता था कि उन वीर बांकुरों के साथ हमारा नाम भी न जुड़ जाये,उन्हें  दिन रात एक ही टाइप के सपनें आने लगे... हम तो डूबे है सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे। वो सो कॉल्ड मित्र भी बड़े वो टाइप निकलें जो रही-सही कसर थी हाईस्कूल में पंच वर्षीय योजना बना चुके साथी पूरी कर देते...‘‘ भाई, ये सुबह चार बजाकर पढ़ने से काम नहीं चलेगा , कुछ और भी जुगाड़ लगाना पड़ेगा। वैसे भी इसे पास करना हर किसी के किस्मत में नहीं होता, अब हमें ही देख लो... ‘‘वो बेचारे देवदास सा चेहरा बनाकर हमारे सामने खड़े हो जाते।

 पढ़ाई के साथ पूजा का समय और व्रत-अनुष्ठान की संख्या बढ़ने लगी। नहाने के बाद सूर्य भगवान को जल,पास के मंदिर में भोले नाथ के चक्कर की संख्या अचानक से बढ़ गई थी। सुना था भोले नाथ अपने नाम के अनुरूप बहुत भोले है और हम जैसे मासूम और भोले-भाले बालकों पर अपनी कृपादृष्टि बनाये रखते हैं। हम किसी तरह का कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे ,अपनी किस्मत को लिखने के लिए हमने सारे टोटके अपना लिए थे। चिड़ियों को दाना, कौवे को रोटी,काले कुत्ते को दूध और गौ माता को घास खिलाना हमारे रोज की आदत में शुमार हो गया।माता जी हमारी भक्ति देखकर मन ही मन बहुत खुश थीं, कभी-कभी तो खुशी से उनकी आँखें भी छलक आतीं। 

पर बेज़्जती होनी तो अभी बाकी ही रहती थी और फिर रिजल्ट का दिन भी आ जाता। ऑनलाइन का जमाना तो था नहीं,सो मौहल्ले के हीरो छाप लड़के जो पहले से ही अपनी नींव मजबूत किए खड़े थे, अपनी फटफटिया घुर-घुराते हुए हमारे जले पर नमक छिड़कने चले आते। ‘‘आज तो रिजल्ट आना है न‘‘...बाई गॉड की कसम मन करता काश हमारे अंदर कोई ऐसी शक्ति होती कि उन्हें खड़ा-खड़ा ही भस्म कर देते। एक तो रातों की नींद वैसे ही गायब थी,उस पर घड़ी-घड़ी माता जी का ये पूछना पास तो हो जायेगा न...ने भूख भी गायब कर दी थी।

अखबार वाले को एक हफ्ते पहले ही सहेज दिया था पर वो करवा चैथ के चाँद की तरह गायब था। हर आहट पर लगता कि वो आया, इतना इंतजार तो पिता जी ने महीने की तनख्वाह आने के लिए भी नहीं किया होगा जितना अखबार के लिए होता था। फाइनली जिसका मुझे नहीं सारे मोहल्ले को था इंतजार वो घड़ी आ ही गई। पूरा का पूरा मुहल्ला उस पर टूट पड़ा। उन दिनों रिजल्ट वाले अखबार को कमर में खोंसकर किसी ऊंची जगह या चबूतरे पर चढ़ जाते। फिर वहीं से नम्बर पूछा जाता और रिजल्ट सुनाया जाता...आठ लाख पैंतीस हजार एक सौ इकतालीस ...फेल, बयालीस..फेल, सैतालिस..फेल, छियासी..सप्लीमेंट्री !!

 कोई मुरव्वत नही..पूरे मुहल्ले के सामने घनघोर वाली बेइज्जती।

उन दिनों रिजल्ट दिखाने की फीस भी डिवीजन से तय होती थी, लेकिन फेल होने वालों के लिए ये सेवा पूर्णतया निशुल्क होती। जानते थे मरे को और क्या मारना... घर वाले कूटने के लिए वैसे ही शस्त्र ढूंढने लगते।जो पास हो जाता, उसे ऊपर जाकर अपना नम्बर देखने की अनुमति होती। टॉर्च को घुमा-घुमाकर या हथेली पर पीट पीटकर उसकी रौशनी बढ़ाने की कोशिश करने के बाद उस अविश्वसनीय शब्द पास शब्द को अपनी आँखों से देखने की ललक को न रोक पाने वाले मन, कपकपाते हाथों से अखबार और प्रवेश-पत्र से मिलाकर नम्बर पक्का किया जाता, और फिर 10, 20 या 50 रुपये का पेमेंट कर पिता-पुत्र माउण्ट एवरेस्ट शिखर पर विजय पताका फहरा कर गर्व के साथ नीचे उतरते।

बात यही खत्म नहीं होती जिनका नम्बर अखबार में नहीं होता उनके परिजन अपने बच्चे को कुछ ऐसे ढांढस बंधाते... ‘‘अरे, कुम्भ का मेला है क्या, जो बारह साल में आएगा और न ही लिप ईयर वाला कैलेण्डर जो सोच-सोचकर आएगा, अगले साल फिर दे देना एग्जाम...

पूरे मोहल्ले में रतजगा होता। चाय और पकौड़ियों के दौर के साथ चर्चाएं चलती, अरे ... फलाने के लड़के ने तो पहली बार मे ही हाई स्कूल पास कर लिया, भगवान जाने ये हमारी पढ़ाई का कमाल था या फिर भोले नाथ की कृपा एक ही बार में निकल लिए...और माता जी के माता रानी अवतार से बच गये। सच में, रिजल्ट तो हमारे जमाने मे ही आता था।


10.

हृषीकेश वैद्य, इंदौर, मो. 9977161117


कविता


कोई लॉक-डाउन, उमंगों के झूले को रोक पाया भला !


तुम कहती हो ना 

कि हर देह की अपनी एक गंध हुआ करती है !

मुझे लगता है 

कि वक्त की भी एक सुगंध होती है 

जो तब और मादक हो उठती है 

जब वक्त हमारे हाथों से जा चुका हो।

गुजरा हुआ वक्त, 

लौट कर हमारे पास आया करता है। 

.... और-और मादक होकर !

आज फिर एक सुगंध 

मुझे कुछ याद दिलाने आई 

अपने माजी को साथ लिए। 

बचपन और कैशोर्य के बीच सिमटे 

वो निकर पहनने के दिन !

