शोध पत्र


डॉ. मजीद शेख़

संपर्क : सहायक प्राध्यापक एवं शोध निर्देशक, हिंदी विभाग,प्रतिष्ठान महाविद्यालय,पैठण, जिला - औरंगाबाद - 431107 (महाराष्ट्र) चलित दूरभाष : 09765944586 ई-मेल : majidmshaikh@gmail.com

'आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास दृष्टि'

सारांश (Abstract) :

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब 'हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने का कार्य आरंभ किया तब सारी चीजें अव्यवस्थित थीं। पूरा साहित्य इधर-उधर बिखरा पड़ा था। कोई पूर्व परंपरा नहीं थी। सब कुछ नये सिरे से करना था और इसके लिए एक तटस्थ और पैनी दृष्टि विकसित करना भी आवश्यक था। आचार्य शुक्ल ने ऐसी ही दृष्टि के साथ इधर-उधर बिखरे साहित्य को संकलित और संयोजित किया। उसका विश्लेषण किया और नई दृष्टि से उसकी व्याख्या की। किसी भी क्षेत्र में पुरोधा होने का एक अलग महत्त्व होता है। शुक्ल जी हिंदी साहित्य के इतिहास के पुरोधा रहे हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य और उसके इतिहास को समुचित स्वरुप प्रदान किया। 

संकेताक्षर (Keyword) :

नई परंपरा की खोज, वीरगाथा काल, अपभ्रंश, भक्तिकाल, कबीर, तुलसीदास, जायसी, विद्यापति, गद्यकाल, छायावाद, हिंदी-उर्दू विवाद, इतिहास पर पुनर्विचार

भूमिका (Introduction) :

हिंदी आलोचना में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का युगांतकारी योगदान अतुलनीय हैं। वे हिंदी के उन मनीषियों में से हैं जिन्होंने हिंदी के बहुमुखी विकास में अमूल्य योगदान दिया। निबंध, समीक्षा, समालोचना के क्षेत्र में उनकी अपूर्व देन आज भी एक निकष के रुप में स्थापित है। हिंदी साहित्य में उनका मूल्यांकन सहज स्वीकार किया गया है। साहित्येतिहास के लेखन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका ही नहीं निभाई अपितु एक परंपरा को भी जन्म दिया। आलोचना के क्षेत्र में उनका अवदान अनन्यसाधारण रहा है। उनका 'हिंदी साहित्य का इतिहास' ग्रंथ ही उन्हें मील के पत्थर के रुप में स्थापित करने में सक्षम हैं। वैयक्तिक रुचि की अपेक्षा वे तटस्थ निरीक्षण को अधिक महत्त्व देते हैं। जीवन की उपादेयता के मानदंडों का प्रयोग वे साहित्य विश्लेषण में करते हैं। इस प्रकार विशुध्द काव्य का आग्रह, तटस्थता एवं जीवनाभिमुख दृष्टि इनकी आलोचना की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं। रामस्वरुप चतुर्वेदी के शब्दों में, “रामचंद्र शुक्ल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने आलोचनात्मक लेखन या कि इतिहास में कहीं साहित्येतर मानदंड स्वीकार नहीं किए। उनकी प्रिय रचना तुलसी का रामचरितमानस रही और अधिकतर उसी में से उन्होंने अपने काव्य-मूल्य विकसित किए। 1

1. नई परंपरा की खोज :

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब 'हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने का कार्य आरंभ किया तब सारी चीजें अव्यवस्थित थीं। पूरा साहित्य इधर-उधर बिखरा पड़ा था। कोई पूर्व परंपरा नहीं थी। सब कुछ नये सिरे से करना था और इसके लिए एक तटस्थ और पैनी दृष्टि विकसित करना भी आवश्यक था। आचार्य शुक्ल ने ऐसी ही दृष्टि के साथ इधर-उधर बिखरे साहित्य को संकलित और संयोजित किया। उसका विश्लेषण किया और नई दृष्टि से उसकी व्याख्या की। किसी भी क्षेत्र में पुरोधा होने का एक अलग महत्त्व होता है। शुक्ल जी हिंदी साहित्य के इतिहास के पुरोधा रहे हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य और उसके इतिहास को समुचित स्वरुप प्रदान किया। उन्होंने हिंदी साहित्य की परंपरा खोजकर उसे विकसित किया। इतने बड़े काम में कुछ-न-कुछ कमी रह जाना स्वाभाविक ही है। अर्थात् वे शुध्दतावाद और यथास्थितिवाद के समर्थक आलोचक रहे हैं। शुक्ल जी ने जिस परंपरा की नींव डाली उसे द्विवेदी जी ने आगे बढ़ाया। यदि आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने 'तुलसीदास' को साहित्य में स्थापित किया तो आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने दूसरी परंपरा की खोज करते हुए 'कबीर' को स्थापित करने का कार्य किया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर शुक्ल जी ने पहली परंपरा न बनाई होती तो शायद द्विवेदी जी दूसरी परंपरा न बना पाते। हमें यह बात समझनी होगी कि जिस युग में शुक्ल जी हुए और जो स्थितियां और परिस्थितियां उनके सामने थीं, उसी के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने साहित्य का मूल्यांकन किया। द्विवेदी जी के सामने भिन्न स्थितियां और भिन्न परिस्थितियां रहीं तभी वे दूसरी परंपरा खोज सके।

हिंदी साहित्येतिहास के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का आगमन युगांतकारी रहा हैं। हिंदीसाहित्येतिहास की परंपरा में सर्वोच्य स्थान आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित 'हिंदी-साहित्य का इतिहास' (सन् 1929 ई.) को प्राप्त है। इस ग्रंथ की रचना मूलतः 'हिंदी शब्द सागर' की भूमिका 'हिंदी साहित्य का विकास' शीर्षक से हुई थी। इसके पूर्व हिंदी छात्रों को साहित्येतिहास पढाने के लिए कुछ 'संक्षिप्त नोट' लिखी गई थीं। आगे सन् 1927 ई. में नागरी प्रचारिणी पत्रिका में वह तीन निबंधों के रुप में प्रकाशित हुई- 1. हिंदी साहित्य का वीरगाथा काल 2. हिंदी साहित्य का पूर्व मध्यकाल और 3. हिंदी साहित्य का उत्तर मध्यकाल। जनवरी, 1929 ई. में 'हिंदी शब्द सागर' प्रकाशित हुआ। उसकी भूमिका का संवदित संस्करण पुस्तककार रुप में 'हिंदी साहित्य का इतिहास' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। उसके बाद सन् 1940 ई. में लेखक ने इसका पुनः संशोधन और संवर्दन किया। इसमें आदिकाल के भीतर वज्रयानी सिध्दों और नाथपंथी योगियों, भक्तिकाल के अंतर्गत स्वामी रामानंद और नामदेव तथा रीतिकाल के अलंकार ग्रंथों के उद्भव और विकास आदि पर अधिक विचार किया गया। आचार्य शुक्ल के निधन के बाद आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा इस ग्रंथ का परिवदित संस्करण तैयार किया गया, जिसमें अद्यतन सामग्री का उपयोग किया गया। कुसुम चतुर्वेदी लिखती हैं, "हिंदी साहित्य का इतिहास शुक्ल जी ने तीन बार पूरा किया और तीनों बार अधूरा रह गया। आधुनिक काल के साथ यह घटना घटी। पहली बार प्रेस जाते समय प्रेस सामग्री या तो रास्ते में गायब हुई या प्रेस पहुंचने के बाद । आचार्य रामचंद्र शुक्ल शोध संस्थान में दिए गए अपने भाषण में डॉ.ना.नागप्पा ने प्रेस से गायब सामग्री का विवरण दिया था। संकेत यह भी किया कि कुछ लोग शुक्ल जी से ईर्ष्या करते थे और कुछ उनके समाजवादी दृष्टिकोण के विरोधी थे। दूसरी बार की लिखित सामग्री शुक्ल जी का नौकर ही रद्दी समझकर बेच आया था। शुक्ल जी के मृत्यु के बाद जो सामग्री गायब हुई उसका विवरण डॉ.शिवमंगल सिंह 'सुमन' और गोकुलचंद्र शुक्ल ने दिया है।"2

हिंदी साहित्य के इतिहास की एक समस्या यह है कि हिंदी साहित्य का आरंभ कब से माना जाए। इस समस्या का संबंध हिंदी भाषा के इतिहास से भी है। कुछ विद्वानों ने अपभ्रंश के परवर्ती रुप को पुरानी हिंदी मानकर वहीं से हिंदी साहित्य के इतिहास का आरंभ माना हैं। आचार्य शुक्ल जी ने प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना हैं। वे 'अपभ्रंश' को कभी 'प्राकृताभास हिंदी और कभी 'पुरानी हिंदी' भी कहते हैं। उन्होंने 'हिंदी साहित्य का इतिहास एक सम्यक-दृष्टि को अपनाते हुए लिखा हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य को चार कालों में विभक्त किया हैं - 1.वीरगाथा काल, 2. भक्तिकाल, 3. रीतिकाल और 4.गद्यकाल । इस वर्गीकरण के प्रमुख दो आधार रहे हैं - 1. रचना की प्रचुरता और 2. ग्रंथों की प्रसिध्दि । भक्तिकाल में मुख्य रुप से दो काव्य-धाराएं मानी गई हैं - 1. निर्गुण धारा और 2.सगुण धारा। निर्गुण धारा की दो शाखाएं मानी गई हैं – ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी और उसी प्रकार सगुण धारा की दो शाखाएं – रामभक्ति शाखा और कृष्णभक्ति शाखा। रीतिकालीन काव्य का धाराओं में विभाजन नहीं है। आधुनिक काल को आचार्य शुक्ल ने 'गद्यकाल' कहा है। उनकी धारणा रही हैं, "आधुनिक काव्य में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान साहित्यिक घटना है। इसलिए उसके प्रसार का वर्णन विशेष विस्तार के साथ करना पड़ा है।3 आधुनिक काल के साहित्य को गद्य और काव्य खंड़ में विभाजित कर उसे प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय उत्थान के रुप में प्रस्तुत किया गया है। डॉ.सुमन राजे लिखती हैं, “यह सत्य है कि शुक्ल जी के काल विभाजन का समर्थन भी खूब हुआ और विरोध भी। दोनों उसकी शक्ति के ही प्रमाण माने जाने चाहिए। और सबसे बड़ी बात तो यह कि, उनके इतिहास-सिध्दांत, जीवन, जगत और साहित्य मंथन से उद्भूत हुए थे थोपे हुए अथवा चिपकाए हुए नहीं। उन्होंने इतिहास जुटाया ही नहीं जगाया भी है।4 हिंदी साहित्य के विकास-क्रम का यह काल-विभाजन कमोबेश परिवर्तन के साथ आज स्वीकार किया गया हैं।

आचार्य शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' ग्रंथ की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि साहित्येतिहास में कवियों-साहित्यकारों के जीवन-वृत्त एवं रचनाओं की स्थूल जानकारी के स्थान पर रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन को प्रमुखता दी गई है। रचनाओं के मूल्यांकन के लिए उन्होंने लोकधर्म तथा लोकमंगल की कसौटी अपनाई है। कवि या रचना के मूल्यांकन का उद्देश्य काल विशेष के साहित्य की प्रवृत्ति का निर्धारण और साहित्य-विकास के सूत्र को स्पष्ट करना रहा है न कि कवि या रचना की आलोचना। डॉ.माधव सोनटक्के जी ने लिखा हैं, "हिंदी साहित्य का इतिहास' उनके गंभीर अध्ययन और विश्लेषण-सामर्थ्य का प्रमाण है। शुक्ल जी की आलोचना दृष्टि प्रमुखतः रसवादी और लोकमंगल- भावनाग्राही तथा रामचरितमानस से प्रेरित रही है। इसीलिए एक ओर वे सूर-कबीर जैसे श्रेष्ठ कवियों के प्रति भी न्याय नहीं कर सके।5 और दूसरी ओर अपने समकालीन स्वच्छंदतावादी काव्य के प्रति भी न्याय नहीं कर सके । अर्थात् मुक्तक काव्य के साथ वे न्याय नहीं कर सके। क्योंकि मुक्तक की अपेक्षा प्रबंध को वे महत्त्व देते थे। निर्गुण काव्य का योग्य मूल्यांकन नहीं कर सके। अपितु नीतिवादी दृष्टिकोण के कारण छायावादी कवियों के साथ न्याय नहीं कर सके।

आचार्य शुक्ल के साहित्येतिहास की कई त्रुटियों की विशेषतः हिंदी साहित्य का आरंभ, आदिकालीन 'वीरगाथाकाल' तथा आधुनिक काल के 'गद्यकाल' के नामकरण, आदिकालीन नाथ, सिध्द तथा जैन साहित्य की अवहेलना, संत साहित्य के प्रति असहिष्णु दृष्टिकोण, रीतिकाल के रीतितेतर काव्य की अनदेखी, केशवदास के प्रति बेरुखी, छायावादी काव्य की उपेक्षा आदि विषयों के संबंध में चर्चा भी की जाती है। भक्तिकालीन साहित्य के उदय के संबंध में मुस्लिम-प्रभाव विषयक उनकी मान्यता की तो सबसे अधिक आलोचना हुई है। पूर्व-मध्यकाल यानी भक्तिकाल के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर वे लिखते हैं, “जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लडनेवाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गए। इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिंदू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी सी छाई रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?"6 इन्हीं त्रुटियों के निराकरण हेतु आगे साहित्येतिहास – परंपरा का विकास हुआ है। वस्तुतः उस युग की सीमित ज्ञानराशि को लेकर भी उन्होंने उसे जैसा रुप दिया, वह निश्चय ही उनके जैसे व्यक्ति के लिए ही संभव था। इतिहास-लेखन की परंपरा में उनका महत्त्व सदा अक्षुण्ण रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं। 

2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि :

हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन को हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास-दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में अवलोकन करेंगे। परंपरा और प्रगति के आपसी संबंध की पहचान करना साहित्य के इतिहासकार का दायित्व है। इस संबंध की पहचान के बाद ही साहित्य का इतिहासकार सार्थक परंपराओं की रक्षा और विकास में सहायक हो सकता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्येतिहास की परिभाषा से उनका दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता हैं, "जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता हैं, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरुप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही 'साहित्य का इतिहास' कहलाता है।"7 उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय हिंदी भाषा के व्यापक जातीय स्वरुप को पहचानकर उसके अंतर्गत मैथिली, ब्रजभाषा, अवधी, खड़ीबोली और राजस्थानी के साहित्य को शामिल किया है। हिंदी के इस व्यापक जातीय रुप और विकास को न समझ पाने के कारण ही कुछ लोग खड़ीबोली के साहित्य को ही साहित्य कहते हैं और इस तरह हिंदी जाति के इतिहास को छोटा कर देते हैं। स्वयं आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी के व्यापक जातीय स्वरुप की पहचान के बावजूद उर्दू साहित्य को हिंदी साहित्य के इतिहास में शामिल नहीं करते, जबकि हिंदी और उर्दू के साहित्य में एक ही भाषा-भाषी जाति के जीवन की वास्तविकताएं और आकांक्षाएं प्रकट हुई हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में उर्दू साहित्य को शामिल न करने के पीछे एक तो उस समय का हिंदी-उर्दू विवाद है और दूसरे हिंदी जाति के निर्माण और विकास की अधूरी समझ। हिंदी और उर्दू के संबंध के बारे में आचार्य शुक्ल के विचार काफी उलझे हुए हैं। इस संदर्भ में उनके विचारों की सीमाओं पर विचार करते समय उस काल की ऐतिहासिक परिस्थितियों और विचाधारात्मक संघर्षों पर भी ध्यान देना चाहिए।

आचार्य शुक्ल के इतिहास में रचनाओं और रचनाकारों के मूल्याकन में 'जनता' और 'शिक्षित जनता के द्वंद्व का प्रभाव है। आचार्य शुक्ल के अनुसार सिध्दों ने निम्न श्रेणी की प्रायः अशिक्षित जनता को प्रभावित किया है, लेकिन इनकी कविताएं शुध्द साहित्य की कोटि में नहीं आ सकती। भक्तिकाल के निर्गुण संतों के काव्य के संदर्भ में उनकी दृष्टि है कि इसमें संस्कृत बुध्दि, संस्कृत हृदय और संस्कृत वाणी का वह विकास नहीं पाया जाता जो शिक्षित जनता को अपनी ओर आकर्षित करता, पर अशिक्षित और निम्न श्रेणी की जनता पर इस शाखा के संत महात्माओं का भारी उपकार है। यहां शिष्ट शिक्षित समुदाय और व्यापक सामान्य जनता का भेद स्पष्ट हो जाता है। शुक्ल जी ने शिक्षित समुदाय की ओर से संत कवियों की आलोचना की है। संतों ने अपनी कविता से सामान्य जनता में आत्मगौरव का भाव जगाने और उसे ऊपर उठाने का जो काम किया, उसके लिए शुक्ल जी ने उनकी सराहना की है, लेकिन संतों की कविता में संस्कृत बुध्दि, संस्कृत हृदय और संस्कृत वाणी' का शिष्ट जनोचित विकास न पाकर उसकी आलोचना की है। संतों की कविता में जन भावनाओं की अभिव्यक्ति है, वह सामान्य जनता की भाषा में सामान्य जनता के लिए कविता की 'संस्कृत वाणी' के प्रेमी शिष्ट जनों के लिए नहीं। प्रयोजन और प्रभाव की एकता ही संत काव्य की व्यापक लोकप्रियता का कारण है। आचार्य शुक्ल जब आगे चलकर यह कहते हैं कि, 'संतों की वाणी में लोकधर्म की अवहेलना छिपी हुई थी और वे ‘यों ही ज्ञानी बने हुए मूर्ख जनता को लौकिक कर्तव्यों से विचलित करना चाहते थे तो बहुत आश्चर्य होता है। वास्तव में गलत दृष्टिकोण लेकर चलने पर गलत निष्कर्ष पर पहुंचना स्वाभाविक है। शुक्ल जी ने संत काव्य को लोक विरोधी मान लिया तो उससे प्रभावित होनेवाली जनता को भी 'मूर्ख' समझ लिया। संत कवि उस समय की सामंती समाज व्यवस्था उसके सांस्कृतिक मूल्यों और मर्यादाओं के विरुध्द आवाज उठा रहे थे। यही नहीं, वे उस व्यवस्था में पीड़ित जनता में आत्मगौरव का भाव जगाकर उसे ऊपर उठा रहे थे, इसलिए उनको लोक विरोधी और जनता को 'मूर्ख' तथा 'अंधी भेड़' समझना गलत है। भक्तिकाल के संदर्भ में लिखते हैं, "आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गये। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?"8