कस्बे की सरहद,

सरहद पर किला।  

एक उथली सी नदी 

नदी के इस पार एरन के पत्थरों से बना हनुमान मंदिर, 

जिसे सब मठ कहा करते। 

नदी के उस पार शीतला माता का मंदिर,

मंदिर के ठीक ऊपर कबीट के पेड़ की छांव। 

वही कबीट....

जिसका नाम सुनकर 

तुम पहले-पहल जोर से खिलखिला उठी थीं 

फिर मुझे डिक्शनरी में खोज कर 

तुमको ये बताना पड़ा था 

कि इसका एक नाम ‘वुड-एपल’ भी है।

पत्थर मार-मार कर कबीट तोड़ना 

इस बात का भी खयाल रखना 

कि कहीं, कबीट सिर पर न गिर जाये 

वरना ‘गुम्मा’ उभर आएगा। 

माँ कबीट खाने से मना करतीं

“मत खा बेटा 

लक्कड़ खटाई है, नुकसान करेगी !” 

और मैं...

पके हुये कबीट का 

चॉकलेटी-पल्प उँगलियों से चाटता रहता। 

शायद उन्हें चिढ़ाने के लिए 

या ये जताने के लिए 

कि मेरी देह नुकसान से परे है !

कॉलेज के दिन आए 

मैं शहर चला आया। 

यहाँ फिर कबीट दिखा 

इस बार पेड़ पर नहीं, एक स्त्री के ठेले पर !

साबुत कबीट, बेर-जाली, पेमली बेर, कच्ची-पक्की इमलियाँ

और दो-तीन तरह की चटनियाँ 

उनमें से एक चटनी कबीट की भी !

गुड़ और नमक को मिलाकर बनाई हुई चटनी,

जिसे वो पत्तों पर रखकर 

चूरन के साथ दिया करती। 

जोर से पुकार लगाती, लयबद्ध तरीके से ठेला धकियाती 

दशकों तक आती रही वो। 

दीवाली के बाद से लेकर पूरी सर्दियों तक 

हर रोज दुपहरी को आती। 

साँवली, सुती हुई देह

तांबई से कुछ ज्यादा गहरा रंग 

जूड़ा बनाए, एक लट बाएँ गाल पर लटकती हुई

आँखों में गजब का विश्वास 

और एक अजीब सा आकर्षण !

दशक बीते, वो आती रही 

हमेशा वैसी ही दिखती 

जैसी कि पहली बार नजर आई थी। 

मुझे देखकर एक निर्दोष-निश्छल मुस्कान देती 

चाहे मैं उससे कुछ खरीदूँ या न खरीदूँ !

तुम सोचोगी 

बावरा हो गया हूँ मैं 

संदर्भों से परे बड़बड़ा रहा हूँ,

मगर कल बरसों बाद 

मुझे एक कबीट का पेड़ दिखा 

और मैं ....

फिर से ‘ट्रांस’ में चला गया !

अजीब सी मादक गंध तारी हो गयी मुझ पर।

कितने अनूठे हैं ये दिन ....

चीनी मिट्टी की बरनियों में 

नया अचार डाले जाने के दिन !

पेड़ की मोटी शाखों पर 

सावन के झूलों के दिन !!

तुमसे दूर बैठकर 

तुमको शिद्दत से जीने के दिन !!!

जाना मेरी, 

कभी कोई लॉक-डाउन 

उमंगों के झूले को रोक पाया है भला ?

आओ मेरे पास !

खयालों की शाख पर, 

हसरतों का झूला डाला है मैंने इसबार सावन में।  

बैठो इस झूले पर 

मैं तुम्हें झूला झुलाऊँ। 

तुम्हारा देव


11.

डाॅ. शोभा रतूड़ी, मेरठ, मो. 9457130665


कविताएँ

श्री राम 

श्री राम तुम ही आराध्य हो हमारे 

है तुम से ही पूर्ण सकल काज हमारे 

वनवासी रहे तुम अपने ही घर में 

लौट आए अब निज गृह तुम 

हुए फलीभूत पुण्य प्रताप सकारे 

श्री राम तुम ही आराध्य हो हमारे

तुम हो सर्वव्यापी तुम कण कण में 

हो तुम ही जन जन में समाये 

मानव की आस्था तुम वेदों का सकल ज्ञान 

क्यों तुमसे मांगा गया तुम्हारा ही प्रमाण 

राम तुम तो मन प्राण हो हमारे 

श्री राम तुम ही आराध्य हो हमारे

सरयू की लहरे हई तरंगित 

जले दीपावली के दीप द्ववारे 

जीती तुमने विजयी वरमाला 

राम तुम ही धर्म विजेता बने हमारे 

श्री राम तुम ही आराध्य हो हमारे

इक्ष्वाकु वंश की नीति तुमसे 

रघुकुल की रीति तुमसे ही 

लेकर आये तुम ही जग में 

मर्यादा की उज्ज्वल रेखा 

राम तुम ही मर्यादा पुरुषोत्तम हो हमारे

जीत कर अन्याय का दशानन 

न्याय की ज्योति तुमने जगाई 

प्रजा वत्सलता संसार ने तुमसे है पाई 

राम तुम ही हृदय हार हो हमारे 

श्री राम तुम ही आराध्य हो हमारे 


माया 

लक्ष्मी तेरी माया निराली 

कुछ तुझे लुटा कर खुश 

कुछ तुझे उठा कर खुश

खुशी दोनों को मिली 

तुझे लुटाने वाला भी खुश 

तुझे उठाने वाला भी खुश 


दुनिया 

बहुत चमकती है ये दुनिया 

पर जगमगाता दर्पण नहीं होती

देखना चाहते जिन आँखों में छवि अपनी 

वो ही कभी अपनी नहीं होती

हैं बहुत कठोर नियम अपनों के 

ये चाहत कैसी जो कभी कोमल नहीं होती

स्वप्नों के सितारे सजा दिए उस चुनरी में 

जो कभी झिलमिल नहीं होती

यूँ तो हैं बहुत लोग साथ मेरे 

है कमी जिसकी वो पूरी नहीं होती

व्यर्थ भटकता है मन का हिरन रेगिस्तान में 

जानकर भी मृग मरीचिका जल नहीं होती


गगन का कैनवास 

गगन के कैनवास पर 

सूर्य के सुनहरे रंग 

ठण्डी हवा से भीगी सुबह 

दर तक बिछी राह का सजीला संग


रेशमी धूप की चमकीली चूनर 

उड़ते पक्षियों का निराला ढंग 

...जीवन की ये अविरल गति 

मन में उठाती जीने की मीठी उमंग


12.