आचार्य शुक्ल कविता में स्वाभाविक ढंग से राजनीति के आने की नहीं, बल्कि उससे बचने की कोशिश की आलोचना करते हैं। विद्यापति ‘पदावली' के कारण 'मैथिल कोकिल' कहलाये। उस समय की लोक प्रचलित मैथिली भाषा का प्रयोग इन्होंने किया था। शुक्ल जी लिखते हैं, "विद्यापति को बंग भाषावाले अपनी ओर खींचते हैं। सर जार्ज ग्रियर्सन ने भी बिहारी और मैथिली को 'मागधी' से निकली होने के कारण हिंदी से अलग माना है। पर केवल भाषाशास्त्र की दृष्टि से कुछ प्रत्ययों के आधार पर ही साहित्य का विभाजन नहीं किया जा सकता। कोई भाषा कितनी दूर तक समझी जाती है, इसका विचार भी तो आवश्यक होता है।9 वे राजस्तुति से भरी और राजाश्रय के कारण सुरक्षित रचनाओं की तुलना में जनता के जीवन में जीवित जगनिक के 'आल्हा की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं। उनके शब्दों में, "जगनिक के काव्य का आज कहीं पता नहीं है पर उसके आधार पर प्रचलित गीत हिंदी भाषा–भाषी प्रांतों के गांव-गांव में सुनाई पड़ते हैं। ये गीत 'आल्हा' के नाम से प्रसिध्द हैं और बरसात में गाये जाते हैं।10 वे जनभाषा में जन संस्कृति से जुड़ी कविता लिखनेवाले विद्यापति और खुसरो को विशेष महत्त्व देते हैं, "वीरगाथाकाल के समाप्त होते-होते हमें जनता की बहुत कुछ असली बोलचाल और उसके बीच कहे-सुने जानेवाले पद्यों की भाषा के बहुत कुछ असली रुप का पता चलता है। पता देने वाले हैं, दिल्ली के खुसरो मियां और तिरहुत के विद्यापति।11 आगे फिर लिखते हैं कि, “पश्चिम की बोलचाल, गीत, मुख प्रचलित पद्य आदि का नमूना जिस प्रकार हम खुसरो की कृति में पाते हैं, उसी प्रकार बहुत पूरब का नमूना विद्यापति के पदावली में। उसके पीछे फिर भक्तिकाल के कवियों ने प्रचलित देशभाषा और साहित्य के बीच पूरा-पूरा सामंजस्य घटित कर दिया।"12

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूफी कवियों के सामाजिक महत्त्व को रेखांकित करते हुए विशेष रुप से पद्मावत के काव्य-सौंदर्य को जिस तन्मयता के साथ उद्घाटित किया है, उस पर आचार्य द्विवेदी मुग्ध हैं। शुक्ल जी के प्रति श्रध्दाभिभूत होकर वह लिखते हैं, “इन कवियों में सर्वश्रेष्ठ पद्मावतकार मलिक मुहम्मद जायसी हैं, जिनके काव्य-सौंदर्य को चामत्कारिक रुप से उद्घाटन करने का श्रेय हिंदी के प्रसिध्द आलोचक पं.रामचंद्र शुक्ल को है। पद्मावत की प्रस्तावना में आपने जैसी काव्य-मर्मज्ञता दिखाई है, वैसी हिंदी तो क्या, अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी कम ही मिलेगी। यह प्रस्तावना अपने आपमें एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृति है।13

आचार्य शुक्ल की मान्यता थी कि हिंदी में 'छायावाद' बंगला साहित्य से आया है। और उसकी आध्यात्मिकता और रहस्यवादिता पर रवींद्रनाथ टैगोर का प्रभाव है, "यह स्वच्छंद नूतन पध्दति अपना रास्ता निकाल ही रही थी कि श्रीरवींद्रनाथ की रहस्यात्मक कविताओं की धूम हुई और कई कवि एक साथ रहस्यवाद और 'प्रतीकवाद' या 'चित्रभाषावाद' को ही एकांत ध्येय बनाकर चल पड़े। 'चित्रभाषा' या अभिव्यंजन पध्दति पर ही जब लक्ष्य टिक गया तब उसके प्रदर्शन के लिए लौकिक या अलौकिक प्रेम का क्षेत्र ही काफी समझा गया। इस बंधे हुए क्षेत्र के भीतर चलनेवाले काव्य ने छायावाद का नाम ग्रहण किया।"14 शुक्ल जी की यह मान्यता अंशतः सही है। हिंदी में छायावाद बंगला से नहीं आया था, लेकिन छायावादी कवियों के रहस्यवाद पर टैगोर का प्रभाव पड़ा था।

आचार्य शुक्ल की इतिहास दृष्टि की एक बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने हिंदी साहित्य के विकास में लोक-संस्कृति और लोक-साहित्य के योगदान का मूल्यांकन करते हुए इसके जातीय रुप को उजागर किया है। साहित्य को जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब माननेवाले आचार्य के लिए यह स्वाभाविक ही है कि वे लोक संस्कृति और लोक साहित्य से हिंदी साहित्य के संबंध पर विचार करते है।

हिंदी में गद्य की विभिन्न विधाओं का उदय और विकास भारतेंदु युग से होता है। आचार्य शुक्ल के सामने हिंदी में गद्य की विभिन्न विधाओं का विकास यूरोप की तुलना में पिछड़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध और आलोचना की उन्नति तथा विकास के संदर्भ में यूरोप की उन्नत और विकसित गद्य साहित्य की परंपरा से बहुत कुछ सीखते हुए आगे बढ़ने का सुझाव हिंदी लेखकों को दिया।

आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य का काल-विभाजन दो आधारों पर किया हैं। पहला कालक्रम के आधार पर और दूसरा साहित्यिक प्रवृत्तियों की प्रधानता के आधार पर। कालक्रम के अनुसार हिंदी साहित्य के इतिहास को आदिकाल, पूर्व-मध्यकाल, उत्तर-मध्यकाल और आधुनिक काल में बांटा हैं और साहित्यिक प्रवृत्तियों की प्रधानता के अनुसार वीरगाथाकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और गद्यकाल में। वे लिखते हैं, "राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीति, श्रृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबंध परंपरा 'रासो' के नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने 'वीरगाथाकाल' कहा है।15 साहित्यिक प्रवृत्तियों की प्रधानता के आधार पर किया गया काल-विभाजन ही विशेष महत्वपूर्ण और लोकप्रिय है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की महत्ता को स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक 'आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना (सन् 1955 ई.) में डॉ.रामविलास शर्मा जी ने लिखा हैं, "हिंदी साहित्य में शुक्ल जी का वहीं महत्त्व हैं जो उपन्यासकार प्रेमचंद या कवि निराला का। उन्होंने आलोचना के माध्यम से उसी सामंती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचंद और निराला ने। शुक्ल जी ने न तो भारत के रुढ़िवाद को स्वीकार किया, न पश्चिम के व्यक्तिवाद को ।16

मई, 1955 की 'नई दिशा में प्रकाशित गजानन माधव मुक्तिबोध का निबंध 'मध्ययुगीन भक्ति-आंदोलन का एक-पहलू अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। मुक्तिबोध तुलसी के मूल्यांकन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ.रामविलास शर्मा दोनों से असहमत है। मुक्तिबोध की स्थापना का निष्कर्ष यह है कि, “निचली जातियों के बीच से पैदा होनवाले संतों के द्वारा निर्गुण भक्ति के रुप में भक्ति-आंदोलन एक क्रांतिकारी आंदोलन के रुप में पैदा हुआ किंतु आगे चलकर ऊंची जातिवालों ने इसकी शक्ति को पहचानकर इसे अपनाया और क्रमशः उसे अपने विचारों के अनुरुप ढालकर कृष्ण और राम की सगुण भक्ति का रुप दे डाला जिससे उसके क्रांतिकारी दांत उखाड़ लिए गये। इस प्रक्रिया में कृष्ण भक्ति में तो कुछ क्रांतिकारी तत्त्व बचे रह गए लेकिन राम भक्ति में जाकर तो रहे-सहे तत्त्व भी गायब हो गए। 17 चौथीराम यादव जी के शब्दों में, “आचार्य शुक्ल ने 'गोस्वामी तुलसीदास के माध्यम से कबीर के जनवादी संघर्ष को पुरोहिती-सामंती समाज-व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी के रुप में सुना था, इस तथ्य को नकारना बेमानी होगा। आचार्य शुक्ल समाज में किसी तात्कालिक परिवर्तन के विरुध्द हैं, इसलिए बेहतर समाज-व्यवस्था के परिवर्तन का भी कबीर, निराला और प्रेमचंद उनके लिए उतने प्रिय नहीं है जितने वर्ण-व्यवस्था के पोषक गोस्वामी तुलसीदास ।18 

निष्कर्ष (Conclusion) :

सारांश रुप में कहा जा सकता हैं कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित 'हिंदी साहित्य का इतिहास सर्वप्रथम व्यवस्थित एवं प्रामाणिक इतिहास माना गया है। शुक्ल जी ने पूर्ववर्ती वृत्त संग्रहों में व्याप्त भ्रांतियों, असंगतियों और त्रुटियों का बहुत कुछ समाहार करते हुए एक प्रौढ़ एवं परिपक्व इतिहास-ग्रंथ लिख पाने की सफलता अर्जित की तो इसलिए कि असाधारण प्रतिभा और संतुलन विवेक के अतिरिक्त उनमें इतिहास लिखने की सुनिश्चित योजना और एक दृढ़ संकल्प भी था। मैनेजर पाण्डेय बड़े आदर भाव से शुक्ल जी के बारे में लिखते हैं, "वे अपने समय के हिंदी के ही सबसे बडे आलोचक और इतिहासकार नहीं हैं, वे अखिल भारतीय स्तर पर भी बेजोड साहित्य चिंतक दिखाई देते हैं, यही नहीं, वे अपने जमाने के संसार के बड़े से बड़े आलोचक और इतिहास के सिध्दांत तथा व्यवहार की जो एकता दिखाई देती है, वह विरल है। आलोचना और इतिहास संबंधी चिंतन और व्यवहार की ऐसी एकता दूसरी भारतीय भाषाओं के किसी एक आलोचक-इतिहासकार में शायद ही मिले।19 और अंत में गज़लकार गुलशन मदान की गज़ल के माध्यम से कहना चाहूं तो - 

"साहस करके जो लड़ते हैं जीवन के अंधियारों से, 
वो ही बातें करते हैं फिर आसमान के तारों से"20

संदर्भ :

1. रामस्वरुप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकमारती प्रकाशन, इलाहाबाद (छब्बीसवां सं. 2019), पृ.176 

2. मुक्ता/कुसुम चतुर्वेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, (प्रथम सं. 2007), पृ. भूमिका 

3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद (सोलहवां सं. 2019), पृ. XVIIII 

4. डॉ.सुमन राजे, रचना की कार्यशाला, साहित्य रत्नाकर, कानपुर (सं.1998), पृ. 156–157 

5. डॉ.माधव सोनटक्के, हिंदी साहित्य का इतिहास, विकास प्रकाशन, कानपुर (तृतीय सं. 2009), पृ. 424 

6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद (सोलहवां सं. 2019), पृ. 39 

7. उपरोक्त, पृ. काल विभाग 

8. उपरोक्त, पृ. 39 

9. उपरोक्त, पृ. 37 

10. उपरोक्त, पृ. 33 

11. उपरोक्त, पृ. 34 

12. उपरोक्त, पृ. 34 

13. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली (दसवां सं. 2019), पृ.63 

14. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, लोकमारती प्रकाशन, इलाहाबाद (सोलहवां सं. 2019), पृ. 455 

15. उपरोक्त, पृ. 1 

16. नामवर सिंह, प्र.संपादक, आलोचना त्रैमासिक–44, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली (जनवरी-मार्च, 2012), पृ. 74 

17. नामवर सिंह, दूसरी परंपरा की खोज, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली (तीसरा सं. 2008), पृ.101 

18. चौथीराम यादव, हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन, लोकमारती प्रकाशन, इलाहाबाद (प्रथम सं. 2012), पृ. 146 

19. मैनेजर पाण्डेय, साहित्य और इतिहास दृष्टि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली (तृतीय सं. 2008), पृ. 91 

20. डॉ.गिरिराजशरण अग्रवाल,संपादक, हिंदी गजल यात्रा : भाग 2, हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर (प्रथम सं.1996), पृ. 64


समीक्षा

समी. श्री इन्द्र राठौर
इंद्र राठौर रायपुर (छत्तीसगढ़), मो. 9098649505

लेखकःश्री अजित राय

कन्नोज (उ.प्र.), मो. 98396 11435

तटस्थता का इतिहास, उसके गद्दार होने की गवाही में साबित हो चुका है। इस पर हमारे समय के क‌ई महत्वपूर्ण कवियों में निराला, मुक्तिबोध, पाश, धूमिल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, रामधारी सिंह दिनकर इत्यादि ने अपनी कविताओं में बहुत पहले ही साफ कर दिया है। उनमें बकौल रामधारी सिंह दिनकर ‘‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध / जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।‘‘

इसकी पुष्टि हो चुकी है। यह कहूंगा मैं संजय शांडिल्य के शब्दों में, ‘‘कि तय करना ही होगा कि आप इधर हैं कि उधर‘‘ यानी, ‘‘केवल रचना में ही बात कहने का वक्त / यह नहीं है, दोस्त! / हमें किसी न किसी ओर होना पड़ेगा सदेह‘‘ माने कि ‘‘सच और झूठ में / एक को चुनना ही पड़ेगा / यह चुनने का वक्त है, दोस्त, / और कारवाई करने का!‘‘

अर्थात् यह, अब बताना ही होगा कि आप किधर हैं। अब वह समय आ चुका है। दर‌असल हिंदी कविता अब तक अड़ी है और खड़ी है तो इसी दम पर। माना कि यह चुनौती चुनने की, हर समय, हर काल में रही, और जिन्होंने यह चुना, मुहर हो ग‌ए। एक ठप्पा बन उभरे। इस कड़ी में इधर हिंदी कविता में कुछ कवियों की ठनक भी देखते बन रही है तो, बस सिर्फ इस एवज में कि उनके चुनने की चुनौतियों के परस्पर होने से है। कहा जाय कि तय राह और पक्षधर होने से, बने हैं। इस कड़ी में नित्यानंद गायेन को दर्ज करना लाज़िम होगा

आज जब/पूरा मुल्क कतार में खड़ा है/यह कतार भी कत्ल करने का/एक नया तरीका है/आज्ञाकारी बनना मतलब / प्रश्न करने की आजादी को खो देना है/सही और गलत के चयन का विवेक खो देना है/आज्ञाकारी बनाने वाले/दरअसल हमें भेड़ बनाकर/हमसे अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं...”