मुक्ति वर्मा, नोएडा, मो. 98183868807


कविता  

अक्षर 

मैं अक्षर हूँ

तुम सब के काम आने वाला

क्या बड़ा, क्या छोटा

क्या अमीर, क्या गरीब

क्या राजा, क्या रंक

क्या साधु, क्या फकीर,

मेरे जोड़ने में ही आप सब की पुष्टि है

मेरा ज्ञान होना ही, आप सब का जहान है।

मेरा समझना ही, आप सब का विश्वास है।

मुझे अपनाना ही, आप सब का सम्मान हैं

मेरा आदर आप सब की प्रतीक्षा है

मेरा अपनत्व, आप सब की प्रेरणा है।

सच, मैं क्या कहूं क्या न कहूं,

मेरे बिना तुम क्या संसार संसार ही नहीं 

क्योंकि,

आपकी प्रसन्नता, प्रस्तुति, अनूभूति, संजीदगी

यहां तक की प्रशंसा, अपवाद, आभास, अट्टहास

आहल्लाद, चीतकार मैं ही तो हूँ 

मैं हर प्रान्त में, शहर में, गाँव में समाज में एक स्तम्भ हूँ

मेरे सुन्दर जोड़ उन्नति का प्रतीक हैं

लेकिन असुन्दर जोड़ अवन्नति भी लाते हैं

मेरे जोड़ तोड़ का ज्ञान

अक्षर ज्ञान की क्षमता है

क्योंकि-

भाषा मैंने बनाई, भाषा के अक्षर मैं हूँ

अक्षरों से जुड़ा वाक्या मैं हूँ

मेरा दायित्व छोटा नहीं है

सुख, शान्ति, प्रेम प्यार

मेरे पद चिन्हों को अपनाते हैं

काश मानव भी अपने,

छोटे से जीवन काल में

अपने छोटे से परिवार के साथ

प्रेम-दया का पाठ-पढ़

सुख-शान्ति की सांस लेना सीखे

वैसे ही जैसे मैंने

अपने छोटै-छोटे आकार में

आप सब लोगों के हाव भाव लेकर

आप की शैली में जीना सीख लिया



13.

प्रभा कश्यप डोगरा, पंचकूला, मो. 98725 77538


राजघाट की यादें

राखियों के रेशमी लच्छे !

राखियों का रिश्ता, भाई बहन के पवित्र  प्रेम की अभिव्यक्ति से है य हम सब यह जानते हैं। मेरे जेहन में यह त्यौहार एक ख़ास माहौल का सृजन, हर बार कर जाता है !! आज की राखी के त्यौहार और उससे पहले बाजारों की साजो सजावट से बहुत ही अलग !! 

आज रक्षाबंधन के करीब आते ही सारे बाजार, दुकानें गलियाँ रंग बिरंगी मौली के धागों से  लेकर सोने चाँदी और तो और प्लास्टिक की राखियों से भरे हर ख़ास -ओ -आम को लुभा ने की होड़ में रहते हैं !!

चलिए इस माहौल से दूर साठ सत्तर साल पुरानी राजघाट स्कूल के रक्षाबंधन की दुनिया में चलते हैं !!

सावन मास के आरम्भ में ही राजघाट के हर हॉस्टल की सुपरिटेंडेंट लड़कियों को अपने भाइयों की (स्कूल के साथी सहपाठी मुहबोले भाइयों तक की लिस्ट बनाकर मंगवातीं। कितनी राखियाँ किसे बनानी हैं, यह हिसाब लगा कर बनारस के रेशम बाजार से रेशमी धागों की बडी बडी लचछियां मँगवाई जातीं। सलमेंसितारे और स्टोन (काँच के  रंग बिरंगे टुकड़े) भी आते, इनसे राखियों को सजाना जो होता था !! सबको अपनी पसंद के रंगों की लच्छियां राखियों की गिनती अनुसार और सजाने का सामान मिल जाता !!

हर हॉस्टल में एक समां सा बंध जाता! अपनी दैनिक रूटीन से बचे फ्री टाइम में हर ओर राखियों का रेशम, उनका रंग, राखी का साइज और कितनी तहों वाली राखी बनाएँ यह सारी सलाह मशविरा आपस में लड़कियों को लेते देते देखा जा सकता था!! गत्ते के गोले कटते, दो दो गोलों को साथ पकड़ उनपर रेशम लपेटा जाता य फिर पैरों के अंगूठें रेशम के बारीक तारों को पकड़ हाथों से लपेट कर डोरा बनाई जाती, राखी को बाँधने को गत्ते पर लिपटा रेशम काट डोरी बँधती और साहब उन राखियों को कंघी से बराबर  कर पंखों सा नरम किया जाता और बड़े जतन,लगन और प्रेम निष्ठा से बनी इन राखियों को सलमा सितारे और स्टोन से सजा जब तक डाक से अपनी अपनी  मंजिल को न भेज देते हम बहनों को  सुकून न मिलता!! इ स तरह सावन की फुहारों के साथ साथ राजघाट स्कूल के सारे हॉस्टल एक रेशम के धागों की दुनिया में डूब जाते !!

राखी वाले दिन हमारे चिल्ड्रन सेक्शन के असेम्बली हॉल में बॉय सेक्शन (छठी कक्षा से ऊपर और वसंत कॉलेज) के लड़के और वसंता कॉलेज (गर्ल सेक्शन) की लड़कियाँ सब इकट्ठा होते, हर लड़के का तिलक कर लड़कियाँ राखी बाँधतीं !! एक अद्वितीय अद्भुत माहौल व भावों का सृजन होता, फिर मिठाइयों का आदान प्रदान !!

रक्षाबंधन के जाते न जाते  हम कृष्ण जन्माष्टमी की झांकियाँ सजाने की तैयारी अपने अपने हॉस्टलों मे कर दिया करते !! इन झाँकियों को सजाने में ये राखियाँ बहुत काम आतीं !!!