“जब देश से भी बड़ा हो जाता है/शासक/और नागरिक से बड़ी हो जाती है/पताका/जब न्याय पर भारी पड़ता है/अन्याय/और शिक्षा को पछाड़ दे/धार्मिक उन्माद/तब हिलने लगता है/देश का/ मानचित्र/इसी तरह से भूकम्प आता है/ और ढह जाता है/एक देश”

पुलिस ने पहन ली है खाकी निकर/तिरंगा फहराया गया है/संसद भवन के ऊपर/जय भारत भाग्य विधाता के नारे लगे जोर से/मैंने पूछा- कहां गया मेरा देश! मुझे गद्दार कहा गया.../मेरी मां को कहा उन्होंने वेश्या/”

जिसे बकौल धूमिल भी देखे जाएं

अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-

तटस्थता। / यहां कायरता के चेहरे पर /सबसे ज्यादा रक्त है। / जिसके पास थाली है / हर भूखा आदमी / उसके लिए, सबसे भद्दी / गाली है

तो उस कड़ी में जोड़ना चाहूंगा कुछ छूटे हुए और अचर्चित नाम, मसलन कि कैलाश मनहर, शहंशाह आलम, योगेन्द्र कृष्णा, गणेश पाण्डेय, रमाकांत नीलकंठ के साथ न‌ई पीढ़ी के कवि अजित कुमार राय का भी नाम जो इस पूरे परिदृश्य में उभरते हुए दिखाई देते हैं। चूंकि यह कवि तटस्थ नहीं हैं। बल्कि, सापेक्ष है। और लाभ लोभ से परे रह जुदा तथा निरपेक्ष है। हालांकि प्रकृति सम्मत विचार है कि अपूर्ण और कमियां मनुष्य में प्राकृत है। जो अजित कुमार राय के संदर्भ में भी कहा जाएगा। यह इसलिए कि अजीत कुमार राय के यहां चाल और दूरी को निर्धारित करने वाली जो समय रेखा है, वह वक्रीय है। यानी, वे बाएं चलते-चलते;  दाएं चलते हैं, कभी-कभी खड़े हो जाते हैं, और फिर ललकार भी लगाते हैं। धिक्कारने लगते हैं। तो वस्तुतः वे मिजाज में सख्ती, और मन में नरमी लिए सर्वे भवन्तु सुखिना की उक्ति से आ जुड़ते हैं। यही है इस सापेक्षतावादी कवि अजित कुमार राय का साहित्यिक रोड मैप। जिस पर; उन्हें चलना आया। सीखा वहीं जो उनके रोड मैप पर रहा, कहा भी वही, जो उनका रोड मैप कहता है। अर्थात् मन या कि साहस से जब हमारी मुट्ठियां तनी हों और ताकत या कि हौसलों से हम उतने ही समृद्ध हों, तो स्थितियां प्रतिकूल होकर भी पक्ष में आ खड़ा होती है। ‘नरमेध‘ (एक नया दलित सौंदर्य शास्त्र) कविता उनके संग्रह ‘रथ के धूल भरे पांव‘ की बयानगी को देखें, तो पाएंगे कि वे हक और अधिकार के जायज मांगों को अपनी कविता में कैसे रखते हैं ? कि उन आश्रमी संविदा शिक्षकों को उनके परिश्रम का मानदेय मिले, सम्मान मिले। ना कि उन्हें निर्वासन के कगार पर कि यूज एंड थ्रो कि फिलासफी में, इस्तेमाल किया जाए। कि उनके होते न‌ई भर्ती ही किए जाएं। यह विभागीय गोरखधंधा चापलूस नौकरशाही सत्ता की मिलीभगत का परिणाम है कि नौकरशाह राजभक्ति करते हैं और गुनाहों के भागीदार होते हुए एक बड़े भ्रष्टाचार को आगे रख, बड़ा करते हैं। दुर्भाग्य है कि व्यक्ति लाभ के रणनीतिकारों की समझ में/नवाचारों के मुकाबले-वे अयोग्य हैं, / अनुभव की आंच में पककर भी / प्रथम श्रेणी के छात्रों को पैदा करने वाले / ये शिक्षक अभी पैदा नहीं हुए / नहीं हुआ है जन्म उनका आयोग की आंख में।

कविता लंबी है, अनेक पौराणिक मिथक संदर्भों के सहारे चीजों और चरित्रों को क्रम दर क्रम रख, समकालीन यथार्थ को उसके व्यापक रुप अर्थ में झांकने का प्रयास करती है किन्तु यह विषय संदर्भ में ही सीमित रह लोप हो जाता है। इस कविता में जहां वे अनियमितता और अनिश्चितता को लेकर जो नजरें इनायत रखें है वह; इतना सीमित नहीं था बल्कि और भी सघन तथा व्यापक है कि हर वह सरकारी संस्थाएं, निजी उद्यमों के भांति ठेका प्रथा तक आ चुका है, जिसकी लड़ाई बनिस्बत इस लड़ाई के और भी अधिक ज़रूरी है। अजित कुमार राय यहां इस संकट के प्रश्न पत्र पर मायूस हो जूझते हैं। यह इसलिए कह रहा हूं कि अजित कुमार राय की इस कविता में भले ही यह( ? ) छूट ग‌या हों, कि दर्ज नहीं हुआ हो, किन्तु एक साइलेंट वार भी उनकी असहमति में है वह है जातीय बोध के वैमनस्य विचार व आरक्षण। किन्तु, इस छूटे हुए संदर्भ के समानांतर ही अजित उन सबका लाईन हाजिर लगाते हैं जो खुद ही अयोग्य हैं और योग्यता अथवा मानक हमारे लिए तय करते हैं। बयानगी देखिए -

उनके लिए कभी खाली नहीं होता कुबेर का खजाना / उनका वेतन दिन दूना / रात चैगुना बढ़ता है / उनका पुष्पक विमान चांद पर चढ़ता है।

ताजा तरीन हालात और प्रबंधन का मजमा देश और राज्यों में यह है कि -

रोज लागू होती है रस्तोगी कमीशन की / सिफारिशों पर सिफारिशें, / किंतु जिन्हें / यह विभ्रम और कारोबार करना है कर रहे हैं बदस्तूर।

हिन्दी कविता अपने बहुप्रचलित मिथक के प्रभाव से न मुक्त है और न होगी कभी ! भले ही वह सच हो, न हो। किन्तु लोक जन के श्रुतितो और लेखों में इसका इतना व्यापक प्रभाव उस पर है कि वह काव्य में कभी प्रतीक, बिम्ब बन संदर्भ को अधिक सुस्पष्ट करने चली आती है। अजित कुमार राय के यहां भी मिथक का प्रयोग अनगिन है संदर्भों को जोड़ने में है। वैश्विक महामारी कोरोना के आरंभ से आज तक का जो भय, आतंक और जो वस्तु स्थिति है उसे अजित कुमार राय कालचक्र के ठहराव, शिव के समाधिस्थ रूप में देख रहे हैं। सब कुछ ठहरा-ठहरा सा पाते हैं, शून्य दशा में स्थिर देखते हैं अतः कहते हैं कि

‘‘अपने काल को पढ़ता हूँ मैं कोरोना लिपि में।

‘‘यह काल बनकर आया है / काल चक्र ठहर गया है,

जैसे शिव समाधिस्थ हो गए हों।‘‘

अब तक कि रोग से हुई मौतों व उसके भयावह तांडव को असंदिग्ध रूप से माना जाना चाहिए कि - यह खंड प्रलय सा है / और ‌/ ‘‘खण्ड प्रलय के इस स्वच्छता अभियान में / पर्यावरण विनाश की कीमत पर अंतहीन विकास / पर एक अल्पविराम नहीं, / एक कठोर चेतावनी है।

वैदिक आस्था, विचार की विश्वास में मान्यताएं अपुष्ट अनुभव आधारित हुए। प्रायोगिक सत्य और अन्वेषों के इतर दैवीय भावों में समिष्ट हुआ। अर्थात् कि

‘‘जा रहा हूँ भूख को उपवास का अर्थ देने, 

संहार को सृजन का अधिभार देने जा रहा हूँ।‘‘

यह एक कवि कहेगा, उसकी कविता कहेगी, परिस्थिति और परिवर्तन के दुस्सह, और असहाय स्थिति को पोलेराइज कर जूझेगा/कहेगा

‘‘वंचितों की भूख - यात्राओं को / स्थगित नहीं कर सकते, / पर पृथ्वी को भूख का कोई हिरण्याक्ष / समुद्र में डुबो दे, इसे कोई वाराह बर्दाश्त नहीं कर सकता।‘‘

असंदिग्ध है कि यह एक मानव विरोधी पूंजीवादी राष्ट्र के सामरिक महत्त्वाकांक्षा में आई उग्रता और उबाल का नतीजा है जिसने पूरे वैश्विक संगठनों को ताक में रखा और प्रायोगिक परीक्षणों से जैविक आक्रमण किया। फिर भी कहूंगा कि निरूपायता शासन की शासक जनित होती हैं। 

अविवेकपूर्ण की अदूरदर्शिता से आकृत होते हैं। वे अपनी विफलताओं को देश और राष्ट्रीय आपदा से जोड़ जनता के भोलेपन को लाभ में बदल इस्तेमाल करते हैं। तरह तरह के किस्से और कोताही फैलाते, बच निकलते हैं। और हम एक सुनियोजित रंगमंच का किरदार बन वही कहते हैं जो कहलवाया जाता है- मसलन थाली पीटते हैं, बत्ती बुझाते हैं, मोबाइल पर लाईट जलाए रखते हैं, दीया जलाते हैं। और अप्रमाणिक बातों को अप्रत्याशित मान लेते हैं। जैसा कि सच यही है-

‘‘इस जैविक हथियार से लड़ने का अस्त्र है / सामाजिक दूरवर्तिता। / इस रण को रणछोड़दास बनकर ही जीत सकते हैं। / वरना वुहान फैल जाएगा पूरे विश्व में।‘‘

हम भारत के लोग, देश को प्राणों से प्रिय और शीर्ष रखा। कब यह राष्ट्रवाद का ज्वार दीमक बन हमारे नसों में टहलने लगता है कि हम भूल चुकतें हैं कि हमने चुनी है कोई सरकार ! और सवाल उठाने की जगह खड़े हो जाते हैं पक्ष में-

‘‘अहिंसा, परोपकार और दया से ही / समष्टि को बचाया जा सकता है। / अन्नपूर्णा संस्थाएँ सक्रिय हैं / और दधीचि अस्थियाँ गला रहे हैं / वृत्रासुर के वध के लिए।‘‘

परन्तु अजीत कुमार राय हैं कहते हैं कि -

‘‘हे राजन् ! / प्रजा के पलायन को रोको। / बीमारू राज्यों में मनोचिकित्सा के लिए / मास्क की कमी है।‘‘

अतः

‘‘नए सिरे से परिभाषित हों

केन्द्र और राज्य सरकार के संबन्ध ‘‘।

अजित कुमार राय कविता की परस्पर आलोचना कर्म से भी संबंध रखते हैं। तात्कालीन संदर्भों में गहरी दृष्टि रख उसकी बखूबी पड़ताल भी करते हैं। यह विगत तकरीबन डेढ़ साल हो गए कोरोना की लंघ्य सीमाएं कम न हुईं। विषकन्या की भांति ही-

‘‘कोरोना की कणिकाएँ, / गणिकाएँ नहीं, / घूम रही हैं लंदन से लखनऊ तक। / और दुष्यंत किसी शकुन्तला की खोज में / अनुधावन कर रहे हैं, / मृगनैनी के आखेट के लिए सन्नद्ध।

चिकित्सा विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने निरंतर इस दिशा में यथासंभव अपनी विशिष्टता साबित की है और अनथक कर भी रहा है किन्तु दुखद कि -

‘‘उत्सवी आह्लाद में डूबे नेता / राष्ट्रवादी या कि भोगवादी, / सभी वर्जनाओं से ऊपर, / ऊपर जाने को बेताब।‘‘

कर रहे हैं-

‘‘संगीत लिपियों का संक्रमण सर्वातिशायी।‘‘

और जानें कब ? कैसे ??

‘‘प्रणय गीतों से विह्वल कर्णिकाएँ / अपने मलयज स्पर्श से / मुग्ध कर लेती हैं मणिधर को।‘‘

हाहाकार और कोलाहल में डूबे -

‘‘मयूर की केका ध्वनि को अनसुनी करके। / नागिन की तरह लहराते - बलखाते / नृत्य - धुनों पर थिरकते 

गंधर्व लोक की / नीली सपनीली रोशनी में /पढ़ते हैं हम ‘मदनोत्सव‘ के मोटे अक्षरों को।‘‘

जिसमें-

‘‘अदृश्य रह जाता है भागवत श्लोक। / सत्ता के मद में डूबे शिवराज को क्या पता / कि छुआछूत का दौर लौट आया है / एक नए अवतार में / वैज्ञानिक समर्थन के साथ।‘‘

कि घटित होने लगता तबलिगी जमात के बहाने, न‌ए-न‌ए अफसाने और इधर अंधाधुंध होते हैं चुनाव -

‘‘कोरोना एक अबूझ पहेली है,

या रक्तबीज का नया अवतार।‘‘

जो देश, समाज की साझी विरासत को निगल रहा 

बेधक।

जीवन का संग्राम कि पहिया थकता नहीं, रूके, रूकती नहीं। वह जीवन के महाराग को पाने अजित कुमार राय की तरह ही संवेदित और संदर्भित ही रहा, नित एक नया को चुना, आगाज किया। ‘बनारस‘ लोक है जन है विश्वास है। बनारस के वैविध्य में यह कभी न रहा, कोई उसके जंग में शामिल हो, खुद ही लड़ा है बनारस। शीर्ष सत्ता तक को मणिकर्णिका के घाट तक उतारा है बनारस। अजीत कुमार यूं ही नहीं कहते -

‘‘अवधू ! यह बनारस है/ मृत्यु भी यहां शुभंकर है। / विप्लव, विभीषिकाओ को यह झेल जाता है / अपनी जटाओ मे अवधूत भाव से।‘‘

यह सच है-

मै मणिकर्णिका घाट पर बैठकर / हरिश्चन्द्र की तरह

सत्य बोल रहा हूं। 

जो छल और भरम सत्ताओं ने दिए हैं वहां के कण-कण से वाकिफ हूं मैं कि -

‘‘पुल का टूटना / कोई खगोलीय संयोग नही, / 

भ्रष्टाचार के भूगोल का प्रतिफलन है‘‘। 

वस्तुतः-

‘‘यह टूटा पुल छेद है,/जिससे हम देख सकते है / रामराज्य की हकीकत,/यह दिगंबर नही,/सत्य का निर्वसन साक्षात्कार है।/कि पुल टूट चुका है/बनारस और सत्ता के बीच। कि यह रूपक है,/लोकतंत्र के टूटे हुए पुल का /जिसके मलवे तले दब गया है आम आदमी।‘‘

कहने को तो, मीडिया लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ है, पर बिकी हुई है यह, चुंधियायी हुई है इसकी आंखें कि तैरती हुई लाशों के अंबार में पैदा कर रही-

‘‘और चमत्कार यह कि मीडिया को

दिखाई पड़ रही हैं बहुत कम लाशें।

अजित कुमार राय की काव्यात्मकता खंड काव्य की प्रबंधात्मकता में दिखाई देता है कि एक साथ कई क‌ई आयामों,वितानो को एकाकार करते हैं, और परत-दर-परत चीजों को उसके संवेगो को स्थापित ही करते हैं। व्यवस्था के कारगुजारियों और नाकामियों पर लाल गुस्सैल होते हैं/कहते हैं

‘‘अरे, काॅलर पकड़ कर/कमिश्नर से नही, /कमीशनर से पूछो ! / कि भ्रष्टाचार की अभियंत्रिकी क्या है ? / महामहिम ! / तुम्हारे कितने बच्चे दबकर मरे ? / सैनिको की शहादत में/ तुम्हारा कितना हिस्सा है ? / मलाई मे नाक डुबोकर /तुम्हे क्यो न मार डाले ? / हम तो ठहरे अवधूत ! / प्रलयंकर, भयंकर शंकर के / त्रिशूल से भागकर कहां जाओगे ? / प्रधान सेवक !

अजित यहां, सीधे शीर्ष सत्ता से मुखातिब हैं केंचुल के नाग को नंगा कर रहे हैं कह रहे हैं हे !

‘‘मंदिरो मे बकोध्यान ! / नाटक कर्नाटक में / ब्रह्मचारी को सत्ता - लोलुपता कहां ? / तुम्हें भी सत्तर साल चाहिए ?/ रमजान के महीने में / रावण-पुत्रों को शक्ति-साधना का अवसर देकर / ओ सत्ताधिप ! कौन सी रामायण पढ़ी है तुमने ? /जो बंदूकें हाथ में लेकर ही पैदा हुए हैं‘‘

इस कविता में बनारस का पुल नहीं, अजित के सब्र का पुल भी टूटा है ! जो उनके इस साफगोई में झलकती है

‘‘यदि उनकी बंदूकें नहीं उड़ा सके/तो उन्हें उड़ा देने के लिए/इससे पवित्र मुहूर्त कब मिलेगा !/यमराज अब भैंसे की नहीं,/रेल इन्जन की सवारी करते है/देश की जीवन - रेखा / हमारी हथेली से मिट क्यों रही है ?‘‘

ओ /बुलेट ट्रेन के संचालक ! / काशी को क्योटो नही, / भारत को अमेरिका नही,/ भारत ही बनने दो।/हमंे अस्सी घाट पर रहने दो/ताकि संगीत में हम सुन सके.ं../ निःस्वन निःशब्द को, / अनहद नाद को।

अजित कुमार राय की कविता और चिंतन दृष्टि की मानें तो वह राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर वैश्विक दृष्टि में लंघ्य है। एक देश से प्रेम करते हुए उसके दुख संताप और अवसाद को लांघ विश्व दृष्टि में समादृत है। ‘तेज घूमती पृथ्वी‘ जड़ नहीं है। चेतन है। अतः कवि उसके चेतन अवचेतन के गर्भ से विरक्त नहीं है, विलग नहीं है। वह पृथ्वी का भाग है इसलिए उसमें घटित प्रत्येक वर्जनाओं को इस कविता में दर्ज करते हुए कहता है की उषा के बाद भी सूरज, भले ही तुम्हारे भीतर की कुरूपता से ‘‘बेखबर है/प्रयाग के कफ्र्यू और तुम्हारे/भीतर चल रहे दंगे से।‘‘

किन्तु- 

रात जब ज्योत्स्ना के आलोक में चाँद को एकटक /निहारती है /तो वह बेसुध रहती है सत्ता-परिवर्तन और /परमाणु-संधि से।

‘‘पृथ्वी मेरी धुरी पर नहीं घूमती सूर्य के / चारों ओर, / फिर मुझे क्यों लगता है / कि तेज घूमती पृथ्वी से मैं गिर/जाऊँगा इतिहासहीन मृत्युु की गोद में।‘‘

लेकिन-

गुरुत्व के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित / कर आकाश में उड़ते पंछी मोरपंखी कलम से / लिखते हैं कृष्ण का नाम। (कृष्ण एक विश्वास है)

यह भी कि-

‘‘मधुमास की मंजरियों का रक्तिम उल्लास / अनभिज्ञ है ट्रेन और सड़क दुर्घटनाओं से। / किन्तु समय के ताप की स्मृति में सुरक्षित है / आज भी इराक पर बमवर्षण‘‘

आज जीवन के आपाधापी, विस्तार वाद की नीतियों से अछूता नहीं रहा है कोई राष्ट्र, कोई सरहदें नहीं बची है साबूत, दुखों का गुबार है, गुबार छटेंगे तो वह यकीनन

‘‘हिमनद-सा पिघल कर / डुबो देंगे आँसुओं की बाढ़ में समूची धरती। सजल /मेघ से उद्भासित तमसाच्छन्न आकाश /आर्द्र क्षणों में भूला नहीं है वाहन के आवाहन /और चिमनियों के धुएँ को, उसकी आँखों से आँसू /नहीं, तेजाब बरस रहा है।‘‘

अजित कुमार राय की आलोच्य दृष्टि एकांगी नहीं है। एकतरफा दोषारोपण करने वाली नहीं हैं। उनके जद में सभी आ जाते हैं। यही उनको समवर्ती कवियों से अलग भी करता है। यद्यपि यहां उनका आक्रमण विचारधारा पर दिख रहा है लेकिन यह सापेक्ष में है। मसलन कि -

ओ कालिदास ! / कहाँ गए ? / कहाँ गईं वे बड़ी साँस की प्राणायामी कविताएँ ? /जो विचारधारा से आई हैं !

‘‘सृजन का वह स्वर्ण युग, / जब तुमने मोरपंखी कलम से भोजपत्र पर नहीं, ‘हृत्पत्र’ / पर लिखी थीं ‘‘

कि -

आखेटक’ /आदिम किरात मन / नहीं कर सका ‘ग्रीवाभंगाभिराम’ स्निग्ध स्वर्ण मृग / का आखेट‘‘

अर्थात् -

(मदिर नेत्रों की पुकार से) जिसके अंतस्तल के रस से, / संच गया था / तुम्हारा ‘कंठ’।

यह क्यों कर नहीं पा रहा / हे कालिदास !

‘‘कहाँ गया हरित सरोवरों की सरोज-शैया पर / बिछ जानेवाला /तुम्हारा ‘निषाद-मन’।‘‘

कि तुम भी, ठहरे-ठहरे प्रतीत होते हो ! खोजते हैं स्वत्त्व में। कहते हैं-

‘‘कविता की जमीन।/जहाँ भागीरथी/के जलकणों का वहन करती वायु-प्रताड़ित / कंपि देवदारु की छाया आसेवित होती है किरातों के‘‘

देखो ओ कालिदास !

‘‘बीनते हैं हम ‘नीमकौड़ियाँ’, फूलने लगे हैं अब / ‘नीम के पेड़’। / (उस) समूचे आरण्यक एकांत को आत्मसात् कर/मेरा मन उड़ता है/वनपाँखी की तरह ‘संदेश’ लाने - जहाँ .../जहाँ लिखती हैं किन्नरियाँ गैरिक सिंदूर से / अपना प्रेमपत्र ...।‘‘

और फिर भी असफलता है कि कवि विडंबना बोध से भर कहता है-

‘‘काश ! मेरी आँखों का /समूचा पानी लेकर भी / वह ‘स ज ल’ हो उठती।‘‘

कुल मिलाकर अजित कुमार राय न सिर्फ पढ़ें जाने वाले कवि हैं बल्कि थोड़ी ठहरकर अधिक गुने जाने की जरूरत के कवि हैं। यह कि य पठनीयता को उनके भाषा की बेबाकीपन में, मिथक चरित्र के घटित आज में, कि वैदिक काल से विषय संदर्भ की समझ विकसित करने में इस कवि की अप्रतिमता इस संग्रह में देखे जा सकते हैं। संग्रह को बोधि प्रकाशन जयपुर ने छापा है तो फ्लैप आर्टिकल हिंदी के एक महत्वपूर्ण कवि ज्ञानेंद्रपति का है। 





साहित्यिक परिचर्चा एवं जीवन परिचय



सुश्री विनीता कुमार

B1/61, Orchid heights, Apple wood township, S. P. Ring road, Shela,
Ahmedabad- 380058, ujarat, Mob. 9714017001

सुश्री सुधा श्रीवास्तव, अहमदाबाद, मो. 94263 00006


डॉ. सुधा श्रीवास्तव: व्यक्तित्व एवं कृतित्व

‘‘होनहार विरवान के होत चिकनेपात’’


डॉ० सुधा श्रीवास्तव का जन्म 17 सितम्बर, 1938 को फतेहपुर (उ.प्र.) में हुआ था। हाईस्कूल तक उनकी शीक्षादीक्षा वहीं हुई। बचपन से ही वह बहुत मेधावी थीं। स्कूल में खेलकूद से लेकर नाटक, नृत्य, संगीत, वाद-विवाद प्रतियोगिता और खेल-कूद में न केवल भाग लेती थीं, वरन् प्रत्येक विधा में प्रथम या द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करती थीं। चारपाँच पुरस्कार तो मिलते ही थे। कभी तीन मिले तो वह रोते हुए घर आती थीं। एक बार सुधा जी ने मिट्टी की तितली बनाकर उसे रंगों से सजाया तो सभी अध्यापिकाएँ मुग्ध हो गई। उन्हें उसमें प्रथम पुरस्कार मिला।

उन दिनों सरकार की ओर से मिलिट्री वालों के लिए आधी बाँह के स्वेटर बनाने होते थे। सरकार ऊन भेज देती थी। आठ दिनों में स्वेटर बुनकर दे देना होता था। सुधा जी अपना स्वेटर छः दिनों में ही बुनकर-सिलकर दे देती थीं। 

प्रतिभाशाली तो थी ही, संवेदनशील भी बहुत थीं। चैथी-पाँचवीं कक्षा से ही महादेवी वर्मा के गीत गुनगुनाते अपने गीत भी बना लेतीं और उसे वैसी ही धुन में गुनगुनाती, जैसी महादेवी की कविताओं को गुनगुनाती थीं।

खेल-कूद की इतनी शौकीन थीं कि शाम होते ही घर के बाहर मैदान में खेलने भाग जाती थीं। चाहे कबड्डी हो या खो-खो, सभी तरह के खेलों में रुचि थी। उन दिनों लड़कियाँ चाहे जितना पढ़े-लिखें, घर का काम करना अनिवार्य होता था। सुबह तो स्कूल जाना होता था, शाम को खाना बनाने का काम एक दिन इनकी बड़ी बहन करती थीं और एक दिन सुधा जी स्वयं बनाती थीं। खेल-कूद में अत्याधिक रुचि होने के कारण शाम को सब्जी-पराठे या कभी सब्जी-रोटी जल्दीजल्दी बनाकर खेलने भाग जाती थीं। यह उन दिनों की बात है, जब ये स्वयं 11-12 वर्ष की थीं। हाईस्कूल में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने में एक नम्बर से झटका लगा था उन्हें। 300 अंक से प्रथम श्रेणी मिलती थी और इन्हें 299 अंक मिले थे। बहुत रोई थीं तब वे। पिता ने कहा था-तुम एक नम्बर से फेल हो गई। उन दिनों ग्रेस वगैरह देने का प्रश्न ही नहीं उठता था।

इनकी माँ भी उन दिनों आठवीं पास थीं और सिलाई-बुनाई का काम बखूबी करती थीं। इनके पिता भी बहुत उदारवादी थे। उस जमाने में भी उन्होंने लड़के-लड़की में भेद नहीं किया था। जो जितना चाहे पढ़ सकता था। और इसीलिए आर्थिक दृष्टि से मध्यमवर्गीय परिवार से होते हुए भी इनके पिता ने इन्हें बी. ए. करने के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय में न केवल पढ़ने के लिए भेजा, बल्कि हॉस्टल की भी सुविधा प्रदान की थी। अपने पिता का आभार वह आज तक मानती हैं। जब ये आठवीं कक्षा में थीं, तब इनकी प्रथम कहानी ‘सत्यनारायण की कथा‘ आगरा से निकलने वाली एक पत्रिका में छपी थी, जो सत्य घटना पर आधारित थी। इनके पड़ोस में सत्यनारायण की कथा चल रही थी और 4-5 वर्ष की एक अछूत (भंगिनी) बालिका अन्दर आकर सत्यनारायण की कथा का आनन्द ले रही थी कि तभी किसी ने उसे वहाँ खड़ी देखकर बड़ी निर्दयता से बाहर निकाल दिया। थोड़ी देर बाद वह फिर चुपके से आ खड़ी हुई। फिर किसी ने उसे दुतकार कर भगा दिया। सुधा जी से यह अन्याय न देखा गया। उनकी आँखों में आँसू आ गए। आखिर उस बच्ची का कसूर क्या है ? उसे क्या पता कि वह किस जाति की है ? उसे तो मात्र भगवान की पूजा देखनी थी। घर आकर सुधा जी ने उसी घटना के आधार पर कहानी लिख डाली, ‘सत्यनारायण की कथा‘।

लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए नवभारत टाइम्स के रविवारीय संस्करण में कभी इनकी कविताएँ और कभी कहानियाँ प्रकाशित होती रहती थीं। उन्हीं दिनों ये विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य परिषद की सदस्या बनी। उसी काल में कलकत्ते से निकलने वाली ‘आदर्श‘ नामक पत्रिका में इनकी कहानियाँ छपती रहीं।

बी०ए० पास करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इन्होंने प्रवेश लिया। वहाँ भी हाॅस्टल में ही रहीं। इस बीच वाद-विवाद, काव्य-प्रतियोगिता आदि में निरन्तर भाग लेती रहीं। साहित्यिक दृष्टिकोण से इलाहाबाद विश्वविद्यालय उन दिनों शीर्ष पर था। हिन्दी विभाग में उन दिनों विभागाध्यक्ष डॉ० धीरेन्द्र वर्मा थे। डॉ० रामकुमार वर्मा, डॉ० धर्मवीर भारती, डॉ० रघुवंश जैसे विद्वानों से इन्होंने शिक्षा प्राप्त की। वहाँ एम०ए० में एक पेपर मौखिक परीक्षा का भी होता था। इनका वाइवा (मौखिकी) लेने बनारस विश्वविद्यालय से डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी आए थे। पूरे 100 अंक की परीक्षा होनी थी। उन दिनों साहित्य में 61 अथवा 62 प्रतिशत नम्बर लाना बहुत ही बड़ी बात थी। इससे अधिक किसी को मिलते ही नहीं थे। 55 प्रतिशत से ऊपर लाने वाले विद्यार्थी मेधावी माने जाते थे। 

सुधा जी को 57 प्रतिशत अंक मिले थे। 1959 में इन्होंने एम०ए० किया और उसी वर्ष मई में इनका विवाह हो गया और ये अहमदाबाद आ गई। इस बीच एम.ए. करते हुए इनकी कहानी, कविताएँ निरन्तर धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सरिता आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। 

विवाहोपरान्त अहमदाबाद में इन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से दो वर्ष तक हिन्दी शिक्षण का कार्य किया। आकाशवाणी-दूरदर्शन से इनकी कविताएँ, कहानियाँ निरन्तर प्रसारित होती रहती थीं। दूरदर्शन में एक नाटक का निर्देशन भी किया और ‘वास्ता‘ नामक एक फिल्म में किरण जुनेजा की माँ का रोल निभाया। इस प्रकार ये सभी मंचों में सक्रिय रहीं।

विवाहोपरान्त कुछ समय तक इनकी लेखनी स्थगित हो गई थी, लेकिन कॉलेज में आने के बाद से लेखनी ने फिर से अपना रंग पकड़ा। 1970 से 1977 अप्रैल तक ये विवेकानन्द कॉलेज में लेक्चरर रहीं। इसके बाद जून 1977 से ये एच. के. कॉलेज में स्थानान्तरित हो गई। यहाँ इनकी प्रतिभा खिल उठी। हिन्दी के नाटक अपने कॉलेज में ये ही निर्देशित करती थीं। एच०के० कॉलेज में आने के बाद 1985 में इनका पहला उपन्यास ‘बियाबान में उगते किंशुक‘ सरस्वती विहार, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसे इतनी प्रशंसा मिली कि क्षितिज नाट्य संस्था ने जो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातकों द्वारा स्थापित की गई थी, ‘बियाबान में उगते किंशुक‘ का नाट्य रूपान्तर कर श्रीराम सेन्टर थियेटर में सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। उपन्यास का नाट्य रूपान्तर भारती शर्मा ने किया था। इसके लगभग पन्द्रह शो हुए और विभिन्न समाचार पत्रों ने इसकी बेहद प्रशंसा की। उसमें से भारती शर्मा ने कुछ समाचार पत्रों की कटिंग, पोस्टर एवं चेक डॉ० सुधा श्रीवास्तव जी को भेजे थे।

सुधा जी नाराज थीं, क्योंकि उनका अनुबन्ध दूरदर्शन के सीरियल के लिए हुआ था। पर पैसों को लेकर दूरदर्शन से ‘क्षितिज संस्था‘ की बात नहीं बनी। उन्हें उपन्यास इतना पसन्द आया कि उन्होंने उसे मंच पर प्रस्तुत किया। बगैर इजाजत मंच पर प्रस्तुत करने पर सुधा जी नाराज थीं। लेकिन ढेर सारे समाचार पत्रों में उसकी प्रशंसा और चेक देखकर इनकी नाराजगी दूर हो गई। भारती शर्मा ने लगभग आठ-दस समाचार पत्रों की कतरन और बड़े-बड़े पोस्टर भी भेजे थे। उनके दो समाचार पत्रों का विवरण (फोटो सहित) उनके उपन्यास ‘प्रियावाद‘ में पीछे की ओर दिया गया है। जिसे मैं संलग्न कर रही हूँ। 

अपने पहले ही उपन्यास से ये काफी चर्चा में आ गई थीं। इनका दूसरा उपन्यास ‘चाँद छूता मन‘ 1998 में प्रकाशित हुआ था। इसकी कथावस्तु अत्यन्त मार्मिक एवं भारतीय संस्कारों से ओतप्रोत है। एक अमीर घर का व्यापारी अशेष अपने से बहुत छोटी उम्र की एक कॉलेजियन लड़की को अपने जाल में किस तरह फाँसता है, इसका विवरण इसमें विस्तार से दिया गया है। वह शादीशुदा और दो बच्चों का पिता है। इसके बावजूद हर बड़े शहर में, जहाँ उसके व्यापार का कारोबार है, उसकी प्रेमिकाए हैं। उसकी पत्नी सब जानती है, पर कुछ कह नहीं पाती। तेजस्वी कॉलेजियन लड़की आहुति को फाँसकर, वह उससे चुपचाप शादी कर लेता है और अपने ही घर में ले आता है, जहाँ उसकी पत्नी हिमानी और दो बच्चे रहते हैं। विवाह के बाद पिता का घर उसके लिए पूरी तरह हमेशा के लिए छूट जाता है, क्योंकि उसने भागकर शादी की थी।

कुछ दिनों बाद ही आहुति को अपने पति के चरित्र का परिचय मिल जाता है और वह चैंक उठती है। थोड़े समय के बाद ही वह अपने मधुर व्यवहार से अपनी सौत हिमानी और उसके बच्चों के साथ आत्मीय रिश्ता बनाने में सफल हो जाती है। उसकी प्रेरणा से उसकी बेटी तथा हिमानी स्वयं पढ़ाई को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेती है। कानून की परीक्षा पास करके हिमानी वकालत करने लगती है और बेटी भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक प्रतिष्ठित परिवार में विवाह करके चली जाती है। आहुति भी अपनी पढ़ाई पूरी करके एक कॉलेज में व्याख्याता बन जाती है। अशेष से किनारा करके ये दोनों ही अपनेअपने लक्ष्य की ओर बढ़ जाती हैं। हिमानी का बेटा अपने पिता पर गया है। किन्तु अन्त में वह भी माँ और छोटी माँ (आहुति) के संसर्ग में आकर सुधर जाता है।

उपन्यास का अन्त अत्यन्त मार्मिक एवं भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, जब अन्त में बुढ़ापे से थककर अशेष भी हिमानी के साथ पूजा घर में दिखाई देता है।

इस उपन्यास में सुधा जी ने भारतीय संस्कृति का उच्चतम रूप प्रस्तुत किया है। मानव अपने सद्गुणों द्वारा ही पहचाना जाता है और सद्गुणों को विकसित करना पड़ता है।

इस उपन्यास को गुजरात की हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

इनका तीसरा उपन्यास है ‘प्रियावाद‘। जिसमें न केवल आफिसों में वरन् विद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में भी प्रियावाद का प्रचलन हो गया है। सहकर्मी स्त्री-पुरुष में जो प्रियावाद के रास्ते पर चलता है, उसे लाभ ही लाभ है। प्रियावाद लेखिका के अनुभवों का निचोड़ है, जो लगभग सच्ची घटनाओं से ओतप्रोत है। ‘प्रियावाद‘ को भी गुजरात की हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा द्वितीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया है।

इनका चैथा उपन्यास ‘उगते पलाश‘ इनके प्रथम उपन्यास की भाँति नारी के एकान्तिक जीवन की ओर संकेत करता है। कभी वह इस एकान्तिक जीवन को स्वेच्छा से ओढ़ लेती है तो कभी परिस्थितियाँ उसे मजबूर कर देती हैं। उसकी आँखों के सपने भी सपने ही रह जाते हैं।