14.

अरुणा शर्मा, दिल्ली, मो. 9212452654

कविता

जीत

बहुत चले, अभी और भी चलना बाकी है

वक्त की छाती पर अभी जीत लिखना बाकी है

अंगारों से भरे पथ पर बहुत चिनौतियां हैं अभी

सुनहरी अक्षरों में बस अभी तकदीर लिखना बाकी है-

हैं मुश्किलों का दौर तो क्या!! 

तुम डर मत जाना फिर कभी-

लिख दिया और लिखोगे बस, बढ़ते जाना आगे ही

तेरी राह कठिन देख, कुछ छूट गए कुछ छोड़ गए

कर हौसला थोड़ा अब अंधेरे में दीप जलाना बाकी है

बहुत चले,अभी और भी चलना बाकी है

वक्त की छाती पर अभी जीत लिखना बाकी है-

कह दो जरा तेज आंधियों से, जरा सहज हों थमके चलें-

देश के सपूत वीर हैं, हम नहीं किसी से भी डरें

नगर नगर डगर डगर मिल यह गीत गातें चलें,

तकदीर तो लिख दिया, बस नई तस्वीर खींचना बाकी है-

बहुत चलें, अभी और भी चलना बाकी है

वक्त की छाती पर अभी जीत लिखना बाकी है-

शायर हो या कवि लिखें मिलकर सभी

अपना पराया फिकर छोड़ देश के हो लें सभी

सूरज के उदगम से पहले दिव्य प्रकाश की लाली

पूरव में जब आती है-

बस इसी समय विजयी संदेश विश्व को देना बाकी है-

बहुत चलें, अभी और भी चलना बाकी है

वक्त की छाती पर अभी जीत लिखना बाकी है

हम एक थे एक हैं एक ही रहेंगे 

देश एकता के लिए मिलजुल जुझते रहेंगे-

कर बलिदान जीवन की आहुति बन, तन मन का देते रहेंगे-

कर्तव्य पथ चलकर हम सबको, दिल से चलना अभी बाकी है

करते रहेंगे प्रयास जीवन भर 

मिलजुल कर चलना अभी बाकी है



बहुत चलें, अभी और भी चलना बाकी है

वक्त की छाती पर अभी “जीत” लिखना बाकी है-


15.

डॉ. प्रज्ञा शारदा, चंडीगढ़, मो. 9815001468


कविता

‘‘काफिला दर्द का’’

आज फिर काफिला दर्द का

चल पड़ा है

यादों से यादों का सिलसिला

चल पड़ा है।

इक याद जो दिल को छूकर

चली गई

बहुत सा दर्द दिल पर

आन पड़ा है।

उसे जाना था आखिर वो

चली गई

कभी ना लौटने का स्वर

कानों में पड़ा है।

माना कि वक्त हर जख्म को

भर देता है

पर ये जख्म तो मेरे भीतर नासूर सा

बन पड़ा है।

सुना है खुदा ने बनाए हैं

सभी रिश्ते

फिर क्यूँ हर रिश्ता मुझ से दूर

जान पड़ा है।

लगता है अब रिश्तों में

वफा नहीं है

तभी तो मेरा दिल भी

बेवफा हो चला है।

तमन्ना अब किसी की

मन में नहीं है

कलेजा पत्थर हो गया

जान पड़ता है।

भले ही हो जाएं हम

दूर सबसे

इक हूक तो दिल में

उठती है,

आज न जाने क्यूँ हर

ज्वाला से

दिल शांत हुआ

जान पड़ता है।

तेरा भाणा मीठा लागे

यही सब्र हम करते हैं

उसकी रजा में खुश होकर

सबको जीना पड़ता है।


16.

डॉ. विभा रंजन ‘कनक’, दिल्ली, मो. 9911809003


कविता

‘‘हम नहीं बन सकते बुद्ध’’

एक पार्थिव

एक रुग्न अवश को देख

करुणा से भर उठे थे

विचलित हो तुम

कर गये थे पलायन

सांसारिक ऐश्वर्य को धिक्कार

धन वैभव से भरा अपना साम्राज्य

तज कर अपनी पत्नी पुत्र

और सभी बंधु बांधवो को

आहत हो सांसारिक पीडा से

बैठ गये समाधि में

उनमुक्त ब्योम के नीचे

निर्वाण प्राप्ति हेतु बने

‘‘तथागत‘‘


आज शवों से भरा हर शहर

रोते बिलखते परिजन

जन्मदाता के निधन से भटकते बालक

कितने अनाथ राहुल

अनेको बिलखती यशोधरायें

पुत्र बिछोह में ब्यथित

अनगिनत पिता शुद्धोधन

विलाप करती अनगिनत माँ महामायायें

काल के गोद में समायें

असंख्य दाह संस्कार हेतु प्रतिक्षारत शव


जरा कहो

विछोड पीड़ा से ग्रसित

आत्मा से ब्यथित

मानवों को बिलखता छोड़

कर्मो से विमुख हो

हाहाकार करते हर प्राणियों को छोड़

सबसे विलग निर्मोही बन

निर्वाण की खोज में

नहीं कदापि नहीं

अंर्तमन में कोहराम मचाते

भयंकर तूफानों के साथ

एक नई आस लिये

विश्वास का हाथ पकड़

जीवन पथ पर

बढते जाने का मार्ग

निर्वाण प्राप्ति का है

अतः हम नहीं बन सकते बुद्ध...!


17.

सान्त्वना श्रीकांत, नई दिल्ली, मो. 8826667950


कविता

अभागापन

स्त्री ने अपने पाँव के नाख़ून को ध्यान से देखा

सौन्दर्य कि परिभाषा से स्वआकलन किया।

रोटी की गोलाई और ब्रह्मांड के आकार में,

अंतर खोजा।

प्रकृति का समर्पण और

वह स्त्री पूरक थे

पूर्णता कि समस्त परीक्षा में अव्वल

आने पर ही चुना गया था उसे

देर तक सोचती रही।

प्रेम हमेशा अपूर्ण ही

क्यूँ रहा

कभी ईश्वर के गूँगेंपन को कोसती

कभी मानुष के लपटपन को।

दरअसल

वह स्त्री प्रेम की अपूर्णता

और अपने अभागेपन में

अपूर्ण होती गयी।


18.


नेहा वैद, नोएडा, मो.  9769992656


गीत-

मौन मृत्यु है, स्वर संजीवन

ऐ मेरे प्रिय भाव-परिंदे !

बोल जरा कुछ बोल रहे

दसों-दिशाएं चुप-चुप-सी हैं

जीवन में रस घोल लें ।।

1.

मंगल प्रेम-कलश घबराए, मंदिर मन का टूट न जाए

नए सुरों की मौन मुरलिया, कहीं हाथ से छूट न जाए

मधुर घंटियां अब देहरी से करती नहीं किलोल रे।

बोल जरा कुछ बोल रे।।

2.

प्रणय-गीत से मधुबन चहकें,नवल हंसी के घूंघट लहकें

आंसू की सूखी रेखाएं, तरल-हृदय में और न दहकें

वे रेखाएं जिनसे अब तक भीगे बहुत कपोल रे ।

बोल जरा कुछ बोल रे।।

3.

तेरा मौन समुंदर ठहरा, मत होने दे इसको गहरा

ये तो लील रहा प्राणों को, लगा-लगा अधरों पर पहरा

मौन मृत्यु है स्वर संजीवन समझ शब्द का मोल रे।

बोल जरा कुछ बोल रे।।



गीत-

किरचें टूटे कांच की

बहुत दिनों तक रहीं निकलतीं किरचें टूटे कांच की।

घर तो बहुत बुहारा लेकिन

मन की कभी न जांच की।।


सर्प-यज्ञ यों हुए हजारों

सधा नहीं मन का तक्षक

लेने को प्रतिशोध अनोखा जलने लगा राज-रक्षक

नाग-पंचमी पर कुछ हल्की,तपन हुई उस आंच की।

बहुत दिनों तक रहीं निकलतीं किरचें टूटे कांच की।।


चंद्रबिम्ब भावों का बिखरा

संवेदन की थाली में

हृदय-मालती की कोमलता

बदली सूखी डाली में

उगी हुई है सबके भीतर, फसल झूठ की, सांच की।

बहुत दिनों तक रहीं निकलतीं किरचें टूटे कांच की।।


ढूंढ न पाए छुपे रहे जो उन विषमय संकल्पों को

तुच्छ समझकर छोड़ा जिन-जिन शूल-सरीखे अल्पों को

मोहकता भयभीत हो गई, मृग की नई कुलांच की।

बहुत दिनों तक रहीं निकलती किरचें टूटे कांच की।।


19.

डाॅ. रवि शर्मा ‘मधुप’, रानीबाग, दिल्ली, मो. 9811036140


लेख

पंथ प्रेम को अटपटो

‘‘मेरठ जनपद में प्रेम-विवाह करने वाले युवा दंपत्ति-सतीश-सरिता को भरी पंचायत में गंडासे से कत्ल कर दिया गया। विपिन गोगिया और जसप्रीत कौर के प्रेम-विवाह, अपहरण, सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमा, अदालत में उनकी नाटकीय उपस्थिति। एक महिला ने अपनी लड़की द्वारा प्रेम विवाह करने की धमकी पर उसे जलाकर मार डाला। माता-पिता द्वारा प्रेम विवाह की अनुमति न मिलने पर प्रेमी-प्रेमिका द्वारा आत्महत्या।’’ ऐसी ही अनेक खबरें अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं। लोग पढ़ते हैं। प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं और भूल जाते हैं।

प्रेम करने वाले इन सब कठिनाइयों के बावजूद सदा से प्रेम करते रहे हैं और करते रहेंगे, क्योंकि प्रेम प्राणी-मात्र की आदिम शाश्वत वृत्ति है। मनुष्य भी जन्म से मृत्यु-पर्यंत अनेक रूपों में प्रेम की शाश्वत सत्ता का साक्षात्कार करता है। माँ-बाप का संतान के प्रति, भाई का बहन के प्रति, मित्र का मित्र के प्रति, मनुष्य का जीवन-साथी, जन्मभूमि, देश और प्रकृति के प्रति प्रेम। जिस प्रकार, प्रेम मनुष्य के आदिम संस्कारों में से एक है, उसी प्रकार विवाह सभ्य मनुष्य की समाज-स्वीकृत आवश्यकता रही है। 

विवाह और प्रेम का संबंध आग और उष्मा, जल और तरंग, दिन और रोशनी जैसा अभिन्न है। भारतीय समाज में दो प्रकार के विवाह प्रचलित रहे हैं - प्रेम विवाह, जिसमें लड़का-लड़की अपने स्तर पर एक दूसरे से परिचित होते हैं। परिचय घनिष्ठ होता है और वे विवाह-बंधन में बंध जाते हैं। दूसरे प्रकार का विवाह माता-पिता या बुजुर्गों की इच्छा से चुने गए लड़के-लड़की से होता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी प्रेम विवाह, जिसे गंधर्व-विवाह भी कहा गया है, के अनेक उदाहरण मिल जाते हैं-पुरुखा-उर्वशी, नल-दमयंती, शकुंतला-दुष्यंत आदि इसी प्रकार के विवाह माने जा सकते हैं।

भारतीय समाज में विवाह की जो परंपरा प्रचलित रही है, उसके अनुसार परिवार के बुजुर्ग विवाह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लड़के/लड़की को पसंद करने से लेकर विवाह की सभी व्यवस्थाएँ वे ही करते रहे हैं। इनमें लड़के-लड़की की इच्छा गौण हो जाती है। उनके माँ-बाप, कुल गोत्र, वंश आदि को महत्त्व देते हुए विवाह का निर्धारण किया जाता है। कुछ समय पूर्व तक विवाह की यह पद्धति अत्यंत लोकप्रिय तथा सर्वस्वीकृत रही। लड़का-लड़की भी माता-पिता की इच्छा तथा निर्णय को सम्मान देते हुए जीवन भर विवाह के पवित्र बंधन को निभाते रहते थे। कई बार तो कुल की मर्यादा, वंश-परंपरा, लोकनिंदा आदि आधारों पर अनेक अनमेल विवाह भी लंबे समय तक चलते रहे। भाग्य का खेल मानकर दोनों पक्ष ऐसे विवाहों को आजीवन ढोते रहे, परंतु आज स्थितियाँ बदल गई हैं।