‘श्यामली‘ और ‘क्षितिज‘ इनके कहानी-संग्रह हैं। जिनमें विभिन्न विषयों को लेकर कहानियाँ लिखी गई हैं। अपनी कहानियों में इन्होंने सामाजिक कुरीतियों को विशेष रूप से उकेरा है।

‘दंशों के घेरे में‘ इनका काव्य-संग्रह है, जिसमें कुछ गीत हैं और कुछ समसामयिक समस्याओं से भरी कविताएँ। ‘महादेवी के काव्य में बिम्ब विधान‘ इनका शोध-प्रबन्ध है, जो प्रकाशित है। उसे काफी ख्याति मिली है।

इसके अतिरिक्त पाठ्यपुस्तकों का लेखन, काव्य-संकलनों में कविताओं का प्रकाशन, कहानी संग्रहों में कहानियों का प्रकाशन तथा पत्र-पत्रिकाओं में कहानी और कविताओं का प्रकाशन अभी तक जारी है।

सुधा जी का नया काव्य-संग्रह ‘सोनजुहीं‘ नवम्बर तक राहुल प्रकाशन, अहमदाबाद से प्रकाशित हो जाएगा। उपन्यास ‘चाँद छूता मन‘ का द्वितीय संस्करण भी राहुल प्रकाशन, अहमदाबाद द्वारा शीघ्र प्रकाशित हो रहा है। 

सुधा जी भारतीय लेखिका संघ की आजीवन सदस्या हैं। इसके अतिरिक्त लायन्स क्लब ऑफ गुजरात, हिन्दी साहित्य परिषद, अहमदाबाद की आजीवन सदस्या हैं। ‘अस्मिता‘ नामक लेखिकाओं की संस्था की अध्यक्षा हैं। यह संस्था, जिसमें प्रत्येक मास मीटिंग होती है और लेखिकाओं तथा कवयित्रियों द्वारा रचनाएँ पढ़ी जाती हैं तथा उनकी समीक्षा भी होती है।



समीक्षा



डाॅ. सुषमा मुनीन्द्र

द्वारा श्री एम. के. मिश्र, जीवन विहार अपार्टमेन्ट्स
द्वितीय तल, फ्लैट नं0 7, महेश्वरी स्वीट के पीछे,
रीवा रोड, सतना (म.प्र.)-485001, मो. 07898245549


डाॅ. मीनाक्षी स्वामी


सुपरिचित उपन्यासकार-कथाकार डाॅ. मीनाक्षी स्वामी का यह तीसरा उपन्यास है। स्त्रियों के सामाजिक, पारिवारिक, दैहिक शोषण व न्यायिक प्रक्रिया पर आधारित उपन्यास ‘भूभल’ व हिन्दू धर्म और आध्यात्म पर आधारित उपन्यास ‘नतोअहम्’ ने मुझे यूँ प्रभावित कर रखा है कि आज भी वह प्रभाव जेहन से नहीं गया है। उपन्यास ‘सौ कोस मूमल’ ऐतिहासिक प्रेम कथा पर आधारित है। ‘नशां में नशो, नेह शे नशो’ (सारे नशों में सबसे बढ़कर प्रेम का नशा है)। शायद इसीलिये ‘‘प्रेम होता है तब इंसान की आँखों पर पट्टी बॅंध जाती है। प्रेम से कोई बेवफाई करे तो विवेक खो जाता है। (पृष्ठ संख्या 96)।’’ ढाई आखर का छोटा सा शब्द ‘प्रेम’ है ही ऐसा। इस शब्द में जितना भरोसा है उतना भ्रम भी है। प्रेम का बोध इतना व्यापक, ऊँचा, गहरा....... असीम है कि समग्रता में प्रेम की व्याख्या सम्भव नहीं। यद्यपि प्रेम प्राणी मात्र का स्वभाव है पर निश्छल सघन लगाव परिभाषित करने के लिये सर्वथा उपयुक्त भाव ही नहीं मिलते। वस्तुतः प्रेम के बोध को भाषा-परिभाषा-व्याख्या-टीका की सीमा में नहीं समेटा जा सकता। इस बोध का यही भरोसा है, यही भ्रम।

राजस्थान की सूखी रेतीली धरती ‘केसरिया बालम आवोनी पधारो म्हारे देस........ जैसी स्वर लहरियों और ढोला-मारू, जलाल-बबूना, जसम-ओडण, जेठवा-उजली, केहर-कॅंवल जैसी प्रेम गाथाओं से समृद्ध है। इसी का विस्तार है लोद्रवा की राजकुमारी मूमल और अमरकोट के राजकुमार महेन्द्र की अद्भुत प्रेम कथा। मीनाक्षी ने कथा को यूँ रचा है जैसे कुशल किस्सागो डूब कर कहानी सुना रहा है और सुनने वाले दम साधे हुये हैं कि इस प्रेमी जोड़े का अंजाम क्या होगा ? 

थार प्रदेश।

जैसेलमेर से लगभग सोलह किलोमीटर दूर पश्चिम में लोद्रवा (लोद्रवा में मूमल के महल के अवशेष आज भी विद्यमान हैं) की राजकुमारी मूमल और अमरकोट (विभाजन के बाद अमरकोट पाकिस्तान में चला गया है।) का राजकुमार महेन्द्र।  विदेश मंत्रालय की कल्चरल एक्सचेंज की योजना के अन्तर्गत भारत भ्रमण पर आये पाकिस्तान के कलाकार, साहित्यकार, संस्कृति प्रेमी विभाजित धरती की इस अविभाजित प्रेम गाथा को सुन कर भावुक हैं। जैसलमेर के लोक संस्कृति संग्रहालय में पारदर्शी काँच के बड़े बॉक्स में बंद मूमल की मेढ़ी (महल-जो अपने भूलभुलैया जैसे निर्माण और मूमल- महेन्द्र के प्रेम का साक्षी है) के मिनिएचर को देखना पर्यटकों के लिये अनोखा अनुभव है। मूमल ऐसी रुपवती, गुणवती, बुद्धिमती, वीर है कि मांगणियार (लोक गायक) अपनी गायन कला में उसके गुणों का बखान करते थे। मांगणियार पैदल घूमते-गाते अमरकोट आते हैं। उनके गायन से प्रभावित हो महेन्द्र उन्हें अपने महल में बुलाता है। ‘‘पुरुष का स्वभाव एक तो स्त्री को चीज समझना, दूसरे पसंद आने पर अपने अधिपत्य में लेना (15)।’’ इस पुरुषाचित्त स्वभाव के साथ ही महेन्द्र में बड़े साम्राज्य के इकलौते राजकुमार वाली राजसी जिद भी है। सात रानियों के होते हुये वह मूमल के लिये लालायित हो उठता है। मूमल के महल के चारों ओर निर्मित भूलभुलैया के कारण महल में प्रवेश करना असम्भव है। प्रयास कर तमाम लोग प्राण गॅंवा चुके हैं। महल तक जो सीधे पहॅंुचेगा मूमल उससे विवाह करेगी। महल तक पहुँचने का भेद मूमल, उसकी बहन सूमल और खास दासी सुजान को ही मालूम है - लोक गायकों के मुख से सुनी मूमल की शर्त को वीरता, विद्वता, मजबूत माँसपेशियों वाला सुदर्शन महेन्द्र चुनौती की तरह लेता है। महेन्द्र के भावों को मीनाक्षी स्वामी ने खूब पकड़ा है। यह चुनौती और रुपसी को देखने की अधीरता तो है ही, कम उम्र की स्त्रियों के प्रति उसके भीतर खास आकर्षण है। इसीलिये वह सबसे छोटी रानी को अधिक पसंद करता है। महेन्द्र महल में प्रवेश का तरीका ढूँढ़ने के लिये अपने सखा, सलाहकार, दास लक्खा को लोद्रवा भेजता है। लक्खा, सुजान को विवाह का प्रलोभन देकर तरीका जान लेता है। मीनाक्षी ने सुजान के चरित्र को स्त्रियोचित स्वाभाविकता दी है। दास-दासी राज महल की परछाईं मात्र होते हैं। सुजान अपनी इच्छा से कुछ भी करने को स्वतंत्र नहीं है। सुजान, मूमल के प्रति कर्तव्यनिष्ठ है तथापि आरम्भिक द्विविधा के बाद लक्खा को भेद बता देती है कि लक्खा से विवाह कर महल से बाहर के संसार में स्वेच्छा से विचरण करेगी। महेन्द्र, महल में प्रवेश करने में सफल होता है। मूमल का चरित्र जितना सरल उतना ही जटिल है। यही उसकी सम्पूर्णता है। इस चरित्रगत विशेषता को मीनाक्षी ने गहराई से समझा है। महेन्द्र के धैर्य, मानसिक स्थिरता, एकाग्रता के परीक्षण हेतु मूमल प्रस्ताव भेजती है वह सात दिन तक निरंतर महल में आये लेकिन मूमल से मिले बिना वापस लौटे। वह आठवें दिन उसके सम्मुख प्रस्तुत होगी। महेन्द्र प्रस्ताव को षडयंत्र या मूमल का अहंकार मानता है लेकिन राजसी जिद चुनौती से पीछे नहीं हटने देती। आठवें दिन दोनों के द्वैत, द्वन्द्व प्रेम में विलय हो जाते हैं। महेन्द्र में हद दर्ज की दीवानगी है। वह हवा की भॉंति तेज गति वाले ऊॅंट चीखल पर सवार हो नित्य रात को सौ कोस की दूरी तय कर मूमल से मिलने आता है। उजास फूटने के पहले अमरकोट लौट कर दोपहर तक सोता है। अस्वाभाविकता पर उसकी माँ, दृष्टिहीन पिता, सात पत्नियाँ द्विविधा में हैं। सत्यता जानने के लिये युक्ति लगा रही माँ, चीखल के अस्वस्थ होने की झूठी सूचना महेन्द्र को देती है। महेन्द्र जिस ऊॅंटनी पर सवार हो लोद्रवा के लिये प्रस्थान करता है, वह राह भटक जाती है। 

उधर मूमल के साथ महेन्द्र की प्रतीक्षा करती सूमल वक्त बिताने के लिये मांगणियार का पुरुष वेश बना कर स्वाँग रचती है। अंततः हताश हो दोनों सो जाती हैं। तमाम कष्ट उठा कर किसी तरह महल पहुँचा महेन्द्र, मूमल को पुरुष के साथ शयन करते देख इसे धोखाधड़ी मानता है। अपने निर्णय को गलत मानने या पछताने का पुरुषों को बिल्कुल अभ्यास नहीं है। वे निर्णय लेने बल्कि उस निर्णय को स्त्री पर थोपने के लिये तत्पर रहते हैं। महेन्द्र सात पत्नियों के साथ विश्वासघात कर रहा है लेकिन क्रोध, घृणा, आवेश के अतिरेक में मूमल को न जगा कर पूरी तरह निर्मम - निर्मोही होकर लौट जाना उसे कायरता नहीं लगती। जबकि मूमल में गजब की नैतिकता है। वह शर्त को लेकर इतनी समर्पित और ईमानदार है कि सात रानियों वाले महेन्द्र को सहज स्वीकार कर एकनिष्ठ प्रेम करती है। फर्श पर महेन्द्र के जूतों के चिन्ह देख कर अपराध बोध से भर जाती है। क्यों सो गई ? और महेन्द्र इतना संस्कारी कि नींद से जगाना उसे नीति विरुद्ध लगा होगा। अपमानित हुआ होगा। अधिकार और अहम् को ठेस पहुँची होगी। दिनों तक महेन्द्र की प्रतीक्षा कर यथार्थ जानने के लिये मांगिणयार किसना को अमरकोट भेजती है। किसना सूचित करता है महेन्द्र, मूमल को चरित्रभ्रष्ट समझ रहा है। मूमल दृढ़ निश्चयी और सिद्धांत प्रिय है। पूरा वक्त लगाकर संयम से प्रत्येक बिंदु पर विचार करती है। यदि महेन्द्र को उस पर भरोसा नहीं तो प्रेम कैसा ? मूमल विषाद में है, लेकिन खुद पर लगे आरोप को निराधार बताने के लिये दृढ़ है। पुरुष वेश बना कर ऊॅंट में सवार हो अमरकोट पहुँच बाल सखा के तौर पर महेन्द्र से मिलती है। देखती है महेन्द्र उसके वियोग में अवसादग्रस्त हो निष्प्रयोजन पड़ा रहता है। अर्थात महेन्द्र भ्रम में है पर उससे प्रेम करता है। चैपड़ के खेल में कौड़ियाँ फेंकती मूमल की हथेली का काला तिल देख कर महेन्द्र उसे पहचान लेता है।

प्रेम कथा का आकर्षण शाश्वत है। उपन्यास अंत तक पाठकों को बाँधे रखता है लेकिन यह उपन्यास, उपन्यास कम, लम्बी कहानी अधिक लगता है जो मात्र एक कथा और दो प्रमुख पात्रों की गाथा बन कर रह गया है। जबकि इस ऐतिहासिक प्रेम कथा का कैनवास बहुत बड़ा है। लेखिका ने जानकारी एकत्र करने में मेहनत की है लेकिन राजमहल के राजसी परिवेश, मनःस्थिति, परम्परागत व्यवस्थायें, आंतरिक छल-बल, द्वन्द्व-द्वेष, संताप-वेदना जैसे रचनात्मक उपक्रम से बचती नजर आती है। महेन्द्र की मॉं दृष्टिहीन पिता, सात रानियों के आपसी वाद, विवाद, संवाद क्या रहे, महेन्द्र, छोटी रानी के पास अधिक रहता था, ऐसे में शेष रानियाँ निस्सारिता से कैसे जूझती थीं, जैसे कुछ प्रभावी प्रसंग होते तो इस प्रेम कथा का आकार और असर अधिक प्रभावी होता। बहरहाल प्रवाहमान सादी भाषा में रचित सुखद अंत वाले उपन्यास को पढ़ना सुखद है। मीनाक्षी स्वामी ने इस ऐतिहासिक प्रेम कथा को प्रचलित कर राजस्थान की धरती को धन्य किया है।

आशा है पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों को रुचिप्रद लगेगी। 


पुस्तक -  सौ कोस मूमल (उपन्यास)

लेखक -  डाॅ. मीनाक्षी स्वामी

प्रकाशक -  स्टोरी मिरर

एच 33/1 डी एल एफ फेज प्

गुड़गाँव - 122002

प्रकाशन वर्ष - 2017

मूल्य -  185/-



समीक्षा

सुश्री लता अग्रवाल

30 एमआई जी, अप्सरा कोम्प्लेक्स-।
सेक्टर, इंद्रपुरी, भोपाल-462022, मो. 9926481878

बड़ा नाच नचाती है: रोटी

पुस्तक शीर्षक: रोटी 

विधा: लघुकथा  

लघुकथाकार : सुश्री नीलम कुलश्रेष्ठ जी

समीक्षक: डॉ. लता अग्रवाल  

प्रकाशक: वनिका पब्लिकेशन  

मूल्य: 190/-

 पृष्ठ: 119

लघुकथा आज की समृद्ध होती विधा है, जिसने अधिकांश लेखकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अपनी लघुता के साथ लघुकथा ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इसकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अलग-अलग विधाओं से लेखक इस विधा में आ रहे हैं।  

इसी क्षेत्र में वरिष्ठ लेखिका नीलम कुलश्रेष्ठ जी का नाम नया नहीं है, साहित्य की कई विधाओं में आपका लेखन रहा है। इसके साथ ही संपादन के क्षेत्र में भी आप सक्रिय रही हैं जैसा कि उन्होंने अपनी भूमिका में लिखा है; वे 20-21 वर्ष की आयु से उन्होंने लघुकथा लिखना आरम्भ किया है इस दृष्टि से अनुमानतः लगभग 4 दशक से उनका साथ लघुकथा से रहा है। प्रस्तुत संग्रह ‘रोटी’ उनका प्रथम लघुकथा संग्रह है जिसमें कुल 69 लघु कथाएं हैं समस्त लघुकथाएं जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से उपजी हैं। भूमिका के रूप में आ० सुकेश साहनी जी की उपस्थिति इस संग्रह को गरिमा प्रदान करती है।

जैसा कि हम जानते हैं, दुनिया में सारी जद्दोजहद उस गोल और छोटी सी चीज के लिए ही है जिसका जिक्र लेखिका अपनी लघुकथा ‘रोटी’ में करती हैं। “जो महाराज की जेब में है और मंत्री महाराज की नजर से बचा कर थोड़ी सी उसमें से तोड़कर अपने कुर्ते की जेब में सरका लेता है।” यह सरकाना संकेत है भ्रष्टाचार का। आज हर व्यक्ति एक दूसरे की जेब से वह छोटी, गोल वस्तु सरका रहा है। आज देश का जो वातावरण है उसने हमारी आंखों पर संदेह का ऐसा चश्मा चढ़ा दिया है कि हम हर इंसान को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। यह लघुकथाएँ ‘आतंक’ व ‘अतिक्रमण’, ‘सहयात्री’ जैसे विषयों पर प्रश्न उठाती हंै। संतान को 9 माह गर्भ में रख अपने आंचल का रसपान कराती हैं। माँ, कई माताएं बच्चों के लिए अपना कैरियर दांव पर लगाती हैं, किंतु जब बच्चे के साथ नाम की बात आती है तो मां के स्थान पर पिता का नाम ही अंकित किया जाता है, क्यों...? युगों से उठता सवाल। हम जिस ‘परिवेश’ में रहते हैं हमारी दुनिया वैसे ही बन जाती है, जैसे बिट्टू की नजर घर की परिभाषा गढ़ती है, “घर गंदा होता है; इसमें ताला होता है; इसमें मम्मी नहीं होती।” यह है बिट्टू का आक्रोश,  आज अधिकतर घरों में माता-पिता दोनों कमाने के लिए निकल पड़े हैं ऐसे में बच्चों के अकेलेपन की मनोदशा को दर्शाती लघुकथा। ‘नया अर्थ’ बच्चों की सोच कहाँ- कहाँ  जाती है,हम सोच भी नहीं पाते हैं।

‘गवई शब्द चित्र परिशिष्ट’ में ‘एहसान’ और ‘पटकनी’ में लघुकथा के स्थान पर हास्य अधिक दिखाई देता है। ‘स्वार्थी’ लघुकथा की चैखट में आते-आते रह गई जिसमें लेखिका ने एक गंभीर विषय उठाया है कि आज संवेदनाएं भी बिकाऊ हो, बाजारवाद का हिस्सा हो गई है। अब तक जो दिखता है वही बिकता है-सुना किंतु जो दिखता है हमारी संवेदनाएं भी उन्हीं के साथ होती हैं जैसे मुंबई की एक अभिनेत्री के छत से गिर आत्महत्या करने पर उसकी चर्चा सारे देश में होती है जबकि एक गांव का गरीब युवा कोल्हू के पाटों के बीच आकर मर जाता है लेकिन उसकी मृत्यु गुमनाम ही रह जाती है। वर्तमान राजनीति का चित्र प्रस्तुत करती लघुकथा ‘मोहरे’ कैसे इस्तेमाल किए जाते हैं। दूसरी ओर चरित्र को रेखांकित करती लघुकथा, “मेरी पहुंच प्रिंसिपल तक है अपने स्कूल के प्रिंसिपल शराब पीने तो मेरे पापा की फैक्ट्री में ही आते हैं। उफ! दुखद है यह स्थिति। रेगिंग के विरोध में सचेत करती ‘प्रशिक्षण’, ना चाहते हुए भी बच्चे उसका हिस्सा बन जाते हैं।

लघुकथा ‘उत्खनन’, ‘छुट्टी’ बताती है, स्त्री और पुरुष गृहस्थी के दो पहिए हैं किंतु श्रम की अनदेखी की जाती है। उनकी नायिका इसका विरोध करती है। “तुम सिर्फ रुपए कमा रहे हो घर को नहीं चला रहे, सुबह से शाम तक तुम्हारी देखभाल करते हैं जिससे तुम निश्चित रुपए कमा सको।” बढ़िया लघुकथा ‘विस्थापन’ सच है, विस्थापन का दर्द स्त्री के अलावा कौन समझ सकता है। वहीं लेखक द्वारा यह कहना कि, “पुस्तक को विस्थापितों को समर्पित करेंगे तब, कोने में बैठी स्त्री की आवाज आती है तब तो यह समर्पण दुनिया की स्त्री जाति के लिए होना चाहिए।” स्त्री में ही वह गुण है जो कुर्बानी देकर ही संतुष्ट रहती है, फिर केवल कविता रचना ही रचनात्मकता नहीं,...चरित्र गणना भी रचनात्मकता है।” लघुकथा ‘‘रचना प्रक्रिया’ में। औरत कई स्तर पर स्वयं को जीती है, बताती ‘मन की औरत’, ‘पक्षपात’,‘समाधान’, ‘स्थगन’, ‘संतुलन’, ‘ममता’, ‘श्राप मुक्ति’ सबके अपने-अपने समाधान हैं।

आज रिश्ते किस तरह बाजारवाद में तब्दील हो रहे हैं बताती लघुकथा, ‘गुमशुदा क्रेडिट कार्ड’। “ईश्वर की अनुकम्पा पर गिरजा घरों में मरियम मेरी पूजनीय बना दी गई व कंसाड्रा श्राप ग्रस्त।” इसे समझने की आवश्यकता है। ‘आधारशिला’ में यदि भूमिका को हटा दिया जाए तो यह एक गंभीर लघुकथा बन सकती है। माइक पर स्वदेशी होने का लंबा चैड़ा भाषण देते नेता का सच देखें, “लो तुम्हारे छोटे बेटे की चिंता भी दूर हो गई उसे अमेरिकन एमएनसी में नौकरी मिल गई है और अपने पोते को सुपर -डुपर इंग्लिश मीडियम स्कूल में एडमिशन।” 

हम जानते हैं कि लघुकथा एक क्षण की कथा है, उस दृष्टि से ‘बेबसी’ लघुकथा की धार बन नहीं पाई,इसे हम लघु कहानी की श्रेणी में रख सकते हैं। ‘दूरदर्शन’ घटना है लघुकथा नहीं। यद्यपि कथा अंबानी के यहां शादी के आमंत्रण पत्र का स्मरण कराती है। ‘हेरिटेज वीक’ कथा को लघुकथा के सांचे में किया जा सकता है,प्रयास की आवश्यकता है। परिणाम विषय अच्छा है किंतु वह बात नहीं बन पाई, यद्यपि  संवाद बड़े सजीव हैं, ‘व्हाट इज योर प्रॉब्लम’, ‘माइंड योर ओन बिज़नेस’, ‘किसी से कोई सवाल पूछो तो चिल्लाएगी आर यू डफर’।” लघुकथा ‘मिशन मंगल’ कई प्रश्न उठाती है सरकारी योजनाओं पर, देश एक ओर गरीबी से जूँझ रहा है, दूसरी ओर हम मंगल पर यान भेजने की बात करते हैं। हालाकि विकास की दृष्टि से यह भी अनुचित नहीं किन्तु ... इतना खर्च, अगर एक ओर भूख से पीड़ित लोग हैं तो प्राथमिकता क्या होना चाहिए ? यह बात एक अनपढ़ कचरा बीनने वाली को समझ आती है किंतु देश के कर्णधारों को नहीं।

लघुकथा महज़ घटना नहीं है, उसका अपना एक रचना विधान होता है, भले ही लघुकथा का लिखित कोई स्वरूप न रहा हो किन्तु फिर भी इन 40 वर्षों में जो आधार लेकर लघुकथा चली है उससे एक चैखट तो लघुकथा ने अपनी बनाई है जिसमें लघुकथा का फिट होना मैं समझती हूं बहुत आवश्यक है। जिसके अनुसार अगर कहूँ कि ‘आखिर कब तक ?’, ‘छटपटाहट’,’दुनिया’,स्वार्थी’, ‘तनी नाक’,’रूदन’, ‘आरोहण’, ‘जिम्मेदारी’, ‘अनेकता में एकता’, ‘गतांक’, ‘कोई तो नहीं देख रहा’,’दिल’ लघुकथा की उस चैखट को पूरा नहीं कर पाई हैं। जैसा कि लघुकथा भूमिका रहित विधा है, फिर लघुकथा का शीर्षक ही सारा भेद खोल दे यह भी लघुकथा में उचित नहीं। ‘और मानव धर्म बन न सका’ गंभीर विषय था अगर इसका निर्वाहन भी उतना ही गंभीर होता तो यह श्रेष्ठ लघुकथा में शामिल होती। ‘मौसेरे भाई’ लघुकथा में कच्चा पन है।

इस तरह इस संग्रह का आरंभ रोटी से और अंत भी रोटी से ...अगर कहूं कि इसके माध्यम से लेखिका ने जीवन दर्शन को प्रस्तुत किया है कि इस संसार में इंसान की सारी भागम -भाग इस रोटी के लिए ही है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। नीलम जी का कहानी और उपन्यास के साथ इस लघुकथा संग्रह के आगमन का स्वागत करती हूँ। यद्यपि अभी इन लघुकथाओं में कच्चेपन की गंध है और मुझे पूरा विश्वास है कि उनके अगले लघुकथा संग्रह में हमें कालजयी लघुकथाओं के दर्शन होंगे।

मैं उन्हें पुनः बधाई देती हूँ। 



समीक्षा

श्री सुशांत सुप्रिय
इंद्रापुरम, गाजियाबाद, मो. 85120 70086

सुशांत सुप्रिय की कहानियों पर टिप्पणियाँ

श्री विमलेश त्रिपाठी: सुशांत सुप्रिय हिंदी कथा-जगत के एक ऐसे अनूठे कथाकार हैं जिन्होंने कहानी कहने की एक सर्वथा भिन्न शैली विकसित की है जिसे पाठकों ने खूब पसंद किया है। उनकी कहानियों का रेंज बहुत व्यापक है जो कई बार हमें चकित करता है और सोचने के लिए विवश भी। ‘‘सम्पूर्ण कहानियाँ”  (1996-2021) संग्रह की कहानियाँ न केवल बार-बार पढ़ी जाएँगी बल्कि बहुत समय तक पाठकों के मन में बनी रहेंगी। शुभकामनाएँ।

शंभु बादल: सुशांत सुप्रिय की सृजनशील चेतना काव्यात्मक कथा-संवेदना से समृद्ध है। कहानीकार की दृष्टि पूरी जागरूकता के साथ परिवेश, जीवन, संबंध, अंतःकरण, रंग, रूप, राग, द्वेष, सुख-दुख, पीड़ा, द्वंद्व, असंगति, त्रासदी, प्रकृति आदि को बारीक़ी से परखती है। इनकी कहानियाँ दिल को छू लेती हैं। यहाँ प्रभावी संदर्भों को संकेतों, बिंबों में अंकित करने की अद्भुत कला देखी जा सकती है।

भालचंद्र जोशी: आज भूमण्डलीकरण के द्वंद्वात्मक समय में बाजार, पूँजी, तकनीक, और राजनीति आदि विभिन्न शक्ति-केंद्र जीवन के भरोसे की पहचान ख़त्म कर देने पर आमादा हैं। ऐसे में सुशांत सुप्रिय की कहानियाँ उस पहचान को लौटाने और बचाए रखने की सार्थक कोशिशों का भरोसा हैं।

अरुण देव: सुशांत सुप्रिय की अधिकतर कहानियाँ सामाजिक मूल्यों के विघटन के दौर में उनकी ज़रूरत की ओर इशारा करती हैं। सुशांत की कथा का यथार्थ समकालीन विद्रूपताओं और विपदाओं की शिनाख्त करता है। उनकी कई कहानियों में परिवार, बच्चे, गाँव और पुरानी स्मृतियाँ आती हैं। किस्सागोई का उनके पास अपना निराला अंदाज है।

अरुण शीतांश: सुशांत सुप्रिय की कहानियाँ हमारे जीवन के करीब हैं। इनमें कहानी की खूबी और कथ्य को नापने की क्षमता है। ये अपनी कहानियों में द्वंद्वात्मकता के बीच कहानी के शिल्प को कलात्मक पाठ के अनुसार ले आते हैं। एकरेखीय कहानियाँ इनके यहाँ नहीं मिलतीं। इतने सारे कथाकारों की भीड़ में सुशांत ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

संतोष श्रीवास्तवःसुशांत सुप्रिय की कहानियाँ समाज की विसंगतियों पर कड़ी नजर रखते हुए बहुत ही सुंदर शिल्प के गठन सहित ज़मीनी सच्चाइयों से जुड़ी हुई कहानियाँ हैं।

रंजना मोरवाल: सुशांत सुप्रिय जी ने लगभग हर विषय पर कहानियाँ लिखी हैं। इनके वृहद् रचना-संसार में कठिन तपस्या के साथ-साथ अथाह शोध भी शामिल है। इनकी कहानियाँ हिंदी कथा-साहित्य को समृद्ध करती हैं।

सुधांशु गुप्त: सुशांत सुप्रिय की कहानियों में एक बेहतर दुनिया का स्वप्न है। स्वप्न, स्मृतियों और फैंटेसी आदि के ज़रिए वे एक बेहतर दुनिया बनाना चाहते हैं। यह कोशिश उनकी कहानियों को महत्वपूर्ण बना देती है।

हरि भटनागर: सुशांत सुप्रिय अच्छे कथाकार के रूप में समादृत हैं। जीवन के तल में छिपे सत्य को वे बिना किसी लाग-लपेट के सामने ला देते हैं। सुप्रिय में भाषा की ताजगी और सादगी है और आधुनिक भाव-बोध का पुट है जो उन्हें अपने समकालीनों से अलग ला खड़ा करता है।

शहंशाह आलम: सुशांत सुप्रिय युग-बोध के कथाकार हैं। इनकी कहानियाँ पढ़ते हुए हम खुद को अपने परिवेश, अपनी संवेदना और अपने जीवन-संघर्ष से सीधे जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। इनका कथा-संसार इतना विविध और व्यापक है कि वहाँ यह संसार और उसके लोग-बाग जीवंत दिखाई देते हैं। कथाकार मानवीय संबंधों को इतना प्रगाढ़ महत्त्व देता है कि हम खुद कहानी का हिस्सा बने हुए दिखाई देते हैं।

सुषमा मुनींद्र: सुशांत की कहानियाँ आकार में लम्बी नहीं, अपेक्षाकृत छोटी हैं तथापि सार्वभौमिक सत्य को सामने लाने में सक्षम हैं। भाषा आकर्षक और बोधगम्य है। आह्लाद और विनोद का पुट कहानियों को रोचक बना देता है। पात्रों के अनुरूप छोटे-छोटे, अनुकूल संवाद हैं जो अत्यधिक उचित लगते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है किस्सागोई का आनंद देती ये कहानियाँ दिमाग पर हथौड़े की तरह वार करती हैं, तथा दिल पर असर छोड़ते हुये सकारात्मक सोच अपनाने के लिये प्रेरित करती हैं। 


समीक्षा


सुश्री सुषमा मुनीन्द्र
सतना (म.प्र.) मो. 07898245549


किस्सागोई का कौतुक देती कहानियाँ

सुपरिचित रचनाकार सुशांत सुप्रिय का सद्यः प्रकाशित कथा संग्रह ‘दलदल’ ऐसे समय में आया है जब निरंतर कहा जा रहा है कि कहानी से कहानीपन और किस्सागोई शैली गायब होती जा रही है। संग्रह में बीस कहानियाँ हैं जिनमें ऐसी जबर्दस्त किस्सागोई है कि लगता है शीर्षक कहानी ‘दलदल’ का किस्सागो बूढ़ा, दक्षता से कहानी सुना रहा है और हम कहानी पढ़ नहीं रहे हैं वरन साँस बाँध कर सुन रहे हैं कि आगे क्या होने वाला है। पूरे संग्रह में ऐसा एक क्रम, एक सिलसिला-सा बनता चला गया है कि हम संग्रह को पढ़ते-पढ़ते पूरा पढ़ जाते हैं। कभी उत्सुकता, कभी जिज्ञासा, कभी भय, कभी सिहरन, कभी आक्रोश, कभी खीझ, कभी कुटिलता, कभी कृपा से गुजर रहे पात्र इतने जीवंत हैं कि सहज ही अपने भाव पाठकों को दे जाते हैं। ‘दलदल’ कहानी के विकलांग सुब्रोतो का करुण तरीके से दलदल में डूबते जाना सिहरन से भरता है तो ‘बलिदान’ की बाढ़ग्रस्त भैरवी नदी में नाव पर सवार क्षमता से अधिक परिजनों द्वारा डगमगाती नाव का भार कम करने के लिये, किसका जीवित रहना अधिक जरूरी है, किसका कम, इस आधार पर एक-एक कर नदी में कूद कर आत्म-उत्सर्ग करना स्तब्ध करता है। ‘‘काले चोर प्रोन्नति पायें, ईमानदार निलंबित हों’’ ऐसे अराजक, अनैतिक माहौल में खुद को मिस-फिट पाते ‘मिसफिट’ के केन्द्रीय पात्र का आत्महत्या का मानस बना कर रेलवे ट्रैक पर लेटना भय से भरता है तो ‘पाँचवी दिशा’ के पिता का हॉट एयर बैलून में बैठ कर उड़ना, गुब्बारे का अंतरिक्ष में ठहर जाना जिज्ञासा से भरता है। ‘दुमदार जी की दुम’ के दुमदार जी की रातों-रात ‘दुम निकल आई है‘ जैसे भ्रामक प्रचार को अलौकिक और ईश्वरीय चमत्कार मान कर लोगों का उनके प्रति श्रद्धा से भर जाना उत्सुकता जगाता है तो ‘बयान’ के निष्ठुर भाई का ‘‘यातना-शिविर जैसे पति-गृह से किसी तरह छूट भागी मिनी को जबर्दस्ती घसीट कर फिर वहीं (पति-गृह) पहुँचा देना।’’ आक्रोश से तिलमिला देता है। वस्तुतः सुशांत सुप्रिय की पारखी-विवेकी दृष्टि अपने समय और समाज की प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति-मनः स्थिति पर ऐसे दायित्व बोध के साथ पड़ती है कि संग्रह की पंक्तियाँ तत्कालीन व्यवहार-आचरण का सच्चा बयान बन गई हैं - ‘‘कैसा समय है यह, जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं सारी मशालें, और हम निहत्थे खड़े हैं।’’ (कहानी दो दूना पाँच)। ‘‘बेटा, पहले-पहल जो भी लीक से हट कर कुछ करना चाहता है, लोग उसे सनकी और पागल कहते हैं।’’ (कहानी ‘पाँचवीं दिशा‘)। ‘‘मैं नहीं चाहता था मिनी आकाश जितना फैले, समुद्र भर गहराये, फेनिल पहाड़ी-सी बह निकले ............ मेरे जहन में लड़कियों के लिये एक निश्चित जीवन-शैली थी।’’ (कहानी ‘बयान‘)। ‘‘लोग आपको ठगने और मूर्ख बनाने में माहिर होते हैं। मुँह से कुछ कह रहे होते हैं जबकि उनकी आॅंखें कुछ और ही बयाँ कर रही होती हैं।’’ (कहानी ‘एक गुम सी चोट‘)। ये कुछ ऐसी वास्तविकतायें हैं जिनसे संत्रस्त हो चुका आम आदमी सवाल करने लगा है ‘‘नेक मनुष्यों का उत्पादन हो सके क्या कोई ऐसा कारखाना नहीं लगाया जा सकता ? ‘‘ लेकिन संग्रह की कहानियों में जो सकारात्मक भाव हैं,वे सवाल का उत्तर दें न दें, आम आदमी को आश्वासन जरूर देते हैं कि ‘‘मुश्किलों के बावजूद यह दुनिया रहने की एक खूबसूरत जगह है।’’ (कहानी ‘ पिता के नाम ‘ )