आज प्राचीन जीवन-मूल्य, मान्यताएँ, आस्थाएँ, परंपराएँ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। उनकी उपयोगिता प्रासंगिकता पर प्रश्न-चिह्न लग रहे हैं। ऐसी ही एक परंपरा है- माता-पिता द्वारा विवाह का निर्धारण। आज शिक्षा के बढ़ते प्रभाव, पाश्चात्य देशों की नकल, सामाजिक, मानसिक, वैचारिक परिवर्तनों के कारण अनेक युवा परंपरागत ढंग से अपना जीवन-साथी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वे विवाह को एक बोझ, दबाव या विवशता नहीं बनाना चाहते।

आज केवल खानदान, कुल, वंश के नाम पर किसी व्यक्ति से नाता जोड़ना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया है, जितना व्यक्तिगत रूचि, वैचारिक धरातल पर समानता, जीवन के प्रति दृष्टिकोण की अभिन्नता के आधार पर नाता जोड़ना। प्रेम विवाह की सफलता का आधार भी यही समानता है। यह ठीक है कि आजकल प्रेम का संबंध शारीरिक आकर्षण से ही जोड़ लिया जाता है, परंतु केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित रह जाने वाला प्रेम सच्चा नहीं है, अपितु यह तो वासना है, पड़ाव को ही मंजिल मान लेना है। प्रेम परमार्थ है, आत्म-त्याग, बलिदान, प्रदान करने की भावना से जुड़ा है। यदि प्रेम का संबंध स्वार्थ, प्राप्ति या बदले में कुछ पाने से है, तो वह सच्चा प्रेम न होकर प्रेम का दिखावा है, ढोंग है। आचार्य रजनीश के अनुसार केवल वही लोग प्रेम कर सके हैं जो दे सकते हैं। हिंदी के एक साहित्यकार भी प्रेम का मुख्य अर्थ आत्म त्याग मानते हैं-

‘‘त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, / करो प्रेम पर प्राण न्योछावर।’’

वस्तुतः प्रेम बुद्धि की वस्तु नहीं, हृदय की सहज अनुभूति है, इसीलिए कहा जाता है कि प्रेम किया नहीं जाता, हो जाता है।

प्रेम विवाह से जुड़ा हुआ प्रश्न है, उसकी सफलता-असफलता का। प्रायः कहा जाता है कि प्रेम विवाह सफल नहीं हो पाते। वे रेत के महल की तरह ढह जाते हैं। यह बात उन्हीं प्रेम-विवाहों के संबंध में ठीक है, जो फिल्मी अंदाज में, काल्पनिक दुनिया में विचरण करते हुए, काम-वासना, को केंद्र में रखकर किए जाते हैं। अक्सर होता यह है कि स्कूल/काॅलेज में किसी लड़के/लड़की से आँखें चार हुईं। बातचीत शुरू हुई। मुलाकातें/बातें बढ़ती गईं। सार्वजनिक स्थानों से एकांत स्थान की ओर बढ़ने लगे और एक दिन जोश में या विवशता में विवाह करने का निर्णय करना पड़ता है। विवाह के बाद जब कल्पना से यथार्थ भूमि पर उतरे तो नज़्ार आई भूख, नौकरी, आवास की समस्याएँ, परेशानियाँ। समाज की उपेक्षा, घर वालों का असहयोग जले पर नमक छिड़कते हैं। ऐसे में जब प्रेम की खुमारी उतर जाती है तो आटे-दाल का भाव पता चलता है और प्रेम विवाह एक बोझ, एक अभिशाप बन जाता है। कल्पनाएँ चूर-चूर हो जाती हैं और ऐसा प्रेम विवाह यदि असफल हो जाए, तो इसमें हैरानी कैसी?

दूसरी ओर, जो प्रेम विवाह वैचारिक चिंतन के धरातल पर दूरदर्शिता से किए जाते हैं, जिनमें एक दूसरे की भावनाओं तथा सीमाओं को समझा जाता है, अपेक्षाएँ सीमित तथा व्यावहारिक होती हैं, ऐसा प्रेम विवाह अवश्य सफल होता है। सफल तथा असफल प्रेम विवाह को यदि एक सूत्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहें तो इस प्रकार कर सकते हैं-

1. वैचारिक परिपक्वता  त्याग वृत्ति उदात्त दृष्टिकोण  सफल प्रेम विवाह।

2. अह्म मात्र शारीरिक आकर्षण, अपरिपक्वता असफल प्रेम विवाह।

प्रकाश-अनीता, नीरज-यशोदा, राजेंद्र-साधना आदि युवाओं ने प्रांत, भाषा, जाति आदि की असमानताओं और विरोधों के होते हुए भी प्रेम विवाह किया। उनका प्रेम चूंकि यथार्थ की ठोस भूमि पर पनपा था अतः आज लंबा समय बीत जाने पर भी कोई दरार, तनाव या कुंठा उनमें नहीं है। दूसरी ओर अपने काॅलेज में ‘स्वप्न संुदरी’ के नाम से विख्यात कामिनी अपने प्रेम-विवाह के निर्णय पर पछता रही है। विवाह से पहले जहाँ विक्रम उसकी हर अदा, बात और इच्छा पर जान देता था, वहीं आज अहम के टकराव, पुरूष-श्रेष्ठता की ग्रंथि तथा कामिनी के उसी अतीत सौंदर्य बनाव-श्रृृंगार के कारण विक्रम बात-बात पर कामिनी को मानसिक यातना पहुँचाता है।