संग्रह की मूर्ति, पाँचवीं दिशा, चश्मा, भूतनाथ आदि कहानियाँ आभासी संसार का पता देती हैं। ये कहानियाँ यदि लेखक की कल्पना हैं तो अद्भुत हैं, सत्य हैं तब भी अद्भुत हैं। ‘मूर्ति’ का समृद्ध उद्योगपति जतन नाहटा आदिवासियों से वह मूर्ति, जिसे वे अपना ग्राम्य देवता मानते हैं, बलपूर्वक अपने साथ ले जाता है। मूर्ति उसे मानसिक रूप से इतना अस्थिर-असंतुलित कर देती है कि वह पागलपन के चरम पर पहुँच कर अंततः मर जाता है। ‘पाँचवीं दिशा’ के पिता हॉट एयर बैलून में बैठ कर उड़ान भरते हैं। गुब्बारा अंतरिक्ष में स्थापित हो जाता है। वे वहाँ से सैटेलाइट की तरह गाँव वालों को मौसम परिवर्तन की सूचना भेजा करते हैं। ‘‘चश्मा’ कहानी के परिवार के पास चार-पाँच पीढ़ियों से एक विलक्षण चश्मा है जिसे पहन कर भविष्य में होने वाली घटना-दुर्घटना के दृश्य देखे जा सकते हैं। दृश्य देखने में वही सफल हो सकता है जिसका अन्तर्मन साफ हो। ‘भूतनाथ’ का भूत मानव देह धारण कर लोगों की सहायता करता है। वैसे ‘भूतनाथ’ और ‘दो दूना पाँच’ कहानियाँ फिल्मी ड्रामा की तरह लगती हैं। सुकून यह है कि जब हत्या, बलात्कार, दुर्घटना, वन्य प्राणियों का शिकार कर, गलत तरीके से शस्त्र रख धन-कुबेर और उनकी संतानें पकड़ी नहीं जातीं या पुलिस और अदालत से छूट जाती हैं, वहाँ ‘दो दूना पाँच’ के कुकर्मी प्रकाश को फाँसी की सजा दी जाती है। कहानियों में जमीनी सच्चाई है इसीलिये झाड़ू, इश्क वो आतिश है गालिब जैसी प्रेम-कहानियाॅं भी प्रेम-राग का अतिरंजित या अतिनाटकीय समर्थन करते हुये मुक्त गगन में नहीं उड़तीं बल्कि इस वास्तविकता को पुष्ट करती हैं कि प्रेम के अलावा भी कई-कई रिश्ते होते और बनते हैं और यदि विवेक से काम लिया जाय तो हर रिश्ते को उसका प्राप्य मिल सकता है: ‘‘जगहें अपने आप में कुछ नहीं होतीं। जगहों की अहमियत उन लोगों से होती है जो एक निश्चित काल-अवधि में आपके जीवन में उपस्थित होते हैं।’’ (पृष्ठ 73)। लेकिन कुछ स्थितियाँ ऐसा नतीजा बन जाती हैं कि इंसान शारीरिक यातना से किसी प्रकार छूट जाता है लेकिन मानसिक यातना से जीवन भर नहीं छूट पाता। बिना किसी पुख्ता सबूत के, संदेह के आधार पर जाति विशेष के लोगों को अपराधी साबित करना सचमुच दुःखद है। ’मेरा जुर्म क्या है ?’ के मुस्लिम पात्र के घर की संदेह के आधार पर तलाशी ली जाती है, उसे जेल भेजा जाता है। बरसों बाद वह निर्दोष साबित होकर घर लौटता है लेकिन ये यातना भरे बरस उसका जो कुछ छीन लेते हैं उसकी भरपाई नामुमकिन है। ‘कहानी कभी नहीं मरती’ के छब्बे पाजी 1984 जून में चलाये गये आपरेशन ब्लू-स्टार के फौजी अभियान की चपेट में आते हैं। झूठी निशानदेही पर ‘ए’ कैटेगरी का खतरनाक आतंकवादी बता कर उन्हें जेल भेजा जाता है। वे भी बरसों बाद निर्दोष साबित होते हैं। कहानियों में इतनी विविधता है कि समकालीन समाज और जीवन की सभ्यता-पद्धति, आचरण-व्यवहार, यम-नियम, चिंतन-चुनौती, मार्मिकता-मंथन, समस्या-समाधान, साम्प्रदायिकता-नौकरशाही, कानून-व्यवस्था, मीडिया, भूकम्प, बाढ़, अकाल, बाँध, डूबते गाँव, कटते जंगल, किलकता बचपन, गुल्ली-डंडा, कबड्डी जैसे देसी खेल, कार्टून चैनल, वीडियो गेम्स, मोबाइल, लैप-टाप जैसे गैजेट्स ........... बहुत कुछ दर्ज हैं।

सुशांत की कहानियाँ आकार में लम्बी नहीं, अपेक्षाकृत छोटी हैं तथापि सार्वभौमिक सत्य को सामने लाने में सक्षम हैं। भाषा आकर्षक और बोधगम्य है। आह्लाद और विनोद का पुट कहानियों को रोचक बना देता है। पात्रों के अनुरूप छोटे-छोटे, अनुकूल संवाद हैं जो अत्यधिक उचित लगते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है किस्सागोई का आनंद देती ये कहानियाँ दिमाग पर हथौड़े की तरह वार करती हैं, तथा दिल पर असर छोड़ते हुये सकारात्मक सोच अपनाने के लिये प्रेरित करती हैं। अच्छे कहानी संग्रह के लिये सुशांत सुप्रिय को बधाई और शुभकामनायें। 


समीक्षा

लेखक श्री सुशांत सुप्रिय

‘‘आधुनिक हिंदी कविता को समृद्ध करती कविताएँ’’

इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं 

(काव्य-संग्रह)

कवि: सुशांत सुप्रिय

प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, 2015

समीक्षक: राम पांडेय (उप-संपादक: यात्रा पत्रिका, गोरखपुर)

इक्कीसवीं सदी के बीते डेढ़ दशक में अपनी अलग पहचान बनाने वाले युवा कवियों में सुशांत सुप्रिय का नाम प्रमुख है। इस डेढ़ दशक में आए सामाजिक बदलाव की बानगी इनकी कविताओं मे स्पष्ट दिखाई देती है। समाज के हाशिए पर खड़े आम आदमी के जीवन-संघर्षों एवं लगातार समाप्त होते जा रहे विकल्पों का जीवंत दस्तावेज हैं इनकी कविताएँ। सुशांत मजदूरों, दलितों, स्त्रियों, शोषितों, वंचितों एवं आम जन की पीड़ा के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। इनकी कविताएँ इंसानियत की बेहतरी के लिए संघर्ष करते रहने की जिद लिए हैं। समकालीन ज्वलंत प्रश्नों से सीधे संवाद करती इनकी कविताएँ सच बोलने का साहस रखती हैं। सुशांत के काव्य-संग्रह ‘‘ इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ‘‘ में कुल सौ कविताएँ संकलित हैं। इन कविताओं से गुजरते हुए यह सुखद अहसास होता है कि समझ और संवेदना की गहराई लिए इस कवि की कविताएँ न सिर्फ मनुष्य होने का अहसास दिलाती हैं बल्कि मनुष्यता को बचाने के लिए प्रतिबद्ध भी हैं।

संग्रह की दूसरी कविता ‘‘जो नहीं दिखता दिल्ली से‘‘ आज के राजनीतिक परिदृश्य को बहुत बेबाकी से व्यक्त करती है। लुटियन की दिल्ली में बैठे हुए जनता के रहनुमाओं को आम जन की पीड़ा नहीं दिखती। सुशांत का कवि किसानों और मजदूरों की पीड़ा को देखकर उनके दर्द को समझता है। गरीबी और भूख से जूझ रहे आम जन की कराह दिल्ली तक नहीं पहुँचती। वह तो इनके अंदर ही तिल-तिल कर बुझ जाती है... ‘‘ मजदूरों-किसानों के/भीतर भरा कोयला और/माचिस की तीली से/जीवन बुझाते उनके हाथ/नहीं दिखते हैं दिल्ली से .../दिल्ली से दिखने के लिए/या तो मुँह में जयजयकार होनी चाहिए/या फिर आत्मा में धार होनी चाहिए ‘‘।

नयी सदी की मशीनी सभ्यता के विषैले डंक ने आम आदमी को भी नहीं बख़्शा है। जीवन के तमाम आत्मीय संबंध तार-तार हो गए हैं। रोजी-रोटी के जुगाड़ में दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। गाँवों से शहरों की तरफ तेजी से पलायन हो रहा है। इस आपा-धापी में किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं है कि अपनों को समय दे सके, उनका दुख-दर्द बाँट सके। तेजी से बदलते समय में बिखरते संबंधों को बयाँ करती सुशांत की बहुत सुंदर कविता है ‘दिल्ली में पिता’.... ‘‘ किंतु यहाँ आकर/ऐसे मुरझाने लगे पिता/जैसे कोई बड़ा सूरजमुखी धीरे-धीरे/खोने लगता है अपनी आभा ‘‘।

महानगरों की ओर तेजी से होते पलायन ने सामाजिक संबंधों की डोर को कमजोर कर दिया है। संबंधों की दीवार दरकने लगी है। रिश्तों की चारदीवारी छोटी होने लगी है, जिसका असर सामाजिक ढाँचे पर पड़ रहा है। सुशांत का कवि महानगरों की दूषित हवा में मौजूद सामाजिक बिखराव का द्रष्टा ही नहीं, भोक्ता भी है... ‘‘ कुछ दिनों बाद/जब ठीक हो गए पिता/तो पूछा उन्होंने.../‘ बेटा, पड़ोसियों से/बोलचाल नहीं है क्या तुम्हारी ? ‘/मैंने उन्हें बताया कि बाबूजी/यह अपना गाँव नहीं है/महानगर है, महानगर/यहाँ सब लोग/अपने काम से काम रखते हैं, बस !/यह सुनकर उनकी आँखें/पूरी तरह बुझ गईं ‘‘।

बदलते परिवेश में आज सबसे बड़ा संकट पठनीयता पर है। टेलीविजन के रंग-बिरंगे कार्यक्रमों, रियलिटी शो और सीरियल देखने के आगे साहित्य पढ़ने की फुर्सत किसको है। सुशांत सुप्रिय की चिंता हिंदी कविता की पठनीयता को ले कर है। कविताएँ लिखी तो बहुत जा रही हैं किंतु उनके पाठक नहीं हैं। नयी सदी के हिंदी कवियों की पीड़ा को सुशांत ‘ इक्कीसवीं सदी में हिंदी कवि ‘ कविता में व्यक्त करते हैं- ‘‘ जैसे अपना सबसे प्यारा/खिलौना टूटने पर/बच्चा रोता है/ठीक वैसे ही रोते हैं/हिंदी-कवि के शब्द/अपने समय को देखकर.../इस रुलाई का/क्या मतलब है..../लोग पूछते हैं/एक-दूसरे से/और बिना उत्तर की/प्रतीक्षा किए/टी.वी. पर/रियलिटी-शो/और सीरियल देखने में/व्यस्त हो जाते हैं .../किसी को क्या पड़ी है आज/कि वह पढ़े हिंदी के कवि को ऐसे/जैसे पढ़ा जाना चाहिए/किसी भी कवि को ‘‘।

सुशांत की कविता ‘कामगार औरतें‘ महाकवि निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर‘ की याद दिलाती है। क्या सुंदर बनावट है कविता की। शब्द-विधान इतना सुंदर कि पूछिए मत। ऐसा लगता है जैसे एक-एक शब्द भावों से सना हुआ है। कामगार औरतों की थकी चाल की विश्व-सुंदरियों की कैट-वाक् से तुलना करके सुशांत ने जो यथार्थ का जीवंत चित्र खींचा है वह अद्भुत है... ‘‘ कामगार औरतों के/स्तनों में/पर्याप्त दूध नहीं उतरता/मुरझाए फूल-से/मिट्टी में लोटते रहते हैं/उनके नंगे बच्चे/उनके पूनम का चाँद/झुलसी रोटी-सा होता है .../हालाँकि टी. वी. चैनलों पर/सीधा प्रसारण होता है/केवल विश्व-सुंदरियों की/कैट-वाक् का/पर उससे भी/कहीं ज्यादा सुंदर होती है/कामगार औरतों की थकी चाल ‘।

तेजी से सांप्रदायिक होती जा रही राजनीति को ‘ पागल ‘ कविता बयाँ करती है। चाहे सन् 1992 का बाबरी मस्जिद विध्वंस हो या 2002 के गुजरात दंगों का जख़्म, यह सब सुशांत के कवि को गहरे स्तर तक प्रभावित करता है। इन दंगों को मानवता के नाम पर कलंक बताते हुए ‘पागल‘ पूछता है... ‘‘ बताओ तुम कौन हो/हिंदू हो या मुसलमान हो.../वह सबसे पूछता है/उसका बाप/बाबरी मस्जिद के/विध्वंस के बाद/दिसम्बर, 1992 में हुए/दंगों में/मारा गया था ../उसका बेटा/2002 में गुजरात में हुए/दंगों में/मारा गया था.../जिन्होंने उसके/बाप को मारा/वे हँसते हुए/उसे पागल कहते हैं/जिन्होंने उसके बेटे को/दंगाइयों से नहीं बचाया/वे हँसते हुए उसे/पागल कहते हैं ‘‘। ‘ कैसा समय है यह ‘ कविता में कवि क्षुब्ध है क्योंकि ‘‘ अयोध्या से बामियान तक/ईराक से अफगानिस्तान तक/बौने लोग डाल रहे हैं/लम्बी परछाइयाँ ‘‘।

सुशांत जनतंत्र में वी. आइ. पी. संस्कृति के खिलाफ हैं। किसी व्यक्ति के आम से ख़ास हो जाने पर सुरक्षा के नाम पर आम आदमी को जो कठिनाई उठानी पड़ती है, उस पर सवालिया निशान लगाती है ‘ वी. आइ. पी. मूवमेंट ‘ कविता ... ‘‘मुस्तैद खड़ा है/ट्रैफिक पुलिस विभाग/चैकस खड़े हैं/हथियारबंद सुरक्षाकर्मी/अदब से खड़ा है/समूचा तंत्र/सहमा और ठिठका हुआ है/केवल आम आदमी का जनतंत्र/यह कैसा षड्यंत्र ? ‘‘ संविधान में गणतंत्र की जो परिभाषा दी गई है, उससे उलट आज समाज में कुछ ख़ास लोगों की सुरक्षा के नाम पर आम आदमी को परेशान किया जाता है। एक वी. आइ. पी. मूवमेंट के लिए घंटों सड़क बंद कर दी जाती है, आम आदमी को रोक दिया जाता है। गणतंत्र के इस स्वरूप पर सुशांत कहते हैं... ‘‘ मित्रो/आम आदमी की असुविधा के यज्ञ में/जहाँ मुट्ठी भर लोगों की सुविधा का/पढ़ा जाए मंत्र/वह कैसा गणतंत्र ? ‘‘

संग्रह को पढ़ते हुए एक साधारण-सी कविता भी अपनी ओर ध्यान खींचती है। इक्कीसवीं सदी में एक कवि की पीड़ा बिल्कुल जायज लगती है जब वह एक बेटी के पिता की पीड़ा और चिंता को बयाँ करता है। घर से बाहर निकली बेटी जब तक घर वापस नहीं आ जाती, तब तक एक पिता की बेचैनी को व्यक्त करती है ‘ लड़की का पिता ‘कविता... ‘‘ लेकिन/डर भी लगता है क्योंकि/बाथरूम के नल में से/झाँक रहा है/इलाक़े का गुंडा/बिल्डिंग की लिफ्ट में/घात लगाए बैठा है/कोई रईसजादा/सामने से बाइक पर/चला आ रहा है/एसिड की बोतल लिए/कोई लफंगा।‘‘

सुशांत सुप्रिय के प्रस्तुत कविता-संग्रह की कविताएँ भाव और भाषा की ताज़गी से युक्त हैं। अपने आस-पास के जीवन और परिवेश को नई दृष्टि से देखना तथा जीवन और जीवनेतर चीजों पर विचार-मंथन करके उन्हें नए रूप में प्रस्तुत करना इनकी विशेषता है। शिल्प और संवेदना... दोनों के धरातल पर ये कविताएँ खरी उतरती हैं। संग्रह की सभी कविताएँ एक से बढ़कर एक हैं। राजनीति से लेकर धर्म तक, समाज से लेकर प्रकृति और पर्यावरण तक, प्रेम से लेकर देश-प्रेम तक,