प्रेम-विवाह के संबंध में पूसा पोेलेटेक्निक से इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रहे पल्लव जैन का मानना है कि प्रेम-विवाह ज्यादातर सफल नहीं होते। कुछ समय बाद ऐसे विवाह टूटने लगते हें। दो विषयों में एम.ए. और स्कूल-शिक्षिका कुमारी वीणा का मानना है कि प्रेम-विवाह जरूर होने चाहिए और बड़ी संख्या में होने चाहिए। ये दहेज, जाति-प्रथा, स्त्री पर होने वाले अत्याचारों को रोकने में सहायक हो सकते हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग में पीएच.डी. हेतु शोधरत विजय कुमार प्रेम-विवाह की असफलता विषयक प्रचलित मान्यता से सहमत हैं। उनका कहना है कि सिद्धांत रूप में प्रेम-विवाह आदर्श और सर्वश्रेष्ठ है पर वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसे विवाह जातिगत तनाव उत्पन्न करते हैं। यह तनाव हत्या, दंगे तक में रूपांतरित हो जाता है। प्रेम-विवाह की असफलता के लिए वे अहम का टकराव, समझौते, सामाजिक दबाव और सुरक्षा के अभाव को जिम्मेदार ठहराते हैं। परंपरागत विवाह में पत्नी की पति पर आर्थिक निर्भरता उसे समझौता करने के लिए बाध्य कर देती है, फिर धीरे-धीरे साथ-साथ रहते प्रायः प्रेम हो ही जाता है। महानगरों में जाति-व्यवस्था टूटने के कारण प्रेम-विवाह का प्रचलन बढ़ा है, पर भारतीय गाँवों और कस्बों में अभी प्रेम-विवाह केवल फिल्मों में ही सफल होते हैं, जीवन में नहीं।

बी.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा कुमारी रचना प्रेम-विवाह को तभी ठीक मानती हैं, यदि दोनों पक्षों की सोच, पृष्ठभूमि और आर्थिक स्थिति एक समान हो, वरना टकराव बढ़ेगा। यदि एक दूसरे की अच्छाइयों-बुराइयों को पहचान और स्वीकार करके प्रेम-विवाह किया जाएगा, तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। साहित्यकार प्रकाशक आचार्य अनूप मनुस्मृति का उदाहरण देते हुए प्रेम-विवाह को बिलकुल उचित और प्रासंगिक बताते हैं। उनके अनुसार फिल्मों से प्रभावित होकर कच्ची उम्र में किया गया प्रेम-विवाह शारीरिक आकर्षण खत्म होने पर डगमगाने लगता है। बहुत छोटी-छोटी बातों पर तकरार, झगड़ा और तलाक की नौबत आ जाती है। यदि समान योग्यता-पद वाले लड़के-लड़की आपस में प्रेम-विवाह करें तो वे सफल होंगे। आचार्य अनूप जातिवाद की समस्या के समाधान के रूप में प्रेम-विवाह को महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

दिल्ली काॅलेज ऑफ इंजीनियरिंग में बी.ए. तृतीय वर्ष के छात्र योगेश कुमार का मत है कि एक ही विभाग या कार्यालय में कार्यरत लड़के-लड़की को प्रेम-विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि ज्यादा नजदीकियाँ अंततः दूरियों को जन्म देती हैं। हाँ, एक ही व्यवसाय या कार्यक्षेत्र का वे विरोध नहीं करते। आई.टी.आई. पूसा में पढ़ रहे लक्ष्मी नारायण माता-पिता की इच्छा तथा सहमति से किए जाने वाले प्रेम-विवाह के पक्ष में है। 

कुछ प्रौढ़ और वृद्ध लोगों की प्रतिक्रिया उनकी पृष्ठभूमि के अनुसार थी। सरकारी कार्यालय से सेवानिवृत जीवन नारायण का दृष्टिकोण प्रेम-विवाह के संबंध में उदार हैं। वे मानते हैं कि समय परिवर्तनशील है, जो बातंे पहले पाप और गलत समझी जाती थीं, वे आज स्वीकार्य हैं। प्रेम-विवाह भी ऐसा ही है पर प्रेम-विवाह के नाम पर उच्छृख्ंालता, बड़ों की अवज्ञा और अनादर को वे अच्छा नहीं मानते। हालाँकि इसके लिए वे बड़ों के हठ और बच्चों की भावनाएँ न समझने की उनकी असमर्थता को भी दोषी पाते हैं। विद्यावती पैसंठ वर्षीया गृहिणी है। उनके नाती-पोते भी जवान हो गए हैं। प्रेम-विवाह के नाम से ही उन्हें चिढ़ते हैं, क्योंकि इससे उनके अनुसार संस्कृति मिट्टी में मिल जाती है। नए दौर में इसके बढ़ते प्रचलन से वे दुखी हैं। वे इसका सारा दोष फिल्मों के मत्थे मढ़ती हैं।

दिल्ली के एक काॅलेज में डाॅ. प्रोफेसर प्रतिभा व्यास अपने अनुभव के आधार पर प्रेम-विवाह को अत्यधिक सफल और उपयुक्त मानती हैं। उनका मानना है कि आज से पच्चीस वर्ष पूर्व उन्होंने प्रेम-विवाह किया था। शुरू-शुरू में पारिवार वालों ने विरोध किया था पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया। वे अपने ससुराल में श्रेष्ठ बहू मानी जाती है। अपने बच्चों को भी वे प्रेम-विवाह की छूट देंगी, पर थोड़ा ध्यान ज़्ारूर रखना चाहेंगी।

वस्तुतः महानगरों में प्रेम-विवाह के बढ़ते प्रचलन का कारण है - सामाजिक व्यवस्था में बदलाव। जब से लड़के-लड़की एक साथ पढ़ने लगे हैं, स्त्रियाँ बड़ी संख्या में नौकरी, व्यवसाय आदि के कारण घरों से बाहर जाकर पुरूषों से मिलने-जुलने लगी हैं, तब से प्रेम-विवाह का प्रचलन बढ़ा है। फिर पाश्चात्य सभ्यता-संस्कृति का फिल्मों और दूरदर्शन के माध्यम से आज हमारे जीवन में जो प्रवेश हुआ है, उससे स्त्री-पुरूष संबंधों में खुलापन आया है, युवा-पीढ़ी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इससे प्रभावित हुई हैं। सामाजिक रूढ़ियों में भी ढीलापन साफ जाहिर होता है।

यह कहा जा सकता है कि फिल्मों में दिखाया जाने वाला तथा प्रेम-विवाह युवाओं में एक अद्भुत कल्पना लोक की सृष्टि कर देता है। किंतु वास्तव में प्रेम-विवाह का मार्ग ‘खांडे की धार’ जैसा है, जिस पर चलना कठिन और चुनौतीपूर्ण है। यदि प्रेम-विवाह के बाद की स्थितियों को पहले से जान और समझ लिया जाए, विवाहोपरांत की समस्याओं, परेशानियों, कमजोरियों से उसी तरह मिलकर लड़ा जाए जैसे कि विवाह से पहले, तो कोई वजह नहीं कि प्रेम-विवाह सफल न हों। निष्कर्षतः किसी भी परिस्थिति में उस प्रेम-भावना को जीवित रखना चाहिए, जो उनके सामीप्य का आधार थी।


20.