सभी भावभूमियों की कविताएँ इस संग्रह में हैं। पारदर्शी भाषा से युक्त ये कविताएँ आधुनिक हिंदी कविता को समृद्ध करती हैं।                       -समी. राम पाण्डेय, गोरखपुर 



श्री भालचन्द्र जोशी

शब्दों में जीवन का आवाह्न 

(सुशांत सुप्रिय का कविता-संग्रह ‘अयोध्या से गुजरात तक’)

मनुष्यता की संगत में कविता लिखने का सलीका समय सिखा देता है। कविता कैसी बनेगी, यह उस संगत की समय-सीमा और अन्तरंगता तय करती है। कविता शब्दों में जीवन का आवाहन है। उस पुकार की लय में, उस प्रार्थना की लय में कविता शब्दों की संगत को आकुल हो जाती है। वह निस्तेज शब्दों में प्राण डालने का काम करने लगती है। सुशांत सुप्रिय के कविता संग्रह ‘अयोध्या से गुजरात तक’ को पढ़ते हुए मुझे कुछ ऐसा ही महसूस हुआ। ये कविताएँ जिस निर्मल मन और सजग विवेक से लिखी गई हैं वह कविता के प्रति भरोसे को मजबूत करता है।

‘एक दिन/मैं अपने घर गया/लेकिन वह मेरे घर जैसा/नहीं लगा/’’ (डरावनी बात, पृष्ठ 10) यह सूचना नहीं कविता में भय है। और यदि सूचना है तो भय की सूचना है। इसमें एक ठण्डे समय की आहट को सुनने का आग्रह और उसकी पहचान को स्पष्ट करने का सजग साहस है। ‘‘यह एक डरावनी बात थी/इससे भी डरावनी बात यह थी कि/मैंने पुकारा उन सबको/उनके घर के नाम से/लेकिन कोई अपना वह नाम/नहीं पहचान पाया/’’ (वही, पृष्ठ 11) नामों का, संज्ञाओं को भूल जाना, भय के आतंक में स्मृतियों का बिखराव है। भय स्मृतियों को उठाकर अपरिचय की अनाम नदी में डाल देता है, जहाँ पहचान का डूबने और बह जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। कविता से इतना सघन रिश्ता जो कविता की पहचान के नष्ट होने की संभावना में सिर्फ चिंतित नहीं है बल्कि उसे बचा लेने का अदृश्य प्रयत्न भी है। कविता की पहचान इस अर्थ में कि रिश्तों की पहचान के बीच ही कविता की पहचान छिपी होती है। रिश्तों और कविता की परस्पर निर्भरता उस खोज का संकल्प भी है जो नष्ट नहीं हुई है, सिर्फ गुम है। उसकी पहचान गुम है। मनुष्यता की यह अभिव्यक्ति घृणा की नहीं, एक ऐसे आक्रोश की है जो विवशता से नहीं पहचान के केन्द्र से आता है। ये रिश्ते उत्तर-आधुनिक समय में गुम हो रहे या नष्ट हो रहे बिम्ब और प्रतीकों की सँभाल के साथ जीवनानुभवों की गति की जड़ता को तोड़ने की साहसी शक्ति है।’’ अस्तित्व की सड़क पर/मंजिल ढूँढते हर यात्री के लिए/मील का गड़ा पत्थर है मेरी कविता/तुम्हारी आत्मा के पूरब में उगे/उम्मीद के सूर्य की/लाली है मेरी कविता/’’ (मेरी कविता, पृष्ठ 140) सूर्य का उजाला पूरब से होता है लेकिन कविता महज पूरब से नहीं आ रही है यहाँ। वह आत्मा के पूरब से आती है। जब कविता का रिश्ता प्रकृति के नियामक तत्वों से इतना सघन हो जाता है तब कविता अपने आशय बिखरने या गुम नहीं होने देती। रिश्तों की इस संश्लिष्टता में भी वह अपने आशय कविता से बाहर नहीं गिरने देती है। कविता में शब्दों और आशय की यह सजग देखभाल कविता की देखभाल है।

ये कविताएँ अजीब-सी द्वन्द्वात्मकता में है। कवि अवसाद में है लेकिन कविता अवसाद में जाने को उद्यत नहीं है। इनमें ऐसे अनुभव हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पदों के बड़े अर्थों की सभ्यता को सामने लाते हैं। यहाँ बदलाव की प्रार्थना में एक किस्म का अवसाद भी है जो बीच में कवि को टोकते और तोड़ने की कोशिशों में हताश करने की कोशिश करते हैं। ‘‘जो खुद को/हमारा अजीज दोस्त/बताते थे/उन्हें हम अक्सर/अपने जीवन से/निकल भागता हुआ/देखते हैं/’’ (हम भी क्या चीज थे, पृष्ठ 12) क्या यह सिर्फ रिश्तों के अप्रत्याशित टूटने का इकलौता दुख है ? इसमें मानवीय रिश्तों के प्रति पैदा हो रहे अविश्वास के प्रति अवसाद और वेदना भी है। एक ऐसा छल जो बड़े और लम्बी अवधि के भरोसे को तोड़कर भाग रहा है। यहाँ कवि भरोसे से पलायन और भरोसे के बीच पलता छल भी है। इनमें प्रश्न नहीं है लेकिन अपने अवसाद में गहरी प्रश्नाकुलता दबी है जो जीवन के गहरे अर्थ-सम्बन्धों को संदिग्ध ही नहीं कर रही है बल्कि अविश्वास के मुकाम पर खड़ी कर रही है।

डर, भय, अविश्वास, इन कविताओं में प्रथम दृष्टया केन्द्रीय स्वर लगता है लेकिन इसी के बीच सुशांत बहुत सावधानी और कविता की अनिवार्यता में उम्मीद और बचाव के निराकरण भी रखते हैं जो गद्यात्मक सुझाव नहीं काव्यात्मक आग्रह की भाँति आते हैं/जैसे, ‘‘लुटेरे इधर से ही गए हैं/यहाँ प्रकृति की सारी खुशबू/लुट गई है/भ्रष्ट लोग इधर से ही गए हैं/यहाँ एक भोर के माथे पर/कालिख लगी हुई है/फरेबी इधर से ही गए हैं/यहाँ कुछ निष्कपट पल/ठग लिए गए हैं/हत्यारे इधर से ही गए हैं/यहाँ कुछ अबोध सपने/मार डाले गए हैं/हाँ, इधर से ही गुजरा है/रोशनी का मुखौटा पहने/एक भयावह अँधेरा/कुछ मरी हुई तितलियाँ/कुछ टूटे हुए पंख/कुछ मुरझाए फूल/कुछ झुलसे बसंत/छटपटा रहे हैं यहीं/लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि/यह जानने के बाद भी/कोई इस रास्ते पर/उनका पीछा नहीं कर रहा/’’ (इधर से ही, पृष्ठ 26, 27) यहाँ तमाम क्रूरता और निर्ममता की मार्मिक सूचनाओं के बीच एक विवश चेतावनी है, पराजित दुख है कि इन सबके प्रतिरोध में, कोई आगे क्यों नहीं आया? किसी ने पहल क्यों नहीं की है ? यानी सूचना के बीच ऐसी मार्मिक प्रश्नाकूलता है जो समय की क्रूर और निर्मम हरकतों के सामने खड़ी होती है। अपने समय के सच से सामना करने के लिए, यदि ये कविताएँ एक गहरे आत्म संघर्ष से गुजरती है तो उससे आगे जाकर उसमें कवि की एक विश्व दृष्टि भी नजर आती है। ‘इक्कीसवीं’ सदी के बच्चे के लिए लोरी ऐसी ही कविता है।

बाजार अपने नित नए रूप-रंग बदलने के उपरांत भी पहचान छिपा नहीं पाता लेकिन उससे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अब सर्व-स्वीकृत होता जा रहा है। वह अब कविता में उसे प्रतिकार के पदों का ही इस्तेमाल करने लगा है। बाजार भी शांति, सद्भाव, विश्व मैत्री और मानवाधिकार जैसे पदों का उपयोग करते हुए अपने पक्ष में एक महीन बुनावट में जाल तैयार कर रहा है। वह प्रतिपक्ष में खड़ा होकर पक्षधर लगने लगा है। ऐसे में सुशांत मनुष्यता के रचनात्मक पाठ के लिए जो शब्दों को कविता में इस्तेमाल करते हैं, वे अपने मूल अर्थों को प्रकट करने में सक्षम नजर आते हैं। वे कभी-कभी भय और हताशा-सी लगने वाली भाषा में सचेत करते हैं। ‘‘कई दुख-दर्द/मुझे जी रहे थे/.... कई तारीखों में से/झर रहा था मैं/कई स्मृतियों में/मौजूद था मैं/एक जीवन/मुझ में से होकर/गुज़र रहा था/’’ (लेखा-जोखा, पृष्ठ 130) मनुष्य की सबसे बड़ी पूरे समाज और सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी यही होगी कि वह इतिहास को बनते या होते नहीं देखे बल्कि उस होने में ही ‘झर रहा’ होने को महसूस करे। इतिहास का क्षरण पूरे समय, पूरे कालखण्ड की बड़ी त्रासदी है। व्यक्ति इतिहास में उपस्थित न हो और इतिहास में से भी बीत जाए, गुजर जाए, यह एक डरावना दृश्य है। कोई भी सभ्यता या संस्कृति इतिहास के बीच, इतिहास के साथ अपनी स्वाभाविक सत्ता का विस्तार चाहती है। उसमें जीवन की आश्वस्ति होनी चाहिए।’’ बची हुई हैं अभी/उन सारी जगहों की/ आदिम सुंदरता/उसके हिस्से की रोशनी में/नहाती हुई/’’ (सबसे अच्छा आदमी, पृष्ठ 40) यह बचे हुए की जो पहचान है, यह बड़ी आश्वस्ति है। पहचान की यह निरन्तरता बनी रहनी चाहिए। ऐसी पहचान के हर अवसर के लिए कवि तत्पर है। यह तत्परता भी इस बात की पहचान है कि मनुष्य को, कवि को अपनी रचनात्मकता को किस शक्ति तक ले जाना है और फिर उसकी पहचान स्पष्ट करना है। इसलिए तमाम भय और संदेह के इन कविताओं में रचनात्मक सक्रियता की आकुलता है। वे आज के बदलाव की आहट को ‘कल रात के सपने में’ सुनते हैं। समय की क्रूरता और विसंगतियों को कामगार औरतों के दुख में देखते हैं। सुशांत के पास एक दृष्टि है जिसे वे कविता-विस्तार में भय, दुख, संदेह, हताशा और उम्मीद की ओर ले जाते हैं। इन सबके बीच कविता को हताशा में अकेला नहीं छोड़ते हैं। वे एक आश्वस्ति की पुकार में कहते हैं कि ‘‘वे और होंगे जो/फूलों सा जीवन/जीते होंगे/तुम्हें तो हर बार/भट्टी में तपकर/निकलना है/जागो कि/निर्माण का समय/हो रहा है/’’ (ईंट का गीत, पृष्ठ 48) यह ईंट का गीत मनुष्य की अदम्य जिजीविषा का गीत है। उस उम्मीद और साहस का गीत है जहाँ ‘‘एक दिन मैं/खाद में बदल जाऊँ/और मुझे खेतों में/हरी फसल उगाने के लिए/डाले किसान/’’ (मेरा सपना, पृष्ठ 58) की प्रार्थना का सपना है।

एक दौर या जन कविता में प्रतिकार की भाषा में एक हिंसक शोर और क्रूर आक्रमकता थी। निश्चित रूप से यह शोर और आक्रमकता समय के यथार्थ हिस्सा थे लेकिन कविता में यह प्रतिकृति नहीं इसका निराकृत प्रतिलोक चाहिए था। यह समाज आक्रमकता से नहीं सक्रियता से बनता है। अपेक्षाओं और उम्मीदों के साहस से बनता है। सुशांत अपनी कविताओं में इसी साहस की तलाश भी करते हैं और भय और त्रासदी के बीच उम्मीद के इस साहस को स्थापित भी करते हैं। जीवन में आकर्षण और विकर्षण के बीच वे साहस की कविता रचते हैं। अपनी कविताओं में वे जीवन की गुम हुई जरूरी, मूल्यवान और सार्थक संज्ञाएँ खोज कर लाते हैं और उसे मनुष्यता के पद से जोड़कर उसकी सार्थकता को पुनर्जीवित करते हैं। ‘‘मैं उसे/प्यार से देखता हूँ/और अचानक वह निस्तेज लोहा/मुझे लगने लगता है। किसी खिले सुन्दर फूल-सा/मुलायम और मासूम/’’ (किसान का हल, पृष्ठ 15)। सुशांत जानते हैं कि इस मुलायम और मासूम लगने के लिए लोहे के साथ कवि का प्रयास भी जरूरी है। इसलिए उन्हें पता है कि इस संसार को खूबसूरत बनाने के लिए प्रकृति की हरकतों में मनुष्य की भागीदारी होनी चाहिए।

सुशांत एक डरे हुए सकपकाए समाज को और अधिक संदिग्ध नहीं करना चाहते बल्कि उसे उस भय से छुटकारा दिलाना चाहते हैं। उन्हें शब्दों और कविता पर भरोसा है कि यह भी हवा-पानी की तरह जरूरी है। ये कविताएँ बनावटी जीवन और उत्तर आधुनिक समय का भयावह दृश्य पैदा करती है तो उसके लिए उम्मीद भी बचाकर रखती है। समाज की विसंगतियों और मनुष्य के खिलाफ होते षड्यंत्रों से आहत उनकी कविता महज एक अकेले कंठ का रुदन नहीं है। वे इस कठिन समय में मनुष्य को उसकी त्रासदियों के साथ अकेला छोड़ देने की विवशता से बाहर आना चाहते हैं। उनकी कविता सर्वहारा का उसके समूचे अस्तित्व के साथ स्वीकार की घोषणा है।

‘‘पाँच सितारा होटल नहीं है मेरी कविता/जहाँ तुम्हारी फटी जेब के लिए/‘प्रवेश निषेध’ लगा हो।’’ कविता की चिंता में अयोध्या से लेकर गुजरात तक शामिल है। पूरी मार्मिकता से। अयोध्या से गुजरात तक (कविता संग्रह): सुशांत सुप्रिय प्रकाशक: नेशनल पब्लिकेशंस, जयपुर, ( 2018 ) 




साहित्य में जो स्वर सबसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है आज के दिन वह है कविता का स्वर। आज के दिन किसी कार्य-व्यवहार पर शक गहराता है तो लोग कवि और कविता की तरफ दृष्टि लगाते हैं। पंजाब की हिंदी कविता में जिस एक नाम को बड़े शौक से लिया जाता है, वह हैं सत्यप्रकाश उप्पल। समकालीन कविता से लेकर गजल तक में इनकी अभिव्यक्ति जन-सरोकार से जुड़कर दिखाई देती है। नारेबाजी और गुट-भक्ति से दूर रहते हुए मुक्त भाव से सक्रिय हैं साहित्य-सृजन में। प्रस्तुत संग्रह को पढ़ते हुए आप पायेंगे कि मनुष्य के अत्यधिक हस्तक्षेप से उपजी प्रकृति-दुर्दशा पर सत्यप्रकाश का कवि-हृदय चिंतित है। कवि चिंतित है मनुष्य द्वारा अपनेअपने दरबों में सीमित होते प्रवृत्तियों से। 

बाजार के खिलाफ संघर्ष मनुष्य का इनके यहाँ स्पष्ट दिखाई देता है। स्पष्ट दिखाई देता है सांस्कृतिक प्रदूषण से उपजे संकट। सत्यप्रकाश उप्पल को पढ़ना अपने समय के यथार्थ से जुड़कर चलना ही नहीं है, समय के संकटकालीन परिवेश को बदलने के लिए तैयार भी होना है। भाव एवं भाषा का सामंजस्य इनके यहाँ देखते बनता है। चयन की संजीदगी और प्रस्तुति का विवेक अपनी तरह का है। यह सब होते हुए कविता की कविताई को बचा कर रखना उप्पल को आता है। यथार्थ-अभिव्यक्ति में सपाटबयानी का कोलाज न रचकर ‘सुर’ और ‘लय’ में कहन की ताजगी को बनाकर रखते हैं। आप इनकी कविताओं को पढ़ते समय ऊबते नहीं अपितु अपने समय के सवालों से दो-चार होते हुए जिम्मेदार नागरिक का पाठ पढ़ रहे होते हैं। ये ‘पाठ‘ सर्वथा आधुनिकता बोध में समादृत समकालीनता के दायरे में है। भाव और अभिव्यक्ति में सहजता तो है ही नवीनता भी है। विषयों के दुहराव और शब्दों के घिसाव से कवि बचता है। संवेदना से परिपूर्ण कविताएँ आपको इसी सामाजिकव्यवस्था में रहने और उसे ठीक-ठीक सजानेसंवारने के लिए प्रेरित करती हैं। विभाजन और आतंक से परिपूर्ण परिवेश को कवि नकारता है और समन्वयशील प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए यत्नशील दिखाई देता है। इस प्रकार की यत्नशीलता इधर की पंजाब की हिंदी कविताओं में बहुत कम देखने को मिलती हैं। आलोच्य संग्रह अपना अपेक्षित प्रभाव काव्य-जगत में लेकर आएगा, ऐसा विश्वास है। 

अनिल कुमार पाण्डेय, सहायक प्राध्यापक, हिंदी-विभाग लवली प्रोफेशनल, यूनिवर्सिटी फगवाड़ा, पंजाब, 144411





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