दीपक शर्मा, लखनऊ, मो. 98391 70890

दीपक शर्मा - एक अनुपम कथाकार

यूं तो हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श का शोर बरसों से है और समय≤ पर कई उत्कृष्ट कृतियाँ पाठकों व आलोचकों का ध्यान उचित ही अपनी ओर खींचती रही हैं, मगर जिस तरह मुझे दीपक शर्मा सन 1990 की अपनी पहली कहानी से अब तक लगातार विचलित करती रही हैं, उसका कोई सानी नहीं। इतना स्तब्ध और विमूढ़ मुझे केवल सआदत हसन मंटो ने किया है या अर्जेंटीना की अद्वितीय कथाकार सिल्विना ओकैम्पो ने। या अमेरिका की फ्लैनरी ओकोनर ने।

कितनी विचित्र नियतियों से लोग गुजरते हैं, मन पर अलग-अलग दाग लिए। कभी वे प्रतिकार कर पाते हैं, कभी नहीं। इतनी बारीकी से फांस दिखा देना हिंदी कथा संसार में सिर्फ दीपक शर्मा ही कर सकती हैं। उनकी तनी हुई भाषा, जैसे तनी हुई रस्सी। विभिन्न विषयों पर, परिस्थितियों पर, परिदृश्यों पर आश्चर्यजनक पकड़। पात्र चमड़े का व्यापार करता हो या अस्पताल में डॉक्टर की रिपोर्ट बूझता बैठा हो, छत से गिरने वाला हो या चुपचाप कहीं जाने वाला हो, उनके पास हर पात्र का छाया चित्र है, उसका एक्स रे। यह उस प्रचलित सीमित, आत्मकथात्मक लेखन से बिल्कुल अलग है जहाँ लेखक अपने भीतर पीड़ा का चक्कर लगाता रहता है। दीपक शर्मा ‘बाहर‘ निकलती हैं, अलग-अलग परिस्थितियों की पड़ताल करती हुईं। क्लिनिकल डिसेक्शन, जैसे अपराध को पकड़ने के लिए जासूस करते हैं।

हमारे यहाँ स्त्री विमर्श जिस भी पीड़ा और दंश में से निकला हो, उसे ऐसी सर्वव्यापी परिघटना में जिस तरह दीपक शर्मा ने अंकित किया है, उसका कोई जोड़ नहीं। उनकी कहानियां इतनी नुकीली हैं, इतनी मर्मभेदी, कि उनके असर से, उनकी अविस्मरणीयता से आप अछूते नहीं रह सकते। वह उन गिने-चुने हस्ताक्षरों में हैं जिनके बिना हिंदी साहित्य का समकालीन स्त्री विमर्श असम्भव है। -गगन गिल, 


21.

राकेश गौड़, नई दिल्ली मो. 9818974184

70 का दशक...... मेरा आकाश*

बचपन में 

न ख़त्म होने वाले 

असीमित आकाश पर जब 

रुई जैसे बादलों की उथल-पुथल देखता

तो उसमें ढूंढ़ा करता था 

बाबूजी, अम्माँ, जीजी

और अपनी आकृति


साँझ ढले नीले आकाश के मुखड़े पर 

ढ़लके सिन्दूरी चूंघट में 

कल्पना करता था एक दुल्हन की 

और सारे आकाश को जैसे 

अपनी बाहों में भर के सोचता 

यह आकाश मेरा है


पर आज, मेरा आकाश 

सीमित हो गया है 

मेरा ही आकाश मुझसे 

कितनी दूर है 

सिर्फ पगार के दिन 

बात करने वाली बीवी


खाने की जगह 

दवाईयाँ खा रहे बाबूजी 

टूटी खटिया पर 

टूटा शरीर लिए पड़ी अम्माँ


सूनी माँग, सूनी आँखें 

लिए विधवा जीजी 

सिर्फ संडे को जागते

दिखने वाले बच्चे


इन में ही सिमट कर 

रह गया है मेरा आकाश 

फिर भी मैं इसे 

बाँहों में नहीं भर सकता 

लगता है जैसे-जैसे 

आकाश सीमित हुआ है 

वैसे ही मेरी बाँहें 

उस से भी दूनी सिकुड़ गई हैं


*28 अगस्त 1980


40 वर्ष बाद ...... धूमिल आकाश **

आज न दिन में बादल 

न रात में तारे दिखते हैं 

बादलों की उथल-पुथल कहाँ 

सब कुछ है धुआँ-धुआँ 

मम्मी को निगल गया कैंसर 

सीनियर सिटिजन होम है 

पापा का घर

दीदी ने की लव मैरिज घर से भाग कर 

लव की उतरी खुमारी 

पापा के यहाँ, लौट आई बेचारी 

क्या पता था उसे, पापा का ही 

नहीं है ठिकाना 

महिला छात्रावास उसे भी पड़ा जाना

मेरे धुंधले आकाश में 

न होम है न लिविग 

दुल्हन है न बीवी 

है तो ‘लिव-इन‘ रिलेशन में पार्टनर 

जो, दो साल पहले जीवन में आई

उसका फंड़ा है साफ 

परिवार और बच्चों से 

अभी करो माफ 

क्या है अभी जरूरत 

कौन ये झंझट मोल ले 

जब मन होगा बच्चा लेंगे गोद 

अभी करीयर पर फोकस करो यार

अब आलम यह है कि 

जब मैं घर आता हूँ 

मल्टीनेशनल में जॉब कर रही 

पार्टनर पहुँच जाती है ऑफिस

अगले दिन जब वह आती है वापिस 

मुझे निकलना होता है ऑफिस

क्या हुआ कभी अगर दोनों हैं घर पर 

तो बैठते हैं अपने अपने लैप्टॉप लेकर 

करते हैं, वर्क फ्रोम होम 

गुड नाइट भी होती है ‘व्हाटस ऐप‘ पर 

कहाँ है मेरा परिवार, कहाँ है मेरा घर !!

*हाल ही में लिखी रचना        




                





Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

एक बनिया-पंजाबी लड़की की जैन स्कॉलर बनने की यात्रा